Friday, September 25, 2009

सच से कैसे आँखें चुराएं ??

मेरे कुछ दोस्तों को मेरी लिखी कहानी तो अच्छी लगी ,पर उनका कहना है, यह इतनी दुखभरी क्यूँ है?...एक शायर की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं.उन्हें यहाँ कहना इसलिए भी जरूरी है,क्यूंकि मेरी दूसरी पोस्ट देखकर भी मेरे दोस्त यही सवाल दुहारायेंगे.....

गुल की, खुशबु की, फिजा की बात करते हो
अमां तुम किस वतन के हो,कहाँ की बात करते हो
भूले से भी न करना चर्चा, कभी इन सिसकती हवाओं का
अगरचे लौट भी जाओ ,जहाँ की बात करते हो

खैर, तस्वीर इतनी भी बुरी नहीं. चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, हम सबको ख़ुशी के दो पल चुरा लेना बखूबी आता है और यही जीवन है.जबतक दुःख का स्वाद न चखें, ख़ुशी कितनी लजीज है ,इसका पता कैसे लगेगा?? दुःख किसी न किसी रूप में हर एक के जीवन में आता ही है,इस से आँखें तो नहीं चुरा सकते हम. इसे दवा की कड़वी घूँट की तरह निगलना ही पड़ता है.

हिमांशु एवं ममता इतना निराश होने की जरूरत नहीं ..क्या पता कथानायक को इस से भी अच्छी नौकरी मिल जाए और उसके जीवन में रूपा जैसी किसी लड़की का आगमन भी हो जाए. दुःख या सुख कुछ भी चिरस्थायी नहीं पर हाँ अवश्यम्भावी जरूर हैं. खुद के बारे में यही कह सकती हूँ,शायद मैं ख़ुशी एन्जॉय करती हूँ और दुःख गहराई से महसूस करती हूँ.इसीलिए रचनाओं में वह झलक जाता है.सायास कभी कुछ नहीं लिखा.दिल ने जो कहा कलम ने बात मानी,दिमाग को बीच में आने ही नहीं दिया.
प्रस्तुत है इस बार मेरी लिखी कुछ पंक्तियाँ

"लावारिस पड़ी उस लाश और रोती बच्ची का क्या हुआ,
मत पूछ यार इस देश में क्या क्या न हुआ

जल गयीं दहेज़ के दावानल में, कई मासूम बहनें
उन विवश भाइयों की सूनी कलाइयों का क्या हुआ

खाकी वर्दी देख क्यूँ भर आयीं, आँखें माँ की
कॉलेज गए बेटे और इसमें भला क्या ताल्लुक हुआ

तूफ़ान तो आया बड़े जोरों का लगा बदलेगा ढांचा
मगर चाँद पोस्टर,जुलूस और नारों के सिवा क्या हुआ

हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दिल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ

जब जब झलका आँखों में व्यर्थ सा पानी 'रविजा'
कलम की राह बस एक किस्सा बयाँ हुआ

16 comments:

कमलेश शर्मा said...

रश्मि जी, बहुत खूब कहा आपने, पिछले साठ वर्षों से इसी पीड़ा को भुगत रहे हैं भारतवासी और शायद अगले और पचास वर्षों तक इसी को भुगतना होगा।

हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दिल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ

अब इनकी याददाश्‍त को लौटाने के लिए क्‍या किया जाए यह भी भारतीय मतदाता को ही सोचना होगा।

आपके ये विचार भी बड़े उमदा किस्‍म के हैं कि

तूफ़ान तो आया बड़े जोरों का लगा बदलेगा ढांचा
मगर चाँद पोस्टर,जुलूस और नारों के सिवा क्या हुआ
हर पांच वर्षों के बाद यही नजारा आम हो जाता है और एक बार दोबारा हम उसी अच्‍छे की कामना से इन्‍हीं ़़़़़़ लोगों को ही चुन लेते हैं।
लगे रहो ।

Mamta said...

I stand humbled.I don't think I'm ever going to complain about the sad endings now.But you speak like a writer,I speak like a layman.Maybe there is negativism around but still people cannot wait to laugh, to enjoy and to appreciate the beauty of life.Har kaali raat ke baad hi subah hoti hai.

कुश said...

उजाले का कद भी अँधेरे से ही बढ़ता है.. मन का पाखी ऐसा ही होता है कभी रोमांटिक हो जाता है तो कभी सेंटी.. अपने बस में रहा ही कब है जो रहेगा..
आँख बंद कर लेने से सच भी कहाँ छुपते है.. आपकी लिखी पंक्तिया बहुत ही उम्दा है..

Vibha Rani said...

blog ka layout achछ्a hai, magar itana gahara rang ham jaise buddhon ko padhane me taklif deta hai. likhate raho.
yah bahut bada chakkar hai ki har bar comment likhne se pahale profile select karo aur sari formality nibhate jao. its time taking process.

Ashish said...

Aisa Lagta hai jaise lekhika, hindi lekhan ki har vidha me parangat hai aur bhasa par unki pakad bhi sarahniya hai. mai lekhika se sahmat hoo ki harsh aur vishad , dono jeevan ke abhinna aang hai aur is vishay par bahas gunijano ka kam hai.aur ha vibhaji ki salah par jarur gaur kare.

डॉ .अनुराग said...

उड़ने दीजिये इन ख्यालो को ...लगाम देंगी तो फिर कोई जमीर मन को मनायेगा ....

hemanshujoshi said...

WOW! Very nice poem.

Again I repeat, you are very high on EQ, over and above that you have strong power to express your emotions with right choice of words, which rarely people have.

However, after reading this blog entry, I asked myself- what is my take away from this write up? It is similar to many stories of the today's newspaper, showing pain and devastation.

I feel, you have wasted the immense power of your words in tears and sadness, which you could have easily used to help many of us and many more to unleash our "Man Ka Pakhi" in some form or the other.

GATHAREE said...

जो दुःख महसूस नहीं करेगा
वो सुख का महत्व नहीं समझ सकता

raj said...

खैर, तस्वीर इतनी भी बुरी नहीं. चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, हम सबको ख़ुशी के दो पल चुरा लेना बखूबी आता है ..yahi do pal chihye bas....achhi lagi post...

चण्डीदत्त शुक्ल said...

अदम गोंडवी ने भी लिखा था...जुल्फ अंगड़ाई तबस्सुम चांद आईना गुलाब...भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब...क्या करे पाखी, ग़र दुनिया ऐसी ही है...। वादाख़िलाफ़ नेताओं की कलई खोलने और विसंगतियों का ऐसा ख़ूबसूरत चित्रण करने के लिए बधाई...ऐसे ही लिखती रहें और मन के पांखी को उड़ने से ना रोकें...भले ही कोई कितना टोके...।

Udan Tashtari said...

बेहतर है-दिमाग पर लगाम कसे रहिये. वो बीच में आया तो शब्दों की रवानी खो जायेगी. बहुत खूब!

दिलीप कवठेकर said...

आपके खयालात अच्छे लगे.

जीवन खुशियों और ग़मों का एक रोलरकोस्टर है, जिसमें बैठ कर हमें उठना और उतरना होता है, अपने अपने प्रारब्ध के अनुसार. इसके नियंत्रण का हमारे हाथ में होना यह हमारी गलतफ़हमीं हो सकती है. मगर इससे समदर्शी हो कर, स्थितप्रग्य हो कर इससे रस प्राप्ति करना ही जीवन का यथार्थ है.सकारात्मकता का यही निचोड है.

vaishali said...

Remarkable outstanding amazing words i am speechless keep going rashmi aap sahi disha me jaarahe ho peeche mudne ki galti mat karna ab,waise raste me kaafi kaante milenge jaroor aur nindaa bhi hogi par tum mat dhagmagana bus chalte rehna isika naam safalta hai aur yehi zindagi hai .........all the very best n well written beautiful thoughts tc

hemanshujoshi said...

Rashmi Ji

From these comments I can see your transition from an emotional writer to an aggressive writer. It appeared to have brought out the versatility in you :)

It depends, how you accept your reader's comments. You can take them as positive criticism and take a lead to experiement with more ideas and thoughts. With due respect to you and the an excellent writer in you, my comments were only to see you a better writer than what you are already. It is entirely your choice about what you want to write. After all it is your blog. You can choose to make people smile for the entire time they are in your blog or add to their woes, worries and tears.

Again, with due respect to those who are unable to comprehend my writing, I prefer to write in English on the computer, as this more convenient to me. It is definitely not to show off my language skills to any one. As and when time permits, I would certainly like to write in Hindi and make good use of google translation for that.

Regarding the books, where you have sadness and pain, no doubt they are wonderful stories and beautiful books. I will read them when I have exhausted all the moments and opportunities to be happy and there is nothing more left to look forward in life. At the moment I want to read things - where the life is beautiful, where there is a hope of a bright future, which can allow me to dream and show me ways to actualize those dreams.


Happy writing!!!

thatsfine said...

कमाल का लिखा है ये कडूवा सच ......

"तूफ़ान तो आया बड़े जोरों का लगा बदलेगा ढांचा
मगर चाँद पोस्टर,जुलूस और नारों के सिवा क्या हुआ

हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दिल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ "

Yatish Jain said...

पहली बार आपकी रचनाये पढ़ी, बहुत ही अच्छी लगी.
कुछ मिलता हुआ सा यहाँ भी देखें.
http://indiagaze.blogspot.com/

yatishjain.com