Monday, June 30, 2014

अंजलि

साहिल दौड़ता-भागता प्लेटफॉर्म पर पहुंचा तो  पता चलाट्रेन दो घंटे लेट है . ऑफिस से तो समय पर ही निकला था पर ट्रैफिक में बुरी तरह फंस गया . सोच रहा था ,पहली बार अंजलि ने उस से कोई मदद चाही है और वह समय पर पहुँच नहीं पायेगा. अजनबी शहर ,अनजान चेहरों के बीच अंजलि परेशान हो जायेगी. ऐसा न हो वो अकेले ही चल पड़े. पर आज मन ही मन भारतीय रेलवे का शुक्रिया अदा किया , आज ट्रेन के लेट होने से खीझ नहीं हुई बल्कि सुकून की सांस ली उसने. एक नीम्बू पानी लिया और प्लेटफॉर्म पर टहलने लगा. अच्छा हुआ थोड़ा समय मिला और बिखरी यादें अपने आप सिमटने लगीं. अंजलि उसकी छोटी बहन साक्षी की सहेली थी . दोनों एक ही क्लास में थीं और अक्सर साक्षी के साथ अंजलि भी घर पर आ जाया करती. साक्षी जब छोटी थी तो उस से बहुत डरती थी (अब तो दादी अम्मा बन कर सलाह दिया करती है ) उसकी देखा देखी अंजलि भी उस से डरने लगी. वो घर में घुसता और दोनों सहेलियां या तो छत पर भाग जातीं या घर के किसी महफूज़ कोने में छुप जातीं. और अगर सामने पड़ जातीं वो भी रौब जमाने को जोर से साक्षी को किसी न किसी बात पर डांट देता , “सारा दिन खी खी करके घूमती रहती हो...इम्तहान पास आ रहे हैं...पढ़ाई नहीं करनी “ “हाँ.. भैया” कहती साक्षी सहम जाती और अंजलि जल्दी से अपने घर चली जाती. 

जब साहिल को पता चला कि गली के कोने पर जो बड़ा सा आलीशान मकान हैवो अंजलि का घर है और वो अपने माता- पिता की इकलौती बेटी है तो उसने साक्षी को बहुत मना किया कि इतने बड़े घर की लड़की से दोस्ती न करे ,उनलोगों का रहन-सहन ..बात व्यवहार सब अलग होता है. दोस्ती बराबर वालों में ही अच्छी लगती है “ पर इस बार माँ ने साक्षी का साथ दिया बोलीं, “अंजलि बहुत अच्छी लड़की है ...घमंड ज़रा सा छू नहीं गया है...बहुत घुल मिल कर रहती है...बड़ों की इज्जत करती हैसब पैसे वाले खराब नहीं होते बेटा“ माँ ने उसे समझाने की कोशिश की. उसने कंधे उचका दिए...” उसे क्या...जिस से चाहे दोस्ती रखे....बस अमीर सहेली की देखादेखी कोई उटपटांग मांग न करे.” अब साक्षी उसके सामने कभी अंजलि को अपने घर पर नहीं बुलाती . काफी दिनों तक उसने अंजलि को देखा नहीं. और भूल ही गया .

 साक्षी कॉलेज में आ गयी थी. एक दिन कॉलेज में उसका साड़ी डे था . दो दिन से उसकी तैयारी चल रही थी और साहिल उसे चिढाये जा रहा था , “ये कॉलज जाने की तैयारी हो रही है या किसी शादी में जाने की ..कॉलेज में पढाई की जगह ये सब होता है....कैसा कॉलेज है तुम्हारा 
 “भैया परेशान मत करो..तैयार होने दो मुझे...” माँ ने भी उसे डांट कर बाहर वाले कमरे में भेज दिया, "जब तक ये तैयार होकर चली नहीं जातीमुझे कोई काम नहीं करने देगी..तंग मत कर इसे “.वो ड्राइंग रूम में टेबल पर पैर फैलाए टी.वी देखने लगा .तभी डोर बेल बजी. सामने एक परी सी ख़ूबसूरत लड़की नीली साडी में ख़ड़ी थी . वो बिना पलकें झपकाए देखता रह गया तो धीरे से बोली, “साक्षी है ? “
वह झेंप गया हाँ है...साक्षीsss...” उसने जोर से आवाज़ दी....और दरवाजा खुला छोड़ अन्दर चला गया . पर बरामदे से देखता रहा..ये कौन सी सहेली है साक्षी की ..इसे तो कभी नहीं देखा .साक्षी साडी संभालती हुई कमरे में आयी और चीख पड़ी..अंजलिss हाय तू कितनी सुन्दर लग रही है...” तो ये अंजलि थी. पर इतनी बदल कैसे गयी वो तो दो पोनिटेल बांधे फ्रॉक पहने रहती थी...इतनी बड़ी कैसे हो गयी ?? दोनों सहेलियां घर से निकल गयी और वह खिड़की के पास आ गया . उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ये अंजलि ही थी. दूर तक उसे जाते देखता रहा . बाद में साक्षी से पूछ भी लिया , “ वो अंजलि थी तुम्हारे साथ..तुम्हारी अंजलि से अब भी दोस्ती है 
लो हमारी दोस्ती ख़त्म कब हुई थी...हम तो स्कूल से ही पक्की सहेलियां हैं ...
कभी देखा नहीं न घर पर ...
वो तुमने डांट दिया था न कि अमीर लड़कियों से दोस्ती मत करोइसलिए तुम जब घर में होतेमैं अंजलि को नहीं लाती और अच्छा ये है कि तुम घर में रहते ही कितनी देर हो...कभी क्रिकेट...कभी दोस्त..कभी कॉलेज ...पर मेरी  सहेली के बारे में इतना क्यूँ पूछ रहे हो...ऊँ..
नहीं...वो तो यूँ ही...पहचाना नहीं न इसलिए...” कहकर उसने बात टाल दी .

पर अब वो अक्सर साक्षी से अंजलि के बारे में पूछ लेता...साक्षी भी सहज होकर सब बता देती . कभी कभी उसके लिए सहायता भी मांग लेती, “भैया तुम्हारे किसी दोस्त के पास इकोनौमिक्स के नोट्स हैं ? साक्षी के लिए ला दो न...या अमुक राइटर की कोई किताब लाने को कहती. वह कहीं से भी ढूंढ कर ला देता. धीरे धीरे साक्षी भी समझ गयी थी. अंजलि के लिए उसके मन में एक सॉफ्ट कॉर्नर है. पर अंजलि जब भी उसके सामने पड़ती..घबरा कर चली जाती. उसके मन में शायद उसके बचपन वाली डांट का अब तक असर था . पर साक्षी बताती कि अंजलि भी उसके बारे में अक्सर पूछती रहती है.

पर फिर वो गंभीर हो जाता, उसे पता था अंजलि और उसका कोई मेल नहीं . जब पढाई ख़त्म कर उसे एक अच्छी नौकरी मिल गयी तब साक्षी ने ही बात शुरू की , “भैया...अंजलि की शादी की बात चल रही है “ उसे एक धक्का सा लगा पर उसने जाहिर नहीं किया . बस एक छोटी सी ‘हम्म’ कही .साक्षी ने फिर से कहा भैया तुम भी अच्छी जॉब में हो और अंजलि बहुत बहुत अच्छी लड़की है... कितना अच्छा हो अंजलि हमारी भाभी बन जाए 
“साक्षी..बहुत पटर पटर बोलने लगी है तू,..ऐसा कुछ नहीं है और मैं चार-पांच साल शादी की सोच भी नहीं सकता. बहुत सारे काम करने हैं. घर की मरम्मत करवानी है...पूरा रिनोवेट ही करवाऊंगा...फिर घर के फर्नीचर बदलने हैं, गाड़ी लेनी है ..मामी-पापा को पूरा देश घुमाना है...लोन चुकाना है...तेरी शादी करनी है...अभी बहुत वक्त है 
पर तब तक अंजली के पैरेंट्स...इंतज़ार थोड़े ही करेंगे “ रुआंसी हो गयीसाक्षी
“इसीलिए तो कह रहा हूँ ,बेफजूल की बातें सोचना छोड़ दे...वैसे भी अंजलि को उसके स्टैण्डर्ड का घर ही मिलना चाहिए.
अंजलि वैसी लड़की नहीं है...हर जगह एडजस्ट कर लेगी 

“बेकार की बातें माँ मत कर..चल चाय बना...” उसे साक्षी से यह सब डिस्कस करने का मन नहीं हो रहा था . अंजलि उसे अच्छी लगती थी. माँ और साक्षी से उसकी तारीफ़ भी सुनता रहता था. अब कॉलेज ख़त्म हो जाने के बाद उसकी आवारागर्दी भी कम हो गयी थी. वीकेंड्स पर अक्सर घर पर ही होता, अंजलि कभी रास्ते में मिल जाती, कभी छत पर से नज़र आ जाती . साहिल को देखते ही अंजलि के चेहरे पर एक घबराहट सी छा जाती, उसके केश की जड़ें पसीने की नन्ही नन्ही बूंदों से लद जातीं .और लाला चेहरा लिए वो कतरा कर निकल जाती . वो कभी मुस्करा देता , कभी सोचने लगता, ‘ इतना भी क्या घबराना ,इतने दिनों में उसे नहीं पहचाना ..क्या वो कोई बदतमीजी कर बैठेगा “ एक बार उसने उसे थोड़ा और परेशान करने के लिए पूछ भी लिया , “वो नोट्स साक्षी ने दिए न...ठीक थे ?”
“हाँ, अच्छे थे “ सपाट स्वर में कहा उसने और फिर थोडा रुक कर कहा “थैंक्यू ‘ और चली गयी.
फिर उसने खुद को ही रोक लिया...क्या फायदा जिस राह की कोई मंजिल नहीं उस पर क्यूँ कदम बढ़ाना . उसने मन ही मन एक दुआ कर डालीकि अंजलि को खूब अच्छा घर और वर मिलेउसे जीवन की सारी खुशियाँ मिले. 

