Saturday, November 21, 2009

जब आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता था !!

पिछली पोस्ट में की पत्रिकाओं,आलेखों और पत्रों के जिक्र ने जैसे मुझे यादों की वादियों में धकेल दिया और अभी तक मैं उनमे ही भटक रही हूँ.कई लोगों ने मेरे छपे आलेखों के बारे में भी पूछा,सोचा आपलोगों को भी उन वादियों की थोड़ी सैर करा दूँ.

दसवीं उत्तीर्ण कर कॉलेज में कदम रखा ही था.स्कूल हॉस्टल के जेलनुमा माहौल के बाद,कॉलेज में आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता,धूप सहलाती हुई सी और हवा गुनगुनाती हुई सी लगती. मौलिश्री के पेड़ के नीचे बैठ गप्पें मारना,किताबें पढना,कमेंट्री सुनना हम सहेलियों का प्रिय शगल था.उसी दौरान एक पत्रिका 'क्रिकेट सम्राट' के सम्पादकीय पर नज़र पड़ी.पूरे सम्पादकीय में अलग अलग तरह से सिर्फ यही लिखा था कि 'लड़कियों को खेल के बारे में कुछ नहीं मालूम, उन्हें सिर्फ खिलाड़ियों से मतलब होता है'.मुझे बहुत गुस्सा आया क्यूंकि मुझे खेल में बहुत रूचि थी.क्रिकेट,हॉकी,टेनिस कभी खेलने का मौका तो नहीं मिलता पर इन खेलों के बारे में छपी ख़बरों पर मेरी पूरी नज़र रहती.मुझे सब चलती फिरती 'रेकॉर्ड बुक' ही कहा करते थे.यूँ छोटे भाइयों को क्रिकेट खेलते देख,मन तो मेरा भी होता खेलने को.पर मैं बड़ी थी. छोटी बहन होती तो शायद जिद भी कर लेती,"भैया मुझे भी खिलाओ" पर मैं बड़ी बहन की गरिमा ओढ़े कुछ नहीं कहती.एक बार मेरे भाई की शाम में कोई मैच थी और उसे बॉलिंग की प्रैक्टिस करनी थी.उसने मुझसे बैटिंग करने का अनुरोध किया.मैंने अहसान जताते हुए,बल्ला थामा .भाई ने बॉल फेंकी,मैंने बल्ला घुमाया और बॉल बगल वाले घर को पार करती हुई जाने कहाँ गुम हो गयी.भाई बहुत नाराज़ हुआ,मुझे भी बुरा लगा,ये लोग कंट्रीब्यूट करके बॉल खरीदते थे. ममी पैसे देने को तैयार थीं पर भाई ने जिद की कि बॉल मैंने गुम की है,मुझे अपनी गुल्लक से पैसे निकाल कर देने पड़ेंगे.शायद बॉल गुम हो जाने से ज्यादा खुन्नस उसे अपनी बॉल पर सिक्सर लग जाने का था. वो मेरी ज़िन्दगी का पहला और आखिरी शॉट था.

अखबार भी मैं हमेशा पीछे से पढना शुरू करती थी.क्यूंकि अंतिम पेज पर ही खेल की ख़बरें छपती थीं.इस चक्कर में एक बार अपने चाचा जी से डांट भी पड़ गयी.उन्होंने किसी खबर के बारे में पूछा और मेरे ये कहने पर कि अभी नहीं पढ़ा है. डांटने लगे,"लास्ट पेज पढ़ रही हो और अभी तक पढ़ा ही नहीं है." इस पर जब मैंने 'क्रिकेट सम्राट' में लड़कियों पर ये आरोप देखा तो मेरा खून जलना स्वाभाविक ही था.मैंने एक कड़ा विरोध पत्र लिखा और उसमे संपादक की भी खूब खिल्ली उडाई क्यूंकि हमेशा अंतिम पेज पर किसी खिलाडी के साथ, उनकी खुद की तस्वीर छपती थी.सहेलियों ने जब कहा ,'वो नहीं छापेगा' तो मैंने दो और पत्र,एक नम्र स्वर में और एक मजाकिया लहजे में लिखा और 'रेशु' और अपने निक नेम 'रीना' के नाम से भेज दिया.सारी 'डे स्कॉलर' सहेलियों को नए अंक चेक करते रहने के लिए कह रखा था.हमारी केमिस्ट्री की क्लास चल रही थी और शर्मीला कुछ देर से आई. उसने 'में आई कम इन' जरा जोर से कहा तो हम सब दरवाजे की तरफ देखने लगे.शर्मीला ने मुझे 'क्रिकेट सम्राट' का नया अंक दिखाया और इशारे से बताया 'छप गयी है'.अब मैं कैसे देखूं?..मैं सबसे आगे बैठी थी और शर्मीला सबसे पीछे और 45 मिनट का पीरियड अभी बाकी था.नीचे नीचे ही पास होती पत्रिका मुझ तक पहुंची.देखा,एक अलग पेज पर मेरे तीनो पत्र छपे हैं,और एक कोने में संपादक की क्षमा याचना भी छपी है.फिर तो नीचे नीचे ही पूरा क्लास वो पेज पढता रहा और मैडम chemical equations सिखाती रहीं.

