Friday, November 27, 2009

सचिन के गीले पौकेट और तीस हज़ार रन


'जीवन में खेल का महत्व' इस विषय पर हम सबने अपने स्कूली जीवन में कभी ना कभी एक लेख लिखा ही होगा.पर बड़े होने पर हम क्या इस पर अमल कर पाते हैं?अपने बच्चों को 'खेल' एक कैरियर के रूप में अपनाने की इजाज़त दे सकते हैं?हम चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाते.कई मजबूरियाँ आड़े आ जाती हैं.हमारे देश में खेल का क्या भविष्य है और खिलाड़ियों की क्या स्थिति है, किसी से छुपी नहीं है.पर अगर आपके बच्चे की खेल में रूचि हो,स्कूल की टीम में हो, और वह अच्छा भी कर रहा हो तो माता-पिता के सामने एक बड़ी दुविधा आ खड़ी होती है.
स्कूल का नया सेशन शुरू होता है और हमारे घर में एक बहस छिड़ जाती है.क्यूंकि हर खेल की टीम का पुनर्गठन होता है.और मैं अपने बेटे को शामिल होने से मना करती हूँ. जब तक वे छोटी कक्षाओं में थे,मैं खुद प्रोत्साहित करती थी,हर तरह से सहयोग देती थी.इनका मैच देखने भी जाती थी.कई बार मैं अकेली दर्शक होती थी.दोनों स्कूलों के टीम के बच्चे,कोच,कुछ स्टाफ और मैं. छोटे छोटे रणबांकुरे,जब ग्राउंड की मिटटी माथे पे लगा,मैच खेलने मैदान में उतरते तो उनके चेहरे की चमक देख, ऐसा लगता जैसे युद्ध के लिए जा रहें हों .मैंने,मैच
के पहले कोच को 'पेप टॉक' देते सुना था और बढा चढ़ा कर नहीं कह रही पर सच में 'चक दे' के शाहरुख़ खान का 'पेप टॉक' बिलकुल फीका लगा था, उसके सामने फिल्म डाइरेक्टर के साथ में 'नेगी' थे,अच्छे इनपुट्स तो दिए ही होंगे.फिर भी मुझे नहीं जमा था.

पर जब बच्चे ऊँची कक्षाओं में आ जाते हैं,तब पढाई ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगती है. .क्यूंकि पढाई पर असर तो पड़ता ही है.जिन दिनों टूर्नामेंट्स चलते हैं.२ महीने तक बच्चे किताबों से करीब करीब दूर ही रहते हैं.और एक्जाम में 90% से सीधा 70 % पर आ जाते हैं.ऐसे में
बड़ी समस्या आती है.क्यूंकि भविष्य तो किताबों में ही है.(ऐसा सोचना हमारी मजबूरी है).एक लड़के को जानती हूँ.जो ज़हीर और अगरकर के साथ खेला करता था.रणजी में मुंबई की टीम में था. १२वीं भी नहीं कर पाया.आज ढाई हज़ार की नौकरी पर खट रहा है...और यह कोई आइसोलेटेड केस नहीं है.ज्यादातर खिलाड़ियों की यही दास्तान है.यह भी डर रहता है,अगर खेल में बच्चों का भविष्य नहीं बन पाया तो कल को वे माता-पिता को भी दोष दे सकते हैं कि हम तो बच्चे थे,आपको समझाना था.और कोई भी माता पिता ऐसा रिस्क लेंगे ही क्यूँ??बुरा
तो बहुत लगता है एक समय इनके मन में खेल प्रेम के बीज डालो और जब वह बीज जड़ पकड़ लेता है तो उसे उखाड़ने की कोशिश शुरू हो जाती है.इस प्रक्रिया में बच्चों के हृदयरूपी जमीन पर क्या गुजरती है,इसकी कल्पना भी बेकार है.

