Friday, August 20, 2010

जब पाठकों ने लिखवा ली कहानी

ये कहना जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी  कि यह  लम्बी कहानी सचमुच पाठकों ने ही लिखवा ली. जैसा कि पहले भी मैने जिक्र किया ,छः पेज की कहानी को ४ पेज में कर के , सिर्फ ९ मिनट में समेटी थी ..... और सोचा ,अब तो अपना ब्लॉग है. Unedited version  ब्लॉग पर डाल दूंगी.पर मन में एक शंका थी,यह बहुत ही सीधी सादी कहानी थी,कोई नाटकीयता नहीं...अप्रत्याशित  मोड़ नहीं.  सब कहेंगे दो नॉवेल लिख लिया ,अब रश्मि का लेखन चुक गया है. पर अपना लिखा एक जगह इकट्ठा करने की ख्वाहिश  भी थी. सो बड़ी हिचकिचाहट के साथ पहली किस्त पोस्ट कर दी.



टिप्पणियों  और मेल में लोगों की प्रतिक्रिया देख सुखद आश्चर्य हुआ, गाँव की पृष्ठभूमि पर लिखी इस  कहानी की पहली किस्त खूब  पसंद आई  थी लोगों को...किसी ने थोड़ा व्यंग्य भी किया कि "छः बच्चे ?कहीं परिवार नियोजन वाले ना दुखी हो जाएँ" पर मैं चुप रही, छः बच्चे इसलिए थे कि मुझे छः अलग अलग जिंदगियां दिखानी थीं...कुछ ने कमेंट्स में कहा भी कि हम भी छः भाई-बहन हैं....कहीं हमारी कहानी तो नहीं,मतलब यह इतनी अनहोनी बात भी नहीं.

फिर भी मुझे लगा, कि ३,४ किस्त में सिमट जायेगी. पर  पाठको का प्यार और उत्साहवर्द्धन लिखवाता गया और मैं लिखती गयी. शिखा, वाणी गीत, वंदना अवस्थी, वंदना गुप्ता, मुक्ति,सारिका, दीपक, आशीष,शुभम जैन,संजीत त्रिपाठी, मुदिता, रेखा दी, संगीता स्वरुपजी, घुघूती जी,राज भाटिया जी,समीर जी,  निर्मला दी, रश्मि दी,शमा जी,  हमेशा की तरह ये लोग पहली किस्त से ही साथ हो लिए, और बहुत ही सजगता से कहानी पर नज़र रखी थी. और भरोसा भी देते गए कि कहानी सत्य के करीब है.

इस कहानी से कुछ नए नाम जुड़े...साधना वैद्य जी और  शोभना चौरे जी, ...उनकी टिप्पणियाँ हमेशा एक नया जोश देती रहीं. राधा-कृष्ण के सिले कपड़े, शादी के बाद भी नैनों से ही प्रेमलीला, मनिहारिन,बच्चों के माध्यम से ससुर जी से बात करना और बड़े-बूढों का खांस कर घर में घुसना...मेरे साथ साथ बहुतों को याद आ गया.

मुक्ति और वाणी का हर किस्त पर ये कहना कि ऐसा उनके गाँव में भी होता था, शिखा,वंदना गुप्ता  संगीता जी ,घुघूती जी का गाँव की एक एक बात ध्यान से पढना ,क्यूंकि इन लोगों ने ग्राम्य-जीवन पास से देखा ही नहीं, बरबस मुस्कराहट ला देता. वंदना अवस्थी,संजीत त्रिपाठी  ने आश्चर्य भी किया कि शहर में रहकर इतने वास्तविकता के करीब कैसे लिखा?...मैने गाँव के जीवन को जिया नहीं पर देखा तो जरूर है...बरसों पहले ही सही.. थोड़ा डर तो था,न्याय कर पाउंगी या नहीं पर कुछ अपनी कल्पना की छौंक भी लगाती रही.शिखा एवं आशीष जी में शर्त लग गयी की मुझे भोजपुरी नहीं आती....जबकि बखूबी  आती है. दीपक मशाल ने शिकायत भी की , सारी लड़कियां हिरोइन और लड़के विलेन..ऐसा क्यूँ??

