Sunday, November 15, 2009

खाली नहीं रहा कभी, यादों का ये मकान

चुनाव के दौरान हुए अनुभवों वाली पोस्ट के बाद ही यह पोस्ट लिखने वाली थी पर कुछ समसामयिक विषय सामने आ गए और लिखना टलता गया.मेरे पिताजी, अगर अपने कार्यकाल के दौरान हुए अपने अनुभवों को लिखें तो शायद एक ग्रन्थ तैयार हो जाए.किस्से तो मैंने भी कई सुने कि कैसे दंगों के दौरान पापा ने एक अलग सम्प्रदाय के लोगों को दो दिन तक घर में पनाह दी थी.वे लोग दो दिन तक पलंग के नीचे छुपे रहें.पलंग पर जमीन छूती चादर बिछी रहती.घर में आने जाने वाले लोगों को पता भी नहीं चलता कि कोई छुपा हुआ है.पापा घर में ताला बंद कर ऑफिस जाते.उनमे से एक को सिगरेट पीने कि आदत थी,उन्होंने रिस्क लेकर एक सिगरेट सुलगाई और बंद खिड़की की दरार से निकलती धुँए की लकीर देख, दंगाइयों ने पूरा घर घेर लिया था.शक तो उन्हें पहले से था ही.संयोग से पुलिस ने वक़्त पर आकर स्थिति संभाल ली.ऐसे ही एक बार दंगे में पापा की पूरी शर्ट खून से रंग लाल हो गयी थी.भीड़ में से किसी ने घर पर खबर कर दी और घर पर रोना,धोना मच गया.बाद में पापा की खैरियत देख सबको तसल्ली हुई.

हॉस्टल में रहने के कारण ,मैंने किस्से ही ज्यादा सुने पर एकाध बार मुझे भी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा.इस बार पापा की पोस्टिंग एक नक्सल बहुल क्षेत्र में थी.मेरे कॉलेज की छुट्टियाँ कुछ जल्दी हो गयी थीं,लिहाज़ा दोनों छोटे भाइयों के घर आने से पहले ही मैं घर आ गयी थी.फिर भी मैं बहुत खुश थी क्यूंकि इस बार,छुट्टियाँ बिताने,मेरे मामा की लड़की 'बबली' भी आई हुई थी. वी.सी.आर.पर कौन कौन सी फिल्मे देखनी हैं,किचेन में क्या क्या एक्सपेरिमेंट करने हैं...हमने सब प्लान कर लिया था.उसपर से हमारा मनोरंजन करने को एक नया नौकर ,जोगिन्दर भी था.जो फिल्मो और रामायण सीरियल का बहुत शौकीन था.जब भी हम बोर होते,कहते,"जोगिन्दर एक डायलॉग सुना." और वह पूरे रामलीला वाले स्टाईल में कहता--"और तब हनुमान ने रावण से कहा..."या फिर शोले के डायलॉग सुनाता.हम हंसते हंसते लोट पोट हो जाते पर वह अपने डायलॉग पूरा करके ही दम लेता.

दिन आशानुकूल बीत रहें थे,बस कभी कभी शाम को घर में कुछ बहस हो जाती.पास के शाहर के एक अधिकारी का मर्डर हो गया था.और पापा को उनका कार्यभार भी संभालने का निर्देश दिया गया था.घर वाले और सारे शुभेच्छु पापा को मना कर रहें थे पर पापा का कहना था, "ऐसे डर कर कैसे काम चलेगा.मुझे यहाँ के काम से फुरसत नहीं मिल रही वरना वहां का चार्ज तो लेना ही है."

