Wednesday, December 2, 2009

कैसा है, हमारे खिलाड़ियों का खान पान ??


एक बार लगातार चार दिन,मुझे एक ऑफिस में जाना पड़ा.वहां मैंने गौर किया कि एक लड़का 'लंच टाईम' में भी अपने कंप्यूटर पर बैठा काम करता रहता है, लंच के लिए नहीं जाता.तीसरे दिन मैंने उस से वजह पूछ ही ली.उसने बताया कि उसे कभी लंच की आदत, रही ही नहीं क्यूंकि वह दस साल की उम्र से अपने स्कूल के लिए क्रिकेट खेलता था.मुंबई की रणजी टीम में वह ज़हीर खान और अजित अगरकर के साथ खेल चुका है.(उनके साथ अपने कई फोटो भी दिखाए, उसने)क्रिकेट की प्रैक्टिस और मैच खेलने के दौरान वह नाश्ता करके घर से निकलता और रात में ही फिर खाना खाता.
उसने एक बार का वाकया बताया कि किसी क्लब की तरफ से खेल रहें थे वे.वहां खाने का बहुत अच्छा इंतजाम था. लंच टाईम में सारे खिलाड़ियों ने पेट भर कर खाना खा लिया और फिर कैच छूटते रहें,चौके,छक्के लगते रहें.कोच से बहुत डांट पड़ी और फिर से इन लोगों का पुराना रूटीन शुरू हो गया बस ब्रेकफास्ट और डिनर.
भारतीय भोजन गरिष्ठ होता है...पर उसकी जगह सलाद,फल,सूप,दूध,जूस का इंतज़ाम तो हो ही सकता है.पर नहीं ये सब उनके 'फौर्मेटिव ईअर' में नहीं होता,तब होता है जब ये भारतीय टीम में शामिल हो जाते हैं.

मैं यह सोचने पर मजबूर हो गयी कि सारे खिलाड़ियों का यही हाल होगा.क्रिकेट मैच तो पूरे पूरे दिन चलते हैं.अधिकाँश खिलाड़ी,मध्यम वर्ग से ही आते हैं.साधारण भारतीय भोजन,दाल चावल,रोटी,सब्जी ही खाते होंगे.दूध,जूस,फल,'प्रोटीन शेक' कितने खिलाड़ी अफोर्ड कर पाते होंगे.? हॉकी और फुटबौल खिलाड़ियों का हाल तो इन क्रिकेट खिलाड़ियों से भी बुरा होगा.हमारे इरफ़ान युसूफ,प्रवीण कुमार,गगन अजीत सिंह सब इन्ही पायदानों पर चढ़कर आये हैं.भारतीय टीम में चयन के पहले इन लोगों ने भी ना जाने कितने मैच खेले होंगे...और इन्ही हालातों में खेले होंगे.


क्या यही वजह है कि हमारे खिलाड़ियों में वह दम ख़म नहीं है?वे बहुत जल्दी थक जाते हैं...जल्दी इंजर्ड हो जाते हैं...मोच..स्प्रेन के शिकार हो जाते हैं क्यूंकि मांसपेशियां उतनी शक्तिशाली ही नहीं.विदेशी फुटबौल खिलाड़ियों के खेल की गति देखते ही बनती है.हमारा देश FIFA में क्वालीफाई करने का ही सपना नहीं देख सकता.टूर्नामेंट में खेलने की बात तो दीगर रही.हॉकी में भी जबतक कलाई की कलात्मकता के खेल का बोलबाला था,हमारा देश अग्रणी था पर जब से 'एस्ट्रो टर्फ'पर खेलना शुरू हुआ.हम पिछड़ने लगे क्यूंकि अब खेल कलात्मकता से ज्यादा गति पर निर्भर हो गया था.ओलम्पिक में हमारा दयनीय प्रदर्शन जारी ही है.

इन सबके पीछे.खेल सुविधाओं की अनुपस्थिति के साथ साथ क्या हमारे खिलाड़ियों का साधारण खान पान भी जिम्मेवार नहीं.??ज्यादातर भारतीय शाकाहारी होते हैं.जो लोग नौनवेज़ खाते भी हैं, वे लोग भी हफ्ते में एक या दो बार ही खाते हैं.जबकि विदेशों में ब्रेकफास्ट,लंच,डिनर में अंडा,चिकन,मटन ही होता है.शाकाहारी भोजन भी उतना ही पौष्टिक हो सकता है, अगर उसमे पनीर,सोयाबीन,दूध,दही,सलाद का समावेश किया जाए.पर हमारे गरीब देश के वासी रोज रोज,पनीर,मक्खन मलाई अफोर्ड नहीं कर सकते.हमारे आलू,बैंगन,लौकी,करेला विदेशी खिलाड़ियों के भोजन के आगे कहीं नहीं ठहरते.उसपर से कहा जाता है कि हमारा भोजन over cooked होने की वजह से अपने पोषक तत्व खो देता है. केवल दाल,राजमा,चना से कितनी शक्ति मिल पाएगी?

हमारे पडोसी देश पाकिस्तान में भी तेज़ गेंदबाजों की कभी, कमी नहीं रही.हॉकी में भी वे अच्छा करते हैं.खिलाड़ियों की मजबूत कद काठी और स्टेमिना के पीछे उनकी फ़ूड हैबिट ही है.
प्रसिद्द कॉलमिस्ट 'शोभा डे' ने भी अपने कॉलम में लिखा था कि एक बार उन्होंने देखा था ३ घंटे कि सख्त फिजिकल ट्रेनिंग के बाद खिलाड़ी.,फ़ूड स्टॉल पर 'बड़ा पाव' ( डबल रोटी के बीच में दबा आलू का बडा,मुंबई वासियों का प्रिय आहार) खा रहें हैं.इन
सबका ध्यान खेल आयोजकों को रखना चाहिए...अन्य सुविधाएं ना सही पर खिलाड़ियों को कम से कम पौष्टिक आहार तो मिले.

स्कूल के बच्चे 'कप' और 'शील्ड' जीत कर लाते हैं.स्कूल के डाइरेक्टर,प्रिंसिपल बड़े शान से उनके साथ फोटो खिंचवा..ऑफिस में डिस्प्ले के लिए रखते हैं.पर वे अपने नन्हे खिलाड़ियों का कितना ख़याल रखते हैं??बच्चे सुबह ६ बजे घर से निकलते हैं..लम्बी यात्रा कर मैच खेलने जाते हैं..घर लौटते शाम हो जाती है.स्कूल की तरफ से एक एक सैंडविच या बड़ा पाव खिला दिया और छुट्टी.मैंने देखा है,मैच के हाफ टाईम में बच्चों को एक एक चम्मच ग्लूकोज़ दिया जाता है, बस. बच्चे मिटटी सनी हथेली पर लेते हैं और ग्लूकोज़ के साथ साथ थोड़ी सी मिटटी भी उदरस्थ कर लेते हैं.बच्चों के अभिभावक टिफिन में बहुत कुछ देते हैं अगर कोच इतना भी ख्याल रखे कि सारे बच्चे अपना टिफिन खा लें तो बहुत है.पर इसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जाता.बच्चे अपनी शरारतों में मगन रहते हैं.और भोजन नज़रंदाज़ करने की नींव यहीं से पड़ जाती है.यही सिलसिला आगे तक चलता रहता है.

22 comments:

Udan Tashtari said...

पौष्टिक आहार तो बहुत जरुरी है मगर खिलाड़ियों को मिलने वाला प्रदेश स्तर पर भी भोजन भत्ता किसी साधारण होटल में साधारण सा खाना उपलब्ध करा दे तो भी बहुत. सोचना होगा सरकार को इस दिशा मे.

खुशदीप सहगल said...

रश्मि बहना,
अब समझ आया भारतीय टीम किसी किसी दिन इतनी खराब फील्डिंग क्यों करती है...क्यों कैच पर कैच छूटते हैं...

जय हिंद...

shikha varshney said...

thik kaha hai aapne ekdam yahi hota hai ....kaash sarkar kuch soch paye

'अदा' said...

रश्मि,
बहुत ही अच्छी जानकारी दी.....विश्व स्तर के खेलों में अगर हमें अपनी पहचान तरीके से बनानी है तो भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना ही होगा..
जानकारीपूर्ण आलेख...

vishnu-luvingheart said...

sach kaha.....cricket mein to fir bhi khiladiyon ko naam aur inaam dono milte hai..par anya khelon ke khiladi to wo sab kuch soch bhi nahi sakte.
humare krida mantriyon aur adhikariyon ka pet bharne ke baad hi to kisi khiladi ko kuchh khane ko milega...aur unka(krida mantriyon) pet to esa hai ki lagta nahi kabhi bharega.