छुट्टियों में घर जा रही थी.ट्रेन में सामने बैठे एक लड़के को 'क्रिकेट सम्राट' पढ़ते हुए देखा. जैसे ही उसने पढ़ कर रखी,मैंने अपने हाथ की मैगज़ीन उसे थमा,उसकी पत्रिका ले ली.(आज भी मुझे किताबें या पत्रिका मांगने में कोई संकोच नहीं होता.फ्रेंड्स के घर में कोई किताब देख निस्संकोच कह देती हूँ,पढ़ कर मुझे देना,इतना ही नहीं,रौब भी जमाती हूँ,इतना स्लो क्यूँ पढ़ती हो, जल्दी खत्म करो).मिडल पेज पर देखा संपादक ने बाकायदा एक परिचर्चा आयोजित कर रखी थी."क्या लड़कियों का क्रिकेट से कोई वास्ता है" पक्ष और विपक्ष के कई लोगों ने मेरे लिखे पत्र का उल्लेख किया था.अब मैं किसे बताऊँ?पापा,बगल में बैठे एक अंकल से बात करने में मशगूल थे, बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा.यूँ भी पापा ने ज्यादा ख़ुशी नहीं दिखाई थी. गंभीर स्वर में बस इतना कहा था 'ये सब ठीक है,पर अपनी पढाई पर ध्यान दो"उन्हें डर था कहीं मैं साइंस छोड़कर हिंदी ना पढने लगूँ.मैंने चुपचाप उसे पत्रिका वापस कर दी,ये भी नहीं बताया की इसमें जिस ;रश्मि' की चर्चा है,वो मैं ही हूँ.जान पहचान वाले लड़कों से ही हमलोग ज्यादा बांते नहीं करते थे,अनजान लड़के से तो नामुमकिन था.ये बात, मुंबई की मेरी सहेलियां बिलकुल नहीं समझ पातीं.

वह पत्रिका फिर मुझे नहीं मिली पर इससे मेरे आत्मविश्वास को बड़ा बल मिला.मेरा लिखा, छपता ही नहीं लोग पढ़ते भी हैं और याद भी रखते हैं.फिर तो मैं काफी लिखने लगी.खासकर 'धर्मयुग','साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के युवा जगत में मेरी रचनाएं अक्सर छपती थीं.जब पहली बार 100 रुपये का चेक आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ.छप जाना ही एक रिवार्ड सा लगता,इसके पैसे भी मिलेंगे, ये तो सोचा ही नहीं था.पर मुझे ख़ास ख़ुशी नहीं होती.चेक तो बैंक में जमा हो जाते.कैश होता तो कोई बात भी थी.
लोगों के पत्र आने भी शुरू हो गए.एक बार जयपुर से एक पोस्टकार्ड मिला.लिखा था,"मैं 45 वर्षीय पुरुष हूँ,मेरे दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं,आपका साप्ताहिक हिदुस्तान में छपा लेख पढ़ा,अच्छा लगा,वगैरह वगैरह.हमलोग सिर्फ 'धर्मयुग', 'सारिका' और 'इंडिया टूडे' लेते थे.अबतक तो वह अंक bookstall पर भी नहीं मिलता.मैंने छत पर से, एक बार दो घर छोड़कर एक लड़के को 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' पढ़ते देखा था.(कॉलेज में मेरी सहेलियां कहा करती थीं,'रश्मि को किताबों की खुशबू आती है...किसी ने कितनी भी छुपा कर कोई किताब रखी हो,मेरी नज़र पड़ ही जाती.)वे लोग नए आये थे,हमारी जान पहचान भी नहीं थी.मैंने नौकर को कई बार रिहर्सल कराया कि कैसे क्या कहना है.और उनके यहाँ भेजा .आज तक नहीं पता उसने क्या कहा,पर उस लड़के ने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 3 , 4 अंक भेज दिए.कई दिन तक सब मुझे चिढाते रहें,'और तुम्हारा 45 वर्षीय मित्र कैसा है?"

