Monday, September 27, 2010

हैप्पी बर्थडे ... मन का पाखी

'मन का पाखी' ने एक वर्ष की उड़ान भर ली और अब तक थका हो...ऐसा महसूस तो होता नहीं. वैसे भी मन के पाखी को इस  ब्लॉग आकाश की खबर बहुत दिनों बाद चली. और गलती मेरी थी, पिछले 5 साल से नेट  पर सक्रिय हूँ पर हिंदी ब्लोग्स   के बारे में मालूम नहीं था. बस कभी कभार 'चवन्नी चैप' पढ़ लिया करती थी. एक बार वहाँ हिंदी फिल्मो से सम्बंधित किसी के संस्मरण पढ़े और मेरा भी मन हो आया कि अपने अनुभवों को कलमबद्ध करूँ. मैने भी अपने  संस्मरण लिख कर अजय(ब्रहमात्मज) भैया को भेज दिए  (.हाँ, वे मेरे भैया भी हैं.) उन्हें पसंद आई और उन्होंने पोस्ट कर दी. उस पोस्ट पर काफी  कमेंट्स आए पर उस से ज्यादा लोगों ने  उन्हें फोन कर के बोला,कि 'बहुत अच्छा लिखा है.' मैने बेवकूफी भरा प्रश्न पूछ लिया कि "जब इतने लोगों को अच्छा लगा तो उन्होंने कमेंट्स क्यूँ नहीं लिखे?" और अजय भैया ने बताया "सबलोग कमेंट्स नहीं लिखते" (अब तो मैं भी यह बात बहुत अच्छी तरह जान गयी हूँ...इसलिए मेरे ब्लॉग के Silent Readers आप सबो का भी बहुत आभार,मेरा लिखा ,पढ़ते रहने के लिए:) )

अजय भैया ने मुझे अपना ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली . पर मैं  बहुत आशंकित थी. यूँ तो पहले भी मैं पत्रिकाओं में लिखती थी.पर लिखने और छपने के बीच एक एडिटर होता था. यहाँ खुद ही निर्णय लेना था,क्या लिखना है? पर अजय भैया रोज ही पूछने लगे थे. उन्हें ऑनलाइन देख मैं डर जाती. उन्हें पता था,मैने कहानियां लिख रखी हैं.कहने लगे कम से कम एक जगह एकत्रित  करने की सोच ही ब्लॉग बना डालो. और मैने ब्लॉग बना कर अपनी एक कहानी पोस्ट कर दी.,चंडीदत्त शुक्ल ,आशीष राय,रेखा श्रीवास्तव ,कुश, ममता ये लोग पहली पोस्ट से ही मेरे ब्लॉग के पाठक  बन गए और लगातार उत्साहवर्द्धन  करते रहें. आप सबका शुक्रिया .

दूसरी पोस्ट पर भी कई नए लोगों के कमेंट्स आए.उसके बाद तो मुझमे आत्मविश्वास आ गया,और किसी भी विषय पर लिखने लगी. आज जब पुरानी पोस्ट पर नज़र डाली तो कुछ नाम देख हैरान रह गयी.उड़न तश्तरी , डिम्पल, निर्मला कपिला, रश्मि प्रभा,दिलीप कवठेकर, कमल शर्मा, प्रवीण शाह,  सुलभ सतरंगी, रंगनाथ सिंह, पंकज उपाध्याय, गिरीश बिल्लोरे, दर्पण शाह , अपूर्व, विजय कुमार सप्पति, शमा, अनिल कांत, रंजना भाटिया, जाकिर अली, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, नीरज गोस्वामी, सुरेश चिपलूनकर, डा. दराल ये लोग शुरू से ही टिप्पणी देकर  मेरी हौसला  अफजाई करते रहें हैं ('जी' सबमे कॉमन है :))  आप सबो का शुक्रिया.

निर्मला जी ने जब लिखा "तुम्हारी शैली बहुत प्रभावित करती है" और अगले कमेंट्स में कई लोगों ने उसका अनुमोदन किया तो मैने आश्चर्य से सोचा, "अच्छा ! मेरी कोई शैली भी है. " ऐसे ही दीपक मशाल ,अजय झा,राज भाटिया जी, विवेक रस्तोगी जी  और कई लोगों ने कहा 'आपके लेखन में सहज प्रवाह  है" तो मन में संतोष हुआ. मुझे किसी भी लेख में सबसे ज्यादा उसका फ्लो पसंद आता है...और थोड़ा बहुत मेरे लिखने में भी आ गया है, अच्छा लगा,जान. नीरज गोस्वामी जी का ये कहना ,"आपके विचार बहुत स्पष्ट हैं" और गौतम राजरिशी का बार बार उल्लेखित करना कि "आप का विषय चयन अचंभित कर देता है '...हैरान कर देता, इतना कुछ दिख गया ,इनलोगों को मेरे लेखन में और मुझे कुछ पता ही नहीं था.

