Friday, June 29, 2012

सच होते....अनदेखे सपने (कहानी-- समापन किस्त )



कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा . जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.बेटे के जन्म के बाद बेटे को उस से छीन लिया गया.  उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. .उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर  गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि  उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया   है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया पहले एक स्कूल में फिर बैंक  में नौकरी कर ली...पर राजीव बैंक में उसे बहाने से तंग करते रहे ..वहाँ  के अधिकारियों ने भी उसका शोषण करना चाहा...उसके शिकायत करने पर उसे नौकरी से अलग कर दिया...कोर्ट ने बच्चों की जिम्मेदारी उसे सौंपी और राजीव को उनके भरण-पोषण के लिए एक निश्चित रकम देने का निर्देश दिया ..उसे दूसरी नौकरी मिल गयी...उसने अपना कविताओं का पुराना शौक फिर से अपनाया...एक पत्रिका में कविता को द्वितीय पुरस्कार मिला.  )

गतांक से आगे 


अब तो उसका उत्साह बहुत बढ़ गया. उसी पत्रिका में एक और कविता भेज दी...वो भी छप गयी..और पत्रिका में कई लोगो ने पत्र लिख कर उस कविता की सराहना भी की तो उसे अफ़सोस होने लगा..'ये वाली कविता...प्रतियोगिता में भेजनी चाहिए थीं...शायद फर्स्ट प्राइज़ मिल जाता.." और फिर खुद को ही डांट दिया...'मन कभी संतुष्ट नहीं हो सकता..छपना ही बड़ी बात थी...द्वितीय पुरस्कार मिल गया...अब सोच रही है...पहला क्यूँ नहीं मिला..'

पुरस्कार के पैसे तो मिले ही थे..दूसरी कविता छपने के भी दो सौ रुपये मिले तो सोचा उसने..'कविता से पैसे भी कमाए जा सकते हैं...ये तो कभी सोचा ही नहीं था'...और अब लोग जब उसे पढ़ रहे हैं..पसंद भी कर रहे हैं तो उसे अपने कविता-लेखन को गंभीरता  से लेना होगा. पर लिखने  के  पहले ढेर सारा पढना ज्यादा  जरूरी है..यही सोच..कई समकालीन कवियों की किताबें खरीद लाई. ऑफिस..घर और बच्चों के काम से बचा एक एक पल...उसने कविता को समर्पित कर दिया था. देर रात तक एक -एक कविता को चार -चार बार पढ़ती...उसका  शिल्प-..शैली समझने की कोशिश करती. 
उसका पूरा जीवन अब कवितामय हो गया था .. किसी भी बात की प्रतिक्रिया कविता के रूप में ही होती  . बच्चों की खिलखिलाहट में...माँ के लाड़  में...जमाने की धूप में....भाई-बहन के  स्नेह की शीतल बयार में...खाली बटुए में....पूजा में... हर चीज़ में एक नया रंग दिखता अब.... हज़ारों शब्द साथी बन गए थे जो उसके आस-पास विचरते रहते...वो लपक कर उन्हें मुट्ठियों में कैद कर लेती.  किसी तितली के पंख से फडफडाते, वे शब्द...और जब उन्हें आज़ाद करती तो कविता का रूप लिए रंग-बिरंगी तितली सा खुले आकाश में उड़ जाते और वो हैरान रह जाती...'ये उसकी रचना है..?'..जब जब्त आंसुओं से कोई रचना बनती तो महादेवी याद आतीं.."मैं नीर भरी दुख की बदली..' मन जब प्रश्नों के चक्रव्यूह में होता तो निराला के शब्द तैरते मन में.." बांधों ना नाव इस ठांव बन्धु...पूछेगा सारा गाँव बन्धु.." . जरूरी कामों से दीगर वो अब कविता ही ओढती और कविता ही बिछाती. 

और इन सारे उपक्रमों  से  कविता का स्त्रोत जो फूट निकला...वो एक सरिता बन...जो अबाध गति से बहने लगा था. 
कई पत्रिकाओं में वो नियमित छपने लगी. कभी किसी पत्रिका का कोई विशेष अंक निकलता तो उस से विशेष रूप से कविताओं का अनुरोध किया जाता. सम्पादक लोग बड़े आदर से पेश आते. कई लोगों के पत्र भी आते.. जबाब तो वो किसी पत्र का नहीं देती पर उन्हें कई-कई बार जरूर पढ़ती .अब तक तो किसी पत्रिका में उसकी तस्वीर भी नहीं छपी थी..इसका  मतलब लोगों को उसकी कविताएँ सचमुच पसंद आती हैं. ये पत्र उसका बहुत उत्साह बढाते...और वो एक जिम्मेदारी सी महसूस करती अपने लेखन को और बेहतर बनाने के प्रति . 
ऑफिस में उसने खुद किसी को नहीं बताया...पर एक बार किसी ने पत्रिका में उसका नाम देख पूछ लिया और उसके हाँ कहते ही सारे ऑफिस में खबर फ़ैल गयी. लोगों ने शिकायत भी की 'अब तक क्यूँ नहीं बताया.."
उसके मुस्कुरा कर चुप रह जाने पर किसी दूसरे ने उत्तर दे दिया.."अरे इसे ही तो कहते हैं..असली टैलेंट....भरे घड़े से कभी कोई आवाज़ आती है??...कहते हैं  ना..'अधजल गगरी  छलकत जाए.. भरी गगरिया चुप्पे जाए'..ये पत्रिकाओं में छपती रहीं और कभी बताया भी नहीं...और याद हैं वो' मिस्टर प्रसाद  ' अखबार में संपादक के नाम एक पत्र छपा था..तो कितना इतराए फिरते थे..दो दिन तक अखबार उनके हाथों में ही था....एक-एक को दिखाते फिरते थे. " सबलोग उन्हें याद कर हंसने लगे...
सब अब उसे बड़ी इज्जत भरी निगाहों से देखते. वो खुद में ही सकुचा सी जाती.

एक बार उसे एक आमंत्रण पत्र मिला. जिसमें शहर में हो रही एक कवि गोष्ठी में सम्मिलित होने का निमंत्रण था. वो सोच में डूब गयी. घर में बैठ कर कविता लिखना और पत्रिकाओं में भेजना अलग बात है और कवि-सम्मलेन में मंच से कविता पढना अलग. ये उसके वश का नहीं....नहीं कर पाएगी वो. माफ़ी माँग लेगी. 
पर इस बार माँ ने बहुत हौसला दिया. बोलीं.."बेटा भगवान ने तुम्हे एक  अवसर दिया है,आगे बढ़ने का..अपनी पहचान बनाने का...इसे ऐसे मत गंवाओ. इसी ईश्वर ने तुम्हारी इतनी कड़ी परीक्षा ली...इतना कुछ सहा तुमने..पर हिम्मत नहीं हारी..और सफल रही...अब खुश होकर वो ईनाम दे रहा है तो उसे मत ठुकराओ.."

बहनों  ने सुना तो एक डांट लगाई , "चुपचाप जाकर गोष्ठी में शामिल हो या हमलोग वहाँ आकर तुम्हे धकेल कर मंच पर भेज देंगे ...सोचो जरा हमारे लिए ये कितने गौरव की बात है...हमारे परिवार में इस क्षेत्र में कोई आगे नहीं बढ़ा...कितना बड़ा सम्मान है ये परिवार के लिए..ना मत कर छुटकी..ह्रदय से आशीर्वाद दे रहे हैं..तू जरूर सफल होगी."

और बहनों माँ-बहनों का आशीर्वाद काम आया. उसने संयोजक से आग्रह किया था कि उसका नाम दो तीन कवियों के बाद डाले...पहला अनुभव है...दूसरों को पढ़ते देख लेगी तो हिम्मत  आ जाएगी. उसने कागज़ पर कविता लिख कर रख ली थी...शायद लोगों को देख कर घबरा जाए तो नज़रें झुकाए कागज़ देखकर पढ़ देगी. माइक के सामने आई तो गला सूख रहा था...थूक निगल कर गला तर किया और हाथ में कांपते कागज़ पर नज़र डाली ..एक पंक्ति कागज़ देख कर पढ़ी..और फिर तो जैसे किसी और ही व्यक्तित्व ने उसपर कब्जा कर लिया...सामने बैठे लोग..उस पर टिकी इतनी आँखें...कुछ भी उसे नज़र नहीं  आ रहा था...सामने सीधा देखती हुई...इतनी बुलंद आवाज़ में कविता पढ़ी कि तालियों की गड़गडाहट से ही वह फिर अपने में लौटी...हैरानी हो रही थी..'ये उसकी जगह कौन इतने जोश से कविता पढ़ रही थी...अपने कितने ही रूपों से वो खुद अनजान थी अब तक. मुस्करा कर सबका शुक्रिया अदा करते अपनी जगह पर वापस आ गयी. 
इस कवि गोष्ठी की क्लिपिंग दूरदर्शन पर  दिखाई गयी...और अब तक  बस उसके घर वाले ,ऑफिस वाले या फिर पढ़ने की रूचि रखने वाले लोग ही  उसके कविता लेखन के विषय में जानते थे. अब महल्ले-टोले के लोग भी जान गए. जहाँ पहले किसी समारोह में लोग ताने देते थे अब आगे बढ़कर उस से बातें करने का बहाना ढुंढते .
अपने रिश्तेदारों से बड़ी शान से मिलवाते.."ये बहुत बड़ी कवियत्री हैं..टी.वी. पर आती हैं.."
"अरे बड़ी कहाँ...और टी.वी. पर तो बहुत लोग आते हैं.." वो सकुचा कर कहती.
"हम तो नहीं आते....हमारे लिए तो आप एक सेलिब्रिटी हैं.." ...वो हैरान रह जाती वक़्त कितना जल्दी बदल जाता  है.

महिलाओं में उसे अपनी सबसे अच्छी दोस्त बताने की होड़ लगी होती. लडकियाँ उसे घेरे रहतीं...'हमें भी सिखाइए ना...कैसे लिखते हैं कविता'
कभी कभी कोई प्यारी सी लड़की..कभी कोई  शर्मीला  सा लड़का एक तह किया हुआ कागज़ लिए हुए उसके घर आते..." कुछ लिखने की कोशिश की है..एक बार देख कर बताइए ना कैसी है.." वो यथासंभव उन्हें सलाह देती... उन्हें बढ़ावा देती...समाज की नज़रें अब उसके प्रति बदल रही थीं.

सबसे छोटे देवर संजीव ने भी वो प्रोग्राम देखा था उसने बधाई  देने को फोन किया...ख़ुशी उसके आवाज़ से छलकी पड़ रही थी. संजीव अब एक अच्छी नौकरी में था और उसकी शादी भी हो चुकी थी. यदा-कदा फोन कर लिया करता था...बच्चों का हाल-चाल ले लिया करता था. कभी कभी आकर मिल भी जाता. वो ही ज्यादा बढ़ावा नहीं देती. पता नहीं उसकी वजह से उसे अपने परिवारवालों से ना सुनना पड़े कुछ. उसकी पत्नी भी उसे कितना जानती है...शायद उसका भी यूँ संजीव का फोन करना अच्छा ना लगे.

पर संजीव के फोन ने चिंता में डाल दिया. अब तो उसके ससुराल  वालों को पता चल गया...इसका मतलब राजीव को भी पता  चल गया होगा..अब पता नहीं वो कैसे रिएक्ट करें. उनका डर नहीं था..पर बिना बात की बहस वो नहीं चाहती थी. थक गयी थी..उनकी जली-कटी सुनते सुनते...दिमाग शांत रखना चाहती थी. पर दो दिन बाद ही राजीव का फोन आ गया..उन्होंने तो नहीं देखा था..किसी ने उन्हें खबर की थी.
आदतवश गाली से ही शुरुआत की.."तो इसीलिए छटपटा  रही थीं,अकेले रहने को कि मर्द लोगों के बीच में बैठकर गीत गा सकें....ये सब मेरे साथ रहने से नहीं होता ना...अनजान मर्द लोग के साथ..हंसी ठट्टा चल रहा है....तनिको सरम नहीं रह गया है आपको..."
वो आगे पता नहीं क्या क्या कहते रहे..उसने रिसीवर टेबल पर रख दिया था. इसके बाद अक्सर यही करती...पहले ही कह देती कि अगर आपको यही सब कहना है तो हम रिसीवर नीचे रख रहे हैं.."
"हाँ मेरा बोली तो खराब लगबे करेगा...हम सच जो कहते हैं.....ओर वो आगे सुनती ही नहीं....जितना हो सके निगेटिव वाइब्स को वो खुद से दूर रखना चाहती थी. अक्सर कोई ना कोई राजीव के किस्से सुनाने की कोशिश   करता. वो शुरुआत में ही रोक देती या फिर वहाँ  से चली जाती. पर वे लोग माँ को बता जाते और मना करते करते भी माँ टुकड़ों टुकड़ों में कह ही डालती...कि अब 'राजीव की  रंगीन मिजाजी उन्हें महँगी पड़ रही थी. औरतें उन्हें ब्लैकमेल करने लगी थीं. उनपर झूठे आरोप लगा कर  भी उनसे पैसे ऐंठने लगी थीं. खुद ही शाम ढले उनके क्वार्टर पर जातीं और फिर उनसे कहतीं, 'मुंहमांगा  पैसे दो नहीं तो हल्ला मचा देंगे...पुलिस में खबर कर देंगे'. राजीव को पैसे भी देने पड़ते फिर आनन- फानन में ट्रांसफर ले वहाँ से भागना भी पड़ता.
माँ खुद ही उसके मन की बात कह देतीं.."जो जैसा करेगा....वैसा भरेगा.."
वो माँ  को  बरजती रहती..'माँ अब बच्चे बड़े हो  रहे हैं...जितनी जैसी छवि अपने पिता की उनके मन में है..वो ही काफी मैली है..अब उस पर और गर्द की परत मत चढाओ...' 

उसकी तरह बच्चों ने भी किताबों में ही शरण ढूंढ ली थी. कभी-कभी उसे महसूस होता....उसका बेटा अपने दोस्तों के साथ फिल्म  जाने की जिद नहीं करता ..ना ही हर शाम चौराहे पर खड़ा गप्पे लगाता है. खेलने जरूर जाता  है..पर वहाँ से सीधा घर. छुट्टी का दिन भी ज्यादातर घर पर ही बिताता है. इसलिए तो नहीं कि' वो भी डरता है कहीं कोई उसके पिता का जिक्र ना कर डाले?" फिर मन को समझाती...'अब कुछ पाने के लिए तो कुछ खोना  ही पड़ेगा...अगर वो  किताबों में डूबा रहता है..तो अपना भविष्य ही बना रहा है' .बाकी बच्चों की माँ उस से हमेशा कहतीं ."आपका  रूद्र  कितना मन लगाकर पढता है....हमेशा फर्स्ट  आता है..मेरे बेटे का तो पढ़ने में मन ही नहीं लगता...क्या उपाय करूँ??.."

और रूद्र के लिए उसे चिंता करने की जरूरत पड़ी भी नहीं. दसवीं अच्छे नंबरों  से पास हुआ. वो उसे इंजीनियरिंग  या मेडिकल पढ़ना चाहती थी. पर रूद्र ने साफ़ कह दिया..इसके लिए पिता से पैसे मांगने होंगे..और उसे उनके पैसे नहीं चाहिए. उसे अपने लिए एक पैसे भी एक्स्ट्रा मांगना गवारा नहीं. उसने उन्हें आश्वस्त किया.."माँ तुम चिंता मत करो...मैने फर्स्ट अटेम्प्ट में ही यू.पी.एस.सी            ना क्लियर किया  तो कहना मुझे. मैं आज से ही उसकी तैयारी में जुटा हुआ हूँ.'  वो समझती थी..वो जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था. जब उसने बी.ए. का इम्तिहान दे दिया तो वो अड़ गयी, उसे कसम दे दिया कि उसे यू.पी.एस.सी. के इम्तहान के लिए  कोचिंग करनी ही पड़ेगी. वो अपने बेटे की इतनी मेहनत जाया होते नहीं देख सकती थी. वो अपनी तरफ से मेहनत कर रहा था तो उसका भी फ़र्ज़ था वो उसे सही मार्गदर्शन मुहैया करवाए. जब सारे बच्चे कोचिंग की सुविधा उठा रहे हैं तो वो अपने  बेटे को इस से वंचित नहीं रखना चाहती थी. 

