Tuesday, September 29, 2009

विसंगतियां ज़माने की

खुशियाँ बिखेरता,प्यार लुटाता नवरात्र चला गया. अगले वर्ष इसके आगमन का सबको बेसब्री से इंतज़ार रहेगा और इस इंतज़ार में शामिल रहेंगी कुछ 'डिटेक्टिव एजेंसियां' भी. क्यूंकि नवरात्र में उनका बिजनेस चरम सीमा पे होता है.पहले पहल यह खबर पढ़कर मैं हैरान रह गयी थी कि गुजरात में संपन्न माता-पिता अपने बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गुप्तचर संस्थाओं का सहारा लेते हैं.मुंबई और गुजरात में नवरात्र में गरबा और डांडिया की धूम रहती है. देर रात तक किशोर,किशोरियां अपने दोस्तों के साथ डांडिया खेलने जाते हैं.मुंबई में तीन साल पहले सार्वजनिक रूप से रात १० बजे के बाद तेज़ संगीत बजाने पर पाबंदी लगा दी गयी है.इस से नवरात्रि कि रौनक तो फीकी पड़ गयी है पर मुंबई के अभिभावक चैन की नींद सोने लगे हैं.

लेकिन गुजरात में चैन की नींद सोने के लिए अभिभावक हजारों रुपये खर्च कर गुप्तचर नियुक्त करते हैं जो उनके बच्चों के कार्यकलापों पे नज़र रखते हैं और सारी जानकारी माँ-बाप को मुहैया करवाते हैं.इस वर्ष तो एक नए सॉफ्टवेर के ईजाद ने इनकी मुश्किल कुछ और आसान कर दी है.इस सॉफ्टवेर को मोबाइल में इंस्टाल करने पर,किस नंबर पे फ़ोन किया गया,किस नंबर से रिसीव किया गया,फोन की लोकेशन क्या है....सब पता चल जाता है.यह अभिभावकों में बहुत ही लोकप्रिय हो गया क्यूंकि इस सॉफ्टवेर की कीमत ५००रुपये और इंस्टाल करने की १००० रुपये है जबकि गुप्तचरों की फीस ५०००रुपये से १०.०००० तक होती है.

पर मन यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर ऐसी नौबत आयी ही क्यूँ? माँ-बाप को इतना भी भरोसा नहीं, अपने बच्चों पर ?और अगर भरोसा नहीं है तो फिर उन्हें देर रात तक बाहर भेजते ही क्यूँ हैं? बच्चों को वो जाने से नहीं रोक पाते यानि कि बच्चों पर उनका वश भी नहीं.
जाहिर है उनकी परवरिश में कोई कमी रह गयी.अच्छे संस्कार नहीं दे पाए.अच्छे बुरे को पहचानने कि समझ नहीं विकसित नहीं कर पाए. वे अपने काम में इतने मुब्तिला रहें कि बच्चे नौकरों और ट्यूशन टीचरों के सहारे ही पलते रहें.उन्हें अच्छी बातें बताने,उनकी परेशानियां सुनने, उनकी उलझने सुलझाने का वक़्त ही नहीं रहा उनके पास.और जब आज बच्चे पहुँच से बाहर हो गए हैं ,तो वे गुप्तचरों का सहयोग लेने पर मजबूर हो गए हैं.यह कहीं उनकी बड़ी हार है.

और ये गुप्तचर या नया सॉफ्टवेर भी उनकी कितनी मदद कर पाएंगे??अगर बच्चे समारोह में न जाकर किसी दोस्त के यहाँ या कहीं और चले जाते हैं तो गुप्तचर इसकी सूचना उनके माता पिता को दे देते हैं.नया सॉफ्टवेर भी सिर्फ कॉल डीटेल्स और लोकेशन ही बता सकता है.कुछ अघटित घटने में समय ही कितना लगता है.?उसे रोका तो नहीं जा सकता.हाँ, पूरा ब्यौरा पाकर माँ बाप बच्चों से जबाब तलब जरूर कर सकते हैं.बच्चों ने भी 'तू डाल डाल ,मैं पात पात' के अंदाज़ में नयी तरकीबें खोज निकाली. एक लड़की ने कहा,वो घर से बाहर जाते ही अपना इंस्ट्रूमेंट ही बदल देती थी .एक लड़का बहाने से अपना फोन घर पे ही छोड़ देता था.

