Saturday, January 30, 2010

और वो चला गया,बिना मुड़े....(लघु उपन्यास )--समापन किस्त

(नेहा स्कूल की प्रिंसिपल है.अपने केबिन में अचानक शरद को आते देख चौंक जाती है.और उसे शरद से अपनी पहली मुलाकात याद आने लगती हैं.यह भी कि किशोरावस्था में वह कितनी शैतान थी.सबको कैसे तंग करती रहती थी.शरद ने जब उसके साथ एक छोटी बच्ची की तरह बर्ताव किया तो बहुत नाराज़ हुई थी वह.पर धीरे धीरे शरद से दोस्ती हो गयी और शरद ने घर का बोझिल वातावरण बदलने में बहुत मदद की.धीरे धीरे दोनों के मन में प्यार के अंकुर ने जन्म लिया और बात एंगेजमेंट तक पहुँच गयी.पर एंगेजमेंट के तुरंत पहले लड़ाई शुरू हो गयी और शरद को जाना पड़ा पर उसके पहले उसने नेहा से मिलकर उसे आश्वस्त कर दिया था.)
गतांक से आगे


जैसी की आशा थी (और प्रार्थना भी).... युद्ध बंद हो गया। दोनों पक्षों को जान-माल की भारी हानि उठानी पड़ी। पूरे युद्ध में भारत हावी रहा और इसके जवानों ने अपूर्व वीरता का प्रदर्शन किया था। सारे देश में उत्साह-उछाह की लहर दौड़ गई थी। युद्धस्थल से लौटते जवानों का हर स्टेशन पर भव्य स्वागत होता। उपहार और मिठाइयों के अंबार लग जाते, तिलक लगाया जाता, आरती उतारी जाती।

इस बार उसने भी सक्रिय भाग लिया था, इन सब में। 'लायंस क्लब' में एक कमिटी बनी थी... जिसकी जेनरल सेक्रेट्री का पद संभाला था, उसने। पूरे मनोयोग से जुटी थी इसके कार्यक्रम को कार्यानिवत करने में। खाने-पीने की भी सुध नहीं रहती।

शरद के जौहर के किस्से भी अखबारों में खूब छपे थे.यह सब पढ़ फूली नहीं समाती वह. शहर भर में चर्चा थी। सबकी प्रशंसात्मक नजरों का केन्द्र बन गई थी वह... अब बस इंतजार था उस दिन का, जब शरद के कदम पड़ेंगे, इस जमीन पर। स्वागत का ऐसा सरंजाम करेगी कि ‘शरद‘ भी आवाक् रह जाएगा। बंगले को भी नए ढंग से सजाया-सँवारा जा रहा था।

0 0 0

इधर बहुत दिनों से शरद का कोई पत्र नहीं आया था। इंतजार भी नहीं था... अब तो रू-ब-रू मुलाकात होगी। इतना पता था कि वह अपने घायल साथियों की देख-भाल में लगा है। दोपहर में अलसायी सी लेटी थी कि कॉलबेल बज उठी... पोस्टमैन था... लिफाफा ले लिया।

‘टू नेहा‘ - यह आश्चर्य कैसे? दुबारा पढ़ा, उसी के नाम यह खत था... अब अक्कल आई है, शरद महाराज को। खुशी से दमकता चेहरा लिए, अपने कमरे में आ लिफाफा खोला। ‘ओह! चार पन्नों का खत? और चारों पन्ने बिल्कुल भरे हुए‘ ‘आखिर बात कया है‘...मन ही मन मुस्कराई वह - ‘सारी कसर एक ही पत्र में पूरी कर दी है... थोड़ा सा सब्र नहीं हो सका... दिन ही कितने रह गए हैं, मुलाकात होने में‘ - चलो आराम से पढ़ेगी और पलंग पर लेट... पत्र खोला।

‘नेही... नेही... नेही... नेही...‘

पत्र रख आँखें मूँद ली। लगा ये शब्द कागज पर नहीं उभरे... वरन् उसके कानों में प्रतिध्वनित हो रहे हैं, लगातार। आगे था...

‘नेही, जाने क्यों आज जी कर रहा है, यही नाम लिखता रहूँ, ताजिंदगी। आज लग रहा है, यह मात्र दो अक्षरों से बना शब्द नहीं, धड़कता हुआ एक अहसास है... मेरे पूरे वजूद को थामे रखनेवाली एक सुदृढ़ शक्ति है। क्यों होता है, नेहा ऐसा? आज जब बिछड़ने का समय आया, तब ये अहसास गहरा रहा है कि दुनिया का कोई भी बंधन... इस स्नेह बंधन से मजबूत नहीं... कितना मुश्किल, सच कितना मुश्किल है, इसकी जकड़न से छुटकारा पाना।‘

एकबारगी ही दिल की धड़कन गई गुना बढ़ गई। पत्र काँप गया... ‘बिछड़ने का समय‘ ‘छुटकारा पाना‘ ये सब क्या है। झटके से उठ बैठी और एक साँस में ही, धड़कते हृदय से पूरा पत्र पढ़ गई।