पूरे भारत से ही पत्र आते थे पर अल्मोड़ा, इंदौर और नागपुर के पत्र कुछ ख़ास लगते क्यूंकि मेरी प्रिय लेखिका,शिवानी,मालती जोशी और सूर्यबाला के शहर से होते. .जबाब तो मैं खैर उन पत्रों का भी नहीं देती.सुदूर नाइजीरिया से जब किसी ने लिखा था,'पापी पेट के वास्ते यहाँ पड़ा हूँ'तो उसपर बड़ी दया आई थी. इनमे से कुछ पत्र जेनुइन भी होते.एक बार 'धर्मयुग' में मेरा एक संस्मरण छपा था.मैंने लिखा था,'घर में बहुत मेहमान होने की वजह से मैं एक छोटे से कमरे में सो रही थी जो पुरानी किताबों,अखबारों से भरा हुआ था.एक टेबल फैन लगाया था.आधी रात को अचानक नींद
खुली तो देखा टेबल फैन के पीछे से छोटी छोटी आग की लपटें उठ रही थीं.भगवान ने वक़्त पर नींद खोल दी वरना कमरे में आग लग जाती " इस पर चंडीगढ़ से एक लड़के ने अपने पत्र में बाकायदा उस कमरे का स्केच बनाया था और लिखा था कि कमरा छोटा होने की वजह से प्रॉपर वेंटिलेशन नहीं होगा.और आग की लपटों के साथ धुआं भी निकला होगा.जिससे आपका गला चोक हो गया होगा और नींद खुल गयी.इसमें भगवान का कोई चमत्कार नहीं है.'धर्मयुग' वालों ने भी यह नहीं सोचा था.पर इन फैनमेल्स ने मेर अहित भी कम नहीं किया. पता नहीं मेरी कहानियाँ छपती या नहीं.पर मैंने डर के मारे कभी भेजी ही नहीं.सोचा,इतने रूखे-सूखे सब्जेक्ट पर लिखती हूँ तब तो इतने पत्र आते हैं.पता नहीं कहानी छपने पर लोग क्या सोचें और क्या लिख डालें.

हमलोग गिरिडीह में थे,वहां जन्माष्टमी में हर घर में बड़ी सुन्दर झांकी सजाई जाती.मेरे पड़ोस में छोटे छोटे बच्चों ने एक शहर का दृश्य बनाया था.सड़कों का जाल सा बिछाया था.पर हर सडक पर छोटे छोटे खिलौनों की सहायता से कहीं जीप और ट्रक का एक्सीडेंट,कहीं पलटी हुई बस तो कहीं गोला बारी का दृश्य भी दर्शाया था.यह सब देख मैंने एक लेख लिखा,'बच्चों में बढती हिंसा प्रवृति' और मनोरमा में भेज दिया.काफी दिनों बाद एक आंटी घर आई थीं,जन्माष्टमी की चर्चा चलने पर मैं उन्हें ये सब बताने लगी.उन्होंने कहा, 'अरे ऐसा ही एक लेख मैंने मनोरमा में पढ़ा है'और मैं ख़ुशी से चीख पड़ी, 'अरे वो छप भी गया'.आस पास सब मुझे 'रीना' नाम से जानते थे.'रश्मि' नाम किसी को पता ही नही था.

