Monday, January 11, 2010

और वो चला गया,बिना मुड़े....(लघु उपन्यास)--3


(नेहा स्कूल की प्रिंसिपल है.अपने केबिन में अचानक शरद को आते देख चौंक जाती है.और उसे शरद से अपनी पहली मुलाक़ात याद आने लगती हैं.यह भी कि किशोरावस्था में वह कितनी शैतान थी.सबको कैसे तंग करती रहती थी.शरद ने जब उसके साथ एक छोटी बच्ची की तरह बर्ताव किया तो बहुत नाराज़ हुई थी वह)

गतांक से आगे

तभी मम्मी आई और चिंतित स्वर में बोलीं -‘बुआ की तबितयत, अचानक खराब हो गई है, रमण का फोन आया है, मुझे तुरंत जाना होगा, लौटने में शायद शाम हो जाए, गेस्ट-रूम शरद के लिए ठीक करवा देना। खाने में ये ये बनवा लेना और... और अपनी शरारतें जरा बंद रखना।‘

वो ऽऽ मारा... इससे अच्छी बात भला और क्या हो सकती है। अब तो पूरा चार्ज ही मिल गया... चलो मि. शरद... आगे-आगे देखो, होता है क्या। प्रकट में बोली -‘मम्मी, बस ऐसे ही सब मुझे दोष देते हैं... क्या करती हूँ मैं, एक भी शिकायत मिले तो देखना।‘

‘नहीं कुछ देखना-वेखना नहीं, मुझे मिलनी ही नहीं चाहिए-‘ मम्मी को कुछ सुनने की फुर्सत नहीं थी। तुरंत बाहर निकल गईं।

खुशी से उछल पड़ी वह और अचानक पंचम सुर में अलाप उठी... ‘आ ऽ ऽ देखें जरा, किसमें कितना है दम, ख्याल आया तो हड़बड़ा कर चुप हुई।‘

कार स्टार्ट होने की आवाज आई तो वह झपटकर ड्राइंगरूम में आ गई। ऐसी चाय, भला चुपचाप पीने का मजा क्या? जल्दी से ढूढ़-ढ़ाँढ़ कर एक शास्त्रीय संगीत का सी.डी.लगा दिया । असली मजा तो अब आएगा जब वेस्टर्न म्युजिक पर थिरकने वाले को यह संगीत भी गटकना पड़ेगा। मुस्कराहट दबाते, एक पत्रिका में मुँह छुपाकर बैठ गई।

कप रख, खड़े हो, शरद ने एक जोरदार अँगड़ाई ली (मानो, इस चाय ने सारी थकान दूर कर दी हो) और एक अदद मुस्कराहट के साथ पूछा -‘कब से शुरू किया है, ये शास्त्रीय संगीत सुनना ?‘

जी में आता है, नोच कर फेंक दें इस मुस्कुराहट को। सच में अगर देखती रही तो कुछ न कुछ कर बैठेगी। इतना गुस्सा आता है, आज तक, इस तरह किसी ने उसके अस्तित्व को नहीं नकारा। पन्ने पर नजर गड़ाए ही रहस्यमय ढंग से बोली -

‘कब्भी से नहीं।‘

‘यही मैं भी सोच रहा हूँ।‘ -छूटते ही शरद बोला।

‘क्या ऽ ऽ‘ - अब चैंकी वह।

‘यही कि दूसरा कुछ नहीं मिला तो यही लगा दिया।‘

‘जी ऽऽ नहीं, कब्भी से नहीं का मतलब, बचपन से ही सुनती आ रही हूं, डैडी को शौक है, कभी शुरू करने का सवाल ही नहीं‘ - उसने जरा जोर से कहा।

शरद ने भी वैसे ही स्वर में चिढ़ाया -‘तो, नेहा जी, अभी डैडी होते ना, तो आपने जम कर डाँट खायी होती।‘

ओह! कैसे बोल रहा है, जाने कब से जान-पहचान हो।

‘क्यों ऽ ऽ ऽ‘ भौं चढ़ाई उसने।

‘पगली, ये राग, रात में सुना जाता है, औरा तुम दिन में दस बजे लगाए बैठी हो - डाँट नहीं खाओगी तो क्या तारीफ करेंगे कि बिटिया रानी को बड़ी समझ है, संगीत की।‘

अब इस आदमी से लड़ा जा सकता है भला, इतने अपनत्व और प्यार से बोल रहा है, जैसे युगों से परिचित हो। जी में आया, पत्रिका फेंक-फांक खूब गप्पे मारे, जैसे शर्मा अंकल से करती है। उन्हीं जैसा नहीं लगता वह। लेकिन वे तो अंकल हैं - लेकिन ये साहब क्या हैं, बमुश्किल चार साल बड़े होंगे उससे और रौब ऐसे मार रहे हैं जैसे चालीस साल बड़े हों। उससे सही नहीं जाएगी, ये बाॅसिंग।

देखा, मनोयोग से रेकाॅर्ड छाँटनें में लगा है -‘ये राग तो ‘कुमार गंधर्व‘ का पसंदीदा राग है, सुन कर सब कुछ भूल जाए, आदमी, अंकल को शौक है, तब तो जरूर होना चाहिए।‘ वह उसकी तरफ पीठ किए ही बोल रहा था। चुपके से चली आई, वह। अब बतियाते रहें, दीवार से। लेकिन कुछ भी, कहेा- है, नं. वन बेवकूफ... इसमें संदेह नहीं, विश्वास कर ही लिया कि उसकी शास्त्रीय संगीत में रुचि है। ... रुचि है खाक... उसने तो ‘कुमार गंधर्व‘ का नाम तक नहीं सुना।
***
फिर नाश्ते खाने में खिलवाड़ करने की हिम्मत नहीं हुई उसकी... इसका क्या है, ये तो लक्कड़ हजम, पत्थर-हजम है... कुछ भी चबा लेगा। कहीं बीमार-वीमार पड़ गया तो वो जम भी जाएगा, दस दिन और डॉक्टर की फीस भरनी पड़ेगी, सो अलग, और उसकी जो लानत मलामत होगी, उसकी ते कल्पना ही बेकार है।

लेकिन इस बार दूसरा ही हथकंडा अपनाया, जी भर कर उपेक्षा की। रघु ने पूछा भी, कमरा ठीक करने की बाबत... तो टाल गई... सामान वैसे ही पैसेज में पड़ा रहा। खाने के टेबल पर भी ऐसे मुँह बना रखा जैसे उसके साथ एक टेबल पर बैठकर अहसान कर रही हो। लेकिन उसकी उपेक्षा की परवाह भी किसे थी। उन आठ दिनों में लगता है, खूब रंग जमा गया था क्योंकि सुमित्रा काकाी के पोते के हालचाल से लेकर रघु के जमीन के झगड़े सबके विषय में खूब घुलमिलकर आधिकारिक ढंग से बातें कर रहा था। इन लोगों से व्यक्गित तौर पर कभी किसी ने बातें नहीं कीं इसलिए बड़ी खातिर-तवज्जो हो रही थी, शरद की। उसने कुछ भी हिदायत नहीं दी थी पर, डायनिंग टेबल स्वादिश्ट व्यंजनों से लदा पड़ा था।

सुमित्रा काकी का वात्सल्य भाव उमड़ा जा रहा था -‘ई ‘मलाई कोफ्ते‘ तो लो, खास तुमरे वास्ते बनायी है।‘ वह चुपचाप रोटी टूँगती रही। शरद ने उसे भी बातें में समेटने की कोशिश की -‘अ ऽ ऽ नेहा, जरा वो डोंगा इधर बढ़ाना तो।‘

उसने हाथ रोककर रघु को आवाज दी और चेहरा पूरी तरह निर्विकार रखे... कहा-‘ये डोंगा, जरा उधर बढ़ा दो।‘