Kusum Thakur said...

इस अच्छी सी जानकारी के लिए आभार !

रश्मि प्रभा... said...

waah......bahut achha bataya

सुलभ सतरंगी said...

खेल और खिलाड़ियों की शारीरिक स्थिति दयनीय है. फ़ुटबाल में इतना पीछे होना यही बताता है की हम कुपोषित बच्चों वाले देश से हैं.

-Sulabh Jaiswal

रंजना said...

Bilkul sahi kaha...sahmat hun aapse...

वाणी गीत said...

आपकी सजग दृष्टि ने खिलाडियों के खान पान पर भी नजर डाली है ...सामान्यतः इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता.....बहुत सार्थक लेख...आभार ..!!

निर्मला कपिला said...

बहुत सजगता से सोचती हैं खेल पर आलेखों मे कुछ पकड मजबूत है जो अन्दर की बात भी जानती हैं बहुत सही लिखा है शुभकामनायें

Mahfooz Ali said...

बहुत सार्थक लेख..... और जागरूकता से भरी है यह पोस्ट...... यह बात तो सही है कि हमारे खिलाडी पौष्टिक खाना अफोर्ड नहीं कर सकते..... इनका डाईट का ख्याल रखना तो सरकार का काम है..... विदेशों में यही है कि वहां का खान-पान सरकार देखती है.... और यहाँ सरकार अपना खान-पान देखती है........ अगर हमारे खिलाड़ी भी अच्छा खाएं....तो शायद अच्छा परफोर्म करने लगें...... और अच्छे खान-पान कि नींव स्कूल टाइम में ही डाल देनी चाहिए...... जो कि बहुत मुश्किल काम है...... यहाँ तो मिड-डे मील ही सरकार खा जाती है.......
--
www.lekhnee.blogspot.com

चंदन कुमार झा said...

बहुत सुन्दर आलेख । यह सब दर्शाता है कि अभी भी बहुत पिछड़े हुऐ है हम ।

कुश said...

waaki tarah to kabhi socha nahi tha maine.. khiladiyo ke perform nahi karne par narazgi to kai baar jatayi lekin is taraf kabhi dhyan hi nahi diya.. ki unki diet kya hoti hogi..

wakai ek informative post hai ye.. aur chhoti bhi :)

Ashish said...

Tathya purn AAlekh. Jaha tak shariraik kshamta ki bat hai khan pan ke sath jalwayu ka bhi anshik prabhav hota hai.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जानकारी और सीख का संगम है,
आपकी यह पोस्ट!
बधाई!

HARI SHARMA said...

रश्मि जी हमारे यहा खेल एक रश्म है जीवन का हिस्सा नही हा़ जिन्दगी खुद भी एक खेल ही है.

पर क्या करे एक तो ये कि क्रिकेट जैसे खेल हमारी जीवन शैली से मेल नही खाते बल्कि ये हमे और बहुत सी बुराइयो की तरक अन्ग्रेज दे गये है.

जिस देश की एक बडी आबादी एक समय भोजन करती हो और उस भोजन मे पौष्टिक भोजन की बात तो सिर्फ़ दिवा स्वप्न है फिर कैसे सोचे कि सभी खेलने वालो को मिल जायेगा. बात घूम फिरकर आपके ही पिछले आलेख पर आ जायेगी पढाई जरूरी है या खेल.

समाधान या तो सरकार के हाथो मे है या कारपोरेट घरानो के हाथ मे. देखे कुछ होता है या नही क्योकि पहले भी तो राजे महाराजे ही खेलो पे ध्यान देते थे.

गौतम राजरिशी said...

आपका सब्जेक्ट-चुनाव हमेशा मुझे अचंभित करता है। खुद भी एक स्पोर्टस-मैन रहा हूं औत हमारी ट्रेनिंग एकेडमी में प्रशिक्षण के दौरान ऐसे अनगिनत मौके आते थे जब हमारा लंच स्किप हो जाता था....सारी यादें उभर आयीं अभी।

हमेशा की तरह एक अनूठा और हटकर के आलेख!

boletobindas said...

rashmi ji ..... baki baat theek hai.....brazil kiyo football me aage hai....????????? plz batayega

चण्डीदत्त शुक्ल said...

रोचक और सार्थक.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक और सही लिखा है आपने ...शुक्रिया

Mithilesh dubey said...

बढिया और सटीक लिखा है आपने ।