Monday, December 27, 2010

कच्चे बखिए से रिश्ते (समापन किस्त )

(सरिता,अपनी सहेली के पति को अपने कॉलेज में ही लेक्चरर के पद पर नियुक्त करवाने में सहायता करती है. कुछ ही दिनों बाद उसकी सहेली की मृत्यु हो जाती है और उसके पति वीरेंद्र, कॉलेज में ज्यादातर समय ,सरिता के डिपार्टमेंट में बिताने लगते  हैं. पर सरिता को वीरेंद्र की कम्पनी रास नहीं आती फिर भी वह सहानुभूतिवश , उन्हें यह अहसास नहीं होने देती.)


गतांक से आगे

मुश्किल ये थी कि वीरेंद्र फिजिक्स  के प्रोफ़ेसर थे .और साइंस के अधिकतम छात्र, कोचिंग क्लास जाया करते लिहाजा..बहुत कम छात्र ही नियमित क्लास अटेंड किया करते.वीरेंद्र  भी  क्लास  में बीस मिनट बाद जाते और दस मिनट पहले निकल आते. कोई जिम्मेवारी  भी नहीं थी. वो कहती भी, "जो बच्चे..क्लास में ,बैठते हैं..शायद वे क्लोचिंग क्लास नहीं अफोर्ड कर पाते हैं..उन्हें ही मन से पढाया करिये .पर वे  गुस्से में बोल उठते,
"वे लोग  ऐसे भी नहीं पढने वाले...बहुत कमजोर हैं,पढने में ....साइंस  उनसे चलेगी नहीं..फेल होने वालो के उपर क्यूँ  मेहनत करूँ.." वह सोचती, तब तो दुगुनी मेहनत करनी चाहिए. पर सहेली के पति का ख्याल कर कुछ बोलती नहीं.
वीरेंद्र की निराशावादी बातें उसे परेशान कर देतीं...पर लिहाजवश वो कुछ भी ,रूडली नहीं बोल पाती. यूँ भी साइंस में नोट्स बनाने की जरूरत नहीं पड़ती. समय ही समय होता उनके पास. जबकि उसे सैकड़ो काम होते...नोट्स बनाने होते. लाइब्रेरी जाना होता..अपने साथी प्रोफेसर्स के साथ विचार-विमर्श..बहस भी नहीं हो पाती. सबसे जैसे वो कटती जा रही थी. वीरेंद्र की उपस्थिति से सब कन्नी काटने लगते और किसी बहाने उठ कर चले जाते.वीरेंद्र  को यूँ भी जिस से भी उसकी दो बातें हो जाती ...थोड़ी मित्रता होती....वे लोग  पसंद नहीं आते. मिस्टर जुनेजा को फोटोग्राफी का बेतरह शौक था...वे हमेशा कैमरा अपने पास रखते. उसकी भी फोटोग्राफी और पेंटिंग सीखने की दिली तमन्ना थी पर अवसर नहीं मिल पाया..नहीं सीख पायी..और अब तो जी के सौ जंजाल थे . उसका वह शौक अनुकूल,हवा,पानी खाद के अभाव में मृतप्राय हो गया था . जुनेजा  जी के खींचे चित्र देख जैसे  उसमे नव-जीवन संचार हो उठता . वे भी नई  तस्वीरें अपलोड करते ही उसे कंप्यूटर लैब में बुला ले जाते. कर्टसीवश वीरेंद्र को भी  बुला ले गए वे. पर वीरेंद्र ने इतनी आलोचना की "ये भी कोई तस्वीरें है..कीड़े-मकोड़ों की...टूटी झोपडी...गन्दी बस्ती की..फोटो तो सुन्दर दृश्यों के लेने चाहिए. " ढलते-सूरज, नदी-झरने झील की. " वो उनसे बहस नहीं करती .बात बदल देती.

अंग्रेजी के एक युवा प्रोफ़ेसर मिस्टर कुमार से उसका किताबो का आदान-प्रदान खूब होता. कई बार खड़े-खड़े ही किसी पुस्तक के किसी कैरेक्टर पर घंटो चर्चा हो जाती. पर मिस्टर कुमार एक विशेष विचारधारा को मानेवाले थे. वीरेंद्र, इस बात को मुद्दा बना उस से बहस कर बैठते .वह कितना भी कहती.."वो उनके विचार है...उसे उस से क्या लेना-देना...वो तो इतर विषय पर बात करती है." उस वक्त कुछ नहीं कहते,पर मौका ढूंढ अक्सर कह बैठते.."वो ये कह रहा था...उसे ऐसा कहते सुना मैने...मुझे बिलकुल नहीं पसंद " परेशान हो गयी थी वह. कॉलेज का कोई भी प्रोफ़ेसर उन्हें अच्छा नहीं लगता...खासकर अगर उनसे उसकी  अच्छी पहचान हो. वह उनकी मनःस्थिति समझती थी...वे परेशान थे, और इस तरीके ही अपनी खीझ ,फ्रस्ट्रेशन निकालना चाहते थे.  पर वो क्या करे. अपनी परिस्थिति से समझौते की कोशिश उन्हें खुद ही करनी थी. वे एक परिपक्व उम्र के इंसान थे. वो बस उनका साथ दे सकती थी,जिसकी वह भरसक कोशिश कर रही थी. पर इसके एवज में उसे अपना मानसिक संतुलन बनाये रखना कठिन हो जाता. घर, पति,बच्चे ,कॉलेज की हज़ारो जिम्मेदारियां और उस पर से वीरेंद्र का यह अनर्गल प्रलाप. वह एकदम से किनारा भी नहीं कर सकती थी. इस शहर में वही एकमात्र वीरेंद्र की परिचित थी और वीरेंद्र दूसरे लोगो से मिलने-जुलने, दोस्त बनाने को उत्सुक भी नहीं दिखते. उसने समय के सहारे खुद को छोड़ दिया था.

इन सबका कोई हल नज़र नहीं आ रहा था और ऐसे में टाइम-टेबल में बदलाव, उसके लिए एक सुखद बयार लेकर  आया. अब टाइम-टेबल कुछ ऐसा बना था जिसमे उसकी सहेली, कृष्णा और उसे एक साथ ऑफ पीरियड मिलते. उसे सुकून मिल गया.  वीरेंद्र तो उसे खाली  देखते आ ही जाएंगे ,इतना उसे पता था पर कम से कम कृष्णा  का साथ तो रहेगा. अब सब, इतना बोझिल तो नहीं होगा. उसने कृष्णा  से परिचय  करवाया और आश्चर्य...किसी से दोस्ती नहीं करनेवाले वीरेंद्र ने लपक कर उस से दोस्ती का हाथ बढाया. उसे सुकून मिला..चलो कुछ बोझ तो बँटा. शुरू में तो कृष्णा  भी उसपर  झल्लाई रहती..."कहाँ से उसके सर पर बिठा दिया..कितना अच्छा वे दोनों हंसी-मजाक दुनिया भर की बातें किया करते थे.' वीरेंद्र की  उपस्थिति थोड़ी असहज बना देती.  पर धीरे-धीरे उसने नोटिस किया.....वीरेंद्र, कृष्णा से काफी बातें करने लगे.

वैसे भी  कॉलेज फेस्टिवल्स अब नजदीक आ रहें थे और तमाम तरह के कम्पीटीशन होने वाले थे. हमेशा की तरह प्रिंसिपल ने उसे बुलाकर कई चीज़ों का इंचार्ज बना दिया था. डिबेट का पूरा कार्यक्रम उसे देखना था. फेस्टिवल के अलग-अलग डिपार्टमेंट्स के हेड भी स्टूडेंट्स  में से उसे ही नियुक्त करने थे . उसे काफी काम होता. डिपार्टमेंट में भी वो आती तो ढेर सारे पेपर वर्क करती  रहती. वीरेंद्र पहले की तरह कुर्सी खींच ...बैठ जाते और कोई ना कोई टॉपिक  शुरू  करने की कोशिश करते. वह भरसक प्रयास करती की उनकी बातो को ध्यान से सुने पर अब उसे  समय ही नहीं मिलता  और ये भी सोचती अब वे नितांत अकेले भी नहीं...कृष्णा से तो उनकी बात-चीत होती ही रहती है. हाँ-हूँ में जबाब देती तो वे चिढ कर उठ जाते. कभी उनके  यूँ अचानक उठ कर चले जाने पर बुरा भी लगता पर वो मजबूर थी.

कृष्णा भी जब भी अकेले में मिलती, कहती "क्या मुसीबत है,जैसे वे घड़ी देखते होते हैं...क्लास ख़त्म कर ,जैसे ही रजिस्टर रख कर जरा सा दम लो और पहुँच जाते हैं, ' नमस्ते कृष्णा  जी..कैसी हैं आप?' अब रोज भला कैसी होउंगी मैं...अच्छी मुसीबत, गले  डाल दी है तुमने "

"अरे,बेचारे अकेले हैं...थोड़ा झेल लो..मैने क्या कम झेला है इतने दिनों...फिर मिलकर उनकी शादी करवा देते हैं...अपनी नई पत्नी के साथ फोन पे चिपके रहेंगे ..हमें छुटकारा मिल जायेगा.."..हंस पड़तीं दोनों

"हाँ, ये ठीक रहेगा..जल्दी करो कुछ...वरना हम अपनी  बातें तो कर ही नहीं पाते.".... ये सच था कृष्णा और उसकी कितनी सारी गर्लिश टॉक अब  वीरेंद्र की  उपस्थिति के चलते गए दिनों की बात हो गयीं  थीं. कितने ही दिन हो गए और उन दोनों ने स्टुडेंट्स की बातें भी नहीं शेयर कीं. आजकल के स्टुडेंट्स,में गुरु-शिष्य वाली  भावना का लेशमात्र नहीं था. एक तो उनकी कच्ची  उम्र और उसपर अनुशासन का अभाव और फिल्मो,टी.वी. के प्रभाव ने काफी उच्छृंखल बना दिया था, छात्रों को.  महिला लेक्चरर्स की तो मुसीबत ही थी. कभी कोई लड़का लेक्चर के दौरान एकटक चेहरे पर देखता रहता. कुछ उसे कहा भी नहीं जा सकता. कह देता,"मैं तो ध्यान से सुन रहा हूँ" कभी कॉपी करेक्शन को दें तो उसमे हीरो हिरोइन की तस्वीरें या फिर कोई मनचला सा गीत लिखा होता. एकाध बार तो क्लास से बाहर निकलते  ही लड़कों  ने मोबाइल से तस्वीर भी खींच ली. डांटने पर बेशर्मी से कह देते ,"मैडम आप अच्छी लगती  हैं" एकाध बार उनके मोबाइल भी सीज किए पर कुछ दिन बाद खुद ही जाकर लौटाना पड़ा, महंगे मोबाइल्स थे..पता नहीं पैरेंट्स ने कितने खून पसीने की कमाई लगा दी होगी और ये आज के ढीठ बच्चे ,वापस मांगने भी नहीं आते. पर ये सब सत्र की शुरुआत में ही होता..धीरे- धीरे  जैसे टीचर-स्टुडेंट्स एक दूसरे को समझने लगते और एक रिश्ता सा बन जाता...फिर तो अपनी कितनी सारी समस्याएं  भी लेकर आते, जिसे वो और कृष्णा आपस में डिस्कस कर सुलझाने की कोशिश करते. पर अब  वीरेंद्र के सामने ये सब बातें करना मुश्किल हो गया था.

उसकी व्यस्तता बढती ही जा रही थी. अभी भी वीरेंद्र नियमित उसके डिपार्टमेंट में आते उसे नमस्ते जरूर कहते..दो मिनट बैठते..पर फिर विषय के अभाव में बात आगे नहीं बढती...'आज गर्मी है... 'लगता है बारिश होगी'...' आज तो मौसम अच्छा लग रहा  है..' बस..इसके आगे कुछ सूझता ही नहीं...
उस दिन भी सोच ही रही थी कि अगला वाक्य क्या कहे कि वीरेंद्र बोले..."कृष्णा जी नज़र नहीं आ रहीं....ये पत्रिका उनके यहाँ से लाई थी...लौटानी थी"

"कृष्णा के यहाँ से ?? " वो कुछ समझी नहीं.

"हाँ, वो बताया था ना आपको, एक मामा भी इसी शहर में हैं...वे कृष्णा जी के घर के पास ही रहते हैं...जब उनसे मिलने जाता हूँ...तो कृष्णा जी के यहाँ भी चला जाता हूँ."

"अच्छा....हाँ,मामाजी की बात तो आपने बतायी थी...कृष्णा के यहाँ की नही..."
"बस पांच-दस मिनट तो बैठता हूँ...क्या बताना  इसमें.."

"ओके .." कहने को तो उसने कह दिया...पर सोचती रही...एक-एक बात बताते हैं...और ये बात गोल कर गए...और कृष्णा ने भी नहीं बताया कुछ...जबकि  वीरेंद्रसे सम्बंधित तो हर बात बताती है...शिकायत ही सही...जिक्र तो रोज उनका  हो ही जाता है.
और करीब दो महीने बाद  जाकर, कृष्णा ने  एकदम कैजुअली कहा.." उस दिन वीरेंद्र घर आए तो बता रहे थे उनका कुक अब तक नहीं लौटा  गाँव से""
"वो तुम्हारे घर भी  जाते हैं?"
"अरे..कभी कभार...वो भी दस- पंद्रह  मिनट के लिए.."
"पर तुमने कभी बताया नहीं..."
"इसमें बताने जैसा क्या..था..."
"हाँ ये भी है......." कह तो दिया उसने पर सोचती रह गयी...वे दोनों   तो कॉलेज से सम्बंधित हर घटना का जिक्र एक दूसरे से जरूर करते थे. किसी प्रोफ़ेसर ने उसे लिफ्ट देने की  पेशकश की...या पहली बार हलो कहा...या किसी ने काम्प्लीमेंट  दिए....छोटी से छोटी कोई बात बताना नहीं भूलती पर वीरेंद्र  के घर पर आने वाली  बात, बतानी  उसने जरूरी नहीं समझी.

उसकी व्यस्तता बढती जा रही थी...और वीरेंद्र की नाराज़गी  भी. सारे खाली पीरियड्स ...स्टुडेंट्स के साथ मीटिंग्स...फेस्टिवल की तैयारियों  में निकल  जाते. डिपार्टमेंट में बैठना भी बहुत कम हो गया था उसका. कभी जाती तो देखती....वीरेंद्र, कृष्णा के पास की कुर्सी पर बैठे हैं. कभी कभी तो उसके हलो को भी नज़रअंदाज़  कर जाते. कृष्णा जरूर पूछती..."कितना बिजी रहने लगी हो.."
"अरे... पूछो मत...बस ये फेस्टिवल निकल जाए...तो चैन मिले."
"नहीं पसन्द, तो करती क्यूँ हैं... इतना काम..." अब वीरेंद्र फूटते
"करना पड़ता है...किसी को तो करना पड़ेगा ही ना...एंड आइ  एन्जॉय डूइंग इट "
"फिर शिकायत मत किया कीजिये...जरा विद्रूपता से कहा उन्होंने....उसे बुरा तो बहुत लगा...पर कुछ कह नहीं पायी "
ऐसा अक्सर लोग  कह जाते हैं...मनपसंद काम करने से भी थकान तो होती है...लेकिन लोग  उसके विषय में एक शब्द सुनना नहीं पसंद करते...अगर अपनी इच्छानुसार कोई काम करो तो फिर होठ  सी लो..दर्द पी लो...जुबान पे कुछ ना लाओ..वरना सुनने को मिलेगा..." किसने कहा ,करने को .

मन खिन्न हो आया. आजकल वीरेंद्र सिर्फ उसे इरिटेट करनेवाली  बाते ही किया करते थे. अक्सर सोचती..ये कृष्णा से उनकी इतनी कैसे बनने लगी?.आखिर किन विषयो पर बात करते हैं.?.क्यूंकि वीरेंद्र के पास तो कोई विषय ही नहीं थे और उसे लगता था ,कृष्णा बिलकुल उस जैसी थी......पर शायद दोनों की वेवलेंथ मिलती हो...एक जैसी पसंद नापसंद हो...

वीरेंद्र जरा थे भी भोंदू किस्म के  ..छोटे से कस्बे से ,कभी महिलाओं से ज़िन्दगी में बात की नहीं...और यहाँ पत्नी की सहेली की वजह से मिले अवसर का खूब  फायदा उठा रहे थे. प्रैक्टिकल क्लासेज़ में उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी. पर वो भी लैब असिस्टेंट के भरोसे छोड़, यहाँ जमे रहते. उनसे सहानुभूति वश कोई सवाल नहीं करता. पर साइंस फैकल्टी के लोग उसे  ही सुना जाते, "अपने काम को तो सीरियसली लेना चाहिए ..आखिर रोटी वहीँ से मिलती है." उन्हें लगता,उसकी सिफारिश पर वीरेंद्र को यह लेक्चररशिप मिली है,तो कुछ जिम्मेवारी उसकी भी बनती है.
  वह क्या कह  सकती थी ? अब वीरेंद्र के बैठने की जगह भी बदल  गयी थी. पहले वे उसकी दायीं तरफ बैठते थे...कृष्णा से परिचय करवाया तो दोनों के बीच की कुर्सी पर बैठने लगे..अब देखती , कृष्णा की बायीं  तरफ  बैठते हैं...वो डिपार्टमेंट में आती ही कम...और जब आती भी तो देखती...साइकोलोजी वाली नीलिमा और संस्कृत पढ़ाने वाली शकुंतला जी भी बैठी हैं...और गप्पो के दौर चल रहें हैं...मुस्कराहट आ जाती,उसके  चेहरे पर...दोस्त बनाने से अरुचि रखनेवाले वीरेंद्र को महिला दोस्त बनाने से कोई परहेज नहीं था.

अब पता नहीं क्यूँ ,अपने डिपार्टमेंट में जा कर बैठना ,उसे अच्छा नहीं लगता. उनकी गप्पे चलती रहतीं... इंट्रूडर जैसा लगता. उसने स्टाफरूम में बैठना शुरू कर दिया. यहाँ ज्यादातर..इंग्लिश,हिंदी,, जोग्रोफी वाले प्रोफ़ेसर बैठते थे. पर सुखद आश्चर्य हुआ उसे ,पहले क्यूँ नहीं आई, इनके सान्निध्य में. बड़े नौलेजेबल लोंग थे. किसी किताब की यूँ मीमांसा करते कि वो मुग्ध सुनती रह जाती. बात-बात पे कोटेशन्स..गीता, रामायण..उपनिषदों से उद्धरण ...रोज ही कुछ नया सीखने को मिलता. स्वस्थ बहस भी होती..कभी-कभी तीखी भी पर एक दूसरे के विचारों का सम्मान करते सब. अपने विचार दूसरे पर थोपने की कोशिश नहीं करते.

फिर भी उसे अपने डिपार्टमेंट में तो जाना ही पड़ता. कृष्णा एक औपचारिक 'हलो' कहती.वीरेंद्र, अगर होते तो वो भी नहीं कहते. दूसरी तरफ देखते रहते. कभी सामने पड़ गए...तो वो 'नमस्ते' कह देती..और वे सिर्फ सर हिला कर चले जाते. अजीब लगता उसे. पर सोचने की फुरसत कहाँ थी..अब डिबेट्स के इनिशियल राउंड शुरू हो गए थे. उसमे पूरी तरह मुब्तिला थी वो. कभी- कभी उसकी क्लास भी छूट जाती. पर ऐसा तो हर वर्ष होता...वो बाद में एक्स्ट्रा क्लास ले सिलेबस पूरा कर देती.पर उसके कानो में कुछ  अजीब सी बात पड़ी...जब केमिस्ट्री  की रीमा कपूर ने कहा, ' "वीरेंद्र जी  आपके मित्र हैं ना..."
"हाँ..क्यूँ.."
"कुछ नाराज़ हैं क्या आपसे...?"
"नहीं तो..क्या हुआ.." उसे लग तो रहा  था,पर वो दुसरो के सामने क्यूँ स्वीकारे ये सब. 
"पता नहीं...कल आपको बहुत क्रिटीसाईज  कर रहें थे...कह रहें थे...'ये क्या बात हुई..क्लास में इतना शोर हो रहा है..कॉलेज में तो पढाना पहला धर्म होना चाहिए...ये डिबेट्स वगैरह ,सब तो ऑफ टाइम में होना चाहिए....आपकी सहेली  भी वहीँ थीं..."

"हम्म...होगा कुछ...मैं बात कर लूंगी ..चलूँ अभी...कुछ काम है " वो ज्यादा बढ़ावा  नहीं देना चाहती थी.

फिर तो अक्सर ही कोई ना कोई कह जाता...' वीरेंद्र जी इतना नाराज़ क्यूँ हैं,आपसे...आपके पढ़ाने के तरीके की बड़ी बुराई कर रहें थे कि उनकी क्लास में कितना शोर होता है..स्टुडेंट-टीचर का रिलेशन पता ही नहीं चलता...वे बहुत फ्रेंडली हो जाती हैं...स्टुडेंट के मन में हमेशा टीचर का डर होना चाहिए...और कृष्णा जी की बड़ी तारीफ़ कर रहें थे कि कितनी शान्ति होती है क्लास में...कोई शोर-शराबा नहीं...टीचर तो ऐसी होनी चाहिए"

" अब इसमें क्या कहा जाए...उन्हें कृष्णा का पढ़ाना अच्छा लगता होगा.." कह कर वो बात ख़त्म कर देती.

कृष्णा और उसका पढ़ाने का ढंग अलग  था . कृष्णा नोट्स बना कर ले जाती. क्लास में पढ़कर थोड़ा एक्सप्लेन कर चली आती.  स्टुडेंट्स खुश होते,बना बनाया नोट्स मिल जाता. जिसे रटकर वे परीक्षा में अच्छे नंबर ले आएँ. जबकि वो कोशिश करती कि बिना किसी नोट्स के पढाये...और विषय समझाने की कोशिश करे कि क्लास में ही कुछ तो उनके दिमाग में रह जाए. इस चक्कर में काफी सवाल जबाब होते और बाहर वालो  को लगता शोर हो रहा है.पर और किसी ने तो कभी शिकायत नहीं की.पता नहीं वीरेंद्र को उस से क्या प्रॉब्लम  हो गयी है. शायद उन्हें लगा वो जान-बूझकर इग्नोर कर रही है. पर सबकुछ तो सामने ही था .वो वीरेंद्र से तो  कुछ भी नहीं पूछ्नेवाली ..इतना कुछ किया है उनके  लिए ,उसका सिला जब वे ,ये दे रहें हैं ,तो क्या बच जाता है पूछने को. उनकी मर्जी.

पर उसने  कृष्णा से इसकी चर्चा करने की सोची.

कृष्णा ने छूटते  ही कहा.."क्या पता तुमलोगों के बीच क्या मिसअंडरस्टैंडिंग है . वीरेंद्र जी बहुत हर्ट हैं"

"अच्छा इसीलिए सब जगह मेरी बुराई करते चल  रहें हैं....और सब तो तुम्हारे सामने ही है ना...कैसी मिसअंडरस्टैंडिंग??...तुम्हे तो सब पता है, मैं बिजी रहने लगीहूँ.....उनसे ज्यादा बात नहीं कर पाती, अब " मन कसैला हो आया उसका. उसकी  इतने दिनों की सहेली भी बात समझने की कोशिश नहीं कर रही .

"अब मुझे क्या पता....तुम दोनों के बीच क्या हुआ है...कह रहे थे, सरिता जी अब बात नहीं करतीं...."

"अरे, तुम्हारे सामने तो कितनी बार हलो कहा है...और उन्होंने जबाब भी नहीं दिया...अजीब बात है...हाँ,बाद में मैने भी छोड़ दिया...मैं भी इतनी फालतू नहीं"

"अब मुझे क्या पता....और मुझे क्या मतलब इन सब बातों से....ये तुम दोनों के बीच की बात है....पर वे बहुत हर्ट हैं  "

"हम्म..ठीक  है जाने दो.." वो समझ गयी, जब वीरेंद्र उसकी प्रशंसा के पुल बांधते फिर रहें हैं तो उसे उनका कोई दोष कैसे नज़र आएगा. चाशनी का ड्रम ही सामने उंडेल दिया गया हो तो पैर तो वहीँ चिपक जाएंगे ना.

एक दिन क्लास लेकर निकली ही थी कि प्यून बुलाने आया..."प्रिंसिपल साहब ने आपको अपने ऑफिस में बुलाया है"

चौंक गयी वो.."अब तो फेस्टिवल ख़तम हो गए...अब कौन सा काम आ पड़ा"

प्रिंसिपल बड़े इत्मीनान में दिखे ,उसे बिठाया ,इधर-उधर की बातें करने लगे ....वो समझ नहीं पा रही थी उनके बुलाने का प्रयोजन क्या है...फिर अचानक उन्होंने पूछा, "आपकी किसी से कोई नाराज़गी कोई बहस हुई है क्या...?"

हम्म तो ये बात है..पर इन तक वीरेंद्र की बात किसने पहुंचाई होगी ?

उसे नकारात्मक सर हिलाते देख उन्होंने कहा.."ऐसी कोई सीरियस बात नहीं... एक इमेल आया है...उसमे आपके खिलाफ काफी बातें कही गयीं है...मैं  सोचने लगा, आप तो इतनी डेडिकेटेड हैं अपने काम के प्रति...किसे शिकायत होगी...कोई पारिवारिक दुश्मनी  तो नहीं...किसी से?"

पर मन काँप गया ,उसका.."कैसी बुराई...क्या कहा गया है?"

" खुद देख लीजिये....आइ डी  भी फेक सा ही लगता है कुछ 'वी' से है ."...कहते उन्होंने लैपटॉप उसकी तरफ कर दिया....एक नज़र देखा उसने, बचकानी बातें थीं..." सरिता तो प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने लायक भी नहीं....उन्हें कॉलेज में कैसे रख लिया आपने..पढ़ाने से ज्यादा उनका मन दूसरी चीज़ों में लगता है...वगैरह..वगैरह..." इतनी गलत अंग्रेजी लिखी थी कि उसे पढने में भी वितृष्णा सी हो रही थी. इस गलत अंग्रेजी और 'वी'  के इनिशियल ने उसका शक यकीन में बदल  दिया..ये वीरेंद्र ही थे..पर उसने कुछ कहा नहीं.

उसे विचार मग्न देख, प्रिंसिपल ने आश्वस्त किया.."इतनी चिंता की बात नहीं..मैने सिर्फ इसलिए बता दिया कि आप  सावधान हो जाएँ....क्या पता, आप जिन्हें दोस्त समझ रही हों...उनमे से ही कोई हो"..उनका अनुभव बोल रहा था.

"थैंक्यू सो मच सर...अगर और इमेल्स आएँ तो बताएं...फिर कोई एक्शन लेना पड़ेगा.."

"हाँ वो तो मैं खुद ही पता लगा लूँगा...बस आपको सावधान करने को यह बताया..."

फिर से  थैंक्स कहती वो बाहर चली आई....मन हो रहा था 'कंप्यूटर लैब में जाकर एकबार अपना मेल भी चेक कर ले...क्या पता उसे भी कुछ भला-बुरा कहा हो. पर वो लास्ट पीरियड था. क्लास रूम्स बंद होने शुरू हो गए थे. शैलेश टूर पर गए हुए थे ,वरना रात में उनके लैप टॉप पर ही चेक कर लेती...

अगर ये वीरेंद्र ही हैं..पर उनके सिवा और कौन होगा...तो कितनी बड़ी गलती की  उसने, उनसे  लैपटॉप खरीदने की सलाह देकर.....वीरेंद्र बिलकुल तैयार नहीं थे..."मुझे क्या काम...मुझे इसकी क्या जरूरत"
उसने समझाया था.."अकेलेपन का बढ़िया साथी है"...कहकर  इंटरनेट के सारे गुण उनके सामने गा डाले थे.

उन्हें कुछ नहीं आता था..उसे भी ज्यादा कहाँ पता था...पर उसने कम्प्यूटर टीचर ' करण दोषी ' से अपनी पहचान  का फायदा उठाया. कॉलेज फेस्टिवल के समय, स्पौन्सर्स से इमेल के  आदान-प्रदान का भार,उसने करण दोषी  पर ही डाल रखा था. हंसमुख और कर्मठ लड़का था, अपने ऑफिशियल काम से कितने ही इतर काम करने को हमेशा तैयार रहता था. वीरेंद्र  ने लैप टॉप  के उपयोग  की सारी जटिलताएं उस से सीख लीं, थीं.
दूसरे दिन पहला क्लास लेकर आई ही थी कि मिस्टर जुनेजा...भागते हुए उसके पास आए..."चलिए जरा आपको कुछ दिखाना है.."

उसने सोचा..."तस्वीरें होंगी...पर उन्होंने अपना मेल बॉक्स खोला...और वही मेल उनके इन्बौक्स में भी पड़ा था "
उसने बताया , कि प्रिंसिपल को भी ऐसा मेल भेजा जा चुका है...."कौन हो सकता है?"...उन्होंने पूछा...
"क्या पता..."
उसके जबाब पर वो खुद ही बोले..."मुझे तो वीरेंद्र साहब ही लगते हैं...आजकल नाराज़ चल रहे हैं आपसे..जिधर देखो..आपके गुण गाते चलते हैं.."
"अच्छा...आपको भी  पता चल गया..".हंस पड़ी वो..
"हम अपनी तस्वीरों की दुनिया में रहते हैं..पर यहाँ की खबर  हमें भी होती है..आपकी शान में कसीदे तो पढ़ते ही रहते हैं...और दूसरी महिला लेक्चरर्स के सामने तो जैसे अगरबत्ती, धूप जला,बस दंडवत को तैयार."
"ह्म्म्म..." 
"वो ठीक है...उनकी अपनी मर्जी...पर जरूरी है कि एक की  बुराई करके ही दूसरे की तारीफ़ की जाए?"
"यही तो मैं सोचती हूँ.....ठीक है...मेरे सारे काम में त्रुटियाँ हैं...पर उन्हें  क्या फर्क पड़ रहा है...मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें,ना "
"तब मजा नहीं ना...जबतक दूसरों के लिए गाए  आरती -भजन आपके कानो में ना पड़ें..क्या मजा उनका...घंटी की टुनटुनाहट तेज करनी ही पड़ती  है..." मुस्कुराते हुए कहा मिस्टर जुनेजा ने.

उसे जोर की हंसी आ गयी...मिस्टर जुनेजा आगे बोले, "फ़िक्र ना करें....अगर ये फेक मेल भेजने वाली, हरकत जारी रही तो कुछ किया जाएगा."
"फ़िक्र कैसी....अगर वे नहीं संभले तो  तो असलियत तो सामने आ ही जायेगी "

और यही हुआ..धीरे-धीरे जो भी नेट पर सक्रिय थे ..सबके पास वो इमेल और उसके साथ ही उस जैसे कई इमेल्स पहुँचने लगे. पता नहीं कहाँ से सबके इमेल आइ.डी. भी पता कर लिए थे...उसने सोचा, 'दूसरा कोई काम तो है नहीं. खाली  दिमाग शैतान का घर...करे भी क्या. कोई जुगत लगाई होगी '

उसे भी इमेल्स  मिलते .पर वो तो डर कर घर पर चेक भी नहीं करती अगर शैलेश ने देख लिया तो फिर तूफ़ान मचा देंगे. वे चुप नहीं बैठने वाले. तुरंत ही आइ.पी. एड्रेस पता कर एक्शन ले डालते..और बेकार का कॉलेज में एक चर्चा का विषय बन जाता. सोच में पड़ गयी वह....घर से बाहर निकल कर काम करने वाली औरतों को कितना कुछ सहना पड़ता है..कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है...और उसे वे  'मजबूर' घर में भी शेयर नहीं कर पातीं.

शायद उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना देख . वीरेंद्र की हताशा बढती गयी और उन्होंने करण दोषी को भी ऐसे मेल भेज दिए .करण तुरंत हरकत में आ गया... पच्चीस  साल का लड़का...जोश से भरा...कुछ नया करने को मिला. सीधा उसके पास आया...किसकी हरकत हो सकती है??...और उसने अपना शक बता दिया...वो तुरंत काम में लग गया.
क्लास लेकर निकल ही रही थी कि शकुंतला जी मिल गयीं....उनका फिर से वही प्रश्न.." वीरेंद्र जी  इतने  नाराज़ क्यूँ है आपसे..."

अब कहाँ से लाए वो कोई वजह...जो थी फिर से दुहरा दी. तभी पीछे से करण ने जोर से आवाज़ दी...."सरिता मैडम"

उसके कदम रूक गए.....शकुंतला जी को देख  कर थोड़ा हिचकिचाया..पर उसने कहा.."ये सब जानती हैं...बोलो क्या पता चला?"

"मैडम ये वही वीरेंद्र जोशी हैं ना ...उन्होंने अपनी  आइ.डी. मेरे सामने ही तो  बनाई थी...आप ही तो लेकर आयीं थीं...उन्हें.....दोनों आइ. डी . का आइ.पी.एड्रेस एक ही है..."
"ओह्ह.." बस इतना ही बोल पायी...शक तो उसे था ही...पर प्रमाण मिल जाने पर सच में एक बार चौंक गयी..शकुंतला जी के चेहरे पर भी आश्चर्य के भाव थे.

उसे चुप देख..करण बोल  पड़ा.
"ये क्या तरीका है...अगर नाराज़ हैं....कोई शिकायत है  तो सामने से बोलो ना.... यूँ फेक आइ.डी. बना कर पीछे से वार क्यूँ....मुझे तो बहुत गुस्सा आ रहा है.."

"बस बस...काबू  रखो गुस्से पर ...ये सब चलता रहता है....और थैंक्यू सो मच...इतना बड़ा काम किया आपने....चलो अपनी क्लास देखो..बाद में बात करते हैं.

शकुंतला जी ने सब सुना....पर बोला कुछ नहीं....उसने ही कहा..." देखिए बिना किसी बात के ...कितनी बात बढ़ गयी "

"अब क्या कहा जाए...गलत तो है ही ये सब "  बस इतना ही कहा उन्होंने. पर उसे संतोष था उनके सामने करण ने यह बात बतायी...अब तो कृष्णा,नीलिमा सबको पता चल जायेगा और उन्हें विश्वास भी करना पड़ेगा.

पर सबके ठंढे रिस्पौंस पर उसे बड़ा दुख हुआ. कृष्णा से भी उसे खुद  ही कहना पड़ा..." सुना ना तुमने....वो फेक इमेल वाले वीरेंद्र ही थे..."

"हाँ....जो भी हुआ बहुत गलत हुआ..." बस इतना ही कहा उसने.

वीरेंद्र  का उसके डिपार्टमेंट में आना बदस्तूर जारी था. अब सबको इमेल वाली  बात मालूम हो गयी थी..अकेले में सब इसकी निंदा कर गए थे पर वीरेंद्र से उसी गर्मजोशी से मिलते. हर्षल को भी देखती...बड़े प्यार से दूर से पुकारता..' कैसे हैं.. वीरेंद्र  स्साब" ऐसा लगता जैसे सब विशेष चेष्टा कर यह दिखाने को आमादा हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता...

एक दिन स्टाफरूम में कोई नहीं था .... यही सब सोचते ,यूँ ही चुप सी बैठी थी. नज़र खिड़की के अंदर आ गए बोगनवेलिया के लतरों पर जमी थीं. मिस्टर कुमार के आने का  उसे पता ही नहीं चला...
"क्या हुआ भाई..यहाँ यूँ खामोशी से क्यूँ  बैठी हैं...आज ब्रश-वर्श  नहीं किया क्या.."
"मतलब.." वो अबूझ सा देखती रही
तो फिर बोले,"ओह! लगता है ब्रश करने गयी तो दाँत सिंक में ही गिरा आयीं...इसीलिए नहीं दिख रहें "
हंस पड़ी वो..."ओह, अब समझी...कैसी भूलभुलैया भरी बातें करते हैं..आप भी"
"हाँ... आप ऐसी ही हंसती हुई अच्छी लगती हैं..पर हुआ क्या..ऐसा मूड क्यूँ है आज.."
"कुछ ख़ास नहीं"
"अब बता भी दीजिये "
"आपने मेरी तारीफ़ में कसीदे नहीं सुने क्या...कोई मेरी तारीफ़ में पुलिंदे लिखे जा रहा है.."
"ना..वरना मैं भी कुछ अपनी तरफ से जोड़ देता...कौन हैं ये भलामानुष"
अब वो चुप नहीं रह सकी...और सब बता दिया कि कैसे वीरेंद्र हर जगह उसकी बुराई करते फिर रहें हैं..कैसे फेक इमेल भेज रहे हैं..सबको"
"पर वे तो आपके मित्र थे,ना..हुआ क्या "
"बताया ना...कहने को तो कुछ  भी नहीं हुआ"
"ओके... मैं बात करता हूँ "
"नोsssss    वेsss "..वो जैसे चिल्ला ही पड़ी.
"अरे..मैं अपने तरीके  से बात करूँगा..."
"नहीं प्लीज़.. कुमार....आप रहने दीजिये.." वो घबरा गयी थी..."क्यूँ जिक्र किया आपसे "
"मैं इधर आ रहा था तो उन्हें साइंस डिपार्टमेंट की तरफ जाते देखा है....बीच रास्ते में ही पकड़ता हूँ..वरना वे अकेले नहीं मिलेंगे...डोंट वरी....मैं  बड़े तरीके से बात करूँगा"
और  कुमार तो यह जा वह जा...वे थे ही इतने जल्दबाज .
वह मायूस सी बैठी रह गयी....यह क्या कर दिया उसने ...पता नहीं कुमार क्या बात करें और वीरेंद्र  क्या समझे कि उसने भेजा है...अब क्या कर सकती थी.एकदम उदास सी बैठी थी कि दस मिनट बाद ही कुमार वापस आ गए. वो गुस्से में भरी बैठी थी. पर कुमार तो हँसते हुए बगल की कुर्सी पर जैसे ढह से गए  और पेट पकड़ कर हंसने लगे.
उसने घूर कर देखा तो बोले, "बताता हूँ...."और फिर हंसने लगे .
उसका घूरना जारी रहा तो किसी तरह हंसी रोक बोले, "शांत देवी..शांत ..पर आप ये बताइये इन जनाब से आपकी दोस्ती कैसे हो गयी."
"कहाँ की दोस्ती...आपने ना कुछ सुना ना कुछ जाना और चल दिए...महान बनने..कहा क्या आपने उनसे?"
"मैने इतना ही पूछा कि आपको सरिता जी से क्या प्रॉब्लम है...आप उनको यूँ क्रिटीसाईज  क्यूँ करते फिर रहें हैं...तो वे तो ..वे तो..".कुमार फिर हंसने लगे....फिर हंसी थाम कर बोले ..."सॉरी टू से ..पर वे तो बिलकुल औरतों की तरह बात करते हैं...नाक फुला कर कहने लगे, 'सरिता जी ने मेरा अपमान किया है...मैने कहा ..'तो उनसे जाकर  क्लियर कीजिये...यूँ दुसरो से उनकी बुराई करने का और ये फेक मेल भेजने का क्या मतलब ...तो बोले 'मैंने किसी से कोई बुराई नहीं की ..बल्कि उन्होंने मेरी इन्सल्ट की है...मैं बहुत हर्ट हूँ...हा...हा.. ही इज नॉट वर्थ इट...यु आर बेटर ऑफ हिम...शुक्र मनाइए  जान छूटी..

"मैने हर्ट किया है.....कैसे भला....पूछा नहीं,आपने??"..आवाज़ तेज हो गयी थी,उसकी.