अगर उन्हें किसी खेल के विधिवत प्रशिक्षण देने की सोंचे भी तो मध्यम वर्ग के पर्स पर यह अच्छी खासी चपत होती है. coaching.traveling bat, football ,studs,stockings,pads .... . लिस्ट काफी लम्बी है.पता नहीं सचिन तेंदुलकर के गीले पौकेट्स की कहानी कितने लोगों को मालूम है? सचिन के पास एक ही सफ़ेद शर्ट पेंट थी.सुबह ५.३० बजे वे उसे पहन क्रिकेट प्रैक्टिस के लिए जाते.फिर साफ़ करके सूखने डाल देते और स्कूल चले जाते,स्कूल से आने के बाद फिर से ४ बजे प्रैक्टिस के लिए जाना होता.तबतक शर्ट पेंट सूख तो जाते पर पेंट की पौकेट्स गीली ही रहतीं.(मुंबई में कपड़े फैलाने की बहुत दिक्कत है,फ्लैट्स में खिड़की के बाहर थोड़ी सी जगह में ही पूरे घर के कपड़े सुखाने पड़ते हैं,यहाँ छत या घर के बाहर खुली जगह नहीं होती..उन दिनों उनके पास वाशिंग मशीन नहीं थी,और सचिन खुद अपने हाथों से कपड़े धोते थे,क्यूंकि उनकी माँ भी नौकरी करती थीं.वैसे भी सचिन अपने चाचा,चाची के यहाँ रहते थे,क्यूंकि उनका स्कूल पास था. चाचा-चाची ने उन्हें अपने बेटे से रत्ती भर कम प्यार नहीं दिया)इंटरव्यू लेने वाले ने मजाक में यह भी लिखा था, क्या पता सचिन के इतने रनों के अम्बार के पीछे ये गीले पौकेट्स ही हों,इस से एकाग्रता में ज्यादा मदद मिलती हो.

20/20 वर्ल्ड कप के स्टार रोहित शर्मा की कहानी भी कम रोचक नहीं.रोहित शर्मा मेरे बच्चों के स्कूल SVIS से ही पढ़े हुए हैं.ये पहले किसी छोटे से स्कूल में थे.एक बार समर कैम्प में SVIS के कोच की नज़र पड़ी और उनकी प्रतिभा देख,कोच ने रोहित शर्मा को SVIS ज्वाइन करने को कहा.पर उनके माता-पिता इस स्कूल की फीस अफोर्ड नहीं कर सकते थे.कोच डाइरेक्टर से मिले और उनकी विलक्षण प्रतिभा देख डाइरेक्टर ने सिर्फ पूरी फीस माफ़ ही नहीं की बलिक क्रिकेट का पूरा किट भी खरीद कर दिया,रोहित शर्मा ने भी निराश नहीं किया. 'गाइल्स शील्ड' जिस पर 104 वर्षों तक सिर्फ कुछ स्कूल्स का ही वर्चस्व था.SVISके लिए जीत कर लाया.मिस्टर लाड को कोचिंग के अनगिनत ऑफर मिलने लगे.बाद में तो एक
कमरे में रहने वाले रोहति शर्मा ने मनपसंद कार की नंबर प्लेट 4500 के लिए 95,000Rs. RTO को दिए.(एक ख्याल
आया,राज ठाकरे ,इन्हें मुम्बईकर मानते हैं या नहीं क्यूंकि रोहित शर्मा के पिता भी कुछ बरस पहले कानपुर से आये थे)

सचिन और रोहित शर्मा हर कोई तो नहीं बन सकता.पर जबतक हम बच्चों को मौका देंगे ही नहीं खेलने का,उनकी प्रतिभा का पता कैसा चलेगा?..जब कभी मैं बोलती हूँ,सचिन ढाई घंटे तक एक स्टंप से दीवार पर बॉल मारकर प्रैक्टिस करते थे.बच्चे तुरंत पलट कर बोलते हैं हमें तो दस मिनट में ही डांट पड़ने लगती है.
खेल के मैदान से बड़ी ज़िन्दगी की कोई पाठशाला नहीं है.मैंने देखा है, कैसे इन्हें ज़िन्दगी की बड़ी सीख जो मोटे मोटे ग्रन्थ नहीं दे सकते. खेल का मैदान देता है.एक मैच हारकर आते हैं,मुहँ लटकाए,उदास....पर कुछ ही देर बाद एक नए जोश से भर जाते हैं,चाहे कुछ भी हो,हमें अगला मैच तो जीतना ही है.यही ज़ज्बा मैंने खेल से इतर चीज़ों के लिए भी नोटिस किया है.