उसने एक दिन नोटों की गड्डी उसके सामने रखी...और कहा.."पता करो कौन सा कोचिंग इंस्टीट्युट अच्छा है ..वहाँ चलकर एडमिशन ले लो.."
रूद्र चौंक कर उठ खड़ा हो गया..' माँ इतने पैसे कहाँ से??"
"चिंता मत करो..तुम्हारे पिता से नहीं  लिए हैं..."
"फिर...??"
वो चुप रही..तो बोला.."तुमने गहने  बेच दिए...क्यूँ माँ..तुम्हे बेटे पर पूरा भरोसा नहीं है..मैं नहीं कर पाऊंगा??"
"पूरा भरोसा है बेटा, तभी तो गहनों की परवाह नहीं की..मालूम है तू कम्पीट भी करेगा..और ऐसे दस सेट बनवा देगा.." 
"पर माँ उस पर  काव्या ,सौम्या का भी हक़ है.."
'हाँ  बेटा...तीन हिस्से कर के तेरा हिस्सा ही बस निकाला है..और अगर जरूरत पड़ती तो उनका हिस्सा भी निकाल देती...तुम तीनो अलग अलग हो क्या..और क्या तू सौम्या,काव्या के लिए नहीं  बनवा देगा.."
रूद्र...सोचता हुआ सा वापस बैठ गया..उसने उसके कंधे पर हाथ रखा..'चिंता मत करो बेटा...ये सब तुमलोगों का ही है.." और फिर वहाँ से चली गयी. रूद्र को अकेला छोड़ देना चाहती थी..जानती थी...आँसू मचल रहे होंगे पर खुद को घर का जिम्मेवार बड़ा लड़का समझता है ना..सारी ताकत लगा उन्हें अंदर ही घोंट लेगा..लड़का हुआ तो क्या...कभी-कभी आँखें नम  करना उसके ही हित में अच्छा है..अंतर का सारा कल्मष बह जाएगा. 

काव्या शुरू से ही चंचल...बातूनी थी,..और प्रैक्टिकल भी. नौकरी भी उसे चैलेंज वाली ही पसंद थी. उसे कोई बोरिंग नौकरी नहीं करनी  थी बल्कि वो कारपोरेट ऑफिस में काम करना चाहती  थी. और इस के लिए उसे एम.बी.ए. करना था. उसे अपने पिता से पैसे लेने में कोई संकोच नहीं था. बल्कि वो उल्टा अपना हक़ समझती थी. उसने कहा भी..."तुम कुछ मत कहना..मैं ही बात करुँगी..आखिर उनका प्रमोशन भी होता जा रहा है...सैलरी बढती जा रही है...पर क्या ,महंगाई  नहीं बढ़ रही??...हमें तो वही सालों पहले कोर्ट से तय किए पैसे ही मिलते हैं...तुम नौकरी ना करो..नानी की पेंशन ना हो...नाना जी का बनाया ये मकान ना हो तो हमारा खर्च चलता, उनके भेजे पैसे से??..वे पैसे भी वो कैसे रो रो के देते हैं..करेंगे क्या उन पैसों का...मैं तो भैया की तरह नहीं हूँ.....उनसे अपनी फीस के पैसे लेकर रहूंगी.."

उसने दो टूक बात की...और उसकी इतनी सीधी बात ने राजीव को कुछ कहने का अवसर नहीं दिया...वे भी शायद मुँहफट  काव्या से डरते थे. जब गेस्ट हाउस में उनसे मिलने जाती तब भी काव्या उन्हें टोक देती थी.."आप इतना पान क्यूँ खाते हैं..माउथ कैंसर हो जाएगा.." ..इस तरह से लेटे रहने से कितने  ओवरवेट हो गए हैं....कई बीमारी हो जायेगी आपको...."
राजीव उसे डांट देते.."हाँ इहे मना रही है..माँ सिखाई होगी.."
"नहीं हमने किताब में पढ़ा है...किसी ने सिखाया नहीं है.."..काव्या बिना डरे बोलती.
इस बार भी पता नहीं काव्या ने कैसे क्या बात की पर राजीव एम.बी .ए. की फीस देने को राजी हो गए. 

पर मुश्किल सौम्या की थी. वो अपने दीदी भैया से अलग...मेडिकल पढना चाहती थी. और वो काव्या की तरह बड़बोली  भी नहीं थी. पिता से उसका कभी संवाद भी नहीं होता. ना ही उनके साथ रहने की कोई स्मृति ही थी उसे. सौम्या गोद में ही थी तभी वो राजीव का घर छोड़ चली आई थी. राजीव के लिए भी वो जैसे अजनबी  सी थी. कभी उसका हाल भी नहीं पूछते ना ही कभी उस से बात करते. 
मेडिकल की कोचिंग...फिर महँगी पढ़ाई..राजीव तैयार होंगे इतने पैसे देने को ..शक था उसे. रूद्र होता तो शायद मान भी जाते..आखिर उनके खानदान का चिराग था वो. 

पर ईश्वर ने जब उसे इतने कष्ट दिए तो उनके निवारण के रास्ते भी निकालता गया. देवर संजीव मिलने आया और हमेशा की तरह बच्चों से बातचीत करता रहा. सौम्या ने उत्साह से बताया..."वो डॉक्टर  बनना चाहती है.."
संजीव ने  शाब्बाशी  दे पीठ ठोंकी उसकी.
पर सौम्या के अंदर जाने के बाद...उसने संजीव से पैसों की चिंता जतायी. संजीव ने कहा.."भाभी..आखिर हमलोग किस दिन के लिए हैं..चाचा हूँ उसका...कुछ तो मेरा भी हक़ बनता है..मुझे हमेशा  ये अफ़सोस रहता है..आपके लिए कुछ नहीं कर सका..अब एक मौका मिला है..इसे मत छिनिये..."
"नहीं संजीव जी...मेरा ये मतलब नहीं था...पर मेडिकल की पढ़ाई लम्बी चलती है....बहुत  रुपये लगते हैं...आपके अपने बच्चे भी हैं....और सौम्या के पिता के पास ऐसा नहीं कि पैसे नहीं हैं. बस उनसे बात कौन करे..क्यूंकि अब मेरी सहनशक्ति जबाब दे चुकी है. अब उनकी गाली-बात बिलकुल भी नहीं सुन पाती हूँ. हिम्मत नहीं होती है..उनसे बात करने की. "
"हम्म ..ठीक है...मैं बात करूँगा...मैं बाबूजी से भी बात करूँगा...हम सब समझायेंगे उन्हें...ये हम  सबके लिए गर्व की बात है कि सौम्या  डॉक्टर बनना चाहती है..हमारे खानदान में आज तक कोई डॉक्टर नहीं हुआ...पूरे घर का आशीर्वाद मिलेगा इसे. बाबूजी भी बहुत खुश होंगे ये सुनकर.... बिटिया का उत्साह बढ़ाइए. आज के ज़माने में बच्चे शॉर्ट कट चाहते हैं..जल्दी से जल्दी पैसे कमाना चाहते हैं...सौम्या इतनी पढ़ाई के लिए तैयार  है तो हमें उसका हौसला बढ़ाना चाहिए....आप बिलकुल फ़िक्र ना करें...बिटिया तो डॉक्टर बन कर रहेगी.."

संजीव की बातों से उसके सर से एक बोझ उतर गया...और बड़ी शान्ति मिली...अब जाकर ये अहसास उसके भीतर उतरने लगा कि उसकी बेटी एक दिन डॉक्टर बनेगी.

संजीव ने अपना वायदा निभाया...राजीव से क्या बात की कैसे समझाया, नहीं पता...पर संजीव ने ही अच्छे कोचिंग  इंस्टीट्युट का पता किया और खुद सौम्या को लेकर एडमिशन के लिए गए. सौम्या ने भी जी जान लगाकर मेहनत की और अपना सपना पूरा किया. ख़ुशी होती उसे..तीनो बच्चों ने अपना -अपना सपना देखा..रास्ते खुद बनाये और मंजिल पाने में सफल भी हुए.

रूद्र के यू.पी.एस.सी. में सेलेक्शन की खबर और सौम्या के मेडिकल एंट्रेस टेस्ट में अच्छे रैंक की खबर आस--पास ही मिली. उसे सातवें आसमान पर होना चाहिए था. पर जैसे उसे विश्वास ही नहीं होता...सहम कर मन ही मन  एक ही जप करती..'हे भगवान!! मेरे बच्चों की खुशियों को नज़र ना लगे..."

देर तक पूजाघर की शांत ठंढी जमीन पर बैठी रही..एकटक भगवान की मूर्ति निहारती..' अब कोई शिकायत नहीं भगवान...मुझे दुख भी दिया...उस से लड़ने का संबल भी..और मेरे बच्चों का भविष्य भी संवारा...' बार-बार आँखें भर आतीं...कभी सोचा था...तीनो बच्चों को अकेले दम पर बड़ा कर एक अच्छा भविष्य दे पाएगी...पर परिवार के आपसी प्यार विश्वास...ने सब संभव कर दिखाया. राजीव के घर से निकलने का ये कदम नहीं उठाती तो शायद उस कलहपूर्ण वातावरण में बच्चे असमय ही मुरझा गए होते और उन निराश कदमों से अपने भविष्य की सीढियां यूँ उत्साहपूर्वक  नहीं  चढ़ पाते.

बच्चों की पढ़ाई ..उसकी नौकरी और कविता लेखन सब सुचारू रूप से चलते आ रहे थे. अब पत्रिकाओं में वो एक जाना-पहचनाना नाम बन चुकी थी. कवि-सम्मेलनों में उसे नियमित बुलाया जाता. दूरदर्शन पर जो कवि गोष्ठियां होतीं उसमे भी उसे जरूर निमंत्रित किया जाता. जिन वरिष्ठ  कवियों की कविताओं की मुरीद थी. अब वो उसके अच्छे मित्र थे. कभी किसी रचना में शंका होती तो बिलासंकोच उन्हें भेज देती. वे बढ़िया सलाह दिया करते.

ऐसे ही  एक कवि सम्मलेन के दौरान एक वरिष्ठ कवि ने कहा.." जया जी..आप इतनी  कविताएँ लिख चुकी हैं...इतनी पत्रिकाओं में छप चुकी हैं. सबका लेखा जोखा कुछ रखा है??"
"ह्म्म्म.. ऐसा सिलसिलेवार तो नहीं...पर सारी कविताएँ मेरी डायरी में सुरक्षित हैं...."

"तो उन सबको एक जगह संग्रहित कर एक संकलन क्यूँ नहीं छपवा लेतीं. आपकी कविताएँ लोगों को बहुत पसंद आती हैं....आपके प्रशंसक  एक जगह आपकी कवितायें पढना चाहेंगे "
"प्रकाशक के संदेश तो आते हैं..पर वे लोग ये प्रस्ताव रखते हैं कि कुछ पैसे मैं खर्च करूँ...कुछ वे योगदान करेंगे तब वे संकलन प्रकाशित करेंगे...ये मुझे मंजूर नहीं..."
"अच्छा !! ये बात तो हमें पता ही नहीं थीं..."
"आप वरिष्ठ कवि हैं...ये सारी शर्तें नवोदित कवियों के लिए  होती हैं.."
"अब आप नवोदित कहाँ रहीं...फिर भी मैं देखता हूँ...इस सिलसिले में क्या कर सकता हूँ...पर आप संकलन की तैयारी शुरू कर दीजिये...जो कविताएँ आप संकलन में देना चाहती हैं...उन्हें  एक अलग डायरी में नोट करती जाइए...कभी भी प्रकाशक उसकी मांग कर सकते हैं. "
उसके पास प्रकाशकों के संदेश तो आते थे पर उसने इस तरफ गंभीरता से कभी नहीं सोचा था. और इसके लिए पैसे देना भी उसे गवारा नहीं था. पत्रिकाओं में छप जाती..लोग पढ़ लेते..बस इतने से ही संतुष्ट थी. अब इन कवि महोदय  ने एक नया सपना बो दिया था उसकी आँखों में. और वो उसमें खाद-पानी डालने में जुट गयी.

कवि जी के वायदानुसार   एक प्रकाशक   का  संदेश आया...फिर तो महीना  भर आवरण चुनने ...भूमिका लिखने  की कवायद चलती रही. उन कवि महोदय ने अपनी तरफ से संकलन के लिए बड़े उत्साहवर्द्धक दो शब्द लिखे . संकलन जब छप कर आया...तो कवर पेज को देर तक सहलाती रह गयी..वही अहसास मन में हिलोरें ले रहे थे...जो पहली बार रूद्र के सर पर हाथ फेरते हुए जन्मे  थे.
कुछ ही दिनों बाद शहर  में एक पुस्तक मेला लगा था...प्रकाशक ने बताया था उसका कविता - संग्रह  भी रख रहे हैं. वो ऑफिस से निकलते ही पुस्तक -मेले का एक चक्कर लगा आती....चोरी छुपे अपनी किताबों की कतार पर बार-बार नज़र डालती. कभी किसी को अपनी किताब पलटते देख लेती तो अजब संकोच से भर जाती . जब विमोचन के समय कुछ लोगों ने उसके संकलन पर उसके ऑटोग्राफ मांगे तो अजीब सी अनुभूति हुई. यह सपना तो कभी देखा ही नहीं था. पता होता तो जरा अपने हस्ताक्षर की ही थोड़ी प्रैक्टिस कर आती. 

और कल  जब  नवोदित कवि के कविता संग्रह के रूप में उसके संकलन को पुरस्कार मिलने का समाचार मिला तब से तो जैसे कोई अहसास समा ही नहीं रहा. यंत्रचालित सी पत्रकारों के सवाल के जबाब देती रही...शुभचिंतकों - प्रशंसकों  की बधाई सब स्वीकार करती रही .जब काव्या ने उस से लिपट कर कहा..."माँ ...यू डिड इट...यू डिड  इट...हमें गर्व है तुम पे माँ..." तब भी वो अबूझ सी उसे देखती रह गयी. काव्या ने उसे झकझोर दिया.."अरे हंसो..खुश हो...ख़ुशी के मारे बस बेहोश मत हो..रुको मैं भैया को फोन करती हूँ..."

उसके जाने के बाद भी   वो वैसी ही मूर्ति बनी खड़ी रही...अब सौम्या ने उसे जकड लिया .."एम सो हैपी फॉर यू.....सो हैपी ..माइ स्वीट मम्मा...वी आर प्राउड ऑफ यू " सौम्या का सर सीने से लगाते उसकी आँखें तरल हो आयीं . 'इतना तो माँगा भी नहीं था ईश्वर..आपने तो मेरी झोली ऊपर तक भर दी...जितने कष्ट दिए... उसके सौ गुणा तो खुशियाँ दे डालीं. ये भी ख्याल रखा कि ये खबर तब आए जब दोनों बेटियाँ साथ हों.' वरना किस से ख़ुशी बांटती वो?..कौन संभालता उसे.?  माँ ..भैया के पास गयीं हुईं थीं. ...और रूद्र अपनी नई नई पोस्टिंग पर. वो तो दोनों बेटियों की छुट्टियाँ चल रही थीं..इसलिए दोनों घर पर थीं. 
"माँ... भैया..." कहते हुए सौम्या ने उसे मोबाइल थमाया.
रूद्र की आवाज ख़ुशी से भीगी हुई थी.."क्या बात है माँ...अब तो तुम सुपर स्टार बन गयी हो...स्टार तो थी ही.."
"पागल...हम लिखने वाले लोग कहाँ के स्टार..." मुस्कुरा पड़ी वो..
"देखाss देखाss...भैया से बात करते हुए कैसे मुस्कुरा  रही है...हमारे कहने पर तो कोई रिएक्शन ही नहीं.."
उसने आँखों से बरजा...बात तो करने  दे...
'हाँ हाँ...कर लो अपने लाड़ले  से बात...अब तो माँ...सबको भूल जायेगी.....'बेटा खाना खाया..बेटा पानी पिया..बेटा रात भर सोया..." सौम्या को हमेशा मजा आता उसे  चिढाने में. पहली बार रूद्र निपट अकेले रह रहा था..उसे चिंता होती पर सौम्या बाज़ नहीं आती..." माँ  वो बच्चा है क्या..अपना ख्याल रख सकता है.." अब सौम्या क्या जाने एक माँ का दिल..खुद  जिस दिन माँ बनेगी उस दिन जानेगी माँ का प्यार और चिंता. 
उसने फिर से आँख दिखाया तो कान पकड़ते हुए बोली.."सॉरी..आज तो तुम्हारा दिन है...मैं जा रही हूँ...मिठाई लेने.."और फिर वो यह जा वह जा..

सारे आने जाने वालों के लिए लगातार चाय कॉफी बना और चहक चहक कर सारे रिश्तेदारों..अपनी सहेलियों को ये खबर  सुना दोनों बच्चियां थक कर चूर हो गयीं थीं..और अब बेसुध सो रही थीं. पर उसकी आँखों में नींद कहाँ...सोफे से बालकनी और किचन का चक्कर  लगाते एक रात में ही अपना सारा विगत जी गयी वह. आज अपना पूरा जीवन चलचित्र सा घूम गया आँखों के समक्ष  पर अब इन आँखों को थोड़ा आराम देना होगा. पुरस्कार मिलने से कुछ बदल नहीं जाता. जिंदगी वैसी ही बदस्तूर चलती रहेगी. सुबह ऑफिस भी तो जाना है..या शायद बेटियाँ ना जाने दें....देखेगी पर अभी एकाध घंटे की नींद तो ले ले. 
अपने कमरे  की तरफ कदम बढ़ा ही रही थी  कि  मोबाइल बज उठा..."इतनी सुबह कौन हो सकता है?'
फोन उठाया...तो राजीव थे उस तरफ....नशे में डूबी आवाज़ में बोल रहे थे..." एकदम्मे से फोन उठा लीं...सुतिं नहीं का रात भर...हाँ खुसी के मारे नीदं त गायबे हो गया होगा...सुना है बड़ा प्राइज़ उराइज़ मिला है आपको..."
वो चुप रही...पर उन्हें क्या फर्क पड़ता था..उन्हें तो एकतरफा बोलने की आदत थी...बोलते जा रहे थे.."अ ई सबका क्रेडिट किसको जाता है...ई जो इतना कबिता-फबिता लिखती हैं..मर्द सबके बीच बईठ के गाती हैं...ई सब मौका मिला कईसे???...हमरा सुकर कीजिए...आपको जो नहीं सताए होते  तो ई कबित्त फूटता का??..ऊ कौन कवि कह गए हैं..." दुखी होके ही कोई गीत लिख सकता है..." 
"कौन कवि बोले हैं??"..उन्होंने दुबारा दुहराया..
वो चुप रही तो आगे बोले...'आपको त मालूमे होगा,नाम ...मत बताइए पर ऊ बहुत सही कह गए हैं ..आज जो अकास पे चल रही हैं....उसके पीछे हम ही हैं...त हमको थैंकू बोलिए...अगर आपसे हम सादी नहीं किए होते तो  और ई सब फेर बदल नहीं हुआ होता आपकी जिंदगी में तो रहतीं कहीं रोटी पकाती...और घर संभालती....ई कवित्त उवित्त चूल्हे में गया होता."

"हाँ एकदम ठीक.." कह उसने फोन काट दिया...उन्हें सुधारने का मन भी नहीं हुआ कि  ये सुमित्रानंदन पन्त ने कहा था.." वियोगी होगा पहला कवि...आह से उपजा होगा गान "

नंबर सेव किया कि  इस नंबर का फोन अब नहीं उठाना  है..वो हमेशा राजीव के नंबर सेव करती रहती और वे अलग-अलग नंबरों से फोन ट्राई करते रहते 
पर अब उसे राजीव पर  गुस्सा नहीं आता...बल्कि तरस आता. एक भरा- पूरा घर ...बीवी..तीन तीन होनहार बच्चे होते हुए भी आज वो व्यक्ति कितना अकेला है. अगर थोड़ी सी समझदारी दिखाई होती..अपने गुस्से पर काबू किया होता... जानवर से इंसान बनने की ज़रा सी कोशिश की होती...तो ये सारी खुशियाँ उसके आँगन में चहक रही होतीं . यूँ अकेलेपन में उसे शराब का सहारा नहीं लेना पड़ता. 

एक गहरी उसांस ले ...फोन सोफे पर फेंका..और अपने कमरे की बजाय बेटियों के कमरे में चली गयी.. दोनों को खिसका बीच में थोड़ी सी जगह अपने लिए बनाई...और दोनों बेटियों को सीने से लगाए पुरसुकून नींद में डूब गयी.

(समाप्त ) 

Wednesday, June 6, 2012

वो खुशनुमा अहसास.. (कहानी--16 )



कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा . जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.बेटे के जन्म के बाद बेटे को उस से छीन लिया गया.  उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. .उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर  गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि  उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया   है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया पहले एक स्कूल में फिर बैंक  में नौकरी कर ली...पर राजीव बैंक में उसे बहाने से तंग करते रहे ..वहाँ  के अधिकारियों ने भी उसका शोषण करना चाहा...उसके शिकायत करने पर उसे नौकरी से अलग कर दिया...कोर्ट ने बच्चों की जिम्मेदारी उसे सौंपी और राजीव को उनके भरण-पोषण के लिए एक निश्चित रकम देने का निर्देश दिया ..उसे दूसरी नौकरी मिल गयी. )

गतांक से आगे 

बच्चे मन लगाकर पढ़ रहे थे...उनका रिजल्ट अच्छा  आ रहा था. माँ ने भी अब उसका मायके में रहना स्वीकार कर  लिया था. बल्कि उन्हें अब यहाँ ज्यादा अच्छा लगता था..बातों बातों में कह ही देतीं..."बेटा के यहाँ तो केवल खाना और सोना था....कोई बात करनेवाला भी नहीं मिलता...बच्चे तो घर में रहते ही नहीं थे...बहू के ऊपर घर का सारा काम...बेटा सुबह गए देर रात को लौटता. हमेशा दरवाज़ा बंद कर के भीतर बैठे रहो...ना किसी से बोलो ना बतियाओ... एकदम मन औंजिया जाता था.  खाने से ही अरुचि हो गयी थी...कुछ अच्छा भी नहीं लगता और पचता भी नहीं था. यहाँ कुछ नहीं तो छत पर ही चले जाओ..दो बार चढ़ने उतरने में ही खाना हज़म हो जाता है....अगल-बगल वाले से छत पर ही बात भी जाती है."
वो भी छोटी- से छोटी बातें भी माँ से पूछकर ही करती.....ताकि उन्हें ये अहसास बना रहे कि  वे ही घर की मालकिन हैं. 'माँ सब्जी में क्या बनाऊं?'...'सौम्या को सर्दी-खांसी में क्या घरेलू दवा दूँ'??...'बच्चे पढ़ रहे हैं..माँ, जरा वहाँ बैठ कर देखो..लड़ाई ना करें आपस में'..इतने से ही माँ खुश हो जातीं..और उन्हें लगता..उनकी कितनी अहमियत है ,घर में.

डगमग करती हुई....जीवन की नैय्या  चली जा रही थी...पर उसकी नाव को हिचकोले देना शायद ईश्वर को ज्यादा ही पसन्द था. एक दिन ऑफिस पहुंची ही थी कि मैनेजर का बुलावा आया..बड़ी नम्रता से उन्होंने एक लिफाफा पकड़ाया और  उसकी सवालिया निगाहों  के जबाब में कहा...' कंपनी को शिफ्ट करने की सोच रहे हैं...इसलिए अब उसकी सेवाओं की जरूरत नहीं है '
वो क्या कहती फिर से चिंताओं के जाल में उलझी घर आ गयी. रह रह कर उस व्यक्ति का ध्यान आता जो एक रोज पहले ऑफिस में आया था और उसकी डेस्क  के पास खड़ा उसे घूरता रहा था...फिर अंदर जाकर काफी देर तक बात करने के बाद निकला तो जाते समय भी अजीब सा चेहरे पर हल्का स्मित लिए उसकी तरफ देख रहा था. उसने व्यस्त होने का बहाना कर अपनी आँखें , एक रजिस्टर में छुपा ली थीं पर बार बार उसे लग रहा था..ये व्यक्ति उसकी तरफ यूँ क्यूँ देख रहा है?..उसे पहचानता है क्या?...पर  दिमाग पर काफी जोर डालने पर भी याद नहीं आया कि कहीं मिली हो उस से. ..अब एक शंका हो रही थी कि उसे इस कंपनी से रुखसती का लिफाफा पकडवाने के पीछे कहीं वही शक्ख्स तो नहीं था. क्यूंकि कंपनी के बाकी लोगो को भी हैरानी हुई...कंपनी शिफ्ट करने  जैसी तो कोई खबर किसी ने नहीं सुनी थी.. 
यानि  की राजीव अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे...किसी और को उस से क्या दुश्मनी हो सकती है...पर विद्रूपता से ,उसने सोचा..कंपनी वाले कम से कम बहाना तो  कोई अच्छा सा बनाते. 

एक बार फिर हाथों में था चाय का कप..लाल पेन..माथे पर सिलवटें ...नज़रों एक सामने अखबारों के विज्ञापन और ढेर सारा वक़्त. कभी-कभी सोचती.,.अच्छा ही है जो यूँ नौकरी से जबरन ब्रेक मिल जाता है. वो बच्चों की तरफ ध्यान दे पाती है...स्कूल से आकर 'माँ कपड़े बदलने के लिए डांट लगाए  और खाना परोसे.'.बचपन के इस सुख से बड़ा दूसरा सुख नहीं होता...खुद अपने दिन याद हैं, उसे...कितने नखरे करती थी...'सलाद काट कर दो'..'अचार लाओ' ....'ये सब्जी कितनी गन्दी है'..पकौड़े बनाओ...और माँ उसे डांटती भी रहतीं और गरम गरम पकौड़े भी बना कर देतीं. ..और यहाँ ऑफिस में बैठी सोचती रहती....'उसके बच्चों को ये सब कहाँ नसीब...पहले राजीव के आतंक से सहमे से रहते थे...जो दो खा लेते थे..अब भी वही है..वो हिदायत  देकर जाती है....'नानी को तंग मत करना...खुद से खाना निकाल लेना.." अब कम से कम उसके बच्चों के पास भी ये स्मृति तो रहेगी कि कभी कभी माँ  भी मनपसंद खाना परोस कर खिलाया करती थी.

कोर्ट से भी बुलावा आता रहता और वो वकील साहब के साथ कोर्ट के चक्कर लगाती रहती पर जब से जज ने बच्चों से बात करके पैसे देने का फैसला सुनाया था. राजीव ने कोर्ट आना बंद कर दिया था. एक बार उसके वकील को खबर भेजी कि वे म्युचुअल सेटलमेंट चाहते हैं...क्यूंकि उन्हें शादी करनी है...उसे अंदर से ख़ुशी ही हुई ..अच्छा है..हमेशा के लिए ही नाता  ख़त्म हो जाएगा. ना तो उनकी सूरत देखने की मजबूरी होगी ना ही उनकी जली-कटी बातें सुनने की. और उसने अपने घरवालों से सलाह-मशवरा कर तीनो बच्चों की पढ़ाई का खर्च जोड़..कर एक रकम निश्चित कर  ली और जब वकील के घर पर मुलाक़ात हुई तो राजीव के सामने वो प्रस्ताव रख दिया. राजीव सुनते ही आग-बबूला हो गए." क्यूँ दे हम इतनी बड़ी रकम....हमारी सेविंग्स क्या रह जायेगी फिर."
उसने भी तर्क दिया.."बच्चों को बड़ा करना है...उन्हें पढ़ना-लिखना है.."
"हाँ..तो करिए इंतजाम...आप ही को शौक था  ना घर छोड़ के भागने का...ई तो घर से बाहर पैर निकालने से पहले सोचना चाहिए था..."
" आप ऐसा सलूक नहीं करते....तो फिर हम पैर ही बाहर क्यूँ निकालते...आपने मजबूर किया मुझे..." अब वो भी चुप रहने वाली नहीं थी. 
"अरे आप जैसी औरत के साथ ऐसा ही करना  चाहिए...ठीक किए हम जो भी किए...बल्कि कम्मे किए...अ का  पता आप हमसे इतना पईसा ले के डिवोर्स ले लें..और दूसरी शादी कर लें..."
"अब ये कौन जानता है...आगे क्या होगा...आप भी तो दूसरी शादी कर सकते हैं.."..वकील ने बीच में दखल देते हुए कहा.
"हाँ, हम तो करबे करेंगे...इसीलिए तो म्युचुअल सेटलमेंट के लिए कहे हैं...पर इतना पईसा हम नहीं देंगे...ई बस पईसा के भूखी  है..सहर में अकेले मौज करना चाहती है..बच्चा सब तो बहाना है..."
इसके साथ ही गालियों की बौछार शुरू कर दी उन्होंने. वकील भी घबरा गए. उनकी पत्नी अंदर से आकर बीच में खड़ी हो गयीं क्यूंकि राजीव ने ऐसा रौद्र रूप धारण कर रखा था कि हाथ चलाते उन्हें देर नहीं लगती.

म्युचुअल सेटलमेंट की बात वहीँ रह गयी...और उसका कोर्ट जाना बदस्तूर जारी रहा. जब भी कोर्ट से बुलावा आता...उसे जाना पड़ता.....सुनवाई कोई नहीं होती..डेट आगे बढ़ जाती पर उसे वकील की फीस देनी पड़ती. उसके साथ ही वकील का व्यवहार भी अब असह्य होता जा  रहा था. थे तो वे पिता की उम्र के..पर हर बार वे अपने कॉलेज के प्रेमप्रसंग बड़े रस लेकर सुनाते. शुरुआत करते..'आपको पता है..हमने प्रेम विवाह किया था, उस जमाने में.....मैं तो कॉलेज में बिलकुल  छैला बाबू था...इतनी लडकियाँ मुझपे मरती थीं'...और फिर छेड़ देते कोई प्रेम प्रसंग...कई बार तो वे दो प्रसंग एक ही नाम से सुना जाते..कभी दो नाम से एक ही प्रसंग. वो हाँ हूँ भी नहीं करती  फिर भी उन्हें एकतरफा कथा सुनाने से  कोई गुरेज़ नहीं होता. पर एक बार तो हद्द हो गयी. जब उसकी इस कंपनी की  नौकरी छूट गयी तो बोले.."मैं आपको अच्छी नौकरी दिलवा सकता हूँ..दस हज़ार तक मिलेगा. मेरे कॉलेज का साथी है...बड़ी कंपनी का मालिक . पर मेरी ही तरह जरा रंगीन मिजाज़ का है. अगर उसे खुश  कर देंगी तो दस हज़ार महीना ऊपर से देगा...अब देखिए  घर से बाहर पाँव निकाली हैं तो जमाने के अनुसार चलना ही होगा..."

उसकी तो मुट्ठियाँ भींच गयीं..गुस्से से चेहरा  लाल हो गया...बदन कांपने लगा... अगर कोर्ट परिसर नहीं होता...लोग आस-पास नहीं होते तो पता नहीं वो क्या करती...शायद उन्हें थप्पड़ ही रसीद कर देती..ऐसा प्रस्ताव रखने की उनकी हिम्मत भी कैसे हुई??"
पर वहाँ से सीधे अपना बैग उठाया...और चल दी.
वे पीछे -पीछे लपकते हुए आए..."अरे, ठीक है...मत करियेगा  वो नौकरी...मैं तो एक बात कह रहा था..."

उसने इतना ही कहा...'अब मेरा केस दूसरा वकील देखेगा...अब आपकी जरूरत नहीं.." और झटकती हुई आगे निकल आई.

उसने भी कोर्ट जाना छोड़ दिया..और उसकी केस फ़ाइल धूल खाती रही...कोर्ट के चक्कर लगाने के दौरान देखा था उसने..कई डिवोर्स केस ..दस साल से... पंद्रह साल से पेंडिंग पड़े हुए थे. उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था..डिवोर्स मिले या ना मिले. बस उसके बच्चों को उनका कानूनी हक़ मिलता रहे...उनकी पढ़ाई सुचारू रूप से चलती रहे...इस से बढ़कर अब उसकी कोई दूसरी इच्छा नहीं थी.

***
उसे एक  कम्पनी में क्लर्क की नौकरी मिल गयी....और उन्ही दिनों राजीव का फोन आया कि उनका ट्रांसफर काफी दूर हो गया है. अब वे हर महीने नहीं आ पायेंगे. मनी ऑर्डर से पैसे भेज दिया करेंगे. सुकून सा महसूस हुआ..वरना महीने का पहला हफ्ता निकट आते ही..उसका जी धड़कने लगता..'अब राजीव के सामने पैसे लेने जाना होगा "

ये सोच भी राहत मिली ..अब शायद उसकी ये नौकरी बच जायेगी. राजीव उतनी दूर से चालें नहीं चल पायेंगे. हालांकि इतना आभास उसे था कि राजीव आसानी से पैसे नहीं देंगे. उन्हें कई बार फोन करके   तकाजा करना पड़ेगा. अपने सामने झुकाने का ऐसा सुनहरा मौका वे नहीं छोड़ेंगे. सच भी यही हुआ. 
वो फोन करती तो कहते..'मुझे आपसे बात नहीं करनी...बच्चों को फोन दीजिये.."
वो बच्चों को उनके अपशब्दों से बचाना  चाहती थी. पर उन्हें फोन थामना ही पड़ता. वो देखती...रूद्र या काव्या..चुपचाप रिसीवर पकडे देर तक खड़े रहते. जब पूछती..'क्या कह रहे थे..?"
"अरे क्या कहेंगे..वही सब..जाने दो ना...उनकी तो आदत है...तुमने ही सिखाया है ना...एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दो..फिर उनकी बात क्या दुहराना...हमने दूसरे कान से निकाल दिया.." और हंसने लगते बच्चे.
वो भी मुस्कुरा देती..मेरी ही दी हुई सीख मुझे ही लौटा रहे हैं...पर समझती थी, जैसे वो बच्चों को उनकी कड़वी बातों से बचना चाहती है..वैसे ही बच्चे भी उसे मानसिक संताप से बचाना चाहते हैं...और उसकी शान्ति के लिए उसे कुछ नहीं बताते.