कुछ महीनों बाद सुना अंजलि की शादी ठीक हो गई  है . उसके कुछ दिन बाद एक दिन वो घर की तरफ आ रहा था और अंजलि जा रही थी. अंजलि ने नज़रें उठा कर बहुत गुस्से में उसे देखा...वो उन नज़रों का मतलब देर तक तलाशता रह गया. अंजलि नाराज़ है उस से पर उसने तो हमेशा उसकी मदद ही की है फिर उन नाराज़ निगाहों का माजरा क्या था. उसे समझ नहीं आया. अंजलि की शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे साक्षी की तैयारियां जोरों पर थीं . बस एक ही विषय था उसके पास, ‘कब क्या पहनेगी ‘ जब दो दिन रह गए तो उसका मन डूबने लगा और वो ऑफिस के काम का बहाना बना शहर से दूर चला गया. अंजलि की विदाई के बाद ही लौटा .अंजलि का घर वैसा ही था पर सूना सूना लग रहा था. छत पर से देखा अंजलि की छत पर बने मंडप की सजावट धूप में फीकी पड़ गयी थी. छत पर अक्सर अंजलि के रंग  बिरंगे  कपडे-दुपट्टे सूखते रहते थे ,आज छत वीरान लग रहा था, उसके मन के एक कोने जैसा. साक्षी से अंजलि की शादी के किस्से उसके दूल्हे की हाज़िरजबाबी सुनता रहा. मन में एक टीस तो उठती पर वह मन को समझा देता ,यही दुआ तो की थी अंजलि के लिए. वो हमेशा खुश रहे.

दो साल बाद साक्षी की भी शादी हो गयी . साक्षी की शादी में अंजलि अपने एक साल के बेटे के साथ शामिल हुई थी. अब वो पहले से भी ख़ूबसूरत हो गयी थी. बेटा भी बहुत प्यारा था . अपने घर में हमेशा अंजलि को सहमे-सकुचाये हुए सा देखा था .पर इस बार माँ के साथ वो बहुत सारा काम संभाल रही थी. साक्षी के सारे काम वही कर रही थी. अच्छा था ,वह काम में इतना व्यस्त था कि ज्यादा आमना-सामना नहीं हुआ. पर दूर से उसने कई बार अंजलि को देखा इस बार अंजलि के चहरे पर कोई सल्लजता नहीं थी. आत्मविश्वास से भरी वो बहुत खुलकर हंसती थी . अच्छा लगा देख, चलो उसकी दुआ क़ुबूल हुई. अंजलि बहुत खुश है.

 अब उसे नौकरी करते हुए कई साल हो गए थे ,उसने अपनी सारी जिम्मेवारियां पूरी कर दी थीं. पुराने घर की ऐसी कायापलट कर दी थी कि लोग पहचान नहीं पाते. माँ-पापा- साक्षी  कब से उसके पीछे पड़े थे ,”शादी कर लो” रोज ही माँ कोई न कोई तस्वीर दिखातीं और उस लड़की के गुण गातीं. वो बहाने बना कर टाल देता ,पर अब कोई बहाना भी शेष नहीं बचा था . उसने भी हाँ कहने की सोच ही ली थी कि साक्षी के एक फोन ने जैसे उसे सुन्न सा कर दिया. रोती हुई साक्षी कह रही थी...भैया..अंजलि की दुनिया उजड़ गयी ..एक एक्सीडेंट में अंजलि के पति की मौत हो गयी “ सुन कर उसकी आँखों के आगे अन्धेरा सा छ गया. वो सोफे पर गिर पड़ा...अंजलि और उसके बेटे का चेहरा बार बार सामने नज़र आ जाता . कैसे सह पाएगी, अंजलि  ये पहाड़ सा दुःख. माँ को जैसे ही खबर पता चली...वे अंजलि के घर चली गयीं . अंजलि को उसके माता-पिता अपने पास लेकर आ गए थे ..साक्षी भी अपनी सहेली का दुःख बांटने आ गयी थी. सुबह होते ही अंजलि के घर चली जाती. रोज रात में रुंधे स्वर में अंजलि की दशा का वर्णन करती, ”बड़ी मुश्किल से उसे एक रोटी खिलाई है..अंजलि तो पत्थर हो गयी है....आंसू भी नहीं बहते उसके बस सारा समय छत घूरती रहती है.” यह सब सुनकर उसका कलेजा टूक टूक हो जाता. एक नज़र अंजलि को देखने की उत्कट इच्छा जाग जाती .उसे पता था ,वो कुछ कह नहीं पायेगा पर एक बार अंजलि के सामने जाकर ये तो जता दे कि उसके दुःख से वह भी कितना दुखी है.  एक दिन उसने साक्षी से कह ही दिया, “ मुझे लगता है...एक बार मुझे भी जाना चाहिए अंजलि के माता-पिता जब भी मिलते हैं  मेरा हाल-चाल पूछते रहते हैं...उनके ऐसे दुःख के समय मुझे भी उनसे मिलना चाहिए 
“और क्या बिलकुल जाना चाहिए...कल ही चलना तुम मेरे साथ 

दूसरे दिन साक्षी के साथ अंजलि के घर गयापैर मन मन भर के हो रहे थे पर किसी तरह जी कड़ा कर गेट के अन्दर प्रवेश किया. अंजलि की माँ बाहर वाले कमरे में ही अंजलि के तीन साल के बेटे को गोद में लेकर बैठी थीं. उसे देखते ही पल्लू आँखों पर रख लिया...बेटा मेरी बिटिया की दुनिया वीरान हो गयी...कैसे जियेगी अब वह.. ये छोटा  सा बच्चा किसे कहेगा अब पापा “अंजलि का बेटा उनकी गोद से कूद कर अन्दर की तरफ भागा और दरवाजा बंद करने की कोशिश करने लगा  “आपलोग अन्दर नहीं आओ...आपको देख के मम्मी रोती है...” पर उसके छोटे छोटे हाथो से दरवाजा बंद नहीं हो रहा था साक्षी ने उसे गोद में उठा लिया...अच्छा ऐसा है...चलो हमलोग मम्मी को गुदगुदी करके हंसाते हैं...ऐसे ऐसे...और साक्षी अनय को गुदगुदी करने लगी... अनय  हंसता हुआ..उसकी गोद से उतरने को छटपटाता रहा . साक्षी अन्दर चली गयी. वह अंजलि की माँ के पास बैठा रहा ...थोड़ी देर बाद अंजलि की माँ उठीं ,”देखूं..अंजलि ने कुछ खाया या नहीं...साक्षी का बड़ा सहारा है...अनय और अंजलि को बहुत संभाला है उसने “ तुम भी आओ बेटा और उसे अन्दर बुला कर ले गयीं. अंजलि एक कुर्सी पर निस्पंद बैठी थी. साक्षी पलंग पर अनय को एक पिक्चर बुक दिखा रही थी...” अंजलि ने आँखें उठा कर उसे देखा और थोड़ी देर देखती रही...पत्थर सी आँखें थीं उसकी ,उनमें कोई भाव नहीं था जैसे एक वीरानी सी ठहर गयी हो ” फिर खिड़की के बाहर नज़रें टिका दीं ,अंजलि ने . अंजलि की माँ ने साक्षीसे पूछा“अंजलि ने खाया कुछ 
खाया क्या.. छुआ भर 
अंजलि की माँ ने ही दूसरी कुर्सी खींच कर उसे बैठने के लिए कहा और बोली..चाय के लिए बोल कर आती हूँ..
नहीं चाहिए....चाय रहने दीजिये..
“अरे तुमलोगों के बहाने इसके गले में भी दो घूँट उतर जाएगा...
वो अपनी हथेलियों को घूरते जड़ बना बैठा रहा, कुछ भी नहीं बोल पाया . अंजलि खिड़की से बाहर देखती रही...अनय  ही उसे शांत बैठा देख अपनी किताब उसके पास लेकर आ गया “अंकल ये देखो..जिराफ “ फिर वो जानवरों के नाम पूछने लगाअंजलि वैसे ही बाहर देखती रही...चाय पीने के बाद वो बाहर निकल आया और एक संकल्प लिया..इन वीरान आँखों में नए सपने उगा कर रहूँगा...

कुछ दिनों बाद साक्षी भी चली गयी .पर वह सुबह शाम अंजलि को फोन करती .और उसे भी अंजलि का हाल पता चलता रहता. साहिल ने साक्षी से ही अंजलि को आगे पढने के लिए प्रोत्साहित करने को कहा. पर साक्षी का कहना था, “अंजलि बिलकुल तैयार नहीं 
आखिर एक दिन वह अंजलि की माँ से मिलने गया...और उन्हें बोला, “अंजलि को एम.ए. करने के लिए बोलिए...घर से बाहर निकलेगी तो उसका दिल भी बहलेगा...”
“साक्षी ने तो कितनी बार कहा है...मुझसे भी कहा..पर ये सुनती ही नहीं..कहती है, “मेरा पढने में मन नहीं लगेगा..,इसके पापा भी कहते हैं ,अभी रहने दो..उसे तंग मत करो “अंजलि की माँ ने मजबूरी जताई .
“चाची पर अगले महीने  सेशन शुरू होने वाला है...अभी एडमिशन नहीं लिया गया तो फिर पूरा एक साल रुकना पड़ेगा और तब तक अंजलि क्या करेगी...ऐसे ही  दुःख में डूबी रहेगी.”
“पर क्या करूं ,बेटा ये सुनती ही नहीं...और अपने पापा की लाडली है, वे जोर डालते नहीं “
चाची, मैं बात करूँ..?”
हाँ बेटा..तुम्ही समझा कर देखो...मुझे भी उसका यूँ सारे दिन कमरे में अकेले पड़े रहना देखा नहीं जाता ..इसके पापा तो सारा दिन घर पर नहीं रहते न....अपनी बेटी को ऐसे हाल में देख कर क्या  गुजरती है, वे क्या  जाने..” उनका गला भर आया था 
अंजलि ने नीचे नज़रें किये पर दृढ स्वर में उस से भी यही कहा..” आगे पढने में मेरी कोई रूचि नहीं है...और मुझे नौकरी करने की जरूरत नहीं है, इतना है पास में कि अनय के भविष्य के लिए सोचना नहीं पड़ेगा “
“नौकरी के लिए कौन कह रहा है, पर वो बाद की बात है..अभी एडमिशन तो ले लो..चाहे यूनिवर्सिटी मत जाना “
“मुझे कहीं नहीं जाना ...कुछ नहीं पढ़ना “..अंजलि ने जैसे एक जिद से कहा .
“फिर क्या करोगी...यूँ ही उदास बैठे रहा करोगी . अनय  की तरफ देखो.. तुम्हे यूँ उदास देखउसका बचपन कैसे गुजरेगा. उसे भी एक हंसती मुस्कुराती मम्मी चाहिए या नहीं ..तुम्हारी कोई जिम्मेवारी है उसके प्रति या नहीं ? बचपना छोडो..मैं एम. ए.  का एडमिशन फॉर्म लेकर आता हूँ ..तुम उसे भर दो और पढाई शुरू करो..
अंजलि कुछ नहीं बोली ..दूसरे दिन  ही उसने फॉर्म लाकर अंजलि की माँ को दे दिया . हर दूसरे तीसरे दिन जाकर पूछताछ करता .पता चला ,’ अंजलि ने फॉर्म नहीं भरा है और जब लास्ट डेट बिलकुल नजदीक आ गयी. तो उसने अंजलि की माँ से कहा , “मुझे फॉर्म दीजिये...मैं भरवा कर लाता हूँ .वो खुद फॉर्म लेकर अंजलि के कमरे में गया और बोला..जैसे साक्षी  को डांट सकता हूँ ,वैसे ही  तुम्हे भी...चलो फॉर्म भरो...” और पेन आगे कर दिया ” शायद अंजलि ने गुस्से में कुछ कहने को सर उठाया पर साथ ही अपनी माँ को और उनकी साडी पकड़ कर सहमे से अनय को खड़े देख कुछ कहा नहीं .और फॉर्म भरने लगी .

