Friday, October 9, 2009

दरीचे से झांकती....कुछ मीठी ,कुछ कसैली, यादें

आजकल मुंबई में चुनाव की गहमागहमी है. नेतागण अपनी आरामगाह छोड़कर धूप में सड़कें नाप रहें हैं. जब भी चुनाव का जिक्र आता है, एक पुरानी घटना, स्मृति के सात परदों को चीरती हुई बरबस ही आँखों के सामने आ जाती है.

मेरे पिताजी एक सरकारी पद पर कार्यरत थे. वे एक ईमानदार अफसर थे लिहाज़ा उनका ट्रांसफ़र कभी भी और कहीं भी हो जाता था. कभी कभी तो चार्ज संभाले ६ महीने भी नहीं होते और कोई न कोई शख्स अपना काम रुकता देख, उनका ट्रांसफ़र कहीं और करवा देता और पापा चल पड़ते अपने गंतव्य की ओर. ज़ाहिर है, मुझे और मेरे छोटे भाइयों को अपनी पढाई पूरी करने के लिए हॉस्टल की शरण में जाना पड़ा.

पापा की पोस्टिंग एक छोटी सी जगह पर हुई थी और मैं हॉस्टल से छुट्टियों में घर आई हुई थी. ७,८ कमरों का बड़ा सा घर,आँगन इतना बड़ा कि आराम से क्रिकेट खेली जा सके.सामने फूलों की क्यारी ,मकान के अगल बगल हरी सब्जियां लगी थी...पीछे कुछ पेड़ और उसके बाद मीलों फैले धान के खेत. एक कमरे को मैंने अपनी पेंटिंग के लिए चुन लिया, कितना सुकून मिलता था उन दिनों.जब जी चाहे , ब्रश उठाओ,थोडा पेंट करो... और जब मन करे ,ब्रश, पेंट,तेल सब यूँ ही छोड़ चल दो ..फिर चाहे एक घंटे में वापस आओ या चार घंटे में चीज़ें उसी अवस्था में पड़ी मिलतीं. .आज मेरे दोस्त,रिश्तेदार यहाँ तक कि बच्चे भी शिकायत करते हैं--'पेंटिंग क्यूँ नहीं करती??'अपने 2BHK फ्लैट में पहले तो थोडी, खाली जगह बनाओ फिर सारी ताम झाम जुटाओ.और जैसे ही ब्रश हाथ में लिया कि दरवाजे या फ़ोन की घंटी बज उठेगी.वहां से निजात पायी तो घर का कोई काम राह तक रहा होगा...फिर सारी चीज़ें समेटो. उसपर से घर के लोग हवा में बसी केरोसिन की गंध की शिकायत करेंगे.,सो अलग.(केरोसिन तेल,ब्रश से पेंट साफ़ करने के लिए उपयोग में लाया जाता है) लिहाजा अब साल में एक पेंटिंग का रिकॉर्ड भी नहीं रहा.ऐसे में बड़ी शिद्दत से याद आता है,बिना ए.सी.,बिना पंखे(क्यूंकि बिजली हमेशा गुल रहती थी) वाला वो बेतरतीब कमरा.

घर से पापा का ऑफिस दस कदम की दूरी पर था लेकिन दोपहर का खाना खाने वे ४ बजे से पहले, घर नहीं आया करते.और जब आते तो साथ में आता लोगों का हुजूम. उनलोगों को 'लिविंग रूम' में चाय पेश की जाती और अन्दर की तरफ बरामदे में लगे टेबल पर पापा जल्दी जल्दी खाना ख़त्म कर रहें होते. बरामदा,आँगन जैसे शब्द तो लगता है, अब किस्से,कहानियों में ही रह जायेंगे. और शहरों ,महानगरों में पनपने वाली पौध के लिए तो ये शब्द हमेशा के लिए अजनबी बन जायेंगे क्यूंकि 'हैरी पॉटर' और 'फेमस फाईव' में उलझे बच्चों का हिंदी पठन पाठन बस पाठ्य पुस्तकों तक ही सीमित है.उसकी सुध भी उन्हें बस परीक्षा के दिनों में ही आती है.