कभी कभी राजीव उसे कह  देते..."शर्म नहीं आती है..पैसा मंगाते हुए...आपका कर्जा खाए हैं क्या...कि कमा कमा के आपका भोथरा भरते रहें..."
उसका जबाब होता...."कानूनी हक़ माँगने में शर्म कैसी??...ये बच्चे आपकी भी जिम्मेवारी हैं...क़ानून ने ये हक़ दिया है, उन्हें...उनके पालन-पोषण का खर्च तो देना ही पडेगा....ये सब उन्हें दुनिया में लाने से पहले सोचना चाहिए था..."अब वो पहले वाली छुई-मुई जया नहीं रह गयी थी.
"हाँ गज भर का जुबान आ गया है मुहँ में....इतना ही अकेले मटरगश्ती का शौक है तो हाथ-पैर हिला के कमा काहे नहीं लेतीं हैं...खाली बड़का बड़का बोली बोलने आता है.."
" जरूर कमा लेती और आपसे अच्छा कमा लेती...पर मैने अपने कैरियर बनाने के दिन...आपके  अत्याचार सहने में और अपने बच्चों को पालने में लगा दिया..."
"हूँह कहने में कुछो का जाता है....कौन देता आपको नौकरी...क्या है आपका क्वालिफ्केसन...ऐसे सैकड़ों बी.ए. पास चप्पल चटकाते घूमते हैं..."
मन तो हुआ कहे...आप भी तो सिंपल बी. ए.. ही हैं..कम्पीटीशन में कम्पीट करके नौकरी लिए हैं..तो क्या वो कोई कमजोर थी पढ़ने में...वो क्या मेहनत करके कम्पीटीशन नहीं कम्पीट कर सकती थी.   
पर बात को दूसरी तरह से कहा...
" आपने जिस तरह से अपनी हर सांस नौकरी को दी है...हर तरफ की चिंता छोड़ चौबीस घंटे सिर्फ नौकरी पर ही ध्यान दिया  हैं...इसी तरह अगर मैं भी अपना तन-मन लगाकर सिर्फ अचार भी बनाती ना तो वो अचार आज देश के हर दुकान पर सबसे ज्यादा कीमत पर बिक रहा होता. और क़ानून भी ये बात समझता है कि  एक औरत आपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय घर संभालने में लगा देती है....इसीलिए अदालत उसके भरण-पोषण का खर्च पति को देने पर मजबूर करती है......आप  बच्चों की तरफ से एकदम निश्चिन्त होकर जो नौकरी कर पाते हैं....जब मन हुआ घर में आए जब मन हुआ चले गए..गए...केवल टेबल पर खाना और अलमारी में धुले कपड़े चाहिए थे आपको...बच्चा बीमार पड़ा...उसका इम्तिहान है..किसी बात की कोई फ़िक्र रही कभी??...चौबीसों घंटे सिर्फ अपनी नौकरी का ध्यान...और आज मुझे आप पैसा कमाने का ताना दे रहे हैं...नहीं करते शादी...नहीं लाते बच्चों को दुनिया में..आपके पैसों पर थूकने भी नहीं जाती मैं..." कह उसने फोन काट दिया. अब तक का  ये सबसे लंबा और सबसे तल्ख़ वार्तालाप था राजीव से. खुद पर ही विश्वास नहीं हो पा रहा था...ये सब कैसे कह  गयी वो...कहाँ से आ गया इतना आत्मविश्वास पर जमाने के तौर -तरीकों ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया था. 

***
पर लोगों को पता नहीं होता था  किन   किन उपायों से ये दो पैसे उसके हाथ आते हैं. उसका यूँ सम्मान से तीन बच्चों के साथ सर उठा कर जीना समाज को नहीं भाता. उसने तो लोगों से मिलना जुलना बंद ही कर दिया था पर  कभी कभार लोकाचार निभाने को आस-पास  किसी की शादी या किसी समारोह में जाना ही पड़ता. और तब देखती कई बार महिलाएं उसे सुना कर पीठ पीछे और कभी तो  सामने से ही कह देतीं.." "मौज तो तुम्हारी है..पति पैसे भी देता है...पर साथ नहीं रहता..और उसकी कोई चाकरी भी नहीं करनी पड़ती ..आराम से बच्चों के साथ अलग रहती हो...ना कोई रोक-टोक...ना कोई कहा-सुनी...अपनी मर्जी की मालिक....कुछ भी  कहो..बड़े आराम की जिंदगी है तुम्हारी.."

मन में बड़ी तीखी बात आती कि कह कर देखे.."मेरी जिंदगी एक्सचेंज करना चाहेंगी?? जितने जुल्म सहकर अलग हुई हूँ ..उसका शतांश भी सह  पाएंगी? '" पर खून का घूँट पीकर रह जाती. यूँ ही वह सबके बीच गॉसिप का एक अच्छा ख़ासा विषय थी...अब अपनी तरफ से उसमें समिधा डालकर गॉसिप की अग्नि को और प्रज्वलित नहीं करना चाहती थी. अगले महीने भर यही चर्चा होती.."अरे मैने तो जरा सा ये कहा ...सुना..उसने कैसे पलट कर जबाब दिया."..और हर दिन उसके कहे वाक्य का विन्यास बदल जाता और कुछ और शब्द जुड़ जाते उसमें . यूँ भी सुनने में आता रहता...सब दूसरे का नाम रखकर कहते.."फलां कह रही थी..अब क्या पता ...कुछ तो बात होगा...आखिर बात यहाँ तक कैसे पहुँच जाती थी " .

उसे समझ नहीं आता...वे लोग उसपर व्यंग्य कर रही हैं या...फिर अंतर्मन से उसकी इस जिंदगी से कुढ़ रही हैं. ..क्यूंकि भले ही...उसकी तरह बदहाल जिंदगी ना हो उनकी. पर पति का रौब तो मानना ही पड़ता है,उन्हें. उसकी तरह अपने फैसले लेने के लिए आज़ाद नहीं थीं  वे...अपनी आर्थिक सुरक्षा की बड़ी कीमत अदा कर रही थीं . और इसीलिए उसकी आज़ादी उनके आँखों की किरकिरी बन गयी थी. 

ससुराल..मायके के कुछ शुभचिंतक अब भी उन दोनों के बीच समझौते की कोशिश करते रहते. उस से कहते...'बहुत हालत खराब है ,राजीव की ..शराब पीना शुरू कर दिया है...कुछ गलत आदतें भी 
अपनाता जा रहा है...जहाँ पोस्टिंग होती है..वहीँ कोई ना कोई औरत का लफड़ा  सुनने में आता है..अच्छे घर का लड़का है...ये सब सुन कर बहुत अफ़सोस होता है...उसकी जिंदगी बर्बाद हो रही है..."
वे लोग सोचते ये सब सुनकर शायद वो पिघल जायेगी. पर राजीव की हरकतों से उसका दिल इस कदर छलनी हो चुका था कि ये बातें उसके दिल में ठहर ही नहीं पातीं कि कोई असर कर सकें. वे लोग उसे ये सब सुनाते रहते और समानांतर में उसके मन में अपने ऊपर किए गए जुल्म एक रील की  तरह आँखों के सामने चलती  रहती. राजीव उस से पांच साल बड़े होकर भी आज 'लड़के' थे क्यूंकि पुरुष थे...अपना ध्यान नहीं रख सकते थे और उस से अपेक्षा की जा रही थी कि वो जाकर उन्हें संभाले...उनका ख्याल रखे. 

किसी तरह गुस्सा दबाते हुए इतना ही पूछा.."आप गारंटी लेंगे..उनके अच्छे व्यवहार की.."
"अब गारंटी तो आदमी अपने बच्चे का भी नहीं ले सकता..." उन्होंने मजबूरी जताई.
"तो फिर मैं उनपर कैसे भरोसा करूँ...आज भी जिस तरह से फोन पर गालियाँ देते हैं..रेकॉर्ड  करके सुना दूँ तो आप हैरान रह जायेंगे.."
"अब देखो...औरत तो बनी ही होती है त्याग के लिए ..बहुत बड़ा दिल होता है,औरत का...माफ़ करके उसे एक और मौका और दो.."
"आपके लिए चाय बनाती हूँ...."कहती वो उठ कर चली गयी. कोई फायदा नहीं इनलोगों से बहस करके. और मन ही मन एक प्रतिज्ञा की. वो काव्या और सौम्या को ये औरत की सहनशीलता और उसके त्याग का एक भी किस्सा नहीं सुनाएगी. अगर  उनके पाठ्य पुस्तक में कोई ऐसी कहानी  होगी  तो कहेगी वो पाठ मत पढो..कम नंबर लाओ..फेल हो जाओ मंजूर है पर ये सब सीखकर तुम  जिंदगी का इम्तहान नहीं जीत सकती. लड़कियों को बचपन से ही  घुट्टी में पिला दी जाती है...'औरत त्याग..विनम्रता...सहनशीलता की मूर्ति होती है ' और औरत भी अपनी इस छवि को बरक़रार रखने की पुरजोर कोशिश करती है. अन्याय के विरोध के लिए एक कदम नहीं उठता  उनका. क्यूंकि शिक्षा ही उलटी दी जाती है...सहती रहो..बर्दाश्त करती रहो..'उसके साथ भी तो यही हुआ...सर के ऊपर पानी चला गया...डूब जाने की पूरी आशंका थी तब जाकर उसने हाथ-पैर मारे. पिंडली तक पानी आने पर ही उसकी बेटियाँ क्यूँ ना वो पानी उलीचने की कोशिश करें. वो उन्हें बस एक अच्छा सहृदय संवेदनशील  इंसान बनाने की शिक्षा देगी....कोई देवी नहीं. 

राजीव का ये लाइफस्टाइल देख...उनके परिजन भी चिंतित हो गए. उनके एक परिचित बता रहे थे कि राजीव के परिवार  ने सलाह दी कि डिवोर्स ले लो..और अपनी जिंदगी नए ढंग से शुरू करो...पर राजीव ने बड़ी अकड़ से कहा.."डिवोर्स तो मैं  बिलकुल नहीं दूंगा ..मैं उसे उसे आज़ाद नहीं कर सकता...वो सारी जिंदगी मेरी बीवी ही कहलाएगी  और किस चीज़ की कमी है,मुझे ...नौकर है..खाना बनाते हैं.. घर संभालते हैं....और शादी का सुख क्या केवल शादी करके ही मिलता है...मुझे किसी सुख की कोई कमी नहीं है..रॉयल जिंदगी  जीता हूँ,मैं ...लोग तरसते हैं..ऐसी जिंदगी के लिए..ना बीवी कि किचकिच  ना बच्चों की चख चख "

***
वो सब तरफ से ध्यान हटा कर अपने बच्चों और किताबों में डूब जाना चाहती थी. जितना भी खाली वक़्त मिलता...किताबों-पत्रिकाओं में सर गड़ाए बैठी रहती. कहीं और ध्यान ना भटके  इसकी पूरी कोशिश करती. एक बार एक पत्रिका में नवोदित कवियों की एक प्रतियोगिता के लिए रचनाएं आमंत्रित की गयी थीं. उसका मन मचल गया...'अपनी रचना भेज कर देखे क्या?..' कई बार पत्रिकओं में दूसरों की कविताएँ पढ़ते-पढ़ते अपनी पुरानी डायरी निकाल ,कविताएँ पढ़ने लगती .और उसे लगता उसकी कविताएँ कहीं से भी कमजोर नहीं हैं..उसे भेजनी  चाहिए ..फिर डर जाती ना...वहाँ तो नामचीन कवियों की कविताएँ छपती हैं...जो पता नहीं कब से लिख रहे हैं..वो तो कई सालों तक  लिखना-पढना सब भूल ही गयी थी. उसे क्या कविता का शउर . पर इस पत्रिका में जिनकी रचनाएं अब तक कहीं नहीं छपी हैं...उनसे अपनी रचनाएं भेजने का अनुरोध था. उसने एक कविता चुन कर भेज दी. पता लिखा लिफाफा भी नहीं भेजा. वापस आ गयी तो बच्चे-माँ सबको पता चल जाएगा...क्या सोचेंगे सब? और उसे क्या...उन्हें पसंद नहीं आई तो फेंक दें वो रद्दी के टोकरे में..उसकी बला से...उसने कौन सा कवियत्री बनने का सपना देखा है. . 

हर नया अंक धड़कते दिल से खोलती...'प्रतियोगिता के परिणाम आ गए क्या? '
उस दिन भी नया अंक लिए घर के बरामदे में ही बैग एक तरफ फेंका और कुर्सी पर बैठ, कांपते हाथों से पत्रिका खोली. पत्रिका के बीच वाले पन्नों पर....एक टहनी पर लगे पलाश के फूलों की पृष्ठभूमि में उसने बड़े कलात्मक अक्षरों में अपनी कविता छपी देखी..और उसके नीचे उसका नाम लिखा था .                   
वो जड़वत रह गयी. सांस भी रुक गयी थी...एक टक अपने नाम को घूरे जा रही थी...ये भी देखने का होश नहीं था कि कौन सा पुरस्कार मिला है,उसकी कविता को. थोड़ी देर बाद पृष्ठ के उपरी हिस्से पर नज़र दौडाई तो पाया उसे द्वितीय पुरस्कार मिला है. 

वैसे ही जाने कब तक बैठी रही..थोड़ी देर बाद माँ बाहर आयीं और उसे देख चौंक गयी ."अरे ,तुम आ गयी हो..और मैं देखने निकली कि अब तक आई क्यूँ नहीं..देर क्यूँ हो रही है..ऐसे यहाँ क्यूँ बैठी हो...??"
उसने माँ के सामने वो पत्रिका बढ़ा दी..माँ घबरा गयीं..."क्या हुआ..क्या छपा है...अरे मेरा चश्मा लाओ जरा...क्या पढ़ लिया जो ऐसे जड़ बनी बैठी हो?
"कुछ नहीं हुआ,माँ..मेरी कविता छपी है.." जाने क्यूँ गला रुंध गया उसका...आँखें छलक आयीं. ये मन भी अजीब है..इस समय इसे ख़ुशी से लहालोट होना चाहिए तो आँसू ला दिए आँखों में." मैं तुम्हारा चश्मा लेकर आती हूँ'..कहती अंदर चली गयी. दो मिनट ठहर कर चित्त स्थिर किया.बार-बार आँखें भर आतीं. उसकी कविता छपी ही नहीं उसे पुरस्कार भी मिला है.सम्पादक ने पढ़ी..पसंद की..और अब जाने कितने लोग पढेंगे...कुछ साल पहले क्या थी जिंदगी उसकी..और अब क्या हो गया. आँसू अंदर घोंट बाहर आई तो माँ हैरान थीं.."अरे तुम कविता कब से लिखने लगी..."फिर पढ़ कर ख़ुशी से चीखते हुए बोलीं...तुम्हे तो पुरस्कार भी मिला है.."
'हाँ माँ...और कविता तो मैं कॉलेज के दिनों से ही  लिखती थी..."भावातिरके में उसने माँ के पैर छू लिए.
माँ भी आह्लादित हो गयीं...ढेर सारा आशीर्वाद दिया .."खूब नाम कमाओ  बेटा ..बहुत आगे बढ़ो..पिछली जिनगानी की छाया भी ना रहे तुम्हारे जीवन पर"...फिर बच्चों को आवाज़ लगाई.."रूद्र..काव्या..सौम्या...यहाँ आओ...देखो मैगजीन में तुम्हारी  माँ की  कविता छपी है..."
बच्चे भागते हुए आये.."मुझे देखनी है..पहले मुझे दिखाओ..तीनो टूट पड़े पत्रिका पर.." 
रूद्र ने उसका नाम पढ़ा..और नज़र उठा कर इतने गर्व भरी नज़रों से उसे देखा कि वो निहाल हो गयी. बोला.."माँ तुम पोएम लिखती हो..मुझे तो मालूम ही नहीं था..."
"मुझे मालूम है..मैने मम्मी की वो डायरी पढ़ी है..वो जो पीछे वाले कमरे में तुम दराज में रखती हो...." काव्या इठला कर बोली..पर फिर रुआंसे  स्वर में आगे जोड़ा.."पर मुझे कुछ समझ नहीं आई..हमारी हिंदी टेक्स्ट बुक में तो ऐसी पोएम नहीं होतीं ."
"सौम्या इन सबके बीच उपेक्षित सी महसूस कर रही थी.....उसकी साड़ी खींचते हुए बोली.."मुझे भी दिखाओ..पोएम....हम भी  पढेंगे.."
"हा हा तू अपनी किताब तो अटक अटक  कर पढ़ती है....मैगजीन की पोएम पढ़ेंगी..." काव्या ने सौम्या को चिढाया.
" तुमने पढ़ा..तो कुछ समझ में आया क्या??...क्या फायदा ऐसे पढ़ने का?...रूद्र सौम्या की साइड  लेते हुए बोला. वो देखती रूद्र सौम्या को बहुत प्रोटेक्ट करता था .
"तुम्हे तो पता  भी नहीं  था...मम्मी पोएम  लिखती है...मुझे तो पता था...पता था..." काव्या उछलती हुई बोली और  जीभ निकाल कर रूद्र को चिढाया 
रूद्र उसके पीछे भागा..."मुहँ  चिढाएगी  मुझे..अभी बताता हूँ.."
सौम्या भी उसे भूल...अपने भाई-बहन के पीछे भागी.
माँ बोलीं..."सुबह प्रसाद चढ़ाया था....इलायची दाना लेकर आती हूँ ..मुहँ मीठा करो.."
सबके जाने के बाद उसने गहरी सांस ली और फिर से अपने नाम को घूरना  शुरू कर दिया....
(क्रमशः )

Friday, June 1, 2012

बदलता मौसम....छंटते बादल..(कहानी -- 15 )



कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा . जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.बेटे के जन्म के बाद बेटे को उस से छीन लिया गया.  उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. .उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर  गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि  उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया   है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया पहले एक स्कूल में फिर बैंक  में नौकरी कर ली...पर राजीव बैंक में उसे बहाने से तंग करते रहे ..वाहन के अधिकारियों ने भी उसका शोषण करना चाहा...उसके शिकायत करने पर उसे नौकरी से अलग कर दिया.) 