पत्र क्या था... व्यक्ति के कर्त्तव्य और आकांक्षा के द्वन्द्व का दर्पण था। दिल की गहराई से निकले शब्दों में, शरद ने स्थिति बयान की थी। शरद का एक सीनियर था ,"जावेद" जो दरअसल भैया का दोस्त था.स्कूल में भैया और 'जावेद',शरद को अपने छोटे भाई से भी बढ़कर मानते थे. शरद की तरह ही, हँसमुख, खुशमिजाज, साथ ही एक सीमा तक मजाकिया। दोनों की जोड़ी ‘लारेल-हार्डी‘ के नाम से मशहूर थी हॉस्टल में। 'जावेद' को देखकर ही शायद शरद को भी 'आर्मी' ज्वाइन करने का शौक चढ़ा और जब जावेद की बटालियन में ही उसे भी शामिल किया गया तब तो जावेद ने जैसे उसे अपनी छत्र छाया में ही ले लिया.'जावेद' भैया के साथ कई बार घर भी आ चुका था भैय्या से भी अच्छी घुटती थी उसकी .

उसके इतिहास से वाकिफ थी वह। उसने घरवालों के कड़े विरोध के बावजूद गाँव में साथ-साथ बगीचे से आम चुराने वाली, पोखर में तैरने वाली... कबड्डी खेलने वाली अपनी बचपन की संगिनी उर्मिला को अपनी जीवन-संगिनी बनाया था, जबकि उर्मिला ने सिर्फ स्कूली शिक्षा ही पा रखी थी... उर्मिला का घर-बार भी छूट गया था और अब दोस्त ही उनके सब-कुछ थे। दोस्तों का घर ही अब उनका घर था।

और अब वही जावेद जिसने पूरे समाज से लोहा लेकर उसे सुरक्षा प्रदान की थी... अब समाज की बेरहम व्यंगबाणों से बींधने को उसे अकेला, निस्सहाय... निहत्था छोड़ गया था। साथ में दो वर्ष की नन्ही मुन्नी और छः महीने के दूधमुहें बच्चे की जिम्मेवारी भी सौंप गया था।

जावेद ने बड़ी बहादुरी से अपने जख्मों की परवाह किए बिना दुश्मनों से लोहा लिया था। देश को तो उस चौकी पर विजय दिला दी... उसने जबकि अपनी जिंदगी हार बैठा। हॉस्पिटल में एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते, जावेद की कोशिशों का साक्षी था, शरद। तन-मन की सुध भूल अपने जिगरी-दोस्त को काल के क्रूर हाथों से बचाने की पुरजोर कोशिश की थी, शरद ने। पर नियति ने अपने जौहर दिखा दिए। बड़ी निर्ममता से नियति के हाथों छला गया वह। शरद ने जैसे लहू की स्याही में कलम डुबो कर लिखा था... अक्षर कई जगह बिगड़ गए थे।

‘... ईश्वर न करे कभी किसी का ऐसे दृश्य से साक्षात्कार हो। नेहा, यदि तुम सामने होती तो सच कहता हूँ जावेद की स्थिति देख, गश आ जाता तुम्हें। जावेद का शरीर गले तक सुन्न हो गया था। मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था, आवाज आनी भी बंद हो गई थी। सिर्फ उसकी बड़ी-बड़ी आँखें खुली थीं जो सारा वक्त छत घूरती रहतीं। डॉक्टर भी आश्चर्यचकित थे कि कैसे सर्वाइव कर रहा है, वह। लेकिन मैं जानता था, दो नन्हें-मुन्नों और एक बेसहारा नारी की चिंता ने ही उसकी साँसों का आना-जाना जारी रखा है। असहनीय पीड़ा झेलते हुए भी उसने अपनी जीजिविषा बनाए रखी थी। लाल-लाल आँखें, बेचैनी से सारे कमरे में घूमती और मुझपर टिक जातीं। सच, नेहा उन आँखों का अनकहा संदेश... बेचैनी देख पत्थर दिल भी मोम हो जाता। शायद ऐसे ही वे क्षण होते हैं, नेही, जब आदमी अपना सर्वस्व अर्पण करने को उद्धत हो जाता है। ... कब सोचा था? जिंदगी, ऐसे मोड़ पर भी ला खड़ा करेगी... जिस दोस्त के संग जीवन के सबसे हसीन लम्हे गुजारे थे... उसी के लिए मौत की दुआ मांग रहा था मैं। और वह भी उस दोस्त के लिए नेहा,जिसने अपनी ज़िन्दगी मेरे नाम लिख दी. हाँ, नेहा....उस चट्टान की ओट में हम दोनों ही थे..मैं जैसे ही आगे बढ़ने को हुआ,जावेद सर ने मुझे पीछे धकेल दिया.और खुद आगे बढ़ कर जायजा लेने लगे....और एक गोली उन्हें चीरती हुई निकल गयी.उस गोली पर मेरा नाम लिखा था, नेहा....मेरा...तुम्हारे शरद का (आगे स्याही बदली हुई थी ... लग रहा था इस मोड़ पर आकर शरद की लेखनी आगे बढ़ने से इंकार करने लगी... अक्षर भी अजीब टेढ़े-मेढ़े थे, जो थरथराते हाथ की गवाही दे रहे थे।)