रघु के हाथ खाली नहीं थे। शरद ने तुरंत कहा -‘रहने दो... रहने दो... ले लेता हूँ, मैं। और आधा उठकर खींच लिया डोंगा अपनी तरफ। आवाज में कोई गिला-शिकवा नहीं। चेहरे पर एक शिकन तक नहीं... आराम से सब्जी डाल रहा था अपनी प्लेट में। लेकिन काकी ने उसकी चुप्पी गौर की।‘


‘ई नेहा बिटिया को का हुआ आज? कौनो सहेली से लड़ाई हो गई का?‘ - हँह, इन शरद महाराज से नहीं हो सकती ना। जाने कितना रूतबा जमा गया है, एक हफ्ते में ही।

वह कुछ बोलती कि मजे से अंगुलियां चाटता, शरद बोला -‘तुम्हारी नेहा, बिटिया का टाँसिल बढ़ गया है... आह! चटनी तो तुम क्या खूब बनाती हो, काकी। ‘लिटरली‘..लोग. अंगुलियां चाटते रह जाए ‘लिटरली ?? खूब समझ रही होंगी, काकी।

‘अउर ई मजे में दही खा रही है, मालकिन नहीं है तो?‘ - काकी बोलीं।

‘किसका टाँसिल बढ़ गया है‘ - तेज स्वर में कहा उसने।

‘ओह! साॅरी गला ठीक है, दरअसल जब मेरा टाँसिल बढ़ जाता है तो मुझे बोलने में बड़ी तकलीफ होती है, तुम इतना कम बोल रही थी तो मैंने सोचा, शायद... ‘ और एक विशुद्ध निर्दोष हँसी।

‘हुँह! सोचने की दुम, जितना दिमाग होगा, उतना ही तो सोचोगे...‘ मन ही मन भुनभुनाते हुए एकबारगी ही कुर्सी ठेल उठ खड़ी हुई। यह भी नहीं देखा, शरद ने खाना खत्म किया भी है या नहीं।
***
अपने रूम में बिस्तर पे लेट, एक बुक उठा ली... तभी ध्यान आया शरद को तो आराम करने की कोई जगह बताई ही नहीं... रघु ने पूछा भी था... कमरा ठीक करने की बाबत... पर वह टाल गई थी। एक बार जी में आया... चलकर कमरा ठीक करवा ही दे... और व्यंग से मुस्करा दी... आखिर ‘अतिथिदेवो भव‘ और अतिथि-सत्कार तो परम धर्म है। पर यह विचार शीघ्र ही दूध की उफान की तरह बैठ गया। चलो भी, जब से आया है, उसे बना रहा है... और उसके आराम की फिक्र करती रहे वह। बहुत कष्ट हो रहा है तो अपना बैग उठाए और रास्ता नापे... और किताब में खो गई वह।

आँखें खुली तो पसीने से तर-ब-तर थी... ओह! ये पावरकट तो जान लेकर रहेगा एक दिन... पता नहीं कब किताब पढ़ते-पढ़ते आँख लग गई थी उसकी। बहुत देर तक ठंढे पानी से हाथ-मुंह धोती रही। अचानक ध्यान आया जरा इन महाशय का हाल देखें... और जो देखा तो ईष्र्या से भर उठी... लान में झूले पर लेटा... शरद ठंढी-ठंढी हवाओं के झोकों का मजा लेता... एक मोटी सी किताब में डूबा था।


जी तो उसका भी कर रहा है, जरा लाॅन में टहले तो कुछ राहत मिले... पर वो हजरत जो वहां जमे हैं। टपक ही पड़ेंगे और आखिर कब तक वह अपना मुँह बंद रखेगी वह भी अकारण।

एक फैसला लिया... अब कोई मतलब नहीं रखना उसे, शरद से... मरे या जीए... रहे या जाए... उसकी बला से... ओफ्!! सुबह से खुलकर हंसी तक नहीं और वह शर्मिला का नं. मिलाने लगी।