गतांक से आगे 

राजीव ने डिवोर्स फ़ाइल कर दिया था ....पर साल गुजर गया और सुनवाई नहीं हुई...फैसले के तो कोई आसार ही नहीं. पर दहशत बनी रहती. पता नहीं बच्चों की कस्टडी उसे मिले या नहीं.
एक बार बच्चों को लेकर कोर्ट गयी थी. फिर खुद अकेले वकील के साथ ही जाती रही ...पर अक्सर राजीव ही उपस्थित नहीं होते और डेट आगे बढ़ जाती. 
एक दिन महिला सेल की डी.एस.पी. मिलने आयीं. पहले भी महिला सेल के अधिकारी उसका हाल-चाल लेने आते रहते थे...और वो उन्हें झूठी तसल्ली देती रहती थी कि 'सब ठीक है'....उन्होंने प्रस्ताव रखा कि एक बार उनके ऑफिस में आकर मिल ले..'राजीव बात करना चाहते हैं...'  
पहले तो उसने मना कर दिया लेकिन फिर सोचा..'चलो अच्छा है ..डी.एस.पी. की उपस्थिति में ही पूछ लेगी कि जब उन्होंने डिवोर्स फ़ाइल  कर  दिया है...उस से अलग होना  चाहते हैं...फिर उसे अपनी शर्तों पर जीने क्यूँ नहीं दे रहे?....क्यूँ उसकी नौकरी ट्यूशन छुडवाने की कोशिश क्यूँ करते रहते हैं...? "

पर ये सब पूछने का मौका ही नहीं आया. घर पर तो वे डी.एस.पी बड़ी मृदुता से बात कर रही थीं. पर वहाँ उनके तेवर ही बदले हुए थे. राजीव पहले से ही उनके ऑफिस में बैठे हुए थे और वे उस से ही उल्टा सवाल कर रही थीं कि "वे बच्चों  को लेकर क्यूँ चली आई हैं...ये बच्चे से मिलने को तरस रहे हैं....मिलने क्यूँ नहीं देतीं.?? " 

वो तो जैसे आसमान से गिरी....कोर्ट में दो घंटे बच्चे, राजीव की नज़रों के सामने थे और राजीव ने एक बार उनके सर पर हाथ  नहीं फेरा...उनसे एक बात नहीं की और अब उसपर उल्टा आरोप लगा रहे हैं कि "वो मिलने नहीं देती"
"बच्चे इनके भी हैं...ये जब चाहें मिल सकते हैं...मैं कैसे मना कर सकती हूँ.."..उसने अपनी बात कही.
"अरे ई इतना जहर भर दी हैं, बच्चा सब के मन में कि मिलना ही नहीं चाहता है,ऊ लोग .....हमसे दूर कर दी हैं..ऊ सबको." राजीव गरजे.
"बच्चों ने आपके जुल्म सब अपनी आँखों से देखे हैं...इसीलिए दूर हो गए हैं....मैने कुछ उन्हें नहीं सिखाया-पढाया  " उसकी आवाज़ भी तेज हो गयी.
"अब वो सब तो पति-पत्नी के बीच ...थोड़ा-बहुत चलता ही रहता है...इसका मतलब ये तो नहीं कि बाप को बच्चों से अलग कर दिया जाए.." डी.एस.पी. पता नहीं कौन सी बोली बोल रही थीं.
"लगता है..आपको हमारे केस के बारे में कुछ मालूम नहीं..प्लीज़ आप पहले सारी फ़ाइल पढ़िए और जानने की कोशिश कीजिए...कि क्या कुछ हो चुका है.."
"हम एक नज़र में ही सब जान लेते हैं...पुलिस वाले की नज़र है...आप सताई हुईं तो बिलकुल नहीं लगतीं..." 

राजीव ने भी एक भरपूर नज़र डाली उस पर और वो थोड़ी सी असहज हो गयी. ये तो सच था....एक साल में उसकी काया पलट हो गयी थी. अब घर से बाहर निकलना पड़ता...खुद को प्रेजेंटेबल रखती. अपने रखरखाव...अपने कपड़े का ख्याल रखती. कॉटन की तीन-चार साड़ियाँ ही थीं उसके पास. पर स्टार्च लगी हुई...मैचिंग ब्लाउज के साथ ही पहनती वह.
एक हाथ में कड़ा.. ...और दूसरे में घड़ी. माथे पर छोटी सी काली बिंदी और ढीली सी एक  चोटी. बस इतना सा श्रृंगार था उसका. पर उसका यह सादा रूप भी लोगों की आँखों में चुभता. शायद उसकी वजह थी उसकी चपलता और होठों पर सजी मुस्कराहट. पर अपना दुख छुपाये रखने के लिए इस मुस्कराहट का आवरण भी जरूरी था. 

अब अपने खाने-पीने का भी ख्याल रखने लगी थी. सोचती ,उस पर ही पूरे घर -बच्चों की जिम्मेदारी है, वो बीमार पड़ना अफोर्ड नहीं कर सकती. पहले जहाँ दो दो दिन डिप्रेशन के मारे अन्न का दाना नहीं डालती थी मुहँ में. अपने ऊपर किए गए जुल्मों के विरोध का और कोई तरीका था भी  नहीं, उसके पास ...और वो खाने पर ही अपना सारा क्रोध निकालती. शायद राजीव के घर में दिन के दो बजे के पहले कभी खाना खाया भी नहीं. घर का  सारा सारे काम निबटाते इतना वक़्त हो ही जाता . उनके यहाँ ,नाश्ता तो शायद कभी किया ही नहीं.
पर अब सुबह चाय भी दो बिस्किट के साथ लेती कि कहीं एसिडिटी ना हो जाए..समय पर नाश्ता-खाना. रात में भी नौ बजे के पहले खाना निबटा देती. अब घर में पहले किसी पुरुष को  खाना खिलाने का इंतज़ार नहीं करना था. इस अनुशासित दिनचर्या का असर उसके शरीर पर भी पड़ा था. मुरझाया चेहरा खिल आया था. दबा हुआ रंग निखर गया था. उभरी हड्डियां अब छुप गयी थीं. 
और खुद में आए ये सारे परिवर्तन उसने राजीव की नज़रों के प्रतिबिम्ब में भी देखे. 

पर उसने सीधी बात करने की सोची.." ठीक  है....कोर्ट में केस चल ही रहा है...यहाँ बहस से क्या फायदा...आप कह रही थीं..बात करनी है...बताइए क्या बात करनी है?.."
"ई चाहते हैं..आप वापस लौट आइये...इनकी बहुत बदनामी हो रही है.." डी.एस.पी बोलीं.
"ये अब संभव नहीं...आगे बोलिए " उसने दो टूक बात की.
"क्यूँ संभव नहीं....इनको आपसे शिकायत है...आपको इनसे...बैठ कर सुलह कर लीजिये..और अपना घर दुआर संभालिये अब  "
"मुझे कुछ काम है...अब जाना होगा..." कहती वो उठ गयी.
"अरे रुकिए तो...बात  तो कीजिए..." डी.एस.पी. कहती रह गयीं...वो उठ कर चली आई. 
थोड़ी दूर आने के बाद पाया....वो अपने साथ लाया थैला तो वहीँ बगल की कुर्सी पर छोड़ आई  है.
मुड कर वापस लौटी ..ऑफिस के दरवाजे पर ही थी कि सुना, डी .एस.पी. साहिबा कह रही थीं.." अब हम तो अपनी तरफ से कोशिश किए पर वो बड़ी जिद्दी हैं.."
जैसे ही अंदर कदम रखे, देखा ...राजीव एक नोटों का बंडल..डी.एस.पी. को पकड़ा रहे थे.
उसे देखते ही जल्दी से हाथ नीचे कर लिए पर वो देख चुकी थी और समझ चुकी थी कि इसीलिए डी.एस.पी. इन पैसों की भाषा बोल रही थीं. 

***
नियमित धनोपार्जन कुछ था नहीं...नौकरी मिलती और छूटती रही...पर अच्छी बात ये रही कि  छूटने के बाद भी नए अवसर मिलते रहे. नए ट्यूशन ले लिए....सुबह सुबह अखबारों में नौकरी के विज्ञापन वाले कॉलम देख कर पेन से गोल घेरा बना देती और फिर शुरू होता सिलसिला फोन करने का.

अब घर में फोन लग गया था...ये सुविधा तो हो गयी थी पर उसके जीवन में एक अच्छी बात भी अपने साथ ढेरों तकलीफें लेकर आती . राजीव ने भी कहीं से घर के नंबर हासिल कर लिए और फोन पर गालियों का सिलसिला शुरू कर दिया. बच्चों को भी नहीं बख्शते . उन्हें धमकाते..'तुमलोगों को तो मेरे पास ही रहना होगा..." ..देखना कोर्ट तुम्हारी कस्टडी  मुझे ही देगा..तुम्हारी माँ  कमाती है, क्या ?.कहाँ से खिलाएगी??..कहाँ से पढ़ायेगी ?."
बच्चे  बुरी तरह से डर जाते. अक्सर उन्हें तेज बुखार आ जाता. रात को  नींद से हडबडा कर उठ जाते. कोई बुरा सपना देखा होता उन्होंने. वो बहला देती...'ऐसा कुछ हुआ तो हम सबलोग  दूर किसी शहर में  भाग  जायेंगे...किसी को  पता नहीं लगने देंगे कहा जा रहे हैं.." वे छोटे थे..उसकी बातों पर विश्वास कर के आश्वस्त हो जाते. पर वो चिंता में पड़ जाती कहीं सच में कोर्ट ने कस्टडी उन्हें सौंप दी तो क्या करेगी वो??

फोन की घंटी बजती तो उसका दिल धड़क जता..'कहीं राजीव ना हों' कभी कभी देर रात घंटी घनघनाती...वो चौंक कर फोन उठाती, शायद भैया -दीदी लोगो का हो..कोई जरूरी बात हो...पर उधर से आतीं राजीव की नशे में डूबी आवाज़ में धमकियां...'तुम्हे देख लूँगा' के साथ गालियों की जो बौछार शुरू होती कि उसे फोन रिसीवर पर से हटा कर रखना  पड़ता .कई बार सुबह फोन वापस क्रेडल पर रखती और फोन घनघना  उठता ...यानि कि नशे में धुत्त राजीव पूरी रात ट्राई करते रहते.

एक दिन एक फोन आया, कि "मैडम जी, मुझे ईश्वर का संदेश मिला है कि आप बहुत परेशानी में हैं ...अगर शनिवार को आप हमारे पास अकेले आएँ तो आपके सारे कष्ट दूर कर सकता हूँ "
वो समझ गयी ये भी राजीव की एक चाल है...टालने के लिए बोली, "ठीक है...आ जाउंगी.."
"बहुत बढ़िया ..अभी आपको पता बता देते हैं और जरा अपना 'डेट ऑफ बर्थ' बता दीजिये तो..."
"जो बगल में खड़ा होकर फोन करवा रहा है,ना...उसी से मांग लीजिये .." कहकर उसने फोन रख दिया.
पर राजीव हार मनाने वाले नहीं थे...एक दिन माँ ने बताया कि उन्होंने फोन उठाया था और राजीव ने कहा कि वे बच्चों से मिलना चाहते हैं...इतवार को उनसे मिलने आ रहे हैं.."
वो मना तो कर नहीं सकती थी,चुप रही. 
इतवार को राजीव तीन-चार अजीब से लोगों के साथ आए. आते ही कहने लगे ," इनलोगों का कहना है कि हमारी जिंदगी पर बुरा साया है...आप पर किसी ने जादू-टोना कर दिया है...ये लोग सब ठीक कर देंगे " 
"पर आपने तो कहा था...आपको बच्चों से मिलना है.."
"हाँ उनसे भी मिल लेंगे...पहिले  ई लोग का ज़रा बात सुन लिया जाए..का हर्जा है...हमको भी बुझा रहा है....कोई कुछ टोना कर दिया है...एकदम से आप कईसे बदल गयीं...आप तो केतना सीधी-सादी  थीं..तनका इलोग का बात सुन लीजिये.."

राजीव के लगातार अत्याचार ने उसके अंदर की शक्ति को ललकार कर जगा दिया है...ये बात वे समझ  नहीं पा रहे थे या शायद उनका अहम् स्वीकार नहीं कर पा रहा  था. इसलिए नित नई चाल चल कर उसे तोड़ने की कोशिश में संलग्न थे.

उसने बच्चों को अंदर भेज दिया और दरवाजे के पास खड़ी हो गयी. समझ नहीं पा रही थी..इन्हें कैसे घर से निकाले...राजीव कुछ तमाशा ना कर दें...बेकार महल्ले में बात फैलेगी.
एक लाल आँखों वाला आदमी  सीधा उसकी तरफ देखते हुए बोला.."इसके सर पर एक साया मंडरा रहा है...मुझे यहीं से दिख रहा है... तनी इधर आओ..."
वो अपनी जगह से हिली नहीं...तो वो राजीव से बोला..." ई साया इनको बस में कर लिया है...वही ई सब करवा रहा है.,..इनका कौनो दोस नहीं है..."
"आइये आइये इधर आइये तनिका.....ई सब ठीक कर  देंगे .." राजीव ने कहा.
उसका दिमाग तेजी से दौड़ रहा था...कैसे निबटे इन सबसे. तब तक उस आदमी ने खुद ही उपाय थमा दिया .बोला, "ठीक है...वहीँ खड़े रहिए...ई बताइए आपको मन में कैसा बुझाता है...कैसा फील होता है.."
उसने भी अपनी आँखें चौड़ी कर लीं...और थोड़े भारी स्वर में बोली.." हाँ कुछ अजीब अजीब सा लगता है...सामने वाले को देख के हमको पता चल जाता है...कि वो मेरे बारे में क्या सोच रहा है...और कुछ भी गलत-सलत लगता है...तो मन करता है...उसको खूब मारें....कभी कभी तो जो भी हाथ में आता है...वही चला देते हैं.."

वो आदमी राजीव से बोला.."देखिए हम कह रहे थे ना...इनके ऊपर साया  है..बड़ा पूजा करवाना होगा...मुर्गा कटवाना होगा...चलिए हम लड़की को देख लिए...सब समझ गए...अब हम तंत्र मन्त्र से सब ठीक कर देंगे...अब चलिए इहाँ से ई साया इस से कुछ भी करवा लेगा.."
वो मन ही मन हंस पड़ी..'डर गया है...वो तांत्रिक..'
"अरे रुकिए..."..राजीव कहते रह गए पर वो आदमी अपने चेलों के साथ उठ  गया. राजीव को भी जाना पड़ा...बच्चों से मिलने का तो बहाना था..पर इसे भी अच्छा हथियार बनाया राजीव ने..अक्सर उनसे मिलने के बहाने , किसी ना किसी ओझा-गुणी को लेकर आते और हर बार उसे नए पैंतरे अपना कर उन्हें भगाना पड़ता. 