‘... और जावेद को शांति से इस लोक से विदा करने की खातिर, मैंने उसके समक्ष प्रतिज्ञा की, बार-बार कसम खायी कि आज से उसके परिवार का बोझ मेरे कंधे पर आ गया। प्राण-पण से उनके सुख-दुख का ख्याल रखूंगा मैं... उसके बच्चों की सारी जिम्मेवारी अब मुझ पर है... पहली बार उन आँखों की लाली कुछ कम हुई... आश्चर्य!! उसके सुन्न पड़े शरीर में एक हरकत हुई। उसके हाथ उठे, शायद मेरा हाथ थामने को लेकिन बीच में ही गिर गए... बस आँखें मुझ पर टिकी रहीं... उनमें प्रगाढ़ स्नेह से आवेष्टित कृतज्ञता का भाव तैरते-तैरते जम गया था।... चेहरे पर अपूर्व शांति फैली थी... और नेहा... मेरा मित्र सदा-सदा के लिए सो गया।‘

मुझे कोई अफसोस नहीं नेहा, झूठ नहीं कहूँगा... अफसोस था जरूर। उस सारी रात मेरी पलकें नहीं झपकीं। यह क्या कर डाला, मैंने। लेकिन जब वह दृश्य देखा, मेरी रूह काँप उठी। उर्मिला के मायके और जावेद के पिता... दोनों जगह यह मनहूस खबर देने को मैंने ही फोन किया।

अगली सुबह ही, जावेद के पिता तो आ गए पर उर्मिला के घरवालों ने आजतक कोई खोज-खबर नहीं ली। शादी के वक्त जैसा उन्होंने कहा था... उर्मिला सचमुच उस दिन से ही मर गई थी उनके लिए। फिर भी... मैं कहूँगा... उस ताड़ना से जो जावेद के पिता ने उर्मिला को दिए, उनकी बेरूखी लाख दर्जे बेहतर थी। वे जावेद की कब्र पर तो फातिहा पढ़ते रहे लेकिन इन बिलखते बच्चों और उस उजड़ी-बिखरी नारी की ओर आँख उठा कर भी न देखा।

जब जावेद के पिता जाने लगे तो आँसुओं में डूबी उर्मिला ने उनके पैरों पर माथा टेक दिया -‘अब्बा! अब आपके सिवा मेरा कौन सहारा है। इन जावेद के जिगर के टुकड़ों का ख्याल कीजिए... इतने नौकर-चाकर पलते हैं, आपके साए में, ये भी दो सूखी रोटी पर पल जाएंगे-‘ लेकिन हैदर साहब ने जोरों से पैर झटक दिया... उर्मिला का माथा दीवार से जा टकराया। जोरों से गरजे वह -‘काफिर! अपनी मनहूस सूरत न दिखा, मुझे। पहले तो जावेद को हमलोगों से दूर किया और अब इस जहान से भी दूर कर दिया... तेरा साया भी न पड़ने दूँगा, अपने खानदान पर... दूर हो जा मेरी नजरों से अपने इन पिल्लों को लेकर।‘

लेकिन उर्मिला ने फिर उनके पैर पकड़ लिए। वे बार-बार पैर झटक देते और अनाप-शनाप बोलते रहते। लेकिन उर्मिला जैसे ‘उन्माद-ग्रस्त‘ हो बार-बार अपना सर उनके पैरों पर पटक देती। आखिर मैं जबरन हाथ-पैर झटकती उर्मिला को अंदर ले गया। हैदर साहब ने पलट कर भी नहीं देखा और चले गए.
बार-बार ये दृश्य कौंध जाता है, आँखों के समक्ष और मैं सर्वांग सिहर जाता हूँ।

नेहा, अब तुम शायद मुझे ‘जज‘ कर सको। जानता हूँ नेही... ये तुम्हारे प्रति अन्याय है। लेकिन मैं तुम पर छोड़ता हँू ... ‘बोलो क्या यह अन्याय है?‘

कौन है अब, उर्मिला भाभी का इस दुनिया में। कौन उन मासूमों की देख-भाल करेगा। गाँव के स्कूल से दसवीं पास उर्मिला भाभी.... क्या कर पाएंगी जावेद के सपनों को पूरा... जो उसने इन बच्चों के लिए देखे थे। नेही... ये जीवन तो अब इन बच्चों के लिए समर्पित है। यह जावेद सर की दी हुई ज़िन्दगी है,और अब इसपर सिर्फ उनके बच्चों का हक़ है.