"अरे पूछना क्या...वे खुद ही भरे बैठे थे...कहने लगे...मुझे इग्नोर करती हैं....मुझे एवोयेड करती है...ये बहुत अपमानजनक है मेरे लिए...यही सब कह रहें थे....बाप रे..कैसे गाँव की औरतों की तरह नखरे के साथ बोलते हैं....मैं तो पांच मिनट ना झेल पाऊं ऐसे आदमी को...आपकी इनसे दोस्ती कैसे हो गयी...कई बार आपके डिपार्टमेंट में बैठे देखा है ,इन्हें .."

" इसीलिए तो कह रही थी..आपको कुछ पता नहीं...वे मेरे दोस्त नहीं उनकी पत्नी मेरी सहेली थी.." फिर उसने सारी कहानी बतायी.

तो कुमार हाथ झटक कर बोले ..."बस आपका काम ख़त्म हुआ...आपने अपना कर्तव्य निभाया.इसे यहीं  छोड़ दीजिये और जरा भी चिंता मत कीजिये...आपको पूरा कॉलेज  ज्यादा अच्छी तरह जानता है..वो भोंपू लेकर भी चिल्लाये ना..कोई असर नहीं होने वाला...चाय पीनी है..खूब मीठी सी ...यू विल फील बेटर "

"ना एम आलरेडी फिलिंग बेटर आफ्टर टाकिंग टु यू ..थैंक्स.अ मिलियन ."
'एनिटायीम..बस आप ब्रश करने जाएँ तो ध्यान रखें ..दाँत सिंक में ना गिरा दें..." और दोनों जोर से  हंस पड़े.
***
कुमार से बात करके सचमुच बड़ा हल्का हो आया मन. सच में इतनी तरजीह देने की क्या जरूरत...कितने दिन बोलेंगे. ये बस एक अटेंशन सीकर बेहवियर है. निगेटिव तरीके से ध्यान खींचने की कोशिश . वो कुछ रेस्पौंड ही नहीं करेगी तो खुद ही चुप हो जाएंगे और दोस्ती का क्या..शायद उसकी भूमिका यहीं तक थी...कृष्णा और वीरेंद्र की दोस्ती करवाने के लिए ही ईश्वर ने उसे चुना था. वीरेंद्र को यहाँ स्थापित करवाने और सबसे परिचय करवाने तक की जिम्मेवारी ही उसकी थी. . और अब उसकी जिम्मेवारी पूरी हुई,बस....कैसा गम.

फेस्टिवल  भी अब समाप्ति की ओर  था. सारे इवेंट्स अच्छी तरह संपन्न हो रहें थे. बीच-बीच में हल्की-फुलकी  गड़बड़ियां भी होती  रहीं . डिबेट्स में दूसरे कॉलेज के आए स्टुडेंट्स ने बड़ा हंगामा किया . उसके कॉलेज के सारे डिबेटर्स  को हूट कर दिया. फोर्थ इयर की ज्योति को इतनी अच्छी तरह तैयार किया था . गोल्ड मेडल कहीं जानेवाला नहीं था.पर उन लडको को देखते  ही वह घबरा गयी. काफी कुछ तो भूल ही गयी...जो बोला वो भी डर-डर के. सबको अच्छा नहीं लगा, उसके कॉलेज में आकर दूसरे कॉलेज के बच्चे मेडल  ले गए.पर अब क्या किया जा सकता है.

ऐसे ही  फैन्सी ड्रेस कम्पीटीशन का उसने और फिलौसोफी की मंजुला ने नया कांसेप्ट सोचा था. कोई स्टेज नहीं बनाया...कॉलेज कैम्पस में ही तरह-तरह के वेश धरे स्टुडेंट्स आते रहें. प्रिंसिपल ने दो पीरियड ऑफ देकर इस इवेंट को और्गनाइज़ करने की अनुमति दी थी.पर बच्चो  ने इतना एन्जॉय किया कि दो पीरियड की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी क्लास में नहीं गए. कैम्पस  में ही ही हाहा  करते रहें. जिन प्रोफेसर्स  की क्लास थी..उनलोगों ने थोड़ी नाराज़गी जताई...हालांकि एन्जॉय उनलोगों  ने भी कम नहीं किया.

आज अंतिम दिन था और प्राइज़ डिस्ट्रीब्यूशन  भी था. प्रिंसिपल ने प्रोग्राम की समाप्ति पर उसका अलग से उल्लेख कर उसे धन्यवाद कहा और भूरी-भूरी  प्रशंसा  की. वो तो इतना असहज महसूस कर रही थी कि सर भी नहीं उठा पायी.

सब अच्छी तरह संपन्न हो जाने के बाद अब जी-जान से छूटी पढ़ाई में जुटी थी. पूरे दिन लाइब्रेरी में या स्टाफ-रूम में बैठे नोट्स तैयार करती रहती. उस दिन क्लास ख़त्म हो जाने के बाद मंजुला ने मार्केट चलने का इसरार किया. उसे कुछ शॉपिंग करनी थी. वो बोली, "ठीक है चलो..जरा ये नोट्स और किताबें मैं डिपार्टमेंट में अपने लॉकर  में रख आऊं. "

डिपार्टमेंट तक पहुंची कि उसे ख्याल  आया, "अरे मोबाइल तो ..मेज पर ही छूट गया "
उसने मंजुला को अपना बैग ,,किताबे थमायी  और तेज कदमो से वापस लौट पड़ी. जब मोबाइल लेकर आई तो देखा, मंजुला दरवाजे के पास ही गंभीर मुद्रा में खड़ी है , उसने पूछा..तो उसे होठो पे अंगुली रख चुप हो सुनने का इशारा किया .

अंदर वीरेंद्र  की आवाज गूँज रही थी.."पता नहीं लोगो ने सरिता जी को इतना सर क्यूँ चढ़ा रखा है...किस बात की तारीफ़ कर रहें थे प्रिंसिपल...बटरिंग करती होंगी प्रिंसिपल की...पहले तो सारी जिम्मेवारी दे दी उन्हें...उन्हें ही क्यूँ??..और लोग  नहीं हैं, कॉलेज में...कृष्णा जी हैं...नीलिमा जी हैं..इतने एफिशिएंट लोंग हैं...कितना हंगामा मचा रहा..पूरे प्रोग्राम के दौरान...डिबेट का मेडल दूसरे कॉलेज वाले ले गए...फैन्सी ड्रेस वाले दिन देखा...कोई डिसिप्लीन  ही नहीं..कृष्णा जी एकदम शान्ति से सुचारू रूप से सब करवातीं. सरिता जी को ना तो पढ़ाने का ढंग है..ना क्लास में शान्ति रखने का.....एक काम भी उनका सही नहीं होता..फिर भी लोगो  को देखिए बिना वजह की तारीफ़ करते रहते हैं..."

"अरे जमाना ऐसा ही है....वीरेंद्र  जी" किसने कहा..ये देखने को कमरे के अंदर झाँका तो पाया, वहाँ  तो उसके सारे ही तथाकथित दोस्त भरे पड़े हैं..कृष्णा, शकुंतला जी, नीलिमा तो हमेशा की तरह थी हीं पर उसे आश्चर्य हुआ , मनीषा दी को देख. वे उसकी बड़ी दीदी की सहेली  थीं....उनसे घर जैसा रिश्ता था. हमेशा, उसे मेरी छोटी बहन कह लाड़ लगाती रहतीं. वे भी चुपचाप वीरेंद्र का ये अनर्गल  प्रलाप सुन रही थीं. एक शब्द नहीं कहा उन्होंने कुछ. भले ही ना कहतीं..पर कम से कम वहाँ से हट तो सकती थीं. यह सब सुनने की क्या मजबूरी थी,उनकी? उतना ही आश्चर्य हर्षल को देख भी हुआ. नया -नया उसके हिस्ट्री डिपार्टमेंट  आया था. उसे दीदी कहते उसकी जुबान नहीं थकती . उसका सबसे बड़ा खैरख्वाह बनता था .इतना एग्रेसिव था ,किसी से भी लड़ पड़ने को तैयार. कितनी बार रोका था उसे. और यहाँ, वह भी सब चुपचाप सुन रहा  था.

उसकी आँखे झलझला  आई थीं. मंजुला ने महसूस किया और उसका हाथ पकड़ कर बोली.."चलो..यहाँ से चलते हैं"
उसके लाख मना करने पर भी उसे शॉपिंग  के लिए ले गयी..."अरे मूड ठीक होगा..घर जाओगी तो यही सब सोचते बैठोगी. घर पर कोई है भी नहीं...कि ध्यान बंटेगा..चलो मेरे साथ."

  हँसते-बतियाते..ढेर सारी शॉपिंग की....उसे भी लगा ..अब वो नॉर्मल  है सब भूल गयी है. पर घर की तरफ आते ही जैसे बाँध  की पानी की मानिंद  उन बातों का सैलाब उमड़ पड़ा....और थके-बोझिल कदमो से उसने दरवाज़ा खोल अंदर कदम रखा.

खिड़की के पास खड़ी ...उन्ही बातों के बहाव के साथ मन हिचकोले ले रहा  था .बिजली अभी तक नहीं आई थी.लगता था कुछ मेजर ब्रेकडाउन हो गया है. बाहर फैला घना अँधेरा उसके अंदर भी फैलता जा रहा था. सामने शर्मा जी के बंगले का चौकीदार अपनी लाठी ठक-ठक करता हुआ गेट के पास बैठ गया था.अब पता था वो ऊँची वाल्यूम में अपना ट्रांजिस्टर ऑन करेगा. और अगले ही पल फिजा को गुंजाते हुए  स्वरलहरियां फ़ैल गयीं..गाना बज रहा था,

"कसमे वादे प्यार वफ़ा
सब बातें हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं
ये रिश्ते नाते हैं, नातों का क्या"

वो ऐसे चौंक उठी जैसे उसकी  ही चोरी पकड़ ली हो किसी ने...उसके मनोभाव का इन गाना प्ले करने वालों  को कैसे चल गया? क्या सचमुच ऐसी ही है दुनिया...ये रिश्ते-नाते क्या कच्चे बखिए से हैं...बिन प्रयास के ही उधड़ जाते हैं. कैसे किसी पर विश्वास करे....हर चेहरे के अंदर एक चेहरा है...जबतक नकाब पड़ी रहें तभी तक दुनिया ख़ूबसूरत है...उसे लगता था ..सबकुछ देख -जान चुकी है...अब कुछ भी बाकी नहीं..दुनिया के हर पैंतरे से वाकिफ है वह... पर इतना  कुछ देखने के बाद भी कितन कुछ अनदेखा -असमझा बाकी रह जाता है...

अनायास ही उसकी नज़र आकाश की तरफ उठ गयी. सुदूर कोने में एक मध्यम सा तारा था . उसकी नज़र पड़ते ही झिलमिलाया ,लगा उसने आँखे झिपझिपा कर हामी भरी हो.

Friday, December 24, 2010

कच्चे बखिए से रिश्ते


ताला खोल,थके कदमो से...घर के अंदर प्रवेश किया...बत्ती  जलाने का भी मन नहीं हुआ..खिड़की के बाहर फैली उदास शाम, जैसे  उसके  मूड को रिफ्लेक्ट कर रही थी...या शायद उसके मन की उदासी ही खिड़की के बाहर फ़ैल कर पसर गयी थी...अच्छा था, आज घर में वो अकेली थी..जबरदस्ती मुस्कुराने का नाटक करने की जहमत पल्ले  नहीं थी....बच्चे अपनी बुआ  के पास गए थे और पति दौरे पर.  जबरदस्ती कोई बात नहीं करनी थी....दिखाना नहीं था कि सब नॉर्मल  है...आज वह जी भर कर अपनी उदासी को जी सकती थी...कब  मिलता है ज़िन्दगी में ऐसा मौका कि अपनी मनस्थिति को बिना कोई मुखौटा लगाए सच्चाई से जिया जा सके. अचानक मोबाइल का ध्यान आ गया...डर लगा, उसके अकेले रहने पर पति से लेकर बच्चे..ननदें...सब फोन करके अपनी उदासी को जीने के मुश्किल से मिले ये पल....कहीं छीन ना लें..और उसे वापस उसी चहकती आवाज में बतियाना पड़े...कि 'चिंता ना करो सब ठीक है'..मोबाइल साइलेंट पर रख,दराज़ में रख दिया. लैंडलाइन का रिसीवर भी उतार कर रख दिया...ख्याल आया कॉफी के साथ ये उदासी एन्जॉय  की जाए....कॉफी में दूध भी नहीं डाली...सारे कॉम्बिनेशन सही होने चाहिए...धूसर सी शाम...अँधेरा कमरा ...ये उदास मन और काली  कॉफी.

कॉफी का मग थामे खिड़की तक चली आई....शाम के उजास को अब अँधेरे का दैत्य जैसे लीलता जा रहा था...और दूर के दृश्य उसके पेट में समाते जा रहें थे. दैत्य ने उसकी खिड़की के नीचे भी झपट्टा मार थोड़ी सी बची उजास हड़प ली. और उसके इस कृत्य से नाराज़ हो जैसे सारे उजाले छुप गए..शहर  की बिजली चली गयी थी. घुप्प अँधेरा फैला था...उसकी नज़र आकाश की तरफ गयी..आकाश में तारों ...अभी कुछ ही देर में पूरी महफ़िल सज जाएगी और सारे तारे जग-मग करने लगेंगे. क्या ये तारे हमेशा ही इतनी ख़ुशी से चमकते रहते हैं या कभी उदास भी होते हैं. इन्ही तारों में से एक उसकी सहेली भी तो होगी...पर वो उसे उदास देख क्या कभी खुश हो सकती है?

रूपा से उसकी टेलीपैथी इतनी अच्छी थी कि उसके अंतर्मन के सात पर्दों में छुपी उदासी की हल्की सी रेखा भी उससे  नहीं  छुप पाती थी. वो कहती थी.."अरे नहीं....सब ठीक है..इट्स फाइन....मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता" तो रूपा गंभीर हो कहती.."अगर कहना पड़े ना..इट्स फाइन..मुझे फर्क नहीं पड़ता  इसका मतलब है...फर्क पड़ता है....बताओ ना ..क्या हुआ " और कितनी  भी कोशिश करती बात टालने की आखिर उसे रूपा को सब बताना ही पड़ता और फिर दोनों मिलकर उस वाकये  की शल्यचिकित्सा  कर डालतीं. उसका मन हल्का हो जाता . पर आज उसका दुख बांटना तो दूर समझनेवाला भी कोई नहीं था .

रूपा कोई उसकी बचपन की सहेली नहीं थी. रूपा के पिता और उसके पिता की पोस्टिंग एक ही जगह हुई थी और वे दोनों अपने-अपने मायके आई हुई थीं...उन्ही दिनों रूपा से मुलाकात हुई थी .जल्दी ही यह पहचान एक गहरी दोस्ती में बदल  गयी...जैसे कोई पूर्वजनम का नाता हो.  मुलाकात तो कम ही होती पर फोन से कॉन्टैक्ट बना रहता. दोनों बच्चों सा किलकती हमेशा एक दूसरे के शहर आ मिलने का जुगाड़ बनातीं पर वह कारगर नहीं हो पाता. रूपा शिकायत करती,कितना अच्छा होता तेरी जगह मेरे पति की तरह तेरे पति भी प्रोफ़ेसर होते और फिर हम गर्मी की  लम्बी छुट्टियां साथ बिताते. ईश्वर ने उसकी उनके एक ही शहर में रहने की पुकार सुनी तो सही पर गिने-चुने दिनों के लिए.

उसके कॉलेज में फिजिक्स  के प्रोफ़ेसर की जरूरत थी और उसने हिचकते हुए रूपा को फोन मिलाया क्या उसके पति इस शहर के कॉलेज में ज्वाइन करेंगे? रूपा तो खबर सुनते ही उछल पड़ी..."क्यूँ नहीं करेंगे....बड़े शहर का बड़ा कॉलेज है.इस कस्बे के कॉलेज से तो हर हाल में अच्छा. हमारी दोस्ती की बात तो जाने दे..पर इनके  कैरियर के लिए भी बहुत  अच्छा है."
वह अक्सर कॉलेज के डिबेट्स..एक्स्ट्रा करिकुलर  एक्टिविटीज़ कंडक्ट किया करती  थी,जिस से प्रिंसिपल से थोड़ी जान-पहचान हो गयी  थी और थोड़ी अनौपचारिकता भी. इसका ही फायदा उठाया और रूपा के पति वीरेंद्र  की सिफारिश कर डाली. प्रिंसिपल तुरंत मान गए. वीरेंद्र  का बायोडेटा भी इम्प्रेसिव ही था. बढ़िया कॉलेज. और बढ़िया पर्सेंटेज और वीरेंद्र   जोशी  ने उसका  कॉलेज ज्वाइन कर लिया.

उसने रूपा को नए शहर में गृहस्थी बसाने में पूरी सहायता की ..घर पर खाने  को भी बुलाया .उसके पति से भी मुलाकात हुई. उसे शरीफ से ही लगे. मितभाषी और थोड़े बोरिंग भी. पर उसने सोचा कौन सी मुलाकात होनी है...वो इतिहास पढ़ाती है...जबकि वे फिजिक्स ..अलग फैकल्टी अलग बिल्डिंग....कभी कुछ सन्देश देना भी हो तो सोच कर जाना पड़ेगा. पर वो यहीं गलत साबित हो गयी. वीरेंद्र  अक्सर उसके डिपार्टमेंट  में आ जाते. शुरू में तो उसे लगा ..अभी किसी और से परिचय नहीं है..दोस्त नहीं बने हैं..इसीलिए आ जाते हैं और शायद...अपनी पत्नी की सहेली को हलो कहना फ़र्ज़ भी समझते हों. पर धीरे धीरे उसे नागवार  गुजरने लगा. खासकर इसलिए कि कोई बात ही नहीं होती करने को. वो ज्यादातर रूपा और उसके बेटे अक्षय की ही बात करती. वे भी खुश खुश दोनों  विषय में कुछ ना कुछ बताते रहते. उसे लगता चलो कितने भी बोरिंग हों..उसकी सहेली का तो अच्छी तरह ख्याल रखते हैं. और उसकी सहेली खुश है तो अपनी सहेली के लिए उसके बोरिंग पति को झेल लेना उसका भी फ़र्ज़ है. वह रूपा को सरप्राइज़ देने के उन्हें नए नए गुर बताती.

रूपा का बर्थडे आ रहा था और उसने वीरेंद्र  को बताया क़ि आप उसे एक रेस्टोरेंट में ले जाइए और उसके मैनेजर से पहले ही बात कर लीजिये क़ि वो कुछ देर बाद उनकी टेबल पर जलती हुई मोमबत्ती के साथ एक केक भेजे और 'हैप्पी  बर्थडे" का म्यूजिक बजाए . और मैने ये आइडिया दिया है..ये बिलकुल मत बताइयेगा ".वीरेंद्र  ने ठीक ऐसा ही किया और दूसरे दिन सुबह सुबह रूपा का फोन आया. ख़ुशी उसकी आवाज़ से छलकी पड़ रही थी, 'ये मेरे लाइफ का सबसे यादगार  बर्थडे था. इसका थोड़ा श्रेय  तुम्हे भी जाता है..तुमने हमें इस बड़े शहर में आने का मौका दिया..उस छोटे से शहर में तो एक ढंग का रेस्टोरेंट भी नहीं था फिर वीरेंद्र  को ये सब पता भी नहीं था . यहीं किसी से सुना होगा उन्होंने.." वो मन ही मन मुस्कराती उसकी ख़ुशी में शामिल होती रही. रूपा खुश है...उसे और क्या चाहिए. इस बार तो वीरेंद्र  ने अच्छी एक्टिंग कर ली.रूपा को पता नहीं लगने दिया क़ि उसने बताया था सब. पर तीज  के वक्त वे भूल  कर बैठे .
उसने यूँ ही पूछ लिया.."कल तीज है..आप रूपा के लिए कुछ ले जा रहें हैं ?"