एक शाम  अमिताभ बच्चन के ब्लॉग में पढ़ा, कि वे मिडिया द्वारा ब्लॉग को महत्व नहीं दिए जाने से बहुत दुखी हैं और मैने एक पोस्ट लिख डाली  ,अमिताभ और ब्लॉग जगत का साझा दर्द उस पोस्ट पर काफी लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दीं अविनाश वाचस्पति, स्मित अजित गुप्ता, हरकीरत हकीर, गिरश बिल्लोरे, मुफलिस,रंजना ,शाहिद मिर्ज़ा शाहिद, कुलवंत हैप्पी,अर्क्जेश ,सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी,  दिगंबर नासावा, किशोर चौधरी,  डा.प्रवीण चोपड़ा,.इनमे से कुछ लोग तो  नियमित रूप से मेरी पोस्ट्स पढ़ते हैं. सबका आभार.

पर मैं हैरान थी, लोगों को मेरी पोस्ट के बारे में पता कैसे चल जाता है? अजय भैया के  कहने पर  मैने ब्लॉग वाणी पर रजिस्टर कर लिया था .पर ना मुझे वहाँ कुछ देखना आता था ना ही मैं कभी वहाँ 'लॉग इन' करती. ऐसे में  एक पोस्ट पर नमूदार हुए 'महफूज़ अली'. और गूगल  ने हमें दोस्त बना दिया.'हॉट  लिस्ट','चटका' ,वहाँ से दुसरो की पोस्ट पर कैसे जा सकते हैं, यह सब महफूज़ ने समझाया. महफूज़ की दोस्ती जिन्हें मिली है, उन्हें पता है कि सारी दुनिया आपके विरुद्ध हो जाए पर आप,महफूज़ को अपने साथ खड़ा पाएंगे. और महफूज़ अपने दोस्तों की कही किसी  बात का बुरा नहीं मानते. मैने दो,तीन बार किसी और की पोस्ट पर दिए ,महफूज़ के कमेन्ट पर  पब्लिकली बड़े कड़े शब्दों में आपत्ति प्रकट की है. महफूज़ की जगह कोई और होता तो मैं शब्दों में हेर-फेर कर माइल्ड बना देती.पर मुझे पता था,इस से महफूज़ से मेरी दोस्ती के इक्वेशन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा..और ऐसा ही हुआ. बस महफूज़,अपना उतावलापन जरा कम कर लो, और जल्दी से अपनी गृहस्थी बसा लो, अपने आप स्थिरता आ जाएगी.शुभकामनाएं.

महफूज़ ने अदा और शिखा को मेरे ब्लॉग से परिचित करवाया. अदा से आंचलिक  भाषा में टिप्पणियों के आदान-प्रदान को मैने बहुत एन्जॉय किया. अदा, इतनी व्यस्त रहने के बावजूद,अपने दोस्तों की प्रशंसा कर उन्हें आसमान पर बिठाना , नव-वर्ष और जन्मदिन पर शुभकामनाएं देना नहीं भूलती. सीखने पड़ेंगे ये सारे गुण.

शिखा और मैं तो अक्सर इनविजिबल मोड में रहकर पोस्ट लिखते रहते हैं और  डिस्कस भी करते रहते हैं. कमियां भी बताते हैं और एक दुसरे को आश्वस्त भी करते हैं,"न एडिट की जरूरत नहीं,रहने दो" शिखा से जाना कि ये 'फौलोवर लिस्ट' और 'डैश बोर्ड' क्या बला है. उसकी बहुत अच्छी आदत है कोई भी कमेन्ट करे वो उन्हें थैंक्स बोलती है,उनका ब्लॉग चेक करती है,फौलो करती है और कमेन्ट भी कर आती है. मैं बहुत कोशिश करती हूँ ये सब सीखने की,पर मेरी  लम्बी किस्तों को टाइप करने की थकान और कुछ मेरा laid back  attitude  आड़े आ जाता है. (शिखा, बहुत कुछ जमा हो गया है तुमसे सीखने को :))

शिखा और अदा के साथ वाणी गीत और संगीता स्वरुप जी भी मेरा ब्लॉग पढने लगीं. ये लोग इतनी सारगर्भित टिप्पणी देती हैं कि मेरी पोस्ट इनकी टिप्पणियों के बिना अधूरी रहती है. वाणी बहुत ही अच्छी सहेली है और उसके बेबाक विचार और सुन्दर लेखन शैली की तो फैन हूँ मैं.

मैने ब्लॉग जगत में कई जगह बहसों में जम कर हिस्सा लियाऔर खुल कर अपने विचार रखे. शायद
यही देख, ,रचना जी ने नारी ब्लॉग पर लिखने का निमंत्रण  दिया.और मैने वहाँ ,'मोनालिसा स्माइल फिल्म के बारे में लिखा,जो अब भी मेरे प्रिय पोस्ट में से एक हैं.एक पूरा सन्डे 'बेनामी  जी' के ब्लॉग पर बहस में व्यतीत  हुआ और मुझे पता भी नहीं था कि मेरी 'विवाह-संस्था' पर इतनी आस्था है. दूसरे पक्ष की वकालत ,'गिरिजेश राव जी, अमरेन्द्र त्रिपाठी, लवली गोस्वामी,दिव्या श्रीवास्तव जैसी शख्सियत कर रहें थे और मैं अकेले 'मोर्चा संभाले  थी. जब अंत में सबकी खिंचाई करने वाले, बेनामी जी ने कहा' आपकी सोच में एक सफाई है ,जो नमन मांगती है ' तो मेरा सन्डे बर्बाद होने का सारा मलाल चला गया. चिट्ठा चर्चा पर  भी अपनी असहमति जताने में मैने हिचक नहीं बरती.