दहेज़ मेरा प्रिय विषय था.और कहीं भी मौका मिले मैं उसपर जरूर लिखती थी.एक बार शायद 'रविवार' में एक लेख लिखा था.'लडकियां आखिर किस चीज़ में कम हैं कि उसकी कीमत चुकाएं'. लेख का स्वर भी बहुत रोष भरा था.पापा व्यस्त रहते थे,उन्हें पत्रिका पढने की फुर्सत कम ही मिलती थी.हाँ अखबार का वे एक एक अक्षर पढ़ जाते थे (आज भी).एक बार वे बीमार थे और समय काटने के लिए सारी पत्रिकाएं पढ़ रहें थे.उनकी नज़र इस लेख पर पड़ी और उन्होंने ममी को आवाज़ दी, 'देखो तो जरा, आजकल लड़कियां क्या क्या लिखती हैं' ममी ने बताया ,'ये तो रीना ने लिखा है' मैं जल्दी से छत पर भाग गयी,कहीं बुला कर जबाब तलब ना शुरू कर दें.पर पापा ने कोई जिक्र नहीं किया.एक बार उन्होंने मेरा लेखन acknowledge किया था जब किसी स्थानीय पत्रकार ने उन्हें धमकी दी थी कि लोकल अखबार में उनके खिलाफ लिखेगा. उन्होंने जबाब में कहा था ,'मुझे क्या धमकी दोगे,मेरी बेटी नेशनल मैगजींस में लिखती है' ये बात भी पापा ने नहीं ,प्यून ने बतायी थी.

फिर धीरे धीरे एक एक कर धर्मयुग,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,सारिका सब बंद होने लगे.मैं भी घर गृहस्थी में उलझ गयी.मुंबई में यूँ भी हिंदी अखबार ,पत्रिकाएं बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. हिंदी से रिश्ता ख़तम सा हो गया था.अब ब्लॉग जगत की वजह से वर्षों बाद हिंदी पढने ,लिखने का अवसर मिल रहा है.AND I AM LOVING IT

38 comments:

Mahfooz Ali said...
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महफूज़ अली said...

bachpan ki yaadon se .....sanjo kar .... yuvavastha... ki mastiyon ko goondh kar... sthaayitva ...ke milestone .... par aa kar yeh sansmaran bahut achcha laga.....

Raju (world's king) said...

sahi kaha ji aapne
"LADIES FIRST"

Apanatva said...

pahalee var hee is blog par aana hua .accha laga .

शरद कोकास said...

धर्मयुग,साप्ताहिक हिन्दुस्तान और सारिका इन पत्रिकाओं ने हम जिसे बहुत से लोगो को लेखक बनाया है । पापा ये पत्रिकायें कॉलेज से लेकर आते थे और हम लोग इन्हे चाव से पढ़ते थे बाद मे अपने जेबखर्च से सारिका खरीदना शुरू किया । अभी भी सारिका के बहुत से अंक मेरे पास रखे हैं । आपका यह वृतांत पढकर अच्छा लगा । अब यह पत्रिकायें नहीं हैं लेकिन इनसे बेहतर पत्रिकायें आ गई हैं कथादेश, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, वसुधा , वर्तमान साहित्य, कथन, पूर्वग्रह, सापेक्ष,और भी बहुत सी पत्रिकायें ।आपका हिन्दी से रिश्ता और प्रगाढ हो हमारी यही कामना है

shikha varshney said...

Bahut se utaar chadav ko rochak tarike se likha hai aapne....bahut si yaadon ko taza kia aapne..badhai.

राज भाटिय़ा said...

भई आप लिखती तो वाक्या मै बहुत ही अ़च्छा है वरना इतना लम्बा लेख देख कर मै दुसरो की टिपण्णियां ढ कर ही टिपण्णी दे कर चल पडता हुं, बाकी सच मै लडकियांभी किसी से कम नही, अरे मेज के नीचे ही नीचे हमारी तरह सारी कलास की लडकियो ने मेगाजींन पढ ली,चलिये अब दोवारा से शुरु करे लिखना, यह लिखना भी हर किसी को नही आता,भगवान ने किसी किसी को ही यह गुण दिया है, अब अच्छा लिखा है सुंदर लिखा है तो कहने की जरुरत ही नही.
राम राम

rashmi ravija said...

