Tuesday, October 20, 2009

वक़्त की धूप में बेरंग होता ये मन...

पिछली 'सिवकासी' वाली पोस्ट पर बड़ी इमोशनल प्रतिक्रियाएँ मिलीं. सुखद अनुभूति हुई,जानकर कि इतने लोग हमखयाल हैं. मेरे बेटे को सबने बहुत आर्शीवाद और शुभकामनाएं दीं....सबका शुक्रिया. पर सारे बच्चे ऐसे ही होते हैं--निश्छल,निष्पाप, दूसरों के दुःख में दुखी हो जानेवाले,अपनी धुन के पक्के. कई लोगों ने अपने अनुभव बांटे.ममता ने बताया,उनका बेटा भी वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण का ख्याल कर पटाखे नहीं चलाता. राज़ी के बेटे ने इस बार,बिजली के रंगीन बल्ब और झालर लगाने से मना कर दिया और बोला--'इतनी बिजली बर्बाद करने से क्या फायदा,हम दिए जलाएंगे'. कई लोगों ने अपनी टिप्पणियों में भी बताया कि उनके बच्चों ने भी पटाखों का बहिष्कार किया है.ख़ुशी होती है ये देख कि आज के बच्चे इतने जागरूक हैं और देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.ये बच्चे पाठ्य-पुस्तकों में पढ़कर सब भूल नहीं जाते बल्कि आत्मसात करते हैं और उसे व्यवहार में लाने की भी कोशिश करते हैं

मेरी एक डॉक्टर सहेली थकी मांदी क्लिनिक से आती है पर उसकी बेटी 'ग्लोबल वार्मिंग' की सोच उसे ए.सी. नहीं चलाने देती.मेरा छोटा बेटा भी,भीषण गर्मी में भी मुझे ए.सी.चलाने से रोकता है और मुझे समझाता है,"अगर हमने अभी से पर्यावरण की रक्षा का ख़याल नहीं किया तो तुम्हारी उम्र तक, जब मैं पहुंचूंगा तब तक टेम्परेचर ५० डिग्री तक पहुँच जायेगा.मैं ऑफिस से पसीने से लथपथ घर आऊंगा" जैसे भविष्य की भयावह तस्वीर उसके सामने खींच जाती है.

हम बच्चों में बढती अनुशासनहीनता,भौतिकपरस्तता और स्वार्थीपन की शिकायत करते हैं पर कभी कभी ये बच्चे सहजता से इतनी बड़ी बात कह जाते हैं कि हमें चकित कर देते है.एक बार मैं पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली से बात कर रही थी तभी उसका दस वर्षीय बेटा आया और बोला --'ममी,कमलेश खेलने के लिए बुला रहा है,मैं नीचे जाऊं??"(कमलेश पास की दुकान में डिलीवरी बॉय का काम करता है,जब कभी काम से फुरसत मिलती है,बिल्डिंग में बच्चों के साथ खेलने आ जाया करता है)
सहेली ने पूछा--"और भी कोई आया है खेलने?"
"ना, और कोई नहीं...बस मैं और कमलेश हैं"
"बाद में जाना, जब सब आ जाएँ"....सहेली का आभिजात्य मन अपने बेटे को एक डिलीवरी बॉय के साथ अकेले खेलने देना गवारा नहीं कर रहा था. बेटे ने आँखे चढाकर,संदेह से पूछा--"क्यूँ?..क्यूंकि वह एक दुकान में काम करता है,इसलिए??...तुमलोग इतना भेदभाव करती हो इसलिए,इंडिया इतना पिछड़ा हुआ है...मुझे जाने दो,ना."..सहेली ने उसकी बातों से बचने को, जाने की इजाज़त दे दी...और वह दस साल का बच्चा हमें भाईचारा का पाठ पढ़ा,चला गया. ऐसे ही एक बार मैं बाहर से लौटी तो पाया घर में बिल्डिंग के बच्चे जमा होकर 'पकिस्तान' और 'साउथ अफ्रीका' के बीच चल रहा मैच देख रहें हैं.मैंने यूँ ही पूछ लिया,"तुमलोग किसे सपोर्ट कर रहें हो?..और सबने समवेत स्वर में कहा--"ऑफ कोर्स! पाकिस्तान को...आखिर वो हमारा भाई है"....जब हम ना खेल रहें हो तो पाकिस्तान को कई लोग सपोर्ट करते हैं..पर भाई का दर्जा कितने लोग देते हैं? ये बच्चे कारगिल भूले नहीं हैं....आज भी लक्ष्य,बॉर्डर,LOC इनकी फेवरेट फिल्में हैं....लेकिन जंग और खेल में फर्क करना इन्हें आता हैं.
इसी दीवाली में सात साल की अपूर्वा अपनी मम्मी से घर के सामने रंगोली बनाने की जिद कर रही थी,उसकी मम्मी ने कहा, जाओ सीढियों पर कुछ फिगर्स बना कर उसमे रंग भर दो....आप आश्चर्य करेंगे जानकर,उस बच्ची ने हर स्टेप पर एक दीपक,एक स्वस्तिक और चाँद तारे बनाए...और खुश खुश हमें दिखाया,"मैंने पाकिस्तान के फ्लैग का मार्क भी बनाया".

इन बच्चों का मन इतना कोमल होता है,दूसरो का जरा सा दुःख देख व्याकुल हो जाते हैं,कोई भी त्याग करने से जरा भी नहीं हिचकिचाते.मेरी सहेली वैशाली की बेटी स्कूल की तरफ से एक अनाथालय में एक स्किट पेश करने गयी.घर आकर दो दिन उसने ठीक से खाना नहीं खाया और उदास रही कि वे बच्चे अपने मम्मी पापा के बिना कैसे रह पाते हैं? मैं भी जब बच्चों के छोटे कपड़े अनाथालय में देने जाती हूँ तो मेरा छोटा बेटा कहता है, "तुम्हे इसके साथ कुछ नए कपड़े भी देने चाहिए"...मैं तर्क देती हूँ," सिर्फ एक दो बार की पहनी हुई है,और छोटी हो गयी है,बिलकुल नयी जैसी है." वह कुछ रोष से कहता है ."पर नयी तो नहीं है"

२६ जुलाई के महाप्रलय में जब सारा मुंबई डूबा हुआ था... कुछ ऊँचाई पर होने की वजह से हमारे इलाके में पानी नहीं भरा और बिजली भी नहीं गयी....बिल्डिंग के बच्चों ने जब टी.वी.पर देखा, कई इलाकों में तीन दिन से बिजली नहीं है, तो जैसे अपराधबोध से भर गए. उन्हें आपस में बाते करते देखा--"ये लोग एक दिन के लिए हमारी बिजली काटकर उन्हें क्यूँ नहीं दे देते?"..उन्हें अँधेरे में रहना...टी.वी.नहीं देखना गवारा था पर दूसरो की तकलीफ वे नहीं देख पा रहें थे.

इन बच्चों कि बातें सुन ,मुझे लगा....क्या हम भी बचपन में ऐसे नहीं थे?...फिर ऐसा क्या हुआ कि हम संवेदनाशून्य होते चले गए.वक़्त ने ऐसा असर किया हमपर कि हम इतने बदल गए.बचपन का एक वाक़या याद आता है...मेरी माँ बाहर गयीं थी तभी एक भिखारी आया और बोला...वह बहुत भूखा है.मैंने उसे ढेर सारे कच्चे चावल दे दिए. मैं चावल दे ही रही थी कि मेरा छोटा भाई आ गया.मुझे डर लगा ,अब ये मेरी शिकायत करेगा कि दीदी ने इतने सारे चावल दे दिए.मैंने सफाई दी...दरअसल वह बहुत भूखा था.मेरे भाई ने तुंरत कहा, "तुमने उसे फिर थोड़े दाल और आलू भी क्यूँ नहीं दिए,केवल चावल वो कैसे खायेगा?"..... ऐसे होते हैं हम सब बचपन में......फिर धीरे धीरे आगे बढ़ने की जद्दोजहद, इस दुनिया में सर्वाइव करने की कशमकश हमारी सारी कोमल भावनाएं सोख लेती है.कर्तव्यों,जिम्मेवारियों के बोझ तले ये दूसरों के लिए सोचने का जज्बा दम तोड़ देता है.हम अपनी सुविधाएं,असुविधाएं देखने लगते हैं...अपना हित सर्वोपरि रखते हैं.

दो तीन साल पहले मैंने एक संस्था "हमारा फुटपाथ" ज्वाइन की थी. यह संस्था सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए काम करती है.पर जब मुझे पता चला कि बाकी सारे सदस्य शाम ७ बजे इकट्ठे होते हैं क्यूंकि बाकी सारे लोग ऑफिस वाले थे और बच्चे भी सिग्नल पर फूल,गुब्बारे,खिलौने,किताबें...बेचने के बाद ही आ सकते हैं.मैं नहीं जा सकी क्यूंकि ७ बजे मेरे बच्चे भी खेलकर घर वापस आते थे ,उनकी पढाई,उनका खाना पीना देखना था.फिर दूरी के कारण आने जाने में भी २ घंटे लग जाते. मैंने कहाँ सोचा कि मेरे बच्चों के पास तो सुख सुविधा से पूर्ण आरामदायक घर है,उन बच्चों के पास तो माँ..बाप..सर पे छत...किसी का सहारा नहीं.यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि हम कुछ अच्छे काम करना भी चाहते हैं तो अपने फालतू बचे समय में.

हर बच्चे के दिल में एक 'मदर टेरेसा' और 'बाबा आमटे' का ह्रदय होता है पर जैसे जैसे उम्र बढती है यह छवि धूमिल पड़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है जब ये छवि बिलकुल गायब हो जाती है.तभी तो आज इनके बाद ऐसी निस्स्वार्थ सेवा करने वाला कोई तीसरा नाम नहीं सूझ रहा.

16 comments:

mamta said...

How true!Your post reminded me of the time when I was willing to take even the maid-servant's children in my lap and play with them for hours together.Now before taking any child in my lap I think twice.Going to orphanage is just the time to get rid of extra clothes and old toys for me.Whereas,for my kids it's time to do something for the have-nots.Wonderful article.

raj said...

hmesha ki tarah achhi post....mera bhai australia me hai..ik din maine puchha ki jab india or aus ka match hota hai to tum kiski taraf hote ho to bola jab india ki taraf magar jab india har raha hota hai to main aus ki taraf ho jata hun....

रश्मि प्रभा... said...

us waqt ke drishya jivant ho uthe.....

डॉ .अनुराग said...

बच्चे निश्चल मन ओर मासूम होते है ..कच्चे घडे की तरह ....तभी तो किसी ने कहा है.....
"बच्चो के छोटे हाथो को चांद सितारे छूने दो
चार किताबे पढ़ लिख कर ये भ हम जैसे हो जायेगे "

दिगम्बर नासवा said...

YOU ARE RIGHT IN YOUR WRITINGS ........ WE WANT TO DO CHARITY BUT ONLY IN FREE TIME ..... THOUGHT PROVOKING .......

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हर बच्चे का दिल मासूम होता है पर बदती उम्र उसको न जाने कहाँ ले जाती है ..

कुश said...

बिलकुल ठीक कहा आपने.. अनुराग जी की एक त्रिवेणी की आखिरी लाईन याद रही है..

चार किताबे पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे..

कुश said...

अरे.! अनुराग जी तो ऊपर कमेन्ट कर चुके है.. मैंने देखा नहीं :)

महफूज़ अली said...

bahut hi achchi post....

neelima sukhija arora said...

बच्चों के बहाने कितनी बड़ी बात कह दी आपने, अगर हम भी खुद को बच्चों की तरह निश्चल और मासूम बने रहने दें तो शायद दुनिया के आधे से अधिक फसाद तो यूं ही निपट जाएंगे

Nirmla Kapila said...

सच मे जब तक बच्चे हैं तब तक मासूम हैं वरना बडे हो कर तो दुनियादारी सीख लेते हैं सुन्दर रचना जैसे कि हमेशा होती ही है शुभकामनायें

Ashish said...

Bacche Man Ke Sacche , Sare jag ke ankh ke Tare

Ye Wo Nanhe phool hai jo Bhagwan ko Lagte pyare.

Mere pass shabd nahi hai isliye uprokt panktiya dohra raha hoo.

गौतम राजरिशी said...

आपका सब्जेक्ट हट कर होता है हमेशा...सोचता हूँ तो लगता जैसे सारी संवेदनायें अपने इस ब्लौग-जगत तक ही सिमट कर रह गयी हैं।
ऊपर डाक्टर अनुराग साब ने मेरा पसंदीदा शेर कह दिया। निदा फ़ाजली ने या बशीर बद्र ने, किसने कहा है, अभी कनफ्युज हूं, लेकिन आपके पोस्ट को बड़े अच्छे से सम-अप करता है।

...अरे हाँ, वो आप कोई कहानी भेजने वाली थीं? वैसे ब्लौग पे क्यों नहीं लगाती हैं आप? हम प्रतिक्षा में हैं...

क्रिएटिव मंच said...

बिलकुल ठीक कहा आपने

सुन्दर पोस्ट

शुभकामनायें

Dr Parveen Chopra said...

हर बच्चे के दिल में एक 'मदर टेरेसा' और 'बाबा आमटे' का ह्रदय होता है पर जैसे जैसे उम्र बढती है यह छवि धूमिल पड़ती जाती है
..... ऐसे होते हैं हम सब बचपन में......फिर धीरे धीरे आगे बढ़ने की जद्दोजहद, इस दुनिया में सर्वाइव करने की कशमकश हमारी सारी कोमल भावनाएं सोख लेती है
मुझे वैसे तो आप की सारी पोस्ट ही बढ़िया लगी --ऊपर वाली ये पंक्तियां तो लगता है कि हम मां-बाप को अपनी डायरी में, अपनी अलमारी के दरवाज़े की अंदर की तरफ़ और अपनी स्टडी-टेबल के कांच के नीचे छुपा कर रख लेनी चाहिये -----ऐसा क्यों ? क्योंकि हम इन कोमल फूलों को क्यों बताएं या इन को भनक भी क्यों लगने दें कि हमारी कोमल भावनायों को समय के थपेड़ों ने सोख लिया है। ...ताकि वे जीवन का यह पहलू जाने बिना यूं ही सारी उम्र बाबा आमटे जैसे, मदर टेरेसा जैसा बने रहने का प्रयास करते रहें ----यह मैंने यहां प्रयास शब्द क्यों लिख दिया, ये बच्चे प्रयास थोड़े न करते हैं, ये तो नन्हे फूल हैं ...........मुझे मेरा एक पसंदीदा गाना याद आ गया ...
बच्चे मन के सच्चे,
सारे जग की आंख के तारे,
ये वो नन्हें फूल हैं जो,
भगवान को लगते प्यारे।
ज्यों ज्यों इन की उम्र बढ़े .....
वैसे,मैंने बहुत बार सुना है कि बच्चे अपने मां-बाप की झेराक्स कापी होते हैं और यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि बच्चे नैतिकता के सारे पाठ, अच्छी बातें, विश्व-बंधुत्व, सहनशीलता, धर्म-निरपेक्षता जैसे दैवी गुण अपने घर की चारदीवारी से ही सीखते हैं....

रेखा श्रीवास्तव said...

हाँ , बच्चे मासूम होते हैं और उनमें वह कुटिलता और भेदभाव नहीं होता है, लेकिन क्या ये बचपन बहुत दूर तक साथ देता है, हाँ दे सकता है अगर उसको घर और परिवेश में इस इमानदारी और सहृदयता कि बयार मिलती रहे.