ये उपाय कारगर ना होता देख,उन्होंने एक नया तरीका अपनाया. एक रात जीप उसके दरवाजे पर रुकी. राजीव ने दरवाज़ा खटखटाया. वो खिड़की से राजीव की जीप देख चुकी थी. असमंजस में पड़ गयी अगर दरवाज़ा नहीं खोलती है तो पता नहीं क्या हंगामा करें. महल्ले वाले भी डिस्टर्ब होंगे. माँ भी जाग रही थीं...उनसे ही दरवाज़ा खोलने को कहा. और  बोली ..".. बाहर बरामदे पर ही रोक देना और कह देना..बच्चे सो गए हैं..."
पर खिड़की से उसने देखा..उनका चपरासी दो सूटकेस उठाये राजीव के पीछे -पीछे आया और बाहर बरामदे में सूटकेस रख दिया. ये माजरा कुछ समझ नहीं आया और वो बाहर निकल आई . राजीव अपने चपरासी से कह रहे थे, "अरे, ये यहाँ क्यूँ ले आए...??"
मुहँलगा चपरासी बोला.."सर आपका घर है ये.....आपके बीवी बाल-बच्चे यहाँ हैं तो आप कहाँ जायेंगे?...आप क्यूँ गेस्ट हाउस में ठहरियेगा.?..यहाँ अपने बच्चों के साथ रहिए " 
"ठीssक   है..अब तुम ऐसा कहते हो तो यही सही..रख दो अंदर सूटकेस..." सारे जाल राजीव के रचे हुए थे..पर वे अनभिज्ञता दर्शा रहे थे. 
वो गुस्से से भर उठी..एकदम सख्त आवाज़ में बोली.."खबरदार जो अंदर कदम रखा  है...ले जाओ सूटकेस..और अब आप भी मेरे घर में नहीं आ सकते...कोर्ट में फैसला होने दीजिये...जब तक कोर्ट से निर्देश नहीं मिलते...अब आप बच्चों से भी नहीं मिल सकते...बच्चों से तो आपको कभी मिलना ही नहीं था...हर बार  उनका बहाना बना कर नई चाल, चलते रहे.....अब आप इस घर में कदम नहीं रखेंगे.." अंदर से डर भी रही थी...कहीं राजीव भी चिल्लाने ना लगें...पर ड्राइवर और चपरासी की उपस्थिति में वे अपनी फजीहत नहीं करवाना चाहते थे. उसका रौद्र रूप देख वो भी समझ गए थे..'वो चुप नहीं रहेगी'
"हाँ ठीक है...अब कोर्ट में ही फैसला  होगा..एक पैसा नहीं देंगे...रोड पर भीख ना मंगवाए तब कहियेगा.." फुफकारते हुए  वे वापस चले गए. 

बाद में एक रात चपरासी ने उसे फोन करके  कहा.." आप मेरे साहब के साथ जो कर रही हैं...ये अच्छा नहीं कर रहीं...भगवान इसका फल जरूर देगा आपको.."
उसकी सहनशक्ति जबाब देने लगी थी. उसने राजीव की पोस्टिंग वाले  शहर के डी.एम. को एक पत्र लिखा...और उसमें राजीव और उनके चपरासी की सारी करतूत बयाँ कर दी कि 'वे लोग अक्सर फोन करके उसे धमकाते हैं...उसका जीना मुश्किल कर दिया है."
राजीव को बुला कर पूछताछ की गयी , राजीव ने एक बार तो फोन करके अपनी सारी भड़ास निकाली पर उसके बाद उनके फोन आने बंद हो गए.

***

उसे एक बड़ी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का काम मिल गया था. माँ ने थोड़ी आपत्ति जताई पर उसने कहा...'एक तो उसके पास क्वालिफिकेशन नहीं है..अनुभव नहीं है...और पैसों की भी जरूरत है..वो ज्यादा चूजी  नहीं हो सकती.
जिंदगी फिर से ढर्रे  पर आने लगी थी...इसी दौरान कोर्ट से बुलावा आया.बच्चों को भी लेकर जाना था.

लेडी जज थीं...उन्होंने रूद्र और काव्या से अलग कमरे में काफी देर तक बात की. उसका मन काँप रहा  था..ऐसा ना हो वे बच्चों की कस्टडी राजीव को दे दें. (पर जज ने बच्चों से तरह तरह के सवाल कर के उनके प्रति राजीव के व्यवहार का पता कर लिया और फैसला  उसके हक़ में सुनाया. राजीव से ये भी कहा कि अगर बच्चों का सम्मान पाना है तो उनका मन जीतना होगा, उन्हें प्यार देना होगा...तलाक की सुनवाई अभी चलती रहेगी..फैसले पर इतनी जल्दी नहीं पहुंचा जा सकता पर तब तक एक निश्चित रकम बच्चों को और  जया को मिलती रहेगी. इस ऑर्डर को पढ़कर वकील ने कहा.."अब आगे जो भी फैसला हो पर ..राजीव किसी बच्चे को लेने की बात नहीं कर सकते."..एक बड़ा बोझ उसके दिल से उतर गया.

बाद में काव्या  ने बताया कि जज ने पूछा था कि क्या कभी पापा ने प्यार नहीं किया..कभी टॉफी -चॉकलेट नहीं दिया...?" स्पष्टवादी काव्या ने कह दिया कि "कहते थे बोलो मम्मी गन्दी है..तभी चॉकलेट दूंगा  "
जज ने बच्चों की परवरिश के लिए एक हर महीने  एक अच्छी  रकम देने का निर्देश दिया था. उसे शान्ति मिली कि आखिर अब उसका संघर्ष सफल हुआ..वो चिंतामुक्त हो जी  सकेगी. परन्तु  अभी इस व्यवस्था की खामियों से दो चार होना बाकी था. उसके वकील ने निर्देश दिया कि इस रकम में उनलोगों का भी हिस्सा है..कुछ अंश वे ले लेते. कुछ जूनियर  वकील ..को दिलवा देते. सबका हिस्सा देते उसके हाथ में आधी रकम भी नहीं पहुंचती. 

आखिर कुछ महीने बाद खुद उसने राजीव से कहा कि वे सीधा उसके पास  ही  वो  रकम भेज दिया करें. राजीव ने शर्त रखी कि वे महीने में एक बार हेड ऑफिस  में  मीटिंग के लिए आते हैं तो वो बच्चों के साथ आकर पैसे खुद ले लें . राजीव से मुखातिब होने की बात सोच कर ही उसकी रूह काँप जाती. पर बच्चों के लिए ये करना ही था. बच्चे भी सहमे से रहते.

गेस्ट हाउस में राजीव बिस्तर पर मसनद लगाए किसी महंथ की तरह लेटे रहते. वो बच्चों को लेकर सामने कुर्सी पर अपराधी की तरह सर झुकाए बैठी रहती. कचर कचर पान चबाते राजीव का एकालाप चलता रहता. "कुछ नहीं बनोगे तुमलोग..ई तुमलोग की माँ तुमलोग का जिन्नगी खराब कर दी है...बिन बाप के रहने वाले बच्चे का कहीं कोई पूछ है.?..तनिका लोग को पता चलने दो...कोई बात नहीं करेगा तुमलोग से...अकेले पड़ जाओगे एकदम...कुछ नहीं कर पाओगे जिंदगी में..एक चपरासी का नौकरी भी नहीं मिलेगा..."

वो पहले से जानती थी 'राजीव' को हमेशा एकतरफा संवाद ही पसंद है. वे घंटो अकेले बोल सकते हैं. उन्हें किसी से  बातचीत करते कभी नहीं सुना..ऐसा कभी नहीं होता था कि वे 'दो अपनी कहें' और 'दो किसी की सुनें'. पहले भी वे एकतरफा अपनी ढपली बजाते रहते और उनके जूनियर ऑफिसर उसपर 'हाँ.. हाँ' की थाप लगाते रहते. या फिर उनके सीनियर अफसर हों तो बस सुनायी देता..'जी सर..'... 'जी.. जी सर.." हाँ सर'.. "एकदम ठीक सर" 

यहाँ तो उन्हें पूरा मौका मिल रहा  था...ना तो वे लोग उठ कर जा सकते थे ना ही कोई जबाब दे सकते थे. वो कुछ कहती तो फिर झगड़ा बढ़ता और शायद वो पैसे देने से मना कर देते  फिर लगाते रहो कोर्ट के चक्कर. बाद में बच्चों का डरा चेहरा देख कर समझाती  'किसी के कहने से कुछ नहीं होता...बल्कि तुमलोग इसे चैलेंज की तरह लो और भी अच्छे से पढ़ लिख कर बड़े आदमी बन कर दिखाओ " 

राजीव अक्सर रूद्र को नुक्कड़ से पान लाने के लिए कहते. पीछे वो और काव्या रह जाती...राजीव का प्रलाप चलता रहता. एक बार काव्या की तबियत ठीक नहीं थी...वो साथ नहीं गयी. सिर्फ रूद्र साथ था. कुछ ही देर बाद राजीव ने रूद्र से पान लाने के लिए कहा...अब कमरे में सिर्फ वो और राजीव रह गए थे. उसका दिल किसी अनागत की आशंका से धड़क उठा. और आशंका गलत नहीं थी.. रूद्र के जाते ही राजीव उठे और दरवाज़ा बंद करने लगे...'अभी डिवोर्स हुआ नहीं है....अभी भी आप हमारी पत्नी हैं...पत्नी धरम निबाहिए "
किसी तरह वो राजीव  को धक्का देते हुए बाहर भाग आई. बुरी तरह हांफ रही थी. रूद्र को आते देखा तो खुद को व्यवस्थित किया...रूद्र ने पूछा.."यहाँ क्यूँ खड़ी हो माँ.."
"तुम्हारी राह देख रही थी..कि इतना देर क्यूँ लग रही है.."
रूद्र कुछ बोला नहीं...उसने जाकर पान राजीव को दे दिए.

इसके काफी दिनों बाद, एक बार फिर काव्या  नहीं जा सकी और रूद्र के साथ उसे ही  जाना पड़ा. रूद्र ने रास्ते में ही बोला.."माँ दस पान बनवा  कर ले चलते हैं...वरना वे मुझे फिर पान लेने भेज देंगे..."
रूद्र पान बनवाने चला गया और वो अपने बेटे को एकटक देखती रही....इतने कम समय में ही कितना बड़ा हो गया उसका बेटा और कितना कुछ समझने लगा,इस कच्ची  सी उम्र में ही.
(क्रमशः )

Saturday, May 26, 2012

जीवन की ये तल्खियां...ये दुश्वारियां (कहानी --14 )


कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा .जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.  उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. पर ससुर को चिंताग्रस्त देख, उसने केस वापस ले लिया. ससुर के रिटायरमेंट के बाद...सास-ससुर...उसके साथ राजीव के पास ही आकर रहने लगे...राजीव के अत्याचार चलते रहे..उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर  गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि  उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया   है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया .और एक स्कूल में नौकरी कर ली ))

गतांक से आगे 





धीरे धीरे  शहर में बसे रिश्तेदारों को पता चलने लगा था...और वे जैसे उसके मरे हुए रिश्ते की मातमपुर्सी के लिए आने लगे थे...चेहरे पर थोड़ा दुख छिडके...आँखों में चिंता का सुरमा लगाए...आवाज़ में इतनी सहानुभूति  घोल कर बोलते कि उसका मन होता उनके मुहँ पर ही दरवाज़ा बंद कर दे. उसे खुद  की चिंता नहीं थी..वो तो यह सब मान कर चल रही थी...कि इन स्थितियों से दो चार होना ही पड़ेगा पर उसे चिंता  बच्चो की होती...वे लोग बच्चों को ऐसे घूरतीं..और इतनी दया दिखा, उनके सर पर हाथ फेरतीं..जैसे अनाथ हो गए हों वे . अब असलियत सबको पता चल गयी थी...कि कितने जुल्म सहे थे उसने....इन सबका भी खूब बखान करतीं.."ना ना....ई मारपीट सब शरीफ  घर में होता है कहीं..." "कैसा खानदान में जया का बियाह कर दीं...कुछ पता उता  लगाना था,ना " और फिर उसे ऐसी हिकारत भरी नज़रों से देखतीं जैसे अच्छा ससुराल ना मिलने में उसकी ही कोई गलती हो.
बातों बातों में ये भी कह जातीं..'बच्चों के लिए तो सब सहना ही पड़ता है...'..औरत का तो जनम ही त्याग के लिए होता है'...मानो, उसने अपने सुख-चैन के लिए बच्चों से उनके ऐशो-आराम की जिंदगी छीन  ली हो. उसे डर लगता...बच्चों के कच्चे  दिमाग में ये सब बातें जायेंगी..तो सच में कल को वे उसे ही ना दोषी समझने लगें...भावनाओं को भी लोग भौतिकता के तराजू पर ही तौलते हैं. रोज बच्चे हिंसा के  शिकार हों...या फिर अपनी आँखों के सामने हिंसा घटित  होते हुए देखें...समाज को सब मंजूर होता है..दो रोटी, तन ढंकने को कपड़े और सर पर छत की एवज  में.

बहनें भी मिलने आयीं...पर थोथी सहानुभूति के लिए नहीं...उनका मन सचमुच व्यथित था...अपनी सामर्थ्य भर सहायता करने की भी कोशिश की. उसकी सीमा दी के दो बेटे ही थे...उन्होंने कह दिया.."'काव्या' की पूरी जिम्मेवारी मेरी,मेरी कोई बेटी नहीं...अब ये मेरी बेटी है.....उसकी पढ़ाई-लिखाई..कपड़े लत्ते सब मैं खरीदूंगी..." और उसे बुरा ना लगे...इसलिए यह चुहल भी की..'देखना..कन्यादान भी मैं ही करुँगी...फिर तुम अपना हक़ मत जताने लगना '
वो हंस कर रह जाती. 
सीमा दी ने काव्या के लिए नई फ्रॉक..जूते...हेयरबैंड सब ख़रीदे और साथ में रूद्र और सौम्या  के लिए भी...ये तर्क देते हुए कि ये छोटे बच्चे क्या समझेंगे कि मौसी सिर्फ 'काव्या'  को ही प्यार करती है. वो समझ रही थी...सीमा दी उसकी मदद भी करना चाहती हैं...और उनकी ये भी मंशा है कि उसे पता भी ना लगे. 
बहनों को भी इतने दिनों बाद यूँ मायके में आकर रहना अच्छा लग रहा था. उसकी शादी के बाद ही माँ,भैया के पास चली गयी थीं...और बहनों का इकट्ठे यूँ इत्मीनान से कुछ दिन बिताना छूट ही गया था. जब सारी बहनें..शाम को छत पर या देर रात गए आँगन में चारपाई पर लेटे बातें करतीं तो लगता ये बीच के साल छलांग लगा कहीं दूर चले गए हैं...और उनके वही पुराने स्कूल-कॉलेज वाले दिन लौट आए हैं....जब किसी चीज़ की कोई चिंता फिकर नहीं थी...जिंदगी के डरावने अन्धकार से साबका नहीं पडा था...सबकुछ स्वच्छ ,सहज और सुन्दर लगता.....चाँदनी अपनी शीतलता से नहलाती हुई सी और ठंढी हवा सहलाती हुई सी लगती थी.

उसकी बहनें यही थीं तभी..कोर्ट से राजीव द्वारा फ़ाइल किए गए डिवोर्स के कागज़ात मिले. अब उसे भी एक वकील चाहिए था. रीता दी ने अपने जेठ से बात की जो एक क्रिमिनल लायर थे...उन्होंने फैमिली कोर्ट का एक वकील ठीक कर दिया. वकील के पास सारी बातें दुहराते हुए उसे फिर उसी अंगार पर चलने जैसा महसूस हुआ...जो पैर की जगह ह्रदय दग्ध करते जा रहे थे.पर सबकुछ बताना भी जरूरी था.. कोर्ट से तारीख मिलने का इंतज़ार करते दिन बीतने लगे . वकील ने बताया था .बच्चों को भी कोर्ट ले कर जाना पड़ेगा. अपने बच्चों के मासूम चेहरे देखती और एक ठंढी सांस निकल जाती उसकी...इतने छोटे बच्चों को जिंदगी का कितना क्रूर रूप देखना पड़ेगा. इस उम्र तक अब तक उसने कोर्ट का मुहँ नहीं देखा....और उसके ये नन्हे बच्चे...इतनी जल्दी जिंदगी की तल्खियों से दो-चार होने लगे. फिर मन को दिलासा देती...आँख खोलते ही तो इनलोगों ने जिंदगी का विकृत रूप ही देखा है...उसकी कोशिश तो ये है कि दुनिया का एक खुशनुमा रूप भी देखें वे.