मुझे पता है,नेहा तुम बहुत समझदार हो.सब संभाल लोगी पर मुझे खुद पर भरोसा नहीं.और नेहा, मैं किसी मल्टी नेशनल में काम करने वाला एक्जक्यूटिव नहीं हूँ.कि देश विदेश घूमूं और मोटा सा लिफाफा हर महीने घर आ जाए.मैं कभी तपती रेगिस्तान में और कभी सियाचिन की बर्फीली हवाओं से जूझने वाला अदना सा सैनिक हूँ.बस अपनी कमाई से जावेद सर के इन दोनों बच्चों को अच्छी ज़िन्दगी दे सकूँ तो अपनी ज़िन्दगी सफल मानूंगा.

‘क्षमा? .. ना ... क्षमा नहीं माँगूंगा... यह एक शहीद की आत्मा का अपमान होगा... नेहा... मुझे प्रेरणा दो... मेरी शक्ति बनो ताकि मैं एक शहीद के सम्मान की रक्षा कर सकूँ।‘

भूल जाओ... यह भी नहीं कहूँगा... जानता हूँ भूलना इतना आसान नहीं...तुम्हारा अपराधी हूँ.वो सारी भावनाएं तुम में जगाईं , जिनसे अछूती थी तुम.पर क्या करूँ,नेहा...कोई रास्ता नज़र नहीं आता,एक दूसरे को भूलने के सिवा...इसलिए कोशिश करने में क्या हर्ज है? यह मुझे भी सुकून देगा, तुम्हें भी।

अच्छा अब विदा... विदा नेही मेरी, अलविदा (विदा कहते शब्द भी कराह रहे हैं,नेही... नहीं?)

तुम्हारा

....(अब भी लिखने की जरूरत है :))



लगा, जैसे किसी ने आसमान में उछाल कर धरती पर पटक दिया हो... अभी... अभी कहाँ थी वह, और अब कहाँ है? क्यों दुनिया की सारी कड़वाहटें उसी के हिस्से लिखी है... पत्र हाथों से गिर पड़ा और सारी चीजें घूमती नजर आने लगीं... ‘ओऽऽह! शऽऽरऽऽद‘

धीरे-धीरे मुंदती पलकों वाले शरीर को बेहोशी ने अपने आगोश में ले लिया। पत्र से फिसल कर एक सूखे घास का छल्ला सा गिर पड़ा था...जिस पर उसका ध्यान ही नहीं गया।

0 0 0


मिनटों में ही जैसे सारा पिछला जीवन जी गई -- व्यस्त होने का बहाना अब बिखरने लगा था। फाइल में गड़ी नजरें धुँधली पड़ने लगी थीं, अक्षरों की पहुँच तो पहले भी दिमाग तक नहीं थी। किसी तरह खुद को साध... शर्मा को आवाज दी...

‘येस मैडम‘ - सुन भी बिना नजरें उठाए कहा -‘एडमिशन रजिस्टर ले आइए‘ - (शर्मा थोड़ा चौंक गया... क्योंकि ‘मिड-सेशन‘ में वह कभी भी एडमिशन की इजाजत नहीं देतीं।)

शरद इतनी देर तक कुर्सी से पीठ टिकाए, एक प्रिंसिपल की व्यस्तता टॉलरेट कर रहा था। अभी भी नजरें तो फाइल पर ही जमीं थीं लेकिन कान शर्मा और शरद के बीच होते प्रश्नोत्तर पर ही लगे थे - फादर्स नेम की जगह सुना - ‘जावेद खान‘ और नजरें हठात् ही चौंक कर उठ गईं। जाने किस अदृश्य शक्ति से प्रेरित हो, शरद ने भी उसकी ओर देखा। और पल भर के आँखों के क्षणिक मिलन में वर्षों का अंतराल ढह गया।

आखिरकार... उसे फाइल गिराना ही पड़ा और बिखरे कागजों को समेटने के बहाने... अंदर का सारा कल्मष बह जाने दिया। व्यवस्थित होकर जब सर उठाया तो ये दूसरी ही नेहा थी। इतनी जल्दी संभाल लेगी, खुद को...यकीन नहीं था और अभी क्षण भर पहले की बेचैनी पर मन ही मन हँसी आ रही थी। ओह! आज इतने सारे काम निबटाने हैं उसे और वह यों निष्क्रिय बैठी अतीत के समंदर में गोते लगा रही है। बरसो पहले उसने एक पतिज्ञा की थी कि खुद भले ही 'दीपशिखा' की तरह जलती रहेगी पर जितना हो सके प्रकाश फैलाने की कोशिश करेगी ।