पर चिट्ठा चर्चा ने एक बहुत ही प्यारी सहेली दी.'वंदना  अवस्थी दुबे' ,उस से बातें करते तो लगता है.'कॉलेज के नहीं स्कूल के दिन लौट आए हैं.बात बात पे कहती है,"विद्या कसम" जो मैने स्कूल के बाद अब तक नहीं सुना था .मेरे लेखन की सजग पाठक है और किसी भी कमी की तरफ तुरंत इंगित करती है. 'विद्या कसम' ,वंदना ऐसी ही पैनी नज़र रखना मेरे लिखे पर:)

पापा की सर्विस में उनकी पोस्टिंग के समय हुए कुछ रोचक (और भयावह भी ) घटनाओं पर लिखे संस्मरण और मुंबई की लोकल ट्रेन के संसमरण लोगों को खूब पसंद आए.चंडीदत्त जी ने सलाह दी कि, "संस्मरण, शब्द चित्र और रेखा चित्र " पर ज्यादा कंसंट्रेट करूँ. शरद जी के आश्वासन पर ,डायरी में कैद अपनी कुछ  कविताएँ भी पोस्ट करने की हिम्मत कर डाली. बच्चों के लिए खेल की अनिवार्यता..... काउंसलिंग की आवश्यकताऔर बाल मजदूर की त्रासदी पर भी लिखे मेरे पोस्ट, पसंद आए सबको. कई लोगों ने  मुझे बच्चों से संबंधित विषयों पर लिखने की सलाह दी. विजय कुमार सपत्ति जी शिवकासीमें काम कर रहें बाल मजदूरों  की दशा  के बारे में पढ़कर इतने  द्रवित हो गए कि मुझसे 'नुक्कड़ ब्लॉग' से जुड़ने का आग्रह किया ताकि मानस के मोती के जरिये , पोस्ट सब तक पहुँच सके. आप सबका आभार,मेरे लेखन पर इतनी बारीक नज़र रखने के लिए.

अलग-अलग  विषयों  पर लिखना जारी था और ममता कुमार (मेरी भाभी ) मुझसे पूछती रहतीं, "कहानी कब पोस्ट कर रही हैं?" प्रथम पोस्ट से अब तक की हर पोस्ट वे पढ़ती हैं और जहाँ सहमत ना हों,आपत्ति जताने से भी नहीं चूकती ,  इनके जैसे ही कुछ नॉन-ब्लॉगर सौरभ हूँका,आलोक, आदि कुछ अंग्रेजी पढने-लिखने -बोलने वाले लोग हैं पर मेरा लिखा बड़े शौक से पढ़ते हैं. शुक्रिया दोस्तों.

मैने कहानी की किस्तें डालनी  शुरू कर दीं.अब कई लोग नेट पर लम्बी कहानी पढने के आदी नहीं हैं. मैने भी दूसरे आलेखों  के लिए दूसरा ब्लॉग बना लिया.जिन्हें कहानियों का शौक था, बस  वे लोग ही इस ब्लॉग  पर आते रहें. पहले  लघु उपन्यास की  अंतिम किस्त पर आचार्य सलिल जी ,डा.अमर कुमार जी, रवि रतलामी जी, ज्ञानदत्त पण्डे जी, ताऊ रामपुरिया जी, इन लोगों की टिप्पणी से पता चला ये लोग भी मेरा लिखा पढ़ रहें थे.

मेरे लेखन ने,आचार्य सलिल जी, ज्ञानदत्त जी, सारिका,आलोक, डा. अमर कुमार, डा.तरु ...... कई लोगों को  (शायद भावनाओ की रौ में)  दिग्गज साहित्यकारों के लेखन  और उनकी कृतियों  की याद दिला दी. शायद मैं सातवें आसमान पर पहुँच जाती पर चंडीदत्त  जी, शरद जी, शहरोज़ भाई, अनूप शुक्ल जी,राजेश उत्साही जी  की टिप्पणियों ने हमेशा धरातल पर रखा. इन लोगों ने मेरा उत्साहवर्धन भी कम नहीं किया. पर यदा-कदा बताते भी रहें कि,यहाँ शिल्प की  कमी है,या साहित्यिक शब्दों की कमी खलती है,वगैरह.

प्रारम्भ से जिन लोगों  ने मेरी पोस्ट्स पढनी शुरू की,अब तक अपना स्नेह बनाये रखा है . बाद में कुछ नए नाम भी शामिल हो गए.
प्रथम उपन्यास से वंदना गुप्ता, सतीश पंचम जी, हरि शर्मा जी, दीपक शुक्ल जी, मनु जी,मुदिता, पूनम, शुभम जैन,  विनोदकुमार पाण्डेय, अबयज खान,पाबला जी हर किस्त पर  साथ बने रहे. खुशदीप भाई ने तो मुझे सीरियल में स्क्रिप्ट लेखन की कोशिश की सलाह भी दे डाली.

