Saturday, March 20, 2010

आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) ---4


(अभिषेक, एक पत्रिका में कोई रिपोर्ट लिखने के उद्देश्य से एक कस्बे में आता है.वहाँ एक दुकान पर उसे एक नारी कंठ सुनायी देता है.वह चेहरा नहीं देख पाता.उसे शची की आवाज़ लगती है और वह परेशान हो उठता है.अपने गेस्ट हाउस में लौट वह पुरानी यादों में खो जाता है कि शची नयी नयी कॉलेज में आई थी..मनीष उसे शची का नाम ले छेड़ने लगा था. पर वह अपने मन को नहीं समझ पा रहा था.पर जब शची ने स्टेज पर आँखें उठाकर कुछ ऐसी नज़रों से देखा कि उसने बहुत कुछ पढ़ लिया उसकी आँखों में.)
( पेन्सिल स्केच ललित शर्मा जी(ये ब्लॉगर नहीं हैं ) के बनाए हुए)

प्रोग्राम काफी सफल रहा. इसकी सफलता को सेलिब्रेट करने के लिए सब ने पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बनाया. तय हुआ.'जाह्नवी लेक' चला जाए. वहाँ घूम फिर कर और खा पीकर, चांदनी रात में बोटिंग के बाद रात के आठ-नौ बजे तक लौट आया जाए. नाव पर ही महफ़िल जमी और करीब करीब हर गाने का शौक रखनेवालों ने ने एकाध गाने सुनाये. विजय की मिमिक्री पर तो सब इतना लोट पोट होकर हँसे कि डर लगा कोई गिर ना जाए पानी में. लेकिन जब इतने लोग अपने बेस्ट मूड में हों तो हंसी तो बेबात ही चली आती है. शालीनता के कवर में लिपटे नौनवेज़ चुटकुले भी चले.पर उसे आश्चर्य हुआ, शची को देख. शची ने ऐसे भाव प्रदर्शित किये , मानो सुना ही नहीं. 'कस्बाई मनोवृति' मन ही मन दुहराया उसने. ये छोटे शहरों से आई स्मॉल टाउन मेंटालिटी वाली लड़कियों से बड़ी कोफ़्त होती है उसे. क्या छोटी बच्ची हैं वे सब. किताबें तो बड़ी बड़ी पढ़ेंगी पर बस चाँद ,फूल खुशबू की ही बातें करेंगी. जीवन के सच से जैसे वे अनभिज्ञ हैं.

अन्त्याक्षरी भी चली. झट से लड़के लड़कियों के दो ग्रुप बंट गए .पर दोनों एक दूसरे पर बीस ही पड़ रहें थे. जब बोर गए तो गाने का दौर शुरू हुआ. उसने भी सोच लिया था, ऋचा ने मजाक बनाया तो क्या, वो बेहतर जानता है,अपनी आवाज़. इसे ही माध्यम बनाएगा अपना पैगाम पहुंचाने का. (बाद में कितना हंसा था अपनी इस बेवकूफी भरे ख्याल पर. सच ही तो कहा है किसी ने, 'व्हेन अ गर्ल इज इन लव,शी बिकम्सा क्लेवर बट व्हेन अ बॉय इज इन लव,ही बिकम्स अ फूल.) इसीलिए जब सबने आग्रह किया तो उसने ज्यादा टाल मटोल नहीं की और गाया, "ये रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ....मुरादों भरी ये रात किसे पेश करूँ....." सबके कान खड़े हो गए. खूब समझते थे ,सब ,किसके लिए गाया है,उसने.पर गाना ख़त्म होते ही शची बोली, 'कविता को और किसे?." इसपर कविता बिलकुल छुई मुई सी हो गयी. लेकिन शची ने कहा, "अरे ! तुम क्यूँ शर्मा गए मैंने तो इन्हें कविता लिखने की बात की थी....अब इस सुहाने महौल में तो कविता ही लिखी जा सकती है,ना. ".अपने गाने का यूँ सत्यानाश होते देख, तिलमिला गया वह. और फिर सबों के बहुत आग्रह करने पर...'एक और....प्लीज़ एक और..." एक कठिन उर्दू शब्दों से भरी एक ग़ज़ल उठा ली. जो सबके सर पर से गुज़र गयी. पर शची ने भी जैसे बनाने की कसम खा रखी थी.गाना ख़त्म होते ही पूरे लय में शुरू कर दिया, "वाशिंग पाउडर निरमा..दूध सी सफेदी...." एक पल को किसी के कुछ समझ में नहीं आया पर दूसरे ही पल असलियत जान सब खिलखिला पड़े. हंसी के बीच शची ने स्पष्ट किया., "गाने के बीच विज्ञापन भी तो जरूरी है,ना....और ऐसे गाने के बाद तो अनिवार्य." व्यर्थ हो गयी सारी ,कोशिश उसकी. फिर भी एक क्षीण आशा बाकी थी. अभी तो शची के गाने की बारी बाकी है और यह सब बिलकुल एकतरफा तो है नहीं.लेकिन तुषारपात हो गया उसकी आशाओं पर.नाविक ने नाव किनारे लगाते हुए कहा ,"दो घंटे हो गए स्साब "
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फिर सब कुछ सामान्य हो चला,लेकिन नहीं सामान्य हुआ,उसका मन.मन ही मन शची के प्रति अपने आकर्षण को महसूस तो कर रहा था. लेकिन कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था. शची की तरफ से हल्का सा भी आभास नहीं मिल रहा था, स्पष्ट संकेत मिलने की बात तो दर-किनार रही. शची के व्यवहार से कुछ भी परिलक्षित नहीं होता था. पहल करने से वह नहीं घबराता लेकिन शची ने अगर नकार दिया तो ?? और इसी ' तो' ने उसके सभी राहों पर तालेबंदी कर रखी थी. 'तो ' के आगे सोच कर ही रूह काँप जाती. किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकता. खुद ही हर संभावना से इनकार किया है उसने. लेकिन बिल्ली के भाग्य से छींके मुहावरे में ही नहीं, सच में भी टूटते हैं. तभी तो उस दिन मनीष ने कैंटीन में बड़े राजदार ढंग से पूछा, "पता है तुझे...अभी तक शची के राखी का उपहार ड्यू है ..पता है क्या देने की सोच रहा हूँ.?"