फुर्ती से फाइल पर कलम चलानी शुरू कर दी।इस रफ्तार से काम करने पर अपने स्कूल को इस शहर के ही नहीं, पूरे राज्य के और हो सके तो पूरे दशे के शीर्षस्र्थ विद्यालयों के बीच देखने का सपना कैसे पूरा हो सकेगा ?? आज ही किस कदर व्यस्तता है, स्टाफ की मीटिंग है, डी. एम. से भी अप्वाइंटमेंट है। और प्यून की पोस्ट के लिए कुछ इंटरव्यूज भी तो लेने हैं... और... और अभी राउंड पर भी तो जाना है... लेकिन ये शरद... ना शरद कौन... मि. मेहरोत्रा क्यों अभी तक बैठे हैं जबकि इनके वार्ड को ‘मिसेज जोशी‘ लेकर जा चुकी है... ये बच्चे से विदा भी ले चुके हैं... फिर? एक-दो बार उसने सवालिया निगाहों से उसे देखा भी पर... शरद तो... ओह! नो... मित्र मेहरोत्रा की आँखें तो खिड़की से भीतर आ गए बोगनवेलियां की कुछ लतरों पर जमी थीं।

जोर की आवाज से उसने फाइल बंद की तो शरद ने चौंक कर उसकी तरफ देखा। उसने एक प्रोफेशनल मुस्कान चिपका ली - ‘आइए, मि. मेहरोत्रा मैं, स्कूल के राउंड पर जा रही हूं... आप भी चलना चाहें तो चलें... हमारा स्कूल भी देख लेंगे‘ ... और वह उठा खड़ी हुईं।

शरद ने बिना कुछ कहे, धीरे से कुर्सी खिसकायी और उसके साथ हो लिया। पूरी बिल्डिंग की परिक्रमा कर आई... कहीं... बच्चों से कुछ पूछा... कहीं टीचर्स से कुछ बात की... शरद बस साथ बना रहा।

आखिरकार अब उस बरामदे पर पहुँच गई, जिससे सीढ़ियाँ उतर कर बस दस कदम के फासले पर लोहे का बड़ा गेट था। फिर मुस्करा कर... ‘अच्छा तो‘ के अंदाज में शरद की तरफ देखा। पर शरद तो जैसे पाकेट में हाथ डाले किसी गहन विचार में मग्न था... ‘अब क्या ऽऽशरद... बरसों पहले जो फैसला लिया... अटल रहो न उस पर... इतने दिनों बाद पीछे मुड़ कर क्यों देखना चाहते हो ‘ तुम तेज रफ़्तार से अपनी ज़िन्दगी की राह पे कदम बढा रहें हो,(उसकी कामयाबी के किस्से अक्सर अखबारों में पढ़ती रहती थी)...और उसने भी खुद को समेट कर अपने लिए यह राह चुन ली है दोनों राहें कितनी जुदा हैं एक दूसरे से.

असमंजस में दो पल खड़ी रहीं, फिर निश्चित कदमों से सीढ़ियों पर पैर रखा और बिना मुड़े गेट तक पहुँच गई... शरद ने भी अनुकरण किया... बाहर उसकी जीप खड़ी थी। शरद अब भी चुप खड़ा था। चाहता क्या है आखिर, शायद उसे भी नहीं पता... क्या चाहता है, वह? क्यों खड़ा है? दोनों पाकेट में हाथ डाले, उसने खोयी-खोयी निगाहें उसके चेहरे पर टिका दीं। नजरें जरूर उसके चेहरे पर थीं। पर वह जैसे उसे देख कर भी नहीं देख रहा था। क्षण भर को वह भी, जैसे वहाँ होकर भी नहीं थी।

एकाएक... खन्न की आवाज आई। दोनों ने चौंक कर देखा, एक बच्चा कंकड़ों से पेड़ पर निशानेबाजी का अभ्यास कर रहा था। वहीं से एक नया संदर्भ मिल गया। अब इस मुलाकात पर ‘द एण्ड‘ लगाना ही होगा। शरद की ओर देखा और पाया की इस आवाज ने शरद को भी धरा पर ला खड़ा किया है।

पूरी चुस्त-दुरूस्त मुद्रा में बड़ी गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया... थैंक्यू कहा और एक ही छलाँग में जीप पर सवार हो गाड़ी स्टार्ट कर दी पूरे वेग से काली सड़क पर जीप दौड़ पड़ी....और वह चला गया ,बिना मुड़े।

शिथिल कदमों से लौट पड़ी वह और बैग से काला चश्मा निकाल, लगा लिया आँखों पर... जबकि आकाश में फिर से काले-काले बादल घिर आए थे।


(इति - शुभम्)

29 comments:

वन्दना said...

रश्मि जी
आज इस कहानी ने कई बार पढ़ते पढ़ते रोंगटे खड़े कर दिए..........कहानी क्या थी जैसे चलचित्र आँखों के आगे चल रहा हो हर दृश्य जैसे आँखों के आगे घटित हो रहा हो.........सच्चे प्रेम की अभूतपूर्व मिसाल बन गयी है और साथ ही कर्त्तव्य की भावना सर्वोपरि होती है ये इस कहानी से शिक्षा मिलती है ...........मगर कहना कितना आसां होता है ना..........जिस पर गुजरी उस दर्द को समझना हर किसी के बस की बात नही होती.........एक बहुत ही सशक्त लेखन का परिचायक है आपकी ये कहानी ............बधाई स्वीकारें.

kase kahun?by kavita. said...

bahut sunder,yathrth ke dharatal par rachi ek kahani.badhiyan.