"मुझे तो ध्यान ही नहीं,  कल तीज है...और क्या ले जाऊं..."

"अरे! वो आपके लिए सारा दिन भूखी रहेगी और आप उसके लिए कुछ नहीं करेंगे??...उससे पूछिए,उसे क्या चाहिए उसे शॉपिंग के लिए लेकर जाइए...आपकी क्लास तो ख़त्म हो चुकी है...बस देर किस बात की...अभी ही घर की  तरफ निकल लीजिये"

वीरेंद्र के चले जाने के बाद उसने लम्बी सांस ली....आज तो एक ही पत्थर से दो शिकार किए , अपनी सहेली को भी खुश कर दिया और वीरेंद्र  से भी जान छुड़ा ली."

पर शायद वीरेंद्र , रूपा के दरवाज़ा खोलते ही उस से पूछ बैठे ..."कल तीज है ना..कुछ लेना है मार्केट से?..चलो इसीलिए जल्दी आ गया हूँ "

और रूपा समझ गयी क़ि उसने ही बताया है...बाद में उसने उस से पूछा..तो वो बिलकुल नकार गयी.

"नहीं मुझे क्या पता..बेचारे ने इतना ख्याल रखा तुम्हारा...और तू  शक कर रही है..नॉट फेयर..."

रूपा हंस पड़ी."नहीं बताना तो मत बता..पर एक गाना याद आ रहा है..'होठों पे सच्चाई रहती  है..जहाँ दिल में सफाई रहती है...."

आज भी वो गाना जब बजता है तो उस से सुना नहीं जाता वो टी.वी. बंद कर देती है...बच्चे भी आश्चर्य करते हैं...' इतना अच्छा गाना तो है.तुम्हारे जमाने का...तुम्हे तो ऐसे रोने वाले गाने ही पसंद है...क्यूँ बंद कर दिया.."

वो बहाने बना देती है..." आजकल कहाँ किसी के होठो पे सच्चाई और दिल में सफाई होती है..इतना झूठा गाना नहीं सुना जाता..." सच बता भी दे तो कोई भी उसके दुख को उस गहराई से महसूस नहीं कर पायेगा..क्या फायदा बोलने का .

वीरेंद्र  तो नियमित आते रहते पर रूपा से उसकी बात नहीं हो पा रही थी...रूपा  जब कॉल करती तो वो  क्लास में होती या कहीं और .... जब वो कॉल करती तो..रूपा नहीं उठाती..कभी किचन..बाथरूम या फिर कभी सब्जी लाने गयी होती तो कभी बेटे को स्कूल छोड़ने. वीरेंद्र  ने भी शिकायत की कि रूपा परेशान है, उस से बात नहीं हो पा रही . जब उसने कहा कि वो तो फोन करती है घर पर रूपा फोन ही नहीं उठाती..तो वीरेंद्र  तुरंत बोले, "मेरे मोबाइल पर कर लीजिये..मैं जाकर दे दूंगा.." उसे उन्हें नंबर देना गवारा नहीं हुआ...कॉलेज में उनकी कंपनी क्या कम झेलनी पड़ती है कि अब फोन पर भी झेले. उसने मुस्कुरा कर बहाने बना दिए.."रूपा को ही एक मोबाइल लाकर दे दीजिये ना...रूपा बाहर भी जाएगी तो उसका फोन उठा सकती है..या फिर उसका नंबर देख कॉल बैक तो करेगी.

दो दिन बाद ही वीरेंद्र  ने बताया कि रूपा के लिए मोबाइल ले दिया है..अब आप अपना नंबर दे दीजिये..उसने कहा.."ना आप रूपा का नंबर दीजिये..मैं उसे फोन करके सरप्राइज़ कर दूंगी..."
ओके  कह कर उन्होंने नंबर भी दे दिया उसने सेव तो कर लिया..पर घर गयी तो आदतन ,लैंड लाइन  ही खटका डाला. रूपा ने बताया वो दो दिन बाद ही हफ्ते भर के लिए सापरिवार कोई शादी अटेंड करने ससुराल  जा रही है.

वीरेंद्र  भी छुट्टी ले चले गए . कुछ दिन तक कोई खबर नहीं आई . वह समझ रही थी, रूपा रिश्तेदारों  में बिजी होगी...वापस शहर आते ही फोन करेगी. पर पता नहीं क्या इंट्यूशन हुआ ,एक शाम  यूँ ही कॉल कर बैठी..दो मिनट के लिए ही सही....बात कर लेगी. पर रूपा ने ना तो फोन उठाया ना ही कॉल बैक किया. उसे आश्चर्य हुआ,अगले दो दिन में उसने कई कॉल कर डाले पर रिंग होता रहा. फोन नहीं उठाया उसने. उसका कॉल भी नहीं आया तो उसे आश्चर्य हुआ.पता था, बिजी होगी..फिर भी एक बार भी फोन ना उठाये ऐसी क्या व्यस्तता..उसके बाद अक्सर ही वो कई कॉल कर डालती पर नतीजा वही..नो रिस्पौंस सोचा ,लगता है..रिश्तेदारों में ज्यादा ही व्यस्त है..पर कुछ दिन बाद जो खबर आई  वो तो सबका दिल दहला गयी. अब रूपा किसी भी व्यस्तता से छुट्टी पा चुकी थी..एक भीषण बस एक्सीडेंट में अपने बेटे के साथ इस लोक को विदा कह चुकी थी. वीरेंद्र  को कई फ्रैक्चर्स थे पर ज़िन्दगी को कोई खतरा  नहीं था. आखिर रूपा ने उनकी लम्बी ज़िन्दगी के लिए व्रत जो रखे थे और सफल हुई थी उसकी पूजा.

उसके दुख का कोई ठिकाना नहीं था पर वीरेंद्र  के दुख के सामने उसका दुख नगण्य था. कॉलेज के काफी लोग   मिलकर  उनके शहर हॉस्पिटल में देखने गए थे. वीरेंद्र  ने एक भी बात नहीं की  बस शून्य आँखों से छत देखते रहें थे. उसका कलेजा मुहँ को आ गया था. वीरेंद्र  के स्वस्थ होने की प्रार्थना करती रहती पर साथ ही सोचती हॉस्पिटल से निकल वे वापस  कैसे सामन्य ज़िन्दगी जी पाएंगे. उसके दुख की सीमा नहीं थी.

इस हादसे के करीब दो महीने बाद.... कॉलेज से आ कपड़े समेट रही थी कि उसका मोबाइल बज उठा..देखा..'रूपा कॉलिंग' वो तो जड़ हो गयी...उसने नंबर डिलीट ही नहीं किया था. समझ गयी वीरेंद्र  होंगे दूसरे एंड पर .किसी तरह कांपते हाथो से फोन उठाया. वीरेंद्र  की आवाज़ आई..'इस नंबर से बहुत सारे मिस्ड कॉल थे इस सेल पर" उसका गला भर  आया...किसी तरह रुंधे हुए स्वर में बताया.."वीरेंद्र  जी....मैं हूँ ....सरिता  " और वीरेंद्र  दहाड़ मार रो पड़े..उसकी भी सिसकियाँ बंध गयीं. उस दिन तो कुछ भी बात नहीं हो पायी..."ये क्या हो गया सरिता जी.."..बस बार बार यही कहते रहें..."आपकी सहेली मुझे छोड़कर चली गयी.."

वीरेंद्र  हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो घर आ गए थे .पर अभी पूर्ण स्वस्थ होना बाकी था. अब अक्सर  वीरेंद्र  के फोन आने लगे....वो उन्हें अपनी शक्ति भर ढाढस   बताती रहती . हमेशा निराशावादी बातें करते .."अब क्या करूँगा जीकर...कैसी नौकरी...अब रिजायीन कर दूंगा ..किसके लिए पैसे कमाना है.." वो उन्हें समझाती रहती..वही सैकड़ों बार कही बातें दुहराती रहती.."जानेवाला तो चला गया...अब जीना तो पड़ेगा..वगैरह ..वगैरह "

उनके दुख से वह  भी दुखी हो जाती...समझ नहीं पाती..उन स्मृतियों से भरे  घर में अब वो किस तरह रह  सकेंगे...उसे लगता ,शायद वही अपने  माता-पिता के पास ही वे रह जाएँ...किसी ना किसी कॉलेज में नौकरी उन्हें मिल ही जायेगी. पर जब एक महीने बाद उन्होंने कहा कि वे उसी कॉलेज में ज्वाइन करने आ रहें हैं तो बहुत आश्चर्य हुआ उसे. पर फिर सोचा ,आखिर उन्हें नई ज़िन्दगी भी तो शुरू करनी होगी...इतनी बढ़िया नौकरी क्यूँ कुर्बान करें. शुरू में दसेक दिनों तक माता-पिता साथ आए थे पर फिर अपनी जगह छोड़ उनका मन नहीं लगा...और वे वापस चले गए...अब वीरेंद्र  नितांत अकेले थे अपने घर में..सोच कर उसकी रूह काँप जाती ,'हर तरफ यादें बिखरी पड़ी होंगी..कैसे रह पाते होंगे..

अब भी वीरेंद्र  खाली पीरियड होते ही उसके डिपार्टमेंट में चले आते. अब तो सबकी सहानुभूति थी उनके साथ. वह भी  पूरी कोशिश करती कि उनका दुख बांटने की कोशिश करे..पर मुश्किल थी, कैसे.??.'संवाद अब भी उनके बीच नहीं हो पाता और अब तो कुछ विषय भी प्रतिबंधित हो गए थे..पहले रूपा की... उनके बेटे की कितनी बातें कर लेती  थी..अब ध्यान रखती की गलती से भी उनका नाम ना आ जाए ,उसकी जुबान पर. अपने बच्चों की ही पढ़ाई की स्कूल की  बातें किया करती थी  ..पर अब अपने बच्चों  का भी नाम नहीं लेती कि कहीं उन्हें अपने बेटे की याद ना आ जाए.

वीरेंद्र  बताते रात भर वे सो नहीं पाते हैं...और उनकी स्थिति  वो समझ सकती थी. उसने सुझाया
"योगा किया कीजिये ..मन भी शांत होगा और नींद भी समय पर आ  जाएगी"

"पर सुबह उठूँ कैसे...चार-पांच बजे सुबह तो नींद आती है.."

"बस एकाध दिन कोशिश कर उठ  जाइए..फिर बॉडी क्लॉक सेट हो जायेगा और जल्दी नींद आ जाया करेगी."

"नहीं हो पाता कितना भी कोशिश करता हूँ..नींद नहीं खुलती "

"ठीक है..मैं उठा दिया करुँगी.." और वह सुबह बच्चों के लिए टिफिन  बनाने  उठती और किचन से उन्हें फोन करके उठाया करती कि कहीं पति ना जाग जाएँ. पति कितने भी उदार थे ..वीरेंद्र  से सहानुभूति भी थी...पर सुबह -सुबह अपनी  बीवी का किसी और को फोन करके जगाना भी नागवार ना गुजरे..ये अपेक्षा उनके मेल इगो से कुछ ज्यादा हो जाती.

चार-पांच दिनों बाद ही उनकी आदत बन गयी और वे अपने आप जल्दी उठने लगे और सोने भी लगे. उसने भी फिर ना तो पूछा ना ही फोन किया. सोचा,उसने तो अपना कर्तव्य निभाया अब आगे वे जाने.

परन्तु अब धीरे-धीरे उनकी कंपनी असह्य होने लगी थी क्यूंकि बात करते पता चलता उनके विचार किसी बिंदु पर नहीं मिलते. राजनीतिक,सामाजिक, किसी विषय पर वे एक तरह नहीं सोचते. किताबो की बात करने की कोशिश करती तो यहाँ भी पसंद बिलकुल अलग थी..उन्हें आधुनिक,नया लेखन बिलकुल पसंद नहीं था . फिल्मे, क्रिकेट, अखबारों की गॉसिप में उनकी कोई रूचि नहीं थी. बड़े शुष्क किस्म के इन्सान थे. और मुश्किल थी कि वे एक सीमा तक असहिष्णु थे. उन्हें लगता जो उन्हें पसंद वो दूसरे को कैसे पसंद  नहीं आ सकता??.वो मजाक में बात टाल भी देती पर बहस पर उतारू हो जाते. और मुश्किल ये कि वे नए दोस्त भी नहीं बनाते. उनके डिपार्टमेंट के लोगो ने दोस्ती का हाथ बढाया...क्लास के बाद कहीं चलने के लिए पूछ लेते. उस से जिक्र करते तो वह भी उत्साह  बढ़ाती ,"आपको जाना चाहिए था...ऐसे ही  तो लोगो से जान-पहचान होगी"

पर वे पुराना राग ले बैठ जाते.."नहीं मुझे क्या करना है..दोस्ती करके..मेरा जी उचट गया है, दुनिया से ..मैं तो बस कॉलेज आता हूँ..पढाता हूँ..घर चला जाता हूँ...मुझे नहीं दिलचस्पी,किसी से दोस्ती करने में ...कहीं आने-जाने में  " कुछ प्रोफेसर्स  इनके परिचितों के दोस्त, रिश्तेदार ही निकल आए...एक जनाब...उनके कजिन के क्लासमेट थे...एक उनके चाचा के पड़ोसी .उसे लगा अब तो कम से कम पुराने परिचितों के हवाले ही उनके करीब जाएंगे...उसने हुलस कर पूछा .."ये तो बड़ी अच्छी बात है...अब तो आप उनसे कितनी सारी पुरानी बातें शेयर कर सकते हैं"

लेकिन फिर.."ना मुझे कोई इंटरेस्ट नहीं....मुझे नहीं करनी कोई बात .." उनके ठंढे से जबाब ने उसके सारे उत्साह पर पानी फेर दिया.
(क्रमशः)

Friday, December 10, 2010

कहानी 'छोटी भाभी' की

इन  दिनों व्यस्तता कुछ ऐसी चल रही है कि कहानी के इतने प्लॉट्स दिमाग में होते हुए भी...उन्हें विस्तार देने का मौका नहीं  मिल पा रहा...और ख्याल आया...कहानी सुनवाई तो जा ही सकती है. ये कहानी भी आकशवाणी से प्रसारित हुई थी. इसे ब्लॉग पर भी पोस्ट कर  चुकी हूँ  "होठों से आँखों तक का सफ़र "..शीर्षक  से.....  दोनों कहानियों में थोड़ा बहुत अंतर ..रेडियो के समय सीमा के कारण नज़र  आ सकता है

तो मुलाहिजा फरमाएं :) 


Wednesday, November 3, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की ( कहानी --समापन किस्त )

आर्यन के टेस्ट चल रहें हैं..सुबह से उसे पोएम रटवा कर परेशान. अब शरारत से या सचमुच पर हर  बार वो एक लाइन गलत बोल जाता. वो डाँटती तो , कभी मुहँ फुला लेता...और कभी अड़ के बैठ जाता...अब पोएम सुनाएगा ही नहीं. फिर खुद ही चॉकलेट देकर...गोद में लेकर बहलाना पड़ता. खुद पर ही झुंझला उठती , सबकुछ समझते हुए भी वह उस अंधी दौड़ में क्यूँ शामिल हो रही है ? अगर बेटे को 'ए प्लस' की जगह 'सी'  ही आ गया तो क्या पहाड़ टूट जायेगा. अभी चार साल का छोटा सा बच्चा है. ताजिंदगी तो हर घड़ी खुद को उसे कड़े अनुशासन में बंध प्रूव करते ही रहना है. पर फिर टीचर की चमकती आँखें याद आ जातीं, जब वो सारे पेरेंट्स के सामने आर्यन की तारीफ़ करती, और सबकी प्रशंसात्मक निगाहों का केंद्र बन वह, अपनी सारी खीझ, झुंझलाहट भूल जाती.

बच्चों का मासूम बचपन छीन, उन्हें तोतारटंत बनाने  की शुरुआत किसने की थी? इस समाज  के नियम आखिर कौन बनाता है.? खुद समाज के ही लोग ना...फिर खुद ही ये उलजुलूल  नियम बना,उसका पालन शुरू  कर देते हैं. आज बुरी तरह खीझ रहा था उसका मन. उसका मन था, तीन साल के बाद ही उसे स्कूल भेजेगी..पर आस-पास के पेरेंट्स  ने  डेढ़ साल से ही प्ले स्कूल में भेजना शुरू कर दिया. फिर पार्क में... सोशल गैदरिंग में सब पूछते, "किस प्ले स्कूल में जाता है. " और उसके यह कहने पर कि "अभी कहीं नहीं जाता " सब ऐसे आश्चर्य और उपहास से देखते, जैसे वो  अभी अभी बस किसी बीहड़ गाँव से उठ कर आ गयी हो. कितनी महिलायें तो उसे नसीहत देने लगतीं, "सोशल बिहेवियर  सीखेगा...दोस्त बनाना सीखेगा". और आर्यन की किसी छोटी सी शैतानी पर भी उसे ऐसे देखती जैसे कहती  हों, "कहा था ना..प्ले स्कूल में डालो" उसका मन होता कह दे..."प्ले स्कूल से और चार बदमाशियां सीख कर आयेगा.

लोगों की  बातों से इतना अपसेट रहने लगी थी .रोज ही सुनील से शिकायत करती...'आज इन्होने ऐसा कहा...वैसा कहा.." सुनील कहने लगे..तुम्हारे इस मूड का असर बच्चे पर भी पड़ेगा..इस डिप्रेशन में आने से तो अच्छा है, उसे दो घंटे के लिए स्कूल ही भेज दिया करो. पड़ोस के बच्चों को देख आर्यन  भी जिद करने लगा था, " इछ्कूल  जाऊँगा' फिर उसे लगा , कहीं इसमें हीन भावना ना आने लगे, चलो..अब माहौल के अनुकूल  ही तो चलना पड़ेगा. और उसने मन मार कर ढाई साल में उसे स्कूल भेज दिया. और उसके बाद से रेस शुरू हो गयी. पढ़ाई तो कुछ नहीं है. पर इतनी  छोटी उम्र में 'रंगों' फलों, सब्जियों, रिश्तों के नाम याद रखना क्या पढ़ाई से कम है? और अब चार साल  में  तो बाकायदा, पोएम,गिनती, छोटे छोटे शब्द , ड्राइंग-क्राफ्ट सब शुरू हो गए हैं. और इन सबमे 'ए प्लस' लाने की होड़ भी. बच्चे से ज्यादा पेरेंट्स के बीच.

सुबह से सारा काम छोड़ आर्यन में ही लगी थी. अब जल्दी-जल्दी सारे काम निबटा ले .आर्यन के स्कूल से आते ही खिला कर सुला देगी और फिर ड्राइंग की प्रैक्टिस भी करानी है. बुरी तरह थक जाती है. सब आर्यन के मूड पर निर्भर करता है. मूड हो तो एक बार में बना लेगा, ना हो तो मजा है जो एक मिनट बैठ भी जाए. आजकल सिम्मी-रोहन की शादी के प्लान्स बनाना भी छूट  गया था..पूरे समय आर्यन  के टेस्ट की टेंशन ही चलती रहित दिमाग में.
सारी बिखरी चीज़ें उठा कर संभाल कर रख रही थी कि फोन बज उठा. अब ये एक और मुसीबत. इस समय जो भी फोन करता है, गप्प के मूड में होता है और उसके पास जरा भी वक्त नहीं. मम्मी का नंबर दिखा , उनके कुछ बोलने से पहले ही बोल उठी,

"आर्यन के टेस्ट चल रहें हैं...सारा घर बिखरा पड़ा है...ढेरो काम पड़े हैं....उसके आने से पहले सब ख़त्म करना है...बोलो कैसे फोन किया "

"ओह! फिर तो तुम नहीं आ सकोगी ,ना...सोच रही थी जरा घर आ जाती तो कुछ आराम से डिस्कस करना था "

"क्या .." सोचा शायद यही होगा, "बाई बहुत तंग कर रही है...पुरानी है,ईमानदार है...पर इतनी छुट्टियां करती है निकालूं या रहने दूँ" या फिर होगा..." फलां की शादी में क्या भेजूं...उन्होंने तो तुम्हारी शादी में बड़ी साधारण सी साड़ी दी थी...देने को साधारण ही दे दूँ..पर देखने वाले क्या कहेंगे,  हम बड़े शहरों वाले से लोग उम्मीद रखते हैं.." ये सब बातें ममी के लिए बड़े गंभीर मसले होते थे...वो उनका रुख भांप वही कह देती और वे खुश हो जातीं. पर आज तो ये सब सुनने का  कोई मूड नहीं.