और अपने फैसले पर अटल भी रही। सबसे काट लिया खुद को। पर यहाँ परवाह भी किसे थी ? सारा घर ही शरद के गिर्द सिमटा जा रहा था। शरद के मित्र साहब भी अब तशरीफ ले आए थे।
***
जब दसरे दिन शरद ने जाने की पेशकश की तो भैया ने उसकी छुट्टी का पूरा प्लान बनाकर रख दिया। यहाँ तक कि शरद की मम्मी को भी फोन कर के इजाजत माँग ली... और एक हफ्ते के लिए शरद को रोक लिया।

यह देख अच्छा भी लगा अैर रूआँसी भी हो गई, लड़कियों में इतनी निश्छल दोस्ती क्यों नहीं होती? एक-दूसरे पर इतना अधिकार क्यों नहीं होता?

भैया का तो खैर वह दोस्त ही था। पर मम्मी को तो जैसे नया बेटा ही मिल गया था। कभी भैया से इतनी सहजता से बातें करते नहीें देखा। कभी बाजार का काम कहतीं भी तो हिचकते हुए। पर शरद से तो बड़े अधिकार से नापसंद चीजें लौटा लाने को भी कह डालतीं। और शरद भी इतना घुल मिल गया था कि आराम से कह डालता ...‘ओह! आंटी... क्या फर्क है इन दोनों रंगों में... आपने कहा ‘ग्रीन कलर‘ और मैंने ला दिया।‘

मम्मी भी खीझकर बोलतीं -‘हाँ! ये ‘पैरेटग्रीन‘ और ‘बाॅटलग्रीन‘ में तुम्हें कोई अंतर नजर नहीं आ रहा न। ... ‘पैंरेटग्रीन और क्रीम कलर का स्वेटर बना दूँ तो अंकल गले में डालना तो दूर, घर में देखना भी पसंद नहीं करेंगे... चलो चैंज करके लाओ इसे।‘

मम्मी और भैया के अलावा शरद के प्रशंसकों की एक फौज ही थी - रघु, सुमित्रा काकी, माली दादा... सब शामिल थे... पर इन सबको छोड़ वह तो डैडी से भी गप्पे लगा लेता। जबकि वह और भैया बाहर चाहे जितनी उधम मचा लें। डैडी के सामने तो भीगी बिल्ली ही बन जाते हैं। डैडी के रौबीले व्यक्तित्व ने कभी इतनी छूट ही नहीं दी। पर शरद के लिए तो जैसे सात खून माफ थे। वह तो डैडी के सामने ही आराम से कुर्सी उल्टी कर उसके पीठ पर ठुड्डी टिकाए बातें करता रहता और आश्चर्य!! डैडी कुछ भी नहीं कहते। जबकि इतने सलीके पसंद डैडी, मेहमानों तक की ज्यादती बर्दाश्त नहीं कर पाते। पर शरद का व्यवहार इतना बेलौस था कि क्या कहे कोई... कैसे कहे कोई??

अब तो बातों का सिलसिला डायनिंग टेबल पर भी नहीं छूटता। पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ... व्यंजनों की प्रशंसा की जाती है, नुक्स निकाले जाते हैं, सुझाव दिए जाते हैं, साथ ही फमाईशें भी की जाती हैं। वरना सिर्फ प्लेट, चम्मचों की खनखनाहट के बीच मन भर मुँह लटकाए जल्दी-जल्दी कौर निगलता याद है उसे। अब मम्मी भी तो कितने शौक से नई-नई डिश बनाती है... जबकि पहले तो जैसे रस्मपूर्ति होती थी।

पर इन सबके बीच रह-रह कर कुछ काँटे सा चुभ रहा था... बहुत ही आहत हो उठी थी वह। गौर किया... यहां तो शरद की उपेक्षा के चक्कर में खुद उसी की उपेक्षा हुई जा रही है। यूँ पहले भी घर में कोई खास बातचीत तो नहीं थी पर तब तो किसी की किसी के साथ नहीं थी। और जिसकी उपेक्षा करने की कोशिश कर रही है, उसे तो इलहाम तक नहीं। एकमात्र वही पूरे अधिकारपूर्ण ढंग से बातें करता -‘नेहा, जरा आज का न्यूजपेपर दे जाना तो‘ - या - बाबा रे! इतना पढ़ती है लड़की, टाॅप भी किया तो क्या तारीफ? (अलग-थलग दिखने की यही तो तरकीब है, हर वक्त किताबें थामे रहो।)