"क्या दे रहा है ?" यूँ ही अन्यमनस्क भाव से पूछ लिया उसने.

"वो चीज़ जो जीवन भर उसके साथ रहें
और हर पल,उसे इसका अहसास रहें "

"वाह वाह वाह...शायरी की टांग तोड़ने से तो तू बाज़ आएगा नहीं...अब नाम भी बता दे."

"ना, ऐसे नहीं....मैंने इतना दिमाग खर्च किया इसे बनाने में तू आधा तो कर."

"कोई किताब होगी "

"मेरी बात के तह में जा गधे, किसी को कैसे जीवन भर याद रह सकता है कि उसके पास ये किताब है."

"तो क्या कोई ज्वेलरी पीस दे रहा है..?"..अविश्वास से पूछा उसने.

"अबे पागल है?, मैं कहाँ से लाऊंगा इतने पैसे ...मानता है हार बता दूँ?"

"बता दे यार...तू भी एक बार जान ले जीत की ख़ुशी क्या होती है "...बोर होकर कहा उसने. उसे बिल्कुल मजा नहीं आ रहा था,इस बातचीत में.

"जीवन साथी"

"क्या कह रहा है, ..मैं समझा नहीं..."...वह सचमुच नहीं समझ पाया था.

"जीवन साथी का मतलब होता है, 'हमसफ़र ,हमकदम, लाइफ पार्टनर, समझा उल्लू के पट्ठे."...आज वह उसे खिझाने पर आमादा था..आगे जोड़ा, "उसकी बहन ने कहा था,कोई अच्छा सा लड़का हो नज़र में तो बताऊँ"

उसे विश्वास ना हुआ. ये तो वह जानता था. मनीष का शची के यहाँ आना -जाना काफी बढ़ गया है.परिवार में काफी घुल मिल भी गया है. आखिर एक ही कॉलोनी में रहते थे वे. यह सहज स्वाभाविक था.लेकिन भाभी मनीष से चर्चा करेंगी? अविश्वास सा हुआ उसे. सीधे उसकी नज़रों में देख कर पूछा, "तुझसे कहा उन्होंने?"

"एक ही बात है. उन्होंने माँ से कहा और माँ ने मुझसे चर्चा की. पढ़ाई ख़त्म हो रही है,उसकी. चिंता नहीं करेंगे गार्जियन," गंभीर स्वर था उसका, "दस जगह पूछताछ करनी ही पड़ती है. एकाध जगह और बात चल रही है."