दूसरों के लिए कैसे त्याग किया जाए,और उस त्याग में ख़ुशी ढूंढी जाए,बच्चे बखूबी सीख जाते हैं.गोल के पास सामने बॉल रहती है,पर इन्हें जरा सी भी शंका होती है,अपने साथी को बॉल पास कर देते हैं,वो गोल कर देता है,उसे शाब्बाशी मिलती है,कंधे पर उठाकर घूमते हैं,अखबार में नाम आता है.और उसकी ख़ुशी में ही ये खुश हो जाते हैं.
आज टीनेजर बच्चों को टीचर तो दूर माता-पिता भी हाथ लगाने की नहीं सोच सकते.पर गोल मिस करने पर,या कैच छोड़ देने पर कोच थप्पड़ लगा देता है,और ये बच्चे चुपचाप सर झुकाए सह लेते हैं.एक बार भी विरोध नहीं करते.
समानता का पाठ भी खेल से बढ़कर कौन सीखा सकता है? अभी कुछ दिनों पहले पास के मैंदान में ही अंडर 14 का मैच था.आमने सामने थे,धीरुभाई अम्बानी स्कूल,(जिसमे शाहरुख़,सचिन,सैफ,अनिल,मुकेश अम्बानी के बच्चे पढ़ते हैं) और सेंट फ्रांसिस (जिसमे माध्यम वर्ग के घर के बच्चों के साथ साथ,ऑटो वाले और कामवालियों के बच्चे भी पढ़ते हैं...स्कूल अच्छा है,और fully aided होने की वजह से फीस बहुत कम है.)धीरुभाई स्कूल का कैप्टन था शाहरुख़ का बेटा और सेंट फ्रांसिस का कैप्टन था एक ऑटो वाले का बेटा.जिसकी माँ,मोर्निंग वाल्क करने वालों को एक छोटी से फोल्डिंग टेबल लगा,करेले,आंवले,नीम वगैरह का जूस बेचती है.हम भी, कभी कभी सुबह सुबह मुहँ कड़वा करने चले जाते हैं.उसने उस दिन लड्डू भी खिलाये,बेटे की टीम जीत गयी थी.निजी ज़िन्दगी में ये बच्चे एक साथ कभी बैठेंगे भी नहीं पर मैंदान में धक्के भी मारे होंगे,गिराया भी होगा,एक दूसरे को..
अफ़सोस होता है...यह सबकुछ जानते समझते हुए भी हम मजबूर हो जाते हैं...क्यूंकि दसवीं में जमकर पढाई नहीं की तो अच्छे कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलेगा.और फिर किसी वाईट कॉलर जॉब हंटिंग की भेड़ चाल में शामिल कैसे हो पायेंगे ,ये नन्हे खिलाड़ी.

29 comments:

डिम्पल मल्होत्रा said...

shuru me lga aaj koee khelo pe lekh likhna padhega class me.....achhi post.....aap kuch bhi likhti hai...chahe apki yaadein ho ya koee or pahlu zindgee ka maza aataa hai padh ke...bas rachna jara jyaadaa lambi hoti hai......सचिन और रोहित शर्मा हर कोई तो नहीं बन सकता.पर जबतक हम बच्चों को मौका देंगे ही नहीं खेलने का,उनकी प्रतिभा का पता कैसा चलेगा?......bilkul sahi kaha aapne...

चण्डीदत्त शुक्ल-8824696345 said...

अच्छा लेख है. बधाई. कुछ बातें उलझा गईं...उन पर एक बात कहना चाहूंगा. तमाम जगह आप अपने ही विचारों में उलझी नज़र आ रही हैं. बतौर अभिभावक आप क्या चाहती हैं...बच्चे खेल में कैरियर बनाएं या नौकरियां तलाशें? गारंटी तो कोई दे नहीं सकता. ना खेलों में-ना सफ़ेदपोश नौकरियों में कामयाबी की. वैसे भी, सिर्फ कोचिंग या अन्य सुविधाएं जुटाने से भी कोई खिलाड़ी नहीं बन जाता. यही बात आप लेख के अंत में खुद ही बताती हैं, जहां कामवाली बाई का बेटा बतौर कैप्टन सफल है. वैसे ही, एक जगह आपने उदाहरण दिया है कि जहीर और अगरकर के साथ खेलने वाला लड़का ढाई हज़ार की नौकरी करने के लिए मज़बूर है. कहीं-कहीं आपकी निगाह राज ठाकरे की तरफ चली गई है. मुझे लगता है कि प्रश्न ढेर सारे थे, उसी तरह भ्रम की स्थिति भी बन गई है. अभिभावक क्या करें-बच्चे मेहनत नहीं करना चाहते. बच्चे क्या करें-अभिभावकों की उम्मीद ही इतनी ज्यादा है. आप बच्चों को सुपरस्टार, सिंगर, स्पोटर्समैन, पोलिटिशियन औऱ ना जाने क्या-क्या बनाना चाहते हैं. वो सबकुछ तो बन नहीं सकते. वैसे भी, खेलना व्यक्तित्व के विकास के लिए ज़रूरी है, उसे कैरियर के रूप में अपनाने की बेचैनी बच्चों में हमेशा नहीं होती. ऐसे ही पढ़ाई के लिए दिन-रात जूझते रहना भी तो स्वाभाविक नहीं. बच्चों को मस्त रहने देना ही बेहतर है.