और एक बार जब उसे पेन चाहिए थी तो बेझिझक उसके कमरे में पहुँच गया... और ... ‘अरे! यहाँ नाॅवेल पढ़े जा रही है, और हमलोग सोच रहे हैं... रानी बिटिया ‘कार्ल माक्र्स‘ को घोंट रही है। ये शाम का वक्त कोई पढ़ने का है, चलो बाहर।‘ ... और जबरदस्ती बाहर ले आया था उसे। याद नहीं पड़ता... कभी भैया ने उसके कमरे में पैर भी रखा हो।

फिर तो पूरी तरह शामिल हो गई, वह भी... यहाँ इंकार भी किसी था? और अब लगता है, यह ईंट-गारे-सीमेंट से बना निर्जीव मकान नहीं... अहसासों, भावनाओं से धड़कता घर है। यूँ चहल-पहल पहले भी रहती थी... उसकी सहेलियों की चहचहाटों से, भैया के दोस्तों की धमाचैकड़ी से या पापा के मित्रों के छतफाड़ ठहाके से... ऐसा कभी नहीं हुआ कि घर के चारों जन मिल बैठें और लफ्फजी गुलछर्रे उड़ा रहे हों।

मम्मी की तो पूरी शख्सियत ही बदल गई, लगती थी। कभी भी उन लोगों ने मम्मी को घर की साज-संभाल से अलग या किचेन से परे देखा ही नहीं। शरद बड़े आराम से मम्मी से राजनीति, साहित्य, संगीत यहाँ तक कि फिल्मों के विषय में भी बातें करता रहता और वह आश्चर्यचकित रह जाती, मम्मी इतनी वले-इ-फाॅर्म्ड है, इन सब विषयों पर। उस दिन जब क्रिकेट की चर्चा छिड़ी थी और न उसे, न शरद को न भैया को ही याद आ रहा था कि ‘ओवल टेस्ट‘ में भारत कितने रनों से जीतते, जीतते रह गया था तो मम्मी ने बिना नींटींग पर से नजरें हटाए ही कहा था -‘नौ रन‘ आश्चर्य से मुँह खुला रह गया था, उसका। भैया ने भी चकित होकर पूछा था -‘मम्मी तुम और क्रिकेट?‘

हँस पड़ी थी मम्मी। -‘क्यों चैबीस घंटे टीवी आॅन रहता है, फुल वाॅल्यूम में कमेंट्री चलती रहती है तो क्या मैं आँखों पर पट्टी और कानों में रूई डाले बैठी रहती हूँ - और उसे ध्यान आया। सच ही तो है घर में इतनी सारी पत्रिकाएं, न्यूजपेपर आते हैं और मम्मी पढ़ती भी खूब है। वे लोग तो यह भी भूल चले थे कि मम्मी अपने जमाने की फस्र्ट क्लास एम ए हैं। जो गिने चुने लोग ही होते थे एम ए।

अब लगता है, यह घर का यही माहौल वह भी तो चाहती थी, लेकिन किसी से सहयोग मिले, तब तो। डैडी के लिए तो घर का मतलब था, पेपर, ब्रेकफास्ट, डिनर (लंच वे आॅफिस में लिया करते थे) और नींद... बस। और मम्मी इतना कम बोलतीं - सिर्फ काम की बातें, बस। और भैया को रौब जमाने से ही फुर्सत नहीं। महीने में दस दिन तो उसके साथ लड़ाई ही रहती... रौब तो ये शरद भी कम नहीं जमाता, पर दूसरे ही पल मना भी लेता है, अपनी गलती मान भी लेता है। जबकि भैया... हुँह! हार कर खुद जातीं बातें करने और तब ऐसे बोलता जैसे अहसान कर रहा हो।