दूसरे लघु उपन्यास से , मुक्ति, संजीत त्रिपाठी, हिमांशु मोहन जी जुड़ गए और अपनी समीक्षात्मक  टिप्पणियों  से मेरी मेहनत  सार्थक करते रहें. अनूप शुक्ल जी ने कुछ अंशों को बॉक्स  में उद्धृत करने की तकनीकी सलाह भी दी.पर मैं नाकाम रही. (अब उन्हें सलाह देने के लिए थैंक्यू बोलूं या मेरे अमल ना कर पाने के लिए सॉरी, समझ में नहीं आता :))

तीसरा लघु उपन्यास तो इन्हीं पाठकों के साथ ने लिखवा ली.साधना वैद्य जी और शोभना चौरे , इंदु पूरी जी, प्रवीण पाण्डेय जी, घुघूती बासूती जी   ने भी पढ़ा और  ख़ास नज़र रखी,इस उपन्यास पर.

पिछली दो कहानियों पर अली जी  की समीक्षात्मक टिप्पणी ने अपनी ही लिखी कहानी को समझने में मदद की.  अभी और रोहित  की संवेदनशीलता भी कहीं गहरे छू गयी.

एक उल्लेख और करना चाहूंगी, "पराग, तुम भी.." में पहली बार मैने अपने लेखन में थोड़ी बोल्डनेस दिखाई (अपने स्टैण्डर्ड से ) दरअसल दिखानी पड़ी क्यूंकि वो 2010 की कहानी है ,और आज लड़के-लड़की साथ मिलकर सिर्फ चाँद और फूल नहीं देखते. किसी ने मुझे आगाह भी किया कि ये ब्लॉग जगत है, ज्यादातर लोग , सिर्फ उन्हीं उद्धरणों को कोट करके अपनी प्रतिक्रिया देंगे. पर एक भी पाठक ने ऐसा नहीं किया और कहानी के मूल स्वरुप को ही समझने की कोशिश की. सच , मुझे गर्व हो आया,पाठकों पर. और ब्लॉग जगत से कोई शिकायत नहीं ,यहाँ काफी  अच्छे लोग हैं जो बहुत अच्छा लिखते हैं और प्रोत्साहित भी करते हैं,अच्छा लिखने को..

सभी पाठकों का बहुत बहुत शुक्रिया, जिनके साथ और उत्साहवर्द्धन ने इस एक साल की ब्लॉग यात्रा को इतना खुशनुमा बनाए रखा.

मन के पाखी की, स्वच्छंद विचरण की यही जिजीविषा बनी रहें और थकान,ऊब, निराशा उसके पास भी ना फटके...बस यही  कामना है.

कुछ ऐसी टिप्पणियाँ, जो बेहतर लिखने को उत्साहित करती हैं और जिम्मेवारी का अहसास भी 

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल जी 
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/10/blog-post_13.html 
ज्ञानदत पाण्डेय जी
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/03/4.html
अविनाश वाचस्पति जी,
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html 
खुशदीप भाई
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html
शहरोज़ भाई
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html
हिमांशु  मोहन जी,
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/05/blog-post.html
प्रवीण शुक्ल प्रार्थी जी,
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html

54 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

रश्मि,

बहुत बहुत शुक्रिया, मैंने तो कुछ किया ही नहीं, हाँ बस रास्ता दिखाया था ब्लॉग बनाने का और तुम ऐसे आगे बढीं कि पीछे देखने कि फुरसत ही नहीं मिली. मैं तुम्हारे लेखन और काला दोनोंकी कायल हूँ. दरअसल मैंने चैट भी समसे पहले तुमसे ही करना सीखा था नहीं तो ऐसे कभी किया ही नहीं. एक साल में जो मुकाम तुम्हें मिला बस इसी तरह से हमेशा आगे बढती रहो और हमें अच्छा पढ़ने को मिलता रहे.
हार्दिक शुभकामनाएं!

बी एस पाबला said...

हम तो भई, खामोश पाठक रहे हैं :-)
हालांकि पिछले कुछ अर्से से सक्रियता कुछ कम रही

फिलहाल, बहुत बहुत बधाई एक पड़ाव पार करने की
शुभकामनाएँ भविष्य हेतु

shikha varshney said...

अरे वाह एक साल पूरा होगया ...हैप्पी बर्थडे मन का पाखी.
अरे सीखा तो आपसे है मैंने. और अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है.:):) .और ये इनविजिबल मोड पर लिखना.. ये भी आपसे ही सीखा है हा हा हा बहुत काम की चीज़ है.पर अब आप वाकई इतना थक जाती हो कि डिस्कशन का तो टाइम ही नहीं है आपके पास :(.पर इन खूबसूरत कहानियों के बदले ये सौदा मंजूर है हमें .मन का पाखी ऐसे ही ऊँची उड़ान भरता रहे .
एक बार फिर से बहुत बहुत शुभकामनाओं के साथ .

राज भाटिय़ा said...