उसका कलेजा धक् से रह गया. ओह! क्या बेवकूफी कर डाली, उसने. मनीष को इस तरह दर किनार नहीं करना चाहिए था. यही कुछ सहायता कर सकता था. लेकिन अब? अब क्या हो सकता है? सब कुछ तो ख़त्म हो गया. मन कडवाहट से भर गया, लेकिन छुपाने का प्रयत्न करता हुआ बोला, "तो भाई का कर्तव्य निबाह रहें हो?.कहाँ ढूंढ लिए?"

"है एक..." लापरवाही से बोला, मनीष.."मेरा तो पूरा विश्वास है, रिश्ता पक्का हो जायेगा. लड़का भी अव्वल है और अपनी शची ही कौन सी कम है."

उसने जैसे सुना नहीं...खिड़की के पार उड़ते धूसर बादलों को देखता रहा.

"क्यूँ यार ! तबियत तो ठीक है तेरी...बड़ा सुस्त लग रहा है."

"मनीsssष..." हंसने का अभिनय करने की क्षमता भी नहीं रही उसमे. गले में कुछ फंसता हुआ सा महसूस हुआ. आँखों में पानी झलझला आए. क्या होगा, अब उसके सपनों का?"

लेकिन मनीष ने जैसे ध्यान ही नहीं दिया.कंधे पर हाथ रख कर बोला,"तूने नाम नहीं पूछा, अभिषेक?'

झुंझला आया वह.हाथ झटक कर उठ खड़ा हुआ, "मैं जान कर क्या करूँगा...चल अब थोड़ी देर में लेक्चर शुरू होने वाला है. तेरी इन फ़ालतू बातों में मिस हो जायेगा ."

अब मनीष खुल कर हंस पड़ा. उसका हाथ थाम रोकते हुए बोला, "तू जानना चाहे या ना...मुझे तो बतानी है...दोस्त हो आखिर...उसका नाम है, अ भि षे क "

"क्यूँ मजाक करता है यार...हमेशा तुझे मसखरी ही सूझती रहती है..." आशंका के बादल छंटे नहीं थे, उसके चेहरे से,अभी

"अच्छा मसखरी ही सही....लेकिन बता तो कैसा है,अभिषेक उसके लिए? "

लगा मानो इतनी देर तक किसी ने उसे ,अँधेरी तंग कोठरी में बंद कर दिया था और दम घुट रहा था, उसका.भरपूर सांस खींचकर वापस बैठते हुए बोला, ओफ्फ़! तूने तो मुझे डरा ही दिया था.और जेब से रुमाल निकाल ली. पसीना छलक आया था, चेहरे पर.

"क्यूँ मैंने तो कोई डराने वाली बात नहीं कही. ना भूत का नाम लिया, ना शेर का."..बड़े भोलेपन से कहा मनीष ने .

"क्या सब कुछ जानकर भी अनजान बनने की कोशिश कर रहा है."...इतनी देर बाद मुस्कराहट आई थी उसके चेहरे पर.

"अनजान मैं नहीं,तू बनने की कोशिश कर रहा है. पर बन नहीं पा रहा.." फिर बड़े अपनेपन से कहा, "यार मुझसे नहीं कहेगा तो किस से कहेगा.? देख रहा हूँ, मन में लिए घुट रहा है. लेकिन इतना जान ले,तेरा मनोभाव किसी से छुपा नहीं है. शची से भी नहीं. फिर भी मुहँ छुपाये फिरता है.अरे डरना क्या कर दे इज़हार."

"क्या कर दूँ?"...कुछ गुस्से से बोला वह.

"अच्छा तो आ गया फिर से ओल्ड ट्रैक पे?...अभी तो तेरी सांस अटकी जा रही थी. ...सोच रहा होगा, क्यूँ नहीं कह दी मनीष से दिल की बात " बड़े नाटकीय ढंग से बोला,मनीष तो हंस पड़ा वह ,"तू अन्तर्यामी कब से हो गया यार?...मैं सच में यही सोच रह था."...और एक लम्ब सांस खींची.. "लेकिन लगता है ये सब अपने वश का रोग नहीं."

"बस बस अब तुझे फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं...अब मुझे हमराज़ बना लिया ,ना...देख कैसे सब फिट करता हूँ..अरे अपना बीस साला सॉरी बीस गर्ल वाला तजुर्बा किस दिन काम आयेगा ?"

"मेहरबानी कर के मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे....तेरी उलटी सीधी हरकतों की कोई जरूरत नहीं मुझे "...कुहनी तक दोनों हाथ जोड़ लिए उसने तो मनीष ठहाका लगा कर हंस पड़ा.
(क्रमशः)

25 comments:

HARI SHARMA said...

"व्हेन अ गर्ल इज इन लव,शी बिकम्सा क्लेवर बट व्हेन अ बॉय इज इन लव,ही बिकम्स अ फूल."

सोचो दुनिया के सारे लडके अपना ब्लोग बना ले और घोषणा कर दे -
लडके जिन्होने इन्कार कर दिया मूर्ख बनने की त्रासदी से, जिन्होने जो मिली, जैसी मिली उस पर ही सन्तोष कर लिया और जिन्दगी भर मूर्ख ना कहलवाने का पक्का इन्तेजाम कर लिया.......
तो लडकियो का सारा चातुर्य जो प्यार करने के बाद और बढ जाता है धरा रह जायेगा.

लेकिन हाय री किस्मत, और किस्मत भी क्या करे - ये गधा पचीसी की उमर ही ऐसी होती है कि लाख समझाओ हमारी बात सुनते ही नही.

वैसे व्यक्तिश: मै ऐसे प्रेमियो का समर्थन करता हू जो मौका मिलते ही अपने प्रेम का इज़हार कर देते है वरना तो उनके भाग्य मै अपनी प्रेयसी के बच्चो का मामा कहलवाना ही लिखा होता है (मामा थ्योरी आफ़ वन साइडेड लव).

आपकी ये कहानी बडी जीवन्त और चुलबुली होते जा रही है. मन करता है बार बार खोल के पढू.

मनोज कुमार said...

रोचकता बढती जा रही है। आगे का इंतज़ार है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:)

वाणी गीत said...

आज सुबह सुबह ही तुम्हारी कहानी पढ़ ली ...सब काम छोड़ कर ...
बहुत रोचक संवाद क्रम होता है तुम्हारी कहानियों में ...सहज ...अकृत्रिम
अगली कड़ी जल्दी लिखोगी ना ...!!

संजय भास्कर said...

रोचकता बढती जा रही है। आगे का इंतज़ार है।

'अदा' said...

हमेशा की तरह...तुम्हारी लेखनी को सलाम ..
रोचकता बनी हुई है कहानी में...पाठक बंधे हुए हैं...कहानी की सफलता भी यही होती..
अगली कड़ी का इंतज़ार है...

वन्दना said...

कहानी ने निरंतर बाँधा हुआ है …………………बहुत ही रोचक चल रही है………॥अगली कडी का इन्तज़ार्।

sangeeta swarup said...

पढने के बाद ऐसा क्यों लगता है कि ओह थोडा और आगे तक लिखा होता ?????????????
इंतज़ार जारी है....

Deepak Shukla said...

Hi..
Kahani ki pichhli 3 kadiyon ki tarah es kadi ne bhi pathkon ko bandhe rakha hai.. Aur aage kya hoga yah janane ki utsukta bani hui hai.. Par kahani ke ant main 'kramshah' ne fir hamen agli kadi ko padhne ke liye utsuk kar diya hai..

Samay ke sath manovrati bhi badal rahi hai, tabhi 'Shaleenta ki chashni main lipte non-veg chutkalon.. Ko ansuna karne wali Shachi Ko 'kasbai' manovruti ka maana jaane laga hai.. Jo badi badi kitaben to padhti hai par 'JIVAN KI SACHCHAI' ka gyan nahi.. Agar wo Nirlaajta ka parichay de to wo Adhunic Shahri maan li jayegi..

Sahi kahti hain aap, ek aadmi agar muhabbat main ho to wo murkh se jyada kuchh nahin.. Haha.. Kyo murkh hi muhabbat karte hain.. Akalmand to aapna kaam nikalte hain aur kisi ko pata bhi nahi chalta..

Achha hua..ABHISHEK ne ,"HOTHON SE CHHU LO TUM, MERA GEET AMAR KAR DO.." gana na gaya.. Varna Shachi 'BORO PLUS' le kar hajir ho jaati..haha..

Khair.. Kahani ki agli kadi ki pratiksha main..

DEEPAK SHUKLA..

Sanjeet Tripathi said...

kishto me na dena tha ise.
rochak...
waiting...

shikha varshney said...

मजा आ रहा है पढने में ..पिकनिक कि मस्ती के दृश्य बहुत अच्छे बन पड़े हैं....बाकी अभी सरसरी तौर पर ही पढ़ पाई हूँ ...ये सप्ताहांत कुछ ज्यादा ही व्यस्त है..इत्मीनान से पढूंगी

खुशदीप सहगल said...

शुक्र है मनीष शोले के जय जैसा दोस्त नहीं है...जो दोस्त बीरू का रिश्ता लेने मौसी के पास जाता है और पूरी तरह बैंड बजाने के बाद कहता है...

क्या करूं मौसी मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है...

जय हिंद...

Deepak Shukla said...

Hi..
@ Khushdeep ji
yahan Abhishek bhi kahan Veeru jaisa hai.. Jo tanki par chadh kar apne pyaar ka dhindhora peete.. Yahan to kahani ki 4th kadi ho gayi par pyaar ka ejhaar to door dost se bhi kahne main shreeman ji jhijhakte lage hain..
Dekhen Rashmi ji aur kitni kadiyon tak pratiksha karwati hain..

DEEPAK SHUKLA..

दीपक 'मशाल' said...

aisa nahin ho sakta aap sara upanyas ek baar me daal den di?? :)

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कहानी का प्रत्येक दृश्य जीवंत बन पडा है. बेहद रोचक होती जा रही है कहानी. मज़ा आ रहा है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

स्तरीय किशोर/युवा वर्गीय साहित्य की हिन्दी में बहुत कमी है। उसे भरने का आपमें बहुत पोटेंशियल है!

दीपक 'मशाल' said...

कृपया जल्दी अगली कड़ी डालिए दी, बहुत उत्सुकता हो रही है जानने की कि इतने करीब आने की बात होकर ये दोनों इतने दूर कैसे हो गए?? आपकी कहानी होती कहाँ है ये तो एक चलचित्र होता है दी.. जो मोहताज नहीं किसी निर्देशक या सीरिअल बनाने वाले का इसे सीरिअल में ढालने का..

Neha said...

aasha hai jaldi hi agli kadi padhne milegi...pata nahi din me kitni baar agli kadi ki utsukta me aapke blog me jhaank jaati hoon.....

रेखा श्रीवास्तव said...

intjar ki ghadiyan khatm huin aur aage ka parda khul gaya. par laga padh kar badi jaldi phir parda band ho gya. kahani bandhane vali hai, aur usako poora kiye bina jaya nahin ja skata hai. phir aage intjaar ....................

shikha varshney said...

रश्मि! मुझे तो ऐसा लगने लगा है कि यूवा मनोविज्ञान पर एक किताब लिखनी चाहिए आपको...जिस सरलता से आप उनकी मनोस्थिति को दर्शा देती हो काबिले तारीफ है.. नोनवेज चुटकुलों पर शची का अनसुना करने का रवैया ,अभिषेक कि उस पर सोच और २ दोस्तों का आपसी चुटकियों दोस्ताना..सब कुछ बेहतरीन तरीके से दर्शाया है आपने...अब जल्दी जल्दी आगे कि सारी कड़ियाँ डाल दो...

JHAROKHA said...

kaafi aanad aa raha hai .agali kadi ka besabri se intazaar hai.

सारिका सक्सेना said...

आज एक साथ सारी कडियां पढीं। सारे कमेंट्स भी पढे। जो कुछ भी कहना है सब लिखा जा चुका है। सुंदर कहानी है। युवा मन के मनोविग्यान से अच्छी तरह वाकिफ हैं आप रश्मि जी। लगता है ये उपन्यास काफी लम्बा है। वैसे जितना लम्बा उतना बेहतर बस ज्यादा इंतज़ार मत करवाया कीजिये। अगली कडी का इंतज़ार है।

अभिषेक ओझा said...

बहुत बढ़िया... इस बार बात कुछ ज्यादा आगे बढ़ी नहीं.

mukti said...

ये पार्ट कुछ ज्यादा रोचक लगे-
-'कस्बाई मनोवृति' मन ही मन दुहराया उसने. ये छोटे शहरों से आई स्मॉल टाउन मेंटालिटी वाली लड़कियों से बड़ी कोफ़्त होती है उसे. क्या छोटी बच्ची हैं वे सब. किताबें तो बड़ी बड़ी पढ़ेंगी पर बस चाँद ,फूल खुशबू की ही बातें करेंगी. जीवन के सच से जैसे वे अनभिज्ञ हैं.
-'व्हेन अ गर्ल इज इन लव,शी बिकम्सा क्लेवर बट व्हेन अ बॉय इज इन लव,ही बिकम्स अ फूल.
प्रेमियों के मनोभावों को बड़ी खूबसूरती से चित्रित किया है आपने.

Dr.R.Ramkumar said...

हमारी सोच हमें किस प्रकार रूपायित करती है इसका बढ़िया प्रस्तुतिकरण