Friday, March 2, 2012

साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे ...(कहानी --२ )


(इस किस्तों वाली कहानी का उपयुक्त शीर्षक नहीं मिल रहा था और मेरी सलाहकार वंदना अवस्थी दुबे ने (सोचती हूँ...इन्हें ऑफिशियल सलाहकार ही एपोयेंट कर लूँ...पर डर है,कहीं मोहतरमा लम्बी-चौड़ी फीस न फरमा  दें :)) सलाह दी...हर किस्त का एक अलग शीर्षक रख लो और बात मुझे जाँच गयी...पूरी कहानी का शीर्षक  ढुंढने की  कवायद मुल्तवी  }

कहानी अब तक--
(जया के कविता संग्रह को एक बड़ा पुरस्कार मिला. पत्रकार पूछने लगे, उसकी कविताओं में इतना दर्द कहाँ से आया ?और जया पुरानी यादों में खो गयी.. दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनों..माँ-बाबूजी के संरक्षण में बचपन बड़े प्यार में बीता...बाबूजी के दुनिया से चले जाने के बाद उसने सोचा नौकरी करके माँ की देखभाल करेगी..पर एक पड़ोस के लड़के ने ख़त भेजकर..रास्ते में रोक कर अपने प्यार का इजहार शुरू कर दिया..उसने हर बार उसे मन कर दिया...)
गतांक से आगे ---


कुछ दिन यूँ ही डरते-डरते बीत गए. पर   -धीरे महसूस किया...अब दो आँखें पीठ पर नहीं जड़ी होतीं...ना ही किसी के द्वारा घूरे जाने का अहसास ही होता...और वह थोड़ी निश्चिन्त हो गयी...लगता है 'राजीव समझ गया और कोशिश छोड़ दी....चलो अच्छा हुआ बला टली...अब यूँ डर के साए में नहीं जीना पड़ेगा...अब इत्मीनान से कहीं आ जा सकती है. बिजली का बिल जमा कर लौट रही थी कि देखा...राजीव के घर के बाहर ढेर सारे गद्दे चादरें..सूखने को फैलाई हुई हैं. पड़ोस की मिसराइन चाची गुप्ताइन चाची से कह रही थीं..'लगता है...राजीव की अम्मा आई हुई हैं....कभी मिश्रा जी के पास तो कभी बेटे के पास...एक पैर इहाँ त एक पैर उहाँ रहता है,उनका....आते ही झाड़-पोंछ में लग जाती हैं...चलते हैं शाम को मिलने...' 

उसने ऐसे ही उत्सुकता से एक नज़र मुड कर देखा...पर कोई नज़र नहीं आया...वो घर चली आई.

दूसरे दिन अलसाई सी लेटी थी कि तीन बजे के करीब...दरवाजे पर जोर की खट-खट हुई..."अरे कोई है..?"
हडबडा कर उठी तो देखा अधेड़ उम्र की एक औरत खड़ी थीं...उसके दरवाज़ा खोलते ही...उसे ऊपर से नीचे तक घूरने लगीं...उसे थोड़ा अजीब सा लगा...असमंजस में चुप खड़ी रही..जब उनका घूरना बंद नहीं ही हुआ तो पूछ लिया..."किस से मिलना है??.."
"अपनी माँ को बुलाओ"
"आप बैठिये अभी बुलाती हूँ..."
माँ भी लेटी थीं...बताने पर " कौन है...." कहती...हडबडाते हुए सर पर पल्ला ठीक करते बैठक की तरफ भागीं "
"का हाल है..नरेस की माँ....बढ़िया हुआ यहाँ चली आयीं...अपना घर होते हुए काहे बेटा-बहू के आसरे रहतीं.."
"नहीं आसरे की बात नहीं है...ये घर भी इतने दिनों से बंद पड़ा था....इसकी देख-रेख करनी थी...रहने पर ही पता चलेगा ना...किधर क्या मरम्मत कराना  है..इसीलिए यहाँ चली आई " 

वो एक कोने में खड़ी थी...माँ ने उसकी तरफ  मुड़ कर देखा..."जरा  सरबत-पानी लेकर आओ...." फिर उसकी आँखों में सवाल देख खुद ही जबाब दे दिया.."अरे राजीव की माँ हैं...तुमको याद नहीं होगा...कम ही मुलाकात हुआ है...कभी जब हमलोग आते थे तो ये नहीं और ये आती थीं तो हमलोग नहीं.." फिर उन महिला की तरफ मुड़ कर पूछा.."आपने पहचाना,इसे...जया है.."

"हाँ अच्छी तरह पहचाना...अब तो एही बाकी  है ना सादी  के लिए....बाकी सबको तो सरमा जी निबटाइए  के गए हैं.."

उनका इस तरह 'निबटाइए  के' बोलना..उसे अच्छा नहीं लगा...पर चुपचाप मुड़ गयी. शरबत देने के बाद ...वह वापस कमरे में आ कर लेट गयी..अचानक उनकी बातचीत में अपना नाम सुन..उसके कान खड़े हो गए . राजीव की माँ कह रही थीं..." छोटकी बेटी की सादी के लिए का सोची हैं..?"
"अभी तो कुछ नहीं...बी.ए.का इम्तिहान दी है..रिजल्ट आ जाए...तब देखें..कहती तो है कि अभी और आगे पढेंगे...नौकरी करेंगे..."
"अरे का लड़की जात से नौकरी करवाईयेगा....सादी-ब्याह का सोचिये.."

और माँ की दुखती रग छू गयी हो जैसे...बिना देखे ही वो बता सकती थी..उनकी आँखें गंगा-जमुना बन गयी होंगी...जब भी उसकी बात होती...माँ बाबूजी को याद करके रोने लगतीं..क्या क्या अरमान थे उनके..अभी भी रुआंसी सी बोल रही थीं.." हाँ..देखना ही होगा...इसके बाबूजी तो रहे नहीं...बीच मझधार में छोड़ चले गए...हमेशा कहते थे इसके लिए तो राजकुमार जैसा दूल्हा लायेंगे....क्या पता क्या लिखा है..इसकी किस्मत में.."
"अरे ऐसा क्यूँ कहती हैं....सरमा जी का अरमान था तो राजकुमार जईसा दुल्हा ही मिलेगा इसको.."
"आप बताइए...राजीव को भी तो नौकरी में आए बहुत दिन हो गया...कब कर रही हैं...ब्याह  उसका..?"

"अरे अब का बताएँ...दू साल हो गया नोकरी लगे...लड्कीवाला लोग सुबह-साम दुआर अगोरता है...पर इ माने तब ना...अभी और परीक्षा देना है..अफसर बनना है...एही कहता है...मेरा तो उ लोग को चाय पिलाने में ही महीना का पांच किलो चीनी...और दू किलो चाय ख़तम हो जाता है. कम से कम सादी करे तो ई खर्चा त कम हो.."
"आप भी ना.."..हंसने लगीं  माँ...
"पर अब मान गया है...एक लड़की पसंद आ गयी है...."
"ओह फिर देर काहे की...जल्दी से बजवाइये बाजा.."
"इसीलिए तो इहाँ आए हैं.."
"समझी नहीं..." माँ सचमुच कुछ नहीं समझी थीं...पर वो सब समझ रही थी...उसका दिल बैठ गया...उनकी चाय की चर्चा सुन चाय बनाने उठी थी..धम से वापस चौकी पर बैठ गयी...'तो ये वजह है राजीव की माँ के यहाँ आने का"
"का नहीं समझीं....आपकी बेटी जया पसंद आ गई है राजीव को...अब तक सादी के नाम पर ना ना कहता था..अब अपने से कहा है...बात करने के लिए...त का करें...अब आपके घर में कोई मरद माणूस भी नहीं है ना...किस से बात किया जाए...इसीलिए हमको आना पड़ा...नहीं तो औरत लोग कभी ई सब काम करती है...पर अब का करें...दुसर कौनो उपाए नहीं था..."
माँ शायद सकते में थीं...एक शब्द नहीं निकला उनके मुहँ से....
"का सोच रही हैं....सरमा जी कहते थे ना..राजकुमार जैसा दूल्हा ढुंढेंगे  त देखिए बिना मेहनते के दुआरी पर राजकुमार जैसा दूल्हा आ गेया "
" हाँ..भाग्य है लड़की का..पर बातचीत त मेरा दुनो बेटा ही करेगा...अब वही दोनों गार्जियन  है इसका.." शायद माँ को घर में कोई मरद मानुस नहीं होने की बात अखर गयी थी...उसे भी सुकून आया..डर रही थी कहीं माँ..एकदम से हाँ ना कह दें.

"ठीके है...खबर कर दीजिये उ लोग को...दुनो खुसे होगा...भाग-दौड़ का मेहनत बच गया....अब चलेंगे...राजीव के ऑफिस से आने का टाइम हो रहा है..जब तक हियाँ हैं..चाय-पानी त  दे दें.." 

"आप चाय तो पी के जाइए...जयाss..जयाss " माँ पुकार ही रही थीं...पर राजीव की माँ बीच में ही उन्हें रोक कर उठ गयीं.." अब त मिठाईये खायेंगे...चाय ओए रहने दीजिये"  
उसने भी राहत की सांस ली...उसका भी मन नहीं था उनके सामने जाने का 

***
माँ घबराई सी अंदर आयीं...' जया..बेटी...सुना तुमने क्या कह रही थीं...राजीव की माँ..."
माँ को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था...खुश भी थी...और उनकी आँखें भी भरी जा रही थीं...
पर उसने सख्त चेहरा बनाए हुए कह दिया.." सब सुना...पर  मैने पहले ही बता दिया है...शादी नहीं करनी..अभी और पढूंगी...नौकरी करुँगी.."

ज़िन्दगी में पहली बार माँ ने जोर से डांटा.."ऐसे कुलच्छन बोल नहीं बोलते.... कोई लड़की अनब्याही रही है आजतक...भगवान ने भेजा  है..इतना सुन्दर घर और वर....उनकी इच्छा को ना नहीं करते..चल  मेरे साथ चल...दोनों भैया को फोन कर दे... "
"माँ....मैं कहीं नहीं जा रही....इतना हडबडाने की जरूरत नहीं है.
"अब इ शाम  को हम अकेले जाएँ...हमको तो नंबर मिलाना भी नहीं आता...काहे नहीं बात मान रही हो..सीमा और रीता को भी फोन कर देंगे...सबसे ई खुसखबरी बाँटने का मन हो रहा है..."
"कैसी खुसखबरी माँ...अभी से सब जगह  ढिंढोरा मत पीटो...आज तो हम कहीं नहीं जायेंगे...कल देखेंगे.." और इतना कह वह उठ कर चली गयी .

माँ भी शायद समझ गयीं...वो नहीं मानेगी..."ठीक है...कल ही चलना..पर जरा कागज़ कलम दे...सबको चिट्ठी तो लिख दें".. और सीधा चिट्ठी लिखने बैठ गयीं...ये माँ का एकदम बदल हुआ रूप था...अब तक रोने-धोने सोग मनाने वाली माँ, एकदम से कामकाजी हो उठी थीं .....माँ की पनीली आँखों में एक नई चमक आ गयी थी. एक नई जिम्मेवारी के अहसास से एकदम सीधी तन कर बैठी थी... माँ ने तो लम्बी चिठ्ठी दोनों भैया और दोनों दीदी को  लिखी... लिखते वक्त....खुद से ही बातें करतीं...कभी रोती..कि बाबूजी नहीं है..अपनी रानी बेटी की शादी देखने को...कभी खुश होती...कि कितनी चिंता थी..उन्हें निशा  की शादी की..भगवान ने घर बैठे लड़का भेज दिया. उसने भी लिफ़ाफ़े में दो लाइन लिख कर डाल दिया कि उसे शादी नहीं करनी...और कोई जल्दी नहीं है...जैसे छुट्टी मिले...वैसे ही लोग आएँ.

माँ नहीं मानीं..दूसरे दिन सबको फोन किया और कह दिया...कि चिट्ठी में सब विस्तार से लिखा है. बड़े भैया तो दो दिन बाद ही आ गए .बहनों ने भी पत्र के उत्तर में ,ख़ुशी जाहिर की और उसे समझाया कि बचपना ना करे. पर भैया जबतक आए...राजीव की माँ वापस चली गयीं थीं . भैया, राजीव से मिलकर बहुत खुश हुए कि होनहार लड़का है  और उनके मात-पिता से मिलने...उनकी पोस्टिंग पर चले गए. लौट कर बताया...."उनलोगों को जया बहुत पसंद है..."
"और लेन-देन की बात ?"...माँ ने आशंका से पूछा.

"मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था...उन्होंने कहा दो-तीन दिन छुट्टी लेकर आऊं..फिर आराम से बातें करेंगे...तुम चिंता मत करो...जब खुद लड़की का हाथ मांग रहे हैं तो उनलोगों की ज्यादा डिमांड नहीं होगी....और अपने घर की लडकियाँ, अपनी  किस्मत लेकर आती हैं....सीमा और रीता  की शादी में भी कहाँ ज्यादा दहेज़ माँगा  उनलोगों ने..दोनों दामाद कितने अच्छे मिले हैं...और हम दोनों भाई की शादी में भी पिताजी ने नहीं ली ..तो जया की शादी में क्यूँ देना पड़ेगा....जो भी करेंगे हमलोग अपने शौक से करेंगे....और सबसे छोटी बहन है...पूरे धूमधाम से शादी करेंगे...उन्हें शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा..."

माँ की आँखों से झर झर आँसू गिरने लगे...वे बस आँचल से आँखें पोंछती रहीं...कुछ बोली नहीं...शायद मन ही मन भगवान  का शुक्रिया  अदा कर रही थीं.

"बस इतना कहा है कि सोने के सिक्के से लड़के का टीका कर जाऊं...."
"हाँ, लड़के का रोका तो करना होगा....चलो संदूक खोलती हूँ...देख लो...उसमे से क्या लेना होगा "

ये सब सुनकर थोड़ा मन उदास हो गया उसका..शुरुआत तो कर ही दी उनलोग ने मांगने की....दीदी-भैया के समय ऐसा कुछ तो नहीं कहा था.. पता नहीं आगे क्या होने वाला है." एक गहरी सांस ली उसने.

कानो कानो ये बात पूरे मोहल्ले में फ़ैल गयी. उसका बाहर निकलना  दूभर हो गया. वो तो ज्यादा लोगों  को पहचानती नहीं..लेकिन लोग उसे दिखा कर कहते..."यही है वो लड़की " उसे लगता पता नहीं लोग क्या सोच रहे होंगे......माँ के चहरे से उदासी की परत गायब हो गयी थी..वे सारा समय शादी का हिसाब-किताब ही करती रहतीं.

राजीव ने कई सारी परीक्षाएं दे रखी थीं. और उनके रिजल्ट आने शुरू हो गए थे.पता चला...पी.सी.एस. का इम्तहान पास कर लिया है और वो अब डिप्टी कलक्टर बन जाएगा. राजीव के माता-पिता घर आ गए और एक बड़ी पूजा रखी. वो तो पूजा में नहीं गयी पर माँ बता रही थी कि मोहल्ले के सारे लोग ,उसे बधाई दे रहे थे कि 'लड़की के पैर बड़े अच्छे हैं...रिश्ता जुड़ते ही बढ़िया नौकरी लग गयी.'
 
माँ ने तो बस इतना ही बताया.पर एक दिन पास-पड़ोस की औरतें घर पर आई थीं...उनमे से ही दबंग मिसराइन चाची ने कहा.."अरे जब मैने राजीव  की माँ से कहा, बहू के पैर बड़े शुभ हैं..आने के पहले ही...खुशखबरी आ गयी" तो तमक कर बोली.."अभी कैसी बहू...कोई छेका थोड़े ही हुआ है... " 
मैने भी सुना दिया.."क्या अब दहेज़ की चकाचौंध में भुला  गयीं  का...कि आप ही गयीं थीं..लरकी का हाथ मांगने...तब ना सोचीं कि कहीं बेटा अफसर बन जायेगा त बड़का गाड़ी में लोग आएगा रिश्ता ले के...नहीं जाना चाहिए था ना. "
 वो तो राजीव के बाबूजी उसी वक्त बात सम्भाल लिए.."अरे नहीं भौजी...जुबान देने के बाद...हम फिरने वाले में से नहीं हैं..' ..वरना मैं तो और सुनाने वाली थी." 

सबने हाँ में हाँ मिलाई..."पूरा सहर  जानता है....कि इन दुनो का सादी पक्का हो गया है...इसके भाई त सिक्का से लरिका का टीका भी कर गए थे...तुम कंजूस लोग ने लड़की को कुछ नहीं दिया..तो का शादी नहीं ठीक  हुआ"...बोलो सुधीर  की माँ...गलत कहे का हम?" मिसराइन चाची ने आगे जोड़ा.

"ना ना एकदम ठीक बात है..अरे लरकी का भाग है की ऊ अफसर बन गया "...ये सुधीर  की माँ थीं.
यह सब सुन उसे डर भी लगा और थोड़ा सुकून  भी...अच्छा हो, वे लोग कहीं और रिश्ता कर लें...और उसके मन की बात पूरी हो जाएगी"

पर उसने मन का शक दूर करने को सीधे राजीव से ही बात करने की सोची. इस बार वो रास्ते में राजीव के इंतज़ार में खड़ी थी. वो उसे देख  गर्व से मुस्कुराया और उसके कंधे थोड़े  और  भी चौड़े हो गए. वो नज़रें झुकाए बोली.. "आप बिलकुल फ्री हैं..कहीं और शादी करने के लिए....मेरी तरफ से एकदम स्वतंत्र"
"नहीं जी शादी तो हम आपसे ही करेंगे...और अब तो हम अफसर भी बन गए हैं...अब तो आपके भाई लोग की बराबरी में हैं ना?"..आज उसके स्वर में वो नम्रता और वो मनुहार नहीं था ..बल्कि..थोड़ा  विद्रूपता और उपहास था.

पर वो भी फैसला करके आई थी..दो टूक बात करेगी..." देखिए आपको दूसरी जगह अच्छा दहेज़ मिल जायेगा...मेरी माँ -भाई का  इतना सामर्थ्य नहीं है "
"ये सब बात लड़की लोग के मुहँ से शोभा नहीं देता...और ये सब तो परिवार के बड़े-बुजुर्ग तय करेंगे...हम आप क्या बोलें उसमे...फिर अजीब ढंग से मुस्कुरा कर बोला..." और आप सबसे छोटी हैं..इतना बड़ा मकान है...बाबूजी भी बढ़िया पैसा छोड़ कर गए ही होंगे...दो दो अफसर भाई है..आप क्यूँ चिंता करती हैं...जाइये जिस रूप पर इतना घमंड है ना...उसका साज-श्रृंगार कीजिए.....अब उसपर मेरा हक़ है "

वो अंदर तक सिहर गयी...इस आदमी से उसकी शादी होने जा रही है...उसके स्वर में लेश-मात्र का प्यार नहीं था...ऐसा भाव था..जैसे उसने कोई जीत हासिल कर ली हो. और रूप पर घमंड??....जबसे बाबूजी गए हैं...उसने ठीक से आईना  तक नहीं देखा...घमंड क्या करेगी?

***

वो नीची निगाह किए, थके कदमो से लौट आई...कैसे गुजरेगा उसका आगामी जीवन?...माँ,भैया सब खुश हैं...उन्हें बिना भाग-दौड़ के एक अफसर दामाद मिल गया...वो कैसे मना करे...मना भी करे तो किस बात पर...कोई बड़ी वजह तो हो...सिर्फ इतनी सी बातचीत पर कैसे कोई निर्णय ले...और क्या पता शायद उसे इस बात का गुस्सा हो कि उसने बधाई नहीं दी...शर्मा कर हंस कर बात नहीं की..सीधा दो टूक बात की. छुई-मुई लडकियाँ ही लड़कों को अच्छी लगती हैं...लजा कर शर्मा कर आदाओं से बातें करने वाली लडकियाँ ही भाती हैं, उन्हें...शायद ये साफगोई उन्हें धृष्टता लगी हो...और फिर अंतर्मन ने जैसे आवाज़ दी.."क्या खुद पर हरोसा नहीं...अगर पत्थरदिल भी होगा...तो उसे वो अपने प्यार और समर्पण से मोम बना लेगी. और खुद तो प्रपोज़ किया है....मन में प्यार तो होगा ही.....वो नाहक चिंता कर रही है. और सर झटक घर के अंदर आ गयी...गुनगुनाने की कोशिश की....खुश होने की कोशिश की...लेकिन दिल में जैसे किसी गहरी उदासी ने घर कर लिया था. मन को समझाया शायद माँ से दूर एक अजनबी घर में जाने के डर से मन उदास है.

पर डर बेबुनियाद नहीं  था. भैया छुट्टी लेकर शादी की बातचीत करने राजीव के पिताजी के पास गए  थे. लौट कर आए तो बहुत परेशान. उनकी तो अच्छी खासी मांगें थी. माँ से बता रहे थे..."पहला सवाल ही उन्होंने किया...कितने भर सोना देंगे??".महानगरीय जीवन के आदि भैया जब यह समझ नहीं पाए तो जोर का ठहाका लगाया, ससुर जी ने और विद्रूपता से बोले, "बहन की शादी करने चले हैं या मजाक करने...इतना भी नहीं जानते...या जानना नहीं चाहते....मतलब कितने ग्राम सोना देंगे....?

 ऐसे ही लम्बी लिस्ट,पकड़ा दी है उन्होंने,...कार...फर्नीचर ...फ्रिज ..टी.वी. से लेकर गृहस्थी का हर सामान है...और फिर उनके खानदान भर के कपड़े....शादी भी वे अपनी पोस्टिंग वाले शहर से ही करेंगे...यहाँ से नहीं...बारात का आना -जाना ठहराना...स्वागत -सत्कार सब.." भैया  के स्वर में  चिंता थी...माँ ने भी आशंका से पूछा..."क्या कहा तुमने...."

"क्या कहता...कार में तो असमर्थता जता दी...बाइक के लिए हाँ की है......बाकी सब चीज़ें तो देनी ही पड़ेंगी...बार-बार सुना रहे थे..फलां जगह से इतने लाख का ऑफर है...वहाँ से अच्छी कार और कई  लाख रुपया का ऑफर है...वो तो हमने  आपको जुबान दी है...अब समाज में  नाक की बात थी..हमें क्या पता था...ये नालायक लड़का सचमुच पी.सी.एस. निकाल ही लेगा...लगा क्लर्की के लिए ये घर ठीक है...गुस्सा  तो इतना आ रहा था...कि  कह दूँ...वो सब पैसे चार दिन में चले जाएंगे...पर मेरे सोने जैसी बहन आपके आँगन में जायेगी तो आपका खानदान सँवर जायेगा....पर लड़की का भाई था...खून का घूँट पी कर रह गया...बोला नहीं कुछ "

"पर बेटा...कहाँ से होगा इंतजाम ?"

"हो जायेगा माँ...छोटे से भी  कहूँगा...हम दोनों भाई हैं...कर लेंगे  इंतजाम "

वह अंदर कमरे में सब चुपचाप सुन रही थी...अब उस से नहीं रहा गया...सारा भय-संकोच त्याग कर भाई के सामने आ बोली,"भैया....जरूरी है क्या यहाँ शादी करना....मैने तो पहले भी कहा था...मैं शादी नहीं करुँगी...नौकरी करुँगी "

"गुड़िया..क्यूँ चिंता करती है...सारा इंतजाम हो जायेगा...पिताजी ने इतना कुछ किया है हम सबके लिए...बस एक तेरी जिम्मेवारी छोड़ गए हैं...वो भी हम दोनों भाई पूरी नहीं कर सकते??...चिंता मत कर...शुरू शुरू में हर लड़केवाले ऐसे ही बातें करते हैं...फिर मान जाते हैं....जा एक कप चाय बना ला..." भैया ने स्नेह से बोला.

बाबूजी के जाने के बाद पहली बार किसी ने गुड़िया कह कर पुकारा था...आँखें भर आयीं उसकी....अच्छी भली ज़िन्दगी गुजर रही थी,भैया लोगों की...कहाँ से उस पर राजीव की नज़र पड़ गयी और उसके भाई मुसीबत में पड़ गए.

इसके बाद देखती...शादी की जो भी बात करनी हो...भैया और माँ की बैठक छत पर बने कमरे में होती ताकि उसके कान में कुछ ना पड़ सके...पर दोनों का चिंताग्रस्त चेहरा और माथे की गहरी लकीरें उसे आभास दे देती कि सबकुछ सही नहीं है...और अपनी असमर्थता पर खीझ कर रह जाती वह.

धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू होने लगीं. राजीव ट्रेनिंग पर चले गए थे....थोड़ी राहत थी...कि अब  राजीव से मुलाकात नहीं होगी और फिर कुछ उल्टा-सीधा नहीं सुनना पड़ेगा.

शादी  की तारीख नज़दीक आने लगी....घर में  मेहमान भरने लगे...चाची,मौसी ,बुआ....सारे रिश्तेदार उत्साह से भरे  थे...इतने अच्छे घर में इतनी आसानी से जया का रिश्ता तय हो गया...बैठे -बिठाए इतना अच्छा लड़का मिल गया. माँ और दोनों भैया ने लेन-देन दहेज़ की बातें अपने तक ही रखीं थीं....बहनों को भी ज्यादा कुछ नहीं बताया  था...उसने दीदी से राजीव से मिलने की बात बतायी....और बताया कि किस रूखे  ढंग से उसने बात की...दीदी ने उसे दिलासा दिया ..."उसे लड़कियों से कैसे बाते करते हैं नहीं पता होगा...कई लडको को नहीं होता...वे ऐसे ही ऐंठ कर बातें करते हैं. पर उसने खुद तुम्हे पसंद किया है....घबरा मत...सब ठीक होगा."

वो भी यही आस लगाए बैठी थी...कि शादी के  तीन दिन पहले...उसके नाम राजीव का ख़त आया...पहली बार कुछ कोमल अहसास ने सर उठाये....अच्छा था कि भैया के बेटे ने उसे ही पत्र थमाया.  धड़कते दिल से कमरे के कोने में जाकर ख़त खोला...सिर्फ एक पंक्ति थी...कोई संबोधन नहीं..."अगर बारात  लेकर नहीं आया तो क्या करोगी??.....राजीव " वो तो पत्ते सी कांपने लगी. संयोग वश दीदी आ गयी कमरे में और उसे यूँ कांपते देख.."क्या हुआ...जया??" कहते थाम लिया...वरना वो बेहोश ही हो गयी होती. दीदी  ने वो पत्र देख  लिया...वे भी घबरा गयीं...उसे बिठाया पानी पिला कर लिटा दिया...और दौड़ गयी भैया को बताने. उसी कमरे में दोनों भैया, माँ  और दीदी  की बैठक हुई. तय हुआ बड़े भैया और जीजाजी जाकर बात करें...आखिर माजरा क्या है?"

उसे तो तेज बुखार चढ़ गया....भैया और जीजाजी जब बात करके लौटे तो भैया बड़े निराश से थे...और जीजाजी गुस्से में. अब उस से कुछ भी छुपाने का कोई फायदा नहीं था...दो दिन बारात चढ़ने में रह गए थे...और यहाँ लड़के वालों के ये तेवर थे. भैया ने बताया, राजीव ने कहा..."वो तो उन्होंने ,अपनी होने वाली पत्नी को लिखा था...इनलोगों ने क्यूँ पढ़ी?"

जीजाजी नाराज़ हो गए..." वहाँ लड़की बेहोश हो गयी है...उसे तेज बुखार हो गया...और आप कह रहे हैं..मजाक था...ऐसा मजाक करता  है कोई"

इसपर सुना उसने कहा.."मजाक तो आपने देखा ही  नहीं..कैसा कैसा कर सकते हैं?"

भैया उन्हें शांत करके ले आए...पर आज भैया फूट फूट कर रो रहे थे...गलती हो गयी...ऐसे घर में बेटी नहीं देनी थी...उस दिन राजीव के पिताजी ने भी कहा था..."आपलोग कह रहे हैं...ये नहीं दे सकते...वे नहीं दे सकते...अखबार में पढ़ते हैं कि नहीं कि बहू जला दी गयी...मार दी गयी....डर नहीं लगता आपलोगों को.."
जीजाजी को फिर गुस्सा आ गया.."और आप सुनकर चुप रह गए?'

"नहीं मैने कहा...ऐसा क्यूँ   कह रहे हैं....तो कहने लगे....हम तो एक बात कह रहे हैं....हमलोग इतने नीच नहीं हैं..."...अभी आठ दिन पहले की बात है...क्या करता...सब तैयारी हो गयी है,शादी की. अब क्या कर सकते हैं..."

माँ अलग रोने लगीं.."अब तो शादी तोड़ दें ..तो इसकी शादी फिर कभी नहीं होगी....ज़िन्दगी भर बिनब्याही बैठी रहेगी...लड़की ससुराल जाएगी पर जी वहीँ टंगा रहेगा..पता नहीं  कैसी है...?"

उसे सामने की दीवार घुमती सी लगी....दोनों हाथों से सर थाम लिया....कुछ उपवास...कुछ घर छोड़ने का दुःख..और अब ये नयी टेंशन...जोरों का चक्कर आ गया ,सर में..इन लोगों की बातें भी  उस तक टुकड़ों टुकड़ों में ही पहुँच रही थीं....पलकें मुंदने लगी थीं...धीरे धीरे मुंदती पलकों वाले शरीर को बेहोशी ने अपने आगोश में ले लिया...
(क्रमशः )
चाहें तो अपनी प्रतिक्रिया यहाँ दे सकते हैं 

Wednesday, February 29, 2012

झील में तब्दील होती वो चंचल पहाड़ी नदी (कहानी--१)


कमरा सुन्दर फूलों के गुलदस्तों से भरा हुआ था....कहीं सफ़ेद..पीले..लाल गुलाबों के गुच्छे तो कहीं नीले-बैंगनी ऑर्किड मुस्करा रहे थे..- कॉफी की तीखी गंध के साथ फूलों की खुशबू मिलकर एक अजीब ही मदहोश सी महक भर रही थी कमरे में. आँखें मुंदने सी लगी थीं और सर भारी लगने लगा और वे खिड़की के पास चली आयीं....भारी-भारी परदे परे सरका दिए....एक ठंढी हवा के झोंके ने जब हौले से सहलाया तब वे अपनेआप में लौटीं....बस ये हवा की छुअन ही सुकून देती है,मन को.....आस-पास अपने की दावेदारी करने वालों का...उनकी शान में कसीदे पढ़नेवालों का जमावड़ा सा लगा रहता है...फिर भी कोई अपना क्यूँ नहीं लगता??..इतने लोगो से घिरी रहने के बाद भी अपनेपन के अहसास के लिए एक इस ठंढी हवा का सहारा रहता है उन्हें...और उन्होंने आँखें बंद कर खिड़की की रेलिंग पर झुक...चेहरा थोड़ा आगे की तरफ झुका दिया...शरारती हवा ने उनके बाल बिखेर दिए थे और उनके गालों पर प्यार की थपकियाँ देने लगी थी.

कल रात ही उन्हें पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई और सुबह से लोगो का तांता लगा हुआ था...भूले-बिसरे मित्र....लेखक...पत्रकार ..कवि...पास-दूर के रिश्तेदार...सब फूलों के गुलदस्ते थामे बधाइयां देने आ रहे थे. पत्रकारों  के अजीबो-गरीब सवाल के संयम से कलात्मक आवरण में लिपटे शब्दों में जबाब देते दिमाग की नसें तड़क रही थीं. .."आप की  कविता में इतना दर्द  कहाँ  से आया?"..."आपकी कविताएँ दर्द का समंदर लगती हैं."..."हर कतरे से जैसे दर्द टपक रहा हो"....दर्द...दर्द.... दर्द...उन्होंने जबाब तो दे दिया कि "संसार की हर नारी का दर्द उन्हें अपना लगता है....वे खुद को उसकी जगह खड़ा  हुआ पाती हैं ...और उसका रेशा रेशा  दर्द सोख लेती हैं जो उनकी कविताओं में उतर आता है.." पर इस असहनीय पीड़ा के दलदल में  लगातार धंसते मन  को किस भागीरथ प्रयास से वे ऊपर तक ले आती हैं...इन्हें क्या पता.

पर क्या कभी सोचा था, फूलों की तरह मुस्काने वाली... बासंती हवा की तरह इठलाने वाली....बादलों सी हल्की और चांदनी सी शफ़्फ़ाफ़ उनकी ज़िन्दगी...एक दर्द के दरिया में तब्दील हो जाएगी...दो बहनों और दो भाइयों की सबसे लाडली बहन. माँ का प्यार ऐसा जैसा दादी का प्यार..अनुशासन से विमुक्त.  उसकी देखभाल का जिम्मा दोनों बड़ी बहनों ने ले लिया था...बहनें  उसे गुड़िया की  तरह सजा कर रखतीं. दूध में  शहद सा घुला रंग और उसपर काले बादल की तरह छाये घुंघराले बाल. लाल रंग की खूब  फ्रिल वाली फ्रॉक पहनती तो किसी चाबी वाली गुड़िया सी लगती बस आँखें गुड़िया सी बेजान नहीं बल्कि चपल मछलियों जैसी चंचल थीं जो कभी स्थिर नहीं रहतीं. पिता ने सैकड़ों उपनाम दे रखे थे.... गुड़िया, परी, छुटकी, रानी बेटी..... कभी उन्हें अपने नाम से नहीं पुकारा. भाभी भी आयीं तो बड़ी बहनों से वे ननद का रिश्ता निभातीं पर उसे  पुत्रीवत स्नेह ही देतीं. सबके प्यार की ऊष्मा सहेजे वह उम्र की सीढियां पार करती जा रही थी.

स्कूल की उछलती कूदती चंचल पहाड़ी नदी सी लड़की कॉलेज में पहुँचते ही  शांत गंभीर झील में कैसे बदल गयी कोई समझ नहीं पाता. अब उन्हें किताबें अच्छी लगने लगी थीं...महादेवी..पन्त..निराला....की कविताएँ कई- कई  बार पढ़तीं..कितनी तो कंठस्थ कर रखी थीं. डायरी में कहीं-कहीं कुछ पंक्तियाँ भी लिख रखीं  थीं.पर किसी को नहीं दिखातीं...वे उनके नितांत निजी क्षण की उपज थे. दोनों दीदी और भैया की शादी हो गयी थी...उसके लिए पिताजी कहते इसके लिए तो एक राजकुमार लाना पड़ेगा. तभी मेरी रानी  बेटी की जोड़ी जंचेगी. वो सोचती  राजकुमार हो या रंक बस उसे खूब प्यार करे. वो भी उसे अपने प्यार से ढक देगी...इतना मान-सम्मान -प्यार देगी कि उनकी जोड़ी की लोग मिसाल दिया करेंगे. पति-पत्नी के प्यार का एक नया इतिहास  लिखेंगे वे लोग. कभी ना उनके घर कोई बर्तन टूटेंगे ना कोई ऊँची आवाज़ सुनाई देगी. बस प्यार के सरगम पर ही उनके जीवन का संगीत गूंजेगा.

अभी बी.ए. का फाइनल इयर ही था कि पिता को दिल  का दौरा पड़ा और वे सबको रोता-बिलखता छोड़ चले गए. दुख का पहाड़ टूट पड़ा उसपर. पर अपना दुख भूल वो  माँ को संभालने में लग गयी. उसने सोच लिया....अब माँ उसकी जिम्मेदारी है. दोनों भैया महानगरों में रहते हैं...खुद ही दो कमरे का फ़्लैट है, उसमे माँ को कहाँ एडजस्ट कर पायेंगे. और हमेशा खुले मकान में रहनेवाली माँ , वहाँ रह पाएंगी? उसके फाइनल इम्तहान के बाद पिता जी का सरकारी क्वार्टर खाली कर देना पड़ा और वो माँ के साथ  अपने  पुश्तैनी मकान में आ गयी. उसने अपना भविष्य तय कर लिया था.. अब वह नौकरी करेगी और माँ की देखभाल करेगी. कभी शादी नहीं करेगी. माँ , अकेली नहीं रह सकती, महानगर में नहीं रह सकती...और बेटियों के साथ रहना तो वे कभी गवारा नहीं करेंगी इसलिए वो ही माँ के साथ रहेगी...आजीवन अविवाहित रहेगी...नौकरी करेगी...अपने लिखने- पढ़ने का शौक पूरा करेगी.अब अपनी कविताओं को गंभीरता से लेगी..पत्र-पत्रिकाओं में भेजेगी..अब उसकी दुनिया और मंजिल कुछ और ही होगी.