एक दिन शाम को हमलोग 'चांदनी' फिल्म देख कर उठे.बबली किचेन में जोगिन्दर को 'स्पेशल चाय' बनाना सिखाने चली गयी.ममी भगवान को दीपक दिखा रही थीं.प्यून उस दिन की डाक दे गया था ,मैं वही देख रही थी (कभी हमारे भी ऐसे ठाठ थे). उन दिनों मेरी डाक ही ज्यादा आया करती थी.मैंने पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया था.'धर्मयुग','साप्ताहिक हिन्दुस्तान",'मनोरमा' 'रविवार' वगैरह में मेरी रचनाएं छपने लगी थी.लिहाजा ढेर सारे ख़त आते थे.मेरे ५ साल के लेखन काल में करीब ७५० ख़त मुझे मिले ,जबकि मैं नियमित नहीं लिखा करती थी.कभी कभी तो इन पत्रों से ही पता चलता कि मेरी कोई रचना छपी है.फिर पड़ोसियों के यहाँ ,पेपर वाले के यहाँ पत्रिका ढूंढनी शुरू होती.हालांकि ये इल्हाम मुझे था कि ये पत्र मेरे अच्छे लेखन की वजह से नहीं आ रहें.उन दिनों इंटरनेट की सुविधा तो थी नहीं.इसलिए लड़कियों से interact करने का सिर्फ एक तरीका था.किसी पत्रिका में तस्वीर और पता देख, ख़त लिख डालो.सारे पत्र शालीन हुआ करते थे,पर कुछ ख़त बड़े मजेदार होते थे.दो तीन ख़त तो सुदूर नाईजीरिया से भी आये थे..मैं किसी पत्र का जबाब नहीं देती थी पर हम सब मजे लेकर सारे ख़त पढ़ते थे.थोडा अपराधबोध भी रहता था क्यूंकि ममी पापा को लगता था मेरी पढाई पर असर पड़ेगा इसलिए वे मेरी लेखन को ज्यादा बढावा नहीं देते थे.

उन पत्रों में से एक पत्र था तो पापा के नाम पर मुझे लिखावट मेरे दादाजी की लगी,लिहाज़ा मैंने पत्र खोल लिया.पढ़कर तो मेरी चीख निकल गयी.ममी, बबली,जोगिन्दर सब भागते हुए आ गए.उस पूरे पत्र में पापा को अलग अलग तरह से धमकी दी गयी थी कि अगर उन्होंने 'अमुक' जगह का चार्ज लिया तो सर कलम कर दिया जायेगा..एक मर्डर वहां हो भी चुका था.हमारे तो प्राण कंठ में आ गए.पापा मीटिंग के लिए पटना गए हुए थे.जल्दी से जोगिन्दर को भेज 'प्यून' को बुलवाया गया.शायद वह कुछ बता सके.वो प्यून यूँ तो इतना तेज़ दिमाग था कि हमारे साथ यू.एस.ओपन देख देख कर लॉन टेनिस के सारे नियम जान गया था. बिलकुल सही जगह पर 'ओह' और 'वाह' कहता.पर अभी उस मूढ़मति ने बिना स्थिति की गंभीरता समझे कह डाला,"साहब तो कह रहें थे कि मीटिंग जल्दी ख़तम हो गयी तो वहां का चार्ज ले कर ही लौटेंगे." हम सबकी तो जैसे सांस रुक गयी. पर पापा का इंतज़ार करने के सिवा कोई और चारा नहीं था.सो चिंता से भरे हम सब सड़क पर टकटकी लगाए,बरामदे में ही बैठ गए.तभी जैसे सीन को कम्लीट करते हुए बारिश शुरू हो गयी.बारिश हमेशा से मुझे बहुत पसंद है पर आज तो लगा जैसे पट पट पड़ती बारिश कि बूँदें हमारी हालत देख ताली बजा रही हैं.बिजली की चमक भी मुहँ चिढाती हुई सी प्रतीत हुई. बारिश शुरू होते ही बिजली विभाग द्वारा बिजली काट दी जाती थी ताकि कहीं कोई तार टूटने से कोई दुर्घटना ना हो जाए.बिलकुल किसी हॉरर फिल्म से लिया गया दृश्य लग रहा था.....कमरे में हवा के थपेडों से लड़ता धीमा धीमा जलता लैंप,अँधेरे में बैठे डरे सहमे लोग और बाहर होती घनघोर बारिश.तभी दूर से एक तेज़ रौशनी दिखाई दी.पास आने पर देखा कोई ५ सेल की टॉर्च लिए सायकल पे सवार हमारे घर की तरफ ही आ रहा है.हमारी जान सूख गयी.पर जब वह हमारा गेट पारकर चला गया तो हमारी रुकी सांस लौटी.

दूर से पापा की जीप की हेडलाईट दिखी और हमने राहत की सांस ली.ममी ने कहा,"तुंरत कुछ मत कहना, हाथ पैर धोकर. खाना खा लें,तब बताएँगे" पर पापा ने जीप से उतरते ही ड्राइवर को हिदायत दी,"कल सुबह जरा जल्दी आना.पहले मैं वहां का चार्ज लेकर आऊंगा तभी अपने ऑफिस का काम शुरू करूँगा."ममी जैसे चिल्ला ही पड़ीं,"नहीं, वहां बिलकुल नहीं जाना है" फिर पापा को पत्र दिया गया.सबसे पहले हम लड़कियों पर नज़र पड़ी.इन्हें यहाँ से हटाना होगा.पटना में मेरे छोटे मामा का घर खाली पड़ा था.मामा छः महीने के लिए बाहर गए हुए थे और मामी अपने मायके में थीं.हमें आदेश मिला,"अपना अपना सामान संभाल लो,सुबह ड्राइवर मामा के घर छोड़ आएगा"
खाना वाना खाते, बातचीत करते रात के बारह बज गए,तब जाकर मैंने और बबली ने अपनी चीज़ें इकट्ठी करनी शुरू कीं.बिस्तर पर दोनों अटैचियाँ खोले हम अपना अपना सामान जमा रहें थे कि हमारी नज़र नेलपौलिश पर पड़ी.हमने तय किया नेलपौलिश लगाते हैं.रात के दो बज रहें थे तब.ममी हमारी खुसपुस सुन कमरे में हमें देखने आयीं.(ये ममी लोगों की एंट्री हमेशा गलत वक़्त पर ही क्यूँ होती है??) हमें नेलपौलिश लगाते देख जम कर डांट पड़ी.और हम बेचारे अपनी अपनी दसों उंगलियाँ फैलाए डांट सुनते रहें.क्यूंकि झट से किसी काम में उलझने का बहाना भी नहीं कर सकते थे.नेलपौलिश खराब हो जाती.

सुबह सुबह मैं और बबली,पटना के लिए रवाना हो गए.पता नहीं,स्थिति की गंभीरता हम पर तारी थी या अकेले सफ़र करने का हमारा ये पहला अनुभव था.ढाई घंटे के सफ़र में हम दोनों, ना तो एक शब्द बोले,ना ही हँसे.जबकि आज भी हम फ़ोन पर बात करते हैं तो दोनों के घरवालों को पूछने की जरूरत नहीं होती कि दूसरी तरफ कौन है?,ना तो हमारी हंसी ख़तम होती है,ना बातें.
ड्राईवर हमें घर के बाहर छोड़ कर ही चला गया,दोपहर तक ममी को भी आना था.पड़ोस से चाभी लेकर जब हमने घर खोला,तो हमारे आंसू आ गए.घर इतना गन्दा था कि हम अपनी अटैची भी कहाँ रखें,समझ नहीं पा रहें थे.मामी के मायके जाने के बाद कुछ दिनों तक मामा अकेले थे और लगता था अपनी चंद दिनों की आज़ादी को उन्होंने भरपूर जिया था.सारी चीज़ें बिखरी पड़ी थीं.बिस्तर पर आधी खुली मसहरी,टेबल पर पड़े सिगरेट के टुकड़े,किचेन प्लेटफार्म पर टूटे हुए अंडे,जाने कब से अपने उठाये जाने की बाट जोह रहें थे.'जीवाश्म' क्या होता है,पहली बार प्रैक्टिकली जाना.डब्बे में एक रोटी पड़ी थी.जैसे ही फेंकने को उठाया,पाया वह राख हो चुकी थी.