इन सबसे तो बेहतर है कि माता पिता चाहे कितने भी व्यस्त हों,कुछ क्वालिटी टाइम निकालें.उनके साथ कुछ समय बिताएं,उन्हें अच्छे,बुरे की पहचान करने में मदद करें.उनमे इतना आत्मविश्वास जगाये,उनके चरित्र को सुदृढ़ बनाने की कोशिश करे ताकि वे किसी भी स्थिति का सामना कर सकें और किसी भी स्थिति में खुद पर संयम रख सकें.

मुंबई में जन्मी,पली,बढ़ी मेरी कई सहेलियां बताती हैं कि वे लोग नवरात्रि के दिनों में डांडिया खेलकर सुबह ४ बजे घर आया करती थीं.साथ में होता था कालोनी के लड़के ,लड़कियों का झुण्ड. उन सबके माता पिता ने उनपर कैसे विश्वास किया?...लोग कहेंगे अब ज़माना खराब है.पर ज़माना हमसे ही तो है. इस ज़माने में रहकर ही,खुद को कैसे महफूज़ रखें, अपना चरित्र कैसे सुदृढ़ रखें,अपने संस्कारों को न भूलें.यह जरूरी है न कि किसी गुप्तचर के साए की दरकार है.

मेरे पड़ोस की मध्यम वर्ग की दो लड़कियां २० साल की कच्ची उम्र में उच्च शिक्षा के लिए विदेश गयी हैं.कभी लिफ्ट में मिल जातीं तो हलके से मुस्करा कर हेल्लो कहतीं.स्मार्ट हैं, पर कभी उन्हें उल्टे सीधे फैशन करते या बढ़ चढ़कर बांते करते नहीं सुना.मैं सुनकर चिंता में पड़ गयी थी,वे लोग वहां अकेले कैसे रहेंगी? पर उनके माता पिता को अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा है.

एक बार टी.वी.पर यह खबर देखी कि आजकल बच्चे भी अपने माता पिता की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गुप्तचरों का सहारा लेने लगे हैं.गुप्तचर संस्था के संचालक बता रहें थे कि बेचारे बड़े दुखी मन से कभी माँ के तो कभी अपने पिता क अफेएर का पता लगाने आते हैं.यह स्थिति तो और भी शर्मनाक है.

शायद यही सब देख किसी शायर मन ने कहा...."ये पत्थरों का है जंगल,चलो यहाँ से चलें
हमारे पास तो, गीली जमीन के पौधे हैं"

6 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बढ़िया भावपूर्ण पोस्ट . वैसे गरबे पर रात्र दस के बाद प्रतिबन्ध लगाना कोई बुरी बात है . यदि कोई भी कार्य अनुशासित ढंग से किया जाए तो उसके परिणाम शुभ होते है .

mamta said...

well said.It's amazing how you can instantly write about things we mildly feel concerned about.This news of mobile spying made me wonder,is this the solution?Aren't the tech savvy children today much smarter to be stopped by just mobile spying?You have very well presented the unease most of us feel.

Ashish said...

Mother Teresa ne kaha tha"kind words can be short and easy to speak, but their echoes are truly endless".humare samaj me paarivarik vightan aur ek dusre par sandeh ki bhavna ke vikas par, apke vichar acche lage. samajik kuritiyo par pratighat aaj ki nitant jarurat hai. Mamta ji ka ye kahna satya hai ki lekhika kisi bhi sam samyik vishay par likh sakti hai..kisi bhi jwalant vishay par likhne ki jijivisha acchi lagi.Lekin rashmi ji wo spy software mujhe chahiye apne boss ki location pata karne ke liye.

raj said...

apne bacho pe brosa hota hai...duniya pe nahi...achhi lagi post...

रेखा श्रीवास्तव said...

aja ki tej bhagati jindgi aur MNC ki samskriti ne bachchon ko sanskar dene ka vakta hi kahan mil pata hai, aane vali paudh kitane sanskaron ke lekar aa rahi hai yah vakta hi batayega. lekin ye bachchon par vishvas na karana shayad hamari hi kamajori ka parinam hai. vishvas dekar hi sadaiv vishvas milta hai.

चण्डीदत्त शुक्ल said...

माता-पिता सही करते हैं या गलत...इस पर क्या कहें! उनकी नज़र में तो ऐसी पाबंदियां सही ही होंगी। वैसे, आपने बहुत ज़रूरी विषय पर गंभीर बहस की है, इसके लिए बधाई।