इन दिनों व्यस्तता कुछ ऐसी चल रही है कि कहानी के इतने प्लॉट्स दिमाग में होते हुए भी...उन्हें विस्तार देने का मौका नहीं मिल पा रहा...और ख्याल आया...कहानी सुनवाई तो जा ही सकती है. ये कहानी भी आकशवाणी से प्रसारित हुई थी. इसे ब्लॉग पर भी पोस्ट कर चुकी हूँ "होठों से आँखों तक का सफ़र "..शीर्षक से..... दोनों कहानियों में थोड़ा बहुत अंतर ..रेडियो के समय सीमा के कारण नज़र आ सकता है
तो मुलाहिजा फरमाएं :)
40 comments:
छोटी भाभी का बाह्य और आंतरिक व्यक्तित्व मन को प्रभावित कर गया।
...इस उत्तम कहानी को सुनवाने के लिए आभार रश्मि जी।
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-मानवाधिकार, मस्तिष्क और शांति पुरस्कार
कहानी पहले भी पढ़ी थी तब भी मन को छू गई थी. अब भी टचिंग लगी.
पोस्ट आने के पहले से ही मुझे तो खबर थी :)
अभी दुबारा सुन लिया. :)
बहुत जीवंत लगी कहानी ....अच्छी प्रस्तुति
...अच्छी प्रस्तुति
जीवंत कथा सुनने मे और भी अच्छी लगी। धन्यवाद।
सुनकर ही मर्म पता लगता है कहानी का, अगली इस्मत आपा आप हैं।
प्रवीण जी...ये क्या कह दिया...तब से कानो को हाथ लगाए बैठी हूँ...
वो तो अच्छा है मेरे पैर सिर्फ जमीन पर ही नहीं हैं, बल्कि जमीन के अंदर तक धंसे हुए हैं...वरना आपलोगों की यूँ ही कह जानेवाली बात कहाँ उड़ा ले जाती,पता नहीं...और मैं खुद को ही भूल जाती.
एक साधारण सी कहानीकर हूँ....जो दिल में आए..लिख जाती हूँ.
बहुत ही ह्रदयस्पर्शी कहानी
दिल को भीतर तक बरबस ही छू गयी
आवाज भी बेहद सुन्दर लगी
आभार
क्रिएटिव मंच आप को हमारे नए आयोजन
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आभार
सुनने में बहुत मज़ा आया ... आपकी आवाज़ भी अच्छी है और कहानी दिल छुं गई ..
कहानी पहले भी पढी थी…………बहुत बढिया।
ankhen nam ho gayi... bahut sunder!
रश्मि जी,
आपकी खनकती हुई आवाज़ में कहानी सुनना एक सुखद अनुभव...आवाज़ अत्यंत सुस्पष्ट एवं सुश्रवणीय...उच्चारण प्रशंसनीय!
छोटी भाभी अपने नाम ‘किरण’ के अनुरूप ही घर-भर में....! हँसते समय...रोशनी-सी चमक जाना... जैसी अभिव्यक्तियों में objective co-relation का प्रयास भी सराहनीय...पूरी कहानी सुनते समय ऐसा एहसास हुआ कि मानो आप PC के अन्दर से नहीं, बल्कि मेरे घर आकर... सम्मुख बैठकर सुना रही हों...बधाई!
और हाँ...मैंने अकेले नहीं सुना आपको...मेरी श्रीमती जी भी साथ में सुनकर गयीं हैं...कह रही हैं कि ‘छोटी भाभी’ का चरित्र आपने बख़ूबी उकेरा है...बड़ी ‘प्यारी कहानी’ है...और ‘नमस्ते’ भी लिखवा रही हैं...स्वीकारें उनकी नमस्ते!
!
@जितेन्द्र जी,
बहुत बहुत शुक्रिया...तारीफ़ कुछ ज्यादा नहीं हो गयी :)
भाभी जी को मेरा स्नेह भरा नमस्कार कहियेगा....कहानी सुनने का समय निकाला उन्होंने...और पसंद भी किया..इस उत्साहवर्द्धन के लिए कोटिशः धन्वाद
बहुत ही भावपूर्ण और सुंदर कहानी, सधे हुये अंदाज में स्वर का उतार चढाव, कहानी को जबरदस्त प्रवाह देता है. लाजवाब, शुभकामनाएं.
रामराम.
कहानी लिखने में तो आप कमाल करती ही हैं , सुनाने में भी कोई ज़वाब नहीं ।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति रश्मि जी ।
रश्मि जी यह तो कहानी का प्लाट ही लगा। कहानी तो आपको इस पर लिखनी चाहिए। बहरहाल आपकी आवाज बहुत ही मधुर और कानों में मिश्री घोलती लगी। पढ़ने का अंदाज,शब्दों के उच्चारण और उतार-चढ़ाव सब कुछ बहुत सधा हुआ है। बधाई। मैं इसे आंखों से होठों तक का सफर कह सकता हूं।
@राजेश जी,
आपने सिर्फ कहानी ही सुनी...लगता है,उसके ऊपर के दो शब्द नहीं पढ़े :)...मैने वहाँ जिक्र किया है...और लिंक भी दिया है कहानी का...
छोटी भाभी को पढ़ते हुए शरतचंद्र के कई पात्र स्मृतिपटल पर घूमने लगे.. कहानी का अंत बहुत सकारात्मक है.. यह देख अच्छा लगा..