मैंने और बबली ने एक दूसरे को देखा और आँखों आँखों में ही समझ गए,सारी सफाई हमें ही करनी पड़ेगी.कपड़े बदल हम सफाई में जुट गए.बस बीच बीच में एक 'लाफ्टर ब्रेक' ले लेते.कभी बबली मुझे धूल धूसरित,सर पर कपडा बांधे, लम्बा सा झाडू लिए जाले साफ़ करते देख,हंसी से लोट पोट हो जाती तो कभी मैं उसे पसीने से लथपथ,टोकरी में ढेर सारा बर्तन जमा कर , मांजते देख हंस पड़ती.कभी हम,डांट सुनते हुए लगाई गयी अपनी लैक्मे की नेलपौलिश की दुर्गति देख समझ नहीं पाते,हँसे या रोएँ.
दो तीन घंटे में हमने घर को शीशे सा चमका दिया और नहा धोकर ममी की राह देखने लगे.अब हमें जबरदस्त भूख लग आई थी.किचेन में डब्बे टटोलने शुरू किये तो एक फ्रूट जूस का टिन मिला. टिनक़टर तो था नहीं,किसी तरह कील और हथौडी के सहारे उसे खोलने की कोशिश में लगे.मेरा हाथ भी कट गया पर डब्बा खोलने में कामयाबी मिल गयी.बबली ताजे धुले कांच के ग्लास ले आई.हमने इश्टाईल से चीयर्स कहा और एक एक घूँट लिया.फिर एक दूसरे की तरफ देखा और वॉश बेसिन की तरफ भागे.जूस खराब हो चुका था.वापस किचेन में एक एक डब्बे खोल कर देखने शुरू किये.एक डब्बे में मिल्क पाउडर मिला.डरते डरते एक चुटकी जुबान पर रखा,पर नहीं मिल्क पाउडर खराब नहीं हुआ था.फिर तो हम चम्मच भर भर कर मिल्क पाउडर खाते रहें,और बातों का खजाना तो हमारे पास था ही.सो वक़्त कटता रहा..
वहां का काम समेटते ममी को आने में शाम हो गयी.हमने उन्हें घर के अन्दर नहीं आने दिया.फरमाईश की,पहले हमारे लिए,समोसे,रसगुल्ले,कचौरियां लेकर आओ,फिर एंट्री मिलेगी.

56 comments:

महफूज़ अली said...

bahut achcha laga yeh sansmaran......... ghar saaf karne ka incident to bahut hi mazedaar raha...

thatsfine said...

इन समोसों का स्वाद कितना लजीज होगा, सोच कर ही लार टपक रही है.

'अदा' said...

अरे वाह रश्मि जी,
अच्छा ये बताइए ये सारी यादें लगभग इक सी क्यूँ होती हैं......
यहाँ तक की लक्मे की नेलपालिश भी....
बस मज़ा आ गया जी पढ़ कर और हम भी पहुँच गए बीते दिनों में जहाँ ऐसा ही कुछ हुआ करता था ...

Mahfooz Ali said...

arey! adaaji..... saari ladkiyan ek jaisi hi hotin hain.... lakme hi lagatin hain....

शबनम खान said...

mehfooz ji ne link dekar aapke blog par pohchaya..varna me top itna accha sansmaran miss hi kar deti...bohot mazedar likha ha aapne..soch rahi hu kitna enjoye kia hoga us MILK POWDER ko..bhukh me to kuch b accha lagta ha n...aage bhi aapko padte rahungi...

शबनम खान said...

nahi nahi sari ladkia lakme nahi lagati...are aur bhi bohot brandz ha mehfooz ji....

राज भाटिय़ा said...

अरे वाह क्या लिखती है आप हम भी एक सांस मै पढ गये, बहुत सुंदर लिखा आप ने यांदो को... ओर फ़िर समोसे,,समोसे,रसगुल्ले,कचौरियां मिली या नही
धन्यवाद

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बहुत रोचक संस्मरण। शुक्रिया।

dr. ashok priyaranjan said...

अच्छा लिखा है आपने । सहज विचार, संवेदनशीलता और रचना शिल्प की कलात्मकता प्रभावित करती है ।

मैने भी अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-घरेलू हिंसा से लहूलुहान महिलाओं का तन और मन-समय हो तो पढ़ें और कमेंट भी दें ।
http://www.ashokvichar.blogspot.com

कविताओं पर भी आपकी राय अपेक्षित है। कविता का ब्लाग है-
http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

Udan Tashtari said...

पहले हमारे लिए,समोसे,रसगुल्ले,कचौरियां लेकर आओ,फिर एंट्री मिलेगी. ....हम भी आता हूँ आपकी तरफ से....हा हा!!


बढ़िया संस्मरण!!

प्रवीण शाह said...

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बेहतरीन संस्मरण,
ऐसा लगता है कि आप के साथ हम भी जी रहे हैं, उन यादों को...

mamta said...

Excellent post!Everyday reminiscence was never so alluring- that is -till you started writing.keep it up!

महफूज़ अली said...

aapki yeh post mujhe itni achchi lagi ki baar baar padhne ka man kar raha hai........

महफूज़ अली said...

abhi phir aata hoon.....

rashmi ravija said...

अरे!!मुझे तो अंदाजा ही नहीं था,ये पोस्ट इतनी पसंद की जायेगी. ..मैंने सोचा कुछ रोचक लिखूं वरना सब मुझे खड़ूस समझेंगे...serious stuff ही ज्यादा जो लिखती हूँ......अदा,शबनम,प्रवीण,ममता,अशोक,सिद्धार्थ,महफूज़ (सॉरी मैंने जी नहीं लगाया :))..सबका बहुत बहुत शुक्रिया
राज जी, हमें...समोसे, रसगुल्ले के साथ चौकलेट भी मिली(बिना फरमाईश के)..इतनी मेहनत जो की थी...समीर जी आप जरूर आएं...अब तो ये सारी चीज़ें मैं बनाना भी सीख गयी हूँ,हाथ का बना मिलेगा:)
महफूज़..लगता है आपकी शादी नहीं हुई और क्या कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं??..आजकल लक्मे का कहाँ एल 18 का जमाना है, जनाब.वैसे दोबारा शुक्रिया आपका...इतनी लम्बी पोस्ट फिर से पढने के लिए.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही पसंद आया यह संस्मरण वाकई यादे कई एक सी होती है ..आपके लिखे ने अंत तक बांधे रखा शुक्रिया

mark rai said...

samoshe ka swaad ..............laajwaab raha.........

नीरज गोस्वामी said...

बहुत दिलचस्प पोस्ट ...मानना पड़ेगा आपकी लेखन शैली कमाल की है...क्या प्रवाह है...वाह...आगे जानन की उत्सुकता बढ़ गयी है...
नीरज

रश्मि प्रभा... said...

सबकुछ मनपसंद,लजीज .......जल्दी बताएं आगे क्या हुआ ........जल्दी

गौतम राजरिशी said...

लीजिये हमारे मुँह में तो पानी आ गया यहां उन समोसों का जिक्र पढ़कर...

बहुत ही अच्चा संस्मरण और उम्दा लेखन-शैली!

Nirmla Kapila said...

रश्मि संस्मरण तो रोचक होते ही हैं मगर जैसे तुमने इसे शब्दों मे गूँथा है ये बहुत ही रोचक हो गये हैं । सच मे क्या लिखती हो मैं तो हैरान होती हूँ कि तुम इस उम्र मे ही इतना बडिया लिखती हो तो आगे जा कर तो धूम मचा ही दोगी बहुत सुन्दर शैली है । तुम्हें पढना सुखद लगता है इस लिये आराम से ही तुम्हारी पोस्ट पढती हूँ । साथ ही अगली पोस्ट का इन्तज़ार भी करने लगती हूँ। बहुत बहुत आशीर्वाद्

दिगम्बर नासवा said...

दिलचस्प पोस्ट ... अच्छा लिखा है...... बहुत ही रोचक संस्मरण ......

raj said...

hmesha ki tarah interesting post..aisee hi ik post aapne pahle bhi likhi thi ek.....milti si...दरीचे से झांकती....कुछ मीठी ,कुछ कसैली, यादें,....

Ashish Shrivastava said...

aage kya huwa ?

rashmi ravija said...