Am so sorry mahfooz,aapka comment delete karna pada kyunki aapne same comment copy paste kiye the....aap quantity ki fikar kyun karte hain...aap,raj bhatia,sarad ji,shikha ji,jaise log mere posts padhte hain aur saraahte hain...bahut hai mere liye.mujhe koi shauk nahi ki 50 ya 100 comments mele..only quality matters...sorry again...pls dnt feel bad.

thatsfine said...

सच में इन पुरानी हिन्दी पत्रिकाओ के बंद होने से दूसरी पीढी के कई लेखको को गुमनामी में भेज दिया. लेकिन लेखकीय कीड़ा कही न कही कुलबुलाता रहता है और उसीका परिणाम है की ब्लागस्पाट आज हिंदी के साहित्यकारों. का प्रिय मंच बन चुका है. रश्मि जी इतने सुंदर और सरल लेखन के लिए बधाई.

Einstein said...

वाकई फिर पढता चला गया ...और अपने २०० रूपये की चेक की याद आ गई|
जो मुझे मिला था आकशवाणी वाराणसी से, मेरे आलेख "कम्पयूटर का इतिहास और उसका महत्त्व" के लिए..7 मिनट में इस आलेख को मै पढ़ा भी था| कार्यक्रम युववाणी थी |बहुत ही अजीब थी रेकॉर्डिंग की अनुभव ...चलिए कभी अपने ब्लॉग www.einsteinkunwar.blogspot.com पे शेयर करूँगा...अपनी मीठी यादों को बाँटने के लिए धन्यवाद....

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

rashmi ji bhut khub aap ki yaado ke prbhah me mai bhi kho gaya
saadar
praveen pathik
9971969084

अजय कुमार झा said...

जो भी ब्लोग्स मेरे दिल के करीब हैं ..अक्सर उनसे मुझे उलाहना मिलती है कि ..पता नहीं कहां कहां टीपता रहता हूं और उन पर नहीं टिप्पणियां करता ..सुना है मन की पाखी भी एक ऐसी ही पाती लिखे बैठी है मेरे नाम ॥ चलिये जी अब ज्यादा कहें सिर्फ़ इसके सिवा कि अब से हमारा आपका मल्टी नेशनल कोलेबोरेशन हो गया ..आप जब जब लिखेंगी हम टीपेंगे ....और हां आपकी आज की पोस्ट तो बहुतों को अपने पुराने दिन याद दिला रही है ..मुझे भी ...तो पक्का हो गया मेरी तरह से ...आगे के लिये शुभकामनाएं ..दिल्ली मुंबई कौन दूर है जी .......?और फ़िर हम तो आपके शुरूआती फ़ौलोअर हैं जी ..

Apoorv said...

अखबार भी मैं हमेशा पीछे से पढना शुरू करती थी.क्यूंकि अंतिम पेज पर ही खेल की ख़बरें छपती थीं..

यही आदत अपनी भी थी पहले...मगर हम लड़के थे तब (सो तो अभी भी हैं) ;-)
हाँ डाँट तो पड़ती ही थी.

Nirmla Kapila said...

सच है रश्मि मैं भी इतना लम्बा आल्र्ख कम ही पढती हूँ मगर तुम ने लिखा ही इतना रोचक ढंग से कि पूरा कब हो गया पता ही नहीं चला। इन पत्रिकायों मे छपना नये लेखक के लिये बडी उपल्ब्धि है । वास्तव मे तुम्हारी लेख रोचक होते हैं। मा सरस्वति का हाथ तुम्हारे सिर पर है । बहुत बहुत आशीर्वाद बहुत आगे तक जाओगी।

Ashish said...

Bahut sundar post,socha iski prshansa me kuch likhoo lekin shabdo ke mamle me hath tang hone ke karan man ki bat man me hi rah gayi. Ha agar chemical reaction wali bat badhi hoti to shayad kuch likh jata.waise is post ne blog jagat ko ek antarrastriya samjhauta ka tohfa diya hai. BADHAI. Apoorva ke comment ne mujhe ye batane ka sahas diya ki is budhape me bhi mai sabse pahle khel panna hi padhta hoo. apporva ki umar to abhi khelne ki hi hai wo bhi soccer.

खुशदीप सहगल said...

रश्मि जी,
आपके लेख ने स्कूल के दिनों में पहुंचा दिया...मुझे याद है तब क्रिकेट पर अलग से मैगजीन्स नहीं आती थी...धर्मयुग,
साप्ताहिक हिंदुस्तान ही क्रिकेट के खास आयोजनों पर विशेषांक निकाला करते थे...बस जब भी ऐसे विशेषांक आते थे, हम सुध-बुध खोकर जब तक उन्हें पूरा चाट नहीं लेते थे, चैन नहीं आता था...अब तो टीवी, मैग्जीन्स, अखबार में क्रिकेट की भरमार रहती है, लेकिन वो मजा नहीं आता जो वाड़ेकर, इंजीनियर, गावस्कर, विश्वनाथ, बेदी, चंद्रा, सोल्कर, प्रसन्ना, वेंकटराघवन के खेलने के दौरान आता था...और ऊपर से रेडियो पर जसदेव सिंह, डॉ नरोत्तम पुरी, सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल, रवि चतुर्वेदी की कमेंट्री...क्या दौर था वो भी...

अजय कुमार झा जी,
अभी तक आप राजीव तनेजा भाई की पोस्ट को ही डेढ़-दो किलोमीटर के पैमाने पर मापा करते थे...अब आपको
रश्मि बहना की पोस्ट पर भी नज़र रखनी होगी...आपका काम बढ़ गया...

जय हिंद...

जय हिंद...

Ashish said...

Dear Apporva

Pls take my comment in humorous mood. as i was reffering APPORVA, who is really a kid.

नीरज गोस्वामी said...

आपकी लेखनी में जो प्रवाह है वो गज़ब का है दूसरा आप अपने विचारों में बहुत स्पष्ट हैं...ये दोनों गुण पाठक को आप का लिखा पढने पर बार बार उकसाते हैं...लिखती रहिये...
नीरज

मुकेश कुमार तिवारी said...

रश्मि जी,

इस पूरी पोस्ट को या उसके किसी हिस्से के बार-बार पढ़ा, श्री नीरज के विचारों से मैं सहमत हूँ और आपके लेखन का कायल कि पढ़ते हुये पाठक को ऊब नही होती।

वैसे मैं भी उसी इन्दौर शहर का रहने वाला हूँ , जहाँ के खतों में आपकी दिलचस्पी रही है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

raj said...

hmesha ki tarah dichasap post...hum bhi cricket khelte the...ya yun kahe main zidd karti thi mujhe khelni hai lakin ball kabhi bat ko nahi chhoo pati thi na jane kyun meri tyming etni khraab thi ki bat pahle uttha deti ......or sab mujhpe chilate.....likhti rahe.....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पसंद बहुत मिलती है पढने में आपकी और मेरी .कभी यह मेग्जिन ही बहुत पढ़े जाते थे ..आप बहुत अच्छा लिखती है अंत तक बांधे रखा आपके इस लिखे नेशुक्रिया

लोकेन्द्र said...

ऐसा होता है कुछ मिलता है तो कुछ जाता है....... आपका ये हिंदी प्रेम देख मुझे भी बचपन की घटना याद आ गई जब हम मित्रगण आपस में कोई पत्रिका खरीदते थे और उसे पहले पढ़ने या तय समय पर न देने पर झगड़ते थे.....
आप ऐसे ही हिंदी को कुछ न कुछ हमेशा देती रहें.....
इसके लिए आपको ढेर सारी शुभ कामनाएं.....

'अदा' said...

रश्मि जी,
पूरा आलेख एक सांस में पढ़ लिया....अरे हम भी हमेशा कोई भी अखबार पीछे से ही पढ़ते थे..क्यूंकि कार्टून होता था....
बहुत अच्छा लगा पढ़ कर...जाने क्या-क्या याद आगया...क्रिकेट-सम्राट की तो लूट हो जाती थी....
जान कर बहुत ख़ुशी हुई की आपके लेख, धर्मयुग, हिन्दुस्तान , सारिका जैसी पत्रिकाओं में छपते थे....
यह तो हमारा सौभाग्य हुआ न की आपको हम पढ़ रहे हैं...
बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर रश्मि जी...