पर मम्मी  बोलीं, "ठीक है...रहने दो..बाद में बात करेंगे...असल  में सिम्मी के लिए एक रिश्ता आया है "

"माँ अब वो ज़माना नहीं है...कि तुम सिम्मी के रिश्ते के लिए मुझसे पूछोगी...पहले सिम्मी से पूछा??"

" दरअसल...मुझे और तेरे पापा को नहीं जंच रहा ..पर सिम्मी को पसंद है"

"क्या sssss ...." उसके हाथ से फोन नहीं छूटा यही गनीमत है .

"अरे इसमें इतना चौंकने की क्या बात है....दो साल  हो गए उसे नौकरी करते ...अब शादी का सोचना होगा ना.."

"पर सिम्मी ने 'हाँ'.. कहा...??"...उसने शब्दों को यथासंभव संयत रखते हुए कहा.

"हाँ...उसे प्रपोज़ल  ठीक लगा....आजकल के बच्चे..तुम्हे पता है ना...उनकी सोच अलग होती है...तुम भी आज की ही हो...पर इन सबसे अलग हो. "

"माँ एक फोन आ रहा है...मैं बाद में फोन करती हूँ..." कह कर फोन काट दिया और तुरंत सिम्मी को मिलाया

"हाय  दी....." उसकी चहक भरी आवाज़ सुनते ही पारा चढ़ गया.और सीधा पूछ लिया,
 "तेरा रोहन से झगडा हो गया है? ब्रेक अप हो गया और मुझे बताया भी नहीं??....यहाँ मैं....सारा दिन सोचती रहती हूँ...तेरी शादी कैसे करवाऊं...और तू है.." हर शब्द के साथ स्वर तेज होता जा रहा था...

"दीदी...दीदी...होल्ड ऑन प्लीज़....और इतनी तेज़ आवाज़ में मत बोलो..मुझे अपनी सीट से उठ कर आना पड़ा...तुम तो चिल्ला ही रही हो....कोई झगडा नहीं हुआ...तुम्हे सब बताउंगी,आराम से .." सिम्मी धीरे धीरे फुसफुसा आकर बोल रही थी.

पर वो कुछ सुनने के मूड में नहीं थी..."क्या बताएगी....और अब तक क्यूँ नहीं बताया....मैं बेवकूफ की तरह तुम दोनों के बारे में सोचती रहती हूँ..."

"दीदी अभी बहुत काम है....तुम घर आ जाओ...बात करते हैं..मैं जा रही हूँ....काम करने" कह कर फोन काट दिया, उसने.

दो मिनट ठगी सी खड़ी रह गयी....अच्छा तमाशा है, जब चाहो अपने जीवन में शामिल कर लो, जब चाहे मक्खी की तरह निकाल  कर फेंक दो. दुबारा फोन  मिला ये सब कहने का मन हुआ...पर वो जानती है सिम्मी ने साइलेंट पर रख दिया होगा, मोबाइल और अब नहीं उठाएगी.

माँ को ही फोन लगा कर कहा, " शाम को आती हूँ ...आर्यन को लेकर"

बुरी तरह परेशान हो रही थी...काम करने की गति भी कम हो गयी. किसी तरह , काम निबटाए और आर्यन के आते ही उसे खाना खिला.मम्मी के यहाँ चलने की तैयारी कर ली...आने दो ड्राइंग में 'सी ' या 'डी' अभी उसे सारी बात जाननी जरूरी थी. वह सोने को बेचैन हो रहा था पर उसे कार में जबरदस्ती डाला...सीट बेल्ट से बंधे  आर्यन का सर बार-बार इधर-उधर लुढ़क रहा था. दया  भी आ रही थी...एक नज़र सड़क पर..एक नज़र आर्यन पर रखते किसी तरह, घर पहुंची. (अब भी खुद से मायका नहीं निकलता...घर ही आता है जुबान पर)

माँ देख हैरान  रह गयीं, "अरे शाम को आनेवाली थी ,ना..इस बेचारे को नींद में ही उठा लाई...ओह.."..वे आर्यन को गोद में ले सुलाने चली गयीं.

जब उसे अच्छे से थपकी दे..चादर उढ़ा...लौटीं तो उसने निढाल स्वर में पूछा..."अब बताओ शुरू से...क्या बात है"

"पर तू खुद भी बहुत थकी हुई लग रही है....थोड़ा आराम कर ले...फिर बात करते हैं "

"मैं ठीक हूँ...शुरू से बताओ....." सोफे पर अधलेटी हो कहा. माँ को क्या पता, यहाँ..थकान शारीरिक नहीं मानसिक है.

"वो मिसेज शौरी हैं ना...फ्लोरेंस   बिल्डिंग वाली...वे एक दोपहर  आई थीं, और अपनी बहन के बेटे के लिए सिम्मी का रिश्ता मांगने लगीं...सब तो ठीक है...पर लड़का मर्चेंट नेवी में है...यह बात मुझे और तेरे पापा को नहीं जम रही...हमने तो ना का ही सोच लिया था  ,पर यूँ ही सिम्मी से जिक्र किया तो कहने लगी.. क्या बुरा है.... "

"सिम्मी ने कहा ये..." विश्वास नहीं हो रहा था उसे, जरूर इसकी रोहन से लड़ाई हो गयी है. और रिबाउंड में यह दूसरे रिश्तों में बंधने की सोच रही है...कितने फ्रेंड्स का देख चुकी है,जैसे ही एक रिश्ता टूटता है...तुरंत ही बिना ज्यादा सोचे-समझे तुरंत ही दूसरे रिश्ते बना शादी भी कर लेते हैं.

"हाँ उसने ही सारी जानकारी जुटाई...मिसेज़ शौरी का लड़का विवेक ,सिम्मी के फेसबुक में फ्रेंड्स लिस्ट में है...और वो नितिन , विवेक के फ्रेंड्स लिस्ट में...विवेक के प्रोफाइल से जाकर उसके एल्बम देखे सिम्मी ने और बस तब से उसकी आँखे चौंधियाई हुई हैं...उसका आलिशान फ़्लैट...बड़ी सी गाड़ी...और उसके फौरेन ट्रिप  के फोटो..."

वो  यह सब तो सुन ही रही थी...साथ ही सोच रही थी, मम्मी कितनी सहजता  से फेसबुक, प्रोफाइल, फ्रेंड्स लिस्ट की बात कर रही हैं....सिम्मी के सान्निध्य में इन सारी चीज़ों से परिचित हो गयी हैं....और एक वो है...मम्मी से भी ज्यादा आउटडेटेड हो गयी है...बस नर्सरी राईम्स  और पिक्चर बुक में ही उलझी रहती है.

सिम्मी को दो बार मेसेज भेजा ...'जल्दी आओ'

कुछ समझ नहीं पा  रही थी. आखिर सिम्मी -रोहन के बीच क्या हो गया. मम्मी बता रही थीं...पापा  को भी यह रिश्ता पसंद नहीं..शिप्पीज़ के बारे में बहुत सारी बातें सुनी हैं...शराब पीते हैं...बहुत सारी बुरी आदतों के शिकार होते हैं...और उन्हें तो नहीं ही पसंद.....बेटी को अकेले  रहना पड़ेगा...अकेले घर संभालना पड़ेगा. हमेशा किसी की छत्रछाया में रहने वाली  माँ को यह सब गवारा होता भी नहीं. वह आधे मन से सब सुन रही थी....सिम्मी से बात करने की बेचैनी हो रही थी.

आर्यन उठ कर आ गया...उसकी ड्राइंग बुक..कलर पेन्सिल्स सब लेकर आई थी, पर मन नहीं हो रहा था, प्रैक्टिस करवाने का...वह भी उनींदा सा था..दूध का ग्लास सामने पड़ा था और वह ,शांत  सा बैठा था कि  कॉल बेल बजी और सिम्मी को देखते ही हज़ार वाट की मुस्कान छा गयी, चेहरे पर ...बिजली सा दौड़ा उसकी तरफ. सिम्मी ने भी..'मेरा राजा बेटा'...कहते उसे गोद में उठा...गोल-गोल घूमना शुरू कर दिया. यही सब आर्यन को  अच्छा लगता है...फिर दोनों छुक छुक रेल गाड़ी बना....पूरे फ़्लैट में घूमते रहें...वो गंभीर बनी बैठी रही..आखिर..सिम्मी ने ही पूछा..."ये दीदी को क्या हुआ है?"

"पता नहीं कुछ तबियत ठीक  नहीं लग रही इसकी..मना किया...फिर भी चली आई...." मम्मी ने चिंतित  हो, कहा.

सिम्मी भी गंभीर हो गयी...उसे पता चल गया...दीदी क्यूँ चुप है.

थोड़ी देर को उसका चेहरा म्लान हुआ फिर आर्यन के साथ खेलने लगी...आखिर उसने ही गुस्से में बोला, "आर्यन दूध ख़त्म करो.."

 सिम्मी ने ही डरने की एक्टिंग की "चलो..चलो...भागो यहाँ से..मम्मी गुच्छा है..."और दूध का ग्लास ले बालकनी में चली गयी.

दूध ख़तम करवा कर खाली  ग्लास लिए, सिम्मी आई..."देखो बता दो..मम्मा को, मैं कितना राजा बेटा हूँ ..सारा दूध फिनिच कर लिया ..."

उसने मम्मी से कहा, "मम्मी....आर्यन को गार्डेन में ले जाओ..."

"अरे, उसे प्रैक्टिस नहीं करवाएगी...उसके ड्राइंग का एग्जाम है ना कल"

"नहीं..मूड नहीं है..."

मम्मी उसे अबूझ सी देखती रहीं....क्या हो गया है उसे.

"आर्यन...नानी के साथ  जाओ गार्डेन में..."

"मुज्झे नहीं जानाssss...मैं मासी के साथ ट्रेन ट्रेन खेलूँगा...." आर्यन ने जिद की.

उसने उसे गोद में उठाया और हाथ पैर पटकते आर्यन  को लिफ्ट तक ले आई...मम्मी भी साथ चली आयीं...चीखते -चिल्लाते आर्यन  को उसने लिफ्ट में खड़ा कर, लिफ्ट बाहर से बंद कर दी ...मम्मी  ने उसे गोद में उठा पुचकारते हुए ग्राउंड  का बटन प्रेस कर दिया...पर उनके चेहरे से गुस्सा साफ़ झलक रहा था. उन्हें इस बात का क्या इलहाम कि वो किस कशमकश से गुजर रही है. आर्यन तो झूला देखते ही तुरंत बहल जाएगा...मम्मी को भी उनकी सारी सहेलियाँ मिल जाएँ तो अच्छा...घंटा- दो घंटा वो लोग नीचे ही रहें ताकि...वो आराम से बात कर सके सिम्मी  से.

लौटी तो सिम्मी ने छूटते ही कहा...." बच्चे पर क्यूँ गुस्सा निकाल  रही हो..."

"क्या करूँ तो....तुम तो ऐसे एक्टिंग कर रही हो जैसे....कुछ हुआ ही नहीं..." चिल्ला ही पड़ी जैसे वो...

"रिलैक्स दी...इतनी परेशान क्यूँ हो..."

वो भी शांत हो सोफे पर बैठ गयी..." सिम्मी क्या है ये सब..."

"हम्म....क्या पूछना है तुम्हे....पेश हूँ, तुम्हारे दरबार में...दागो..सवालों की गोली.." कुछ नाटकीयता से कहा उसने.

"सिम्मी ये सब एक्टिंग रहने दे....और बता..रोहन से झगड़ा हुआ....?"

"ना.."

"फिर इस रिश्ते के लिए हाँ...कैसे कह  दी?"

"हाँ... कहाँ..कहा है ??"

"पर  कंसीडर तो कर रही है ना..."

"कुछ सोचा नहीं दी...समझ नहीं आ रहा...मैं अभी का नहीं...पांच साल बाद का सोच रही हूँ...क्या हमारे रिश्ते इतने ही ख़ूबसूरत रह जाएंगे. क्या यही तस्वीर रहेगी रिश्तों की....लगता है सब कुछ बदल  जाएगा....वह ऑफिस से आकर किसी बात पर चिल्लाएगा...मैं किसी और बात पर झल्लाउंगी  और वजह कुछ और होगी. ...सब कुछ इतना रोज़ी रोज़ी नहीं रहेगा....उसपर से तुम्हारे  और मम्मी के रहने की वजह से मुझे घर का कुछ काम भी नहीं आता. रोहन क्या मुझपर नहीं चिल्लाएगा...उसकी मॉम इतनी एफिशिएंट हैं..."

"ये सब इतनी गंभीर बातें नहीं हैं....वैस भी खुद पर पड़ती  है..तभी सब सीखते हैं..तू भी सीख लेगी..."

"बात सिर्फ वही नहीं दी...किसी भी मैरिड कपल को देखो..पांच साल बाद बताया नहीं जा सकता कि   उनकी अरेंज्ड मैरेज है या लव मैरेज ...सब एक से दिखते हैं...वही एक दूसरे से, एक सी शिकायतें....एक से झगडे....एक से समझौते...जो ज्यादातर लेडीज़ को ही करने पड़ते हैं...चाहे उसने लव मैरेज की हो  या अरेंज्ड...फिर जब बाद में समझौते करने ही हैं...तो अभी क्यूँ नहीं..? "

"यानि कि तुमने फैसला  कर लिया है? "

"फैसला तो एज सच कुछ नहीं किया...एक्चुअली..एम सो कन्फ्यूज्ड.."

"हम्म...जब प्यार में सोचना..समझना पड़ जाए तो क्या कहा जाए..."

"दी..मैं तुम्हारी तरह भावुक नहीं हूँ....रियलिस्टिक वे में सोचती हूँ...रोहन के साथ लाइफ बहुत टफ नज़र आती है...सारी ज़िन्दगी निकल जायेगी..पैसे जोड़ते...एक बड़ा फ़्लैट ले लें..गाड़ी ले लें..वेकेशन ट्रिप पर जाएँ...हर चीज़ के लिए सोचना पड़ेगा....दोनों, दिन रात पसीना  बहायेंगे....फिर भी पूरा नहीं पड़ेगा..."

"तो ये तो तू पहले से जानती थी...कि पापा हर हाल में रोहन से ज्यादा कमाने वाला ही ढूंढेंगे...फिर क्यूँ कदम बढ़ाया ..."

"ये कभी नहीं सोचा था...इतना, ज्यादा .......सिम्मी कुछ कहते कहते रुक गयी..."

"हाँ हाँ कह दे....सोचा था जीजू जैसा ही कोई ढूंढेंगे......"

"दी..तुम पर्सनली क्यूँ ले रही हो....वी  ऑल नो...जीजू अर्न्स सो वेल.."

"पर हमारा...पौश कॉलोनी में घर तो नहीं है..फौरेन ट्रिप्स पर तो नहीं जाते..बी.एम.डबल्यू. तो नहीं है...
"ही ही  दी.....बी.एम.डबल्यू तो उसके पास भी नहीं है...".सिम्मी खी खी कर हंसने लगी...

"सिम्मी तुझे सिर्फ पैसे की चमक दिख रही है....क्या सारा सुख पैसों से ही  मिल जाएगा...उन घरों में परेशानी... फ्रस्ट्रेशन...झगडे .. नहीं होते?

"वो रहेगा कहाँ...झगडे करने के लिए...वो तो शिप पर होगा "

"यू आर सो मीन....फिर रोहन का दिल क्यूँ तोडा...तुझे शुरू में ही कहा था....सोच समझ कर ही आगे बढ़ना"
"
दी..ऐसा भी कुछ नहीं है...आजकल सब मेंटली प्रिपेयर्ड रहते हैं...नहीं वर्क आउट हुआ रिलेशनशिप... तो टाटा बाई बाई...कोई देवदास नहीं बनता...एक्चुअली..कभी भी नहीं बनते थे ..नहीं तो इतने  सालो से एक ही देवदास का नाम क्यूँ लिया जा रहा है....दस-बीस-सौ देवदास क्यूँ नही हुए?...और रोहन भी इतना  कोई आइडियल लड़का नहीं है...आजकल का है..सबकी अपनी कमियाँ  हैं...उसने भी मुझे ही गर्लफ्रेंड क्यूँ चुना...स्मार्ट कॉन्फिडेंट लड़की..सबको चाहिए ताकि दोस्तों में धाक जम सके...वरना उस निधि को क्यूँ  एवोयाड करता रहता है..बेचारी कितना केयर करती है इसका...रोज़ एस.एम.एस करती है....अपनी सारी बातें शेयर करती है...रोहन के बर्थडे पर इतने सुन्दर गिफ्ट देती है....रोहन भी ये सब एन्जॉय करता है...कितनी बार कहा...'उसे ऐसी झूठी आशाएं मत दिलाओ...वो तुमसे प्यार करती है''...तो हंस कर उड़ा देता है कि वो डम्ब है...उसे डम्ब लगती है क्यूंकि...सीधी साधी सी है...फील सो बैड समटाइम्स ."

" बट रोहन लव्स यू...इसलिए उसे भाव नहीं देता..."

"तो फिर साफ़-साफ़ उस से कह क्यूँ नहीं देता....उसे मेरे बारे में बताता क्यूँ नहीं...रोहन भी इतना सीधा  नहीं है...जितना दिखता है..इगो कूट कूट कर भरा हुआ है...मेरा सेल एक बार घर पे छूट गया था...दो बार कॉल किया...मैने नहीं उठाया तो बस नाराज़ हो गया कि मैं उसे इग्नोर कर रही हूँ....वहीँ मैं...एक बार उसका फोन नहीं लग रहा  था...उसके कितने दोस्तों को फोन कर डाला ..ऑफिस  में फोन किया...आखिर उसको ढूंढ ही निकाला...और इसने कोई एफर्ट नहीं लिया, मेरे बारे में पता करने का......दी, हम लडकियाँ सेंटीमेंटल होती हैं...इन्हें सारी ज़िन्दगी मान लेती हैं...जबकि  ये लोग हमें अपनी ज़िन्दगी का बस एक पार्ट ही समझते हैं..

"पता नहीं तेरी बातें..मेरी समझ  में नहीं आतीं...मैने तुम दोनों को साथ देखा है.....और तुम्हारी आँखों में एक दूसरे के लिए स्नेह भी...

"हम्म...जो दिन गुजरे..अच्छे थे..नो डाउट....पर इसकी गारंटी नहीं कि हमेशा अच्छे ही रहेंगे..."
"
"गारंटी किस चीज़ की है...एक शिप्पी के साथ लाइफ कितनी टफ होती है...पता है...?..सब कुछ अकेले संभालना पड़ता है...छः से आठ महीने तो वो शिप पर रहेगा.."

"साथ में सेल करने को तो मिलेगा, ना...वो पेरिस...स्विट्ज़रलैंड...वेनिस...वाऊ...कभी सोचा भी नहीं था..देख पाउंगी...रोहन के साथ तो दस साल में बहुत हुआ तो सिंगापुर और मॉरिशस से ज्यादा के सपने भी नहीं देख सकती."

"इट्स सो डिस्गस्टिंग...कितनी मेटेरियालिसटीक  है तू...बाद  का नहीं सोचती...अकेले गृहस्थी संभालनी पड़ेगी...बच्चे आ जाएंगे तो सेल कर पाएगी...सब अकेले देखना पड़ेगा."