उन दिनों चुनाव की सरगर्मी चल रही थी और चुनाव का दिन भी आ ही गया. हमलोग पापा का खाने पर इंतज़ार कर रहें थे.पता था, आज तो कुछ और देर होनी है. ५ बजे के करीब पापा खाना खाने आये.और जाते वक़्त बस इतना ही कहा--"तुमलोग बाहर कहीं मत जाना ,मैंने आज एक क्रिमिनल को अर्रेस्ट किया है" पापा पुलिस में नहीं थे पर चुनाव के दिनों में कई सारे अधिकार गैर पुलिस अधिकारीयों को भी प्रदान किये जाते हैं.हमलोग
सोचते ही रह गए,ऐसा क्यूँ कहा? हमलोग तो कहीं जाते ही नहीं थे.वहां तो हमारी दुनिया बस कैम्पस तक ही सीमित थी.कभी बाज़ार का भी मुहँ नहीं देखा.शौपिंग करने जाना हो तो जीप पर सवार हो, पास के शहर जाया करते थे. हमें लगा,शायद अतिरिक्त सावधानी के इरादे से कहा हो.

रात में भी पापा काफी देर से आये और आते ही सुबह ही पास के शहर जाने की तैयारी करने लगे क्यूंकि मतगणना होने वाली थी. उन दिनों 'इलेक्ट्रानिक मशीनों' के द्वारा नहीं बल्कि मतगणना 'मैनुअल' हुआ करती थी.एक एक मत हाथों से गिना जाता था.जबतक मतगणना पूरी न हो जाए कोई भी बाहर नहीं जा सकता था.करीब २४ घंटों तक मतगणना जारी रहती थी और अधिकारियों को अन्दर ही रहना पड़ता था.

हमें पता था ,पापा रात में,घर वापस नहीं आने वाले हैं.हमेशा की तरह बिजली भी गुल थी. मैं करीब १० बजे अपने कमरे में सोने चली गयी. अभी बिस्तर तक पहुंची भी नहीं थी कि घर के बाहर कुछ लोगों की "हो..हो" करके जोर से चिल्लाने की आवाज आई.मैं मम्मी के कमरे की तरफ दौडी. मम्मी पत्ते की तरह काँप रही थीं.उनको कंधे से थामा पर हम बिना आपस में एक शब्द बोले ही समझ गए, ये जरूर उसी बदमाश के आदमी हैं और अब बदला लेने आये हैं.दिमाग तेजी से दौड़ने लगा,बचने के क्या रास्ते हैं?पर तुंरत ही हताश हो गया. कोई भी रास्ता नहीं.सरकारी आवासों के दरवाजे तो ऐसे होते हैं कि एक बच्चा भी जोर से धक्का दे तो खुल जाए.और मजबूत कद काठी वाले ने अगर धक्का दिया तो किवाड़ ही खुलकर अलग गिर पड़ेंगे.पीछे की तरफ एक दरवाजा था तो,पर भागा कहाँ जा सकता था.चारों तरफ खुले खेत.पीछे की तरफ प्यून और सर्वेंट क्वाटर्स थे...पर कुछ दूरी पर थे.सामने वाला आवास एक डाक्टर अंकल का था,पर वे लोग किसी शादी में गए हुए थे.और अगर होते भी तो क्या मदद कर पाते?कहीं कोई उपाए नज़र नहीं आ रहा था.घर में कोई हथियार तो होते नहीं.और एक सब्जी काटने वाले चाकू से ४,५, लोगों का मुकाबला करना ,नामुमकिन था.तभी मुझे पापा की शेविंग किट याद आई और किशोर मन ने आखिरी राह सोच ली.मैंने सोच लिया,अगर उनलोगों ने दरवाजे पर हाथ भी रखा तो बस मैं शेविंग किट से 'इरैस्मिक ब्लेड' निकाल अपनी कलाई की नसें काट लूंगी. किशोर मन पर,देखे गए फ़िल्मी दृश्यों का प्रभाव था या इसे छोड़ सचमुच कोई राह नहीं थी,आज भी नहीं सोच पाती. मम्मी शायद देवी,देवताओं की मनौतियाँ मनाने में लगीं थीं.