पर अब तो आराम से ताश की बाजी जमती, बरसों बाद कैरम की धूल झाड़ी गई... भैया भी उदार हो लेता है। बरना लूडो तक कभी नहीं खेला उसके साथ

बाहर निकली, तो देखा शरद कैरम की गोटियाँ जमा रहा है। भैया... मनपसंद गानों की सीडी ढँूढ़ने में लगे थे। उसे आदेश दिया शरद ने... ‘अपने लिए, एक चेयर लेकर आओ।‘

‘पर तीन जन कैसे खेलेंगे!‘

‘कयों तुम नहीं खेलोगी, शर्मिला टैगोर का बुलावा आ गया क्या?‘

‘जी नहीं।‘

‘ओह! समझा... जूही चावला तशरीफ ला रही हैं।‘

’’नहीं बाबा’’

अच्छा तो; पूनम ढिल्लों से मिलने जा रही हो ?


‘ओफ्फोह! कह तो दिया... न कोई आ रही है, न मैं कहीं जा रही हूं, (अब उसकी तीन सहेलियों के नाम, फिल्म एक्ट्रेसों से मिलते थे, तो उसका क्या कसूर, पर शरद को तो जैसे ये नाम रट गए थे, हर दो मिनट में दुहरा लेता) ... पर हमलोग सिर्फ तीन हैं, कैसे खेलेंगे?‘

‘क्यों, तीन क्यों?? आंटी कहाँ गईं?‘

‘मम्मी ऽ ऽ खेलेंगी‘ हँसी छूट गई उसकी तो।

‘क्यों नहीं खेलेंगी, हमलोग तो यहाँ जमे हैं, अकेली क्या करेंगी वो?‘

मम्मी भी कहाँ तैयार थीं। टालने की कोशिश की, पर एक नहीं माना शरद -‘‘इसमें क्या है, यों स्ट्राइकर पे हाथ रखा और यों मारा शाॅट कम से कम इस गिलहरी से तो अच्छा ही खेलिएगा।‘

और सचमुच जब मम्मी ने दूसरे ही शाॅट में क्वीन कवर कर लिया तो उसने भी घोषणा कर दी, अगले चांस मे वह और मम्मी पार्टनर रहेंगी।
***
शरद आठ दिन रहकर, मौज-मस्ती कर चला गया पर सबको जैसे एक सूत्र में पिरो गया। उसे डर था... शरद के जाने के बाद कहीं घर वापस पुराने ढर्रे पर न लौट पर नहीं, डैडी एक बार खुले तो फिर पुराने उधड़े स्वेटर सा परत दर परत खुलते ही चले गए। अब पहले से जल्दी घर भी तो लौटने लगे हैं। आदमी की व्यस्ततम जिंदगी में भी एक कोना ऐसा होता है... जिसकी पूर्ति घर-परिवार में ही हो सकती है।

भैया भी खूब दिलचस्पी लेने लगा है, घर में... पिक्चर, पिकनिक... चारों इकट्ठे जाते तो पैर नहीं पड़ते उसके जमीन पर। पहली बार भैया के हास्टल जाने पर चीजें देर तक धँुधली नजर आती रहीं।

18 comments:

shikha varshney said...

कहानी नया मोड़ लेती प्रतीत हो रही है...नाईका का मन कोमल हो रहा है....जल्दी जल्दी आगे बढाइये...फिर क्या हुआ?

सारिका सक्सेना said...

आपकी लेखनी ने तो जैसे बांध लिया है। रोज बेसब्री से इंतज़ार होने लगा है अगली किस्त का।

HARI SHARMA said...

नेहा को शुरुआत मे शरद से चिढ क्यू हुई? सोचो अगर इस बेगानेपन से घबराकर वो भाग खडा होता तो ये मस्ती भरे दिन और घर मे बदले माहौल की रन्गत होती क्या?

Udan Tashtari said...

हाँ...पूरी जोश पर है कहानी..प्रवाह में..इन्तजार लगा जाने में सक्षम!!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कहानी, इन्तजार है अगली किस्त का

sangeeta swarup said...