"अब ये सब फंडे मुझे मत दो...तुम क्या अकेले नहीं संभालती सब..? यहाँ की सारी औरतें..अकेले ही तो ढोती हैं..गृहस्थी का बोझ...मुझे इतना गुस्सा आया था...जब तुम लेबर रूम में  दर्द से छटपटा रही थी...और जीजू किसी दूसरे शहर में मुस्कुरा कर मीटिंग अटेंड कर रहें थे...मैं सोच रही थी...अभी खबर सुन कर लड्डू बाँट देंगे..लो मैं बाप बन गया...और मिल जाएगा  बेटे को उनका नाम. क्या फर्क पड़ता है....पति सात समंदर दूर  हो..या सात सौ किलोमीटर दूर...पास तो नहीं होता,ना.."
"वे लोग बीवी-बच्चों   के लिए ही तो करते हैं ये सब..."

"अब उनकी जुबान भी मत बोलो...सब समझौता है.....औरतें खुद को धोखा देती हैं...ये सोच...जो मैं खुली आँखों से स्वीकार करना चाहती हूँ...दीदी तुम नहीं समझोगी..एक सिक्योर्ड घर से दूसरे सिक्योर्ड घर में चली गयी हो...ज़िन्दगी सिर्फ, गुलज़ार की नज्मे और जगजीत की गज़लें नहीं हैं दी...और ये फूल,खुशबू, चाँद की बातें भी तभी अच्छी लगती हैं...जब रोटी-कपड़ा-मकान की फ़िक्र ना हो..."
"हम्म....तो ये मुझ पर व्यंग्य है.."
"ऑफ कोर्स नॉट...बस तुम्हे नेकेड ट्रुथ दिखाना चाह रही हूँ..."

"इट्स नॉट नेकेड ट्रुथ...तुम्हारा सच है ये....और आधा सच....आज भी  लोग हैं...प्यार, विश्वास और ईमानदारी पर मर-मिटने वाले..."

"मैने कब कहा नहीं हैं...होंगे इमोशनल फूल्स...पर मैं नहीं बनना चाहती..."

"इट्स गुड़...सिम्मी..कि तूने इतनी जल्दी ही फैसला ले लिया...और उसकी ज़िन्दगी से निकल आई...तुम दोनों एक दूसरे के लिए नहीं बने थे....और तुम्हे क्या लगता है...इस शिप्पी गाइ ने तुम्हे क्यूँ पसंद किया....उसे भी एक ख़ूबसूरत स्मार्ट बोल्ड...बीवी चाहिए बस...जो उसकी अनुपस्थिति में उसके पैसों का.... उसके घर का अच्छी तरह ख़याल रख सके.."

"आइ नो..मैं किसी मुगालते में नहीं हूँ...उसने मेरे फेसबुक प्रोफाइल्स पर मेरे अपडेट्स पढ़कर और मेरे फ़ोटोज़ देखकर ही प्रपोज़ल भेजा है..विवेक बता रहा था...सो इट्स गिव एन टेक...मैं ये नाइन टु फाइव जॉब छोड़ एक बढ़िया सा बुटिक खोल लूंगी...अपना काम होगा...आराम की ज़िन्दगी...पति सारे समय सर पे नहीं बैठा होगा...और जब आएगा...तब भी मेरे पीछे ही घूमेगा,...यू नो ना..इन शिप्पिज़ का कोई सोशल सर्कल नहीं बन पाता...जहाँ बीवी ले जाए...वहीँ जाएंगे...सो नो टेंशन.
"हम्म तो अब क्या बोलूं...जब तूने इतनी दूर तक सोच लिया है...जो सोच तू तेरी ज़िन्दगी है,ये

"थैंक्स  दी..मुझे ये डिसीज़न लेने में हेल्प करने में...तुम्हे सारे तर्क देते देते...खुद को भी समझा  लिया. "

बिलकुल थक गयी थी, वो.... लगा मीलों दौड़ कर आई हो...अब थोड़ी देर अकेले रहना चाहती थी...बोली," चलो..जाकर आर्यन को ले आऊं...अब जाना भी होगा..."

"सॉरी दी..यू  आर हर्ट.....कैन सी दैट.....बट एम हेल्पलेस...हमारा ज़िन्दगी को देखने  का नजरिया बिलकुल अलग है...'

"तू बस खुश रहें...मुझे और क्या चाहिए.."

थके कदमो से बाहर निकल आई....मन में भी यही कहा...'आज इसे पैसों की चमक में ही असली ख़ुशी लग रही है...कल कहीं इन्हीं पैसों से भाग...योगा, मेडिटेशन, विपासना में मन की शान्ति ढूँढती ना फिरे.'

खुद पर भी गुस्सा आ रहा था...उसे जो सब नहीं मिला..इनके माध्यम से पूरा करने की कोशिश क्यूँ कर रही थी...यह सिम्मी की  ज़िन्दगी थी..उसके सपने थे...पर देख वो रही थी...और तभी जब ये सपने टूटे तो उसकी किरचें चुभ कर उसका ह्रदय लहू-लुहान किए जा रही थीं. हताश सी लिफ्ट का बटन प्रेस कर दिया और सोचती रही..काश कोई परिचित चेहरा ना मिले और थोड़ी देर अकेली बैठ वो इन चुभती किरचों को निकाल सके.

(समाप्त )

( आपलोगों को सॉरी भी बोल दूँ..एक तो इस किस्त  को पोस्ट करने में इतनी देर हो गयी...और फिर मॉडरेशन भी लगाना पड़ा...इस असुविधा के लिए सचमुच खेद है ,पर मजबूरी थी.  कुछ  विचारों  की असहमति की वजह से एक पुराने पाठक ने  अलग-अलग फेक प्रोफाइल बना पहले तो मुझे विधर्मी , धर्म विशेष की अनुयायी वगैरह  कहा.जब कमेन्ट नहीं पब्लिश किए तो उनकी  अंतर्दृष्टि अचानक जाग गयी और उन्हें अब मेरा लिखा, वाहियात,घटिया और सस्ता लगने लगा...जैसे किसी सस्ती पत्रिका ,मनोहर कहानियाँ से कॉपी किया गया हो. समय के साथ विचार भी परिवर्तनशील होते हैं. कोई बात नहीं...और उन्हें विचारों  की अभिव्यक्ति की भी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए .पर अपनी सही प्रोफाइल के साथ कहने की हिम्मत होनी चाहिए. लाइव ट्रैफिक से ही उनकी सही प्रोफाइल का अंदाज़ा हो गया था क्यूंकि कमेन्ट और ब्लॉग विजिट का समय एक ही था. फिर एक शुभचिंतक ने आइ.पी एड्रेस ट्रेस करके  भी उनका सही नाम-पता बता दिया.

उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत थी कि किसी ने अपनी साईट पर मेरा परिचय 'साहित्यकार ' कह कर कैसे दिया? अब क्या जबाब दूँ इसका?..आज ही 'स्वाभिमान टाइम्स' में मेरे आलेख के साथ मेरे परिचय में 'साहित्यकार' लिखा है. :) (कटिंग साइड बार में लगा दी है ) .अब ये मुझसे पूछकर तो नहीं लिखते...:) यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  है.

एक अपील है...फेक प्रोफाइल वालों के आरोपों ,प्रश्नों का मैं कोई उत्तर नहीं दूंगी...यह मेरी कहानियों का ब्लॉग है और इसकी sanctity  मैं बनाए रखना चाहती हूँ )

Thursday, October 28, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की ( कहानी -२)

(छोटी बहन सिम्मी ने ,एक लड़के रोहन से अपने प्रेम की बात बतायी थी. रोहन , अपनी माँ के साथ अकेले रहता था..उसके माता-पिता का डिवोर्स हो चुका था. )
 

गतांक से आगे 

आर्यन को ले, घर लौट आई थी पर पूरे  समय उसके दिमाग में सिम्मी और रोहन के रिश्ते ही छाये रहते . चाहे जो हो,वो अपनी बहन की खुशियाँ नहीं बिखरने देगी. खुद तो कभी प्यार जाना नहीं. माँ का इतना सख्त अनुशासन था . कॉलेज में कदम रखते  ही उसे बिठाकर एक घंटे लेक्चर  और ढेर सारी हिदायतें दी थीं. हर वाक्य के अंत में होता, 'तुम्हारी एक छोटी बहन भी है...तुम्हारी किसी भी हरकत का असर उस पर भी होगा." और वो पूरे समय  एक आदर्श बड़ी बहन का रोल निभाती रही और छोटी बहन ने ही गुल खिला दिए. माँ की उलझन वो समझती थी. उन्हें उसके माध्यम से अड़ोसी-पड़ोसी रिश्तेदारों सबको यह दिखाना था कि उन्होंने कितनी अच्छी परवरिश की है. जब भी छुट्टियों में अपने शहर जातीं...सब हिदायतें देते..'बड़े शहर में रहती हो जरा,लड़कियों पर ध्यान रखा करो...ऐसा ना हो बाद में रोना पड़े" और माँ का सख्त शिकंजा जरा और मजबूती से कस जाता.

वह भी डरी डरी सी ही रहती, कॉलेज में उस  मनीष ने कितनी बार करीब  आने की कोशिश की..असाईन्मेंट्स  के बहाने...बुक्स के बहाने. उसे भी घुंघराले बालों वाला, लम्बा -पतला...बेपरवाह चाल वाला ,मनीष अच्छा लगता,  पर वो अपनी सहेली संजना से ही  चिपकी रहती. आखिरकार  बाद में सुना उसका नाम 'आइस बेबी' रख छोड़ा है उसने. जिस दिन वो नहीं आती, संजना बताती...सारा दिन कहते रहता..'कितनी गर्मी है आज...वो 'आइस बेबी' भी तो नहीं आई.' फिर भी उसकी हिम्मत नहीं हुई. जब अपने नेटिव प्लेस की कजिन्स को देखती तो लगता छोटे शहर में रहकर भी वे ज्यादा आज़ाद हैं. छत पर अपनी सहेलियों से लड़कों की ऐसी ऐसी बातें करतीं कि वो दंग रह जाती. पर वो तो फ़्लैट में रहती थी और उसपर मम्मी के खड़े कान  और सतर्क नज़र. कॉलेज का भी सारा टाइम टेबल उन्हें पता होता. दस मिनट भी लेट हो जाती तो सौ सवालों  के जबाब देने पड़ते. बस कॉलेज बंक कर के कैंटीन और गार्डेन में टाइम पास किया है. इस से ज्यादा तफरीह नहीं की कभी.

फिर भी सोचती, चलो कॉलेज के बाद जॉब करेगी ,तब तो अपनी मर्जी की मालिक होगी.पर पापा को किसी ने सुनील का रिश्ता बताया और फिर चट मंगनी पट ब्याह . वैसे सिम्मी उसपर चुपचाप गाय जैसे सर झुका कर शादी कर लेने का इलज़ाम लगाती है .पर बात वो नहीं थी...उसने डरते-डरते ही सही, पर विरोध किया था. और तब पापा ने बड़े प्यार से समझाया था. संयोग से इसी  शहर का लड़का है...वो अपने शहर मे ही रहेगी. शादी के बाद भी आगे पढ़ना चाहे ..कोर्स करना चाहे..नौकरी... जो चाहे कर सकती है. दो साल  बाद पता नहीं किसी  दूसरे शहर  का लड़का मिले...तो उसे जाना पड़ेगा.आखिर दो-चार -पांच साल बाद शादी तो करनी  ही है. एक बार सुनील से मिल ले..ना अच्छा लगे तो ना कर दे और वे मान लेंगे.

सुनील उसे बहुत सुलझे हुए लगे. और हैन्डसम,वेल मैनर्ड भी ( सिम्मी कहती है, तुमने उसके पहले किसी लड़के को नजर भर देखा कहाँ था, पहला लड़का देखा और दिल हार गयी.) उसकी आगे पढने की चाह नौकरी की ख्वाहिश सबमे हामी भर दी. और वह तो ख़ुशी से नाच उठी. सुनील से शादी की ज्यादा ख़ुशी थी या माँ के सख्त अनुशासन से निकल जाने की वो तय नहीं कर पाती. पर सारे मंसूबे धरे रह गए.एक साल बाद ही आर्यन आ गया और अब तो बस उसकी  दुनिया ,आर्यन ही है.

उसकी ज़िन्दगी तो एक बनी बनायी लीक पर चलती रही...पर सिम्मी ने विद्रोह कर दिया था....उसने मम्मी-पापा से साफ़ कह दिया था, वो दीदी की तरह पढ़ाकू नहीं और उसे ज्यादा पढने का शौक भी नहीं...ग्रेजुएशन के बाद नौकरी करेगी और कुछ साल तक शादी नहीं करेगी. पापा कितना मना कर रह गए थे, एम.बी.ए. कर ले...कोई अच्छा सा कोर्स कर ले ...पर उसकी ना तो ना...खुद ही वेकेंसी पता कर इंटरव्यूज़ के लिए जाती और एक अच्छी सी जॉब भी मिल गयी, उसे.

उसने भी हर कदम पर सिम्मी का साथ दिया था, कपड़ों के चयन की बात हो, या फ्रेंड्स के साथ देर रात न्यू ईयर पार्टी या गरबा में जाने की बात...हर बार वो माँ से उसके लिए लड़ पड़ती. जो कुछ, खुद नहीं जिया, सिम्मी के माध्यम से जीने की कोशिश थी,शायद. माँ ने उसे जींस पहनने से तो नहीं रोका..पर टी.शर्ट या कुर्ती लम्बी सी ढीली ढाली होनी चाहिए थी. माँ उसे खुद ही शॉपिंग  के लिए लेकर जातीं.और ओल्ड फैशंड कपड़े खरीदवा देतीं. हद्द  तो तब हो गयी थी,जब एक बार बारिश में उसके कपड़े नहीं सूखे थे और माँ ने बाकी कपड़े...प्रेस में दे दिए थे. माँ ने जबरदस्ती अपना सलवार कुरता पहनने पर मजबूर कर दिया था. उसके  आना-कानी करने पर डांट लगाई थी कि वो कॉलेज पढने के लिए जाती है या फैशन शो में भाग लेने. टेस्ट था इसलिए वो बंक भी नहीं कर सकी. सारा दिन मनीष की नज़रों से बचती  रही थी. पर उसने देख ही लिया और उसके ऊँचे गले और बेफिटिंग वाले कपड़ों को देख..'आइस बेबी' से बदल कर उसका नाम 'मुगले-आज़म' रख दिया था. घर पे आकर कितना रोई थी और सबने सोचा था, टेस्ट खराब हो गया है.

शायद इसी का बदला लेने को, सिम्मी के कॉलेज में जाते ही खुद उसे लेकर लिंकिंग रोड गयी थी और ढेर सारे तंग...छोटे टॉप्स खरीदवा दिए थे.माँ कुछ कहतीं..उसके पहले खुद ही कह दिया था....'मुझे तो मुगले-आजम के जमाने के कपड़े पहना ,  भेजती थी कॉलेज...अब इसे तो आज में जीने दो...." माँ के चेहरे का बदलता रंग देख..थोड़ा अपराधी मह्सूस  किया था और आगे जोड़ दिया.."ये इतनी दुबली-पतली है,इस पर अच्छे लगेंगे ये कपड़े" और मन ही मन कहा था.."मैं कौन सी मोटी थी...मुझपर क्या अच्छे नहीं लगते?? " . सुनील कोई टोका-टोकी नहीं करते...पूरी आजादी थी ,जो चाहे पहने ,पर आर्यन के जन्म के बाद खुद ही मन मसोस  कर रह जाती. जब किसी शॉप में शॉपकीपर  उसकी नाप के कपड़े के लिए अलग काउंटर पर भेज देता तो उसी वक़्त प्रण कर लेती, अब कल से ही जिम और डाइटिंग शुरू. पर यह प्रण बस रास्ते तक ही रहता घर आकर भूल ही जाती कि ऐसा कुछ सोचा भी था.अब कोई मोटिवेशन भी तो नहीं था.

माँ भी सिम्मी से उतनी सख्ती से पेश नहीं आतीं...शायद उन्हें संतोष हो गया था ,'एक बेटी को तो पारंपरिक  ढंग से पढ़ा-लिखा कर शादी कर दी' अब उनकी परवरिश पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकता. फिर भी रोहन से शादी की बात तो माँ भी ना मानें,चाहें रुमा आंटी उनकी कितनी ही अजीज़  हों. और पापा का तो सवाल ही नहीं उठता. उनकी तो साहनुभूति भी नहीं थी,रुमा आंटी के साथ. माँ के ,जिक्र करने पर अक्सर कह देते.."क्या पता, क्या बात थी,एक घर भी नहीं संभाल सकी. एक औरत का इतना इगो रखना अच्छा नहीं."  एक महिला सुचारू रूप से घर चला रही है, अकेले दम पर ,बच्चे की परवरिश कर रही है. शायद उनके पुरुष दर्प को यह बात आहत करती थी. फिर रोहन के पास अच्छी क्वालिफिकेशन भी नहीं थी. पापा भले  ही बरसों से महानगर में रह रहें हों.पर अभी भी डॉक्टर,इंजनियर, क्लास वन गवर्नमेंट ऑफिसर्स से आगे उनकी सोच नहीं जाती. सुनील का  भी आइ.आइ.टी. से होना उन्हें लट्टू कर गया था

उसे ही सब करना होगा.अगर माँ-पापा नहीं माने तो कोर्ट मैरेज करवा देगी,उनकी. विटनेस की जगह हस्ताक्षर करने की बात सोच ही रोमांचित हो उठती . आर्य समाज मंदिर में फेरे भी करवाने होंगे. पर इन सबके पहले सुनील को मनाना होगा. वे मम्मी -पापा के खिलाफ साथ देने को तैयार होंगे? ना तो ना सही...वो तो पूरा साथ देगी,उनका. फिर एक अपराध बोध भर आता मन में. क्या गुजरेगी, मम्मी- पापा  पर....छोटी लड़की उनकी मर्जी के खिलाफ शादी कर रही है और बड़ी बेटी साथ दे रही है...पर  कोई चारा भी तो नहीं...अब समय  के साथ नहीं बदलेंगे तो यह दुख तो सहना ही पड़ेगा...  रुमा आंटी के ना करने का तो सवाल ही नहीं. रोहन की ख़ुशी,उनकी ख़ुशी है. और अब तो रोहन से मिल भी चुकी है.बहुत पसंद आया था उसे.

सिम्मी ने ही एक दिन पूछा,'रोहन से मिलोगी ?..मैने उसे  दिया है कि तुम्हे सब मालूम है.' उसने घर बुलाना चाहा ,दोनों को तो सिम्मी ने मना कर दिया..'ये सब झंझट मत पालो...तुम किचन में खटना शुरू  कर दोगी...ऐसे ही कहीं साथ में कॉफी पीते हैं."

"पर आर्यन..."

"क्या दीदी...कभी...तो उसके बिना भी कुछ सोच लिया करो...इतनी औरतें...बच्चों को छोड़कर बाहर जाती हैं या नहीं...मम्मी के पास...छोडो..या नेबर या  किसी फ्रेंड के यहाँ...ये सब तुम जानो....फिर मुझे बता दो...किस दिन का प्लान है."

माँ के पास ही छोड़ना ठीक लगा...आराम से जितनी देर चाहे रुक सकती है. सिम्मी के साथ शॉपिंग का बहाना बनाया कि वो ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकल  आएगी. उस दिन बड़े यत्न से तैयार हुई. ढूंढ ढाढ   कर एक फैशनेबल टॉप और जींस निकाला. बाल खुले छोड़े. मस्कारा और आई लाइनर भी ट्राई करने की कोशिश की पर इतने दिन नहीं यूज़ करने से ड्राई हो  गए थे सब. ट्रेंडी ज्वेलरी भी निकाले...और जैसे खुद को ही आइने में पहचान नहीं पायी.