प्रवीण पाण्डेय जी, डॉक्टर दराल, अनामिका जी,रचना दीक्षित जी, इस्मत जैदी जी , ताऊ रामपुरिया जी,रवि धवन जी, जाकिर अली, विनोद पाण्डेय, रोहित, सौरभ , हिमांशु मोहन जी  ये लोग भी समय मिलने पर कहानी पढ़ते रहें और अपनी टिप्पणियों से उत्साहवर्धन करते रहें.हिमांशु जी ने अंतिम  किस्त पर बहुत ही ख़ूबसूरत टिप्पणी की.

दूसरी किस्त में ममता  की शादी कि बात पढ़ ,सबको लगा ये ममता की कहानी है..टिप्पणियों में ममता की कहानी आगे बढ़ने का सबको इंतज़ार था पर अब तो कहानी स्मिता पर आ गयी.शोभना जी ने बताया,स्मिता जैसी ही ज़िन्दगी देखी थी उन्होंने मुंबई में.  इस कहानी की पात्र नमिता का चरित्र सबको खूब पसंद आया. सब इंतज़ार करने लगे, कि नमिता शायद  अब घर में बदलाव लाएगी. टिप्पणियाँ पढ़, मुझे लगता, 'मैं कुछ गलत कर रही हूँ क्या..? हमेशा पाठकों के अनुमान के विपरीत जा रही हूँ.' पर कहानी की रूप-रेखा तो पहले ही बन चुकी थी.

प्रमोद और प्रकाश की कहानी के बाद सबको अनुमान हो गया कि ये अलग-अलग पात्रों की कहानी है. जब प्रकाश की पत्नी पूजा का कहानी में प्रवेश हुआ, तो बिंदास पूजा का चरित्र भी सबको बहुत पसंद आया. घुघूती जी ने कहा 'अब नमिता और पूजा मिल कर बदल देंगी घर को' पर एक बार फिर मैने निराश किया,अपने पाठकों को.और पूजा को विदेश भेज दिया. अब तक कहानी बिलकुल धरातल पर पैर जमा चल रही थी ,मैने  पूजा के बहाने ,कल्पना को थोड़ी उड़ान दी. इंदु जी ने भले ही कभी टिप्पणी नहीं की पर उनकी पैनी नज़र थी,कहानी पर.तुरंत टोक दिया, "काश! गाँव ऐसे होते" .


इस कहानी का सबसे बड़ा झटका था, 'नमिता' का घर छोड़ कर चले जाना. इसे पाठकों का संस्कारी मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था. उनकी प्रतिक्रियाएँ देख, मुझे भी दुख होता,पर मैं यह भी दिखाना चाह रही थी कि 'कैसे शिक्षित, मृदु स्वभाव वाले पिता भी,बेटी का अन्तर्जातीय विवाह स्वीकार नहीं कर पाते.'

समापन किस्त पर भी सबकी प्रतिक्रिया ने चौंकाया...सबको मार्मिक लगी वो कड़ी...और करीब-करीब सबने आँखें नम होने की बात लिखी. मैं तो पोस्ट करके सो गयी थी. सुबह कमेंट्स पढ़े तो अपराध-बोध से भर गयी. कभी कभी कैसी विवशता हो जाती है, कहानी की मांग ही ऐसी होती है कि पाठकों को दुखी करने का अपराध अपने सर लेना पड़ता है.

यह कहानी लिखते वक़्त जाना कि गाँव की यादें इतनी सुरक्षित हैं, मेरे मन-मस्तिष्क में. सचमुच दिल से शुक्रिया सभी पाठको का...उन लम्हों को फिर से जीने का मौका दिया और एक लम्बी कहानी मेरी झोली में डाल दी.