विनोद कुमार पांडेय said...

जिंदगी में कई मोड़ ऐसे आते है जहाँ आदमी को अपने प्यार, भावना और रिश्तों के अहमियत की भी परीक्षा देनी पड़ती है कुछ ऐसे ही ज़ज्बात को समेटते हुए यह कहानी थी....मैने बीच में एक दो कड़ियाँ मिस कर दी अब उसे भी ढूढ़ कर पढ़ुंगा....एक बेहतरीन कहानी प्यार का एक अलग रूप दर्शाती हुई...बधाई रश्मि जी आगे भी मैं ऐसे सुंदर कहानियों का इंतज़ार करूँगा...बहुत बहुत धन्यवाद

arun pandey said...

रश्मि जी ,सॉरी ..
मेरा दिल शायद इतना कठोर नहीं ,जो इतना अंतर्द्वंध झेल सके ,
शरद और जावेद .........उत्पन्न परिस्थितियों में शरद का निर्णय
बहुत ही खुबसूरत लगा , विजयी सैनिकों का स्वागत भी शानदार ,
नेहा ने दिल ही दिल में जो प्यार का अहशास कर रही थी ....बेमिसाल .
लेकिन अंततोगत्वा जो हुआ उसे सहजता से मै स्वीकार कर शांत रहू ,मुझसे नहीं हो रहा
ना जाने उर्मिला ,जावेद ,शरद ,या कि नेहा ने मेरे दिल को इतना .... ...
मेरे आँख भर आये .
रश्मि जी प्लीज़ मेरे सामने ऐसे-२ ...भगवान् करे ये कहानी ही हो
सच न हो कभी ..
रश्मि जी ......... प्लीज़ ऐसा नहीं ......प्लीज़ .......

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

ऐसा पढ़ने पर मन मानवीय गुत्थियों के समाधान का यत्न करने लगता है। पर अफसोस, मैं कोई ठोस विचार न बना पाया।
बड़ा झमेला है जीवन!
बहुत सुन्दर लिखा है।

shikha varshney said...

ahhhhhhhhhhhh इसी बात का डर था मुझे..".कितना आसान है कहना भूल जाओ,कितना मुश्किल पर......"...बहुत संवेदनशीलता है लिखा है आपने ये उपन्यास ...आगे सुखांत कहानी का इंतज़ार रहेगा..

sangeeta swarup said...

बहुत सुन्दर लघु उपन्यास.....मन तक पहुंचा....बहुत संवेदनशील....अंत तक उत्सुकता बनी रही.....

अच्छे लेखन के लिए बधाई

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर लिखा है।

संजय भास्कर said...

बहुत संवेदनशील है।...

वाणी गीत said...

कहानी के इस मोड़ पर पहुँचने का अंदेशा तो कब से ही था ...मार्मिक ....इतना करीब आकर दूर हुए रिश्ते भीषण दुःख पहुंचाते हैं ..नेहा और शरद का दुःख जैसे सामने पसर गया है ...

मगर यह भी कहूंगी कि मैं इस तरह की भावुकता को बेवकूफी मानती हूँ ...शरद जावेद के बच्चों को नेहा से शादी करने के बाद भी सुरक्षा प्रदान कर सकता था ...बल्कि नेहा इसमें उसका साथ ही निभाती ...और उर्मिला का भविष्य संवारने में उसकी मदद भी करती .....नेहा को नेह बंधन टूटने का दुःख क्यों झेलना पड़ा जब कि जीवन संगिनी के रूप में वह हर कदम पर शरद का साथ ही देती ...सोचना इस तरीके से भी ....!!

खुशदीप सहगल said...

रश्मि बहना,
अल्टीमेट...इससे आगे कुछ और कहने को नहीं है मेरे पास इस कहानी के लिए...

मुझे गलत साबित किया, शरद सरहद और ज़िंदगी के मोर्चे, दोनों जगह ही हीरो साबित हुआ...और नेही...क्या विशाल हृदय का ही दूसरा नाम नारी है...नेही को सैल्यूट...इस कहानी ने सिलसिला फिल्म की याद दिला दी...अमिताभ बच्चन को ऐसे ही हालात में जया से शादी करनी पड़ती है...प्रेमिका रेखा के साथ ज़िंदगी के
हसीन ख्वाब देखने के बावजूद...लेकिन बाद में गुरुद्वारे में बैठ कर अमिताभ को जया के साथ सात फेरों के रिश्ते का अहसास होता है...अद्भुत दृश्य उकेरा था वो यश चोपड़ा ने...सीडी पर एक बार फिर उस दृश्य को महसूस कीजिएगा, कभी मौका मिले तो...

सुंदर कहानी है, बॉलीवुड में किसी प्रोड्यूसर को भेज दीजिए...अच्छी फिल्म बनने की सारी संभावनाएं मौजूद हैं...एक बात और...बहन से हार में भी भाई की जीत होती है...

जय हिंद...

rashmi ravija said...