अक्सर शाम को बाहर बरामदे में बैठी वह कुछ लिखती पढ़ती  रहती..एकाध बार लगा,उसे गौर से कोई देख रहा है. नज़र उठा कर इधर-उधर देखा, कोई नज़र नहीं आया. पर तसल्ली नहीं हुई....एक दिन फिर उसे पीठ पर किसी की  चुभती नज़रों का आभास हुआ. एकदम से पलट कर देखा तो  दो घर छोड़, तीसरे घर के बरामदे के खम्भे की आड़ में कोई छुपता नज़र आया. वो एकदम से डर गयी और किताबें उठा...अंदर चली गयी. बाहर बैठ कर पढना-लिखना तो छोड़ ही दिया.
एक दिन छत पर सूखे कपड़े उठा रही थी कि  पड़ोस के दो बच्चे  रूमी और केशु भागते हुए सीढियां चढ़ते  हुए आए....उसे लगा जरूर कोइ पतंग कट  कर उसके छत पर गिरी है...और बड़े बच्चों ने इन दोनों को.दौड़ा दिया है लेने....इधर उधर नज़रें घूमा,पतंग ढूंढ ही रही थी कि खी खी करती रूमी पास आ गयी...और एक तह किया  हुआ कागज़ उसकी तरफ बढ़ा दिया.
उसने असमंजस में खोल कर देखा...लिखा था..."आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं " काँप गयी वह. रूमी की हंसती नज़रें उस पर जमी हुई थीं. सात साल की इत्ती सी लड़की पर सब समझ रही थी.

"किसने दिया तुम्हे?" जरा रोष से पूछा...तो वो सकपका गयी....और एक छत की तरफ इशारा कर दिया. देखा एक नौजवान छाती पर हाथ बांधे उसी की तरफ देख रहा है. चेहरा तो नहीं दिख रहा था...पर उसे लगा , जरूर मुस्कुरा रहा है.

उसने नीचे बैठ रूमी को कंधे से पकड़ा....और जोर से झकझोरते हुए बोली.."खबरदार जो फिर कभी कोई कागज़ लेकर आई...तुम्हारी माँ को बता दूंगी...और फिर वो कमरे में बंद कर देगी."

रूमी रुआंसी हो गयी, बोली..."राजीव भैया ने कहा, चॉकलेट दूंगा"...तो उस लड़के का नाम 'राजीव ' है.
केशु अब तक इन सब बातों से  बेखबर इधर उधर देख रहा था, चॉकलेट का नाम सुनते ही सजग हो गया.......रूमी का हाथ खींचते  हुए बोला..."चल,...भैया चॉकलेट देंगे "

"रुको..",.उसने जोर से कहा...और रूमी के हाथों में वापस वो कागज़ पकड़ा दिया..."ये अपने भैया को दे देना...और फिर कभी, कहीं कोई कागज़ लेकर नहीं जाना"

रूमी ने डर कर सर हिला दिया...पानी उतर आया था उसकी आँखों में. उसे  दया  आ  गयी ...पर  बच्चों  को  समझाना  भी  जरूरी  था....

दोनों बच्चे रुआंसे से चले गए....उन्हें लग गया था,अब चॉकलेट  नहीं मिलेगी .

***लेकिन वो अब क्या करे....बरामदे में बैठना छोड़ दिया...छत पर आना भी छोड़ना पड़ेगा. क्यूँ उसके पीछे पड़ा है...उसने तो कोई संकेत नहीं दिया...हो सकता है...आज के बाद कोशिश छोड़ दे.


फिर भी वो ज्यादातर कमरे के अंदर ही रहती. छत पर कपड़ा सुखाने जाने से भी बचती...कामवाली काकी से अनुनय करती.."आप ही डाल दो...ना....आप ही उठा लाओ ना" 

पहले तो माँ ने कुछ  गुस्सा किया..."कितनी आलसी हो गयी है...अब बहनों की शादी हो गयी है...तुझे काम करना पड़ेगा ना..रीता कैसे भाग-भाग कर काम किया करती थी...कल को ससुराल जाएगी...ऐसी आरामतलबी से कैसे काम चलेगा ??" 

फिर भी वो नहीं सुनती तो एक दिन माँ ने चिंता जताई...." इतना उदास क्यूँ रहती है...ना बरामदे में  में बैठती है...ना छत पर जाती है..सारा समय कमरे मे घुसी रहती है...बेटा, जानेवाला चला जाता है...पर पीछे जिन्हें छोड़ जता है..उन्हें जीना पड़ता है, ना ".....और माँ ने आँचल की कोर से आँसू पोंछ लिए..."मुझे देख..इतने दिनों का साथ....सुबह से शाम तक सारी जिंदगी तेरे बाबूजी के इर्द-गिर्द ही घूमती थी...पर समझौते किए ना...जी रही हूँ ना...तेरी तो सारी जिंदगी सामने है...ऐसे कैसे चलेगा बेटा..."

कैसा कैसा मन हो आया उसका...मन हुआ,सब बता दे माँ को....फिर लगा...माँ परेशान हो जाएँगी...तुरंत दीदी भैया लोगो को फोन खटका देंगी...और वे लोग कुछ कर तो पाएंगे नहीं...बस हंगामा हो जाएगा. उसे ही सामना करना होगा...माँ को बहला दिया.."माँ तुम भी ना..क्या-क्या सोच बैठती हो...बरामदे में और छत पर कितना डिस्टर्ब होता है...मुझे शान्ति से पढना अच्छा लगता है...तुम्हे मालूम है माँ..." 

एक दिन माँ पड़ोस में गयीं थीं....अचानक दरवाजे पर  खट खट हुई..निकल कर देखा तो एक लड़का खड़ा था...देखते ही  उसने एक लिफाफा बढाया, " पोस्टमैन गलती से आपकी चिठ्ठी हमारे यहाँ दे गया था..."

उसने लिफाफा ले उलट-पुलट कर देखा...कोई जानी-पहचानी लिखावट नहीं लग रही थी....'किसका हो सकता है?'...सोचते हुए पत्र खोला...वो लड़का धीरे -धीरे वापस लौट रहा था...पत्र खोलते ही काठ मार गया उसे.....ये तो उसी लड़के का ख़त था...उसने गुस्से से नज़रें उठाईं....लड़के को भी जैसे कुछ आभास हुआ....पीछे मुडा...मुस्कुरा कर झुक कर आदाब किया और चलता बना.

अंगारा बनी...गुस्से में जलती वो कमरे में आई.....इतनी हिम्मत......पत्र एक तरफ फेंक दिया....आँसू निकल आए उसके....आज उसके घर में कोई पुरुष नहीं है...इसीलिए इतना साहस कर लिया,उसने. 
फिर थोड़ी देर बाद....पत्र उठा कर पढ़ा....पत्र में कुछ अशिष्टता नहीं थी...बस इज़हार-ए-इश्क  था. वो उसकी तरफ  क्यूँ नहीं देखती...छत पर  क्यूँ नहीं आती...बरामदे में क्यूँ नहीं बैठती...वो उस से बेइंतहा  मुहब्बत  करता है..वगैरह..वगैरह....पत्र उसे कुछ बचकाना सा लगा...उसे पता चल गया था...वो नौकरी करता है...यहाँ अकेला रहता है...पर पत्र किसी किशोर उम्र के लड़के के लिखे सरीखा लगता था...अब पता नहीं....किताबे पढ़ने की आदत ने या...कंधे पर जिम्मेदारी के बोझ से  उसकी सोच बहुत परिपक्व हो चुकी थी. यह उसकी जिंदगी का पहला प्रेम पत्र था...पर उसे पत्र पाकर कोई ख़ुशी नहीं हुई. 

छत पर जाना छोड़ दिया...बाहर बैठना छोड़ दिया फिर भी, घर के सौ काम होते...और उसे ही करने थे...घर से बाहर जाना ही पड़ता. वो थोड़ी  डरी-सहमी सी ही रहती....पता नहीं कहाँ से उसकी आँखें  पीछा कर रही हों.  

एक दिन असमय ही बादल छा गए थे और अँधेरा सा छा गया था...वो सब्जी लेकर तेज़-तेज़ कदमो से घर लौट रही थी..घर के सामनेवाली गली एकदम सूनी हो गयी थी. आंधी-बारिश के डर से सब घर के अंदर चले गए थे...वो भी जल्द से जल्द  घर पहुंचना चाहती थी...अचानक से एक आवाज़ आई .."सुनिए.."...काँप गयी वह. कदम धरती से चिपक गए और नज़रें कदमो से. सामने वही राजीव  खड़ा था और पूछ  रहा था, "आप क्या नाराज़ हैं, मुझसे  ??" 

 यूँ रास्ते पर एक अजनबी लड़के से बातें करते कंपकंपी सी छूट रही थी  पर उसे दिखाना था...वो डरती नहीं.."एकदम से सर उठा कर सीधा उसकी तरफ देखकर बोली..." नहीं...क्यूँ??"

"वो..आपने पत्र का कोई जबाब भी नहीं दिया...और अब आप बरामदे में बैठकर  पढ़ती भी नहीं....छत पर भी नहीं आतीं "

"वैसे ही...लेकिन आपको इस से क्या मतलब..मेरा घर है.....मैं कहीं भी पढूं.." उसने थोड़ा गुस्सा दिखाया और तेजी से आगे बढ़ गयी. पत्र की बात को बिलकुल ही नज़रंदाज़ कर दिया. अब अक्सर,वह उसे अपने गेट के सामने से गुजरते देखती. उसकी नज़रें , उसके घर पर ही टिकी होतीं. . वो बेहद डर गयी थी....लोग कहीं कुछ बातें ना बनाने लगें. 

एक दिन फिर से रास्ते में मिला और नम्रता से बोला..." मुझे गलत मत समझिए...मैं आपको पसंद करता हूँ...और आपसे शादी करना चाहता हूँ..." 

"लेकिन मेरा शादी करने का कोई इरादा नहीं है..."

"क्यूँ...आप इसलिए इनकार कर रही हैं क्यूँ कि मैं एक क्लर्क हूँ?"

"ऐसी बात नहीं...मुझे शादी ही नहीं करनी...और प्लीज़ मुझसे ऐसे रास्ते में बाते मत कीजिए...लोग पता नहीं क्या समझेंगे.."

"आप, हाँ कर दीजिये....फिर डर की कोई बात नहीं.."

"नहीं..मुझे शादी नहीं करनी.." कहती वो फिर आगे बढ़ गयी...पर बहुत परेशान   हो गयी. क्या करे...किस से कहे?  माँ सुनकर एकदम परेशान हो जाएँगी.  वैसे ही बाबूजी के जाने के बाद एकदम टूट सी गयी हैं. कभी घर के बाहर कदम नहीं रखा...बाहर का कुछ नहीं जाना. सिर्फ घर सम्भाला...अब भी वो कोशिश करती,माँ को कुछ महसूस ना हो.

एक बार गेट से बाहर निकली ही थी कि पता नहीं,कहाँ से सामने आ गया और कहने लगा..." आपके भाई लोग अफसर हैं...और मैं क्लर्क हूँ ...इसीलिए आप ना कर रही हैं, ना ..."

"ऐसा बिलकुल नहीं है...मुझे सचमुच शादी नहीं करनी...."

"तो क्या मैं देखने में अच्छा नहीं हूँ...आप इतनी ख़ूबसूरत हैं..इसलिए आपको लगता है..मैं आपके लायक नही..."

"ऐसी कोई बात नहीं...मेरा लक्ष्य अलग है...मैं नौकरी करुँगी....माँ की देखभाल करुँगी...आप प्लीज़ मेरा पीछा मत कीजिए " कहती वो वापस गेट से अंदर आ गयी...नहीं जाना उसे बाहर....नहीं लाएगी सब्जी..दाल रोटी खा लेंगी माँ-बेटी. अब वो सुबह सुबह ही सारे काम निबटा लेगी...जब वो ऑफिस में हो...मिलने का अवसर ही नहीं मिलेगा.
(क्रमशः )

Friday, January 20, 2012

बंद दरवाजों का सच (समापन किस्त )



"नीलिमा..तुम मेरी बेटी जैसी हो....मैं तुम्हे बिलकुल ही गलत नहीं समझ रही....इन हालातो में ऐसा हो सकता है...मुझे ही देखो...आज पहला दिन है...बेटे -बहू का फोन भी आ चुका है..पति से भी बात हो चुकी है...पर इतना अकेलापन था....ये कुछ घंटे भी काटना मुश्किल लग रहा था ....तुमने तो महीने काटे हैं ऐसे....मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम खुलकर अपने मन की बात मुझसे कहोगी....किसी के कुछ काम आ सकी ये ख़ुशी तो होगी. 