कहानी बहुत अच्छी लगी और आपकी आवाज़ भी कर्णप्रिय रही. पहली बार आकी आवाज़ सुनी. शुक्रिया आवाज़ सुनवाने के लिए. आपकी आवाज़ यहाँ की एक अदाकारा जी से बहुत मिलती है.
@शुक्रिया अनामिका...
पहले भी कहानी का ऑडियो पोस्ट किया है..दूसरे ब्लॉग पर 'ओणम' पर एक वार्ता भी...पर आप तो कभी-कभी दर्शन देती हैं...:)
और यहाँ की कौन सी अदाकारा...???
कहानी, आवाज़, प्रस्तुति...सब कुछ माशाल्लाह...!
bahut achhi lagi yah prastuti
अगर बच्चा २२-२४ साल में नौकरी पाया हो तो भाभी के दुखों की उम्र भी उतनी ही हुई ! शायद इस वक्त वे ४२-४५ वर्ष की होंगी !
दुर्घटना पर वैधव्य एक संयोग था पर भाभी के ससुराल वालों के व्यवहार में आये परिवर्तन के लिए एक पुरातनपंथी जस्टिफिकेशन ये लग रहा है कि वे अपने युवा पुत्र की मृत्यु को नवविवाहिता से जोड़ कर देख रहे हों ,क्योंकि हम भारतीयों को भाग्यवाद पे कुछ ज्यादा ही भरोसा रहता है ! भाभी के पुत्र में वे अपना पुत्र तो देख पा रहे होंगे पर परजाई में अपने पुत्र की मृत्यु की छाया दिख जाना एक कारण हो सकती है उनके बदले हुए व्यवहार की पृष्ठभूमि में ! बहरहाल ये एक विचार मात्र है !
मुझे तो कथा पहले सुख फिर दुःख और फिर से सुख के ख्याल पर आधारित लग रही है...कुछ हद तक संस्मरणात्मक शैली में लिखी गयी !
भाभी को यौवन के वर्षों की क्षति और मेहनत के घंटों की बढोत्तरी पर भी कमेन्ट बनते हैं पर फिलहाल नहीं ...
दीदी, बेहद सुंदर कहानी रही।
पर मैं एक बात समझ नहीं पाता हूं, जब लड़कियां इतनी पढ़ी-लिखी हैं। सबसे खास बात लड़कियां समझदार भी हैं, तो क्यों सहती हैं ये सब। एक और बात, सगी ननंद को भाभी से कोई प्रेम नहीं है मगर उसकी सहेली भाभी को कितना चाहती है। ऐसा क्यों होता है आम जिंदगी में भी।
बहुत अच्छी कहानी भाई मैंने तो पहली ही बार पढ़ी
मेरे ब्लॉग में SMS की दुनिया
बहुत सुंदर कहानी सुनाई|
घुघूती बासूती
सिर्फ नाम की छोटी निकलीं ये तो, काम तो बडे अच्छे करती हैं। बधाई।
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दिल्ली के दिलवाले ब्लॉगर।
कहानी तो अच्छी है ही..प्रस्तुति भी बहुत अच्छी लगी.बधाई रश्मिजी.
बहुत अच्छी प्रस्तुति...
जितनी बेहतरीन कहानी..उतनी ही उम्दा प्रस्तुति!! बधाई.
बेहद अच्छी लगी कहानी.
आपकी आवाज़ भी काफी मधुर है.
उम्दा प्रस्तुति!!
कहानी,आवाज़ और प्रस्तुतीकरण तीनों ही अच्छे लगे !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
बेहद दिलकश कहानी सुनाने का अंदाज़ भी बहुत दिल को भाया ...शुक्रिया रश्मि जी
शुरू से अंत तक पोस्ट मन को आंदोलित कर गया।छोटी भाभी का व्यक्तित्व अच्छा लगा। कहानी मन को झकझोर कर चली गयी।समापन भाग सराहनीय है।मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार है।
bahut hi umda post....kahaniyan to aapki hamesha acchhi hoti hain..aaj sunkar to aur bhi acchha laga...ek voice over artist hone ke naate mere liye ye ek bonas sa raha...ek baat kahna chahungi...aapka shabdon ka uccharan bahut hi behtarin hai...
waise umra me chhoti hun par fir bhi ek baat zarur kahna chahungi ki agar aap kahaniyan padhne me bhi thode zyada bhav laayen to sunne wala bhi use zyada enjoy karega...aapka bolne ka andaaj kafi acchha hai..lekin jitne behtarin dhang se aap kahaniyon me shabdon ka samavesh karti hain...un shabdon ko usi bhav ke saath agar bolen to shrotaon ke dilon dimag ko aapki kahani chu jayegi..jis tarah se pathkon ko chbuti hain...ek vo artist ke naate ye meri raay hai..agar buri lage to maafi chahti hun..
@नेहा
इसमें बुरा मानने की क्या बात है...ये तो ख़ुशी कि बात है कि तुमने इतने ध्यान से सुना...और मेहनत से कमेन्ट किए. बहुत ख़ुशी हुई जान कि तुम एक voice over artist हो तुम्हारी राय तो बहुत मायने रखती है. दरअसल रेडियो में समय सीमा की बहुत समस्या है..8 मिनट में ही सब समेटना होता है...8 पेज की कहानी को 4 पेज तक लाने में ही एडिट करती थक जाती हूँ.
पर आगे से जरूर ध्यान रखूंगी कि थोड़ा और एडिट करूँ....और भाव के साथ पढूं.
बहुत बहुत शुक्रिया
आनन्द आ गया.. पहले पारुल...और अब आप... आवाज़ जैसे गुड़ की डली ढली सी...
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