खुशदीप भाई...कैसी हार और जीत??...मुझे तो अच्छा लगा,आपने इतने ध्यान से पढ़ा और चिंतित थे कि कहीं predictable end ना हो, इस कहानी का और शरद...शहीद ना हो जाए...मुझे तो बहुत ख़ुशी हुई कि आपको इतना अच्छा लगा ये लघु उपन्यास.

और कहाँ बॉलीवुड के सपने देखूं??...आजकल तो टी.वी.धारावाहिक का ज़माना है और आप टी.वी.वाले ही हैं...फिर दिए सारे सर्वाधिकार आपको..(अब,पड़ गए ना मुश्किल में :D)

दीपक 'मशाल' said...

wah chala gaya bin mude.. sach me.. pata nahin kyon ant ka kuchh hissa apna sa laga.. poori kahani rula gayi di..
Jai Hind...

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत मार्मिक और संवेदनशील, शुभकामनाएं.

रामराम.

Raviratlami said...

इस पूरे उपन्यास को स्क्रिब्ड पर या आर्काइव.ऑर्ग पर पीडीएफ़ फ़ाइल में भी प्रकाशित कर दें तो उत्तम रहेगा. इसमें कोई समस्या हो तो बताएँ

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सोचा ही नहीं था कि उपन्यास में इतना मार्मिक मोड भी आयेगा. एक स्त्री ही इतना बडा त्याग इतनी गम्भीरता के साथ कर सकती है. इतना चुलबुला रिश्ता इतनी गम्भीरता के साथ जुदा होगा , अकल्पनीय. सुन्दर, सार्थक और सटीक भाषा शैली से सुसज्जित उपन्यास. बधाई.

गौतम राजरिशी said...

शायद आपको पता नहीं हो, किंतु एक ऐसी ही घटना हो चुकी है बिल्कुल कि जब एक आफिसर की शहादत के बाद उसी युनिट के एक जुनियर ने शहीद हुये आफिसर की विधवा का हाथ थामा....

अच्छी कहानी लिखी है, मैम।

सारिका सक्सेना said...

हम आपकी इस कहानी से इतना जुड चुके थे कि यकीन सा नहीं हो रहा है कि अब और कोई अगली कडी नहीं आयेगी। जानने की उत्कंठा तो थी कि आगे क्या होगा, अंत में ये होगा कि वो। पर आज कहानी खत्म होने पर सूनापन सा लग रहा है कि अब कोई संभावना कोई कल्पना नहीं है। शायद हम कुछ ज्यादा ही जुड जाते हैं किरदारों के साथ।
अब आते हैं कहानी के अंत पर। कहानी का अंत हमारे हिसाब से तो जो है और कुछ हो ही नहीं सकता था। एक लेखक की क्रति भी सृष्टि की किसी भी अन्य रचना की तरह ही होती है जो जैसी एक बार बन गई उसे बदला नहीं जा सकता। और जाने क्यों हमें कहानी दुखान्त नहीं सुखान्त ही लगी। खो कर पाने में जो जीत है जो जज़्बा है वो सबकुछ पा लेने में नहीं है। ज़िन्दगी में कुछ कर दिखाने, कुछ बन पाने का जुनून जो है वो किसी के लिये या किसी को खोकर ही आता है। अगर शरद और नेहा एक दूसरे को मिल गये होते तो कहानी कुछ बात ही नहीं होती।
बहुत ही अच्छा लगा आपको पढकर।
अब मन का पाखी पर आने की और कुछ नया पढने की आदत सी हो गई है। कुछ नया परोसती रहियेगा हम साहित्य प्रेमियों के लिये।

HARI SHARMA said...

रश्मि जी आपने पूरी कहानी को बहुत से रन्ग भरते हुए पूरा किया है. आपने जो प्रवाह रखा उसने इस कहानी के उत्सुकता को निरन्तर बनाये रखा. अन्त का चित्र तो आपने शीर्षक से ही खीच दिया थ बस उसे एक स्पष्ट रूप देना था. दुनिया मे बहुत ही कम लोग होते है जो जीवन मे कर्तव्य को जीवन की चाही हुइ खुशियो से अधिक महत्व देते है. बडे अच्छे अच्छे कमेन्ट आ रहे है. सिलसिला से कथानक थोडा सा मिलता है लेकिन बहुत थोडा.

'अदा' said...
This comment has been removed by the author.
'अदा' said...

कहानी का अंत वास्तव में अपेक्षा से अलग हुआ है...अच्छी बात है कि मार्मिक है दुखांत नहीं....
नेहा का त्याग अवश्य प्रशंसनीय है लेकिन शरद का भी त्याग अनुकरणीय है.....उसने न सिर्फ त्याग किया है बल्कि दूसरे के बच्चे को अपनाया है....दूसरे कि पत्नी को अपनाया है और एक अपराधबोध को अपने सीने में ढोया है सारी उम्र...इतने सारे समझौते और अपराधबोध के साथ जीवन जीना बहुत कठिन होता है..इसलिए मेरी दृष्टि में नेहा से भी ज्यादा बड़ा त्याग शरद का है...
कहानी बहुत अच्छी लगी है...अंत तक पाठक बंधे रहे हैं...
बधाई..