हमने खिड़की से देखा कुछ देर की खुसफुसाहट के बाद, वे लोग बगल की तरफ एक दूसरे अफसर के घर की तरफ बढे.वे अंकल, अकेले रहते थे और पापा के साथ ही मतगणना के लिए गए हुए थे.बस घर में उनके प्यून 'राय जी' थे. इलोगों ने उन्हें जगाया और थोडी देर बाद, राय जी हाथों में लालटेन लिए हमारे घर की तरफ आते दिखे.उन्होंने दरवाजा खटखटाया.मम्मी ने किसी तरह हिम्मत जुटा,कड़क आवाज़ में पूछा--"कौन है?...क्या काम है?"तब राय जी ने बताया ये लोग सादे लिबास में पुलिस वाले हैं और इनलोगों को हमारी हिफाज़त के लिए पुलिस अधिकारी ने भेजा है.और ये लोग जोर से चिल्लाकर अपनी उपस्थिति जता रहें थे ताकि लोग समझ जाएँ कि हमलोग अकेले नहीं हैं.

यह जान, हलक में अटकी हमारी साँसे वापस लौटीं. रायजी ने कुछ दरी निकाल देने और एक लालटेन देने को कहा और वे लोग बाहर के बरामदे में सो गए.मैं तो यह सब सुन आराम से सो गयी लेकिन मेरी मम्मी की रात आँखों में कटी. उन्हें डर लग रहा था, क्या पता ये लोग झूठ बोल रहें हों और उसी बदमाश के आदमी हों. पर मम्मी की शंका निर्मूल निकली.

18 comments:

अनिल कान्त : said...

पुरानी यादों में बस खो जाने का माँ करता है
चाहे वो अपनी हों या किसी और की
बहुत अच्छा लगा पढ़कर

अनिल कान्त : said...

कृपया माँ को मन पढें

GATHAREE said...

वो रात आप लोगों ने कैसे बितायी होगी ? सोच कर
सिहरन होती है

कुश said...

लम्बी लम्बी पोस्ट लिखने का अवार्ड तो आपको ही मिलना चाहिए..
वाकई बरामदा जैसा शब्द अब नहीं मिलता.. एक अजीब सी फिलिंग हुई ऐसा सोचकर.. कभी इस बारे में गौर ही नहीं किया..
वैसे नस काटने वाली स्टाइल अच्छी लगी.. फिर भी अंत भला तो सब भला..

raj said...

us rat ki subah to huee.....

डॉ .अनुराग said...

जी हां कई नौकरी वालो को अपनी नौकरी के साथ जुड़े खतरों से भी जूझना पड़ता है ..मेरे ताऊ जी सी बी आई की तरफ से बिहार के उस केस की पैरवी में थे जिस पर प्रकाश झा ने फिल्म भी बनायीं थी ..आँख में तेजाब डालने वाला ..तब मई बहुत छोटा था ...लेकिन कुछ अजीब से हालातो का सामना ताऊ जी के परिवार ने किया था

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...
This comment has been removed by the author.
प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

बहुत खूब रश्मि जी शहर की इस भागम भाग जिन्दगी में जब भी कभी उन पुराने दिनों की याद आती है सच में मन भर आतः है एक एक पल सुखद अनुभूति देते हुए निकल जाता है
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

mamta said...

Good to hear about a time when knowing that there are policemen outside you could sleep peacefully.Presently ,I believe,people will be even more scared to know that cops are near them.Well written post,congrats.

rashmi ravija said...