rashmi ravija said...

@शुक्ल जी,शायद आपने कुछ जल्दबाजी में ये पोस्ट पढ़ी है...इतना तो स्पष्ट है कि बच्चे खेल में अच्छा करें तब भी अभिभावकों को पढाई की तरफ ही उनका ध्यान खींचना पड़ता है क्यूंकि खेल में कोई भविष्य नहीं है...पढ़ लिख कर एक अदद नौकरी की आशा तो कर ही सकते हैं. ऑटोवाले का बेटा आज जरूर कैप्टन है,पर उसके उज्जवल भविष्य की कोई गारंटी नहीं क्यूंकि आज ढाई हज़ार की तनख्वाह पानेवाला भी स्कूल,आर वार्ड,डिस्ट्रिक्ट,प्रदेश के पायदान तय करके ही रणजी तक पहुंचा.और इस क्रम में 12th की बोर्ड परीक्षा भी मिस की .बच्चे जब खेल में डूबे होते हैं,तो वे MNU और CHELSI तक के लिए खेलने का सपना पालते हैं, सिर्फ व्यक्तित्व के विकास की बात उनके समझ में नहीं आती

राज भाटिय़ा said...

कुछ बच्चे पढाई मै नही खेल मै अब्बल होते है, तो क्यो नही इन बच्चो को ऎसी पढाई जाये कि यह साथ साथ खेलो मै भी चमके, आप ने अच्छा लेख लिखा है.धन्यवाद

Unknown said...

रश्मी जी आपका ये लेख बहुत ही यथार्थ को छूता है और शायद हम सभी के मन के बहुत करीब है. नेरा बेटा कार्तिकेय जो कल ही १५ साल का हुआ है जब तक १० साल का था उसे ये पक्का लगता था कि उसे तो क्रिकेटर ही बनना है और कम से कम सचिन जितना सफ़ल तो बो हो ही जायेगा. धीरे धीरे उसे खुद समझ बढी और वो पढाई की तरफ़ खुद को समेटता गया. हमारे देश का ये दुर्भाग्य है कि यहा खेल संस्कृति नही है. हम एक पूर्बाग्रह मे पैदा हुए और उसी को जाने अनजाने आगे बढा रहे है.
पढोगे लिखोगे बनो नबाब
खेलोगे कूदोगे होगे खराब
किसे दोष दे.

शरद कोकास said...

मेरे घर में यह कहानी इस तरह घटित हुई । मेरी छोटी बहन सीमा ने मिडिल स्कूल से खेलना शुरू किया और वॉलीबाल, टे.टे. हैंडबाल. व आर्चरी मे वि.वि. तक खेलने के साथ मैथ्स मे बी एस सी किया पिता के इस सवाल पर कि गणित मे ही कैरियर है उसने खेल मे कैरियर को चैलेंज की तरह लिया और घर के तमाम विरोध के बावजूद अमरावती स्पोर्ट्स कॉलेज से बी.पी.एड किया व युनिवर्सिटी मे टॉप कर उसी कॉलेज में फिज़िकल एज्यु. में नौकरी पाई । इसलिये क्या बनना है यह तो तय करना ज़रूरी है । मैट्रिक में आप फुट्बाल खेलते थे इस आधार पर अब कोई नौकरी नही देगा ..स्पोर्ट कोटे मे भी नहीं। इस लिये अगर खिलाड़ी के अलावा कुछ और बनना है तो खेल पूरी तरह छोड़ देना चाहिये ..व्यक्तित्व विकास जो होना है उम्र के 10 साल के भीतर हो जाता है उसके बाद तो इसके लिये सिर्फ 15 दिन का कोर्स काफी है ।

शबनम खान said...