KISHORE KALA said...

sansmaran bhi rochak hote hain. apni yadon ke silsile ko logon ke sath share karana bhi acha lagata hai.apto likahati bhi acha hai phir apto behatarin patrikaon ki lekhika hai jankar hi bahut acha laga.
kishore kumar jain. guwahati assam

rashmi ravija said...

@ अदा जी,सारिका में कभी कोई रचना नहीं छपी....कभी भेजने की हिम्मत ही नहीं हुई...वैसे भी सारिका बहुत ऊँचे स्तर की पत्रिका थी.....कहीं भी कहानियां ना भेज सकने की वजह भी लिख ही दी है.
@खुशदीप जी,सही कहा आपने...पौकेट ट्रांजिस्टर पे आठ दस सर झुके हुए, जो कमेंट्री का मजा लेते थे वे...सोफे पर फैलकर टी.वी. के मैच देखने में नहीं...कई बार कोई खिलाड़ी 90 पर हो तो हमलोग क्लास बंक कर दिया करते थे,और अक्सर वो खिलाड़ी आउट हो जाता...और पोस्ट लम्बी तो है,पर जब सब कह रहें हैं की एक सांस में पढ़ लिया...फिर मैं क्यूँ कटौती करूँ,यादें बांटने में :)
@निर्मला जी एवं नीरज जी, आपलोगों की शुभकामनाएं ही और लिखने को प्रेरित करती हैं...बाकी सारे दोस्तों का भी शुक्रिया,हौसला अफजाई के लिए

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
Email- sanjay.kumar940@gmail.com

रेखा श्रीवास्तव said...

rashmi,

padh tumhara likha rahi hoon, aur vaakya lag raha ki yahi sab apane saath bhi hua tha. pahale likhana aur phir 'fan-mail' aur chhoti jagah men itane saare khat kisi ladaki ke naam aana badi baat , maan ka kahana ye sab band karo log baaten karte hain. par mere papa khud sahityika abhiruchi ke the to ye kaarya chalta raha aur chal raha hai.

हर्षवर्धन said...

ये अच्छा है कि ब्लॉग ने आपको फिर से लिखाई-पढ़ाई का पूरा मौका दे दिया

Kusum Thakur said...

bahut achha sansmaran likha hai . badhai!!

babli alka said...

दीदी,तुम्हारी तरह मैं भी उन यादों की वादियों में भटकने लगी.तुम्हारे नाम आये पत्र ,पढना हमलोगों का अच्छा टाईम पास था.अच्छा किया, तुमने फिर से लिखना शुरू किया.बहुत सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं.

mamta said...

Excellent flow of language,the reader just drowns in your memories as if they were ones very own,congrats,once again a winner.

शहरोज़ said...

शुभ अभिवादन! दिनों बाद अंतरजाल पर! न जाने क्या लिख डाला आप ने! सुभान अल्लाह! खूब लेखन है आपका अंदाज़ भी निराल.खूब लिखिए. खूब पढ़िए!

Rakesh said...

dharapravah bhasha mein sunder vishyon ko chuta ye aalekh pasva sangeet sa bajta hai magar mul svar ki tarah ubharta hai ..badhai

Rohit Jain said...

bahut achchha laga aapki yaadein padh kar...aur apni yaadon ke samandar me gote lagane lag gaye .........Shukriya

गौतम राजरिशी said...

सारिका और धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान का वो सुनहला युग मेरी कई बचपन की स्मृतियां समेटे हुये है। सोचता हूं कि यदि सारिका न होती तो क्या हम दुष्यंत की अद्‍भुत ग़ज़लों से मिल पाते...

वैसे शरद जी ने सही कहा है कि इन नयी पत्रिकाओं ने एक और युग का आह्वान किया है। अपनी रचना को छपे देखने का सुख तो रचनाकार ही जान सकता है।

लिखती रहिये और हमें मिलवाती रहिये अपने शब्दों से यूं ही अन्वरत

रंजना said...

Aapka yah rochak sansmaran jitna saras laga utna hi yah mujhe bhi apne smriti vitaan me le gaya....

रंजना said...

Sach kaha hindi blog lekhan ek vardaan saa lagta hai...

Mithilesh dubey said...

बढिया लगा ,संस्मरण पढकर ।