आगे भी ऐसे ही स्नेह,मार्गदर्शन,चौकस नज़र बनाएं रखें....अगली कहानी में उसकी ज्यादा जरूरत है क्यूंकि कागज़ पर उसे लिखना शुरू किया था (ब्लॉग बनाने से पहले) पर आधे के बाद नहीं लिख पायी. ये अहसास रहें कि कुछ लोग साथ हैं तो शायद पूरी कर पाऊं.

33 comments:

दीपक 'मशाल' said...

लोगों का प्रोत्साहन तो मिला ही पर इसके लिए भी प्रतिभा की जरूरत होती है जो आपमें भरपूर है.. ये अंत का विश्लेषण भी ठीक रहता है.. पाठकों को भी प्रोत्साहन चाहिए ही चाहिए.. :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:):) कहानी के समापन पर भी कहानी लग रही है ....

नयी कहनी का इंतज़ार है ..आप लिखती जाएँ ..हम लिखवाते जायेंगे ..:):) शुक्रिया

डॉ टी एस दराल said...

बहुत बहुत शुभकामनायें ।
बेशक , आप बहुत अच्छा लिखती हैं ।

shikha varshney said...

अरे जब ओखली में सर दिया तो मुसल से क्या डरना ...जब इतना लिखवा लिया तो आगे भी लिखवा ही लेंगे :)लिखती जाओ आप तो बस
बस एक शर्त है कहानी सुखांत होनी चाहिए .:)

ताऊ रामपुरिया said...

अब शिखा वार्ष्णेय जी ने मेरे मन की बात कह ही दी है तो ध्यान रखियेगा. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम

Sadhana Vaid said...

आप लिखती ही इतना सजीव और सुन्दर हैं कि एक बार कहानी का आरम्भ पढ़ लेने के बाद आगे पढ़े बिना चैन ही नहीं आता ! आपकी कहानी की प्रतीक्षा है ! पाठक कैसे उसे सराहते हैं आप देखती जाइए ! हमारी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ हैं !

महफूज़ अली said...

आप वाकई में बहुत अच्छा लिखतीं हैं.... तो सब इतना प्यार तो देंगे ही देंगे ना.... एक मैं ही नालायक, निक्ख्ट्टू हूँ... जिसके पास टाइम ही नहीं है....

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी अच्छी कहानी लिखी है। आगे भी लिखती रहें।

kshama said...

Aapne padhvaa zaroor lee! Maine kaha tha na,ki,sar se leke pair tak shareer me dard rahta tha,lekin kahani ki kisht dekhte hi padhne ka pagalpan sawar ho jata! Ye to kahanikaar kee kimaya hai...kahanee ka tilism hai!

ashish said...

इतनी प्यारी कहानी हो तो , पाठक तो खिचे चले आयेंगे ही ना., वैसे आपकी भोजपुरी ज्ञान के बारे में लगी शर्त में transperency नहीं बरती गयी थी. हाहाहा , , लेकिन गाँव से दूर रहकर गाँव की आत्मा को आत्मसात कर लेना , वाह आप साधुवाद की पात्र है. बाकी मै अनुमान लगा सकता हूँ की आपकी अगली कहानी मुसली (मुसल नहीं) जड़ की तरह होगी जो पाठको को बांध कर रखती है. अब ओखली कौन है इस पर शिखा जी ही प्रकाश डाल सकती है..

रश्मि प्रभा... said...

tussi gr8 ho hi

राज भाटिय़ा said...

आप लिखती ही इतना अच्छा है कि हम वाह वाह किये बिना रह नही पाते. धन्यवाद

सारिका सक्सेना said...

अरे वाह एक और कहानी ! हम अभी से इन्तज़ार कर रहे है.. वैसे अच्छा लगता है दी आपके ब्लाग पर अपना नाम देखना, आप सभी को याद करके शुक्रिया कहना खूब याद रखती है।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

लिखती रहो, बस लिखती रहो इसी तरह, हम हैं न पढने के लिये :)

विनोद कुमार पांडेय said...

रश्मि जी.. आप की कहानी में बहुत सहजता होती है जो हर पाठक को आकर्षित करती है.. इन्हे पढ़ना एक सहज अनुभूति प्रदान करता है..हो सकता है कभी कभी समय की विवशता के वजह से हम त्वरित टिप्पणी ना कर पाएँ...उम्मीद है आगे भी हमें ऐसी भावपूर्ण और सुंदर कहानियाँ पढ़ने को मिलेगी.....धन्यवाद

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut hi achchhi kahani likhi gayi

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

वन्दना said...

रश्मि तुम लिखती जाओ हम तुम्हारे साथ हैं तो लिखवाते ही रहेंगे।

इस्मत ज़ैदी said...

आप को पढ़ कर बहुत मज़ा आता है रश्मि जी,लगता है अपने ही आसपास की, अपने ही गांव की कहानी है,कहानी नहीं बल्कि सच्चाई कहें तो ज़्यादा ठीक होगा
बहुत सहजता से आप पात्रों को उन के चरित्र में ढाल देती हैं और वे सजीव हो उठते हैं
रचना की सफलता पर बधाई स्वीकार करें

Mithilesh dubey said...

लिखते रहिए बढिया, बाकी हम तो आर्डर करते रहेंगे ।

Mired Mirage said...

लिखते रहिए। पढ़ने वाले तो हैं ही।
घुघूती बासूती

वाणी गीत said...

आपके लिखे को ध्यान से पढ़ा जाए तो लिखते समय और चौकस रहना पड़ता है , उत्साहवर्धन तो खैर होता ही है ...फिर तुम लिखती भी इतनी अच्छी तरह हो ...छोटी से छोटी बात को शामिल करती हो कहानी में कि सबको अपने नजदीक लगने लगती है ...
अब तो हमारी और अपेक्षा बढ़ गयी है ....लिखती रहो ...
बहुत सारी शुभकामनायें ..!

शोभना चौरे said...

जब पढ़ते थे तो ये वाक्य हिदी साहित्य में हमेशा पढ़ते थे की" साहित्य समाज का दर्पण होता है |"तब तो रट लेते थे जैसे जैसे समझ बढ़ी कुछ समझ में आने लगा की समाज में जो कुछ घटित होता है वही तो लिखा जाता है जिसमे कुछ कल्पना ,भाषा शैली ,और साहित्यिक विधाओ का समावेश होता है \आपकी कहानी सभी अपेक्षाओ पर खरी उतरी है |जिसमे हमने सबने अपने आपको पाया है |
बस आप लिखती रहे हम पढ़ती रहे |
शुभकामनाये

रेखा श्रीवास्तव said...

हाँ, रश्मि कहानी है ऐसी विधा की अगर उसमें घुस आकर जीने लगें तो उसके एक एक पत्र हमें जीवन में कहीं न कहीं देखने को मिल जाते हैं और फिर कहानियां सिर्फ कल्पना से नहीं उपजती उनका कोई आधार होता है हाँ उन्हें अपनी कल्पना के अनुसार हम जीवन देते जाते हैं, स्वभाव और कर्म में उन्हें वर्तमान और अतीत के चरित्रों के साथ साम्य स्थापित कर देते हैं. वैसे कहानी बहुत बहुत अच्छी रही. इसमें पृष्ठभूमि मायने नहीं रखती बल्कि सहज कहानी अधिक दिल को छू जाती है.
अब अगली कहानी के इन्तजार में ...................

manav vikash vigyan aur adytam said...

bahoot hi achha likha hai

MUFLIS said...

मैं ....
और क्या कहूं....
सभी पाठकों की टिप्पणियों
का अनुमोदन करता हूँ

Vijay Kumar Sappatti said...