@नीरज जी एवं रश्मि जी...मुझे लगा सबने अंदाज़ा लगा लिया होगा....कोई अप्रिय घटना नहीं हुई...पापा ने वहां का चार्ज नहीं लिया और एक साल के बाद ही उनका ट्रांसफ़र कहीं और हो गया....छुट्टियाँ भी हमारी अच्छी गुजरीं....रोज रात को मैं और बबली सब जगह की लाईट ऑफ कर देते थे और आँगन में छोटी सी टेबल लगा उसी पर खाना खाते थे.चारों तरफ चांदनी छिटकी होती थी..और उस पे एक छोटे से टेप रेकॉर्डर पे जगजीत की ग़ज़लें सुना करते थे....'हम तो हैं परदेस में....'और "कल चौदवीं की रात थी....",ना जाने कितनी बार रीवायींड कर कर के सुना होगा...मुंबई में तो चांदनी रात और तारों खचित आकाश देखने को तरस गयी हूँ...अब तो बस मन यही कहता है..."कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.."

Einstein said...

मै तो इतने अच्छे संस्मरण पढ़ कर सोच रहा हूँ की आप ढाई घंटे में पटना पहुँच गयी थी तो
उस समय आप थी कहाँ .......जहाँ भी होंगी बिहार में ही होंगी...लगा की बैठ कर बात- चित किये हैं...धन्यवाद ...

सैयद | Syed said...

दिलचस्प संस्मरण !!

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही जबर्दस्त लेखन । एक सांस में पूरी पोस्ट पढ़ गया……
पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा ।

शरद कोकास said...

सच कहूँ .. एक साँस में पढ़ गया बिलकुल रोचक कहानी की तरह लगा यह संस्मरण । लेकिन धर्मयुग में किस विधा मे लिखती थी आप ? और किस सन में ?

महफूज़ अली said...

Neend nahi aa rahi thi..... isliye phir aa gaya.... aapne itna achcha likha hai ki baar baar padhne ka man karta hai.....

abhi to teen baj rahe hain.... subah ke.... phir aata hoon....

hehehehehehehehe........

कुश said...

तो मतलब लाईफ पुरी एडवेंचरस रही है आपकी..

Harsh said...

sansmaran pasand aaya ...

रंजना said...

बहुत ही रोचक और मजेदार संस्मरण !!!!

आनंद आ गया पढ़कर....और सच कहूँ तो मन समोसे की ओर भाग निकला....अब इतना मजेदार संस्मरण पढ़ समोसा खाने को जी मचलना...स्वाभाविक ही है न....

Ek utsukta kilolen maar rahi hai...yah ghatna sthal lagta hai kahin aas paas hi hai....aap kahan ki hain...batayengi ?

babli said...

आज तो तुमने वो पुरानी यादें ताज़ा कर दीं और मैं वापस उन्ही दिनों में लौट गयी.और सारे काम छोड़कर उन दिनों के किस्से बच्चों को एक एक कर सुनाने लगी.कितने ही ऐसे लम्हे हमलोगों ने साथ बिताएं हैं.वो आँगन में चांदनी रात में ग़ज़लें सुनते हुए खाना खाना...एक सपना सा लगता है अब. और वो तुम भूल गयी,जब पड़ोस वाली भाभी ने कहा था कि देर रात तक उन्हें हमारी बातें सुनायी देती हैं और हमने पलट कर कहा आपको क्या लगता है,सिर्फ आप ही हमारी बातें सुनती हैं हम भी आपकी बाते सुनते हैं और दुसरे दिन से उनके कमरे में रेडियो बजने लगा था.हमारे झूठ को उन्होंने सच समझ लिया था और हम कितना हँसे थे.बहुत अच्छा लगा ये सब पढ़कर.

Ashish said...

Wah Mazedar, lajij sansmaran, ek dam samose ki tarah,bhasha aur shaili ke bare me mujhe pata to nahi hai lekin ek bar padhna suru kiya to fir samapt karke hi dum liya maine. Kai sare cosmetics brand ke nam pata chale.(jo shayad mai bhool gaya hoo).waise sochta hoo ki ekdin mujhe bhi samose khane ka nimantarn milega.

लोकेन्द्र said...