आर्यन ने भी उसे गौर से देखा और एक हाथ कमर पर रख  एकदम मवाली की तरह बोला...'ओ  मम्मा ...तुम कित्ती ब्यूटीफुल लग रही हो..."और फिर सब  किरकिरा कर दिया,यह कह कर ," "एकदम मेरी 'मिस डे ' टीचर जैसी." पूत के पाँव पालने में...अभी से टीचर्स को गौर से देखना शुरू कर दिया है. सोचा  उसने.

माँ भी एकबार चौंकी.फिर बोलीं...'हम्म तो दोनों बहने आज एन्जॉय  करने जा रही हैं"

थोड़ा झिझकी वो,"अब सिम्मी के साथ जाना है..पता है,ना..जरा सा ढीली-ढाली रही तो बीच बाज़ार में ही डांट देगी मुझे"

"उस लड़की से तो भगवान बचाए...कैंची की तरह जुबान चलती है...पर तू बहुत अच्छी लग रही है, ऐसी ही रहा कर.."

गुस्सा आ गया उसे,मन ही मन कहा..."हाँ...जब अच्छी लगती थी तो पहनने  नहीं दिया...और अब ना  समय मिलता है .ना कपड़े फिट आते हैं...ना सजने-संवारने की चाह तो कहती हो..ऐसे ही रहा कर..."

जल्दी से बाहर निकली,पहला मौका था जब यूँ आर्यन के बिना...बाहर जा रही थी. कॉफी शॉप तो दूर किसी रेस्टोरेंट में जाना भी बंद हो गया था. एक बार आर्यन ने वेटर के प्लेट रखते ही चम्मच उठा खट से प्लेट पर मारा और प्लेट टूट गयी. और एक बार तो टेबल पर चढ़ डांस करने की कोशिश करने लगा. सारे लोग देख रहें थे. उसे तो उतना बुरा नहीं लगा, सबके बच्चे इस उम्र में ऐसा ही करते  हैं.पर सुनील काफी एम्बैरेस्ड हो गए थे और बिलकुल बंद कर दिया था,बाहर जाना...अब सिर्फ वे लोग गार्डेन में जाते या किसी 'बीच' पर. वहाँ जाने के लिए क्या तैयार होना? बहुत दिनों बाद ये मौका आया था.

कार में खुद को अकेले पाकर एक अलग ही अनुभूति हुई. हालांकि आर्यन  के लिए ही गाड़ी चलानी सीखी. वरना सुनील तो कितनी बार कहते, 'मैं ट्रेन से जाता हूँ,कार पड़ी रहती है,सीख लो'. पर अंदर छुपी भीरु लड़की ने हिम्मत नहीं की. फिर एक बार सिग्नल पे इतना धुंआ था  कि आर्यन का तो गला चोक होते-होते बचा. ऐसी खांसी उठी कि चार घंटे हॉस्पिटल में रखना पड़ा. ऑक्सीजन दी गयी तब वो ठीक  हुआ. सुनील बहुत बरसे ," हफ्ते में दस दिन, अपनी  माँ के यहाँ जाना तो छूटेगा नहीं...बच्चे पर तो रहम करो...गाड़ी पड़ी रहती  है पर नहीं चलानी ...तुम्हे तो किसी गाँव में होना चाहिए था " (उनका गुस्सा देख, ध्यान भी नहीं दिलाया कि हफ्ते में दस नहीं, सात दिन होते हैं ) उसके बाद से ही हिम्मत कर गाड़ी चलानी सीखी.....वो अलग बात है कि ,वीकेंड्स पर सुनील का अधिकार रहता है कार पर और उनको हज़ार अदृश्य आवाजें सुनायी देने लगती हैं...शिकायत जारी रहती  है....'कार का ये खराब हो गया है..वो ख़राब हो गया है'. और जब वो चलाती तो वे सारी आवाजें गायब हो जाती हैं, शायद अगले वीकेंड्स तक और अब तो आदत ऐसी खराब हो गयी है  कि जरा 'धनिया पत्ता' भी लेना  हों तो गाड़ी लेकर ही जाती है ..हालाँकि, इसीलिए 'वेईंग  स्केल'  पर नंबर भी बढ़ते जा रहें हैं. पर आज तो इतने दिनों बाद हलके  मूड में है और  मौसम भी साथ दे रहा था. बादल छाये थे और हल्की हवा चल रही थी...मन हुआ ए.सी.बंद कर शीशे नीचे कर दे...फिर सोचा ..एक तो बाल खराब हो जाएंगे और फिर बाहर की सारी चिल्ल-पों भी अंदर आयेगी.सिग्नल पर बच्चों की भीड़  टूट पड़ेगी, सो अलग.. ना यही ठीक है. और ऍफ़.एम. का वो चैनल लगाया जहाँ सिर्फ नए गाने आते थे.....मन  ही मन कहा..'अंदर बाहर सब से वन  शुड फील यंग'....इतनी आज़ादी महसूस  हो रही थी कि मन हो रहा था...ये सफ़र ख़त्म ही ना हो..लौंग ड्राइव पर चली जाए. उलटी दिशा में जाने से ट्रैफिक भी नहीं था. गाना सुनते , कुछ गुनगुनाते स्टीयरिंग व्हील पर ही उँगलियों से ताल देते खुद में ही मगन थी कि मोबाइल बज उठा. देखा,सिम्मी का ही फोन था..पर उठाया नहीं..सामने ही कॉन्स्टेबल नज़र आ रहा  था...अगर फाइन ठोक दी तो अभी से सपनो की दुनिया से धरातल पर आ जाएगी.

पर सिम्मी के फोन ने धरातल पर ला ही दिया था...वो पहुँच गयी थी और उसका इंतज़ार कर रही थी. कार की स्पीड बढ़ा दी...कॉफी शॉप पर तो  पहुँच गयी.पर पार्किंग की झंझट .यही एक वजह है कि ऑटो से आना ही जमता है. काफी दूर जाकर ही पार्क किया और दूरी देखकर सोच में पड़ गयी. ऐसा रास्ता और उसकी हाई हील की सैंडल. कम से कम ये तो नहीं पहनती. उसने पूरी छूटी कसर निकालने की कोशिश की और अब फंस गयी. आदत भी छूट गयी थी.मन ही मन प्रार्थना की,रहम करना ईश्वर..सब संभाल लेना.

बाहर ही सिम्मी एक हैंडसम लड़के के साथ खड़ी  थी.ये रोहन इतना लम्बा कब हो गया? उसे तो गोरा,चिकना चुपड़ा चेहरा ही याद था पर फूटबाल खेल खेल  कर धूप ने अच्छा tan कर दिया था उसके स्किन को..उसपर वो rugged look . फौर्मल्स ही पहने थे.पर कमीज़ पैंट से बाहर  निकली हुई थी और शर्ट की बाहँ ऊपर तक मोड रखी थी. एक हाथ जेब में डाले लापरवाही से खड़ा था. सिम्मी ने ठीक ही कहा  था, टी.डी.एच. स्वभाव,मैनर्स की बात तो अलग...लडकियाँ तो इस रूप पर ही मर मिटें.

सिम्मी की आँखे फ़ैल गयी उसे देखते ही और होंठ गोल हो गए. शुक्र हुआ उसने सीटी नहीं बजायी. (घर मे तो बजा ही देती है.) उसने उसे आँखे दिखाईं और "हलो रोहन"...कहती आगे बढ़ गयी. रोहन बड़े अपनेपन से मिला. उनकी पुरानी जान-पहचान की लौ जैसे जल उठी. वे लोग बिल्डिंग में साथ मिलकर खेले जानेवाले दिनों की बात करने लगे. वो कई लड़कों के बारे पूछने लगी...'अभी क्या कर रहें हैं..कहाँ हैं'...सिम्मी ही थोड़ी उपेक्षित सी हो गयी थी और इसे, उस से पहले गौर किया रोहन ने..." क्या ऑर्डर किया जाए सिम्मी?" फिर खुद ही बोला..."इसकी तो फेवरेट है ब्राउनी और कोल्ड कॉफी ..आप क्या लेंगी दीदी?"

उसके दीदी कहने पर सिम्मी और वे दोनों चौंकी..पर रोहन की नज़रें मेन्यू कार्ड पर थीं...पर उसे कुछ आभास हो गया...नज़रें हटा कर उनकी तरफ देखा और समझ गया. मुस्कुरा कर बोला," दिन में बत्तीस बार तो दीदी... दीदी... सिम्मी के मुहँ से सुनता हूँ....तो मैने भी कह दिया...होप नो ऑब्जेक्शन?"

सिम्मी जैसे चिल्ला   पड़ी.."ऑब्जेक्शन??...अब तो तुम्हारे सात खून भी माफ़ होंगे,  किसी ने दीदी कहा इन्हें  और हमेशा के लिए गुडबुक्स में गोल्डेन लेटर्ज़ में नाम दर्ज. मुझसे भी ज्यादा भाव मिलेगा तुम्हे..."

"ऐसा नहीं है....प्लान करके नहीं....पर अगर अपनेआप मुहँ से निकल आए तो अच्छा लगता है... यू  कैन कॉल मी दीदी....वुड लव इट...एक्चुअली..तुम  हमेशा से छोटे भाई से ही लगते थे.."

तभी  सिम्मी ने हलके से मेज़ थपथपाई ...'हलो...ये म्युचुअल एडमायरेशन सोसाइटी से बाहर निकलो तुमलोग...मैं भी यहाँ हूँ.."

और रोहन ने इतनी प्यार भरी नज़र डाली सिम्मी पर कि उसने एक छोटी सी प्रार्थना  बोल डाली मन ही मन.."हे ईश्वर इन आँखों का प्यार यथावत कायम रखना हम्मेशा"

कॉफी के घूँट भरते  इतनी बेतकल्लुफी से बातचीत होती रही कि लगा, तीन पुराने दोस्त मिल बैठे हों. दोनों का व्यवहार बिलकुल संयत  था. ऐसे जैसे भी रहते हों..पर उसके सामने बड़े सलीके से बैठे थे. बस बीच-बीच में स्नेह से नहलाती ,रोहन की नज़रें...ठहर जातीं,सिम्मी पर और  सिम्मी सल्लज मुस्कान के साथ बाहर देखने लगती. उसने अनदेखा सा कर दिया वरना बेमतलब दोनों कॉन्शस हो उठते.

जब बिल देने की बारी आई तो रोहन ने अपने लम्बे हाथों से बिल उठा कर एकदम ऊपर कर लिया...."ना..इट्स अ मैन जॉब...नो वे..  एम नॉट गोइंग टु लेट यू  पे....सवाल  ही नहीं उठता..."

"रोहन मैं बड़ी हूँ...तुम दोनों से..."

"अरे दीदी छोडो,ना...मुझे आइसक्रीम खिला देना, नैचुरल्स में.. बस..."

"अच्छा  मुझे क्यूँ नहीं फिर..." रोहन था..

"हा हा...फिर ठीक है...तुम दोनों ही खा लेना,बाबा " उसने भी बिल छीनने की कोशिश छोड़ दी.

बाहर निकली तो सिम्मी बोल पड़ी..."आज तो ट्रेन के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे...दीदी तुम अक्सर आ जाया करो,ना...रोहन आज क्लास छोड़ो..चलो..कार की  सवारी मिल रही है..."

"ना..क्लास तो नहीं छोड़ सकता...ओके दी..मिलते हैं फिर...बाय दी..बाय सिमी.."

और वह सड़क पार कर  हाथ हिलाता चला गया. सिम्मी देर तक देखती रही  उसे. जब उसने उसके  कंधे पर हाथ रख  कहा, "चलें.." तो शर्माती हुई जल्दी जल्दी  कदम बढाने लगी. फिर बोली.."आज तो क्या लग रही हो तुम....मेरे बॉयफ्रेंड  से मिलने आई थी या अपने..."

"मैं तो अपने छोटे भाई से मिलने आई थी..."

"अहा...बड़ा छोटा भाई...बट दीदी यू आर लुकिंग सो प्रिटी..कितनी बार कहा....जरा अपनी तरफ ध्यान दो..."

"सब यही कह रहें हैं....जैसे पहले मैं कोई घसियारिन   लगती थी..." गुस्सा आ गया था,उसे. इतने बुरे तरीके से तो नहीं रहती थी.

जरा जोर से ही कार का दरवाजा खोल कर अंदर बैठी तो सिम्मी हंसने लगी.."कहाँ कहाँ से ये सारे वर्ड्स याद रखती हो..घसियारिन ..हा हा "

जब वो गुस्से में मुहँ फुलाए रही ...तो सिमी ने बिलकुल उसके ड्राइवर की  नकाल उतारी.."कबी बी गुस्से में गाड़ी नई  चलाने का...भूल गयी उस मराठी ड्राइवर का लेसन...."

वो भी हंस पड़ी..."क्या करूँ ..आर्यन तक ने यही कहा....अब जरा ढंग से रहना  पड़ेगा..."

"अच्छा दी..रोहन कैसा लगा?."....सिम्मी ने थोड़ा गंभीर होते हुए पूछा .

"डैम कूल.....क्या लुक्स हैं....क्या आवाज़..एन क्या पर्सनैलिटी...सोचा ही नहीं था वो पिद्दी सा लड़का.....इतने हैंडसम डूड में बदल  जायेगा...और उस पे इतने माइल्ड मैनर्स वाला.....स्वीट बॉय     यू  लकी रे..."

"हाँ और रोहन लकी नहीं है..." सिमी तुनक उठी थी

"है ना...डिम्पी की बहन जो मिली है उसे...' हंस पड़ी थी, वो पर फिर गंभीर हो  गयी. ,"तुम दोनों सच्ची सीरियस हो ना...क्यूंकि आगे की राह बहुत मुश्किल भरी है...मम्मी-पापा दोनों नहीं मानने वाले"

"आई  नो दी....पर क्या करें..."

"हम्म ..पर दोनों जॉब में हो...एंड एट राईट एज....तो देरी कैसी..बता दे ममी  को...टाइम लगेगा उन्हें मनाने में."

"ना दी..अभी रोहन को एम.बी.ए. कम्प्लीट करना है...फिर वो जॉब चेंज करेगा..तब जाकर सेटल होने की सोचेगा..."

"तू भी कर ले एम.बी..ए तब तक...और फुल टाइम कर...पापा तो कब से पीछे हैं....जॉब भी छोड़ दे."

"हाँ...रोहन भी कहता रहता है...पर पढना पड़ेगा, ना...' सिम्मी ने रुआंसी होकर कहा.

"हाँ वो तो पड़ेगा..." हंसी  आ गई थी उसे...आज भी एकदम छोटी बच्ची  सा जी चुराती है पढ़ाई से.

"हम्म.... तो तुमलोग रोज मिलते हो...?? "

"जाते बस साथ हैं...आने का तो कुछ फिक्स नहीं रहता ,ना...और वीकेंड्स में तो बस रोहन को सोना अच्छा लगता है...फिर मम्मी के सौ सवाल....मेरा भी उस दिन ड्रेस-आप होने का मन नहीं होता....टी.और ट्रैक पैंट में ही सारा दिन निकाल देती हूँ.....कम ही मिलते हैं वीकेंड्स पे....बस यही ऑफिस से  कभी जल्दी निकल  पाए तो..."

"हम्म...देन नो खतरा...वैसे होप यू नो, योर  लिमिट्स ....यू  नो, ना..... वाट  आइ मीन..." जरा उसे टीज़ करने की सोची.

" दीदीss...."..एकदम से धक्का दे दिया...सिम्मी ने और उसके हाथों में स्टीयरिंग डगमगा उठा. जल्दी से ब्रेक पर पैर रखा...तो पीछे से कई गाड़ियां हॉर्न बजा उठीं...

"सिम्मी मरवाएगी क्या ....वो तो स्पीड ज्यादा नहीं है....नहीं तो क्या हो जाता आज....इडियट है तू बिलकुल..."

"तो तुम क्यूँ ऐसी बातें करती हो....ड्राइविंग पे कंसंट्रेट करो, ना..."

"अरे बड़ी बहन हूँ ना..फ़र्ज़ बनता है...सही रास्ता दिखाने का."

"दुनिया को जानने   के मामले में तुम कहीं छोटी हो मुझसे...अपनी छोटी सी दुनिया में महफूज़...जरा बाहर निकालो..तो देखो कदम कदम पर क्या मुश्किलें आती हैं..."

"ओके... मैडम जी....अब आप अपने भाषण मोड में मत आइये........ अब मम्मी को क्या कहेंगे....शॉपिंग तो कुछ की नहीं...कुछ ले लें क्या...यूँ ही दिखाने को ."

"अरे चिल दी...मेरे सर पे डाल देना सब कि इसने बीस कपड़े ट्राई किए और इसे एक भी पसंद नहीं आई .और मुझे भी कुछ लेने नहीं दिया.......मम्मी मान  जाएँगी"

"तू ना रग-रग से वाकिफ हो गयी है...." हंस पड़ी वो...

"हे शsशss  दी..क्या गाना आ रहा है..." और वो साथ-साथ गुनगुनाने लगी...

"आजकल बड़े  रोमैंटिक गाने पसंद आ रहें हैं तुझे...या चैटिंग  पे कंसंट्रेट करना है?....तब से तेरी मोबाइल की टीं टीं  सुन रही हूँ "

"पूछ रहा था..."होप... दीदी इज नॉट डिसएपोयेंटेड "...मैने लिख दिया.."शी इज लट्टू ओवर यू" हा हा ठीक लिखा ,ना...ओह तुम्हारी बातों में वो स्टेंज़ा निकल गया...तुम भी ना दी..अब सुनने दो ये गाना ..मेरा फेवरेट  है"

सिम्मी ने फिर होठों पर ऊँगली रख ' शsशs ' का इशारा किया और आँखें बंद कर गाने में डूब गयी..."

वो भी चुप हो गाना सुनने लगी...उसे ये मौके नहीं मिले तो क्या..एन्जॉय करने दे उसे. ये लम्हे,ये अहसास, पता नहीं उसकी ज़िन्दगी में फिर कभी आयें या नहीं.

दिमाग अब घर की तरफ दौड़ रहा था...पता नहीं आर्यन कहीं तंग ना कर रहा हो मम्मी को. एकाध घंटे तो वे एन्जॉय करती हैं फिर थक जाती हैं. आदत भी नहीं रही. परेशान हो जाती हैं बिलकुल. इसी वजह से ज्यादा देर छोड़ती भी नहीं वो आर्यन को,उनके पास. पर आज तो मजबूरी थी. सब ठीक हो वहाँ ...वरना देखेंगी इतनी देर में उनलोगों ने कुछ खरीदा नहीं तो बुरी तरह चिडचिड़ा जायेंगी. सारे मूड का कबाड़ा हो जायेगा.
(क्रमशः )

Tuesday, October 26, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की

अपना तकिया,अपना बिस्तर अपनी  दीवारें...और अपना खाली-खाली  सा कमरा...जिसने पूरे चौबीस साल तक उसकी हंसी-ख़ुशी-गम -आँसू सब देखे थे. उसके ग़मज़दा होने पर  कभी पुचकार कर अंक में भर लेता , कभी शिकायत करता ,इतना बेतरतीब क्यूँ रखा है तो कभी सजाने संवारने पर मुस्कुरा उठता . पिछले पांच बरस से जब-जब अपने कमरे में आती है लगता है ,जैसे शिकायत  कर रही हो दीवारें...इतने दिनों बाद सुध ली? तकिये पर सर रखते ही लगा,उसी पुरानी खुशबू ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है. पलकें मुंदने लगी थीं.

पलकों को जगाये रखने की वजहें भी आज नहीं थीं. कहीं किचन में कुछ फ्रिज में रखना ...या दही का जमान डालना तो नहीं भूल गयी ?. दरवाजे के बाहर याद से थैली टांगा ना..नहीं तो दूधवाला वहीँ डोरमैट पर दूध के पैकेट्स डाल चलता बनेगा.. सब जगह की लाईट -फैन बंद किए या नहीं. सिलसिलेवार ढंग से सब याद कर, थका शरीर नींद के आगोश में तो चला जाता है पर सुकून  की नींद कहाँ नसीब, आर्यन को रात भर चादर उढाओ, और इतने एहतियात से कि जरा करवट बदलने  की आवाज़ भी ना हो...वरना सुनील का खीझा  स्वर सुनाई देगा,'दिन भर  खट कर आओ...और चैन की नींद भी नहीं नसीब' गुस्सा आ जाता उसे ,जैसे वह सारा दिन राजगद्दी पर आराम फरमा  रही हो. फिर रात भर रेंगते  हाथों के स्पर्श की आशंका तो बनी ही रहती . आज, आर्यन तो माँ के पास सोया है. और सुनील दौरे पर हैं. अच्छा हुआ सिम्मी की जिद पर रुक गयी. दिनों बाद पुरसुकून नींद मिलेगी उसे. इन आशंकाओं से परे क्या पता मीठे सपने भी आ जाएँ. आजकल तो सपने भी यही आते कि 'दरवाजा चेक नहीं किया और कोई घुस आया घर में' ...या..' दूध फ्रिज में रखना भूल गयी  और दूध फट गया .अब आर्यन रो रहा है.....सुनील चाय के लिए आवाजें लगा रहे  है ...क्या करे'.

अंतिम बार कब देखा था , कोई खुशनुमा सपना? वो फूलों से भरी घाटियाँ, बर्फ लदी चोटियाँ या फिर चांदनी रात में दूर तक जाती ठंढी,अकेली सड़क. सुन्दर सपनो की सोच कर ही मीठी सी मुस्कान फ़ैल गयी थी चेहरे पर. सचमुच वो यह सब सोच रही है या सच में सपना ही देख रही है.पलकें भारी होने लगीं  थीं कि सिम्मी की फुसफुसाहट सुनायी दी,"दीदी...दीदी...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है"

"हम्म..." उसने आँखें नहीं खोलीं.

"दीदी..." सिम्मी ने फिर झकझोरा.

"सिम्मी प्लीज़...कल बता देना...सोने दे आज"

"ना आज.... अभी...."

"हम्म.. तेरी फिर से अनीता से अनबन हो गयी..." नींद थोड़ी थोड़ी खुलने लगी थी.

"ना ..."

"तो नया क्या होगा....वो नई सहेली...तेरा एडवांटेज ले रही है?...भाव देना बंद कर दे उसे...चल  अब सोने दे.."

"दीदी...तुम उठ कर बैठो ....और पूरी बात सुनो.."

"ओह फिर जरूर सेवेंथ  फ्लोर वाले अंकल को लिफ्ट में देख तुझे स्टेयरकेस  से जाना पड़ा"

" अब मैं नहीं डरती उनसे...अगर अब कभी बेटी बेटी कह कर कंधे पर हाथ रखा ना...तो ऐसी किक मारूंगी...कि परलोक ही सिधार जाएंगे" इतनी तेज़ आवाज़ में कहा,सिम्मी ने कि नींद पूरी तरह खुल गयी...पर आँखे खोलने का मन नहीं हो रहा था.

"तो बता ना..फिर क्या बात है..."

"तुम मुझे बताने भी दे रही हो....खुद ही अँधेरे में तीर फेंके जा रही हो "

"हम्म... गौट इट ...सब सहेलियाँ, जैसे ही  टाइम मिले  अपने बॉयफ्रेंड  से 'एस एम एस' चैटिंग में बिजी हो जाती हैं  और तू बोर होती रहती है...." अंतिम पासा फेंका..शायद यह सही हो और वह दो मिनट में उसे थोड़ा ज्ञान दे...वापस सोने चली जाए.पर आगे जो सिम्मी ने कहा..उस से तो आँखें अपनी पूरी चौड़ाई में खुल गयीं.

"नहीं...अब मैं बोर नहीं होती...क्यूंकि अब मेरा भी बॉयफ्रेंड  है..." सिम्मी  ने चहक कर कहा.

"आएँs..." उसने करवट बदल  ली उसकी तरफ...."कब हुआ ये.....कौन है.."

सिम्मी पलंग से कूद, धीरे से दबे पाँव जाकर दरवाजा सटा आई." मम्मी  तो बातें सुनती नहीं...सूंघ लेती है...उन्हें तो खुशबू आ जाती  है....बाप रे...कैसे जान लेती हैं सब..तुम कभी ऐसी माँ मत बनना...जरा भी प्रायवेसी नहीं..."

"सिम्मी, इस मेट्रो में दो दो लड़कियों को बड़ा करना मजाक है?...और वो भी तेरी जैसी  तेज तर्रार....बीस आँखें रखनी पड़ती हैं..." अब नींद को तिलांजलि दे ही दी थी उसने..."छोड़ वो सब, अब बता पूरा किस्सा..."

"बता तो दिया..." अब सिम्मी भाव खा रही थी.

"मेरी इतनी प्यारी नींद ख़राब कर बस तुझे एक लाइन में यही कहना था..." गुस्सा आ गया उसे.

"तो और क्या बोलूं..." लाली  छिटक आई थी सिम्मी के चेहरे पर...कुशन गोद में दबाये यूँ ही आगे पीछे झूल रही थी.

वो भी उठ बैठी..."कौन है ये..पहले ये बता "

"तुम उसे जानती हो.."

" नाम..."

"रोहन  "

"वो...रुमा आंटी का बेटा...??" अविश्वास हुआ था  उसे. वो कहीं से भी सिम्मी के मैच का नहीं था. सीधा-साधा. पास की बिल्डिंग में ही रहता था. बचपन में साथ खेला करता था. पर उसके साथ....सिम्मी के नहीं. सिम्मी तो तब छोटे में आती थी. उनका ग्रुप अलग हुआ करता था. रोहन कभी खेल में झगडा नहीं करता. क्रिकेट में कई बार आउट ना होने पर भी दूसरे को बैटिंग दे देता. झगडा सुलझाने को झूठ-मूठ को सॉरी भी बोल दिया करता. वह उसके स्वभाव को हमेशा  उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से जोड़ती. रुमा आंटी डिवोरसी थीं. अकेले दम पर बड़ा किया उन्होंने रोहन को. उनकी कोई नौकरी भी नहीं थी. बस फ़्लैट अपना था. पर वो ट्यूशन लेतीं, क्रेच चलातीं, ग्रीटिंग्स कार्ड बनातीं, गिफ्ट बॉक्स भी बनातीं...और अचार ,चटनी, चकली भी. कभी दुकान पर बेचने भी नहीं गयीं,ना रोहन को इन्वॉल्व किया . आस-पास की औरतें ही खरीद लेतीं ये  सब और ऑर्डर भी दिया करतीं. माँ भी हमेशा उनसे ही अचार-चटनी लिया करती. उनकी तारीफ़ करते नहीं थकती. तारीफ़ तो वो रोहन की भी कम नहीं करतीं. बचपन में बर्थडे पार्टी में रोहन आया करता, पर हमेशा हेल्प करने को तत्पर. बाकी बच्चे शोर मचाते रहते यहाँ तक कि  वो भी सहेलियों से गप्पों में मशगूल रहती. माँ के दस बार बुलाने पर भी अनसुना कर देती और वहीँ रोहन...माँ के हाथों से ट्रे थाम लेता. प्लेटे लगाता ...इधर उधर गिरे ग्लास भी इकट्ठा कर डस्टबिन में डाल आता.

पार्टी के बाद भी माँ उसे रोहन का उदाहरण देतीं पर उसे कभी रोहन से इर्ष्या नहीं हुई या गुस्सा नहीं आया.वो था ही इतना शांत और हंसमुख कि उस से लड़ने का ख्याल भी नहीं आता. उस से दो क्लास नीचे था. यहाँ  दीदी कहने का रिवाज़ नहीं था पर उसपर हमेशा एक छोटे भाई जैसा प्यार ही आता,उसे. पर सिम्मी ये क्या कह रही है...ये सब बातें अपनी जगह हैं...और रिश्ते बनाना अपनी जगह ... रोहन का नाम सुनते ही एक सेकेण्ड में सारी बातें दिमाग में घूम गयीं.
भगवान करे ये बस सिम्मी का  पासिंग फेज़ ही हो और रोहन तो कहीं सिम्मी के डैशिंग इमेज  वाले खांचे में फिट भी नहीं बैठता. पूछ ही लिया.

"रोहन इज  नॉट योर  टाइप ऑफ गाइ....हाउ डिड यू  टु मीट"

"व्हाट डू यू मीन...नॉट माई टाइप...क्या है मेरा टाइप ?" सिम्मी तुनक उठी थी.

"अरे ...वो बस मूवी,पार्टी, डिस्को..बाइक-रेसिंग....तुझे तो यही सब पसंद हैं,ना...."

"दीदी मैं सोलह साल वाली सिम्मी  नहीं हूँ...ही इज सो...मैच्योर.. केयरिंग एन स्वीट टू....आजकल के लड़कों जैसा एटीच्यूड्स वाला नहीं है.."

"अरे,वाह ...बहुत पता है तुझे, आजकल के लड़कों की.."

"होगा क्यूँ नहीं....तुम्हारी तरह कॉलेज के बाद गृहस्थी बसा ली क्या...दीदी, सच यू डोंट नो ...वाट यू मिस्ड..."

"अब तू अपना पुराण मत शुरू कर....अभी बात तेरी हो रही है..." बीच में ही बात काट दी उसने..वो हमेशा डरती है...कब सिम्मी ये किस्सा  छेड़ बैठे. सिम्मी ने कभी उसका इतनी जल्दी शादी के बंधन में बंध जाना स्वीकार नहीं किया. हमेशा उसे दो बातें सुना जाती है. पर आज तो सिम्मी की बातें सुननी थीं..."अरे बता तो सही....दोस्ती कैसे हुई रोहन से..."

"हाँ ,पहले दोस्ती ही हुई....ऑफिस जाने की हमारी टाइमिंग एक ही थी.हम दोनों ही गेट के सामने वाली बस स्टॉप के क्यू में खड़े होते. पर अपने अपने कानों में हेडफोन लगाए. मुझे याद है...रोहन तुमलोगों के साथ खेलने बिल्डिंग में आया करता था...पर तब तुमलोग मुझे 'कच्चा लिम्बू'  कह के साथ नहीं खिलाते और जब मैं बड़ी हो गयी तो रोहन फूटबाल  खेलने दूसरे ग्राउंड पर जाने लगा . बस मैं जानती थी कि वो रुमा आंटी का लड़का है और वो जानता था,मैं डिम्पी की बहन हूँ....ना वो कुछ बात करता...ना मैं. फिर एक दिन बस नहीं आ रही थी मैं भी परेशान थी....उसने एक ऑटो रोका और मुझसे पूछा और फिर हम दोनों साथ गए, ऑटो में. उसके बाद रोज ही हमलोग  ऑटो शेयर करने लगे, स्टेशन तक. मुझे थोड़ा एक्स्ट्रा टाइम भी मिलने लगा. वो ऑटो  लेकर मेरी गेट तक आता. बस वहीँ से बात चीत  शुरू हुई....फिर कभी कभी  शाम को भी साथ आने लगे...एंड देन कॉफी. एन मूवी....एन यू नो ना...."

आगे बताने से सिम्मी हिचकिचा रही थी...बड़ी बहन कितनी भी सहेली जैसी हो...पर बड़ी बहन ही होती है और वो तो उस से पांच साल बड़ी थी...उसने भी गंभीरता से कहा.."या कैन गेस...बट रियली आर यू गाईज़ सीरियस?"

"डोंट नो..." सिम्मी ने कंधे उचका दिए तो उसे गुस्सा आ गया..."ओह! तो ये तेरा टी.पी. है "

"नहीं दी...वी आर रियली सीरियस...नहीं तो तुम्हे नहीं बताती...एक साल हो गया हमें मिले...बट कमिट हाल में किया है"

"सिम्मी...तुझे सब पता है,ना..रोहन के बारे में...पापा कभी मानेंगे ?

"तुमसे ज्यादा पता है...तुमसे क्या ..किसी से भी ज्यादा पता है...और पापा से मैं नहीं डरती...वे मेरी ज़िन्दगी का फैसला नहीं करेंगे .."

"इतना आसान नहीं हैं...पर वो तो बाद की बात है...पहले तुमलोग तो गंभीर हो जाओ एक दूसरे के प्रति...वन इयर इज टू शॉर्ट,अ पीरियड टु नो एनीवन.....गिव  सम मोर टाइम टु योर रिलेशनशिप ...पर सिम्मी प्लीज़ इसे टाइम पास की तरह मत लेना...सब सोच-समझ कर...कमिटेड हो तभी आगे बढ़ना...उस बेचारे ने बहुत दुख देखे हैं,बचपन से...उसे हर्ट मत करना "

"यू नो दी..रोहन को नफरत है...इस बेचारे शब्द से....उसे बहुत गुस्सा आता है कि लोग उसे बेचारागी की नज़र से क्यूँ देखते हैं...बता रहा था एक दिन...उसने तो कुछ भी अलग महसूस नहीं किया...सब बच्चों की तरह ही स्कूल जाता,खेलता...बर्थडे पार्टी में जाता...फ्रेंड्स को अपने घर बुलाता...और फिर यहाँ कितनो के डैडी इन्वोल्व रहते हैं,बेटे की ज़िन्दगी में. शिप पर काम करने वाले, आठ महीने नहीं रहते घर पर...क्या अलग  है उसका घर उनलोगों  से? फिर भी लोग सिम्पैथी दिखाते हैं....हाँ वो अपनी माँ को लेकर वरीड रहता है..तुम्हे पता है...उसने कितनी कोशिश की है, अपने ममी-पापा को नज़दीक लाने की..."

"अच्छा...उसका अपने डैडी से कम्युनिकेशन है??...उनके बारे में तो कितने रयूमर्स  थे कि वे गल्फ में हैं या शायद स्टेट्स में...कभी फोन नहीं करते...कोई पैसा नहीं भेजते.."

"हाँ फोन नहीं करते..पैसे नहीं  भेजते....पर इसी शहर  में रहते हैं...अपनी बहन के पास...ये फ़्लैट उसकी ममी के नाम करके अपने कर्त्तव्य  की इतिश्री समझ ली...रोहन तो बहुत छोटा था...उसे पता  भी नहीं कि क्या प्रोबलम थी ममी-पापा के बीच....पर जब उसके बोर्ड का रिजल्ट आया तो उसके डैडी ने फोन किया था...और उसे लंच के लिए ले गए थे....रोहन के मन में कटुता नहीं है,अपने डैडी  को लेकर...और इसका श्रेय वो अपनी ममी को देता है...उसके बाद से ही उसने कोशिश शुरू कर दी...घर पर गणपति की पूजा भी रखी  और इसी बहाने अपने डैडी को जबरदस्ती घर आने पर मजबूर किया...उसने बहुत कोशिश की, दी..ममी से डैडी के बर्थडे पर विश करवाया...डैडी को ममी के बर्थडे पर फोन करने को कहा...लेकिन पता नहीं...उसकी बुआ ने क्या कान भर रखे हैं...आखिर उसके डैडी, सारे पैसे अपनी बहन  के बच्चों पर ही तो खर्च करते हैं...पर यह बात उसके डैडी को समझ नहीं आती...रोहन जितना कहता उसके ममी-डैडी उसका मन रखने को कर लेते..बट एक्चुअली दे आर ड्रीफटेड अपार्ट ...एक दो साल के बाद रोहन ने भी कोशिश छोड़ दी...एंड यू नो दी...नाउ हिज़ डैडी वांट्स टू रिटर्न....अब खुद अपने मन से अक्सर फोन करते हैं..."

"हाँ..क्यूँ नहीं...अब बुढापे में सेवा जो करवानी होगी...अब कौन पूछेगा,उन्हें बहन के यहाँ..." उसका मन तिक्त हो आया था...इसी शहर में रहकर एक बार सुध नहीं ली ,अपने बीवी बच्चे  की. रुमा आंटी की मेहनत देखी है उसने...सुबह पांच बजे से रात के बारह बजे तक वो खटती रहतीं...रोहन की देखभाल के लिए नौकरी भी नहीं की उन्होंने और घर से ही सब सम्भाला.

"एग्जैक्टली दी..यही बात है...पर रोहन कहता है...आखिर फादर हैं...उनकी देखभाल तो उसी  की जिम्मेवारी है....बुआ मुहँ फेर लेंगी,तो वे कहाँ जाएंगे....पर कहता है,अपनी ममी को मजबूर नहीं करेगा...उनकी सेवा के लिए..."

"ही  रियली इज अ नाइस गाइ...तू आजकल बड़ी समझदारहो गयी है.. फिर हंस कर जोड़ा..."पर तेरे मुहँ से इतनी समझदारी की बातें...शोभा नहीं देतीं..तू तो लड़ती-झगड़ती ही अच्छी लगती है...अच्छा चेंज लाया है..इस रोहन की कंपनी ने ...अब कैसा दिखता है...मैने  तो कब लास्ट देखा था उसे...याद भी  नहीं.."

"तुम्हारी दुनिया...बस जीजू..और आर्यन हो गए हैं....उनके आगे-पीछे घूमना...और बस उनकी ही बातें करना...तुम्हे बाकी दुनिया से कोई मतलब भी है??" विद्रूपता से कहा, सिम्मी ने.

"सिम्मी...तू फिर शुरू हो गयी...बात रोहन की हो रही है...बता ना..कैसा दिखाता है अब..

"एकदम 'टी.डी.एच'...." सिम्मी मुस्कुरा रही थी.

"ओए.. होए.. 'टी.डी.एच'.....तो वो गोरा-चिट्टा लड़का...अब काला हो गया..."

"ना..फेयर तो अब भी है...लो..थिंक ऑफ द डेविल  एन डेविल इज हियर...आज तो घर आने में उसे ज्यादा ही देर हो गयी है.." .सिम्मी के मोबाइल का मेसेज टोन बज उठा था.

"इस वक़्त घर आता है वो...??"

"हाँ...जॉब के साथ...पार्ट टाइम एम.बी.ए. कर रहा है..लेट नाईट क्लास होती हैं....पर मुझे गुडनाईट कहे बिना नहीं सोता..." सिम्मी मुस्कुराते हुए ...मेसेज टाइप करने में लगी थी.

"हाँ...नींद कैसे आएगी,उसे ...चल अब तू अपनी 'एस.एम.एस' चैटिंग कर...मैं चली  सोने..."

सिम्मी  ने भी मुस्कुराते हुए तकिया खींच दूसरी तरफ करवट बदल ली थी.

सिम्मी का राज़ सुन जाने कैसी अनजानी ख़ुशी भर गयी थी मन में. चेहरे से मुस्कान मिट नहीं रही थी. दिल की धड़कने बढ़ गयी थीं...'माई लिल सिस इज इन लव'...इतनी बड़ी हो गयी है, छुटकी. अब. उसपर एक बड़ी जिम्मेवारी आ गयी है. सिम्मी की खुशियाँ अब उस पर निर्भर  हैं...मम्मी -पापा को उसे ही मनाना होगा...फिर सर झटक दिया...एक मन कहता,अभी दोनों को शादी का फैसला तो करने दे...फिर दूसरा मन कहता, जब कमिट कर लिया है तो अगला कदम शादी ही तो होगा...पता नहीं क्या क्या सोच रही थी कि सिम्मी ने मोबाइल हेडबोर्ड  पर रखा...और 'गुडनाईट दी'..कहती सिमट कर सो गयी.

उसने करवट बदल ,उसके चेहरे पर भरपूर नज़र डाली. सिम्मी का चहरा दमक रहा था और एक शांतिपूर्ण  स्मित  थी होठों  पर. उसके चेहरे की दमक और होठों की स्मित कायम रखना अब उसकी जिम्मेवारी है.सिम्मी तो सो गयी...पर वो ना जाने कब तक इन्ही सपनो में डूबती उतराती,जागती रही.

(क्रमशः )