अच्छा मुद्दा...
मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे खेल को केवल एक खेल के रुप में ही ले पाते है करियर के रुप में नहीं...
शुभकामनाएँ..

shikha varshney said...

bahut sahi or achcha likha hai aapne..vakai hamari majburi hi hai ki khelo main achche pradarshan ke vavjud ham apne bachchon ko padaai or kheechte hain....kyonki khelo main koi bhavishya nahi deekhta.
behad sarthak lekh..

Anonymous said...

वैसे खेलों को शुद्ध मनोरंजन के रूप में भी तो लिया जा सकता है, खेल टीवी, कंप्यूटर से तो अधिक ही स्वस्थ्य और सामाजिक विकल्प है.

mark rai said...

मंजिल । चल तो रहा हूँ । पेड़ों की छांव भी है ....
....पर चैन नही । एक तारा कहीं खो गया है ।
....अब क्या करूँ ।
वाईट कॉलर जॉब हंटिंग की भेड़ चाल में शामिल कैसे हो पायेंगे ,ये नन्हे खिलाड़ी......आप ने अच्छा लिखा है.....

स्वप्न मञ्जूषा said...

रश्मि जी,
बहुत ही सार्थक आलेख....हम सभी के घर में एक -एक सचिन और एक-एक माराडोना हैं...लेकिन सिर्फ १० वीं से पहले तक ही... उसके
बाद हम सभी माता-पिता उसी दर से गुजरने लगते हैं...अगर ठीक मार्क्स नहीं आया तो क्या होगा...कहाँ admission होगा और बस सारे सपने वहीँ दम दोस देते हैं..अपने भी और बच्चों के भी....
मेरा बड़ा बेटा soccer और क्रिकेट दोनों में बहुत अच्छा था..अब भी है लेकिन.....जब भी उसने इस पर ध्यान दिया सीधा ९५ % से ८०% पर आगया...हार कर हमने कहा..रहने दो....
घोर आश्चर्य कि बात ये है कि मेरे घर में मेरे दो मामा को नौकरी भारत सरकार में उनकी hockey कि वजह से ही मिली थी...
मेरी सबसे प्रिय सहेली आज भी अल्लाहबाद बैंक में ब्रांच मेनेजर है सिर्फ अपने स्पोर्ट्स कि वजह से...
पढ़ कर सब कुछ याद आ गया....बहुत ही अच्छा लिखती हैं आप.....अब ऐसे ही तो नहीं छाप देते थे न क्रिकेट सम्राट, सरिता, धर्मयुग वाले.....
एक बहुत अच्छे आलेख के किये आपको कोटिश बधाई....

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

बहुत अच्छा लेख..... आजकल यह भी है कि.... खेल को लोग इसलिए प्रोत्साहित नहीं करते..... क्यूंकि यह काफी अनिश्चितता का करियर है..... और कोई गारंटी भी नहीं है.... कि खेल के बच्चा आगे बढ़ ही जाये..... लेकिन पढ़ाई कर के फिर भी बच्चा सेक्यूर हो जाता है.... इसलिए माँ -बाप पढाई पर जोर देते हैं..... समानता का दृश्य बहुत ही खूबसूरत और यथार्थवादी लगा..... यही समानता कि परिभाषा बहुत अच्छी लगी.....

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

मैं देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ.....

निर्मला कपिला said...

रश्मि पहले मुझे भी लगा था कि ये खेल से सम्बन्धित आलेख होगा मगर थोडा सा पढते ही अगली पूरी पोस्ट एक साँस मे पढ गयी बहुत रोचक जानकारी तो है ही आलेख का मंतव भी सार्थक है सुन्दर रोचक आलेख के लिये बधाई और आशीर्वाद

निर्मला कपिला said...

हाँ देर से आने के लोये मैं भी क्षमा चाहती हूँ

Ashish said...

This post proves to be torch bearer for the parents who are in dilemma regarding career of their childrens. congrats for such beautiful post.