दोनों भाइयों की भी चिट्ठी आती. उनलोगों ने फोन लगवाने के लिए कहा था...और उसके पैसे देने की पेशकश की थी. दोनों भाइयों ने इस बात को जोर देकर लिखा था कि...'माँ की उम्र हो गयी है..उन्हें चिंता लगी रहती है...फोन होगा तो उनका हाल-चाल मिलता रहेगा.' उसके मन में एक टीस सी उठी..सिर्फ माँ की चिंता..यहाँ वो तीन बच्चों को लेकर अकेली है...उसकी चिंता की बात नहीं करते?...क्या वे लोग अब भी यही समझते हैं कि उनलोगों ने उसकी शादी कर दी...अब वो राजीव की जिम्मेवारी है?...और अगर वो राजीव को अपनी जिम्मेवारी सौंपने से इनकार कर रही है तो फिर खुद अपना ध्यान रखे..?.' फिर सर झटक देती..'इतनी छोटी-छोटी बातें सोचेगी तो जीना मुश्किल हो जाएगा...आखिर फोन लग जाएगा तो फायदा उसे भी तो होगा. वो बाहर भी रहेगी तो अपने बच्चों का हाल-चाल लेती रहेगी. भाइयों को ये सब कहना नहीं आया होगा..वरना फोन उसके काम ही ज्यादा आएगा. 
और उसने माँ से कहा.."माँ पड़ोस वाले शर्मा जी से या फिर सिन्हा साहब के बेटे से कहती हूँ..सारी बातें पता लगा कर बताएँगे कहाँ क्या एप्लीकेशन देना है.."
माँ ने कुछ सोचते हुए कहा.."ना तू मत जाना..मैं ही कह दूंगी.."
वो गौर कर रही थी...कभी भी पड़ोसियों से कुछ कहना हो तो माँ के पैरों में कितना भी दर्द हो... कितनी भी थकान हो..खुद ही जातीं..उसे नहीं जाने देतीं...और उसे ये रहस्य समझ में आया. अब वो अकेली स्त्री है...पति को छोड़कर आई है. उसका यूँ पर-पुरुषों से बात करना ठीक नहीं...चाहे पुरुष पचास साल का अधेड़ हो या पच्चीस  बरस का जवान...अब उसके आस-पास उनका प्रवेश वर्जित है. माँ ने दुनिया देखी है...ऊँच-नीच समझती हैं...और नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी को लेकर कोई बातें बनाए. इन बातों का ध्यान आते ही..वो भी ज्यादा सजग रहने लगी...पहले रास्ते में आते-जाते जान-पहचान के पुरुषों से रुक कर दो बातें कर लेती थी...पर अब सर हिलाकर  बस नमस्ते कहती और जल्दी से आगे बढ़ जाती. पहले ही क्या कम मुसीबतें हैं कि वो कुछ और को न्योता दे. 

 वो सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम करती...फिर स्कूल जाती...स्कूल से आकर फिर बच्चों को पढ़ाना उनके काम....शाम होते ही बदन, थकान से टूटने लगता..पर नींद आँखों से कोसों दूर रहती. क्या फैसला करेगा कोर्ट? बच्चे कहीं उस से दूर तो नहीं कर  दिए जायेंगे?...रात में कई बार आँख खुल जाती...पसीने से नहा उठती..सपने में देखा होता....'रूद्र और काव्या को राजीव खींच कर ले जा रहे हैं..और वे दोनों बच्चे उसकी तरफ हाथ फैलाए रोये जा रहे हैं.' दोनों बच्चों को कलेजे से लगा लेती पर उसकी बाकी की नींद उड़ जाती. 

उसने निश्चय किया..उसे और पैसे कमाने होंगे...ये बताना होगा कि वो अपने बच्चों की देखभाल करने में सक्षम है. स्कूल में वो किसी से ज्यादा से बातें नहीं करती थी.एक पत्रिका या कोई किताब हमेशा हाथ में लिए होती. क्लासरूम में पढ़ा कर आती और स्टाफरूम में अपनी पत्रिका में सर छुपा बैठ जाती. फिर भी बाकी टीचर्स स्त्री-पुरुष दोनों..बात करने की कोशिश  नहीं छोड़ते..उनके तमाम सवालों के जबाब में उसने यही बताया था कि 'पति का ट्रांसफर एक छोटी जगह पर हो गया है, वहाँ अच्छे स्कूल नहीं हैं... इसलिए वो बच्चों को लेकर यहाँ है...घर में बोर होती है..इसलिए नौकरी कर रही है.' 
पर उन सबको कहीं ना कहीं से उसकी वास्तविक स्थिति की खबर थी...वे लोग बस उसे घूरते रहते....कोई जबाब नहीं देते. वो फिर से पत्रिका में सर गड़ा देती. 

एकाध पुरुष शिक्षक ने किताबों के सहारे ही दोस्ती बढाने की कोशिश की..."आपको किताबों-पत्रिकाओं का शौक है...मेरे पास बहुत सारी किताबें हैं...आपके लिए ला दूंगा"
"थैंक्स...पर मेरे घर में एक लाइब्रेरी सी ही है...पहले तो वो ही सारी पढ़ लूँ..."
"अच्छा...तो आप हमारे लिए ही ला दिया कीजिए..हमें भी पढ़ने का बहुत शौक है.." तू डाल डाल तो मैं पात पात के तर्ज पर वे कहते.
"बाबूजी की जमा हुईं किताबें हैं..माँ उनको लेकर बहुत पजेसिव है...किसी को नहीं देने देती...सो सॉरी "..वो उनकी सारी चालें निरस्त कर देती. पर भीतर से बेतरह डर जाती. अभी तो उसने नौकरी शुरू ही की है...कैसे सामना कर पाएगी राह में निरंतर आने वाले,इन झंझावातों का. 

प्रिंसिपल एक सहृदय महिला थीं. उनसे उसने  असलियत नहीं छुपाई थी. उन्होंने अफ़सोस भी किया था कि वे उसकी ज्यादा मदद नहीं कर पाएंगी,ज्यादा वेतन नहीं दे पाएंगी . क्यूंकि वो बी.एड. भी नहीं है...और उसके पास पढ़ाने का कोई अनुभव भी नहीं है...हाँ, वो चाहे तो उसे  कुछ  ट्यूशन  दिला सकती हैं. उस वक़्त तो उसने ट्यूशन के लिए हाँ नहीं कही थी...उसे लगा था...स्कूल के बाद ट्यूशन भी करने लगी तो अपने बच्चों को कब समय दे पाएगी? पर अब पैसों की वजह से उसने प्रिंसिपल साहिबा से बात करने की सोची. उन्होंने ट्यूशन दिलवाने का आश्वासन दिया और एक सुझाव दिया  कि एक प्रायवेट बैंक खुला है..उसमे वो चाहे तो नौकरी कर सकती है. अच्छे पैसे मिलेंगे "

एक दिन स्कूल के बाद उसे साथ लेकर गयीं और बैंक के चेयरमैन से मिलवा दिया. उसने उनसे साफ़ कह दिया कि उसके पास बैंक  से सम्बंधित कोई क्वालिफिकेशन नहीं है...उसे अकाउंट वगैरह रखने की कोई जानकारी नहीं है.

चेयरमैन  ने बताया कि उनके पास एक पोस्ट 'बिजनेस डील' की है. बैंक वाले पेड़ लगवाते हैं और दस साल का एग्रीमेंट होता है. फिक्स डिपोजिट की तरह. वो बतौर एजेंट काम कर सकती है. वे लोग,एक अपार्टमेन्ट  भी बनवा रहे हैं...जिसमे, उसे  फ़्लैट की डील करनी होगी. जमीन का लोकेशन दिखाने जाना होगा...इन्सटौलमेंट  की जानकारी देनी होगी. बुकिंग करनेवालों की फ़ाइल तैयार करनी होगी. बुकिंग करके रसीद वगैरह काटना..ये सारे काम उसके जिम्मे होंगे.

उसे खुद पर इतना भरोसा  था कि ये सब तो कर ही लेगी. वेतन की बात पर चेयरमैन ने कहा..वे बहुत ज्यादा तो नहीं दे पायेंगे..पर 'पांच  हज़ार' तक देंगे...और फिर उसका काम देखते हुए बढ़ा देंगे. मुस्कुराते हुए उन्होंने ये भी जोड़ा..'बैंक के कई कर्मचारियों की तनख्वाह इतनी भी नहीं है...वे उसे ज्यादा ही  दे रहे हैं.' एक बजे के बाद बैंक का काम संभालने की बात भी आसानी से  मान गए.

एक पल को उसका जी धक् से रह गया कहीं उसकी क्वालिफिकेशन...'उसका अकेले होना...उसकी उम्र और उसका चेहरा तो नहीं'. पर फिर मन को दिलासा दिया...'कोई नहीं..वो अपना काम इतनी मेहनत और ईमानदारी से निभाएगी कि अपने वेतन को सार्थक सिद्ध कर देगी.

दुविधा थी तो घर की. अब स्कूल के बाद उसे बैंक जाना पड़ेगा...बच्चे बिलकुल अकेले रह जायेंगे. पर उसके पास कोई चारा भी नहीं था. बच्चे कुछ जल्दी ही जिम्मेवार बन जायेंगे...पर मन को समझाया...बच्चों को माता-पिता के नाक-नक्श के साथ उनके सुख-दुख भी विरासत में मिलते  हैं. जब  माँ पर इतनी मुसीबतें टूट रही हैं, तो कुछ हिस्से के भागीदार बच्चे भी बनेंगे ही. 

 पर कुछ ही दिनों बाद उसे स्कूल की नौकरी छोडनी पड़ी. बैंक के बाकी कर्मचारी शोर मचाने लगे कि वो तनख्वाह उन जितनी या उनसे ज्यादा ही लेती है...पर काम आधे दिन ही करती है. जबकि सच्चाई ये थी कि उसका काम क्लाइंट के आने पर निर्भर था. किसी किसी दिन तो कोई भी काम नहीं होता. सुबह जाकर भी वो यूँ ही रजिस्टर भरती  रहती या टाइम पास करती. पर उसे उपस्थित रहना पड़ता. उनलोगों का कहना भी जायज था...वो कोई आपत्ति नहीं कर सकती थी. 

पर घर के खर्चे भी पूरे करने थे..उसने प्रिंसिपल साहिबा की सहायता से कुछ जगह ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. बैंक से आकर चाय पीती...बच्चों से दो बातें करती और फिर ट्यूशन के लिए निकल जाती. उम्मीद थी कि मन से पढ़ाएगी..बच्चे अच्छा रिजल्ट लेकर आएँगे तो शायद लोग अपने बच्चों को उसके घर पर ही ट्यूशन के लिए भेजने लगें. पर अभी तो उसे खुद को एक अच्छे टीचर के रूप में स्थापित करना था. माँ पर भी काम का कुछ ज्यादा ही बोझ बढ़ गया था. वो भरसक प्रयत्न करती कि सारा काम करके जाए. पर तीन तीन बच्चों की देखरेख भी अपनेआप में एक काम ही था. जबकि रूद्र और  काव्या इन कुछ महीनो में ही जैसे कई साल बड़े हो गए थे. अपने बस्ते संभालते...घर साफ़ करके रखते...काव्या तो एक नन्ही माँ ही बन गयी थी....सौम्या के कपड़े बदल देती...उसे खाना खिला देती...उसे गोद में उठाये डगमग कर घूमती रहती. पर माँ का बडबडाना भी चालू रहता. वो समझती थी...माँ की ये उम्र अब बस माला फेरने और चारपाई पर आराम करने  की थी..पर वो भी क्या करे....क्या उसकी उम्र यूँ जगह जगह धक्के खाने की है?..तीन छोटे बच्चों की माँ है वो...और उनके बचपन पर निहाल होने की बजाय वो यहाँ -वहाँ भटक रही थी..पर  करे..क्या ...सबको अपने अपने हिस्से के दुख झेलने ही पड़ेंगे.

***
राजीव कुछ दिन तो शांत रहे...उन्हें लगा...पैसे भेजने की मनाही कर...डिवोर्स सरीखा बम उसके ऊपर फेंक दिया है...उसका वजूद चिथड़े चिथड़े हो जाएगा...और वो उलटे पैरों दौड़ती  हुई उनके शरण में पहुँच जायेगी. पर उसे यूँ अपनी जिंदगी की बागडोर अपने हाथों में लेते देख उनका प्लान मटियामेट हो गया. एक दिन कोर्ट से बुलावा भी आया. वो रूद्र और काव्या को लेकर गयी...राजीव पहले से ही अपने कुछ जूनियर्स के साथ मौजूद थे. वो  एक किनारे अपने वकील के साथ खड़ी हो गयी. रूद्र और काव्या उसका हाथ पकडे उस से चिपक कर सहमे से खड़े थे. काले कोट पहने...पान से होंठ रंगे...ब्राउन रंग की फ़ाइल थामे वकील अंदर-बाहर आ जा रहे थे. आते-जाते उसकी तरफ एक नज़र जरूर उछाल  देते सब. वो खुद में थोड़ी और सिमट जाती. उन वकीलों के  आगे-पीछे लोगों का हुजूम चल रहा था. कुछ फटे कपड़े..मैली धोती...टूटे चप्पलों में हाथ जोड़,उनकी गुहार लगा रहे थे..और वकील उन्हें झिडके  जा रहे थे.  वो बच्चों को ऐसे दृश्यों  से दूर रखना चाहती थी..पर विवश थी. 

करीब दो घंटे खड़े रहने के बाद....वकील ने भीतर से आकर बताया कि तारीख बढ़ गयी है. वे लोग चलने को हुए तो राजीव ने अपने पॉकेट से नोटों की एक गड्डी निकाली और बच्चों को दिखाते हुए बोली.."आओ ले लो..इसीके लिए इतना हैरान होके आए हो ना...पईसा चाहिए ना तुमलोगों को ?" इतनी देर से बच्चे खड़े  थे..राजीव ने एक बार हाल तक नहीं पूछा था उनका..और अब उनके सामने गड्डी लहरा रहे थे. बच्चे भी सब समझ रहे थे..उनकी आँखें जमीन  से लग गयीं. वे अपनी जगह से नहीं हिले तो राजीव ने कहा..'जाओ जाओ..माएँ के साथ जाओ...देखते हैं..केतना दिन खिलाती है तुमलोग को..मेरे पास ही आना पड़ेगा दौड़ के.."
वो बच्चों को खींचती हुई...बाहर निकल आई. 

जब भी अपने घर के सामने वाली उस सड़क से गुजरती...सायास अपनी नज़रें नीची रखती कि कहीं राजीव के उस घर पर नज़र ना पड़ जाए...जिसकी छत पर से पहली बार राजीव ने उसे देखा था और उसकी जिंदगी ही ख्वार कर डाली. अब उस घर में किरायेदार रहते थे. जबतक राजीव के साथ थी...कभी किरायेदार से उनकी कोई घनिष्ठता नहीं देखी.पर अब जरूर राजीव ने उनसे नजदीकियां बढ़ाई होंगी क्यूंकि उससे सम्बंधित हर खबर राजीव को पहुँच जाती. 

पहले तो उसकी बहनों के आने की खबर उन्हें मिल गयी और  राजीव उनके घर जाकर उनसे लड़ आए कि 'वे लोग तो सुख से अपने परिवार के साथ हैं...और उनके परिवार को बिखरने में मदद कर रही हैं. उसे समझाने के बजाय कि उसे अपने पति के पास चले  जाना चाहिए...उल्टा उसकी सहयता कर रही हैं. '. उनसे ये गुजारिश भी कर आए कि 'अब जया अगर उनलोगों के पास किसी मदद के लिए आए तो उसके मुहँ पर दरवाज़ा बंद कर दें..जिस से कोई सहरा ना पा..हताश हो..वो उनके पास लौटने के लिए मजबूर हो जायेगी"

बहनों ने उल्टा उन्हें ही आड़े हाथों लिया कि "अगर वे प्यार से जया को रखते तो ये नौबत ही क्यूँ आती...किसी अनजान के मुहँ पर तो वे लोग दरवाज़ा बंद कर ही नहीं सकतीं...अपनी बहन के साथ ऐसा कैसे करेंगी ?"

वहाँ  से निराश हो...अब  जिनके यहाँ ट्यूशन पढ़ाने जाती थी, राजीव ने  उनसे संपर्क किया और अपना दुखड़ा रोया कि "वो बच्चों के बिना बहुत दुखी हैं...किसी तरह पति-पत्नी का समझौता करवा दें" लोगों को महान बनने का बड़ा शौक होता है. उन महिला ने एक चाल चली...जब वो बच्ची को उसके कमरे में पढ़ा रही थी तो उसे बुलाया कि "आपसे कोई मिलने आया है...ड्राइंगरूम में बैठा है" 
उसे कुछ समझ नहीं आया..जाकर देखा तो सोफे पर राजीव बैठे मुस्कुरा रहे थे. वो सीधा दरवाजे से निकल गयी ..वो ट्यूशन भी हाथ से गयी. राजीव ने उसके दो और ट्यूशन भी यही कह कर छुडवा दिए कि आपलोग पैसे नहीं देंगे तो वो हारकर मेरे पास लौट आएगी. सबलोगों को अंदर की सच्चाई नहीं पता थी..और वे राजीव की बातों में आ गए. 