बहुत सही तस्वीर खिंची है ....कभी कभी घर का माहौल ऐसा हो जाता है की बोझिल लगने लगता है....

बस उसे सुखद बनने का कोई प्रयत्न नहीं करता....बहुत सशक्त लेखन....आगे की कहानी का बेकरारी से इंतज़ार है....

विनोद कुमार पांडेय said...

कुछ शक्स ऐसे होते है जो कभी भी कहीं भी बस थोड़े ही पल में एक ऐसा अपनत्व छोड़ जाते है की उनके जाने के बाद मन उदास हो जाता है..शरद के साथ नेहा ने जो कुछ भी शरारत की उसे नज़रअंदाज करके वहीं पर घुल मिल कर एक नया प्रभाव छोड़ गया शरद जिसने नेहा के घर को फिर से एक घर जैसा बना दिया..बहुत सुंदर कहानी..आगे भी पढ़ना चाहूँगा..धन्यवाद रश्मि जी

मनोज कुमार said...

दिलचस्प, अनुभवों की सांद्रता।

'अदा' said...

क्या बात है रश्मि कहानी पूरे उठान पर है...पाठक बंध चुके हैं...हैरान हैं परेशान हैं कि आगे क्या होगा....!!
यही तो कमाल किया है तुम्हारी कलम ने...बस आगे की कड़ी का इंतज़ार है...मुझे भी ...जैसे सब कर रहे हैं..
जल्दी बताओ ....!!

वाणी गीत said...

कहानी बहुत रोचक तरीके से आगे बढ़ रही है ...तुमने ठीक ही कहा था कि अभी तो बहुत कुछ याद आएगा ...हाँ ...आया ना बहुत कुछ याद ...और तुम्हारी एक शिकायत भी दूर कर दी मैंने ...
अगली कड़ी का बहुत बेसब्री से इन्तजार है ...!!

अजय कुमार झा said...

जानती हैं आपकी ये कहानी , मुझे जितनी दिलचस्प लग रही है उससे अधिक मुझे उकसा रही हैं ।दिमाग के कई सैक्शन सक्रिय हो रहे हैं ।यदि यही हाल रहा तो खुद को ज्यादा दिन रोक नहीं पाऊंगा ......मगर अभी तो फ़िलहाल पढने का मन है सिर्फ़ पढने का ....
अजय कुमार झा

वन्दना said...

rashmi ji

kahani jaldi poori kijiye..........ab sabra nhi hota ye sochkar ki aisa kya huaa jo wo dono ek doosre ke samne hokar bhi ajnabi se ho gaye..........bahut hi sundarta se baandh rakha hai kahani ne..........agli kadi ka besabri se intzaar hai.

रश्मि प्रभा... said...

rochakta ke aage abhi kya kahun........

ज्योति सिंह said...

pahli dafe aayi aur itni sundar kahani padhkar man me bahut khushi hui .

हरकीरत ' हीर' said...

रश्मि जी लघु उपन्यास लिखना कोई सरल काम नहीं आपने ये शुरू किया है शुभकामनाएं हैं .....पर टंकण की गलतियां खलती हैं .....पोस्ट छोटी रखें पर २,३ बार देख लें .....!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बेहद रोचक....हरकीरत जी की बात दोहराती हूं. अगले अंक के इन्तज़ार में हूं.

manu said...

agle ank pe hi chalte haiji...
direct...

गौतम राजरिशी said...

हम्म्म्म...अच्छे से बाँध रखा है आपने पाठकों को। तमाम संवादों में कहीं भी बनावटीपन नहीं है, कृत्रिमता नहीं है। सारे चरित्र आस-पास के से हैं और ये ही खास बात होनी चाहिये हर कथाकार की उसका बुना हुआ चरित्र पाठक को अपने जैसा ही लगे, अपने आस-पास का लगे...

अभी तक रोचकता बरकरार है कि लेफ्टिनेंट साब के कर्नल बन जाने तक के अर्से में क्या सब हुआ...चलता हूँ चौथी कड़ी पे...