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा लगी यह दिल को छूती कहानी..एक साथ पढ़ी..

shikha varshney said...

रश्मि! उस दिन तो जरा जल्दी में थी पर कहानी का अंत देखने का मोह नहीं छोड़ पाई इसलिए सरसरी तौर पर पढ़ कर चली गई....आज पढ़ी है इत्मिनान से.....एक बात कहूँ... शुखदीप जी कि बात पर गौर करो...वाकई एकदम हिट कहानी है..सब कुछ है इसमें ..दर्द,प्यार ,रोमांस,मिलना विछुड़ना,चंचलता,त्याग...और एक रोचक लेखन शैली....और क्या चाहिए एक हिट फिल्म बनाने के लिए .
प्यार और फ़र्ज़ के बीच के असमंजस और त्याग की शक्ति को बहुत शालीनता और सहजता से उकेरा है आपने..बहुत बधाई इस सफल उपन्यास के लिए .

निर्मला कपिला said...

रश्मि कहानी का अन्त चाहे दुखद रहा मगर फिर भी अच्छा लगा कहानी समाज को सन्देश देती है । आज कल इन्सान मे से भावुकता और संवेदना खत्म हो रही है मगर कहानी ऐसी विधा है जो समाज का चेहरा दिखाने के साथ साथ समाज के लिये कुछ माप दंद भी तय करती है आदमी को कई बार सोचने पर मजबूर कर देती है जिसने कभी कौये की कहानी लिखी य्ही उसने शायद यही सोच कर लिखी थी कि बच्चे इस से शिक्षा लेंगे मुझे लगता है कि चाहे लोग इसे भावुकता कहें या आदर्श्वाद मगर कहानियों मे इसका होना बहुत जरूरी है। और तुम ने इस बात को बहुत ही सुन्दर तरीके से निभाया है ये कोरी भावुकता नही है ऐसा होता है समाज मे और होना भी चाहिये नेही जैसी लडकियाँ और शरद जैसे लडके। बहुत रोचक रही शैली कथानक कथ्य शिलप हर तरफ से एक दम मुकम्मलिस लघु उपन्यास के लिये बधाई अब इसे छपवाने की तैयारी करो बस। शुभकामनायें

खुशदीप सहगल said...

चलो इसी बहाने शिखा जी ने मुझे नया नाम तो दे दिया...शुखदीप...कितना क्यूट है न... मेल शूर्पनखा की याद दिलाता है...

जय हिंद...

shikha varshney said...

ahhh.oooopssssssss.........sorry khushdeep sir! realy sorry...
vaise sachh main cute hai naam h aha ha ha h.

चण्डीदत्त शुक्ल said...

स्तब्ध करने वाला अंत. रोचक लेखन, हमेशा की तरह।

manu said...

वहीं से एक नया संदर्भ मिल गया। अब इस मुलाकात पर ‘द एण्ड‘ लगाना ही होगा। शरद की ओर देखा


और पाया की इस आवाज ने शरद को भी धरा पर ला खड़ा किया है....................................................

चलिए मैम...
आपने ठीक ठाक ही अंत कर दिया कहानी का...
लास्ट में आये थे तो हिम्मत नहीं हो रही थी आखिरी किश्त पढने की...

Deepak Shukla said...

Hi..
Aapko SHIKHA ji ke blog par dekha tha aur aaj fursat ke lamhon main aapke 'MAN Ke Pankhi' ke sang vicharne ka saubhagya mila.. Aur sanyog se aapke Laghu Upanyas par aapki vistrut tippaniyon ke saath aapke upanyas ki samapan kishti bhi padh paya..
Upanyas ke marmik ant se hi pure upanyas ki rochakta ka ahsaas ho raha hai ki usme aapka purn pathak varg aapki kahani ke sang sang sukhant ant ki kamna karta raha..
Mujhe bhi aapki kahani etni rochak lagi ki main ese vastutah ek saans main hi padha..

Har kathakar apni soch, kalpana, aur kahahi ki rochakta ke aadhar par apni kahani a ant karta hai. Parantu aapne apni kahani ka ant apne prabhudh pathak varg ki echhanusar hi kiya hai..badhai..

Par ek baat jo dil main khatak rahi hai wo ye hai ki Sharad ne bachche ke pita na am Javed hi bataya, yani Sharad ne Javed ki vidhwa se shadi nahi ki (aapne swaym hi kabool kiya hai ki dono ki shadi nahi hui), tab Sharad Neha ke sath rahkar bhi apne divangat Shahed mitr Javed ki vidhwa aur bachchon ka khayal rakh sakte the.. Haan agar wo apne Shaheed mitr ki vidhwa se vivah karkte tab alag baat hoti..
Barhaal.. Kahani padhkar achha laga.. Bhavishya main aur kahaniyan padhne ko milengi aisi asha hai..
Dhanyawad..
DEEPAK..