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत अच्छा आलेख , एकदम से यथार्थ से जुड़ा हुआ. ये तो है कितने बच्चे सचिन और रोहित बन पाते हैं. यहाँ कानपुर का एक राष्ट्रीय धावक दूध बेच कर अपने घर का खर्च चला रहा है. कितने बुजुर्ग खिलाड़ियों की सुध लेने वाला कोई नहीं.
होनहार खिलाडियों के लिए सरकार को ही कोअचिंग और सारे साधनों की व्यवस्था करनी चाहिए. भले ही वे साधारण परिवार के हों. मेधा किसी की धरोहर नहीं होती और न ही उसका संबंध सम्पन्नता से है. हम अगर पिछड़े हैं इस दिशा में तो सिर्फ अपनी सरकारी नीतियों के कारण.
एक आम परिवार इसी के कारण इस दिशा में कैरियर बनने से पहले दस बार सोचता है और फिर दूसरी दिशा को चुन लेता है.

रंजू भाटिया said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने यह लेख ..सच्चाई से रूबरू करवाता ..

M VERMA said...

सचिन और रोहित शर्मा हर कोई तो नहीं बन सकता.पर जबतक हम बच्चों को मौका देंगे ही नहीं खेलने का,उनकी प्रतिभा का पता कैसा चलेगा?..'
सही कहा है जब तक हम मौका नही देंगे तब तक दूसरा सचिन कैसे बनेगा.

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा है। सुन्दर।

वाणी गीत said...

मौजूदा दौर में सभी अभिभावकों की यही पीड़ा है ...
मेरी बेटी को पेंटिंग का बहुत शौक है ...मगर उसे बार बार पढने के लिए बाध्य करना पड़ता है ...12th में 87 प्रतिशत मार्क्स लेन के बावजूद govt. college में बहुत मुश्किल से दाखिला मिल पाया ...अब कैसे कहे बच्चों को कि तुम साथ साथ अपने शौक भी पूरे करते रहो ....

रश्मि प्रभा... said...

सच में मैं तो बहुत अच्छे लेखों से दूर रही........

नीरज गोस्वामी said...

बहुत सही कहा आपने...ये ठीक है की हम बच्चों को पहले खेलमें पारंगत होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं लेकिन बाद में उन्हें पढाई पर जोर देने के लिए कहते हैं...हमारे देश में सिवा क्रिकेट के और किसी खेल में अच्छी रोज़ी रोटी कमाने के अवसर नहीं हैं...आप ही देखिये ना सिवा क्रिकेट के हमें दूसरे खेल के खिलाडियों के नाम भी नहीं मालूम...इस गला काट स्पर्धा में अपना नाम और पहचान कायम करना बहुत मुश्किल काम है...अचरेकर साहब के ना जाने कितने चेले रहे होंगे और हैं लेकिन सचिन या काम्बली जैसा और क्यूँ कोई नहीं बन पाया? हमें अपने बच्चे की क्षमताओं को आंकना होगा, उसकी कमजोरियों और प्रतिभा को पहचानना होगा तभी उसे सही दिशा में डाल पाएंगे...पढाई करने के बाद रोज़गार के फिर भी अवसर मिल जाते हैं लेकिन पूरी पढाई किये बिना खेल के क्षेत्र में अगर आप सचिन या भज्जी नहीं हैं तो रोटी कमाना भारी पड़ सकता है...आजकल स्पर्धा हर क्षेत्र में है लेकिन जहाँ दूसरे क्षेत्रों में साधारण को रोटी कमाने के अवसर अधिक हैं वहीँ खेल में ये अवसर बहुत कम हैं...
एक बहुत अच्छे और विचारोतेजक लेख के लिए बधाई...
नीरज

Khushdeep Sehgal said...

धोनी की साल भर की कमाई पचास करोड़...
अब कोई कह सकता है

खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब,
पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब...

जय हिंद...

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया...विचारणीय विषय..आज देख पाये फिर से..

Prabuddha said...