राजीव का झूठा अहम् यह गवारा नहीं कर रहा था कि वह उनकी छत्रछाया के बगैर...बिना उनकी कोई मदद लिए अपने बलबूते पर बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेवारी उठा रही है  . उनके पौरुष को यह एक बड़ी चुनौती थी और उसे वे  किसी भी तरह अपनी मदद का मोहताज देखना चाहते थे. रोते-गिडगिडाते....बच्चों का वास्ता देते  अपने पैरों पर गिरा देखना चाहते थे. राजीव वे जीव थे कि वे सिर्फ किसी को पैरों तले कुचल कर ही संतुष्ट नहीं होते थे . कुचला हुआ जीव , पैरों तले आधा दब कर बाकी के आधे हिस्से से उनके जूते चूमते रहे...उनकी तमन्ना ये होती थी.पर अब वो उनकी पहुँच से दूर उन्हें खुद को सताने का कोई मौका नहीं दे रही थी और ये बात उन्हें हकलान किए जा रही थी. 

एक दिन बैंक में उसके पास इंटरकॉम आया कि 'एक क्लाइंट आपसे बात करना चाहते हैं" हमेशा की तरह उसने कहा 'भेज दो' . वो रजिस्टर पर सर झुकाए कुछ लिख रही थी...किसी के गला साफ़ करने की आवाज़ से चौंक कर देखा तो सामने राजीव थे. एकबारगी उसकी नसें तन गयीं पर खुद को संभाला. बगल की कुर्सियों पर और लोग भी बैठे थे. उन्हें बैठने को कहा...और फिर एक आम क्लाइंट की तरह उन्हें पूरी योजनायें समझा दीं ' अब राजीव  की फरमाइश थी कि 'उन्हें लोकेशन देखनी है'...वो उठ कर चेयरमैन के पास गयी और कहा..." आज मुझे घर जल्दी जाना है..जरूरी काम है..आप किसी और को इनके साथ भेज दीजिये" 

उसके चले जाने के बाद..पता चला कि राजीव ने सबको बता  दिया कि वो उनकी पत्नी है और उनसे रूठ कर, उन्हें छोड़ कर चली आई है .उन्होंने चेयरमैन से भी रिक्वेस्ट किया कि...'उसे काम से निकाल दें'

दूसरे दिन  वो बैंक गयी तो पाया सबकी निगाहें बदली हुई हैं. सब उसे छुपी निगाहों से देखकर मुस्कुरा रहे हैं. तुरंत ही चेयरमैन का बुलावा आया और उहोने सारी बातें बता दीं...साथ ही ये अहसान भी जता दिया कि 'देखो तुम्हारे पति ने ये ये कहा...पर मैने बोला..'नहीं...मुझे उनके काम से कोई शिकायत नहीं तो मैं कैसे उन्हें निकाल दूँ..ये सब आपका निजी मामला है...मैं उसमे दखल नहीं दूंगा...आपसे कोई तो शिकायत होगी तभी आपको छोड़ कर चली आई..." फिर आवाज को मुलायम बना कर कहा.."क्यूँ जया जी....मैने ठीक किया ना"

वो सर झुकाए सब सुन रही थी...इस अचानक आवाज़ में घुले शहद  से चौंक गयी...किसी तरह कहा.."हाँ सर ठीक किया..थैंक्स.." और बाहर चली आई. 

ऑफिस  की महिलाएँ ..पुरुष सब किसी ना किसी बहाने ,उस से सहानुभूति जताने की कोशिश करते. पर वो उन्हें कोई भी जबाब ही नहीं देती. लंच टाइम में टेबल पर लंच करते हुए लोग तलाक  का कोई ना कोई किस्सा छेड़ देते...कि फलां महिला...अपने पति को छोड़ कर चली आयीं...या फलां पुरुष ने दूसरी शादी कर पहली पत्नी को घर से निकाल दिया...वो सब समझ रही थी..सब बहाने से जानना चाहते थे कि उसके पति को छोड़, अकेले रहने का क्या कारण था?...एक पचपन वर्षीय अधेड़ वयी सक्सेना जी हमेशा  ललाट पर लाल टीका लगाए रहते और बात बात पे 'जय माँ काली' कहते रहते...

एक दिन कहने लगे..'क्या जमाना है...आजकल  पति-पत्नी साथ  नहीं रहना चाहते और मुझे देखिए दो साल हो गए श्रीमति जी को परलोक सिधारे पर मैं आज भी उनकी फोटो अपनी उपरी जेब में लिए घूमता हूँ कि वे मेरे दिल के करीब रहें ". उन्होंने तुरंत फोटो निकाल कर उसे भी दिखाई. और फिर ठंढी सांस भर कहने  लगे.."श्रीमती जी के जाने के बाद तो मैं सारा ध्यान पूजा-पाठ में लगाने लगा हूँ. सुबह दो घंटे और शाम को चार  घंटे ध्यान लगाता हूँ. इतना ध्यान करने से अब तो मुझमे इतनी शक्ति आ गए है कि मन्त्र पढ़ कर किसी पर फेंक दूँ तो वो मर जाए....किसी की आँख में पांच मिनट देखता रहूँ तो वो मेरे आगे-पीछे घूमने लगे..पर मैं ये सब करता नहीं...मैं तो बस माँ की भक्ति  में मगन रहता हूँ... बस किसी का कुछ भला हो जाए, मेरे हाथों..यही सोचता हूँ...क्यूँ तिवारी जी...उस दिन देखा था,ना उस बच्चे को कितना बुखार था..मेरे हाथ फेरते ही आँख खोल दिया....".

"हाँ महराज..बहुत शक्ति है इनके हाथ में...अपने चेयरमैन साहब भी...काली के बड़े भक्त हैं...हम तो बस आप सबके संगत से ही पुण्य कमा लेते हैं."..ये तिवारी जी थे.

वो सब सुन रही थी पर इस बातचीत का औचित्य नहीं समझ पा रही थी...पर बहुत जल्दी ही इस बातचीत का राज़ पता लग गया. अब सक्सेना साहब अक्सर किसी ना किसी काम से उसे फोन करते पर फोन करने के पहले...फोन में दो तीन  बार फूंक मारते....पहले उसे लगा...शायद उनका फोन खराब है...आवाज़ नहीं जा रही...पर जब रोज का सिलसिला हो गया..वो भी दिन में तीन बार...तो उसे खटका हुआ. एक  ऑफिसर  थीं मंजू दी...वो उस से बहुत स्नेह रखती थीं. उसने उनसे ये सब कहा तो हंसने लगीं,कहने लगीं.."तुम पर वशीकरण मन्त्र आजमा रहे हैं..." फिर उन्होंने गंभीरता से सलाह दी..तुम सबके सामने,ये सब  कह दो..फिर आगे मैं संभाल लूंगी. 

और उसने सबके सामने टोक दिया.."सर, आपका फोन खराब है क्या...बदलवा क्यूँ नहीं लेते....कुछ भी कहने से पहले आपको फूंक मारना पड़ता है"
"ऐसा तो नहीं है...हमलोग से तो ठीक से बात होती है...फोन खराब तो नहीं लगता...क्यूँ सक्सेना जी?"..मंजू दी जल्दी से बोलीं.
वे कुछ बोलते कि मंजू दी खुद ही आगे बोल पड़ीं...."सक्सेना साहब आप कोई मन्त्र तो पढ़ के फूंक नहीं मारते.??..बड़े भले आदमी हैं बेचारे...तुम्हारे अच्छे के लिए करते  होंगे...पर ये नए जमाने के लोग बड़े अजीब  हैं...विश्वास ही नहीं है इनलोग  को पूजा-पाठ की शक्ति पर...किताब पढ़ पढ़ के दिमाग खराब  हो गया है...क्यूँ जया तुमको भी विश्वास नहीं है ना?

उसने 'ना' में सर हिला दिया...और मंजू दी बोलीं.."देखिए आपने अपनी कितनी शक्ति व्यर्थ कर दी...इसको विश्वास ही नहीं तो कहाँ से असर होगा.." चलो चलो कितना काम पडा है ...अब सर नहीं आजमाएंगे कुछ भी."
उन्हें कुछ बोलने का अवसर दिए बिना..वे दोनों अपनी सीट पर चली आयीं. रजिस्टर में सर छुपाये देर तक बेआवाज़ हंसती रहीं ,उसका तो ऐसे हँसते हँसते पेट दर्द होने लगा.

पर उसकी परेशानी कम  नहीं हुई थी.एक दिन एक दूसरे सज्जन सिंह साहब ने अपने केबिन में बुलाया और पूछा..." कितना पैसा देते हैं ये लोग?"
उसके बताने पर कहने लगे.."पता है..इतने काम का ही दिल्ली- बम्बई में कितना मिलता है?? बीस-पच्चीस हज़ार. हमको एक ऑफर है...हम तो ज्वाइन करने का सोच रहे हैं...उसी ऑफिस में एक जगह और खाली है....आपके लिए बात करें..चलियेगा? "
"सोच कर बताउंगी..सर" कहती वो बाहर चली आई...अब इनसे कैसे निबटा जाए. फिर से मंजू दी ही काम आयीं. उनकी सलाह पर दूसरे दिन खुद ही उनसे जाकर बोली..."बहुत बढ़िया ऑफर है सर....आप मेरे लिए भी बात कर लीजिये....मेरे तीनो बच्चे और माँ सबका रिजर्वेशन करवाना होगा..कब चलना होगा?"
सिंह साहब के चेहरे का रंग उड़ गया था...उन्होंने गंभीरता से कहा..."बात करके बताऊंगा..." और फिर दुबारा उस से मुखातिब नहीं हुए.

राजीव ने अब उसे परेशान करने  की दूसरी तरकीब निकाली. अक्सर छुट्टी लेकर उसके शहर  आ जाते और ऑफिस के नीचे चाय के दुकान में बैठे रहते. लोगों  से उसके आने-जाने का समय पूछते रहते. ऑफिस का कोई दिख जाता...तो सुना कर कहते.."अब किडनैप ही करवाना पड़ेगा...दूसरा कोई रास्ता नहीं है...इहाँ नौकरी कर के मेरी इज्जत मिटटी में मिला रही हैं..."

लोग आकर उसे बता जाते...डर तो लगता उसे...पर फिर सोचती...इतनी हिम्मत नहीं है राजीव की...कोर्ट में केस दाखिल है....कुछ करेंगे तो उनकी नौकरी पर बन आएगी. "

ऑफिस में चाय पहुंचाने वाले एक छोकरे को पैसे देकर,राजीव ने  ऑफिस में छोटे छोटे पत्थर भी फिंकवाने शुरू कर दिए. कभी किसी खिड़की से तो कभी किसी खिड़की से पत्थर आते..कभी किसी के हाथों में लगते..कभी किसी कि गर्दन पर. खिड़की से  झांकने पर कोई नज़र नहीं आता. पर एक दिन  तिवारी जी ने उस लड़के को पकड़ लिया ...और उसके कान उमेठ कर दो चपत लगाए   तो उस लड़के ने राजीव की डीलडौल..उनके कपड़ों का वर्णन  कर बता दिया कि उन्होंने उसे पैसे दिए थे. लड़के को तो पुलिस का भय दिखा कर भगा दिया गया....पर तिवारी जी अब खुद को ऑफिस का हीरो और उसका संरक्षक समझने लगे. अक्सर कहते  "डरियेगा  नहीं..जया जी...मैं हूँ..ना..सब ठीक कर दूंगा...एक हाथ लगाया उसको कि उस लड़के ने सब बक दिया....मेरे  रहते आपको कोई तंग नहीं कर सकेगा.."

उसे बहुत उलझन होती इन बातों से पर थैंक्स कह कर सर झुका लेने के सिवा कोई उपाय भी नहीं था. चेयरमैन के कानों तक बात गयी. उन्होंने भी बुलावा  भेजा...और फिर अहसान जताने लगे..."देखिए आपकी वजह से ऑफिस में कितना कुछ हो रहा है....फिर भी मैं आपको कुछ नहीं कहता..मैं आपको समझता हूँ...सब समझते हैं...कि आपके लिए बहुत हाइ रिगार्ड्स हैं मेरे मन में...देखिए लेटर सब पर आप ही साइन करती हैं ना...लोग के पास लेटर जाता है..तो लोग समझ जाते हैं...आपको हम कितना मानते हैं...कितना पावर दिए हुए हैं,आपको?...आप समझ रही हैं ना...आपके लिए कितना मान..कैसी भावनाएं हैं मेरे मन में..??"

उसक पूरा शरीर स्टिफ हो गया था...हाथों की नसें तन गयी थीं. मुट्ठियाँ भींचे नज़रें झुकाए वो चुप रही तो वे आगे बोले..."आप देख रही हैं..ना कितने भगवान लोग का फोटो लगा हुआ है...हम काली, दुर्गा सबकी पूजा करते हैं..ये हाथ में कड़ा जो पहने हैं ना...ये काली जी का आशीर्वाद है...इस कड़ा में ये शक्ति है कि ये सामने वाले के मन में क्या चल  रहा    है...हमको सब बता देता है..."

फिर उन्होंने कड़ा...अपने कान के पास ले जाने का अभिनय किया और थोड़ी देर बाद बोले.."ये कड़ा कह रहा है...आपके मन में मेरे लिए भी वही भावनाएं हैं...आप भी मेरे लिए वही सोचती हैं...जो मैं आपके लिए सोचता हूँ..."

अब वो चुप नहीं रह सकी, बोली.."सर..शायद इस  बार कड़ा ने आपको सच नहीं बताया...मेरे मन में आपके लिए कोई भावना नहीं है...बस आप मेरे बॉस हैं और मैं आपकी कर्मचारी..इस से ज्यादा कुछ नहीं.."

चयरमैन का भतीजा ,इसी बैंक में वाइस चेयरमैन था. युवा लड़का था...मेहनत से अपना काम करता...और अपने काम से काम रखता...उसने कभी उसके साथ कोई अनाधिकार चेष्टा नहीं की..उसके साथ बहुत ही  इज्जत से पेश आता था.  चेयरमैन की बार बार की हरकतों से वो इतनी दुखी थी और उस दिन ,इतने रोष में आ गयी थी कि सीधा उस लड़के के  केबिन में गयी....और चाचा जी की शिकायत कर डाली. भतीजे ने उसे बिठाया..पानी पिलाया..और कहा, 'ऑफिस में किसी और से इसकी चर्चा ना करें....वो अपने चाचा से बात करेगा.'

दूसरे दिन ऑफिस आते ही  चेयरमैन ने उसे अपनी केबिन में बुलाया और एक कागज़ सामने कर दिया..कहा साइन कीजिए.

उस कागज़ में लिखा था..."अब बैंक को उसकी सेवा की जरूरत नहीं रही...उसकी सेवा समाप्त की जाती है"


उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी. स्कूल की नौकरी छोडनी पड़ी थी...ट्यूशन छूट गए और अब ये नौकरी भी नहीं रही....आँखें डबडबा आयीं पर फिर उसने खुद को साध. नज़रें उठाईं...पहले सामने ही दीवार पर लगी...काली जी की तस्वीर पर नज़र गयी...और ह्रदय में एक  विश्वास का नन्हा अंकुर उग आया.."माँ ने जरूर इस से कुछ अच्छा ही उसके लिए सोच रखा होगा...ये जगह उसके लिए नहीं थी..." और उसने सीधी चेयरमैन की नज़रों में देखते हुए कहा..थैंक्यू सर" 

और बाहर निकल आई. एक अन्य कर्मचारी उसके सामने एक रजिस्टर लेकर आया....जिसमे लिखा था 'उसकी सेवाओं से संतुष्ट नहीं है' ,और उसे साइन करना  था.....कि 'उसपर बैंक का कोई बकाया नहीं है'. 

वह कुछ देर अपमान का घूँट पीती रही .फिर एक स्वाभिमान की लहर शिराओं में दौड़ पड़ी....और उसने रजिस्टर में लिख दिया...." मुझे इस बात की ख़ुशी है कि यहाँ ऑफिस से  मुझे कार्य के प्रति अयोग्य घोषित कर निकाला जा रहा है जबकि मैने पूरी लगन से अपने कार्य को अंजाम दिया है. पर यहाँ उन्हीं महिलाओं को योग्य माना जाता है जो वरिष्ठ अधिकारियों की हाँ में हाँ मिलाती हैं...और उनके साथ कहीं भी जाने को तैयार रहती हैं" 

इतना लिख कर वो बाहर निकल आई. बाद में पता चला...इसे पढ़कर दो,तीन महिलाओं ने वहाँ की नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

अब फिर से उसके सामने एक सीधी सपाट सूनी सी सड़क थी...जहाँ किसी दरख़्त की छाया  भी नहीं थी....उसे ही कोई पड़ाव ढूँढना था. 

(क्रमशः)