साहिल पता करता रहता कि कब से क्लास शुरू होने वाले हैं और जब क्लास शुरू हो गए तो उसने साक्षी को बुलवा लिया. शुरू में कुछ दिन साक्षी ही जबरदस्ती अंजलि को यूनिवर्सिटी लेकर गयी . अंजलि  सिर्फ पढाई शुरू करने में आनकानी कर रही थी. एक बार पढ़ना शुरू किया तो फिर उसमे ही रम गयी . पर उस से वैसी ही दूरी बनी रही. एकाध बार अंजलि के घर गया भी ,पूछा ,”पढ़ाई ठीक से चल रही है न ...कुछ जरूरत हो तो कहना ” पर अंजलि ने बड़ी रुखाई से कहा , “ हाँ ,ठीक चल रही है...मैं खुद मैनेज कर लूंगी“ उसके बाद वह फिर नहीं गया . कभी कभी रास्ते में अनय के साथ मिल जाती तो वो अनय से बातें कर लेता उस से भी औपचारिकता वश पूछ लेता ,”कैसी हो ?“ अक्सर तो वो ,”ठीक हूँ ,चलो अनय देर हो रही है..कह आगे बढ़ जाती .
एक दिन अंजलि ने कुछ गुस्से में ही कहा, “ आजतक तो कभी बात भी नहीं की आपने...अब इतनी हेल्प क्यूँ कर रहे हैं..मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ “ और फिर आगे बढ़ गयी. वो अबूझ सा खड़ा रह गया .समझ नहीं पाया ,उसकी नाराजगी इस बात पर थी कि उसने अब तक उस से बात नहीं की थी या इस बात पर कि उसकी हेल्प क्यूँ करना चाहता है “

अंजलि ने खुद को पढाई में झोंक दिया था और उसकी मेहनत रंग लाई .उसने फर्स्टक्लास से एम.ए. पास किया और फिर पी.एच डी. करने लगी . उसे यह सब देख बहुत ख़ुशी होती. उसने जो राह दिखाई ,उस पर अंजलि आगे ही बढती जा रही है.

माँ अब भी अक्सर साहिल पर शादी के लिए जोर डालतीं . पर अब अंजलि  को यूँ अकेला देखउसे अपनी दुनिया बसाने की इच्छा नहीं होती. साक्षी समझती थी. अब वह कुछ नहीं कहती. इसी बीच साहिल को एक कंपनी में बहुत अच्छी जॉब मिल गयी और उसे शहर से दूर जाना पड़ा. अनय के स्कूल की छुट्टियां चल रही थीं और अंजलि उसे लेकर ससुराल गयी हुई थी. मन में एक कसक तो रहती कि आते वक़्त अंजलि को एक नज़र देख भी नहीं पाया. मिल पाता या नहीं...कुछ कह पाता या नहीं,ये तो अलग बात पर एक नज़र देख तो लेता. अंजलि की मनस्थिति समझता था ,इसीलिए वो कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था .

साक्षी के जरिये अंजलि की खबर मिलती रहती थी. अंजलि की पी.एच डी पूरी हो गयी और अब वह एक कॉलेज में लेक्चरार नियुक्त हो गयी.
कभी अपने शहर जाता और अंजलि पर नज़र पड़ जाती तो उसे आत्मविश्वास से भरपूर देख अच्छा लगता . हाल चाल पूछ लेता, अब अंजलि की आँखों में उतना गुस्सा नहीं नज़र आता फिर भी वो ज्यादा बात नहीं करती . छोटा सा जबाब दे आगे बढ़ जाती. पर इतना सा बदलाव भी उसे भला लगता वह अंजलि को भरपूर समय देना चाहता था . उसे अपने दिल की बात कहने की कोई जल्दी नहीं थी. वह पहले अंजलि को अपने दुःख से उबरने देना चाहता था .उसे अपने पैरों पर खड़े देखना चाहता था ताकि अंजलि को ये न लगे कि वह उसे कोई सहारा देने के उद्देश्य से यह सब कह रहा है.

और कल जैसे एक राह मिल गयी. साक्षी का फोन आया “भैया तुम्हारे शहर के कॉलेज में एक सेमीनार है जिसमे अंजलि  को भाग लेना है. ठहरने का इंतजाम कॉलेज में ही है..पर वहाँ ट्रेन शाम को पहुँचती है . नया शहर है और अंजलि ने कभी अकेले सफ़र नहीं किया...वो थोडा डर रही है...तुम उसे स्टेशन से लेकर कॉलेज तक पहुंचा देना 
अंजलि तैयार है,इसके लिए...? “
हाँ भैया..अंजलि ने ही मुझे फोन पर बताया है, कि तुम्हारे शहर उसे जाना है  और जब मैंने कहा भैया तुम्हे स्टेशन से रिसीव कर कॉलेज पहुंचा देंगे तो वह मान गयी 
ट्रेन की डिटेल्स ,कोच नंबर सीट नंबर सब उसे एस.एम.एस. करने की ताकीद कर ..अंजलि का नंबर ले फोन रख दिया . पर अंजलि को फोन करने की हिम्मत नहीं हुई. बार बार नंबर घूरता और फिर मोबाइल बंद कर देता . उसे रात भर नींद नहीं आयी . ऑफिस में भी जैसे तैसे काम निबटाया और अब यहाँ था .क्या पता अंजलि कैसे बात करेगी . अब तक अजनबी जैसे ही थे दोनों .पर एक  तसल्ली थी, जब खुद ही साक्षी से कहा है तो रूखेपन से तो बात नहीं ही करेगी.



दूर से ट्रेन की सीटी सुनायी दी . ट्रेन पास आती जा रही थी और उसके दिल की धडकनें बढती जा रही थीं. ट्रेन रुकी .वो कोच के सामने ही खडा था .अंजलि गेट पर ही बैग थामे खड़ी थी...उसे देखते ही मुस्कुरा दी...और इस मुस्कराहट ने अजनबीपन की पहली दीवार गिरा दी .

Sunday, October 6, 2013

ख़ामोश इल्तिज़ा

तन्वी बालकनी में खड़ी सामने फैले स्याह अँधेरे को घूंट घूंट पीने की कोशिश कर रही थी ,सोचती कुछ ऐसा जादू हो कि वो स्याह अँधेरे में गुम हो जाए और फिर कोई उसे देख न पाए. तभी मोबाईल पर मैसेज टोन बजावो चेक करने नहीं गयीपता था सचिन का मैसेज होगा, "पढ़ लिया न मेरा मैसेज ,अब जरा मुस्करा दो . सचिन का पहला मैसेज पढने के बाद ही बालकनी में आयी थी. और पता था वो दूसरा मैसेज यही भेजेगा . सचिन उसके ऑफिस में हाल में ही आया है ,पर अक्सर टूर पर रहता है. पूरे देश में घूमता रहता और जहां भी जाता है वहां से उसे मैसेज जरूर करता है, कुछ ख़ास नहीं बस उसकी खिडकी से जो भी नज़ारा उसे दिखता है ,वो लिख भेजता है .कभी लिखता , ‘बर्फीली चोटियों पर चाँद की किरणें ऐसे पड़ रही हैं कि सबकुछ नीले रंग में नहा उठा  है ,काश तुम देख पाती कभी राजस्थान के सैंड ड्यून्स का वर्णन करता , कभी काले घुमड़ते बादलों का ,कभी दहकते गुलमोहर का तो कभी पछाड़ खाती समुद्र की लहरों का . एक बार ताजमहल देखने गया तो सिर्फ इतना मैसेज लिखा...वाह ताज !!  ताजमहल को देखा और तुम याद आयी वो किसी मैसेज का जबाब नहीं देती .और सचिन ये बात जानता था .एक बार मैसेज में ही लिखा था , ‘मेरा फोन तो उठाओगी नहीं पर जानता हूँ मैसेज जरूर पढ़ोगी और पढ़ कर मुस्कुराओगी भी ‘.

सचिन बहुत ही जिंदादिल और हंसमुख लड़का था . जितने दिन भी ऑफिस में रहता रौनक आ जाती ऑफिस में. लडकियां तो उसके आस-पास ही मंडराती रहतीं. लड़के भी उसके अच्छे दोस्त थे. अक्सर शाम उन सबका  किसी पार्टी का प्लान बन जाता. वो हमेशा की तरह बस अपने काम से काम रखती और फिर ऑफिस के बाद सीधा घर . शुरू में सबने उसे भी शामिल करने की कोशिश की थी. पर हर बार उसकी ना सुन कर उसे अपने हाल पर छोड़ दिया था .सचिन ने भी हर संभव कोशिश की ,साथ चाय कॉफ़ी लंच का आग्रह ,उसे घर छोड़ देने की पेशकश पर हर बार वो सिर्फ हल्का सा मुस्कुरा कर सर हिला कर ना कर देती . एक बार सचिन ने उसे कह ही दिया , “आपको पता है, आपने अपने चारो तरफ एक  दीवार उठा रखी है, पर यह दीवार दूसरों  को बाहर रखने से ज्यादा आपको अन्दर बंद रखेगी...बहुत घुटन होगी...एक छोटी सी खिड़की तो खोलिए ,थोड़ी ताज़ी हवा आने दीजिये
आपकी बातें मेरी बिलकुल समझ में नहीं आ रहीं...ये काम निबटा लूँ ज़रा कब से पेंडिंग पड़ा है और तन्वी ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रें गड़ा दीं.
कोई बात नहीं ,हम भी छेनी हथौड़ा लेकर इस दीवार को गिरा कर ही रहेंगे .उसकी तरफ एक मुस्कुराहट उछालता सचिन चला गया वहाँ से .

वो बेतरह डर गयी , अगर सचिन ज्यादा से ज्यादा टूर पर नहीं होता तब शायद वो रिजाइन ही कर देती. अब किसी के करीब जाने या किसी को अपने करीब आने देने की हिम्मत नहीं बची थी उसमे. दो दो बार धोखा खा कर उसका दिल छलनी हो चुका था.

*** 

सिड तन्वी की बिल्डिंग में रहता था और उसके ही स्कूल में था . कब साथ खेलते पढ़ते उनके बीच प्रेम का अंकुर फूटा, अहसास भी नहीं हुआ. पर धीरे धीरे वो अंकुर एक पौधे का रूप ले चुका था और उसमे फूल खिल आये थे, जिसकी खुशबु पूरी बिल्डिंग में फ़ैल गयी थी . सबको पता चल गया था , बात तन्वी के माता-पिता तक भी पहुंची .लेकिन तन्वी की शादी को लेकर उसके माता- पिता ने बड़े बड़े ख्वाब बुन रखे . लम्बे बालों वाला, कलाई में ब्रेसलेट पहने ,हाथों पर टैटू बनवाये ,म्युज़िक को ही अपनी ज़िन्दगी समझने वाला सिड कहीं से भी उन सपनों पर खरा नहीं उतरता था .तन्वी ने हिम्मत दिखाई , ‘सिड के साथ भाग जाने को भी तैयार थी .पर सिड ने ही कदम खींच लिए .उलटा उसे समझाने लगा , ‘हम कहाँ रहेंगे ,कैसे घर चालायेंगे ,मेरे कैरियर  का क्या होगा?’ तन्वी ने कहा भी, ‘वो नौकरी कर लेगी, सिड आराम से अपना कैरियर बना सकता हैलेकिन सिड उलटा उसे समझाने लगा , “तुम कितना कमा लोगी कि हम अलग रह कर घर भी चला सकें और मैं अपने शौक भी पूरे कर सकूँ. एक गिटार की कीमत पता है?? और उसकी क्लासेज़ की फीस ?? मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है तन्वी...कितनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं ,तब जाकर पापा पैसे देते हैं. अगर तुम्हारे पैरेंट्स नहीं मान रहे तो फिर हमें एक दुसरे को गुडबाय कह देना चाहिए

सिड की ये बातें सुनकर तन्वी ने फिर कुछ नहीं कहा, ‘उसे भीख में प्रेम नहीं चाहिए था ‘ .पर इस घटना ने पता नहीं उसके पैरेंट्स पर क्या असर डाला कि वे तन्वी की शादी के लिए जल्दबाजी मचाने लगे. चुपचाप रिश्तेदारों से मिलकर एक लड़का ढूंढा गया और मुम्बई से बहुत दूर वह इस शहर में ब्याह दी गयी. तन्वी के एतराज जताने पर माँ से सुनने को मिला, “पहले ही बहुत गुल खिला चुकी हो...इसके पहले कि हमारे मुहं पर कालिख पुते, अपना घर –बार संभालो “.

तन्वी को भी अपने पैरेंट्स पर बहुत गुस्सा आया और उसने भी सोच लिया..ठीक है वह ,अब अपना घर बार ही संभालेगी ,पलट कर उन्हें नहीं देखेगी उसने पूरे तन-मन से अपने पति को अपनाया . पर उसकी किस्मत ने यहाँ भी धोखा दिया. उसके पति को एक साथी नहीं एक केयर टेकर चाहिए थी. उनकी ज़िन्दगी शादी से पहले जैसी चल रही थी, उसमे शादी के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया . वही ऑफिस के बाद दोस्तों के साथ समय बिताना . शनिवार की रात जमकर शराब पीना और फिर सारा सन्डे सो कर निकालना . अगर तन्वी कुछ कहती तो गालियाँ मिलतीं . एक बार तन्वी ने तेज आवाज़ में एतराज जताया तो पति ने हाथ भी उठा दिया . इसके बाद तन्वी सहम सी गयी , अपने माता-पिता से शिकायत की तो उन्होंने कहा , “वक़्त के साथ सब ठीक हो जाएगा थोड़ा बर्दाश्त करो पर वक़्त के साथ ठीक कुछ भी नहीं हुआ बल्कि पति और भी ढीठ हो गया . तन्वी के पति को खुद के एक छोटे शहर से होने का बहुत कॉम्प्लेक्स था .वे अक्सर तन्वी को बड़े शहर वाली , बॉम्बे वाली कहकर ताना दे जाते. फिर भी तन्वी इस शादी को कामयाब बनाने की कोशिश में जुटी रही. पर जब उसका मिसकैरेज हुआ और उसके बाद भी पति ने एक दिन भी छुट्टी नहीं ली, उसे हॉस्पिटल में छोड़ वैसे ही ऑफिस चला गया तब तन्वी बुरी तरह टूट गयी. उसे इस शादी से कोई उम्मीद नहीं बची.

दो तीन महीने तो वो डिप्रेशन में ही रही. फिर उसके बाद खुद को ही धीरे धीरे समेट कर ज़िन्दगी पटरी पर लाने की कोशिश करने लगी. रोज अखबार में नौकरी वाले कॉलम देखती,लाल निशान लगाती और बिना पति को बताये इंटरव्यू दे आती. पर कहीं उसे नौकरी पसंद नहीं आती कहीं क्वालिफिकेशन के अभाव में वो रिजेक्ट कर दी जाती. कहीं दोनों पसंद आते तो सैलरी इतनी कम होती कि इतना मर खप कर नौकरी करना उसे नहीं जमता. फिर उसे इस कंपनी में मनलायक नौकरी मिली.

पति से पूछा नहीं बस उन्हें बताया . सुनने को मिला, “हमारे खानदान की औरतें नौकरी नहीं करतीं

उसने पलट कर तुरंत ही कहा और हमारे खानदान के पुरुष शराब पीकर औरतों को नहीं पीटते
शायद नयी जॉब ने ही उसे इतना कहने की हिम्मत दे दी थी . पर पति का इगो बहुत हर्ट हुआ और वे रोज सुबह शाम ताने कस कर बदला लेने लगे , तैयार होते देख व्यंग्य करते ,”इतना सजा धजा किसके लिए जा रहा है ,बॉस  बहुत हैंडसम है क्या ?”
रोज देर से आने वाले पति अब जल्दी आने लगे थे . जिस दिन उसे देर हो जाती सुनने को मिलता, “ ऑफिस के बाद कॉफ़ी-शॉफी पीने चली गयी होंगी , नौकरी बचाए रखने को ये सब करना पड़ता है...रोज देखता हूँ मैं, यह सब  “

अपने होंठ सिल कर वो सारे काम किये जाती. अपने माँ-बाप के मन का हाल जानती थी . उन्हें अगर पता चल जाता कि उसके पति को उसका जॉब करना पसंद नहीं तो शायद जबरदस्ती छुड़वा देते. इसलिए बिना पति के किसी ताने  का जबाब दिए वह सारे काम करती और ज्यादा से ज्यादा उनसे दूर रहती. बस ऑफिस का काम ही उसके लिए जीने का सहारा था. उसने बहुत मन लगाकर काम सीखा. ऑफिस के पौलिटिक्स, गॉसिप से भी दूर रहती, मेहनत से काम करती. इस वजह से ऑफिस में उसकी बहुत इज्जत भी थी .

कभी कभी तलाक लेने के विषय में सोचती भी पर फिर खुद को ही समझा देती, “क्या फर्क पड़ जाएगा तलाक लेने से ,आज भी एक छत के नीचे अजनबी की तरह ही रह रहे हैं, आगे भी अजनबी ही रहेंगे पर एक दिन वो घर की चाबी ले जाना भूल गयी थी. ऑफिस में ऑडिट चल रहा था, उसे घर आने में देर हो गयी. कई बार घंटी बजायी पर उसके पति ने दरवाजा नहीं खोला. पूरी रात उसने सीढियों पर बैठ कर बिताई . और वहीँ बैठे बैठे एक निर्णय ले लिया. सुबह दूध वाले, पेपर वाले न देख लें इस डर से पति ने दरवाजा खोल दिया . वह अपने कमरे में जाकर सो गयी . उस दिन ऑफिस से छुट्टी ले ली. और सारा दिन घर ढूँढने में बिताया . शाम को सामान बाँधा पति के आने का इंतज़ार किया पति का रिएक्शन था ,“ हाँ ,ठीक है..जाइए जाइए..मैं भी डिवोर्स दे दूंगा..दूसरी शादी करूंगा

आप शौक से दूसरी तीसरी जीतनी मर्जी हो शादी कीजिये मुझे आपके डिवोर्स पेपर का इंतज़ार रहेगा “  कह वह बाहर निकल आयी.

उसके बाद से ही उसकी ज़िन्दगी एक शांत झील की तरह हो गयी है. सीमित दायरे में कैद...न उसमें कोई तरंग उठती है न किनारे  टूटने का कोई डर होता है. ऑफिस से आना देर रात किताबें पढना , गज़लें सुनना .इतना सुकून शायद उसकी ज़िन्दगी में कभी रहा भी नहीं. पर जब से सचिन ने ऑफिस ज्वाइन किया है वो लगातार इस शांत झील में कंकड़ फेंकता जा रहा  है. थोड़ी देर को तरंगें उठती हैं पर फिर झील की सतह वैसे ही शांत हो जाती है. पर अब झील के तल में इतने कंकड़ जमा हो गए थे कि उनकी चुभन , झील को तकलीफ दे रही थी .

***

सचिन भला लड़का था, तन्वी को उसका अटेंशन पाकर अच्छा लगता था.पर प्यार और शादी में दो बार धोखा खा चुकी तन्वी, सचिन को करीब आने देने से डर रही थी. उसे यह भी लगता, सचिन को उसके पास्ट के बारे में मालूम नहीं है, इसीलिए वह उसकी तरफ आकर्षित है. जैसे ही सचिन को सच्चाई पता चलेगी ,वह उस से खुद ब खुद दूर हो जाएगा ,इसीलिए वह सचिन से दूर दूर ही रहती पर सचिन के बार बार आते sms ने उसे उलझन में डाल दिया था. और उसने सचिन से मिलकर उसे सबकुछ साफ़ साफ़ बता देने का फैसला किया. उसे विश्वास था सचिन को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं अगर वो अपना सारा पास्ट उसे बता देगी तो वो बात समझ जाएगा और फिर उस से दूर हो जाएगा . कुल जमा अपनी चौबीस साल की ज़िन्दगी में तन्वी ने इतना कुछ देख लिया था कि उसे अब अपनी ज़िन्दगी में और उथल-पुथल गवारा नहीं थे.

उसने सचिन को मैसेज किया , “कब वापस आ रहे हो टूर से ?”

वाsssऊ... कांट बीलीव, तुम पूछ रही हो...बस अभी एयरपोर्ट की तरफ निकलता हूँ , सुबह तक कोई न कोई फ्लाईट मिल ही जायेगी और फिर डेढ़ घंटे में आपके सामने हाज़िर
मजाक छोडो ..सच बताओ...तन्वी ने फिर से मैसेज किया .
आई शपथ...सच कह रहा हूँ
ठीक है मैं कल ऑफिस में पता कर लूंगी...
और इस बार सचिन ने मैसेज की जगह कॉल ही किया. थोड़ी देर फोन घूरती रही तन्वी फिर उठा कर जैसे ही हलोकहा, सचिन का चिंता भरा स्वर सुनायी दिया, “क्या बात है तन्वी...कुछ परेशानी है...मैं मजाक नहीं कर रहा ,सच में कल आ सकता हूँ “ 
दिल भर आया तन्वी का थोडा रुक कर बोली , कि कहीं आवाज़ का कम्पन पता न चल जाए . कोई परेशानी नहीं बाबा....बस ऐसे ही कुछ बात करनी है
आज तो मेरे सितारे खुल गए ...तुम्हे मुझसे बात करनी है ?? जो सामने देख कर भी मुहं घुमा लेती है आज उसे मुझसे बात करनी है...ओह!! सचमुच यकीन हुआ, खुदा है इस जहां में वरना मेरी दुआ कैसे क़ुबूल हो जाती...
अब ये डायलॉगबाज़ी बंद करो...तुम्हारे आने के बाद कॉफ़ी पर मिलते हैं..चलो गुडनाईट
अरे !! इतनी जल्दी क्या गुडनाईट...अभी तो बात की शुरुआत है..फिर मुलाक़ात होगी और फिर...
मैं सोने जा रही हूँ..गुडनाईट
मैं परसों आ रहा हूँ तन्वी...सीधा ऑफिस ही आउंगा उसके बाद मिलते हैं...गुडनाईट एन यू प्लीज़ टेक केयर...बाय इस बार सचिन का स्वर गंभीर था .
यू टू...बाय तन्वी ने फोन रख दिया पर अब आँखों में नींद कहाँ थी. पहली बार सचिन से इस  तरह खुलकर बात हुई थी और दोनों ही अपनेआप तुम पर आ गए थे . शायद उसके लगातार आते मैसेज ने आप वाली अजनबियत हटा दी थी .देर रात तक ताने बाने बुनती रही कि कैसे बात की शुरुआत करेगी क्या क्या बताएगी, सचिन का क्या रिएक्शन होगा.

सचिन दोपहर बाद ऑफिस में आया . बाल बिखरे हुए थे . चेहरे पर थोड़ी परेशानी की लकीरें दिख रही थीं अब वे सचमुच थीं या तन्वी की कल्पना कहना मुश्किल था. दूर से ही उसकी तरफ बड़ी गहरी नज़रों से देखते हुए बहुत ही अपनेपन से मुस्कुरा दिया .लेकिन उसकी डेस्क के पास नहीं आया ,शायद उसकी असहजता भांप रहा था . छः बजे के करीब उसके पास आकर धीरे से बोला, “कहीं इरादा बदल तो नहीं दिया ?”
उसने भी मुस्करा कर सर हिला कर कह दिया .
फिर कहाँ चले कॉफ़ी के लिए
वो बीन्स एंड बियोंड ‘ है न ..ऑफिस से ज्यादा दूर भी नहीं.
दूर के लिए कोई बात नहीं, कार लेकर आया हूँ...अब इतनी मुश्किल से मौक़ा मिला है ,जितनी देर का साथ मिल जाए ,घर भी  छोड़ दूंगा ..इसी बहाने घर भी देख लूंगा...फिर तो जब मन हुआ डोरबेल बजायी जा सकती है शरारत से मुस्कराया सचिन .
तन्वी ने त्योरियां चढ़ाईं तो हंस दिया  ,”मजाक था बाबा ..समझा करो .अब सब समेटो मैं बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ .
सचिन के जाने के बाद तन्वी सोचती रह गयी, पहली बार ऐसे भरपूर नज़र डाली थी सचिन के चेहरे पर सचमुच दिलकश है मुस्कान उसकी..इसीलिए लडकियां मरी जाती हैं..फिर कंधे उचका दिए..उसे क्या , आज तो उसे सब बता देगी फिर सच जानकार सचिन खुद ही उस से सौ फीट की दूरी रखेगा

सचिन कार में वेट कर रहा था .जगजीत सिंह की नज़्म बज रही थी, “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी...”तन्वी कहने वाली थी ,’मेरी फेवरेट नज़्म है यह ‘ फिर खुद को ही झिड़क दिया, “वह दोस्ती बढाने नहीं, ख़त्म करने आयी थी. फिर एक ठंढी सांस भी ली, “अब बात दूर तलक क्या जायेगी...हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगी .सचिन ड्राइव करते हुए चुप सा था. शायद उसके भी मन में चल रहा था, क्या कहने वाली है वह रास्ते में बस ट्रैफिक मौसम की बाते होती रहीं. जब बीन्स एंड बियोंडनिकल गया तो तन्वी ने उसकी तरफ देखा .सचिन ने सड़क पर नज़रें जमाये हुए ही कहा, ‘यहाँ बहुत भीड़ होती है...आगे चलते हैं न सुकून से दो पल बैठेंगे

अच्छी जगह चुनी थी सचिन ने, बड़े बड़े आरामदायक चेयर्स थे . हलकी सी रौशनी थी और लोग भी बहुत ज्यादा नहीं. वो भी पैर फैलाकर रिलैक्स होकर बैठी थी . बस बात कैसे शुरू करे यही सोच रही थी . 
सचिन ने मेन्यु कार्ड पर नज़र घुमाते हुए पूछा , “क्या लोगी...
बस कॉफ़ी...
चिली टोस्ट ट्राई करो बड़ी अच्छी होती है यहाँ की" कहते उसने चिली टोस्ट और और कॉफ़ी ऑर्डर कर दिया था .तन्वी ने बात जारी रखने को कहा, ‘अक्सर आते हो यहाँ ?”
अब कहाँ वक़्त मिलता है..महीनों बाद आया हूँ, कॉलेज के दिनों में अक्सर आता था
गर्ल फ्रेंड्स के साथ ?” उसने छेड़ा
हाँ, गर्लफ्रेंड्स के साथ...जलन हो रही है ? “ सचिन ने भी हंस कर उसी सुर में जबाब दिया .
मुझे क्यूँ जलन होगी ? “,उसने तेजी से कहा .
हाँ, तुम्हे क्यूँ जलन होगी...ऐसा है ही क्या हमारे बीच सचिन कुछ गंभीर हो गया था .
तन्वी को सूझा नहीं क्या जबाब दे ..अच्छा हुआ उसी वक़्त कॉफ़ी आ गयी.
टोस्ट कुतरते कॉफ़ी के घूँट भरते दोनों ही चुप थे सचिन शायद इंतज़ार कर रहा था ,वो अपनी बात शुरू करे
आखिर तन्वी ने बात शुरू की , “सचिन तुम्हारे एस.एम.एस आते हैं..मैं रिप्लाई नहीं करती...मुझे अच्छा नहीं लगता
मुझे भी ये अच्छा नहीं लगता ...सचिन ने कप रखते हुए उसकी आँखों में सीधा देख मुस्कराते हुए कहा. 
वो थोड़ी असहज हो गयी लेकिन फिर संभाल लिया खुद को , “ देखो इसकी एक वजह है ...मैं सिंगल नहीं हूँ
ओह! आई सी...
नहीं मेरा मतलब सिंगल तो हूँ..पर वैसी सिंगल नहीं ...एक्चुअली आयम अ डीवोर्सी
सो ??”..सचिन ने कंधे उचका दिए
तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता ???” उसे अचरज हुआ
क्या फर्क पड़ना चाहिए ...और ये बात मुझे पता है “ सचिन ने कंधे उचका दिए .
क्याsss ??..वो जैसे आसमान से गिरी . तुम्हे कैसे पता ??”
मैडम हमलोग इन्डियन हैं और हमारा फेवरेट टाईमपास है गॉसिप...याद नहीं पर किसी ने बहुत पहले ही बताया था
और तुम्हे लगा ये तो अवेलेबल है ,इसपर चांस मारा जा सकता है ?“ ये जानकार कि सचिन को ये बात पहले से पता है तन्वी को बहुत गुस्सा आ रहा था
व्हाssट ??..सचिन इतने जोर से चौंका कि थोड़ी कॉफ़ी उसके पैंट पर छलक ही गयी .
हाँ !! तुमने यही सोचा ये तो डीवोर्सी है...अकेली रहती है....इसके साथ टाईमपास किया जा सकता है ...रात बिरात मैसेज भेजा जा सकता है ऑफिस में उसके पीठ पीछे लोग उसकी बातें करते हैं ये जान उसे बहुत गुस्सा आ रहा था और वो इसका बदला सचिन से ले रही थी.
तन्वी..आयम सॉरी... आयम रियली रियली सॉरी...मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा...और मुझे भी नहीं पता तुम मुझे इतना अवॉयड करती थी फिर भी मुझे तुमसे बात करना ,अच्छा लगता था. पता नहीं तुम्हे देख कर क्यूँ लगता कि तुम एक शांत झील सी हो, एक सीमित दायरे में कैद जबकि तुम्हे एक चंचल नदी बनकर बहना चाहिए. मैसेज इसलिए भेजता कि कहीं भी कुछ अच्छा  देखता तो मुझे तुम्हारा ख्याल आ जाता. मन होता ,वो जगह तुम्हारे साथ देखूं, बस इतनी सी बात है तन्वी और कुछ नहीं
यही होता है... डीवोर्सी के साथ अवेलेबल का टैग अपने आप लग जाता है....इसीलिए मैं सबसे इतनी दूरी बना कर रखती हूँ और देखो तुम्हें भी मालूम था फिर भी तुम मेरे करीब आने की कोशिश करते रहे, मुझसे दोस्ती बढाते रहे तन्वी की आँखें छलछला आयीं .
सचिन कुछ कहने जा रहा था पर उसकी भीगी आँखें देख चुप हो गया , कुर्सी से पीठ टिका दी ...एक गहरी सांस ली...फिर पूछा , “तो तुम क्या चाहती हो...मैं तुमसे दूर रहूँ ??”
हाँ ..आँखों में जलते हुए आंसू लिए हुए जैसे बच्चों की तरह एक जिद से कहा .
ठीक है डन.... अब नो मैसेजेस...नो बातचीत.. दूर रहूँगा, तुमसे ..इतनी बड़ी बात कह दी...बहुत हर्ट किया है मुझे...ऐसा कैसे सोच लिया तुमने...सचिन ने हैरानी से सर हिलाया
क्यूंकि यही सच है ...वो कड़वी होती जा रही थी .
फिर सचिन ने वेटर के बिल लाने का भी इंतज़ार नहीं किया काउंटर पर जाकर बिल चुकाया . वो भी साथ ही उठ आयी.
 बाहर निकल कर तन्वी ने कहा ,”मैं ऑटो ले लूंगी..
ओके.. कहता सचिन आगे बढ़ कर ऑटो रोकने लगा . ऑटो में बैठते हुए , सचिन की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई तन्वी की ..बाय भी नहीं कहा...उसकी आँखें तो गंगा जमुना बनी हुई थीं.
घर आकर भी देर तक रोती रही . पर समझ नहीं पा रही थी ,वो तो सचिन को खुद से दूर रहने के लिए कहने गयी थी. सचिन ने उसकी बात मान भी ली ,फिर भी क्यूँ उसके आंसू यूँ उमड़े चले आ रहे थे .
***

सचिन ने अपना वायदा निभाया भी. उसकी तरफ कभी देखता भी नहीं , ऑफिस में भी थोडा बुझा बुझा सा रहता, लोगो ने भी नोटिस किया तो उसने टाल दिया..अरे, इतना टूर रहता है,यार ...आज यहाँ, कल वहाँ थक जाता हूँ पर अब तन्वी की नज़रें हर वक़्त सचिन पर रहतीं. वो कब टूर पर जा रहा है, कब वापस आ रहा है, सारी  खबर रहती उसे. मोबाइल कंपनी वालों का भी कोई मेसेज आता तो चौंक जाती , और फिर सचिन के पुराने मैसेज कई कई बार पढ़ती. अपने उस दिन के व्यवहार का गिल्ट उसके मन में घर कर गया था . वो सचिन को कुछ और कहना चाहती थी पर कुछ और ही कह गयी. उसने सारा दोष सचिन पर डाल दिया ,जबकि इतना वो भी जानती थी ,सचिन के मन में ऐसा ख्याल नहीं रहा होगा. पर तन्वी को समझ नहीं आ रहा था, यह जानते हुए भी कि वह एक डीवोर्सी है सचिन उस से प्यार कैसे कर सकता है? जबकि वो हैंडसम है, काबिल है, उसे कितनी ही सिंगल लडकियां मिल जायेंगी. फिर ये भी सोचती ,अगर सचिन सचमुच सिर्फ उसके साथ टाइम पास करना चाहता था तो फिर उसके बात करने से मना करने पर इतना उदास क्यूँ रहने लगा है?और तन्वी ने सोचा, उस से मिलकर ,अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफ़ी तो मांग ही लेनी चाहिए. उसे अपनी बीती ज़िंदगी की सारी बातें बता देगी कि क्यूँ वह इतनी कड़वी हो गयी थी.
और उसने सचिन को मैसेज कर दिया..क्या बहुत नाराज़ हो ?“
मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं हो सकता...इस जनम में तो नहीं सचिन का जबाब पढ़ फिर से उसकी आँखें भर आयीं .
कल, चलें कॉफ़ी पीने ?“
ठीक है एक स्माइली के साथ सचिन का सादा सा जबाब आया ,फिर से कोई मजाक कर के वो रिस्क नहीं लेना चाहता था .

ऑफिस के बाद सचिन उस दिन की तरह ही कार में उसका वेट कर रहा था . पर आज गाड़ी में कोई ग़ज़ल या गाना नहीं बज रहा था हलके से मुस्कुरा कर उसने उसके लिए दरवाजा खोल दिया .
बैठते ही तन्वी ने कहा.. सॉरी मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था...मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी ..
कोई बात नहीं...मैं समझता हूँ ..
सचिन मुझे तुमसे ढेर सारी बातें करनी है...
बोलो..आयम ऑल इयर्स जरा सा मुस्कुरा कर उसकी तरफ देख फिर नज़रें सड़क पर जमा दीं.
छोडो कहीं नहीं जाते हैं ...लॉन्ग ड्राइव पर चलो..यहीं प्राइवेसी है ..मैं सब बताती हूँ
ठीक है..”..इतना बोलने वाले सचिन के दो दो शब्द के जबाब तन्वी को बड़े अजीब लग रहे थे पर वो समझ रही थी..वो बहुत हर्ट है और अब कुछ भी बोलकर मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता .

वो चुन चुन कर सुनसान रास्ते पर धीरे धीरे गाड़ी घुमाता रहा और तन्वी परत दर परत अपनी ज़िन्दगी के गुजरे लम्हे उसके सामने खोलती गयी . सचिन ध्यान से सुन रहा था जब कभी उसकी तकलीफ से बहुत आहत होकर उसकी तरफ देखता तो तन्वी सामने नज़रें टिका देती. पति से अलग होकर अकेले रहने की बात तक पहुँचते पहुँचते तन्वी की आवाज़ आंसुओं में डूब चुकी थी . सचिन ने एक किनारे गाड़ी लगाकर, तन्वी का सर अपने कंधे से टिका लिया. आंसुओं से चिपके उसके बाल समेट कर पीछे कर दिए और उसका सर सहलाते हुए बस इतना कहा, “भरोसा कर सकती हो तो इतना भरोसा करो मुझपर, अब इसके बाद एक आंसू नहीं आने दूंगा तुम्हारी आँखों में ..बहुत झेल लिया तुमने, अब और नहीं, मेरे होते अब और नहीं ..तन्वी थोड़ी और पास सिमट आयी , आज तक सब कुछ उसने अकेले झेला था ,सारी लड़ाई अकेले लड़ी थी ,अब तक कोई उसकी तकलीफ को यूँ अपनी तकलीफ समझ दुखी नहीं हुआ था. और तन्वी ने अपनी आँखें मूँद लीं . सब कुछ कह कर उसका मन हल्का हो गया था .साड़ी कडवाहट आंसुओं में धुल चुकी थी और अब उसका मन बीते दिनों के गहरे अँधेरे से निकल कर ,इस निश्छल प्रेम की नर्म रौशनी के स्वागत के लिए तैयार था .
(समाप्त )

Friday, August 16, 2013

दुःख सबके मश्तरक हैं पर हौसले जुदा


(जब अपने दुसरे ब्लॉग अपनी, उनकी, सबकी बातें पर कहानी पोस्ट करना शुरू किया तब ये सोचा था बाद में वो कहानी इस ब्लॉग पर भी पोस्ट कर दूंगी ताकि मेरी कहानियां एक जगह संकलित रहें ,पर आज-कल में टलता रहा . आज एक साल बाद  बाद पुनः इस ब्लॉग पर कहानी पोस्ट कर रही हूँ )


मौसम बदल रहा था, ठंढ के दिन शुरू होने वाले थे .हलकी सी खुनक थी हवा में। मालती हाथों में चाय का कप लिए बालकनी में खड़ी  थी। सूरज डूबने वाला था। आकाश सिंदूरी रंग से नहाया हुआ था। आकाश में अपने घोसलों की तरफ लौटती चिड़ियों की चहचाहट और नीचे मैदान में खेल रहे बच्चों का शोर मिलकर एक हो रहे थे। बहुत ही ख़ूबसूरत दृश्य था . मालती को ऐसे दृश्य बहुत ही पसंद थे  और वह रोज शाम को नियम से चाय का कप लेकर बालकनी में आ खड़ी  होती । 

थोड़ी देर में हल्का हल्का अँधेरा घिरने लगा।  बच्चों की माएं आवाजें , लगाने लगीं बच्चे घर की तरफ चल पड़े, पक्षी भी अपने घोसलों में दुबक गए। वातावरण बिलकुल शांत हो गया।
और मालती को अपना बचपन याद आ गया, अंधियारा घिरते ही उसकी गली में आवाजें ही आवाजें होतीं . महिलायें -पुरुष काम से लौटते और उनके बीच झगडा शुरू हो जाता . चारो तरफ शोर ही शोर होता .  उसका अतीत रह रह कर उसकी आँखों  के समक्ष  घूम जाता। कभी सपने में भी नहीं सोचा था उसने, यूँ एक अच्छी सी सभ्य कॉलोनी में अकेली पूरी इज्जत के साथ रह पाएगी वह।
एक बजबजाती खुली नाली के पास उसका उसके बचपन का घर था  घर क्या  एक छोटा सा गन्दा सा कमरा , जिसमे मालती अपने माता-पिता और दो छोटे भाइयों  के साथ रहती थी । एक कोने में खाना बनता,...दुसरे कोने में थोड़ी सी पक्की जगह थी, जहाँ पानी भरी बाल्टी रखी  होती, वहाँ बर्तन धुलते और उसकी माँ स्नान करती। मालती और उसके दोनों भाई तो गली में लगे नल के नीचे ही नहा लिया करते और बापू तो हफ्ते दस दिन में एक दिन नहाया करता।  एक तरफ  टीन  के पुराने बक्से रखे थे जो आधे से ज्यादा खाली ही रहते। बीच में माँ की फटी हुई साडी बिछा वे तीनो भाई बहन सो जाते। सो क्या जाते सहमे से पड़े रहते . क्यूंकि थोड़ी रात बीतते  ही उसका पिता शाराब पीकर गालियाँ देते  हुए घर में आता। कभी खाना उठा कर फेंक देता , कभी माँ के लम्बे बाल घसीट कर उसे पीटता। एकाध बार मालती और उसके छोटे भाई माँ  को बचाने गए तो उन्हें भी पीट दिया। माँ भी बापू को जोर जोर से गालियाँ देती । पर उस गली के हर मकान का यही  किस्सा था। माएं दिन भर घर घर में बर्तन मांज कर पैसे कमा कर  लातीं , बच्चों को पालतीं, खाना बनातीं और फिर शाम को पति से पिटतीं । माँ के पैसे भी बापू छीन कर ले  जाता। 

ऐसे ही  माहौल में वो बड़ी हो रही थी। माँ की ज्यादा से ज्यादा मदद करने की कोशिश करती। पांच साल की उम्र से ही, घर में झाड़ू लगा देती। कच्ची -पक्की रोटी बनाने की कोशिश करती। माँ  के साथ काम पर भी चली जाती। उनके छोटे मोटे काम कर देती। वे लोग कुछ खाने को देतीं तो छुपा कर भाइयों के लिए ले आती। भाई सारा दिन धूल धूसरित गलियों में कंचे खेला करते या फिर साइकिल की टायर को पूरी गली में घुमाते रहते। 

जैसे तैसे दिन कट रहे थे वह आठ या नौ साल की थी जब कहर टूट पड़ा उस पर। एक दिन बापू माँ को पीट रहे थे, माँ भी गालियाँ दे रही थी। बस उस दिन पता नहीं बापू को क्या हो गया, उसने बगल में रखा केरोसिन तेल का डब्बा उठाया और माँ  के ऊपर डाल  कर आग लगा दी। माँ  चिल्लाने लगी, वो छोटे छोटे कटोरे से पानी डालकर आग बुझाने की कोशिश  करने लगी। गली के लोग भी आ गए। किसी ने दरी  डाला, किसी ने पानी और आग बुझा दिया। बापू बाहर भाग गया। बगल वाली  काकी माँ को अस्पताल ले गयी। कुछ दिन अस्पताल में रहकर माँ  वापस घर आ गयी। पर बेहद कमजोर हो गयी थी। वह ठीक  से चल भी नहीं पाती। नौ साल की उम्र  में घर का सारा भार उस पर आ पड़ा । माँ  जिनके यहाँ काम करती थीं वो शर्मा मालकिन एक दयालु महिला थीं। उन्होंने छोटे छोटे कामों के लिए मालती को रख लिया 

अब मालती सुबह उठती , घर का सारा काम करती। घर में जो भी राशन पड़ा होता आटा , चावल  बना कर रख देती। , कभी कभी कुछ भी नहीं होता। तो बगल के बनिए की दूकान से उधार डबल रोटी लाकर रख देती। उसमे से थोडा सा निकाल कर माँ के तकिये के पास छुपा देती .वरना पता था, दोनों भाई ,माँ   के लिए कुछ नहीं छोड़ेंगे। बाहर से बाल्टी में पानी भर भर कर लाती, माँ  को नहलाती,स्टूल पर खड़े होकर उनके लम्बे बाल धो देती  उनके कपडे साफ़ कर देती।  कुछ ही दिनों में छलांग लगा कर एक लम्बी उम्र पार कर ली थी, मालती ने। .माँ  आंसू पोंछती रहती। मैं किसी काम की नहीं, मर जाती तो अच्छा होता .वो भी साथ में रोने लगती तो माँ  चुप हो जातीं। इतना काम करने के बावजूद भी वो खुश रहती क्यूंकि घर में शान्ति थी। बापू पुलिस के डर  से उन्हें छोड़कर भाग गया था . मालती ,भगवान  से मनाती, वो कभी लौट कर ही  न आये।

लेकिन भगवान् ने उसकी नहीं सुनी।
करीब  एक साल के बाद एक रात बापू धड़धडाता हुआ घर में  घुस आया, "बहुत मजे कर रहे हो, तुमलोग मेरे बिना ?? तू मरी नहीं, अब तक ?? कितना कमाती है तेरी बेटी, ला पैसा ला। "

" इतनी छोटी उम्र में इतना काम  कर रही है, पूरा घर संभाल रही है, उसे तो छोड़ दे, " माँ  ने कराहते हुए कहा। 

"जुबान लड़ाती है।" कहता वो माँ की तरफ बढ़ा ही था कि वो बीच में आ गयी, "बापू बस बीस रूपया है, ले लो पर माँ को मत मारो।।"
" ला, जल्दी ला और वो थोड़ी सी जमा पूंजी बापू लेकर चलता बना 

माँ जो थोड़ी ठीक होने लगी थी, सब्जी काट देतीं, चावल बीन देतीं। किसी तरह खिसक कर दरवाजे के पास  बैठने लगी थी। बापू के आने के बाद ही फिर से  बीमार पड़ गयी। 

शर्मा मालकिन को बताया तो वे कहने लगीं, "सदमा लग गया है तेरी माँ को, डर गयी है बापू को  देखकर ।"
माँ  की सेहत दिन ब दिन गिरती गयी, उसने खाना -पीना छोड़ दिया और एक दिन उसकी मौत हो गयी। 

***

वह छोटे भाइयों को गले लगाकर बहुत रोई। बापू से उसे बहुत डर  लगता था। पर अच्छा था  
 बापू दिन भर गायब रहता,देर रात घर आता और थोड़ी बक झक के बाद शराब के नशे में सो
 जाता। उसने अब एक दो और घरों में काम करना शुरू कर दिया। वह मन लगाकर मेहनत  से काम करती। कभी किसी का कोई सामना नहीं छूती। साफ़ सुथरी रहती। सलीके से कपडे पहनती बाल बनाती, सभी मालकिन उसके काम से बहुत खुश रहतीं। अपनी बेटियों के चप्पल, कपडे, उसके भाइयों के लिए भी पुराने शर्ट -पैंट दे देतीं। 

दिन गुजर रहे थे। कुछ दिन से बापू बड़े प्यार से बातें करता  घर में डांट डपट नहीं करता। उस से पैसे भी नहीं मांगता। उसे थोडा आश्चर्य हो रहा था। एक दिन बापू दो आदमियों के साथ आया।
 उस से कहा, "पानी ला ..चाय बना।"
 उसने डरते डरते चाय बना कर दे दिया। पर गौर कर रही थी, चाय बनाते हुए भी वे दोनों आदमी  उसे गौर  से देख रखे थे। दुपट्टे से उसने खुद को जितना हो सकता था, ढक लिया। उसे लगा बापू शायद उसकी शादी करने की सोच रहा है। वो तो कभी नहीं करेगी शादी। उसे कमा कर पैसे नहीं लाने और पति से मार नहीं खानी । उसकी बिरादरी में सब ऐसा ही करते हैं।

चाय पीने के बाद, बापू उन आदमियों के साथ बाहर चला गया। थोड़ी ही देर बाद उसका छोटा भाई  दौड़ता हुआ घर में  आया। 

"दीदी, बापू तुझे उन आदमियों के हाथों बेच रहा है"

"क्या  "आश्चर्य से उसका मुहं  खुला रह गया।

"हाँ .. दीदी, उस आदमी ने बापू को बड़े बड़े नोट दिए हैं। मैं अँधेरे में से छुप कर सब देख रहा था। और उसने कहा कि  बाकी पैसे लड़की को ले जाने आऊंगा तब दूंगा।"
अब  वो क्या करे  उसका दिमाग तेजी से चलने लगा। उसने दोनों भाइयों को पास बिठाया और कहा," देखो शर्मा मालकिन की बहन आयी थी  बम्बई से वे मुझसे कह  रही थीं, साथ चलने को, उनके यहाँ बम्बई में काम करने के लिए। मैं नहीं गयी कि  तुमलोगों का ख्याल कौन रखेगा। पर अब अगर नहीं गयी तो बापू मुझे बेच देगा, तुम दोनों बड़े हो गए हो , अब अपना ध्यान रख सकते हो .मैं शर्मा मालकिन को हाँ बोल देती हूँ।"

दोनों भाई रुआंसे हो गए। छोटा भाई तो डर कर उस से लिपट गया, 'ना दीदी मुझे भी अपने साथ लेती जाओ।।"

चौदह साल के बड़े भाई ने बड़े-बुजुर्ग सा समझाया , "नहीं दीदी को जाने दे छोटे। जब हम और बड़े हो  जायेंगे अच्छा कमाने लगेंगे तो अलग घर में रहेंगे फिर दीदी को बुला लेंगे। "


उसका मन भर आया। पर यह कमजोर पड़ने का समय नहीं था। उसने तेजी से अपनी चीज़ें इकट्ठी करनी शुरू कर दीं। बापू का क्या ठिकाना , उसे सुबह सुबह ही निकल जाना होगा, शर्मा मालकिन बहुत भली हैं।जबतक बम्बई  जाने का इंतजाम नहीं हो पाता । वे उसे अपने घर में  रहने की इजाज़त दे देंगीं। काम में देर हो जाने पर कितनी बार तो कहती हैं, "रुक जा रात को यहीं।' वो उसकी मुश्किल जरूर समझेंगी।
शर्मा मालकिन तो बापू की बात सुनते ही आग बबूला हो गयीं। उसके कुछ कहने से  पहले ही कहा, " अब तू उस घर में पैर मत रखा रखना, यहीं रह मेरे पास। पीछे आँगन  में जो कमरा है, उसे साफ़-सूफ करके उसी  में रह जा। अब उस राक्षस के घर में मत जा "

उसने बताया कि यहाँ  रहना ठीक नहीं होगा । बापू शायद आपसे भी झगडा करे। मुझे शेफाली दीदी के यहाँ बम्बई  भेज दीजिये। वो जब यहाँ आयी थीं तो बार बार कहती थीं  न , "दीदी इसे मुझे दे दो।।"
"हम्म ये ठीक रहेगा, शेफाली के पास रहेगी तो मुझे भी चिंता नहीं होगी। वो तो कई बार कह चुकी है। आज ही उसे फ़ोन करती हूँ। पर तुम चिंता मत करो।" "
शर्मा मालकिन का माँ का सा स्नेह देखकर उसका मन पिघल गया। अगर भगवान एक  तरफ से कष्ट देता है तो दूसरी तरफ से कई हाथ उस कष्ट से बचाने के लिए भी देता है। 

दो दिन बाद ही नीलिमा दीदी के यहाँ जाने के लिए शर्मा मालकिन ने उसे बम्बई  की ट्रेन में लेडीज़ कूपे में  बिठा दिया। आस-पास वालों को उसका ख्याल रखने को कह दिया अपना फोन नंबर भी दे दिया ताकि वो जब चाहे भाइयों से बात करती रहे। 

नीलिमा दीदी उसे स्टेशन  पर लेने आयी थीं। नीलिमा दीदी भी शर्मा मालकिन की तरह ही दिल की बहुत अच्छी थीं। उसका बहुत ख्याल रखतीं पर उसे उनके घर का माहौल रास नहीं आता। शेफाली दीदी के पति फिल्मो में कुछ करते थे। हमेशा उनके यहाँ लोगों की भीड़ लगी होती। देर रात तक पार्टियां होतीं। दिन- रात  का कोई भेद ही नहीं होता। अजीब अजीब से लोग उनके घर आते, फटी जींस वाले ,लम्बे बालों वाले, लगातार सिगरेट फूंकते हुए। सबलोग शराब पीते, देर रात तक उनके ठहाके गूंजते। उसे बहुत अजीब सा लगता . कई लोग कभी-कभी उसे घूर कर भी देखते, उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता। वो इस माहौल  से निकल जाना चाहती थी। 
वो जब सब्जियां लेने जाती तो पास की एक आंटी भी अक्सर मिलतीं  . वो उस से बड़े प्यार से बातें करतीं और एक दिन उसने अपने मन की उलझन उनके सामने रख दी और पूछ लिया , "आप मुझे कहीं और काम दिलवा दीजियेगा ?" 

उन्होंने उसकी समस्या समझी और कहा, "कोशिश करेंगे " 

और एक हफ्ते बाद ही वे रास्ते में उसके इंतज़ार में ही खड़ीं  थीं। उनकी एक सहेली को पूरे दिन के लिए एक लड़की चाहिए थी। सहेली और उसके पति दोनों नौकरी करते थे , उनकी एक छोटी सात साल की बेटी थी , जिसकी देखभाल के लिए उन्हें कोई अच्छी सी लड़की चाहिए थी। आंटी बार बार अपनी सहेली के अच्छे  स्वभाव की बात कर रही थीं। 

मालती को भी ऐसा ही शांत माहौल चाहिए था। इस घर में आकर उसे बहुत अच्छा लगा। शालिनी प्यारी सी शांत सी लड़की थी। लड़की की माँ  जिन्हें वो शोभा दीदी कहा करती थी। वे भी मीठा बोलने वाली थीं। किसी बात पर डांटती नहीं। घर का सारा  भार उसे सौंप दिया था। वे सुबह सुबह ऑफिस चली जातीं, शाम में घर वापस आतीं, पूरे घर की जिम्मेवारी मालती की ही थी अब । वह भी बहुत मन लगाकर काम करती। शोभा दी भी उसके काम में मीन-मेख नहीं निकालतीं। उसे अपनी बेटी जैसा ही मानती .  बेटी के लिए चॉकलेट , आइसक्रीम  लातीं  तो उसके लिए भी लातीं । शनिवार रविवार जब उनकी छुट्टी रहती तो  घर के  कामों में भी हाथ  बटाती । शोभा दी के पति अपने काम से मतलब रखते अखबार पढ़ते, फोन पर बात करते या फिर कंप्यूटर पर कम करते रहते । वे अक्सर टूर पर भी जाया करते . 

दो साल के बाद शोभा  दी का ट्रांसफर एक छोटी सी जगह पर हो गया। वहां उनकी बेटी शालिनी के लिए अच्छे स्कूल नहीं थे। शोभा  दी नयी जगह पर चली गयीं। उनके पति भी अक्सर टूर पर चले जाते . पूरा घर मालती अकेले संभालती। सीमा दी पूरे घर के खर्च के पैसे उसके हाथों में दे देतीं . मालती एक एक पैसे का हिसाब रखती । घर की देखभाल करती । शालिनी का ख्याल रखती .

मालती बहुत निडर और हिम्मती भी थी। किसी से नहीं डरती .  एक बार बिल्डिंग के वाचमैन ने कुछ छींटाकशी की उसपर, मालती ने वहीँ चप्पल निकाली और दो चप्पल लगा दिए। पूरे इलाके में यह बात फ़ैल गयी । अब आस-पास की बिल्डिंग के वाचमैन , ड्राइवर सब उस से डर कर रहते। वो नीचे सब्जी भी  लेने भी जाती तो सब उस से सहम कर नज़रें नीची कर के बात करते। मालती भी यह  दिखाने के लिए कि वह किसी से नहीं डरती , सबसे बहुत रूखे स्वर में बात करती। मुश्किल ये हो गयी कि यह उसकी आदत में शुमार हो गया।
अब वह घरवालों से भी रुखा ही बोलती। खुद को घर की मालकिन समझती, क्यूंकि शोभा दी महीने में एक बार ही आतीं। घर के  सारे निर्णय वही लेती, कौन से परदे लगेंगे, कौन सी चादर बिछेगी, कौन सी चीज़ कहाँ कहाँ रखी जायेगी शोभा दी को ये सब अच्छा नहीं लगता। पर उसकी ईमानदारी , काम के प्रति लगन, अपना घर समझकर काम करना , पूरी जिम्मेवारी उठाना, शालिनी को बहुत सारा प्यार देना, ये सब देखकर वे चुप रहतीं।

अब मालती के पास काफी समय रहता। शालिनी ने उसे पढना-लिखना सिखाना शुरू किया। उसे भी पढने में बहुत दिलचस्पी हो गयी। जरा सा भी खाली वक़्त मिलता तो वह किताबें लेकर बैठ  जाती। शालिनी भी अच्छी टीचर थी, उसे बहुत मन से पढ़ाती। स्कूल जाती तो उसे होमवर्क  देकर जाती। और अगर वो होमवर्क नहीं करती तो उसे सजा देने के लिए शालिनी  खुद खाना नहीं खाती। फिर उसे शालिनी का घंटों मनुहार करना पड़ता। अब वो जल्दी से घर का  काम ख़त्म कर होमवर्क करने लगी। धीरे धीरे वह अंग्रेजी के कॉमिक्स, चंदा मामा , चम्पक से शुरुआत कर , पत्रिकाएं , अखबार सब पढने लगी। शालिनी के साथ अंग्रेजी के प्रोग्राम देखते हुए वो अच्छी तरह अंग्रेजी समझने लगी। शालिनी भी उसे सिखाने के लिए ,उस से ज्यादातर अंग्रेजी में ही बात करती। अब मालती बाहर जाती तो अंग्रेजी में ही बोलने की कोशिश करने लगती। शोभा  दी की सहेलियां, या उनके पति के दोस्त घर आते तो उसे देख दांग रह जाते। कई लोग तो उसे घर का सदस्य ही समझ लेते। 

जब तीन साल बाद शोभा दी का ट्रांसफर वापस इस शहर में हो गया तो शोभा दी ने मालती  से कहा कि  'अब वो उसकी शादी कर देना  चाहती हैं '. उसकी रूह काँप गयी। उसके  अपने माता-पिता का जीवन आँखों के सामने आ गया और गली के और लोगों का जीवन भी। महिलायें हाड तोड़ कर कमाती और उनके पति शराब के नशे में उन्हें मारते भी और उनके पैसे भी छीन कर ले जाते। उसे नहीं चाहिए थी ऐसी ज़िन्दगी। और उसने शोभा  दी से साफ़ कह दिया, उसे शादी नहीं करनी ,अगर वे उसे नहीं रखना चाहतीं तो वह दूसरी जगह कोई काम देख लेगी पर आजीवन शादी नहीं करेगी  । ये उसका अंतिम फैसला है।


शोभा दी ने उसकी बात मान ली । मालती बीच बीच में अपनी  शर्मा मालकिन के यहाँ फोन करके भाइयों का हालचाल लेती रहती। पता चला दोनों भाई एक कारखाने में नौकरी करने लगे हैं और पिता से अलग रहते हैं। दोनों ने शादी भी कर ली। उसे बहुत बुला रहे थे, 'एक बार आकर मिल जा'। शोभा दी ने भी ख़ुशी ख़ुशी उसे छुट्टी दे दी और  भाइयों के लिए ढेर सारे उपहार भी खरीद कर दे दिए। अब तक का उसका सारा वेतन भी जोड़ कर दे  दिया।

वहां जाकर उसने सारे पैसे भाइयों को दे दिए। उपहार तो दिए ही,  भाभियों को उसके जो भी कपडे पसंद आते, वो दे देती। जब लौटने का समय आया तो उसने पाया उसके पास बस दो जोड़ी कपडे बचे हैं। फिर भी उसने सोचा, उसके लिए काफी हैं। अभी जायेगी तो शोभा दी खरीद ही देंगीं और दो महीने के बाद उसके पास भी उसके वेतन के काफी पैसे जमा हो जायेंगे . वह जो चाहे खरीद लेगी। पर जब वापस काम पर आयी उसके दस दिन बाद ही उसकी भाभी ने एक पत्र भेजा अब  खुद लिखा या किसी और से लिखवा कर भेजा पर पत्र   का मजमून था कि  "'आप इतने दिन यहाँ रहीं, आपको अच्छा खिलाने-पिलाने के लिए हमें क़र्ज़ लेना पड़ा। अब उनके पैसे लौटाने हैं। आप पैसे भेज दो।" उसने वो पत्र  फाड़ कर फेंक दिया और फिर भाइयों के घर कभी  नहीं गयी। शोभा दी का घर ही ,अब उसका घर था।

 शालिनी बड़ी होती गयी। उसने कॉलेज पास किया और नौकरी भी करने लगी। उसकी शादी हो गयी। मालती बहुत अकेलापन महसूस करने लगी और उसी दरम्यान एक हादसा हो गया . सीढियों से फिसल कर उसने अपनी कमर की  हड्डी तुडवा बैठी। शोभा दी ने उसके इलाज़ का पूरा खर्च उठाया। हॉस्पिटल में उसके साथ रहीं। शालिनी ने भी ऑफिस से छुट्टी लेकर ,उसकी अच्छी देखभाल की . घर पर भी उसे पूरा आराम दिया। पर पूरी तरह ठीक होने के बाद भी अब वह पहले की तरह काम नहीं कर पाती। झुक नहीं पाती। जल्दी जल्दी काम नहीं निबटा पाती । मालती को बहुत बुरा लगने लगा। उसे लगने लगा , वो शोभा दी पर बोझ बन गयी है। मालती बार-बार उनसे मिन्नतें करने लगी  कि अब उसे छुट्टी दे दें . अब वो पहले की तरह उनके काम नहीं आ पाती। उसकी इलाज़ पर भी इतना खर्च हो गया है। वो कहीं और काम  करके अपना जीवन गुजार लेगी। उनपर बोझ  नहीं बनना चाहती  

पर उसने नाजुक वक़्त में शोभा दी की गृहस्थी संभाली थी ,उनकी अनुपस्थिति में उनकी बच्ची की प्यार से देखभाल की थी।  ये वो नहीं भूल पायीं थीं और उन्होंने एक छोटा सा फ़्लैट खरीद कर मालती को रहने के लिए दे दिया। शालिनी और शोभा दी ने फ़्लैट में सारा सामान भी जुटा दिया। उसे हर महीने खर्च के पैसे भी देतीं। शालिनी की गोद में एक नन्हा मुन्ना भी आ गया। मालती रोज शालिनी के घर जाकार उसके बच्चे की देखभाल करती  , घर के कामों में हाथ बंटाती। पर यह सब वह अपनी ख़ुशी से करती । उस पर किसी किस्म की बाध्यता नहीं थी।  इस छोटे से घर में वो अब अपनी मर्जी की मालकिन थी। 

चाय कब की ख़त्म हो चुकी थी। बाहर अँधेरा घिर चुका था। मालती सोचने लगी, कितने भी कष्ट आयें जीवन में अगर अपने कर्म अच्छे रखो तो अच्छे लोगों का साथ मिल ही जाता है।  अगर उसने सही समय पर सही निर्णय लेने की हिम्मत नहीं दिखाई होती अपना काम  मेहनत ,लगन और ईमानदारी  से नहीं किया होता तो आज वह इस शांतिपूर्ण जीवन की हक़दार नहीं होती।

उस दिन मालती को पार्क में रोज आ कर बैठने  वाले एक उम्रदराज़ अंकल ने एक शेर सुनाया था ,उसे पूरा समझ तो नहीं आया पर अपने पर सही लगा 

"दुःख  सबके मश्तरक हैं पर हौसले  जुदा 
कोई बिखर गया तो कोई मुस्करा दिया "