बाप रे बाप.....

shikha varshney said...

wah bhaut rochak atrike se likha hai aapne sansmaran..har pahlu dilchaspp hai...
bahut maja aaya

अर्शिया said...

आपके संस्मरण रोचक ही नहीं प्रेरक भी हैं।
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11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?

Dipak 'Mashal' said...

वाह!!! रश्मि जी, विशुद्ध हिंदी साहित्यिक संस्मरण लिखा है... कहीं भी ढीलापन नहीं.. बाँध के पानी की तरह एकलय और फिसलता हुआ सा.. एक बार शुरू किया तो फिसल कर सीधा अंत तक पहुँच कर ही रुके... सीखना होगा आपसे बहुत कुछ...
जय हिंद...

vaishali said...

wowwww mohotarmaa jeee indeed intrestng kahani n well written 2, evry detail was so nicely said n writtn , keep going......... n thnxxx its cozz of u hve strted reading hehe

sada said...

शुरू से लेकर अंत तक पूरी तन्‍मयता के साथ आपका यह संस्‍मरण पढ़ा, आपने कहीं पर रूकने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी, बहुत-बहुत बधाई के साथ आभार ।

संजय भास्कर said...

बहुत ही पसंद आया यह संस्मरण वाकई यादे कई एक सी होती है ..

योगेन्द्र मौदगिल said...

संस्मरण वही जो सबको आत्मसात कर ले... वाह समोसे मुझे भी याद आ रहे है... जब तक मिलेंगें तब तक अगली पोस्ट आ ही जायेगी.. शुक्रिया..

महफूज़ अली said...

Main phir aa gaya ......... bahut achcha lagta hai isey padhna.......

महफूज़ अली said...

1. wah bhaut rochak atrike se likha hai aapne sansmaran..har pahlu dilchaspp hai...
bahut maja aaya...

महफूज़ अली said...

2. लीजिये हमारे मुँह में तो पानी आ गया यहां उन समोसों का जिक्र पढ़कर...

बहुत ही अच्चा संस्मरण और उम्दा लेखन-शैली!

महफूज़ अली said...

3. बहुत ही रोचक और मजेदार संस्मरण !!!!

आनंद आ गया पढ़कर....और सच कहूँ तो मन समोसे की ओर भाग निकला....अब इतना मजेदार संस्मरण पढ़ समोसा खाने को जी मचलना...स्वाभाविक ही है न....

महफूज़ अली said...

4. .
.
.
बेहतरीन संस्मरण,
ऐसा लगता है कि आप के साथ हम भी जी रहे हैं, उन यादों को...

महफूज़ अली said...

5. दिलचस्प संस्मरण !!

महफूज़ अली said...

6. बहुत ही पसंद आया यह संस्मरण वाकई यादे कई एक सी होती है ..आपके लिखे ने अंत तक बांधे रखा शुक्रिया

महफूज़ अली said...

7. बहुत ही जबर्दस्त लेखन । एक सांस में पूरी पोस्ट पढ़ गया……
पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा ।

rashmi ravija said...

Goddd!!...am embarrassed now...Mahfooz ji, u mst hv wanted the comments on my post to cross 50 marks :)...U r so kind hearted :)...God bless U..bt dnt worry it will cross on its own some day....if ppl wud like my writing n feel like giving comments..definitely they will...anyway thanx allot for taking sooooo much effort..U mst b in good mood today (aur mere post ka bhala ho gaya)
@Raj a special thanx to u..U hv been reading my posts and giving nice comments right frm my first post...its very encouraging...U r a sweet girl ( i jst love ur poems)....Thanx a ton dear..God Bless U
Thanx to all who liked this post n took pain to write comments too...and thanx to them too who read the posts but shied away from giving comments :)( reason mst b known to themselves)

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

i came to this one just like that and honestly could nt go watchin other things for a single moment...
this is awesome...

cheers!
surender
http://shayarichawla.blogspot.com/

संजय भास्कर said...

भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
सुंदर रचना....

SANJAY KUMAR
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

lajwaab rachna

Mithilesh dubey said...

बहुत रोचक संस्मरण