"आंटी आप किसी से ये सब कहेंगी तो नहीं ना..अपनी बहू से...प्लीज़ आंटी..." उसके आवाज़ से डर छलक छलक पड़ रहा था 
"नहीं बेटा....इत्मीनान रखो...मैं किसी से कुछ नहीं कहने वाली.." मैं उठकर उसके पास सोफे पर बैठ गयी....उसे भी लग रहा था, वह संकट की घड़ी में अचानक मेरे पास चली आई..तो सारी बातें बताना उसका फ़र्ज़ है. थोड़ी देर रुक कर... जैसे खुद को ही समझाकर  उसने फिर कहना शुरू किया.

एक दिन मैं गुड़िया को स्कूल बस में चढ़ाकर वापस लौट ही रही थी कि एक आवाज़ आई..'एक मिनट सुनिए.."
मुड कर देखा...वो लड़का ही था, हलके से मुस्कुरा कर आँखें झुका कर जैसे नमस्ते की उसने और बोला.."आपके पास ठंढे पानी की बॉटल है क्या...यहाँ दुकान में ठंढा पानी है ही नहीं.."
मेरी समझ में नहीं आया क्या बोलूँ....पर एकदम से झूठ नहीं कहा गया मुझसे...और मैने कह दिया.."हाँ... है.."
वो मेरे बिना कुछ कहे ही मेरे साथ चलने लगा...इधर-उधर की बातें करता रहा.."अच्छी बिल्डिंग है...साफ़-सफाई है..यहाँ...अच्छा मेंटेन किया है..." 
मैने कुछ भी नहीं बोला......फिर लिफ्ट में अपने बारे में बताने लगा..'वो क्या है ना.....अकेला रहता हूँ...फ्रिज नहीं रखा  मैने...जब ठंढा पानी पीना हो...दुकान से ले लेता हूँ...आज उनके पास थी ही नहीं...और जैसे मेरा गला सूख रहा था...सोचा,आपसे मांग लूँ...आपको बुरा तो नहीं लगा.." 
.मैने ना में सर हिलाया...अब भी मुझसे कुछ कहते नहीं बन रहा था....मैने कमरे का दरवाज़ा खोला...वो बाहर ही खड़ा रहा ..जेब में हाथ डाले...इधर-उधर देखता रहा...जब मैने बॉटल पकडाई तो बोला.."मैं आज शाम को बॉटल लौट दूंगा.."
मैने  घबरा कर कहा.."नहीं..नहीं...आप इसे रख लीजिये...बहुत सारी बॉटल है मेरे पास..." मैं नहीं चाहती थी ,उसे दुबारा आने का बहाना मिले...और वो भी जैसे भांप गया,एक चौड़ी मुस्कान के साथ बोला..."ओके ...थैंक्यू..."..और लिफ्ट का बटन दबा दिया उसने. मैने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया...डर से मन ही मन काँप गयी थी मैं...ये मेरी जिंदगी में पहला मौका था...जब मैने ऐसे अकेले में किसी अजनबी लड़के से बात की थी

जल्दी से मैने परदे खींच दिए. एक दो दिन मैं खिड़की के पास गयी ही नहीं...मैने गौर किया था...वो शाम को चला जाता था...पता नहीं गए रात को या शायद सुबह लौटता और ग्यारह-बारह बजे तक सोता रहता था. मैं सुबह ही समय निकाल कर कपड़े डाल देती...और शाम ढलने के बाद निकालती. पर कितने दिन??..फिर वही वापस रूटीन शुरू हो गया...अब वह सामने दिख जाता  तो मुस्कुरा भी देता....पर मुझे डर  लगता और मैं वहाँ से हट जाती. ...हालांकि मन को समझाती कि  ' मैं एक बच्ची की माँ हूँ....कोई छोटी लड़की थोड़े ही हूँ...जो डर रही हूँ.' दसेक दिन बीत गए...बस वही...जब कभी सामने दिख जाता, एक मुस्कान उसके चेहरे को छो कर निकल जाती  और एक दिन फिर वही बारह बजे मिला...सीधा ही मुस्कुरा कर पूछा.."हलो..कैसी हैं आप."

"ठीक हूँ.." मेरे मुहँ से इतना ही निकला. शायद फिर से पानी की बॉटल मांगेगा .यही सोच रही थी कि बोला..."आज फिर आपको तंग करने वाला हूँ...बहुत तेज सरदर्द हो रहा है...शायद थोड़ा बुखार भी  है....कोई दवा है क्या...मेडिकल शॉप तक जाने की हिम्मत  ही  नहीं हो रही...यहाँ किसी को जानता नहीं....बस एक आपको चेहरे से पहचानता हूँ...सोचा आपसे ही पूछ लूँ.." 
मैने आँखें उठा कर देखा ..उसके चहरे पर सचमुच दर्द था...आँखें लाल लग रही थीं..फिर मुझसे झूठ नहीं बोला गया..."हाँ.. है..आइये देती हूँ.."

शायद सचमुच उसके सर में बहुत दर्द था..वो रास्ते में कुछ नहीं बोला...लिफ्ट में भी चुप रहा..दरवाजे के बाहर कपाल को हथेलियों से दबाता खड़ा था...और फिर मैने कुछ नहीं सोचा..उसे अंदर बुला लिया...उसने कहा भी..."नहीं.. ठीक हूँ..."
"आ जाइए दो मिनट...कोई बात नहीं...बैठिये.."
वो आकर बैठ गया...मैने दवा और एक ग्लास पानी पकडाया..फिर एकदम से ध्यान आया...उसने कुछ खाया है या नहीं...खाली पेट दवा नहीं खानी चाहिए. पूछा..तो उसने 'ना' में सर हिला दिया और बोला..."कोई बात नहीं..आप बस दवा दे दीजिये."
 पर मैने जिंदगी में आजतक किसी को खाली पेट दवा खाते देखा भी नहीं..घंटो गुड़िया को मनुहार करती हूँ...एक से एक वो फरमाइश करती है...सब पूरा करती हूँ...तभी दवा देती हूँ....सास और माँ के बीमार होने पर भी...जबरदस्ती उन्हें कुछ खिलाकर ही दवा देती थी..इसे ऐसे कैसे खाने दूँ...और मैने सख्ती से कहा..."नहीं...बिस्किट लाती हूँ..बिस्किट खा कर ही दवा लीजियेगा. "

मैं बिस्किट ले आई...उसने बड़े संकोच से एक बिस्किट उठाया..और खा कर दवा खा ली...उसे इस  हालत  में देखकर मेरा सारा संकोच, सारा डर उड़नछू हो गया था और लग रहा था..किसी भी तरह इसे आराम आ जाए. और मैने चाय के लिए पूछ लिया....वो ना कहता हुआ उठ खड़ा  हुआ...पर मैने ही जबरदस्ती की...'दो मिनट में बन जायेगी..पी लीजिये....अच्छा लगेगा " 
वो संकोच से भर उठा.."आप रहने  दीजिये....दवा से आराम आ जायेगा.."

"आप बैठिये....मैं बनाती हूँ.." कहती मैं किचन में चली गयी....चाय लेकर आई तो ऐसे लगा ही नहीं..मैं किसी अजनबी के सामने बैठी हूँ....शायद महीनो से उसका चेहरा देखते रहने के आदी मन ने उसे अपरिचित मानने से इंकार  कर दिया था. 
जिस लड़के से मैं इतना संकोच करती थी...पर्दा खींच दिया करती थी....बातचीत की शुरुआत मैने ही की...और कुछ ही मिनटों  में उसने सब बता दिया...'वो एक कॉल सेंटर में काम करता है...अकेला रहता है.....खाना-पीना बाहर ही खाता है..चाय तक नहीं बनाता'. और मैं उसे किसी पुराने परिचित की तरह सलाह देने लगी...'कम से कम एक हीटर ही रख लीजिये...चाय तो बन सकती है.....कभी मैगी भी बना सकते हैं.."
"वो तो रख लूँ...पर बर्तन भी तो धोना पड़ेगा..फिर चाय के लिए दूध लाओ ..उबालो..वो कहाँ रखो...ये सब झंझट मुझसे नहीं हो पाता "
"हाँ...कभी जिंदगी में किया नहीं होगा ना...घर पर तो राजशाही ठाठ होगी..सबकुछ हाथों में मिलता होगा....." जैसे मैं अपने किसी कजिन को डांट रही थी..
 वो मुस्कुरा कर चुप हो गया...जैसे घर  की यादों में खो गया हो..फिर थोड़ी देर बाद बोला.."सच कहा आपने..एक छोटी बहन है.. ऋचा. ..बहुत ख्याल रखती थी..बिना कहे सब कुछ हाज़िर...कभी-कभी तो मन होता है सब कुछ छोड़कर चला जाऊं...बहुत मिस करता हूँ...सबको..माँ .पापा.. ऋचा .." और अचानक चुप हो गया..लगा जैसे आगे बोलेगा तो गला रुंध जाएगा...या फिर आँखों में पानी आ जायेगा...मैं समझ सकती थी बीमारी में घर बड़े जोरों से याद आता है....मेरी शादी को छः साल हो गए...सासू माँ बहुत अच्छी हैं फिर भी जरा सा बुखार भी आए तो माँ याद आती थी...मैं भी चुप रही.
चाय के बाकी घूँट उसने ख़ामोशी में ही भरे और कप रखकर  खड़ा हो गया..."थैंक्स तो बहुत छोटा सा शब्द है...आपने दवा भी दी..और चाय भी पिलाई...अभी से ही बेटर फील कर रहा हूँ...डोंट हैव एनफ वर्ड्स टु  थैंक यू.....रियली आई मीन इट "

उसके जाने के बाद मन जाने कैसा हल्का-फुल्का हो आया...एक ख़ुशी सी तारी थी...बड़े दिनों बाद इस दैनंदिन एकरसता से अलग कुछ किया था. किसी के काम आई थी...किसी की छोटी सी मदद की थी या फिर बस रूटीन से कुछ अलग किया था...पता नहीं किस बात का संतोष था...पर मैने बड़े मन से साफ़-सफाई की..घर की सजावट बदली...हालांकि सजावट भी क्या बदलनी...बस इधर की चीज़ें उधर कर दो हो गया बदलाव..फ़्लैट में जगह ही कहाँ होती है...हर चीज़ की जगह फिक्स्ड है. बड़े शौक से आलू-पराठे बनाए...'वरना रोज़ दाल-सब्जी रोटी बना कर रख देती थी. कभी नरेश शिकायत भी करते तो कह देती....'इतनी  आरामदायक  लाइफस्टाइल  है, आपकी.. कोई वाक नहीं...एक्सरसाइज़ नहीं..सादा खाना ही ठीक है.' नरेश ने भी शायद अतिरिक्त उत्साह को लक्ष्य किया...एकाध बार मेरी तरफ देखा..पर फिर रिमोट उठा कर चैनल बदलने लगे. मेरे मन में उहा-पोह थी..नरेश को बताऊँ या नहीं...पता नहीं शायद डांट दें...पर आजतक कभी कुछ छुपाया भी नहीं...और मैंने सोचा ,'बता देती हूँ..एक बीमार की मदद की है...अगर डांट भी खाई तो किसी अच्छे काम के लिए "
सोफे पर बैठ कुशन गोद में रख लिया..'सोच ही रही थी कैसे शुरू करूँ कि नरेश का मोबाइल बज उठा...इतना गुस्सा आया...हर बार यही होता है...कुछ भी कहने जाती हूँ और मोबाइल पहले उन्हें अपनी तरफ खींच लेता है...और मैं गुस्से में कुशन फेंक उठ गयी ..गुडिया पर चिल्लाने लगी..'चलो सो जाओ अब..उठने में देर करोगी.." नरेश के चेहरे पर गुस्सा झलक उठा इशारे में कहा.."बात कर रहा हूँ न' और कमरा जोर से बंद कर लिया...