HAMARI SHUBKAAMNAYE AAPKE SAATH HAI RASHMI JI , YUN HI LIKHTE RAHE ...

BADHAYI

VIJAY
आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

अच्छी कहानी.

शुभम जैन said...

Di, aaj kafi dino baad net per aayi to sabse pahle maan ka pakhi hi chek kiya dekha samapan kadi aa gyi hia lekin ye achcha hua ki abhi nayi kahani shuru nahi ki aapne warna mujhe ek saath kitna padna pad jata...aapki fan list to bahut lambi hai, besabri se intjaar hai aapki nayi kahani ka...

vikram7 said...

bahut hii achchha likhatii hae aap

indu puri said...

'कभी कभी कैसी विवशता हो जाती है, कहानी की मांग ही ऐसी होती है कि पाठकों को दुखी करने का अपराध अपने सर लेना पड़ता है.'
यही लिखा है न तुमने? दुष्ट लड़की! इसे'अपराध' कहती हो? पाठकों की आँखों से आंसूं बह निकले तो सोचो कितना मार्मिक लिखा है !
हास्य रचना पढते समय पाठक ना हँसे तो उसे लेखन की कमी कहा जायेगा. मैं बराबर तुम्हारी रचनाएँ पढ़ती हूं पर...समय की कमी या ना लिखने के मूड के कारण 'चलताऊ' टिप्पणी ही कर दूँ,ऐसा मैं नही कर पाती.
क्या करूँ ऐसीच हूं मैं तो.
इसमें कोई शक नही कि अच्छा ही नही बहुत अच्छा लिखती हो तुम.
यूँही खुश करने के लिए नही कह रही. मैंने गांवों को बहुत करीब से देखा है बाबु!
इलाहाबाद मे पैदा हुई बचपन वहीं बीता. पीहर ससुराल का दूर दूर तक गांवों से कोई वास्ता नही रहा.किन्तु जॉब गांवों मे करण पसंद किया. सलेक्शन होने के बावजूद दो-दो बार लेक्चररशीप ठुकरा दी.
अपनी ओर से जहाँ रही गाँव ,गाँव वालों और स्कूल के लिया खूब किया. कीचड भरी कच्ची सडको से होके गाड़ी रोड के किनारे किसी के घर दूकान के सामने खड़ी करके जाती.किन्तु जब भी ट्रांसफर 'लिया,उस गाँव की काया पलट चुकी होती थी.एनिकट,सदके.,सामुदायिक भवन,जरूरतमंदों की पेंस्हंस सब करवाती.किन्तु........ गाँव का वो भोलापन,सादगी,निश्छलता सब खत्म हो चुके हैं बेटा! शहरों से ज्यादा यह करप्शन,छल कपट,दाँव पेच,प्रपंच्बाजी है. जिन्हें करीब से देखोगी तो 'शोक्ड' हो जाओगी.
इसीलिए मुझे कहीं अंदर तक तुम्हारी कहानी के सत्य ने नही छुआ.
हाँ तुम्हारी शैली बहुत प्रभावशाली है इसमें कोई दो राय नही.
प्यार.
लिखती रहो. सत्य सुनने का साहस हो तो इंदु आंटी को बुलाना.
सत्य ना बोल कर हमारे ये ब्लोगर्स मित्र हमारा हित नही करते.
है ना?

indu puri said...

कभी कभी कैसी विवशता हो जाती है, कहानी की मांग ही ऐसी होती है कि पाठकों को दुखी करने का अपराध अपने सर लेना पड़ता है.'

ओह! कितना कुछ लिखा तुम्हारी इस पोस्ट और उस कहानी के लिए जाने कैसे डिलीट हो गया.

kshama said...

"Bikhare Sitare"pe aapki shukr guzaar hun!Zaroor dekhen!

रचना दीक्षित said...

बहुत सारी शुभकामनायें ..! अब अगली कहानी के इन्तजार, जल्दी ही शुरू कीजिये.