पाखी को जन्म दिन के लिये आप को शुभकामनाये, ओर बधाई, ओर आगे भी युही तरक्की करते रहे, धन्यवाद

निर्मला कपिला said...

देखा न मैने गलत नही कहा था कि तुम्हारी शैली प्रभावित करती है अब भला इस तरह की रिपोर्ट कौन लिख सकता है कम से कम मैं तो नही। मन का पाखी के जन्मदिन पर बहुत बहुत बधाई और आशीर्वाद। बस इसी तरह लिखती रहो।

प्रवीण पाण्डेय said...

आपकी रचना पढ़ने की प्रक्रिया में हूँ, देरी क्षम्य हो।

abhi said...

बहुत कुछ पता चला...मुझे नहीं पता था..
और आपने मेरा नाम भी लिया...इसके लिए थैंक्स नहीं कहूँगा...मिलूँगा तो एक चोकलेट खिला दूँगा आपको :)

Sadhana Vaid said...

मन के पाखी की वर्ष गाँठ पर आपको हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें ! आप लिखती ही इतना कमाल का हैं कि सारे पाठक स्वत: ही खींचे चले आते हैं ! जो एक बार आपको पढ़ लेता है आपका मुरीद हो जाता है ! इस पाखी की उड़ान और बुलंद हो और इसके पंख नित नयी ऊर्जा से बलवान होते रहें यही शुभकामना है ! आपको ढेर सारा प्यार और बधाई !

संजय भास्कर said...

...हैप्पी बर्थडे मन का पाखी.

संजय भास्कर said...

मन के पाखी की वर्ष गाँठ पर
बहुत बहुत
बहुत बहुत
बहुत बहुत
बहुत बहुत
बहुत बहुत
बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनायें !

MUFLIS said...

मन का पाखी
के लिए
ढेरों शुभकामनाएं

सालगिरह मुबारक

शरद कोकास said...

बस ऐसे ही जन्मदिन मनाते रहे हार्दिक बधाई

mukti said...

हैप्पी बर्थडे पाखी :-) ! दी, आप कैसे इतने लोगों को याद रखती हैं और उनके कमेंट्स भी, उनका योगदान, सब कुछ.
आपकी कहानियों में एक सहजता होती है, जो मुझे लुभाती है, इसीलिये आमतौर पर किस्सा कहानी से दूर रहने वाली मैं आपकी नियमित पाठिका हो गयी. अब मैं थोड़ी व्यस्त रहती हूँ, पर जब भी कहानी पढ़ती हूँ, तो अच्छी तरह से और कमेन्ट भी मन से करती हूँ.
ऐसे ही मन का पाखी उड़ता रहे...!

डॉ महेश सिन्हा said...

बधाई और शुभकामनाएँ

संगीता पुरी said...

बहुत बहुत बधाई ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन का पाखी को एक वर्ष होने की बहुत सारी बधाई ..और शुभकामनाएं ....

अब नयी कहानी का इंतज़ार है ...

महफूज़ अली said...

कहते हैं कि "टाइम नेवर स्टैंड्स स्टिल".... वक़्त कैसे गुज़र जाता है कि पता ही नहीं चल पाता... कब आपसे मिला और कैसे इतना अच्छा रिश्ता बन गया... आपसे... पता ही नहीं चला... ऐसा लगता है कि आपको मैं बरसों से जानता हूँ... एक अलग ही जगह है आपकी मेरी ज़िन्दगी में... इतने ही वक़्त में पता नहीं कितनी बार आपने मुझे मुश्किलों से उबारा... मेरी कितनी परेशानियों को चुटकियों में सौल्व किया आपने.... कभी मेरा रोने का मन हुआ ... तो आपके सामने रो लिया... कभी चिल्लाने का मन भी हुआ तो वो भी कर लिया... आप मेरी ज़िन्दगी में एक एसेट हैं...

हैप्पी बर्थडे टू मन का पाखी... अनदर फेदर एडेड... इन यौर हैट....

डॉ टी एस दराल said...

यह तो बड़ा भरा पूरा परिवार है ब्लॉग जगत का ।
निश्चित ही यह ब्लोगिंग की जीत है ।

एक साल में इतना कुछ पाने के लिए आपको हार्दिक बधाई एवम शुभकामनायें रश्मि जी ।

Kusum Thakur said...

मन का पाखी के वर्षगाँठ पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई !!

'अदा' said...

मन का पाखी..जिसकी उड़ान बेमिसाल है...
हम भी उड़ते ही रहते हैं..इसके संग-संग...
कहते हैं ..मन से मन को राह होती है...जाने कितने आते हैं जीवन में और चले जाते हैं...लेकिन कुछ अनकहे रिश्ते जो बन जाते हैं ...सारी उम्र की धरोहर होते हैं...
और यही वो रिश्ते हैं जिनके लिए मन कहता है...कुछ तो पा लिया है...!
ऐसा ही है कुछ हमारा बंधन...
बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनायें...

Shobhna Choudhary said...

मन के पाखी की वर्ष गाँठ पर आपको शुभकामनायें

वन्दना अवस्थी दुबे said...

तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार...... ताकि हर बार मेरा इतने ही प्यार से ज़िक्र होता रहे...[ मतलब ऐसा कह के खुद भी हज़ारोंसाल जीने का इन्तज़ाम कर लिया है :) ] केक भेज दिया है, खा के बताना कैसा लगा? :):) रही बात पैनी निगाह की, तो वो तो रहेगी ही, विद्या कसम... :)

आवेश said...

मन का पाखी उड़ता-उड़ता
समय के उस छोर पर जा पहुंचा
जहाँ स्क्रीन पर दिख रहे रंग बिरंगे चेहरों ने
अजनबियत खो दी है
खुद को गाँव के किसी मिटटी के कच्चे मकान
के मजबूत दिवार के सहारे खड़ा पाती है रश्मि
ये वही गाँव है जहाँ वो सब चेहरे भी रहते हैं
जिन्हें शब्दों की साझेदारी का सलीका
अभी अभी आया है
जिंदगी की मुश्किलों को आसान बनाने
और पाखी को परवाज देने का
ये भी एक तरीका है
हम सभी खुश हैं
और गाँव अब पहले से भी ज्यादा गुलजार है

ali said...

बहुत बहुत बधाई ! पर ...एक बात बताइयेगा...प्रविष्टि के तीसरे पैरे में कई नाम लिख कर आपने लिखा कि 'जी' सबमें कामन है तो फिर मैंने समीर जीजी पढकर गलत तो नहीं किया :)

Sanjeet Tripathi said...

jab se aapke blog ke baare mein jana hai, der se hi sahi lekin aapki kahaniyan aur post padhta hi hun..

vakai aapke lekhan me ek ravaani hai.... ise banaye rakhein, thik vaise hi jaise bahana paani... yahi sabse badi khoobi hai....

badhai aur shubhkamnayein..... aise hi man ka paakhi ke janmdin mante aur manaate rahein.....

अनूप शुक्ल said...

वाह ! बधाई!

मुझे आपका लेखन की सहजता अच्छी लगती है। कहानियां धारावाहिक वाली कम पढ़ पाये लेकिन लेख सारे पढ़े हैं और अच्छे लगे हैं।

आपकी टिप्पणियां भी मजेदार होती हैं,खासकर शिखाजी, अदाजी और अपने अन्य साथियों की पोस्टों पर जिनपर आप खुलकर बिन्दास कमेंट करती हैं।

मुझे आपकी बहसा-बहस और नोक-झोंक वाली टिप्पणियां भी मजेदार लगती हैं। आपका अपनी बात पर अड़ना और अड़े रहना आपकी ताकत है लेकिन अगले की बात को समझने की कोशिश ही न करना भी इसी ताकत का साइड इफ़ेक्ट है। :)

पुलकोट लगाना बहुत आसान काम है। प्रयास करिये हो जायेगा।

सालगिरह के मौके पर बहुत सारी शुभकामनायें। बधाईयां!

rashmi ravija said...

@अनूप जी
यहाँ सबकी अपनी-अपनी ताकत और उसके ढेर सारे साइड इफेक्ट्स हैं और अगर अगला अपनी बात ना समझा पाए तो ये उसकी कमजोरी है .

शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद

rashmi ravija said...

@ अली जी,
कहाँ पढ़ लिया आपने, समीर जी??? वहाँ तो उड़न तश्तरी लिखा है..
हा हा..मैने एडिट कर दिया...:)
ध्यान दिलाने का शुक्रिया

rashmi ravija said...

@प्रवीण जी,
ये शुभकामना की जगह..क्षम्य जैसा शब्द क्यूँ?? :)
जल्दी क्या है...आराम से पढ़िए...उपन्यास भागे थोड़े ही जा रहें हैं...और कोई समय सीमा भी नहीं फिर कैसी उलझन.

वाणी गीत said...

हाय रे ...
हम तो घबरा गए नाम ढूंढते ...भूल जाती तो गला तो दबाना ही था ...
तुम लिखती ही इतना अच्छा हो ...टिप्पणी करना तो मैंने तुमसे और अदा से ही सीखा है मतलब तुम्हारे प्रोत्साहन से ..
बहस को सकारात्मक लेना कोई तुमसे सीखे ...विचारों की भिन्नता को खुले दिल से स्वीकार करना तुम्हारी सबसे बड़ी खासियत है ...तुमसे बात करना मुझे हमेशा हल्का कर देता है ...इतनी अच्छी दोस्त बनी रहने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद....!

ये लो ...बधाई देना तो भूल गयी ...मुबारक हो पहली वर्षगाँठ ...बहुत बहुत बधाई ...!

rashmi ravija said...

@वाणी गीत
दिल खुश कित्ता वाणी...:)

यार लोग जैसे जैसे .ब्लॉग से जुड़ते गए...उसी क्रम में उनका नाम लिखा है...इसीलिए तुम्हारा नाम थोड़ा नीचे चला गया....तुम पहली पोस्ट से क्यूँ नहीं आई?? :X :X

वाणी जो सकारात्मकता तुम्हे दिख जाती है....लोगों को क्यूँ नहीं दिखती? ....पर फिर सबका नाम वाणी गीत नहीं है,ना.:) :)

तुम्हारी दोस्ती...अमूल्य है,मेरे लिए...बस नज़र ना लगे,किसी की )

Vivek Rastogi said...

हम भी कई बार किसी पोस्ट पर मतलब कहानी पर टिपियाये और कई बार साईलेंट रीडर :D होकर निकल लिये।

पर कहानियों में वो रवानी है जो किसी को भी अपने अंदर डुबो ले खासकर वो पराग वाली...

अब आपसे उम्मीदें कुछ ज्यादा हो गई हैं... अच्छी कहानियों के लिये..

PD said...

दीदी.. अपने इस सायलेंट रीडर का सलाम भी लेते जाईये.. :)

वन्दना said...

आहा ………………लो एक साल हो गया और पता भी नही चला।
बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें।

इसी प्रकार सफ़लता की उडान भरती रहो।

rashmi ravija said...

@मुफलिस जी, एवं PD
कम से कम ब्लॉग की वर्षगाँठ पर तो इन Silent Readers की वाणी सुनाई दी..शुक्रिया :)

राजेश उत्‍साही said...

लो हमें तो पता भी नहीं चला कि हम इतनी जल्‍दी आपके 'मन' में समा गए। आभारी हूं आपका कि आपने मेरा मंतव्‍य पहचाना।

मेरे लिए तो यह आपका जन्‍मदिन है। सचमुच आपका यह संवदेनशील मन तो इतने दिनों से गर्भ में था हमारे सामने(ब्‍लाग पर) साल भर पहले ही आया है न। इसलिए आपको,आपके मन को और उसके पाखी को भी जन्‍मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

शोभना चौरे said...

रश्मिजी
मन के पाखी के साथ साथ आपको भी बहुत बधाई |
मनका पाखी उड़ता रहे आप उस उडान को रचती रहे इन्ही शुभकामनाओ के साथ अनेक धन्यवाद |
आपकी इस धन्यवाद देने कि कला कि मै कायल हो गई \कितने लोगो को कितनी शिद्दत से याद रखना और सिलसिलेवार उनको उनकी विशिष्टता के साथ धन्यवाद देना काबिले तारीफ है |
आभार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जन्मदिन मुबारक हो मन का पाखी यह ब्लॉग हमेशा से मन के भावों को एक उड़न देता रहा है आगे भी यूँ ही सबका दुलारा बना रहे

Udan Tashtari said...

अभी तो शुरुवात है...उड़ान निरंतर बनी रहे..हम सब मिल कर इसकी वर्षगांठें मनाते रहे....

बहुत बहुत बधाई, शुभकामनाएँ एवं आभार.!!

रश्मि प्रभा... said...

blog kee salgirah yaani shabdon ke rishton kee salgirah .... jitne naam hain, utni gahraai rishton ko lene kee ....... shubhkamnayen

नीरज गोस्वामी said...

रश्मि जी ब्लॉग के जनम दिवस की ढेरों शुभकामनाएं...दुआ करते हैं के आप सालों साल यूँ ही लिखती रहें...और हम जैसे पाठकों को अपना लिखा पढ़ने का अवसर प्रदान करती रहें...
देरी से पहुंचा हूँ लेकिन पहुंचा हूँ...और पहुंचना ही जरूरी होता है...क्यूँ के देर आये दुरुस्त आये...
एक बार फिर ढेरों शुबकामनाएं...

नीरज

anitakumar said...

बहुत बहुत बधाई, हम आप से पहले मिल लिये और आप के ब्लोग से बाद में। चलिए आज अपना नाम यहां भी रजिस्टर करवा के जा रहे हैं

दिगम्बर नासवा said...

Bahut bahut badhaai aur shubhkaamnaayen ..... aapka safar yun hi chalta rahe ... aisi aasha hai ...

दीपक 'मशाल' said...

'मन का पाखी' पर पहली बार जब कहानी पढ़ी थी तो सोचा भी नहीं था कि इतनी जबरदस्त कहानी लिखने वाले हाथ कभी मुझे राखी बाँधने वाले हाथ हो जायेंगे.. आपके लेखन से हमेशा कुछ ना कुछ सीखा है दी और हमेशा सीखता रहूँगा.. दुआ है कि ये ब्लॉग अनंत काल तक चलता रहे और हर हिन्दी भाषी ही नहीं बल्कि विदेशियों की भी जुबां पर हो.. बधाई ..

दीपक 'मशाल' said...

दी.. आपकी लगभग हर कहानी पढ़ी है और काफी गहरे से उसके लगभग हर पात्र को महसूस करने की कोशिश भी की. अभी यहाँ पर सिर्फ आपकी कहानियों के नारी पात्रों और उनमे भी सिर्फ केन्द्रीय नारी पत्रों के बारे में एक संक्षिप्त रूप में कुछ कहना चाहता हूँ क्योंकि समयाभाव भी है और ये भी कि ये कोई पोस्ट या समीक्षा नहीं सिर्फ मेरा कमेन्ट है.. :)
'उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान' की मीरा/नमिता/ममता/स्मिता हों, शिवनाथ माएं हों या फिर अम्मा जी.. सभी के साथ पूरा न्याय किया गया.. ना सिर्फ उनके चरित्र को समय-समय पर उभारा गया बल्कि उनकी सोच के रूप में..... उनके संवादों के माध्यम से समाज की, एक पिछड़े गाँव की कभी दकियानूसी तो कभी बदलते गाँव-शहर की सोच को बखूबी चित्रित किया गया है..
और याद करता हूँ 'आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शचि' की मासूम शचि को जो दुनिया भर की दुःख और तकलीफें झेलती हुई बड़ी हुई और उसके बाद भी अपनी बीमारी के चलते अपने जीवन में आने वाली ख़ुशी का भी सहर्ष परित्याग कर देती है.. जिससे कि उसके चाहने वाले पर कहीं वो बोझ ना बन जाए..
दूसरी तरफ 'पराग, तुम भी...!!!' की तन्वी जो अंततः आदर्श प्रेमिका और पतिव्रता पत्नी के रूढ़िवादी साँचे से बाहर निकल आज की व्यवहारिक एवं यथार्थवादी युवती की सोच में खुद को ढाल लेती है..
वैसे मैंने आपको 'और वो चला गया बिना मुड़े' से पढ़ना शुरू किया था.. उसकी नेहा को छुईमुई से एक दृढनिश्चय अपनाने वाली लड़की में रूपांतरित होते देखा..
इधर शालिनी को देखता हूँ(अरे वही 'आँखों का अनकहा सच वाली') तो मोहल्ले की संकोची और माँ-बाप के कहने पर अपने अरमानों का गला घोंट देने वाली लड़की याद आ जाती है..
कहने को बहुत कुछ है पर फिर कभी.. सच यही है कि आपके नारी पात्रों के विश्लेषण के रूप में एक पूरी पीएच.डी. की जा सकती है.. उनके ना सिर्फ विभिन्न रूप हैं बल्कि भिन्न सोच और भिन्न आयाम हैं भिन्न आवृत्तियाँ भी हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे पाँचों अंगुलियाँ बराबर नहीं होतीं.. आपने कभी सिर्फ नारीवाद की वकालत नहीं की बल्कि उनकी कमियों और अच्छाइयों दोनों को ही बड़े संतुलित रूप में सामने लाया..
बहुत होशियारी(उल्लूपना) झाड़ ली मैंने.. अब बाकी फिर कभी.. :)

खुशदीप सहगल said...

मन के पाखी का एक साल पूरा होने पर बहुत बहुत बधाई...ये रचनाकर्म ऐसे ही सालों-साल चलता रहे...

और अपने नए न्यूज़ प्रोजेक्ट में दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करते हुए आसमां की बलंदी को छुओ...

जय हिंद...

गिरीश बिल्लोरे said...

हार्दिक आभार
एवम बधाइयां स्वीकारिये जी

JHAROKHA said...

man ka oakhi ke ek vaeshh safalta purvak bitne par hardik hardik shubh kamnaaye swikar kare aapyun hi saflta ke sopan ko chhuti rahe yahi eshwar se kamana hai .
aur ham apki achhi achhi kahaniyo va kavitaao kaaanand uthate rahe .
inhi shubh kamnao ke saath-----------
poonam

रचना दीक्षित said...

मन का पाखी के जन्मदिन पर बहुत बहुत बधाई. आपको भी बहुत बधाई |

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

कथा-साहित्य में कम गति है इसलिए आपके दूसरे ब्लॉग पर ज्यादा हाजिर रहा , इस ब्लॉग की अपेक्षा | बज़ शेयर से आया | ब्लॉग बड्डे मुबारक हो !! यह देखना अच्छा रहा कि नवोदित सृजनात्मकता को ब्लॉग जगत में लोग अपेक्षित सकारात्मकता से नवाजते हैं !

बेनामी वाली बहस की सही याद दिलाई आपने | वहाँ मैंने हठात सचेत रूप से एक व्यक्ति के तर्कों का समर्थन विवेकहीन होकर किया था ( ...अनुमोदक/प्रशंसक ..शायद प्रसंग याद आ रहा हो ! ) | उसके लिए क्षमा चाहता हूँ !

सतत रचनाशीलता की यात्रा चलती रहे ! शुभकामनाएं ! आभार !

गौतम राजरिशी said...

लीजिये, कथित बिजियेस्ट मैन ने समय निकाल लिया "मन का पाखी" के सालगिरह-समारोह में शामिल होने के लिये...

ढ़ेरों बधाई...और ये पहला साल धीरे-धीरे सौवां साल में तब्दील हो नयी ऊंचाईयों को छूता हुआ !

Mrs. Asha Joglekar said...

मन का पाखी की साल गिरह पर अनेक बधाइयां । आप ऐसे ही लिखती रहें और मन का पाखी नई नई ऊँचाइयों को प्राप्त करे ।

"अर्श" said...

"मन का पाखी " के प्रथम सालगिरह की ढेरो बधाई


अर्श

राजीव थेपड़ा said...

इस सफ़र में हम आपके साथ हैं.....हर किसी का हर सफ़र किसी न किसी की तलाश है.....वह तलाश जल्द ही पूरी हो सबकी.....इन्हीं कामनाओं के साथ.....यह भाई....!!