दूसरे दिन मैं बार-बार खिड़की से झांकती आखिर एक बजे के करीब वह नज़र आया...इस बार मुझे उसकी तरफ सीधा देखने में कोई झिझक नहीं हुई. मैने ही हाथ के इशारे से पूछा.."कैसा है अब?"
उसने आँखें बंद कर सर हिलाया..'बिलकुल ठीक..." 
अगर जरा जोर से पूछती तो उस तक आवाज़ जरूर चली जाती पर पता नहीं कितने कानो से होकर गुजरती. थोड़ी देर टेरेस पर टहल कर वह चला गया. मैं भी अपने काम में लग गयी...अब वो लुका-छिपी का खेल बंद हो गया था. दूसरे दिन वह नीचे बस स्टॉप पर फिर मिला और थोड़ा झिझका हुआ था...पहले दिन वाली  आत्मविश्वास से भरी मुस्कराहट मिसिंग थी. गुड़िया की बस जाते ही पास आकर बोला..."आपको शुक्रिया कहना चाहता था...बहुत फायदा हुआ उस दवा से...और हाँ चाय से भी.."
"थैंक्स तो आपने उस दिन ही कह दिया था.."
"हाँ....उस दिन का थैंक्स दवा देने के लिए...और आज का थैंक्स असर करने वाली दवा देने के लिए.." मुस्कुरा रहा था वह.
"अरे..तो अगर दवा असर नहीं करती तो थैंक्स कैंसल.." बड़े दिनों बाद या शायद इस शहर में पहली बार मैं इतना चहक कर बात कर रही थी....
उसने भी शैतानी से कहा...."पता नहीं..."
और मैं जोर से हंस पड़ी...उसने भी साथ दिया...अपनी हंसी की आवाज़ ही बेगानी सी लगी....कितने दिनों बाद मैं खुलकर हंसी थी..."चलिए अपना ख्याल रखिए...." कहती मैं आगे बढ़ गयी....मन तो हो रहा था..फिर से चाय के लिए बुला लूँ...और खूब गप्पे मारूँ...पर इतनी हिम्मत नहीं थी. 
"श्योर मैम एन थैंक्स अगेन.."
उसके फिर से थैंक्स कहने पर गुस्से में  देखा उसे तो वह खिसियानी सी हंसी हंस दिया.

अभी भी वो टेरेस पर नज़र आता...कपड़े उठाते डालते दिख जाता .मैं  मुस्कुरा देती....प्रत्युत्तर में वो भी मुस्कुरा देता...बस. 
और एक सप्ताह भी नहीं गुजरे...कि एक दिन फिर से दिखा.... "हलो..कैसी हैं?"
"ठीक...और आप.."
"ठीsssक  ही हूँ मैं भी"....उसने ठीssक  को लम्बा खींचते हुए कहा....और बोला..'बिटिया बड़ी प्यारी है....क्या नाम है उसका...?" 
"मेघना...घर में उसे गुड़िया बुलाते हैं..."
"है भी बिलकुल गुड़िया सी....अच्छा टाइम पास हो जाता होगा..आपका....देखता हूँ...बहुत चंचल है.."
"हाँ....बहुत शैतान  है...पर स्कूल चली जाती है तो पूरा दिन काटना मुश्किल हो जाता है....बोर हो जाती हूँ,बिलकुल.."
"हम्म....मैं भी बहुत बोर हो रहा था.....पर आप एक बात बताइए...सिर्फ सरदर्द होने पर ही आप चाय पिलाती हैं. '
मैं  मुस्कुरा उठी...पर एकदम से हाँ  नहीं कह सकी....दिल कह रहा था...'हाँ' कह दो..दिमाग कह रहा था..'क्या जरूरत है?' पर इस रस्साकस्सी में जीता दिल ही...'हम्म तो चाय पीनी है आपको.."
'अदरक इलायची डली....पर अगर आप अनकम्फर्टेबल हैं... तो  रहने दीजिये.."
"नहीं..नहीं...कोई बात नहीं...आइये "
कहते मैं आगे तो बढ़ गयी...पर दिमाग कोंचे जा रहा था...'क्या जरूरत थी...मैं उसे जानती ही कितना हूँ....ये ठीक  है क्या'...और दिल उसे बराबर जबाब दिए  जा रहा था...'इसमें गलत भी क्या है....पिछले छः महीने से रोज ही तो दिखता है....घर पर भी आ चुका है...क्या इतना चेहरा नहीं पढ़ सकती...बदमाश तो नहीं दिखता...एक कप चाय पी लेगा...कोई बात करने वाला मिल जाएगा...थोड़ा समय काट जाएगा...इसमें बुराई क्या है..."

मुझे यूँ चुप देख वो बोल पड़ा..."आप रहने दीजिये...लगता है आप कम्फर्टेबल नहीं हैं....वैसे भी एक अजनबी को ऐसे घर में नहीं आने देना चाहिए...बट थैंक्स.. हाँ कहने के लिए....चलता हूँ..."
"आप अजनबी नहीं हैं...और थैंक्स चाय पी कर ही दीजियेगा..." मैने एक निश्चय के साथ कहा.... मन की दुविधा हट चुकी थी.
चाय बनाने गयी तो मन हुआ ब्रेड रौल भी सेंक दूँ....अकेला रहता है..उसे कहाँ मिलता होगा...अभी तो सो कर उठा  है...कुछ खाया भी नहीं होगा...गुड़िया को टिफिन में बना कर दिया था सब कुछ सामने ही पड़ा था पर फिर रुक गयी...उसे कहीं ऐसा ना लगे ज्यादा ही स्वागत कर रही हूँ..और प्लेट  में बस बिस्किट डाल कर ले गयी.

चाय की चुस्कियों के साथ जो बात शुरू हुई..पूरे दो घंटे चली...और मैने उसके बारे में सब जान लिया....ग्रेजुएशन के बाद वो कॉल सेंटर में जॉब करके एम.बी.ए. करने के लिए पैसे जमा कर रहा है. उसके घर में माता-पिता और एक छोटी बहन है. बहन को लेकर बहुत अरमान हैं उसके. माता-पिता को भी जिंदगी के सारे सुख देना चाहता है...खुद भी बड़ा आदमी बनान चाहता है..मेहनत करना चाहता है. यहाँ बिलकुल अकेला है...जानबूझकर ज्यादा दोस्ती भी नहीं करता ..ऑफिस से हर वीकेंड लड़के घूमने-घामने फिल्मे देखने..पिकनिक-पार्टी  का प्लान बनाते हैं..पर यह पैसे बचाने के लिए अक्सर कन्नी काट जाता है.
 बातों बातों में मेरे बारे में  भी उसे काफी कुछ पता चल ही गया कि मायके और ससुराल एक ही शहर में है. शादी के बाद अब तक सास-ससुर के साथ ही थी .अपनी हथेली की रेखाओं की तरह जाना-पहचाना अपना शहर...जहाँ बचपन से अब तक का समय गुजारा...इस बड़े शहर के तौर-तरीके समझ नहीं पा रही थी. 
 उसने आश्वस्त भी किया..."बहुत जल्दी ये शहर भी अपना लगने लगेगा..इस शहर की खासियत है...लोग इसे अपनाएँ या नहीं...यह लोगों को बड़ी जल्दी अपना लेता है. 
"आsss मीन ."
'अरे वाह!
 बड़े दिनों बाद किसी के मुहँ से ये शब्द सुना..."
"मैने भी बड़े दिनों बाद ये शब्द कहा है...." कहते एक उदासी सी तिर  आई आवाज़ में ...उसने भी लक्ष्य किया....थोड़ी देर चुप रहा...फिर बोला..."आप दिन में काफी अकेलापन महसूस करती हैं ना....देखता हूँ...आप कहीं आती -जाती नहीं...सर तो सिर्फ सन्डे को ही दिखते हैं...."
"हाँ..कहाँ जाऊं....आस-पास सब जॉब वाली हैं....और किसी से कोई परिचय नहीं....बस सब्जी लेने जाती हूँ.." चाह कर भी मैं उदासी झटक नहीं पा रही थी...स्वर से..
उसने हँसते हुए कहा..."अगर आप ऐसी ही बढ़िया चाय पिलाती रहें तो मैं कभी-कभी गप्पे लगाने आ सकता हूँ...पर इत्मीनान रखिए रोज नहीं धमकुंगा ."
'आपसे सच में बात करके बहुत अच्छा लगा..." मैने सारा संकोच परे रख कर कह डाला. 
वो मुस्कुरा कर चुप हो गया और बोला..."मुझे भी याद नहीं जमाने के बाद किसी से यूँ खुलकर बातें की हैं...पर अब मुझे जाना होगा....कपड़े साफ़ करने हैं...शाम को ऑफिस की तैयारी करनी है. एन थैंक्स अलॉट..चाय सचमुच बहुत बढ़िया थी..आपको अगर बुरा ना लगे तो मेरा नंबर ले लीजिये....जब भी आपका दिल करे आप एक कॉल कर लीजिये...दिन में तो मैं फ्री ही रहता हूँ...बातें भी हो जायेंगी...और आपको चाय भी नहीं पिलानी पड़ेगी.." 
"आप मुझे इतना कंजूस समझते हैं... "मैने नकली गुस्से से कहा 
"जस्ट जोकिंग बाबा..." उसने जेब से पेन निकाला और एक लौंड्री के बिल पर अपना नंबर लिख कर पकड़ा दिया...नाम लिखा था..'रोहित' 
अब जाकर मुझे ध्यान आया मैं एकदम से माथे से हाथ लगा कर बोल पड़ी..."हे भगवान....मैंने अब तक आपका  नाम तक नहीं पूछा था..."
"ना तो मेरा नाम जानती हैं आप, ना पता....और घर बुलाकर चाय पिला दिया...सोच लीजिये कहीं मैं कोई चोर डाकू निकला तो.." शरारत झलक रही थी उसके स्वर में...मुझे गुस्सा आ गया...जोर से बोली 
"एक्सक्यूज़ मी...मैने आपको नहीं बुलाया था...आप खुद आए थे...और इतना मुझे लोगों की पहचान है.."
उसने मुस्कुरा कर बोला.."सच में..."
उसकी ये मुस्कान मुझे असहज कर गयी....मुझे चुप देख वो सीरियस हो गया और  बोला..." दुनिया में इंसानियत भी कोई चीज़ होती है.....और शायद वही असली पहचान है......जी ' हाथ घुमा कर उसने मेरा नाम पूछा....
'नीलिमा..."
"नीलिमा जी..अपना ख्याल रखें....और जब भी चाहे मुझसे बात कर सकती हैं....फिर थोड़ा रुक कर बोला.."मुझे अच्छा लगेगा ..बाय.."
"बाय..." और वह चला गया.

मैने तुरंत ही उसका नंबर सेव कर लिया....रोज ही स्क्रीन पर नंबर निकाल कर घूरती रहती...और एक दिन नंबर मिला ही दिया...उसकी 'हलो'  सुनते ही घबरा कर फोन रख दिया...
दो मिनट बाद ही फिर उसका कॉल आया...जब मैने अपना नाम बताया तो  चौंक गया...ओह!! ..आss प ..गलती से तो नहीं लग गया...क्यूंकि आपने तुरंत काट दिया था फोन.."
"नहीं अपने आप कट गया था.."
"ओके..क्या कर रही हैं..."
और फिर बातों का सिलसिला चल निकाला...करीब आधे घंटे तक बातें हुईं...फिर मैने फोन रख दिया...

दूसरे दिन साढ़े बारह के करीब एक स्माइली के साथ गुड़ मॉर्निंग का उसका एस.एम.एस आया....और फिर तो यह रूटीन ही हो गया...वो रोज दोपहर में  एक एस.एम.एस करके जता देता कि जाग गया है...फिर कभी मैं फोन कर लेती...कभी वो...कभी-कभी वो मेरा फोन नहीं उठाता और तुरंत ही कॉल बैक करता...मैं समझ जाती सोचता है..सिर्फ मेरे ही पैसे क्यूँ खर्च हों....फिर ये रोज का ही सिलसिला हो गया. रोज फोन करके वो अपनी पूरी बात बताता....उसके बॉस...उसके फ्रेंड्स... साथ काम करने वाली लडकियाँ....सबको मैं जान गयी थी. एक नई दुनिया सी खुल रही थी मेरे सामने...ऑफिस की ऐसी -ऐसी बातें बताता कि मैं दंग रह जाती. लड़कियों का यूँ खुलेआम सिगरेट-शराब पीना मेरे लिए नई बात थी. लिव-इन  रिलेशन के बारे में मैने सिर्फ सुना भर था..उसके ऑफिस के दो कुलीग लिव-इन-रिलेशन में थे. 

मैं भी...गुड़िया का खांसी-जुकाम....उसकी पढ़ाई...स्कूल टेस्ट...प्रोजेक्ट वर्क...सबकी चिंता उसी के साथ बांटती...कभी-कभी नरेश की शिकायत भी कर देती....कि जरा भी ध्यान नहीं देते घर की तरफ .. तो मुझे समझाता...'आपको नहीं पता...इस शहर में ऐसे कम्पीटीशन के युग में सर्वाईव करना कितना मुश्किल है...सर को काम का प्रेशर रहता है...ऑफिस की टेंशन..फिर आप पर उन्हें भरोसा भी है कि आप सब संभाल लेंगी..." 
कभी कभी तो मैं कह भी देती.."तुम उनके दोस्त हो या मेरे...??" 
"दोस्त तो आपका ही हूँ...इसीलिए आपको दुखी नहीं देख सकता...."
उसका इतना कहना मुझे अंदर तक भिगा जाता. इसके पहले कभी किसी ने मेरा इतना ख्याल नहीं रखा था. मेरे सुख-दुख की नहीं सोची थी...मेरी बातें इतनी ध्यान से नहीं सुनी थीं...ना ही अपने जीवन की हर छोटी बड़ी बात शेयर की थी. 
कब आप से तुम पर अ आगई थी..पता ही नहीं चला...उसके लिए आप मेरी जुबान पर चढ़ता ही नहीं..."
अब वो घर पर नहीं आता..हमारी बात फोन पर ही होती. 

गुड़िया कब से पानी-पूरी बनाने की जिद कर रही थी. अक्सर कहती 'हेतल'  की मम्मी हमेशा बनाती है..तुम नहीं बनाती...पर उनलोगों का तो वो रात का डिनर ही हो जाता  . नरेश को ये चाट-पानी पूरी जैसी खट्टी चीज़ीं पसंद नहीं थीं. और गुड़िया तो बस दो-चार ही खाएगी. इतना ताम-झाम करो और फिर रात का पूरा खाना भी बनाओ....इतना झंझट करने का मेरा मन नहीं होता,पर गुड़िया की फरमाइश कब तक टालती. बनाना ही पड़ा. नरेश ने बड़ी मुश्किल से अहसान करके पाँच पानी-पूरी खाई बस...सारा बच गया और मैने रोहित को दूसरे दिन बुला लिया. रोहित ने इतने पसंद से खाया और इतनी तारीफ़ की कि मेरा बनाना सार्थक हो गया. इसके बाद तो कोई भी अच्छी चीज़ बनाती तो रोहित के लिए रख देती....

वो थोड़ी ना-नुकुर भी करता आने में पर जो भी दो बड़े पसंद से खाता और कहता.."आप मेरी आदतें बिगाड़ रही हैं"
"शादी के बाद अपनी बीवी से अच्छी अच्छी चीज़ें बनवा कर खिलाना....हिसाब बराबर हो जायेगा "
वो संजीदा हो जाता.."पता नहीं....कैसी लड़की मिले....डर लगता है कभी-कभी..अगर ना निभे तो.."
"तुम कोई नई बात नहीं कह रहे...सब लड़के शुरू में ऐसे ही डरते हैं....और शादी के बाद बीवी के पालतू बन जाते हैं.."
"एक्सपीरियंस बोल रहा है..." वो मजाक करता..
"हमारी बात छोडो..हमारा जमाना अलग था.."
"आप एक मिनट में छलांग लगा कर दादी माँ का लबादा ओढ़ लेती हैं...जैसे सौ साल बड़ी हैं मुझसे.."
'बड़ी तो हूँ ही..."
"आपकी जल्दी शादी हो गयी...बच्ची आ गयी इसीलिए??...मेरी हमउम्र ही होंगी आप..."
"हाँ, मेरी शादी हो गयी है.... एक बच्ची है...मैं तुमसे बड़ी हूँ...बस  बात ख़तम...." एक-एक शब्द पर जोर देते हुए मैने झूठे रोष से कहा तो वो एकदम से हंस पड़ा...
"'आप एक मिनट में दादी माँ से छोटी सी बच्ची भी बन जाती हैं..."
मन हुआ कुछ उठा कर कुछ दे मारूँ...पर ध्यान आया उसके हाथ में खीर की कटोरी है...गिर जायेगी  और फिर मुझे ही साफ़ करना पड़ेगा.

ऐसी ही बेमतलब की बातों में समय गुजर जाता...अगर पलट कर याद करना चाहो तो याद भी ना आए..क्या बातें की थीं...
"एक दिन उसका फोन आया.."मुझे आपकी मदद चाहिए....प्लीज़ ना मत कहियेगा.."
"काम तो बोलो.."
"नहीं.. पहले आप हाँ कहिए..."
"हाँ बाबा...बोलो तो सही..." और मुझे पता नहीं था..किस बात के लिए मैने हाँ कह दी थी...रोहित का कोई दोस्त उसके शहर जा रहा था और रोहित उसके हाथ से ऋचा के लिए ड्रेस और माँ के लिए साड़ी भेजना चाहता था...खरीदने में मेरी मदद चाहिए थी उसे. मैं एकदम सकते में आ गयी. फोन पर बात करना...कभी-कभार उसका घर आ जाना अलग बात थी...पर साथ में बाज़ार जाना...उसकी ये जिद स्वीकार करना मुश्किल हो रहा था...और वो था कि मान नहीं रहा था..
."आपकी  हेल्प के बगैर नहीं खरीद  पाऊंगा..ऋचा  कितनी खुश हो जाएगी..प्लीज़ बस घंटे भर के लिए...समय निकालिए...अभी तो दो ही बजे हँ...गुड़िया तो छः बजे आएगी..कुल चार घन्टे हैं...प्लीज़..प्लीज़ ....यहीं  से मुझे ऋचा का खुश खुश  चेहरा दिख रहा है...महल्ले  भर को दिखाती फिरेगी..और इतरा कर कहेगी 'मेरे भैया ने भेजा है '

अब मेरे लिए मना करना मुश्किल हो गया. मैने भी कई पहलू से सोचा..'जाने में कोई हर्ज़ तो नहीं...यहाँ कोई मुझे पहचानता भी नहीं...जो रोहित के साथ देख कर उल्टा-सीधा सोचे. फिर मेरा भी फायदा है...खुद के लिए भी कुछ ले लूंगी...आजकल मॉल्स में जाना हो ही नहीं पाता. 
और मैं पास के एक मॉल में रोहित के साथ चली गयी . ऋचा के लिए जींस सेलेक्ट करते समय अचानक रोहित ने कहा.."आप भी क्यूँ नहीं अपने लिए एक जींस ले लेतीं.."
"ना बाबा...मैने तो शादी के  बाद से कभी पहना ही नहीं.."
"तो अब पहन लीजिये...यहाँ कौन से आपके ससुराल वाले हैं.."
"नरेश को भी पसंद नहीं.." मैने बात टालनी चाहिए पर वो पीछे ही पड़ गया...
"आपने जब कभी पहना ही नहीं...तो आपको कैसे पता..उन्हें नहीं पसंद....ऑफिस से आएँ तो उन्हें सरप्राइज़ कर दीजियेगा...जींस-टॉप में दरवाज़ा खोल कर...एकदम रानी मुखर्जी की तरह,...वो फिल्म याद है..'कभी अलविदा ना कहना " 
मुझे हंसी आ गयी....पर वो जान छोड़ने वाला नहीं था..."रानी मुखर्जी ने दरवाज़ा खोला तो उसके ससुर जी सामने थे...आपका तो यहाँ कोई नहीं...इसलिए नो खतरा..अब बस एक लीजिये...और ट्राई कर के देखिए "..
"रोहित, यहाँ तुम ऋचा और माँ के लिए कपड़े लेने आए हो ना..."
" हाँ..तो ऐसा नियम है क्या कि दूसरों के लिए नहीं लिया जा सकता...?"
उस से बहस  ही बेकार थी...चुप ही रही...ऋचा के लिए जींस और टॉप देखते रहे हम...मुझे लगा...बात आई-गयी हो गयी...पर उनमे से ही एक  जींस और टॉप सेलेक्ट कर उसने मुझे पकड़ा दी..."जाइए ट्रायल रूम में ट्राई कर के देखिए "
"रोहित ..प्लीss ज़ .."
"ट्रायल रूम उस तरफ है...और हाँ मुझे भी दिखा लीजियेगा...नहीं अच्छा लगेगा तो बता दूंगा..वरना बेकार में आपके पैसे बर्बाद होंगे ." .मुझे बता कर वो फिर हैंगर में लगे कपड़े देखने लगा...मुझे जाना ही पड़ा.
आइने में जैसे मैं खुद को ही नहीं पहचान पा रही थी...मुझ पर सूट ही कर रहा था...फिर भी आशंकित थी...शायद रोहित कह दे नहीं अच्छा लग रहा..तो झंझट ख़तम...
बाहर निकल धीरे से पुकारा..'रोss हित ."
 देख कर ,रोहित ने  कहा कुछ नहीं..बस तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर  इशारा किया...'बढ़िया.'....और किसी फैशन डिज़ाईनर की तरह मुआयना करता रहा..."दिस  पिंक कलर  टॉप इज टू गर्लिश....ब्लू कलर अच्छा लगेगा..और ये टॉप ज्यादा लॉन्ग नहीं है? "
"नहीं...मैं एकदम से शॉर्ट नहीं पहन  सकती "
 "ओके...पर टॉप  ब्लू कलर का ले लीजिये...ज्यादा अच्छा दिखेगा..." और फिर वो कपड़ों के रैक की  तरफ मुड गया.

मुझे अपनी बहनों की याद आ गयी...शादी से पहले ऐसे ही हम एक दूसरे को अपने कपड़े पहन  कर दिखाया करते थे और मीन-मेख भी निकालते..सराहना भी करते...जमाना हो गया...वो सारी आदतें छूट गयी .
ऋचा के लिए कपड़े..माँ के लिए साड़ी लेकर वापस लौटते हुए हम कैफे के सामने से गुजरे और रोहित ने कहा..'एक कप..चलेगी?...अभी तो टाइम है.."

वहाँ बड़ी-बड़ी आरामदायक कुर्सियों पर सब ऐसे फ़ैल कर बैठे थे कि मेरे दुखते पैर ललचा उठे...नथुनों में कॉफी की महक भर रही थी..और दिमाग ने सोचना  बंद कर दिया. मेरे कदम अपनेआप उधर मुड गए. रोहित कॉफी ऑर्डर करने के लिए काउंटर पर ही रुक गया....मैं एक खाली मेज ढूंढ कर बैठ गयी.... यूँ पहली बार मैं इतना निश्चिन्त हो किसी कैफे में बैठी थी. नरेश के साथ जाती तो पूरे समय हम गुड़िया की देखभाल में ही लगे होते. नरेश नाराज़ होते रहते..' उसने ये गिरा दिया है..देखो..उसका मुहँ साफ़ करो.." और गुड़िया का रोना उसकी जिद...नरेश का मूड ख़राब कर देती...वे मुहँ बनाये बैठे रहते...और वहाँ बैठना एक बोझ सा लगने लगता. इस मारे अब बाहर चलने के लिए उनकी खुशामद करना भी छोड़ दिया था...पैसे भी बिगाड़ो और मूड भी खराब करो..
पर मैं आज पूरे आत्मविश्वास के साथ अकेली बैठी थी. खुद को जैसे पहली बार पहचान  रही थी. कोई डर नहीं..संकोच नहीं...इन सारी आधुनिक वेशभूषा में  सजे लड़के-लड़कियों के बीच मैं जरा भी असहज नहीं महसूस कर रही थी. ये इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया मेरे व्यक्तित्व में ?..कुछ ही दिनों पहले...अगर भीड़-भाड़ में नरेश आँखों से ओझल हो जाते तो मैं कितना घबरा जाती थी ..बेचैनी से निगाहें उन्हें ढूँढने लगतीं थीं . पर अब तो लगता है...रोहित  साथ ना भी  हो तो भी अकेले कॉफी पी सकती हूँ,यहाँ . आजकल दिल में एक उत्साह सा भरा होता है...कुछ करने की तमन्ना होती है. और यह सब मेरे चेहरे पर भी जरूर दिखाई देता होगा. जब पार्क में गुड़िया के साथ जाती....तो कभी उसके पीछे भागती..कभी दूसरे बच्चे की बॉल उठा उसे दे देती...दूसरी लेडीज़ भी थैंक्यू कहते बात शुरू कर देती हैं. पहले जरूर मेरे चेहरे  पर खीझ, ऊब..नाराज़गी  के मिले-जुले भाव होते होंगे जो अनजान लोगों को भी थोड़ी दूर पर ही रोक देते होंगे. 
एक  दिन उस बच्चे को बस स्टॉप पर आने में देर हो गयी..और मैने बस रुकवा कर रखा...वो बच्चा भागता हुआ आया तो मैने उसे सहारा देकर बस में चढ़ा दिया..पीछे से उसकी थ्री फोर्थ में रहनेवाली माँ ..शुक्रिया कहते नहीं थक रही थी...ऐसे भी बुरे लोग नहीं हैं यहाँ के...एक कोशिश करने की जरूरत है. इन्हीं ख्यालों में  खोयी थी कि रोहित आ गया. उसकी तरफ एक मुस्कान फेंक फिर मैं बाहर देखने लगी...अभी कुछ भी बात करने की इच्छा नहीं हो रही थी...जो  भी बदलाव मेरे साथ हो रहे थे ..उसे बूँद-बूँद महसूस करने की कोशिश कर रही थी. 

थोड़ी देर बाद नज़रें घुमाई तो पाया रोहित भी खोया हुआ सा है. उसकी नज़रों का अनुसरण कर देखा...दूर एक टेबल पर  दो सुन्दर सी लड़कियां बैठीं थीं...उन पर ही उसकी नज़रें जमी हैं. यूँ ही टेबल पर खट-खट किया..तो रोहित चौंक गया...मुझे मुस्कुराते देख...झेंप कर कहा.." लोग कहते हैं लडकियाँ डायटिंग करती हैं...पर वे दोनों कितना सारा खा रही हैं...यही देख रहा था.."
"मैने कब कहा...कि तुम कुछ और देख रहे थे..." हंसी आ गयी थी,मुझे.
"चलिए कॉफी पर कंसंट्रेट कीजिए..." खिसिया कर रोहित बोला...कॉफी आ गयी थी.

रोहित से मुश्किल से दिन में एक घंटे बात होती पर बाकी के तेइस घन्टों को नई उर्जा दे जातीं.कभी-कभी बात नहीं भी होती...फिर भी मैं पहले सा उदास...डिप्रेस्ड नहीं महसूस करती. आज गुड़िया को बस स्टॉप पर छोड़कर कुछ खरीदने गयी तो वहाँ रोहित भी था...हम थोड़ी देर बाहर बात करते रहे...पर बड़ी धूप थी...मैने कहा...." चलो घर पे बैठ कर  बात करते हैं.."
"मुझे कपड़े साफ़ करने हैं...डिटर्जेंट लेने आया था...."
"तुम और तुम्हारे कपड़े....एक वाशिंग मशीन ले लो...बस ऑफिस  के बाद एक ही काम करते  हो..कपड़े साफ़ करना...चलो कोल्ड कॉफी बनाती हूँ...मेरा मन हो रहा है....तुम साथ दे देना.."
आजकल मैं उस पर बहुत रौब भी जमाने लगी थी. रोहित चला आया....

कमरे में ए.सी. चला कर मैं कॉफी बनाने चली गयी....रोहित सी.डी. उलट-पुलट रहा था...." अच्छा इसी सी. डी. की बात कर रही थीं आप....यही ली उस दिन??
"हाँ लगाओ न..बड़ी अच्छी गज़लें हैं .." मैं किचन में से ही चिल्लाई..
कॉफ़ी लेकर आयी तब तक रोहित ने स्विच ढूंढ  कर कर सी.डी. लगा दी थी...
जब जगजीत सिंह की आवाज़ में पुरानी  ग़ज़ल कमरे में तैरने लगी तो रोहित ने सर पर हाथ मार लिया.."ओह! आपलोग भी न....किसी भी कवर में कोई सी.डी. डाल देती हैं...ये नए कवर में पुरानी सी.डी है. "
मैंने उसे रोक लिया..."यही चलने दो न..." 'तुमको देखा तो ये ख्याल आया....." मेरी पसंदीदा ग़ज़ल थी.
कॉफी के घूँट भरते हम गज़लें सुनते रहे...रोहित कपड़ों की चिंता में ही उलझा हुआ था....और मैं उसे डांट रही थी..."क्या ग़ज़लों की वाट लगा रहे हो.."
"अरे वाह .तरक्की...यहाँ की भाषा भी जुबान पर चढ़ गयी."
"जैसा  देश वैसा वेश की जगह जैसा देश वैसी भाषा...चलो बाबा तुम्हारे कपड़े तुम्हारा इंतज़ार कर रहे होंगे"...रोहित भी उठ गया...मैं कप्स उठाने के लिए झुकी ही थी कि .जाने कैसे कारपेट में पैर उलझ गया...
"अरे संभालिये...." रोहित ने गिरने से थाम लिया....और एक सनसनाहट  सी दौड़ गयी नसों में....ये कैसा अनचीन्हा सा अहसास था. महज किसी स्पर्श से  ऐसी सुरक्षा...इतना लगाव महसूस किया जा सकता है...नया था मेरे लिए और मानो खुद पर ही वश नहीं रहा...इस अनजाने अहसास ने अपने गिरफ्त में ले लिया था...और इसके तिलस्म में घिरे हम क्षण भर को अपना अस्तित्व भुला बैठे थे...पता नहीं...पहले रोहित की बाहें  मेरे गिर्द लिपटीं या पहले मेरे हाथ उसके कंधे पर टिके......पर ना मैं नीलिमा रह गयी थी...ना वो रोहित...तिलस्म टूटा...उसने मेरे बालों पर हाथ फेर मेरा चेहरा उठाया और एक दूसरे की आँखों में झांकते ही हमारी पहचान लौट आई..मैने रोहित को धक्का दे दिया...और उसने भी हडबडाकर सॉरी कहते अपने हाथ पीछे कर लिए...इस क्रम में कुर्सी से टकरा गयी...गिरते-गिरते बची..फिर से रोहित ने ओह! कहकर बचाना चाहा और मैने उसे जोर से धक्का दिया...वो मेज से टकरा कर गिरने ही वाला था..किसी तरह उसने मेज थाम लिया और मैं भागती हुई बाहर चली आई...

बाहर आपको देखा तो आपके पास चली आई...पर मैं आपके पास..रोहित से भागकर नहीं आई थी....अपनेआप से भाग कर आई थी...रोहित की हिम्मत नहीं थी...मेरे करीब आने की...पर मुझे अपनेआप से डर लग रहा था..कहीं कमजोर ना पड़ जाऊं.....कहीं वापस ना चली जाऊं....रोहित की छुअन मुझे बुरी क्यूँ नहीं लगी...एकदम से मैने क्यूँ नहीं उसका हाथ झटक दिया...पल भर के लिए ही सही..पर मैं कैसे भूल गयी कि मैं शादी-शुदा हूँ...रोहित तो लड़का है...मैं उस से बड़ी हूँ..समझदार हूँ..फिर ऐसा कैसे होने दिया...मुझे अपनेआप से घिन आ रही है....समझ नहीं पा रही...मैने अपना संयम कैसे खो  दिया....मैं बुरी हूँ..सच में बहुत बुरी हूँ...मुझे रोहित से कभी मिलना ही नहीं चाहिए था...उस से कभी बात ही नहीं करनी चाहिए थी...मैं खुश थी..या दुखी थी..जो भी थी,अपनी दुनिया में थी..वहाँ ये  ग्लानि तो नहीं थी. 

उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से टप टप बूँदें टपकने लगीं...दया आ गयी  मुझे..."देखो खुद पर इतनी  कठोर मत बनो....जो हो गया..उसे भूल जाओ...और कुछ ऐसी अनहोनी हुई भी नहीं...तुम दोनों ही समझदार हो..तुरंत संभल गए. अब इसे एक दुस्वप्न की तरह भूल जाओ...जितना तुम्हारी बातों से पता चला है....रोहित भी एक शरीफ लड़का है...वो भी तुम्हारी तरह ही शर्मिंदा हो रहा होगा...किसी को दोष देने की जरूरत नहीं...एक पल था जो गुजर गया..बस अब ये सोचो..ऐसा पल दुबारा ना आए...अच्छा लगा सुन...रोहित की सहायता से ही पर तुमने खुद को पहचान लिया है....तुम्हारा आत्मविश्वास लौट आया है....वो  तुम्हारे भीतर ही था...पर  सोया हुआ था...अब इसे दुबारा सोने मत देना...और अपनी जिंदगी बोझिल..उदासी भरी मत बनाओ...अपनी खुशियों के लिए किसी पर निर्भर मत रहो..पति पर भी नहीं......कोई हॉबी  अपना लो...छोटा-मोटा कोर्स कर लो...खुद को व्यस्त रखो...और कुछ सार्थक करो...किसी भी नई जगह में एडजस्ट करने में समय लगता है..." मैं पता नहीं कब तक उसे भाषण  देती रहती पर जोर-जोर से कहीं दरवाज़ा पीटने और ममी-मम्मी की आवाज़ ने चौंका दिया...

"ओह!!! गुड़िया आ गयी..छः बज गए..." और नीलिमा दुपट्टे से मुहँ पोंछती..उठ कर भागी.
मैं भी पीछे-पीछे उठ कर आ गयी....नीलिमा बेटी को गोद में उठाये उसे प्यार कर रही थी.."अरे आज मेरी बिटिया खुद से आ गयी...बड़ी हो गयी अब तो..."
"और क्या..मैं तो लिफ्ट में भी  भी अकेली आ जाती...पर वो गौरव की मम्मी हमारे फ्लोर तक छोड़ गयीं...पता है..आज गौरव को टीचर ने पनिशमेंट दी...ही ही बड़ा मजा आया...उसने रोली की स्केल तोड़ दी थी..." गुड़िया की बातों का पिटारा खुल चुका था..और उसकी बातें सुनतीं नीलिमा अब सिर्फ एक माँ रह गयी थी. 

अपना दरवाज़ा बंद करते नीलिमा ने आँखों में ही आभार जताया...मैने भी मुस्कुराकर सर हिलाया...और वापस आ कर सोफे पर ढह गयी. दिमाग में हलचल मची थी. मेरे विचार गड्ड-मड्ड हो रहे थे . मेरी सारी सोच की नींव हिल चुकी थी.किन- किन  परिस्थितियों से लोग गुजरते हैं और हम तुरंत जजमेंट पास कर देते हैं. हमें उन हालातों का कुछ पता नहीं होता हम बस परिणाम देखते हैं और फैसला सुना देते हैं... कई नाम याद  आ गए..जिन्हें बदचलन...आवारा...कुलक्षनी जैसे विशेषण दिए गए थे..पर पीछे की कहानी किसी को पता थी??....या किसी ने देखने की कोशिश की??... या देखी भी तो उनकी नज़रों से समझने की कोशिश की??....आसान है किसी पर इलज़ाम लगा देना...उसे बदनाम कर देना..
पर हर किसी को तो एक ही जिंदगी मिलती है...उसे भी जिंदगी के हर रंग को महसूस करने का...हर पल को जीने का अधिकार है...वो अपनी जिंदगी बेरंग ही गुज़ार दे...क्यूंकि उसके लिए समाज द्वारा स्वीकृत मसीहा को कोई दिलचस्पी नहीं रंग - कूची और कैनवास में. हर इंसान के दिल में ये तमन्ना रहती है ..कि  कोई उसे सराहे..उसकी प्रशंसा करे....उसकी सुने....अपनी कहे..और जब ये सब मनोवांछित जगह नहीं मिलता तो मन रस्सी तुड़ा भटकने लगता है ..पर क्या ये भटकन जायज है?... इस भटकन की कोई मंजिल है?...मंजिल नज़र भी आए तो वो मरीचिका सरीखी ही होती है....जो दर्द के सिवा और कुछ नहीं दे सकती...कुछ लोगों को इस दर्द का आभास हो जता है...या उन्हें अपनी भटकन ही सही नहीं  लगती...और वे अपने कदम वापस खींच लेते हैं...लेकिन जो इस से बेखबर रहते हैं...उनकी भटकन को दोष दिया जा सकता है? मैं कोई विचार नहीं बना पा रही थी...मेरे संस्कार...मेरे विचारों को एक जोर का झटका लग चुका था. सुना था यह शहर लोगों की जिंदगी बदल देता है.....आज नीलिमा से मुलाकात ने मेरी सोच को भी पूरी तरह बदल दिया था. यही कल तक शायद मैं इस वाकये को सतही तौर पर देखती और नीलिमा को ही दोषी ठहरा देती...पर जिस तरह से पति की बेरुखी ने उसे निराशा के गर्त में धकेल दिया था और रोहित के साथ ने उसमे आत्मविश्वास भरा....उसे जीने  का सलीका सिखाया...मेरा मन संस्कारी होने पर भी उसे गलत नहीं कह पा रहा था .
(समाप्त )
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