खेल अद्बभुत होते हैं। आप 50 की उम्र में खेल रहे हैं तो पसीने-पसीने हो जाएंगे लेकिन जीतने के लिए पूरा ज़ोर लगा देंगे। आपकी बातों से कुछ हद तक सहमत पर पूरी तरह नहीं। दरअसल, जब एक ग़रीब घर का बच्चा खेल को अपनाता है तो वो सब कुछ झोंक देता है क्यूंकि वो अपने खेल को, परिवार को एक सीढ़ी ऊपर ले जाने का ज़रिया बनाना चाहता है। क्रिकेट और हॉकी में आज भी आपको इसकी कई मिसालें मिलेंगीं।

हरकीरत ' हीर' said...

सचिन तेंदुलकर के गीले पौकेट्स की कहानी कितने लोगों को मालूम है? सचिन के पास एक ही सफ़ेद शर्ट पेंट थी.सुबह ५.३० बजे वे उसे पहन क्रिकेट प्रैक्टिस के लिए जाते.फिर साफ़ करके सूखने डाल देते और स्कूल चले जाते,स्कूल से आने के बाद फिर से ४ बजे प्रैक्टिस के लिए जाना होता.तबतक शर्ट पेंट सूख तो जाते पर पेंट की पौकेट्स गीली ही रहतीं.(मुंबई में कपड़े फैलाने की बहुत दिक्कत है,फ्लैट्स में खिड़की के बाहर थोड़ी सी जगह में ही पूरे घर के कपड़े सुखाने पड़ते हैं,यहाँ छत या घर के बाहर खुली जगह नहीं होती..उन दिनों उनके पास वाशिंग मशीन नहीं थी,और सचिन खुद अपने हाथों से कपड़े धोते थे,क्यूंकि उनकी माँ भी नौकरी करती थीं....


सचिन के बारे में रोचक जानकारियाँ मिली आपके ब्लॉग पे ......लिखतीं भी बहुत अच्छा हैं .....!!

गौतम राजऋषि said...

आपका हमेशा इन हटके वाले मुद्दों पर लिखना बड़ा भाता है मुझे।...और आपकी लेखनी इतने लंबे आलेख को कतई उबाऊ नहीं बनाती।

मेरे पापा अपने जमाने में टेनिस के माने हुए प्लेयर थे शहर और राज्य स्तर पर। लेकिन वो ये सब कुछ कर पाये जब उन्होंने मेडिकल कालेज में दाखिला लिया... आपका कहना सच है कि हमारे मुल्क में खेल को कैरियर मान कर आगे बढ़ना रिस्की है।...और कई दफ़ा तो मुझे लगता है कि इसमें टैलेंट की बजाय किस्मत का ज्यादा हाथ होता है। अब जैसा कि आपने रोहित शर्मा का उदाहरण दिया। ऐसे कितने रोहित शर्मा उस नजर पड़ जाने वाली किस्मत के लिये तरसते घूमते होंगे अपने इस देश में...रोहित शर्मा यदि यही टेलेंट लिये मेरी सहरसा की गलियों में होता, तो?

बेहतरीन आलेख मैम!

रंजना said...

एक एक शब्द सत्य और अपना सा लगा आपके इस अनुपम आलेख का...

मेरी एक सहेली (वैधव्य का दुःख भोग रही) जिसके जीवन का सहारा उसके दो बेटे ही हैं, अपने छोटे बेटे से बड़ी परेशान थी...परेशानी पूछने पर कहती कि पढने में उसकी कोई अभिरुचि नहीं केवल खेलता रहता है...मैंने कभी गंभीरता से जान्ने का यत्न नहीं किया कि बच्चा क्या खेलता है...अभी कुछ ही दिनों पहले पता चला कि उसका वह खिलंदर बेटा असल में जबरदस्त क्रिकेट खेलता है.अंतर्राज्यीय स्कूलों की प्रतियोगिताएं में उसके दम ख़म पर कई मैच उसके स्कूल ने जीता है...मैंने अपनी सहेली को बहुत समझाया और बेटे को प्रोत्साहित करने को कहा,ताकि वह अपनी अभिरुचि के क्षेत्र में ही कोई अच्छा मुकाम हासिल कर सके....लेकिन मैं यह भी जानती हूँ कि यह सब इतना आसान नहीं...

खेल या कला के क्षेत्रों में सही मुकाम हासिल कर पाना ,इतना भी सरल नहीं...यही कारण है कि लोग कैरियर के रूप में इसे गोल बनाने कि हिम्मत नहीं जुटा पाते...