Really mamta,a chill went thru my spine...I never realised that time has changed so much n now we can not rely upon our own policemen as some of them hv become BHAKSHAK in the wesh of RAKSHAK

रश्मि प्रभा... said...

oh, sochkar hi ruh kaanp jati hai

rashmi ravija said...

@कुश
लम्बी पोस्ट का ईनाम इतनी आसानी से नहीं मिल जायेगा..प्रतिद्वंदिता कड़ी है...रंजना भाटिया ,डॉ.अनुराग,अनिल कान्त.....के पोस्ट कुछ कम लम्बे नहीं होते(jst joking,i know they r established blogger...dnt want to compare myself with them...:) )
बरामदा,आँगन,तुलसी चौरा जैसे शब्द तो बस किताबों में ही रह जायेंगे,मुझे भी यह ख्याल तब आया जब कुछ साल पहले मैं गाँव गयी थी और मेरे बेटे ने मुझे बरामदे में बैठे देख कहा था...'यहाँ आँगन में बैठ कर क्या कर रही हो?'..मैंने उसे आँगन ले जाकर दिखाया और समझाया पर जो चीज़ें या शब्द बार बार उनकी नज़रों के सामने नहीं आते,कहाँ तक याद रख पाएंगे ये बच्चे भी.
@अनुराग
कर्त्तव्य निष्ठा,ईमानदारी,सच्चाई पर चलने वाले हर सरकारी अधिकारी को इन मुश्किलों का सामना करना ही पड़ता है,चाहे वह भारत के किसी भी कोने में कार्यरत हो.हर जगह का यही हाल है.इसीलिए मैंने जानबूझकर जगह का उल्लेख नहीं किया है क्यूंकि इस प्रकार की घटना अलग अलग रूप लिए कई लोगों के साथ घटी होगी.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पुरानी यादे यूँ ही दिल पर घिर आती है .अपना नाम देख कर यहाँ आई थी पर एक अच्छी पोस्ट पढने को मिल गयी वाकई

Ashish said...

Kartvay paranyata aur Imandari se kam karne walo ka aisi badhawo se samna hota raha hai aur aage bhi hota rahega, ho sakta hai parivesh, desh aur badhawo ki prakriti badal jaye. Waise mujhe is blog ke madhyam se bahut sare sthapit bloggers ke namo ki jankari mili.aur sath me roman english me Tankan ka abhyas bhi.Mai Abhibhoot aur anugrihit hua.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

माफी चाहूँगा, आज आपकी रचना पर कोई कमेन्ट नहीं, सिर्फ एक निवेदन करने आया हूँ. आशा है, हालात को समझेंगे. ब्लागिंग को बचाने के लिए कृपया इस मुहिम में सहयोग दें.
क्या ब्लागिंग को बचाने के लिए कानून का सहारा लेना होगा?

Nirmla Kapila said...

संस्मरन पढ कर एक बार तो अपनी भी साँसें थम सी गयी थीं। आप की लेखन शैली बहुत अच्छी है। पढते हुये पाठक साथ साथ चलता है जैसे साक्षात देख रहा हो घटना को आभार और शुभकामनायें

रेखा श्रीवास्तव said...

bahut achchha sansmaran hai, prastuti bhi utani hi umda. rangon ki duniyan men kirosin ki mahak se pareshan hokar achchha vikalpa khoja hai.
isi tarah se likhati raho

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपने जिस देश-काल और वातावरण का जिक्र किया है वह मेरे वर्तमान से काफी मिलता जुलता है। मेरा सरकारी आवास कलेक्ट्रेट कैम्पस में ही है और ऑफिस भी। घर में बाहर- भीतर बरामदा, आँगन, हिलते चौखट वाले दरवाजे, आगे लॉन और पीछे सब्जी उगाने लायक जमीन, अमरूद, पपीता, अनार, अंगूर के पेड़ आदि सबकुछ है। नौकरी के अनुभव भी कमोवेश वैसे ही हैं।

समय बीतने के बाद भी बहुत सी चीजें नहीं बदलतीं। आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा।