Tuesday, August 31, 2010

आँखों का अनकहा सच

(ये  वो कहानी नहीं, जिसका जिक्र मैने अपनी पिछली पोस्ट  में  किया था....वो तो किस्तों वाली होगी...कुछ दिन चलेगी....यह भी थोड़ी लम्बी तो है..पर एक पोस्ट में ही समेट दिया है )


दोनों बच्चे शोर कर रहें हैं...आपस में कुछ ना कुछ बहस झगडा चल रहा है...शालिनी  मुश्किल से उन्हें, आँखें दिखा कर  चुप कराती है ,उसकी तो सारी इन्द्रियाँ सिमट कर बस कान बन गए हैं...फ्लाईट के पायलट का नाम अनाउंस होने ही वाला है....और धड़कन एक पल को रुक जाती है...और फिर थकी सी ठंढी सांस वापस निकल जाती है...उसका नाम नहीं था...पता नहीं कभी यह रुकी सांस उल्लासित होकर बाहर आएगी भी या नहीं. वापस शिथिल हो कर सर पीछे को टिका देती हैं...बच्चों का झगड़ना फिर शुरू हो गया है...करने दो...एयर होस्टेस अभी आँखें दिखायेगी  तो खुद ही चुप हो जाएंगे.

जब से यहाँ वहाँ  से उड़ती हुई खबर उसके कानों तक पहुंची है कि मानस ने डोमेस्टिक एयरलाइन्स   ज्वाइन की है.हर बार कैप्टन का नाम ध्यान से सुनती है कि शायद वही हो जबकि उसे पता भी नहीं कौन सी एयरलाइन्स ज्वाइन की  है. एयरपोर्ट पर भी बच्चे और ट्रॉली  संभालते भी खोजी निगाहें दौड़ती रहती हैं. और लगता अभी किसी तरफ से मानस का हँसता चेहरा सामने आ जायेगा. हर सोशल नेट्वर्क पर भी उसे ढूंढ्ने की कोशिश की पर निराशा ही हाथ आयी.पर क्यूं, किसलिए  उसे ढूँढने  की कोशिश कर रही थी?? यह सवाल खुद से भी कई बार पूछ चुकी पर जबाब कोई नही मिलता.

और अपनी बेवकूफी पर हंस भी पड़ती है...मानस का  छठी कक्षा वाला चेहरा ही सबसे पहले ध्यान में आता है...जब वह पहली बार उस पर इतना हंसा था...पर तब तो वह कित्ता  रोई थी.

इंग्लिश के नए टीचर आए थे.आते ही डस्टर पटका और रौबीली आवाज़ में, सबको नोटबुक निकालने को कहा. फिर बहुत सारे कठिन ग्रामर के लेसन दिए हल करने को. सबकी  कापियाँ  जमा कर लीं चेक करने के लिए.. उनसे डर तो गए थे सब पर कितनी देर शांत रह पाते.देर शांत रहते..धीरे धीरे बातें शुरू हो गयीं.शालिनी,  रीता और शर्मीला भी सर जोड़े नई फिल्म की कहानी सुनने लगीं जो पिछले हफ्ते ही शर्मीला अपने नए जीजाजी  और दीदी के साथ देख कर आई थी. उसे कितनी कोफ़्त होती...वो क्यूँ सबसे बड़ी है? उसकी भी कोई बड़ी दीदी होती तो वो भी शर्मीला जैसी  उनलोगों के साथ फिल्म देखकर आती और कहानियाँ सुनातीं.पर अभी तो बस सुननी पड़ती थीं. बेच बीच में सर के चिल्लाने कि आवाज़ आती रहती.पर वे लोग तो इतना धीरे बोल रही थीं. सर शायद पीछे बैठे लड़कों पर नाराज़ हो रहें थे .अचानक जोर का एक चॉक  का टुकड़ा उसके सर से टकराया.उसने सर उठाया..और सर चिल्ला पड़े,"क्या गपाश्टक हो रहा है...चलो बेंच पर खड़ी  हो जाओ" तब , इंग्लिश के सर भी हिंदी में ही बाते करते थे और कई बार तो लेसन भी हिंदी में ही एक्सप्लेन कर जाते. उसे तो काटो तो खून नहीं. आजतक कभी डांट भी नहीं पड़ी और सीधा बेंच पर खड़ी हो जाओ. वो  हतप्रभ मुहँ खोले देखती रहीं तो फिर से चिल्लाये..."मुहँ क्या देख रही हो....स्टैंड अप ऑन द बेंच (इस बार अंग्रेजी  में बोले)

वो सर झुकाए खड़ी हो गयी. और आँखों से धार बंध चली. पूरा क्लास सकते में था.इसलिए नहीं कि सर चिल्ला रहें थे.इसलिए कि वह बेंच पर खड़ी  थी. सारे बच्चे ,मुहँ खोले उसे देख रहें थे.
सर, वापस कॉपियाँ चेक करने में लग गए थे.एक एक कॉपी चेक करते...बच्चे का नाम पुकारते...उस बच्चे को  डांटते  और फिर कॉपी उसकी तरफ फेंक देते. किसी ने अच्छा नहीं किया था. यह देख उसका रोना और बढ़ता जा रहा था .अब सर के सामने उसकी कॉपी थी. उनका बडबडाना बदस्तूर चालू था..."कोई भी  नहीं पढता...किसलिए स्कूल आते हो तुमलोग"...फिर माथे पर चढ़ी भृकुटी थोड़ी शिथिल हुई.."अँ.. ये तो सही हैं....हम्म ये भी सही है...ओह ये भी सही है.."अब आश्चर्य का भाव था,चेहरे पर...."हम्म क्या बात है...ये भी राईट..हम्म..पंद्रह में से बारह राईट..." अब थोड़ी सी मुस्कान तिर आई थी उनके चहरे पर....नाम देख पुकारा..."शालिनी कौन है ?" वो चुप रही.

" हू इज शालिनी?" (फिर से अंग्रेजी पर आ गए )

इस बार मानस  ने हँसते हुए कहा..'सर वो जो बेंच पर खड़ी रो रही है,ना..वही है शालिनी"

"ओह्ह!! सिट डाउन..... सिट डाउन...ले जाओ अपनी कॉपी...गुड़, यू हैभ  डन बेल "

वो उतर तो गयी थी...पर इतने अपमान के बाद कॉपी लेने नहीं गयी. वे स्वर को कोमल बना कर

बोले.."ले जाओ अपनी कॉपी"

वो भी हठी की  तरह खड़ी रही.

इस बार मानस उठ कर बोला.."सर मैं दे आऊं??" और हंस पड़ा.

"क्यूँ..."

"ही ही ही.. वो नहीं जा रही ना..."

"तुम्हार क्या  नाम है?...."

"मानस"

"कितने नंबर  मिले तुम्हे?"

"पांच"..मुस्कराहट अब भी वैसे ही जमी थी उसके चहरे पर.

"और हंस रहें हो..शर्म नहीं आती...खड़े हो जाओ बेंच पर..."डांट कर कहा ...और फिर उसी स्वर में उसे भी बोला.."ले जाओ आपनी कॉपी.
सहम  कर वो चुपचाप अपनी कॉपी ले आई.पर मानस बेंच पर खड़ा भी हँसता ही रहा.

घंटी बजी और सर के जाते ही,सब भाग लिए दरवाजे की तरफ. अंतिम पीरियड था. वो शर्म से सर झुकाए,धीरे धीरे बढ़ रही थी कि आवाज़ आई 'रोनी बिल्ली" खूनी आँखों से देखा तो मानस और उसके चार-पांच शैतान  दोस्त हंस रहें थे. बस वहीँ विष बेल के बीज पड़ गए.
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फिर तो मानस कोई मौका नहीं छोड़ता, उसे चिढाने का. उसी की  कॉलोनी में चार घर छोड़ कर रहता था. साथ खेलने  वाले सारे बच्चों को पता चल गया था. उसे बेंच  पर खड़े होने की सजा मिली थी और वह रोई थी. खेल में भी मानस इतना तंग करता कि वह रो ही देती. लुक्का-छिपी खेलते तो पता नहीं कहाँ , छुपा रहता और फिर उसे धप्पा कर देता...बार-बार उसे ही चोर बनना पड़ता अंत में तंग आ वह रो देती.तो फिर उसे चिढाने का बहाना  मिल जाता. कोई भी खेल शुरू करने के पहले कहता..'मैं नहीं खेलता, हारने पर लोग रोने लगते हैं..."

सबकी आँखें उसकी तरफ उठ जातीं. फिर सब मानस को मनाने में लग जाते और शालिनी गुस्सा पीते हुए खुद में ही सिमट जाती.

वह उसे गुस्से मे घूरती और वह दाँत दिखाता रह्ता.पर इस बार गुस्से मे घूरने की बारी मानस की थी जब सिक्स मंथली  एक्ज़ाम मे वह फ़र्स्ट आई थी और मानस को बहुत कम नम्बर मिले थे. हर शाम की तरह वह शोभा के साथ, बाहर घूम रही थी. मानस के घर के सामने से गुजरते हुए, शोभा ने बताया कि आज अचानक वह मानस के घर गयी तो देखा, चाची मानस  को आंगन में दौडा दौडा कर मार रही हैं और बोलती जा रही हैं "वह लड़की होकर भी फर्स्ट आ गयी ...इतने अच्छे नंबर लेकर आई...और तुम मुश्किल से पास हुए...अब भागते किधर हो?."
 उस दृश्य की  कल्पना कर वह दोनो हंस पड़ीं..उसी  वक्त मानस घर से बाहर आ गया. दोनो अचकचा कर चुप हो गयीं पर मानस  समझ गया कि वे दोनों  उसी पर हंस रही थीं. उसे इतने गुस्से से  घूरा  कि अगर किसी देव ने कभी प्रसन्न होकर उसे  कोई वर दिये होते तो वो वहीं भस्म हो जाती. उस विषबेल पर अब पत्ते निकल आये थे.

और अब माँ की मार का बदला वह रोज उसे स्कूल में तंग कर के लेता. अक्सर इंग्लिश टीचर उसे रीडींग डालने को बोलते और मानस जोर से चिल्ला कर बोलता, "सर सुनायी नहीं दे रहा". कभी कभी तंग आ कर टीचर, उसे, शालिनी की  बराबर वाली बेन्च पर बिठा देते, तब भी वह बाज नहीं आता. कान को हाथ की ओट मे लेकर सुनने की एक्टिंग करता.सारा क्लास मुँह छुपा कर हंसता रह्ता.और शालिनी का  ध्यान भंग हो जाता. अगर टीचर ,उसे बोर्ड पर कोई सवाल हल करने को देते तब भी चिल्लाता, "सर कुछ दिखाई नहीं दे रहा." वह उचक उचक कर और बडा लिखने की कोशिश करती और इस चक्कर मे सब टेढा मेढा हो जाता.

उसे बस आश्चर्य इस बात का होता, इतनी शैतानी करने पर भी सारे टीचर उसे इतना  मानते कैसे थे? ऑफिस  से रजिस्टर लाना हो, किसी को बुलाना हो, हमेशा मानस को ही बुलाते. शायद रेस मे हमेशा जीतता था, इसी लिये. स्पोर्ट्स डे के दिन मानस का ही बोलबाला रह्ता.सौ मीटर, चार सौ मीटर रेस, लौन्ग जम्प, हाई जम्प, सब मे वह ढेर सारे कप्स जीतता. अपने लाल हो आए चेहरे से पसीना पोंछते ,वह उसे एक बार गर्वीली नज़र से जरूर देख लेता.वो मुहँ घुमा  लेती. बाकी सब तो"माss नस ...माss नस"  का नारा  लगाते, रह्ते, उसे बधाई देते.शर्मीला,,रीता, मीना  सब जातीं , पर वो दूर ही  खडी रह्ती. मानस तो कभी उस से बात भी नहीं करता,और इतना परेशान करता वो क्यूं जाये बधाई देने? विष-बेल अब बढती जा रही थी.

धीरे धीरे मानस ने शाम को उन सबके साथ खेलना छोड दिया. अब वह मैदान में बडे बच्चों के साथ क्रिकेट और फ़ुटबाल खेलने जाता.क्लास पर क्लास बढते गये पर स्कूल मे तंग करना वैसे ही जारी रहा. मानस की ड्राईंग बहुत अच्छी थी,जबकि,उसकी कम्जोर. फिज़िक्स के ड्राईंग तो वह फिर भी कर लेती पर बायोलोजि के ड्राइंग मे उसकी जान निकल जाती. कुछ भी ठीक से नहीं बना पाती. जब प्रैक्टिकल बुक जमा होती करेक्शन के लिये, वह सोचती बस मानस की नज़र ना पड़े,पर मानस किसी न किसी की बुक ढूंढ्ने के बहाने देख ही लेता और देख कर उपहास के ऐसे ऐसे मुहं बनाता कि उसकी झुकी गर्दन शर्म से और झुक जाती.

फ़ेयरवेल के दिन परम्परानुसार सबने साडी पहनी, उसे देख्ते ही मानस बोला, "कोई शादी है क्या...लोग इतना सज धज कर आ रहे हैं." उसका सारा तैयार होना व्यर्थ हो गया.

और इसी डर के मारे, कौलोनी मे अनीता दी की शादी मे जब उसने सब की ज़िद पर साडी पहनी तो पूरे समय मानस के सामने पडने  से बचती रही. एक बार जब एकदम से सामने आ गया तो उसने जल्दी से मुहँ फ़ेर लिया.और वह धीमे से उसे सुना कर बोलता चला ही गया,"पता नहीं इतना घमंड किस बात का है?"

शालिनी सोचती रह जाती , कब किया उस ने घमंड? फ़र्स्ट आना क्या घमंड करने जैसा है? अब वह उसकी खुशी के लिये फ़ेल तो नहीं हो सकती. और उस ने मुहँ बिचका दिया.खाता रहे जितनी मार खानी हो अपनी माँ से. उसकी बला से.

वह गर्ल्स कॉलेज में  आ गयी तो मानस से पीछा छूटा.पर कहीं उसके तानों की इतनी आदत पड गयी थी कि क्लास मे सब सूना सूना  लगता. मानस के घर के बिल्कुल बगल मे एक शर्मा अंकल ट्रांस्फ़र हो कर आये थे.उनकी तीन लड्कियाँ थीं, तीनों का मानस के घर मे आना जाना था. उनसे हमेशा मानस को हँस कर बातें करते देखती तो आश्चर्य होता, उसे तो लगता था, मानस को लड़कियों  से     ही चिढ है.पर उसे क्या, जिस से मर्जी हो उस से बात करे.

एक बार शर्मा अन्कल के यहाँ गयी थी, बाहर ही उनकी बेटी निशा मिल गई, वो ऊन की सलाइयाँ, मानस की माँ को देने जा रही  थी. उसे भी कहा, "चल मेरे साथ"

"मैं नहीं जाती मानस के यहाँ"

"क्यूँ?"

"ऐसे ही उस के यहाँ कोई लडकी भी नहीं."

"तो क्या हुआ...वो तो तुम्हारे ही क्लास मे था,स्कूल मे?...पर तुम लोग कभी बात भी नहिं करते...झगडा है क्या, उस से?"

"नहीं,झगड़ा क्यूँ होगा.?"

"अरे..झगडा तो किसी भी बात पर हो सकता है...वैसे मानस घर पर है नही..अभी अभी उसे बाहर जाते देखा है...बता ना...झगडा है उस से??

"नहीं बाबा...कोई झगडा नहीं...चलो चलती हूँ....." उसकी बातों से बचने को वो साथ चल दी."

वो हर कमरे मे चाची चाची कह्ती घूमने लगी पर चाची कहीं नहीं थीं. तुम यहिं रुको, मै छ्त पर देख कर आती हूँ, वह मानस का कमरा  था. वह उसकी मेज़ पर आकर उसकी किताबें, उलट पलट कर देखने लगी.’देखूं कुछ पढ़ता भी है या,सब वैसे ही कोरी हैं"

पहली नोटबुक जो खोली , देखा, सुन्दर सा एक फ़ूल बना हुअ है...’ह्म्म ठीक ही सोचा था उसने ,अब भी नहीं पढ़ता.यही चित्रकारी करता रह्ता है’ पर तभी ध्यान से जो देखा तो देखा फ़ूल के बीच मे बड़ी खूबसूरती से लिखा हुअ है, ’शालिनी’. उस के दिल की धड़्कन अचानक बढ़ गई. फ़िर तो जल्दी जल्दी कई नोटबुक  पलट  डाले और तकरीबन  सबमे, फ़ूल पत्ती, बेल बने हुये थे और बीच बीच मे लिख हुअ था, शालिनी.

एकदम से डर गई वह.पसीने से नहा गई. जल्दी से बाहर निकल आई. चेहरा , लाल पड़ गया था और दिल धौंकनी की तरह चल जोर जोर से धड़क रहा था.निशा के सामने पड़ने की हिम्मत नहीं थी उसमे. आंगन से ही आवाज़ लगाई उसने ,"निशा...मैं जा रही हूँ"

"अरे रुक मैं बस आ गई..." निशा की आवाज़ भी उसने बाहर निकलते निकलते सुनी. 

घर आकर सीधा छ्त पर भाग गई, निशा क्या किसी का सामना करने की हिम्मत नहीं थी उसमे. साँस जब सम पर आई तब दिमाग कुछ सोचने लायक हुआ. पर वह इतना घबरा क्यूँ रही है,क्या अकेली शालिनी है वो दुनिया मे? उसके कॉलेज मे लड़्कियाँ भी तो पढ़ती हैं. उन मे से ही कोई होगी या क्य पता, जिन प्रोफ़ेसर के यहाँ ट्यूशन पढने  जाता है, उनकी बेटी का नाम  हो शालिनी. उसका नाम कैसे हो सकता है? उसके पढाई मे तेज़ होने के कारण. उस से तो वह बचपन से ही नफ़रत करता है, स्कूल मे रीता,शर्मिला सबसे बातें करता है, कॉलोनी  में भी शोभा, निशा से कितना खुलकर बात करता है. एक सिर्फ़ उस से दूर रहता है, दूर ही  नहीं हमेशा  नीचा दिखाने की कोशिश , अब उसका नाम कैसे लिख सकता है..नामुमकिन. उस विष-बेल में अमृत धारा कैसे बह सकती है?

और अगर सच मे लिखा हो तो....न... न वह इतना हैंन्डसम है, इतन स्मार्ट, और वह कितनी छुई मुई सी है, बस कीताबी कीड़ा...ना..उसे तो कोई अपने जैसी स्मार्ट लड़की ही पसन्द आयेगी.जो जिसे चाहे मुहँ पर जबाब दे दे ,उसकी तो किसी को देखते ही जुबान तालु से चिपक जाती है. बेकार मे सपने बुन रही है वह.

और फ़िर जैसे खुद को ही पहली बार जाना. सपने??...तो क्या, उसे मानस से कोई नराज़गी नहीं.पहले तो उसे बड़ा गुस्सा आता था, उस पर...हाँ आता तो था,पर जब से कॉलेज  अलग हुये हैं,उसकी कमी बहुत खलती है. तो क्या वह...ना ना...ये सोचने का  भी क्या फ़ायदा...वो कभी मानस की पसन्द हो ही नहीं सकती,ये जरूर कोई और शालिनी  है, नहीं  तो क्या  अब तक वह एक बार भी नज़र उठा उसे देखता भी नहीं. इतनी सारी लड़कियों से बात करता है, सिवाय उसके. इसका मतलब वो उसे पसंद नहीं करता...हाँ, उसे तो उसके जैसा ही कोई पढ़ाकू पसंद करेगा....मोटी कांच के चश्मेवाला, चिपके बाल....पूरी बाहँ की शर्ट, गले तक बंद बटन....यक... और जैसे अपनी कल्पना से ही घबराकर उठ कर नीचे भाग गयी.

शुक्र है,माँ घर में नहीं थीं..वरना उसका बदहवास चेहरा देख पूछ ही बैठतीं,क्या हुआ?...उसने सोफे
पर लेट, टी.वी. ऑन कर दिया...कुछ तो ध्यान बंटे...पर स्क्रीन पर तो एक सुन्दर सा फूल दिख रहा था, जिसके अंदर लिखा था, शालिनी. घबरा कर आँखें बंद कीं तो पलकों में भी वही फूल मुस्करा उठा. उसने कुशन उठा कर जोरो से आँखों पर भींच लिया.

पर इसके बाद से वह काफी डर गयी थी. बालकनी में खड़ी रहती और दूर से भी मानस को आते देखती तो धडकनें तेज़ हो जातीं और वह झट से छुप जाती. लगता जैसे, सबकी नज़रें उन दोनों को ही देख रही हैं. निशा कितनी बार बुलाने आती..चलो बाहर टहलते  हैं..पर वो उसे छत परले जाती,  कहीं मानस से सामना ना हो जाए. कभी आते-जाते मानस सामने पड़ भी जाता तो पसीने से नहा उठती और जल्दी से कतरा कर निकल आती. जबकि बार बार खुद से कहती..."वो शालिनी कोई और है...वो तो हो ही नहीं सकती"

मानस दिखता भी कम...निशा बताती...बहुत मेहनत  से पढ़ाई कर रहा है..उसका मन होता कहे, 'जरा उसकी कॉपियाँ पलट कर देखो..पढता है या ड्राइंग करता है' पर जब बारहवीं का रिजल्ट आया तो सब हैरान रह गए, मानस  को 'फर्स्ट क्लास'  मिली थी. उसके बराबर में आ गया था वह...जो पापा को शायद अच्छा नहीं लगा था,  बार बार कहते.."लड़कों का कुछ पता नहीं,कब पढने की लगन जाग  जाये.."
माँ बहुत खुश थी,कहतीं.." मानस की माँ की चिंता दूर हो गयी...हमेशा कहती थीं..."तुम्हारी तो बिटिया  है..वो भी इतनी तेज है..और मानस तो ..लड़का होकर भी नहीं पढता....कैसे मिलेगी, नौकरी?"

मानस का अच्छा रिजल्ट उसे इस शहर  से भी दूर ले गया. वह बड़े शहर में पढने चला गया.जाने के एक दिन पहले, कई बार मानस को उसके घर के सामने से आते-जाते देखा....पर हर बार वह ओट में हो जाती. हिममत  ही नहीं हुई सामने आने की.

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उसने भी खुद को पढ़ाई में झोंक दिया.अपने भविष्य की रूपरेखा भी तय कर ली, ग्रेजुएशन के बाद कम्पीटीशन देगी...और फिर एक बढ़िया सी नौकरी. बड़ी सी मेज़ होगी...फाइलों से लदी. सामने चपरासी हाथ बांधे खड़ा रहेगा...वाह क्या रुआब होगा.

पर उसे कहाँ पता था, वह तो परीक्षा की तैयारियों में उलझी है...घर वाले किसी और तैयारी में. यूँ ही पढ़ाई से ब्रेक लेने किचेन में कुछ डब्बे टटोलने आई तो बरामदे में बैठी  माँ और पड़ोस वाली, सिन्हा चाची  का स्वर कानो में पड़ा. " अब लड़की के भाग्य हैं और क्या..घर बैठे तुम्हे इतना अच्छा लड़का मिल गया " सिन्हा चाची थीं.

"हाँ , वो तो है...हमने अभी कहाँ कुछ सोचा था, वो तो इसकी बुआ आई थीं उन्होंने ही बताया  उनकी  पड़ोस में एक बहुत अच्छा लड़का है. उनलोगों को बस अच्छे घर की गोरी,पढने में तेज़ लड़की चाहिए..."

"अरे तेज़ लड़की...मतलब?..नौकरी करवाएंगे क्या??  लड़का अच्छा कमाता तो है...?"

"सच कहूँ तो मैं भी ऐसे ही हैरान हो गयी थी, पर सुषमा जी ने जब बताया सुन कर कुछ अजीब ही लगा....लड़की पढने में तेज़ होनी चाहिए..ताकि बच्चे मेधावी हों...क्या क्या नखरे  होते जा रहें है लड़केवालों..के..पर इनकी दहेज़ की ज्यादा मांग नहीं और शालिनी को तो दूर से बाज़ार में देख कर ही पसंद कर लिया...वरना आप शालिनी को तो जानती हैं , ना??...वह कभी तैयार होती 'लड़की दिखाने को"?? दिमाग में क्या फितूर भरा हुआ है..बहुत पढना है....कम्पीटीशन देना है..ऑफिसर बनना है....पर हमें तो ,बिना चप्पल घिसे अच्छा लड़का मिल गया...हम तो गंगा नहा लिए."...माँ थीं.

वो घड़े से पानी ले रही थी, मन हुआ ग्लास दे मारे घड़े पर और सारा पानी फ़ैल जाए,किचेन के साथ साथ उनके मंसूबों पर भी.

पर कुछ नहीं कर सकी और अनजान बन वापस कमरे में लौट आई...बस किताब उठा जोर से दूर  फेंक दी ..और बरसती आँखें ,तकिये में छुपा लीं.

पढने का भी मन नहीं होता...पर मन को बहलाने का कोई दूसरा साधन भी नहीं था...नोटबुक खोलती तो बार-बार मानस के उकेरे फूल पत्ती दिखने लगते...पर खुद को ही डांट देती...पता नहीं, किस शालिनी का नाम वह लिखता रहता है.. और वह दिवास्वप्न देख रही है.

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इम्तहान ख़त्म हो गए और उसकी शादी की तैयारियां शुरू हो गयीं. घर जिस तेजी से मेहमान से भरने लगा,उतनी तेजी से ही उसके दिल में खालीपन घर करने लगा....कोई उत्साह,उमंग मन में जागती ही नहीं. उसने इस जीवन की कल्पना तो कभी नहीं की थी?? उसके मन की इच्छा को भली-भांति जानते हुए भी अगर  माता-पिता  एक बोझ समझ दूसरे हाथ में सौंप गंगा नहा लेना चाहते हैं..तो ऐसा ही सही.

मन इतना अवसाद से घिर चुका था, मानस का भी ख़याल नहीं आता, आता तो यही कि उसे कम से कम जिसकी चाहना है वो,उसे  मिल जाए.

आज उसकी  शादी थी और उसे पीली साड़ी पहना,आँखों में काजल लगा, एक कमरे में बिठा दिया गया था. सारे भाई-बहन, मेहमान, चहकते हुए रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे इधर से उधर दौड़ते रहते. पल भर को हमउम्र बहने पास आ बैठतीं फिर ही ही करती हुई बाहर चल देतीं. वो वीतराग  सी चुपचाप एक चटाई पर बैठी रहती. तभी माँ का तेज़ स्वर कानों में पड़ा..."अरे मानस की माँ कहाँ,जा रही हैं?? खाना खा कर जाइये. " कुछ दिनों से घर में  सब चिल्ला चिल्ला कर बातें करते. धीरे बोलना सब भूल ही गए थे जैसे. पिछले दो दिन से  ज्यादा करीबी लोगों का खाना शालिनी के  घर ही होता था. बस समय समय पर वे लोग कपड़े बदल कर आ जाते.

" बस थोड़ी देर में आती हूँ...मानस की ट्रेन का टाइम हो चला है...वो आने ही वाला होगा..."

"अच्छा मानस आ रहा है??...आप तो कह रही थीं...उसकी छुट्टी नहीं"

"हाँ पहले तो उसने यही कहा था...पर कल कहा कि दो दिनों के लिए आ रहा है..."

"बहुत अच्छा हुआ...कॉलोनी के लड़के ही काम नहीं संभालेंगे तो कौन  संभालेगा..जल्दी आइये उसे साथ लेकर"

शालिनी को जैसे  जोर का चक्कर आ गया...क्यूँ आ रहा है मानस?...क्यूँ उसके लिए सबकुछ इतना मुश्किल बना रहा है?....क्या पहले ही यह राह कम दुष्कर नहीं. पर रोक नहीं सकी खुद को...खिड़की पर जा खड़ी हुई. कोई घंटे भर, खड़े रहने के बाद, जब पैर दुखने लगे...तब जाकर, उसकी नज़रों के फ्रेम में एक आकृति नमूदार हुई और वह घबराकर चटाई पर आकर वापस बैठ  गयी. सर घुटनों में छुपा लिया.

बरामदे में मानस के पदचाप के साथ....उसकी आवाज़...नमस्ते चाची..प्रणाम दादी..सुन रही थी. जरूर ,छोटू को ढूंढ रहा होगा. पर उसकी पदचाप तो कमरे तक आती जा  रही थी और परदा उठा वह भीतर दाखिल हो गया..उसकी झुकी गर्दन और झुक गयी.

'शालिनी"...इतने दिनों में पहली बार मानस ने बिना किसी व्यंग्य के उसका नाम पुकारा. पर उसका झुका सर उठ नहीं सका.

"शालिनी..." इस बार मानस की  आवाज़ थरथरा रही थी....और उसकी आँखों से दो बूँद...पानी टपक गए.

"शालिनी....क्या हमेशा नाराज़ ही रही होगी..." गीली हो आई थी मानस की आवाज़ और उसके आँखों से आंसुओं की धार बंध चली.

"ओक्के .. नो प्रॉब्लम....इट्स फाइन  ...यू टेक केयर.." और बहुत ही भारी थके क़दमों से वह बाहर निकल  गया.
उसने जल्दी से सर उठा..'मानस' पुकारना चाहा..पर तब तक वह परदे उठा बाहर कदम रख चुका था....उसकी थमती रुलाई दूने वेग से उमड़ पड़ी.

बाहर माँ की आवाज़ सुनाई दी.." आ गए बेटा..बहुत अच्छा किया...तुमलोगों को ही तो सब संभालना है. पर तुम मेरा एक काम करो....मेरा कैमरा तुम संभालो. फोटोग्राफर तो हैं ही..पर वो सबको पहचानता नहीं ना.....तुम मेरे कैमरे से, सारे करीबी लोगों की अच्छी अच्छी फोटो लेना...सारे रस्मों की... हाँ.."

और माँ कमरे में आ गयीं.."शालिनी जरा आलमारी से कैमरा निकाल दो तो..."

उसने बिजली की फुर्ती से कैमरा निकाल कर दे दिया...और साथ में चार रील भी. माँ ने सारी तैयारी कर रखी  थी.

मानस के हाथों में कैमरा देखना था कि बच्चों की फरमाईश शुरू हो गयी, एक हमारी फोटो लो ना भैया.." उधर से लड़कियों का झुण्ड खिलखिलाता हुआ आया..."भैया एक फोटो हमारी भी"...तभी मामियों ,चाचियों का ग्रुप टोकरी में कुछ सामान लिए उसके कमरे तक आता दिखा,और साथ में मानस को हिदायत..."अंदर चलो....रस्म   होने वाली है...उसकी फोटो ले लेना..."

कैमरा संभालता मानस अंदर दाखिल हो गया. इसके पहले भी इन चाची,मौसी,मामी,बुआ, दादी का ग्रुप उसे अक्सर घेरे रहता और अजीब  अजीब से रस्म करवाता रहता, 'यहाँ चावल चढाओ' .'यहाँ टीका करो.' वह कठपुतली सी बिना किसी अहसास के रस्म निभाये जाती पर आज थोड़ी सी अनकम्फर्टेबल थी... पूरे समय लगता रहा,एक जोड़ी आँखें उसपर टिकी हुई हैं. रस्म ख़त्म होते होते....उसके पैर सुन्न पड़ गए थे. उसने आशा भरी आँखों से उनलोगों की तरफ देखा, पर वे लोग खुद में ही मगन  थीं..."अरे ये तो लाल कपड़े में बाँधा जाता है"...."सुपारी नहीं रखी?"..."पान के पत्ते भी चाहिए थे"..."क्या जीजी अभी तो आपने बेटी की शादी की है...और सब भूल गयीं "
किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं था. और एक हाथ उसके आँखों के सामने आया, नज़रें उठाईं तो देखा, 'मानस ने सहारे के लिए हाथ बढाया है' वह उसकी आँखों का आग्रह समझ गया था. कैसे नहीं समझता ,'बचपन से बस आँखों की भाषा ही तो जानी है'

उसका हाथ थाम, उठते  हुए लड़खड़ा सी गयी..और मानस ने एकदम से थाम लिया,..'अरे संभल के' ..कितना स्वाभाविक सा लग रह है सब कुछ ...जैसे कितने पुराने ,गहरे दोस्त हों. वो बीच में फैली विष-बेल कहाँ विलीन हो गयी थी.

महिलाओं का सारा ग्रुप कोई मंगल गीत गाते हुए ,आँगन की तरफ चला गया कोई और रस्म निभाने. और जैसे उसे होश आया, अपनी पसीजती हथेली  उसने मानस के हाथों से छुड़ा ली.

कमरे में सिर्फ मानस और वह थे, और थी बड़ी ही असहज करती हुई सी चुप्पी.उसने ही चुप्पी तोड़ी.."खाना खाया?"
"हाँ"
"झूठ"..हंसी आ गयी उसे..."जब से आए हो कैमरा संभाले खड़े हो...खाना कब खा लिया?"....फिर से एकदम सहज हो उठा सब कुछ.
मानस भी मुस्कुरा पड़ा...फिर थोड़ा रुक कर पूछा, "तुमने खाया?"
"नहीं....मेरा  उपवास है...मुझे कुछ भी नहीं खाना.."
"अरे क्यूँ?"
"लड़कियों को शायद पहले से ही ट्रेनिंग दी जाती है कि आदत बनी रहें...क्या पता वहाँ जाकर कुछ खाने  को मिले या नहीं...या पता नहीं कब मिले.." हंस दी वह.
"बेकार की बातें हैं सब.....मैं ले आऊं?...कुछ खाओगी?..भूख लगी है?"
"नहींssss...." उसने जरा जोर से ही कह दिया..मानो ये थोड़ा सा एकांत मिला है...इसे गंवाना नहीं चाहती हो.

फिर से दोनों चुप हो गए. इस बार मानस ने ही थोड़ी देर अपनी हथेलियों को घूरते हुए कहा, "बड़ी जल्दी थी, तुम्हे शादी की"

उसने एक नज़र मानस को देखा, और नज़रें खिड़की से बाहर टिका दीं..."किसी ने कहा ही नहीं इंतज़ार करने को.."

"कैसे कहता...वह कुछ बन तो जाता पहले...तुम कहाँ इतनी तेज़....टॉपर....और मैं नकारा..किसी तरह पास होने वाला." कहने की रौ में मानस भूल गया था कि इशारे में बातें हो रही थीं.

"तुम स्कूल के..कॉलोनी के.... कॉलेज के हीरो थे" एक एक शब्द पर जोर देते हुए कहा,उसने.

"मुझे सिर्फ एक का हीरो बनना था"

"तुम उसके हीरो थे" जरा जोर देकर कहा उसने तो मानस एकदम से पूछ बैठा...

"सच??.." मानस  के दिल की धड़कन बढ़ गयी थी.

शालिनी ने एक नज़र मानस को देखा और नज़रें खिड़की के बाहर आम के पेड़ की  फुनगी पर टिका दीं...जहाँ कुछ गुलाबी कोमल पत्ते उग आए थे.ऐसा ही कुछ कोमल सा उनके बीच भी उग रहा था...पर इन  नवजात कोंपलों की उम्र कितनी कम थी. वो पेड़ के कोंपल की तरह प्रौढ़ हरे पत्ते में बदल पायेंगे कभी?

"हाँ सच...पर तुम तो पता नहीं किस शालिनी के नाम की माला जप रहें थे...
अपनी नोटबुक में उसका नाम ही लिखते रहते थे..." उलाहना भरा स्वर था उसका.

"व्हाटssss ????       .." बुरी तरह चौंक गया वह.

उसकी असहजता पर मुस्कुरा पड़ी वह, "हाँ मानस एक बार निशा के साथ मैं तुम्हारे घर गयी  थी...देखा..नोटबुक में फूल-पत्तियों के बीच किसी शालिनी का नाम लिख रखा है...मैं देखते ही भाग आई..."

"ये...ये... तो बहुत गलत है...यूँ चोरी..चोरी किसी की किताब कॉपियाँ..देखना...बैड मैनर्स... वेरी वेरी बैड, मैनर्स " मानस का चेहरा लाल पड़ते जा रहा था, बोला,"...और मैं  दूसरी किस शालिनी को जानता हूँ...? "...फिर एकदम से उसकी नज़रों में सीधा देखते हुए कहा ..."अगर ऐसा होता तो आज मैं यहाँ आता??...मुझे तो जैसे ही माँ ने बताया....बस दिमाग में एक ही बात थी...'मुझे यहाँ पहुंचना है...हर हाल में..क्यूँ, कैसे मैं कुछ नहीं जानता...दो कपड़े बैग में डाले और सीधा स्टेशन आ गया....रात भर जाग कर टॉयलेट के पास एक रुमाल बिछा कर बैठ कर आया हूँ....और तुम कह रही हो..कोई और शालिनी होगी" दर्द से भीग आया स्वर उसका.

उसकी भी आँखें भर आयीं....अब क्या फायदा मानस...तुमने जरा सी हिम्मत नहीं  की...और कोई संकेत भी नहीं दिया..उल्टा उसे हमेशा चिढाते,खिझाते ही रहें , और चिढाने की बात से सब पिछला याद आ गया, रोष उमड़ आया....आज उसे सारा हिसाब लेना ही होगा. एकदम से बोल पड़ी..."तुम मुझे इतना चिढाते, रुलाते क्यूँ थे?"

"तुम्हारी अटेंशन पाने को..इतना भी नहीं समझती थी तुम"

"हाँ, नहीं समझती थी...और जब समझने लगी....तुम दूर चले गए "..हताश होकर बोली वह.

"पता नहीं, मुझे क्यूँ तुम हमेशा डरी-सहमी सी लगती थी...लगता था तुम्हे किसी की सुरक्षा की जरूरत है...तुम्हे याद है..हमेशा मैं तुम्हारे पीछे आता था और किसी को आवाज़ देकर जता देता था की मैं पीछे ही हूँ....पर  तुमने कभी एक बार मुड कर भी नहीं देखा"

"क्या देखती...मैं तो डर जाती थी...अब फिर कुछ चिढ़ाओगे..."

"बुध्दू हो तुम..बिलकुल...स्कूल में और किसी  लड़के ने कभी कुछ कहा?...तंग किया?...परेशान किया??...क्यूंकि सब जानते थे...तुम्हे परेशान करने का अधिकार सिर्फ मेरा है..वरना वो तुम्हारी सहेलियाँ...रीता, शर्मीला..याद है..कितना परेशान करते थे लड़के, उन्हें??..." और जैसे उसे कुछ याद आ गया, हंस पड़ा...."वो उचक उचक कर बोर्ड पर 'सम' बनाती तुम...और वो बेंच पर खड़ी हो कर रोती हुई...एकदम रोनी बिल्ली लगती थी.."

"अच्छा और क्लास में मुर्गा बने तुम कैसे दिखते थे...शर्मा  सर तो तुम्हारी पीठ पर किताबें भी रख देते थे और तुम उन्हें गिरा देते....सर तुम्हे आधे घंटे और खड़ा रखते...."उसके भी होठों पर मुस्कान तिर आई.

"उन्हीं सब से तो दूर जाना था., मैं तुम्हारे काबिल बनना चाहता था...जी-जान लगा दी थी मैने पढ़ाई में...अब क्या पढूंगा...सब छोड़ दूंगा..." झुंझला गया वह.

"बेवकूफी की बातें मत करो....मेरी पढ़ाई तो अकारथ गयी....तुम बहुत बड़े आदमी बनना  ,मानस..मुझे अच्छा लगेगा."

"तुमने इतनी जल्दी शादी के लिए  'हाँ'  क्यूँ कहा,शालिनी....??" मानस ने आजिजी से कहा.

"किसने पूछा मानस??...हम लड़कियों से कभी पूछते हैं??....बता देते हैं,बस..कई बार तो तुरंत बताते भी नहीं...दूसरों से पता चलता है कि उनकी शादी ठीक  हो गयी है...." गला भर आया उसका.

मानस भी चुप हो आया, फिर शायद उसे थोड़ा सहज करने के लिए मुस्कुराता हुआ बोला, "चलो..भाग चलते हैं "

वह उसका प्रयास समझ गयी थी...उसमे शामिल होती हुई बोली, "ड्राइविंग आती है?.."

"ना"

"बाइक है?"

"उह्हूँ "..मानस ने भी साथ देते हुए सर हिला दिया.

"कोई दोस्त है...गाड़ी लेकर खड़ा...?"

"ना "

'फिर कैसे भागेंगे?..पैदल??...पकडे जाएंगे ...भागना कैंसल..पहले से सब प्लान करना था ना"

"हाँ, अब तो कैंसल ही करना पड़ेगा....कैसे कुछ प्लान करता....तुम तो ऊँची डाली पर लगी उस फूल के समान थी,जहाँ तक पहुँचने के लिए मैं इतनी मशक्कत कर सीढ़ी तैयार कर रहा था ...और तुम बीच में ही किसी और की झोली...में..." आगे के शब्द मानस ने अधूरे छोड़ दिए.

इतनी महेनत से हल्की-फुलकी बात करने की कोशिश की थी उसने पर फिर से उदासी ने अपने घेरे में ले लिया, दोनों को.

"वैसे , हू इज दिस लकी चैप ....मैने माँ से कुछ पूछा ही नहीं..."

"क्या पता "

"व्हाट डू यू मीन ...क्या पता....मिली नहीं हो?"

"ना...और कोई इंटरेस्ट भी नहीं....जो भी हो...पति परमेश्वर मानना होगा उसे"

"अरे चाचा जी ने बहुत अच्छा लड़का ढूँढा होगा...मस्ट बी अ गुड़ कैच..वरना तुम्हारी पढ़ाई ,तुम्हारा कैरियर यूँ बीच में नहीं छुडवा देते.. बहुत काबिल होगा..."..उदासी घिर आई  थी उसके स्वर में , जिसने उसे भी कहीं गहरे छू लिया.

"मानस, मुझे बहुत डर लग रहा है.." अनायास ही थरथरा आई आवाज़ उसकी.

मानस का मन हुआ उसे आगे बढ़ ,गले से लगा कर उसके अंदर का  सारा डर  सोख ले. एक आवेग सा उमड़ा...पर उसकी पीली साड़ी और मेहंदी  रचे हाथ दिख गए...जो किसी और के नाम के थे. वैसे ही जड़ बना बैठा रहा.

और तभी निशा और शोभा ने ये कहते ,कमरे में कदम रखा...."शालिनी चलो..मंडप में तुम्हे बुला रहें हैं तुम्हे... "  मानस को देखकर एकदम से चौंक गयी.

"अरे तुम कब आए....हम्म बेस्ट फ्रेंड की शादी में तो सब आते हैं...पर पक्के दुश्मन की शादी में आते पहली बार देखा किसी को..." शोभा की आवाज़ में चुहल थी.

मानस और शालिनी की नज़रें मिलीं....और सारा अनकहा सिमट आया, क्या थे वे...दोस्त..दुश्मन..या क्या.

निशा की नज़र मानस के हाथ में थमे कैमरे पर पड़ी और वह मचल उठी..'मानस शालिनी के साथ हमारी फोटो लो ना".

दोनों उससे लग कर खड़ी हो गयीं और जब निशा ने उसे कंधे से घेर गीली आवाज़ में  कहा, "कितना मिस करेंगे तुम्हे...कैसे रहेंगे  हमलोग तुम्हारे बिना..." शालिनी का इतनी देर से रुका आंसुओं का सैलाब बह चला....दोनों सहेलियाँ भी आँखें  पोंछने लगीं और उसे पता था कैमरे के पीछे भी किसी की आँखें गीली हैं.

वह मानस से पहली और आखिरी आत्मीय बातचीत थी. बड़ी दीदियाँ,उसे तैयार करने.., संवारने ले गयीं...मानस भी नहीं दिखा फिर. जब स्टेज पर जयमाल के लिए, सब  लेकर जा रहें थे ...देखा,मानस कैमरा लिए बिलकुल सामने खड़ा है...नज़रें मिलीं और वहीँ जम कर रह गयीं. एक टीस सी उठी दिल में, अब वह किसी और के पहलू में बैठने जा रही है. उसके कदम लड़खड़ा से गए, 'अरे संभालो..." सबको लगा, भारी लहंगा पैरों में फंस गया है. स्टेज पर उसका दूल्हा बैठा था...नज़र उठा कर भी नहीं देखा उसे...अब तो सारी ज़िन्दगी यही चेहरा देखना..है और स्टेज के नीचे खड़ा चेहरा शायद फिर कभी  ना मिले देखने को.

स्टेज पर तो सब यंत्रवत करती रही...लोगों की तालियाँ, हंसी ठहाकों , कैमरे के लिए बार बार वो माला पकड़ना , सबके आग्रह पर मुस्काराना ...सब मशीनवत चलता रहा पर जब कन्यादान के समय उसे माता-पिता के बगल से उठा उस अजनबी के पास बिठाया जाने लगा तो जैसे अंदर कुछ जोर का दरक गया. सामने निगाहें उठाईं तो पाया, मानस की नज़रें उस पर ही जमी हैं...उसने मानस की ओर देखा और उसकी नज़रों में इतनी शिकायत,इतना उलाहना भरा था कि मानस उसके नज़रों कि ताब सह नहीं सका. उसने गर्दन  झुका कैमरा किसी और को पकडाया  और वहाँ से चला गया. और वह एक अनजान व्यक्ति के पास बिठा दी गयी, अब उसका हाथ किसी और के हाथों में सौंप दिया गया था.
उसे पता था, अब मानस नहीं आएगा...और वह उसकी विदाई तक नहीं आया.

शालिनी के पापा, सिर्फ शालिनी की पढ़ाई की वजह से अपना ट्रांसफर कई बार रुकवा चुके थे, अब शालिनी की शादी के बाद,उन्होंने भी ट्रांसफर दूसरी जगह ले लिया और मानस फिर कभी नहीं मिला.

'प्लीज़ टाई योर सीट बेल्ट' की उद्घोषणा से उसकी तन्द्रा भंग हुई. बच्चों की सीट बेल्ट बाँधी...उन्हें जगाया...प्लेन लैंड होने वाली थी.
फिर से एयरपोर्ट पर निगाहें इधर-उधर भटकने लगी थी.

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शालिनी को  कहाँ पता था, उसी समय देश के किसी दूसरे एअरपोर्ट पर यूँ ही एक जोड़ी निगाहें उसके लिए भटक रही थीं.  जब से मानस की  माँ को वाया वाया किसी से पता चला था  कि शालिनी अब  छुट्टियों में बच्चों को लेकर प्लेन से ही मायके आती है. उन्होंने यूँ ही मानस से एक बार पूछ लिया, "तुम्हे कभी मिली शालिनी?..." और आगे खुद ही जोड़ दिया..."मिल भी गयी तो पहचानेगा कहाँ ....अब तक कितनी  बदल गयी होगी."

मानस ने मन ही मन कहा, "माँ, वो अस्सी साल की भी हो जाए तब भी पहचान लूँगा... उसकी आँखें और मुस्कुराहट तो नहीं बदलेंगी....और तब से स्कूल की छुट्टियां शुरू होते ही, मानस की नज़रें, एयरपोर्ट पर किसी को ढूंढती रहती हैं. उसकी एयर  होस्टेस पत्नी को भी पता है, कि बचपन की अपनी फ्रेंड को वह ढूंढता रहता है.

कभी कभी मजाक भी करती है, "क्या बात है...कुछ प्यार व्यार का चक्कर तो  नहीं था.."

"व्हाट रब्बिश....हमलोग स्कूल  में साथ थे....वी वर जस्ट किड्स "

उनलोगों  के बीच जो भी था, उसे वह कोई नाम दे सकता है,क्या?

"फिर क्यूँ, इस तरह उसे ढूंढते रहते हो? "....रोज़ा  उसे थोड़ा और चिढाती है.

यही तो सैकड़ों बार खुद से भी पूछता रहता है,... क्यूँ...किसलिए.....पर जबाब कोई नहीं मिलता .

Friday, August 20, 2010

जब पाठकों ने लिखवा ली कहानी

ये कहना जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी  कि यह  लम्बी कहानी सचमुच पाठकों ने ही लिखवा ली. जैसा कि पहले भी मैने जिक्र किया ,छः पेज की कहानी को ४ पेज में कर के , सिर्फ ९ मिनट में समेटी थी ..... और सोचा ,अब तो अपना ब्लॉग है. Unedited version  ब्लॉग पर डाल दूंगी.पर मन में एक शंका थी,यह बहुत ही सीधी सादी कहानी थी,कोई नाटकीयता नहीं...अप्रत्याशित  मोड़ नहीं.  सब कहेंगे दो नॉवेल लिख लिया ,अब रश्मि का लेखन चुक गया है. पर अपना लिखा एक जगह इकट्ठा करने की ख्वाहिश  भी थी. सो बड़ी हिचकिचाहट के साथ पहली किस्त पोस्ट कर दी.



टिप्पणियों  और मेल में लोगों की प्रतिक्रिया देख सुखद आश्चर्य हुआ, गाँव की पृष्ठभूमि पर लिखी इस  कहानी की पहली किस्त खूब  पसंद आई  थी लोगों को...किसी ने थोड़ा व्यंग्य भी किया कि "छः बच्चे ?कहीं परिवार नियोजन वाले ना दुखी हो जाएँ" पर मैं चुप रही, छः बच्चे इसलिए थे कि मुझे छः अलग अलग जिंदगियां दिखानी थीं...कुछ ने कमेंट्स में कहा भी कि हम भी छः भाई-बहन हैं....कहीं हमारी कहानी तो नहीं,मतलब यह इतनी अनहोनी बात भी नहीं.

फिर भी मुझे लगा, कि ३,४ किस्त में सिमट जायेगी. पर  पाठको का प्यार और उत्साहवर्द्धन लिखवाता गया और मैं लिखती गयी. शिखा, वाणी गीत, वंदना अवस्थी, वंदना गुप्ता, मुक्ति,सारिका, दीपक, आशीष,शुभम जैन,संजीत त्रिपाठी, मुदिता, रेखा दी, संगीता स्वरुपजी, घुघूती जी,राज भाटिया जी,समीर जी,  निर्मला दी, रश्मि दी,शमा जी,  हमेशा की तरह ये लोग पहली किस्त से ही साथ हो लिए, और बहुत ही सजगता से कहानी पर नज़र रखी थी. और भरोसा भी देते गए कि कहानी सत्य के करीब है.

इस कहानी से कुछ नए नाम जुड़े...साधना वैद्य जी और  शोभना चौरे जी, ...उनकी टिप्पणियाँ हमेशा एक नया जोश देती रहीं. राधा-कृष्ण के सिले कपड़े, शादी के बाद भी नैनों से ही प्रेमलीला, मनिहारिन,बच्चों के माध्यम से ससुर जी से बात करना और बड़े-बूढों का खांस कर घर में घुसना...मेरे साथ साथ बहुतों को याद आ गया.

मुक्ति और वाणी का हर किस्त पर ये कहना कि ऐसा उनके गाँव में भी होता था, शिखा,वंदना गुप्ता  संगीता जी ,घुघूती जी का गाँव की एक एक बात ध्यान से पढना ,क्यूंकि इन लोगों ने ग्राम्य-जीवन पास से देखा ही नहीं, बरबस मुस्कराहट ला देता. वंदना अवस्थी,संजीत त्रिपाठी  ने आश्चर्य भी किया कि शहर में रहकर इतने वास्तविकता के करीब कैसे लिखा?...मैने गाँव के जीवन को जिया नहीं पर देखा तो जरूर है...बरसों पहले ही सही.. थोड़ा डर तो था,न्याय कर पाउंगी या नहीं पर कुछ अपनी कल्पना की छौंक भी लगाती रही.शिखा एवं आशीष जी में शर्त लग गयी की मुझे भोजपुरी नहीं आती....जबकि बखूबी  आती है. दीपक मशाल ने शिकायत भी की , सारी लड़कियां हिरोइन और लड़के विलेन..ऐसा क्यूँ??

प्रवीण पाण्डेय जी, डॉक्टर दराल, अनामिका जी,रचना दीक्षित जी, इस्मत जैदी जी , ताऊ रामपुरिया जी,रवि धवन जी, जाकिर अली, विनोद पाण्डेय, रोहित, सौरभ , हिमांशु मोहन जी  ये लोग भी समय मिलने पर कहानी पढ़ते रहें और अपनी टिप्पणियों से उत्साहवर्धन करते रहें.हिमांशु जी ने अंतिम  किस्त पर बहुत ही ख़ूबसूरत टिप्पणी की.

दूसरी किस्त में ममता  की शादी कि बात पढ़ ,सबको लगा ये ममता की कहानी है..टिप्पणियों में ममता की कहानी आगे बढ़ने का सबको इंतज़ार था पर अब तो कहानी स्मिता पर आ गयी.शोभना जी ने बताया,स्मिता जैसी ही ज़िन्दगी देखी थी उन्होंने मुंबई में.  इस कहानी की पात्र नमिता का चरित्र सबको खूब पसंद आया. सब इंतज़ार करने लगे, कि नमिता शायद  अब घर में बदलाव लाएगी. टिप्पणियाँ पढ़, मुझे लगता, 'मैं कुछ गलत कर रही हूँ क्या..? हमेशा पाठकों के अनुमान के विपरीत जा रही हूँ.' पर कहानी की रूप-रेखा तो पहले ही बन चुकी थी.

प्रमोद और प्रकाश की कहानी के बाद सबको अनुमान हो गया कि ये अलग-अलग पात्रों की कहानी है. जब प्रकाश की पत्नी पूजा का कहानी में प्रवेश हुआ, तो बिंदास पूजा का चरित्र भी सबको बहुत पसंद आया. घुघूती जी ने कहा 'अब नमिता और पूजा मिल कर बदल देंगी घर को' पर एक बार फिर मैने निराश किया,अपने पाठकों को.और पूजा को विदेश भेज दिया. अब तक कहानी बिलकुल धरातल पर पैर जमा चल रही थी ,मैने  पूजा के बहाने ,कल्पना को थोड़ी उड़ान दी. इंदु जी ने भले ही कभी टिप्पणी नहीं की पर उनकी पैनी नज़र थी,कहानी पर.तुरंत टोक दिया, "काश! गाँव ऐसे होते" .


इस कहानी का सबसे बड़ा झटका था, 'नमिता' का घर छोड़ कर चले जाना. इसे पाठकों का संस्कारी मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था. उनकी प्रतिक्रियाएँ देख, मुझे भी दुख होता,पर मैं यह भी दिखाना चाह रही थी कि 'कैसे शिक्षित, मृदु स्वभाव वाले पिता भी,बेटी का अन्तर्जातीय विवाह स्वीकार नहीं कर पाते.'

समापन किस्त पर भी सबकी प्रतिक्रिया ने चौंकाया...सबको मार्मिक लगी वो कड़ी...और करीब-करीब सबने आँखें नम होने की बात लिखी. मैं तो पोस्ट करके सो गयी थी. सुबह कमेंट्स पढ़े तो अपराध-बोध से भर गयी. कभी कभी कैसी विवशता हो जाती है, कहानी की मांग ही ऐसी होती है कि पाठकों को दुखी करने का अपराध अपने सर लेना पड़ता है.

यह कहानी लिखते वक़्त जाना कि गाँव की यादें इतनी सुरक्षित हैं, मेरे मन-मस्तिष्क में. सचमुच दिल से शुक्रिया सभी पाठको का...उन लम्हों को फिर से जीने का मौका दिया और एक लम्बी कहानी मेरी झोली में डाल दी.

आगे भी ऐसे ही स्नेह,मार्गदर्शन,चौकस नज़र बनाएं रखें....अगली कहानी में उसकी ज्यादा जरूरत है क्यूंकि कागज़ पर उसे लिखना शुरू किया था (ब्लॉग बनाने से पहले) पर आधे के बाद नहीं लिख पायी. ये अहसास रहें कि कुछ लोग साथ हैं तो शायद पूरी कर पाऊं.

Sunday, August 8, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (समापन किस्त )

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर, उसके  विदेश चला गया. तीसरी बेटी नमिता ने दूसरी जाति के लड़के से घर से विरोध होने पर,घर से भागकर शादी कर ली.छोटी बेटी अपने भाई के यहाँ रहकर एम.बी.ए. कर रही थी.)

गतांक से आगे



घर वापस आ गयीं,पर मन नहीं लगता...सुबह पति को फूलों की क्यारियाँ ठीक करते देखतीं  और मस्तिष्क में मीरा का तेजी से रसोई में काम करना दिखता रहता...दोपहर को आराम करने को  लेटतीं और लगता वो कॉलेज में भूखे पेट पढाई कर रही होगी, रात देर तक नींद नहीं आती, किताबों पर झुका मीरा का  थका चेहरा दिखाई देता रहता.

छः महीने बाद मीरा घर आई और उन्होंने उसे एक ग्लास पानी भी लेकर पीने नहीं दिया. कलावती की बेटी छुटकी को ताकीद कर दी थी कि मीरा के आस-पास ही बनी रहें,ध्यान रहें कि एक बार उसे   हैण्ड-पम्प भी ना चलना पड़े. मीरा हंसती रहती, 

"माँ मेरी आदतें खराब कर रही हो"

वे उसे डांट देती, "चेहरा देख जरा...कैसा मुरझाया सा हो गया है...कोई रौनक ही नहीं.जबतक छुट्टी है,सिर्फ खाना खा और आराम कर "

"अउर नहीं त का....सहर  जाके अईसा चेहरा बना लिया है कि दमाद बाबू को पसंद नहीं आया तो?? अब सादी-बियाह होगा...जरा धियान रखो  अपना..."

"काकी तुम्हे सादी-बियाह के अलावा कुछ और सूझता है?..."

"लो कल्लो बात...इस उम्र में तुम्हारी माँ, तीन बच्चे की माँ बन  गयी थी."

"मैं जा रही हूँ बाहर पढने "..मीरा सचमुच नाराज़ हो कोई भारी भरकम किताब ले बाहर चल देती.

 कभी कुआँ के जगत पर बैठी पढ़ती होती..कभी हनुमान जी के चबूतरे पर तो कभी...अमरुद के पेड़ की छाँव पे. दिन  दुनिया से बेखबर. पता नहीं क्या सारा-दिन लिखती पढ़ती रहती.

पर उसकी यह मेहनत रंग लाई और फ़ाइनल रिजल्ट आने से पहले ही उसे एक अच्छी सी नौकरी मिल गयी. पति प्रकाश,प्रमोद की नौकरी लगने पर भी इतने खुश नहीं हुए थे,जितना अपनी छोटी बेटी मीरा की नौकरी लगने की खबर से.हुए. बिलकुल बाबूजी की तरह बाहर कुर्सी लगा बैठे होते और हर आने-जाने वालों को यह खबर सुनाते. "अरे जो मैं साल भर  में कमाता था ,मेरी बेटी के एक महीने की कमाई है..क्या ज़माना आ गया है...पर बच्चे मेहनत भी तो कितना करते हैं, कितनी सारी पढ़ाई करते हैं" उन्हें लगता पति की तरफ ,अब  बुढ़ापा तेजी से बढ़ता आ रहा है. बुढापे में सबलोग एक जैसी ही बातें और एक जैसा ही व्यवहार करते हैं.

मीरा की नौकरी दूसरे शहर में लगी और वे परेशान हो गयीं, अकेली कहाँ रहेगी कैसे जाएगी? उन्होंने प्रकाश से कहा साथ जाने को, मीरामना करती रही पर उनकी बात माँ,प्रकाश साथ गया. मीरा को उसकी नई नौकरी पर छोड़ उसे आश्वस्त किया,"माँ उसके साथ और भी लडकियाँ हैं, एक हफ्ते तो ऑफिस के गेस्ट हाउस में रुकेंगी सब फिर मिलकर एक फ़्लैट ले लेंगी,मीरा समझदार है,तुम चिंता मत करो"

कह देना आसान है,चिंता मत करो.इतने बड़े शहर में लड़की अकेली है, आगे नाथ ना पीछे पगहा....और कहता है चिंता मत करो.नाराज़ होकर बोलीं, "अब तू उसके लिया अच्छा सा लड़का देख,अब तो पढ़ भी ली,नौकरी भी लग गयी,अब तो हो गयी तुम भाई-बहन के मन की"

"अच्छा माँ....देखता हूँ.." प्रकाश ने हँसते हुए कहा और फोन रख दिया.

यह हंसी में उड़ाने वाली बात है कहीं? लड़की इत्ते बड़े शहर में अकेली है और भाई हंस रहा है .अब वे पति के पीछे पड़ीं,लड़का देखिए मीरा के लिए.पति ने गंभीरता से कहा, "अब कहाँ उसके लायक लड़का मैं खोज पाउँगा? अगर उसे कोई पसंद आ जाता है तो कह देना कोई मनाही नहीं है मेरी तरफ से"

वे आवाक मुहँ देखती रह गयीं. ये वही  पति कह रहें हैं? जिन्होंने नमिता के हाथ-पैर तोड़ घर बैठाने की  धमकी दी थी.और इनकी वजह से आज वे बेटी का मुहँ देखने को तरस गयी हैं.

आश्चर्य से बोलीं, " ये आप कह रहें हैं....नमिता के समय तो..."

" उसकी बात अलग थी, वो गाँव की लड़की थी...तुम नहीं समझोगी...जाओ  खाना  लगाओ..."

हाँ, जब मुश्किल में पड़ जाओ,सवालों से घिर जाओ...तो बस..."नहीं समझोगी..खाना लगाओ ..."

वे वहाँ से चली तो गयीं,पर मीरा के लिए सचमुच चिंतित हो उठीं.

मीरा रोज फोन करती.अपने हाल-चाल के प्रति आश्वस्त कराती उन्हें. अब तीन लड़कियों ने मिलकर घर भी  ले लिया था.कहती काम भी अच्छा लग रहा है.जैसे ही छुट्टी मिलेगी,घर आऊँगी.

पर छुट्टी मिलने में उसे चार महीने  लग गए. जब आई तो दो बड़े बड़े बैग भरे हुए थे. पता नहीं क्या क्या लेकर आई थी. अपने पापाजी  के लिए कई सेट कपड़े, उनके लिए साड़ियाँ, अपने गोपाल चाचा के लिए भी कुरता पायजामा, घर के लिए भी तमाम तरह के सामान. सिवनाथ माएँ के लिए साड़ी,कलावती के लिए कपड़े और सुन्दर  सी चप्पल,उसकी बिटिया के लिए फ्रॉक और गुड़िया.

पर ये उपहार उसके सामने कुछ भी नहीं थे जो उसने अपने पापा जी को दिए. रात में खाना खाने के बाद जब पति अखबार की छूटी ख़बरें ढूंढ ढूंढ  कर पढ़ रहें थे तभी मीरा गयी और एक मोटा सा लिफाफा उनकी गोद में रख दिया.

पति चौंके ," ये क्या है?"

हिचकते हुए बोली मीरा, "पापाजी ,वो बाग़ जो गिरवी रखा था,ना कृष्णभोग आम के पेड़ वाला,उसे वापस ले लीजिये"

पति ने वो लिफाफा छुआ भी नहीं.बोले, "पहले इसे उठाओ."

"पापाजी..."

"पहले इसे उठाओ...फिर समझाता हूँ" थोड़ा जोर से बोले वह .

मीरा ने उनकी तरफ देखा,उन्होंने आँखों से इशारा किया...मीरा ने बड़े बेमन से वो  लिफाफा वापस ले लिया.

पति उसे समझाते रहें,अब घर में  है कौन आम खाने वाला? तुम सबलोग बाहर हो. हम बुड्ढे- बुढ़िया क्या खायेंगे इस उम्र में. इस उम्र में तो परहेज ही जरूरी है. जिसके पास है वह बगान, कम से कम  खा तो रहा है. यह सब भूल जाओ. इतना कुछ लाया तुमने, मैने कुछ बोला? आराम से रहो,इतनी मेहनत  की है, उसका फायदा उठाओ....ये सब भूल जाओ..." और अखबार रख वे सोने चले गए.

पर मीरा भी धुन की पक्की थी. उसने कब गुप-चुप गोपाल जी से बात की और वे मान गए, उन दोनों को खबर भी नहीं हुई.  सारा कागज़ पत्तर तैयार करवा जब पति से  हस्ताक्षर करने को बोला. तो वे एक बार फिर चौंके.पर गोपाल जी ने समझाया, "बिटिया का इतना मन है, तो कर दीजिये  ना...कितने बाल-बच्चे इतना सोचते हैं??...वह सोच रही है तो उसे करने  दीजिये. अब तो उनके बाल-बच्चे हैं वरना शम्भू बाबू जिंदा होते तो ऐसे ही बगान वापस कर देते. वे सिर्फ लोगों की मदद के विचार से गिरवी रखते थे,"
हस्ताक्षर करते पति की आँखों में आँसू आ गए जिसे छुपाने को वे हस्ताक्षर कर झट से बाहर चले गए.

मीरा ने पति के जाने के बाद कहा, "देखो मैं  कैसे सारे खेत,बगीचे वापस लाती हूँ.और उनकी चिंता और बढ़ गयी,जल्दी से अब इसकी शादी हो जाए और वो यहाँ की चिंता छोड़,अपना घर-बार संभाले.

चार-दिन रहकर, मीरा चली गयी. पर कहती गयी अब इस बार मैं नहीं आऊँगी,तुमलोगों को आना पड़ेगा. एक फ़्लैट ढूंढती हूँ. फिर मेरे साथ ही रहना...और पता है हवाई जहाज में चढ़ कर आना आप दोनों लोग"

"तेरा दिमाग तो ठीक है...हवाई जहाज में और मैं?? डर से मर ही जाउंगी..."

"अभी नहीं माँ...एकाध साल रुक जाओ बस....थोड़े पैसे जमा कर लूँ...फिर देखना...हवाई जहाज में ही सफ़र करोगी.."

"चल-चल खयाली पुलाव ना बना....मुझे लड्डू बनाने दे." वे ढेर सारा नाश्ता बना रही थीं बेटी और उसकी सहेलियों के लिए.उन्हें पता है काम से कितना थक जाती होंगी सब. कुछ घर का बना बनाया खाने को तो मिले.

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नमिता के जाने के बाद जो गम के बादल छा गए थे, वे अब धीरे धीरे छंटने लगे थे. पति ने गाँव के लोगों से मेल-जोल बिलकुल कम कर दिया था . पर अब फिर वापस मिलने-जुलने लगे थे.समारोहों में शामिल होने लगे थे. ऐसे ही जनार्दन  बाबू के बेटे की बारात में शहर गए और वापस आए तो तबियत खराब हो गयी.

थोड़ा बुखार था. गाँव के डॉक्टर को बुलाया,उसने दवाएं दीं . बच्चों को फोन पर बताने ही नहीं दिया. उन्हें भी लगा मौसमी बुखार है. डॉक्टर साहब तो हर शाम आते और उन्हें आश्वस्त करते  सिर्फ फ़्लू है, कमजोर हो गए हैं, उम्र का भी असर है इसलिए समय लग रहा है. पर जब एक हफ्ते तक बुखार नहीं उतरा तो उन्हें चिंता हुई. कहीं मलेरिया ना हो,वैसे तो गाँव में भी कम मच्छर  नहीं थे, देर शाम तक जब पति बागबानी करते रहते तो मच्छरों  का झुण्ड उनके सर के ऊपर मंडराता रहता. पर ये शहर के गंदे बजबजाते नाले पर भिनभिनाते  मलेरिया वाले मच्छर नहीं थे. पति बता रहें थे कि जहाँ बारात ठहराई गयी थी...वहीँ पर एक बड़ा सा खुला,नाला भी बह रहा था.

डॉक्टर साहब से आशंका  जताई,तो उन्होंने कहा, खून जांच करके पता कर लेते हैं. कम्पाउडर आया घर से ही जांच के लिए खून ले गया. फिर डॉक्टर साहब दूसरी दवाएं लेकर आए,बोले, मलेरिया नहीं टाइफायड है. टाइफायड के  दवा की एक कोर्स कर लेंगे, ठीक हो जाएंगे. हर बार ,उनके कुछ कहने से पहले ही पति कहते,बच्चों को मत बताना, सब नौकरी,अपने बाल-बच्चों में व्यस्त हैं.बेकार परेशान होंगे. अब उम्र हो रही है तो बीमारी-सिमारी लगी ही रहेगी. वे बहुत घबरा जातीं. पर फोन  उनके सिरहाने के टेबल पर ही रहता छुप कर नहीं कर पातीं.बच्चों के फ़ोन भी आते तो कहना पड़ता,सो रहें हैं,पापाजी.

पर एक दिन बुखार की बेहोशी में वे कुछ कुछ बोलने लगे और बार-बार नमिता को बुलाने लगे तो वे एकदम घबरा गयीं और रोते -रोते प्रकाश को फोन कर दिया.पहले तो प्रकाश बहुत नाराज़ हुआ कि उसे पहले क्यूँ नहीं बताया. फिर डॉक्टर साहब का नंबर  लिया.उनसे बात करने के बाद बोला,मैं गाड़ी लेकर आ रहा हूँ. पापा जी को शहर लेकर आना है. दूसरे दिन ही पहुँच गया. पति मना करते रहें.पर अब डॉक्टर  भी थोड़े चिंतित लग रहें थे .उन्होंने भी मना  नहीं किया वरना अब तक तो वे दावा कर रहें थे कि उनकी दवाओं से ही ठीक हो जाएंगे.

प्रकाश के आने के बाद उन्हें थोड़ी राहत हुई. उन्होंने उसे पति के  पास बिठा....फोन का तार दूर खींचकर ममता,स्मिता,मीरा सबको फोन करके बता दिया. स्मिता से कह दिया कि जरा नमिता को भी खबर कर दे,उसे पापाजी बेहोशी में याद कर रहें थे. एक प्रमोद को फोन नहीं कर पायीं.विदेश फोन करने की सुविधा इस फोन में  नहीं थी.
प्रकाश से कहा,"बेटा , शहर जाकर प्रमोद को फ़ोन कर बता देना."

"माँ, वो बिचारा इतनी  दूर है...रहने दो ना...उसे क्यूँ परेशान किया जाए"

"ना बेटा, जैसे तू नाराज़ हो गया वो भी दो बात सुनाएगा....उसे भी बता दो"

डॉक्टर  साहब ने दो सूई लगाई पति को और गाड़ी से सीधा अस्पताल ही लेकर आया प्रकाश. उन्हें भरती कर लिया  गया और उन्हें संतोष हो गया. अब सही जगह आ गए हैं,सही इलाज हो जायेगा. पता चला मलेरिया ही है. बुखार भी कम हो गया था.पर कमजोरी  बहुत थी.

ममता,स्मिता  दिन में चार बार फोन करतीं ,उनके बच्चों के इम्तहान चल रहें थे.वे भी आश्वस्त करातीं, "हाँ अब पापा जी ठीक हो रहें हैं. बच्चों की पढ़ाई देखो. "

पति सो रहें थे वे पास बैठी खडकी से बाहर देख रही थीं कि तभी लगा,दवाजे पर पड़ा परदा हिला और नज़र घुमाई तो देखा,नमिता खड़ी है.

झपट कर  उनके गले लग कर ऐसे बेआवाज़ रोई जैसे इस जनम में ,उसे मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी . नरेंद्र अपराधी सा थोड़ा दूर ही खड़ा था. वे नमिता का कन्धा थपथपाते उसे लिए  बाहर आयीं. हाल-चाल पूछते बार-बार माँ-बेटी की आँखें भर आतीं. नमिता ने फुसफुसाते हुए पूछा, "पापा जी की नींद खुल जाएगी तो नाराज़ तो नहीं होंगे.."

उन्होंने आश्वस्त किया..."ना,बेहोशी में तुझे याद कर रहें थे...खुश ही होंगे देखकर." और नमिता गीले आँखों से मुस्करा उठी.बहुत देर तक उनके पैरों की तरफ खड़े एक टक पति के चहरे पर नज़रें जमाये खड़ी रही. नरेंद्र चुपचाप पीछे कुर्सी पर बैठा हुआ था.

पति की नींद खुली और उनकी नज़र  सीधी नमिता पर पड़ी...उन्होंने एक दो बार आँखें झिपझिपा कर खोलीं,जैसे पहचानने की कोशिश कर रहें हों. फिर उनकी तरफ नज़र घुमाई.एक बार तो वे डर गयीं,फिर हिम्मत कर फंसे गले से बोलीं, " नमिता है..."

पति चुप रहें, वो दो पल की चुप्पी एक युग सी लगी.फिर उन्होंने मुस्करा कर नमिता की ओर इशारा किया और नमिता दौड़ कर कुर्सी पर बैठ उनके कंधे के पास सर रख, बेसंभाल फफक पड़ी.इस बार उसे यह ख़याल भी नहीं था कि ये अस्पताल है,जोर से आवाज़ नहीं होनी चाहिए. उसका सर सहलाते पति की आँखों के कोर भी भीग आए. उन्होंने पीछे नजर की और देखा, नरेंद्र कुर्सी पर बिना हिले डुले बिलकुल सीधा सर झुकाए बैठा था. जैसे इस दृश्य का अपराधी वह ही था. दया हो आई उन्हें उस पर, जब से आया था, मुहँ नहीं खोला था,उसने.

अब  स्थिति उन्हें ही संभालनी  थी. नमिता को डांटा ,"चुप कर अब...पापाजी की तबियत और ख़राब हो जाएगी.अभी अगर आवाज़ सुन कर नर्स आ गयी तो इनके पास बैठने भी नहीं देगी."

पति ने भी माहौल हल्का करने के लिए, मुस्कराकर  पूछा, "कहाँ है वो, तुम्हारा मोटरसाइकिल वाला डरपोक?? जैसे चुपचाप ले गया था वैसे ही तुम्हे यहाँ चुपचाप छोड़ गया है क्या??"

नमिता  आँखे  पोंछती उठ कर एक तरफ खड़ी हो गयी. उन्होंने ही नरेंद्र को बुलाया, उनके पैर छू चुपचाप सर झुकाए बिस्तर के पास खड़ा हो गया. पर पति ने शायद उसे क्षमा  कर दिया था. प्यार से बोले, "क्या हाल है बाबू...ये तुम्हे परेशान तो नहीं करती...सारा गाँव डरता था इस से....ठीक से रहती तो है तुम्हारे साथ..??"

नरेंद्र अपनी आवाज़ शायद बाहर ही छोड़ कर आया था,सिर्फ मुस्करा कर सर हिला दिया. उनके कलेजे से एक बोझ उतर गया. रोज इस क्षण के लिए भगवान से प्रार्थन की थी और आज वह साकार हो गया. मन ही मन धन्यवाद कहा अपने गिरधर गोपाल  को.

शाम को प्रकाश और बहू आए तो नमिता को देख चौंके....फिर साथ चलने पर जोर डालने लगे.पर नमिता नहीं मानी. उसे अस्पताल में ही रहना था. नरेंद्र को ले गए साथ.और अब नमिता ने जैसे बाबू जी की बीमारी में सारी जिम्मेवारी अपने सर ले ली थी वैसे ही यहाँ भी सारा भार उठा  लिया. नर्स के साथ लगी रहती,चादर  ठीक करना कपड़े बदलवाना, फल काट कर के देना, सब कुछ करती. बुखार कम हो रहा था,पर डॉक्टर  कहते कुछ दिन रहना पड़ेगा अस्पताल में क्यूंकि मलेरिया बहुत ज्यादा बढ़ गया था. खून की बहुत कमी हो गयी है.

ममता,स्मिता भी आ गए.प्रमोद भी रोज फोन पर बात करता और नाराज़ होता,"कैसे डॉक्टर हैं गाँव के..पढाई नहीं की क्या??....खून जांच करवाया तो कैसे मलेरिया नहीं पता चला??...इनलोगों को इतना तक पता नहीं कि बुखार में  ही खून जांच के लिए लेते हैं,तभी  मलेरिया के कीटाणु खून में आते हैं अन्यथा नहीं. जहाँ दो गोली में पापाजी ठीक हो जाते, इतना समय लग रहा है और..इतनी तकलीफ सहनी पड़ रही है..." फिर थोड़ा रुक कर कहता.."मैं भी आ रहा हूँ "

उन्हें एकबारगी लगता वो अपने पिता को देखने आ रहा है या उस डॉक्टर कि खबर लेने. करने.

सारे बच्चे परेशान थे , पति एक अनुशासित दिनचर्या के आदी थे. रोज घूमने जाते ,सात्विक भोजन करते. अब तक कभी दो दिन से ज्यादा बीमार नहीं रहें. और अस्पताल में भरती होने की तो यह पहली घटना थी. मीरा को छुट्टी नहीं मिल रही थी.अस्पताल में रोज फोन कर देर तक नमिता से बातें करती. और अफ़सोस  करती कि सारे भाई-बहन जमा हैं और वो ही नहीं आ पा रही. सब उसे समझाते..'फिकर ना करो..हम सब यहाँ हैं"

पर अब पति ठीक हो रहें थे, शारीरिक रूप से भी और मानसिक निश्चिन्तता भी फैली रहती चेहरे पर. ममता,स्मिता भी अब लौटने की तैयारी कर रहें थे. ऐसे में ही, एक रात नमिता उनकी चादर ठीक करने उठी और जोर से डॉक्टर....डॉक्टर चिल्लाती हुई बाहर भागी. उनका किसी आशंका से मन काँप गया और जैसे काठ मार गया उन्हें. वे हिली तक नहीं. बस जड़ बनी देखती रहीं, कई डॉक्टर नर्स सब जमा हो गए...जल्दी से कुछ मशीन लाये गए पर ममता के पापाजी...नींद में ही शान्ति से इस दुनिया से विदा हो गए.

सब लूटे-पिटे से गाँव आ गए.बस प्रमोद और मीरा उनके अंतिम दर्शन नहीं कर सके. प्रमोद दो दिन बाद आया और रोता रहा, "क्या फायदा मेरे डॉक्टर  बनने का, वहाँ मैं अपना सुख-चैन,नींद खोकर गैरों का इलाज़ करता हूँ और यहाँ मेरे पिता का गलत इलाज़ होता रहा."

मीरा जैसे पत्थर की हो गयी थी. विश्वास ही नहीं कर पाती. उसे अभी अपने पापाजी के लिए कितना कुछ करना था और वे यूँ चले गए. सारे काम वही देख रही थी. ममता.स्मिता बहुत पहले ही गाँव से जा चुकी थीं, उनके समय काम करनेवाले सब बूढे हो गए थे. उनके बेटे-बेटियों को वे लोग अब नहीं पहचानती थीं. प्रकाश-प्रमोद ने तो गाँव में रहकर भी अपने पढ़ाई के सिवा और कुछ नहीं जाना. नमिता उनका साथ एक पल को नहीं छोडती. कमरे में वे बैठी होतीं और उनके एक तरफ नमिता और एक तरफ प्रमोद,सारा सारा दिन उनका हाथ पकड़ बैठे रहते. मीरा बेचारी अकेली गोपाल जी के साथ सारा इंतजाम देखती. प्रकाश भी उसकी सलाह से ही कुछ करता.

उनके लिए तो समय रुक गया सा लगता. इतने वर्षों से सुबह उठ पति को दातुन देने  और चाय बनाने के साथ..जो दिन शुरू होता वो..रात में पानी का ग्लास रखने के साथ ही ख़त्म होता. अब वे क्या करेंगी..अपने दिन और रात का.

फिर भी बच्चों का मुहँ देख, अपना दुख अंदर ही पी लेतीं. रात में भी नमिता और प्रकाश तो उनके साथ बने होते. प्रकाश,मीरा और गोपाल जी लालटेन की रोशनी में ,किस दिन क्या करना है,भोज के लिए क्या क्या तैयारियाँ करनी हैं,सबकी रूप-रेखा बनाते रहते. दोनों ननदें, ममता,स्मिता और दोनों बहुएं बच्चों के साथ आँगन में चारपाइयों पर बैठी होतीं या फिर छत पर चटाइयाँ बिछा जमी होतीं. बातों के बीच कभी कभी उनकी हंसी भी सुनाई दे जाती. आखिर इतने दिनों बाद सब मिली थीं...कोई बात हंसी वाली भी हो जाती होगी. पति ऊपर से देख,प्रसन्न ही होते होंगे...अपने पीछे एक बहरी-पुरी हंसती-मुस्कुराती दुनिया छोड़ कर गए हैं.

सारा कुछ निबट गया, दूर के रिश्तेदार,गाँव के लोग,स्कूल के शिक्षक-छात्र ,सब जमा हुए. आँसू भरी आँखों से सबने पति को याद किया.वे वैसे ही पत्थर बनी सबके शोक सन्देश स्वीकारती रहीं.

अब बच्चे अपने अपने घरौंदों में लौटने वाले थे. प्रकाश,मीरा,नमिता सब आपस में बहस कर  रहें थे ,माँ मेरे साथ जाएगी,नहीं मेरे साथ जायेगी. प्रमोद चुप था,बोला ,"दो महीने बाद तो माँ को मैं ले जाऊंगा...अभी माँ की मर्जी,जिसके पास रहें." और उन्होंने अपनी मर्ज़ी सुना दी कि अभी तो कुछ दिन गाँव में ही रहेंगी,फिर जबतक मीरा कि शादी नहीं हो जाती,उसके साथ ही रहेंगी.

पर मीरा नमिता ने गुपचुप प्लान बनाया और नमिता गाँव में ही रुक गयी.फिर पंद्रह दिनों बाद मीरा वापस पहुँच गयी, "माँ..दीदी ,कबतक तुम्हे अगोर कर बैठेगी.उसे अपनी गृहस्थी देखने दो और मेरे साथ चलो,मैने घर ले लिया है"

"मैने कब रोका है इसे...ये खुद अपनी मर्जी से यहाँ है....."

"तुम्हे हम अकेला कैसे छोड़ सकते हैं...तुम मीरा  के साथ जाओ..जरा देखो लड़की कितनी दुबली हो गयी है...उसे ठीक से खाना-वना खिलाओ.." नमिता बोली.

वे कुछ नहीं बोलीं और मीरा के साथ शहर आ गयीं. खाना-वाना खिलाना तो एक बहाना था,यह दोनों बहनों की मिलीभगत थी, उन्हें मीरा के साथ लाने की. मीरा ने एक कामवाली रखी थी जो सारे काम किया करती. मीरा ने ऑफिस से आते ही हाथ मुहँ धोया और एक किताब जैसी बड़ी सी मशीन खोल ली.उन्होंने टोका..."सारा दिन तो काम किया करती है...अब तो आराम कर ले"

"माँ, ये काम नहीं है....पास आओ तुम्हे कुछ दिखाती हूँ. और उनका चश्मा उठा कर ले आई,जरा इसे पहनो और देखो अपने बहू बेटे को...और सिनेमा जैसे  उस छोटे से सफ़ेद परदे पर प्रमोद, पूजा और उसकी बिटिया की कई तस्वीरें देखीं.फिर मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "भैया की कविता सुनोगी?"

"कविता...और प्रमोद....??" उन्हें विश्वास नहीं हुआ.

"हाँ, माँ...भैया का एक ब्लॉग है...वह उसपर कविताएँ लिखा करता है.." फिर हंस पड़ी..."चाहे उस बरगद के पेड़ के नीचे कभी ना बैठा हो...नहर के किनारे ना घूमा हो...कुएँ के जगत पर बैठ चाँद ना निहारा हो.. ...पर इन सबपर  कविताएँ लिखी हैं....गाँव का एक एक कोना उतर आया है उसकी कविता में...कभी कभी अपने मन की बातें भी लिखता है....अपने देश की मिटटी को बहुत याद करता है, माँ...पर वहाँ का ऐशो आराम भी नहीं छोड़ना....दोनों हाथों में लड्डू कैसे मिलेंगे....."

मीरा और पता नहीं क्या क्या कहती रही...पर उनका मन तो एक ही बात पर अटक गया. उनका छोटे...कविताएँ लिखता है??...और उन्हें पता नहीं??. अपने बच्चे की बातें ही उन्हें नहीं पता??...इसे समझ नहीं....अभी उम्र छोटी है इसलिए हंस रही है...अपनी मिटटी से दूर रहना क्या होता है...इसे क्या पता?

वे  तो चार दिन में ही ऊब गयी थीं.सारा  दिन कमरे के भीतर. खुली हवा को तरस जातीं. मीरा दिन में तीन बार फोन करती.ऑफिस से आते ही उन्हें पार्क में लेकर जाती. शनिचर -इतवार मंदिर  के दर्शन के लिए ले जाती. पर वे पीली पड़ती जा रही थीं. शिकायत नहीं करतीं कुछ. आखिर बिटिया भी अकेली है...ऑफिस से आने के बाद कोई दो बात करने को तो है,उसके पास.

पर मीरा उनकी क्षीण पड़ती काया  और मायूस  चेहरा देख समझ गयीं...उनका यूँ सारे दिन अकेला इस शाहर में रहना मुश्किल है. खुद ही बोली..."चलो तुम कुछ दिन गाँव रह आओ..वहाँ दिन भर लोगों का आना-जाना रहेगा तो मन लगा रहेगा....तुम्हारा मन तो वहाँ  के पेड़ ,पौधे , खेत खलिहान ही बहला देंगे. "

"पर तू अकेले...ना मैं ठीक हूँ...तेरा अकेले रहना मुझे नहीं जमता..."

"उसकी फ़िक्र ना करो...एक अच्छी सी सहेली है...उसे बुला लेती हूँ...पर हाँ...अपना ख़याल रखना , ठीक से खाना-पीना वरना फिर ले आऊँगी यहीं."

और मीरा  उनके  साथ गाँव आई..सिवनाथ माएँ,कलावती...गोपाल जी सबको समझा गयी कि उसका ख़याल कैसे रखें. रमेसर को रात में ओसारे  पर सोने की ताकीद कर गयी. और दादी अम्मा रोज फोन कर सारी रिपोर्ट लेती.

रमेसर का नाम आते ही जैसे वह चौंकी....आँगन की तरफ देखा तो पाया, चांदनी ख़तम हो, अब सुबह का उजास फ़ैल रहा था. ओह सारी रात वह बैठी ही रह गयीं? हाथ में रखे मोबाइल पर नज़र गयी और हडबडा गयीं. जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाएँ .वरना नींद खुलते ही मीरा फोन करेगी और जो नहीं उठाया तो गाँव आ धमकेगी और जिद करेगी, "मेरे साथ चलो,माँ"

समाप्त

Monday, August 2, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -13)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर, उसके  विदेश चला गया. तीसरी बेटी नमिता ने दूसरी जाति के लड़के से घर से विरोध होने पर,घर से भागकर शादी कर ली)

गतांक से आगे

नमिता के जाने के बाद घर बिलकुल भुतहा लगने लगा था. लोगों का आना-जाना वैसे ही कम हो गया था. ये दोनों बाप-बेटी किताबों में खोये रहते. ना घर में रेडियो पर  गाने गूंजते और ना टी.वी. चलाने का ही किसी को शौक था. अक्सर बैटरी चार्ज करने का ही ध्यान नहीं रहता. वे ही याद करके मीरा को बोलतीं, तो लगा देती चार्जर या फिर भूल जाती. ज़िन्दगी ठहर गयी सी लगती थी. ममता और स्मिता जब विदा होकर गयीं  तो उनके बाकी बच्चे छोटे थे, अम्मा-बाबूजी भी जिंदा थे, काम में बेटी का विछोह भूली रहतीं.

पर अब तो चारो तरफ उन्हें नमिता ही दिखती. कभी सीढियों से उतरती हुई, कभी तेज तेज हैंडपंप चला चेहरे पर छींटे मारती हुई तो कभी चारपाई पर लेटी तारों में जाने क्या खोजती हुई सी...जब दुबारा फिर देखती, तो सूनी सीढियाँ,शांत हैंडपंप और खाली चारपाई ही नज़र आती. अंदर के सन्नाटे  से घबराकर बाहर देखती तो एक बार लगता जैसे, अमरुद के पत्तों  के बीच कोई लाल रिबन झाँक रही है, फिर ठंढी सांस भर कर रह जाती,पता नहीं शहर में कैसी होगी,उनकी बिटिया इन पेड़-पौधों , खेत-खलिहानों के बिना.

पर एक दोपहर स्मिता का फोन आया. वे डर ही गयीं क्यूंकि स्मिता तो हमेशा ,रात ग्यारह के बाद ही फोन करती थी,तब पैसे कम लगते थे. भरी दोपहर को  फोन किया कुछ अघटित तो नहीं घट गया.मन आशंका से काँप उठा. स्मिता ने  धीरे से पूछा, "कोई आस-पास तो नहीं?" उनके 'ना' कहने पर उसने ख़ुशी से चीखते  हुए बताया, "माँ,नमिता का फोन आया था, नरेंद्र  ने भी बात की. नमिता बहुत रो रही थी...सबका हाल-चाल पूछ रही थी..... दोनों ठीक है, गृहस्थी बसा ली है. मुझे बुलाया है...मैं तो यहाँ नहीं बुला सकती..मेरे सास-ससुर हैं पर मैने संजीव से बात की, वे  मान गए हैं....जाकर एक बार दोनों को देख आउंगी"

उनकी आँखों से आँसू बह चले, चलो ठीक है लड़की. अब स्मिता से उसकी खबर मिलती रहेगी.

उनका चेहरा ख़ुशी से इतना  खिला-खिला था कि शाम को पति ने भी दो बार नज़रें उठा कर देखा,पर वे जल्दी से किसी काम में लग गयीं.
रात में चुपके से मीरा को बताया वो भी बहुत खुश हुई...'माँ कुछ दिन बाद पापा जी का गुस्सा शांत हो जायेगा तब दीदी घर आ  सकेगी, ना ?"

"क्या पता बेटा...." एक गहरी सांस ली उन्होंने. पति तो कभी नाम भी नहीं लेते उसका. और जो बातें उन्होंने नमिता को फोन पर बोली हैं, कैसे बताएं इस नन्ही लड़की को जो बातें बस बड़ी बड़ी करती है.

नमिता के जाने के बाद मीरा भी  बहुत अकेली पड़ गयी थी. गाँव में ,कॉलेज में, यूँ भी उसका कोई दोस्त और सहेली नहीं थे. सब उस से थोड़ी  दूरी रखते थे. हमेशा फर्स्ट आती क्लास में. टीचर्स भी बोलते कि ये तो प्रकाश,प्रमोद से भी ज्यादा तेज है. अंग्रेजी की  किताबें  धडाधड पढ़ जाती , स्कूल, कॉलेज  में कोई जरूरी चिठ्ठी लिखवानी हो तो शिक्षक भी उसे बुलाते, लिखने को. टी.वी. पर देर रात तक वो अंग्रेजी की बहस देखा करती.

सिवनाथ माएँ,कलावती सब उसे टोकती रहतीं..."क्या करोगी इतना दिन-रात पढके?...सादी  के बाद तो रोटी पकाने  और बच्चे ही संभालने होंगे...उहाँ ई किताब का ज्ञान काम नहीं आएगा.."

मीरा सिर्फ हंस देती.."तुम देखो, काकी मैं क्या क्या करती हूँ...."

"बस बिटिया भगवान जिंदा रखें...तुम्हारे बच्चे खिला लूँ,गोद में...फिर ले जाए, जमदूत "

"चुप रहो.....भरी सांझ को क्या बोल रही हो.." वे टोक देतीं,पर देखती सचमुच कितनी बूढी लगने लगी
हैं..उनसे २,३ साल ही बड़ी होंगी. इनलोगों की १२,१३ वर्ष की  उम्र में तो शादी हो जाती, १४-१५ साल में माँ बन जातीं, फिर कड़ी मेहनत और रुखा सूखा खाना , ३० में ही बुढ़ापा आ घेरता और ५० तक पहुँचते पहुँचते झुरकुट बुढ़िया लगने लगतीं.

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मीरा के बी.ए.के इम्तहान हो गए फिर भी वह पढ़ाई में वैसे ही गुम रहती, अब प्रकाश उनलोगों के अकेलेपन का ख़याल कर कभी कभी घर आने लगा था. उसके बच्चों को गाँव बहुत अच्छा लगता. इतनी खुली जगह...दौड़ने खेलने की छूट, पढ़ाई से छुट्टी, बहुत भाती उन्हें. बेटा राज़, तो अपने लाये खिलौनों को हाथ भी नहीं लगाता और टूटी टहनी, रस्सी के टुकड़े, टोकरी किन किन चीज़ों से वह नए नए तरीके से नहीं खेलता. एक लकड़ी के टुकड़े पर रस्सी बाँध किसी ऊँची जगह पर चुपचाप बैठ जाता.वे पूछतीं,

"यूँ अकेले चुपचाप बैठकर क्या कर रहा है??"

तो कहता,"फिशिंग कर रहा हूँ "

वे नहीं समझ  पातीं तो प्रकाश हँसता हुआ समझाता, "माँ, वो मछली मार रहा है"

" राम राम...ये कौन सा खेल है...यही बनेगा क्या बड़ा होकर"

"माँ, लोग शौक से भी मछली मारते हैं .."

"शौक से क्यूँ..."

"वो सब छोडो बताओ खाने  में क्या है...." प्रकाश बस जैसे खाने और सोने को ही आता. शहर की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से दूर यहाँ बहुत सुकून मिलता उसे. शाम होते ही छत पर चला जाता और एक चटाई पर लेट आकाश देखता रहता.

बिटिया 'रिनी' सारे घर में ठुमक ठुमक घुमा करती.जब वे रात में  उसके पैरों में तेल लगा मालिश करती हुई उसे राजा-रानी और परियों की कहानी  सुनातीं.तो वह अपनी नींद भरी आँखें खुली रखने की कोशिश करती रहती."अब सो जा,कल सुनाउंगी  कहानी,"कहने पर भी वो अपनी अधमुंदी आँखों से ही 'ना' का इशारा करती.

 एक प्रीति का मन शायद उतना नहीं लगता पर बच्चे जिद करते.."...मम्मा कुछ दिन और यही रहेंगे"  और उसे रुकना  पड़ता. वह भी मीरा की किताबें उलट पुलट करती रहती और मीरा से ही बातें करती रहती.

मीरा के बी.ए.का रिजल्ट आया और वह कॉलेज में ही नहीं,यूनिवर्सिटी में प्रथम आई. मीरा को भी विश्वास नहीं होता. बार-बार कहती, "अच्छे नंबर मिलेंगे ये तो सोचा था पर फर्स्ट क्लास फर्स्ट ...ये नहीं सोचा था कभी"

पति भी बड़े खुश थे,बड़ी सी हंडिया में रसगुल्ले लेकर आए और बहुत दिनों बाद शाम को कुर्सी निकाल अहाते में बैठे.

कॉलेज में भी सारे प्रोफ़ेसर बड़े खुश थे. उन्होंने कॉलेज के वार्षिक उत्सव में  मीरा को पुरस्कार देने की योजना बनायी.... माता-पिता दोनों को बुलाया. वे तो कभी जानने वालों के  सामने यूँ मुँह उघारे  नहीं गयीं.उन अजनबी लोगों के बीच कैसे बैठेंगी? उनके तो पैर काँप रहें थे.

पति से कहा तो उन्होंने घुड़क दिया, "क्या गंवारो जैसी बातें कर रही हो...इतनी उम्र हो गयी....बेटा विदेस में,बेटी मुंबई में और तुम्हे डर लग रहा है??"

"मन हुआ कहें..सारी उम्र तो गाँव में रहीं तो शहरियों  जैसी बातें कैसे करेंगी....और उम्र से डर का क्या रिश्ता?"...पर चुप रहीं.

मीरा उनकी घबराहट भांप गयी. और काफी देर तक उनका हाथ पकड़ कर बैठी रही. थोड़ी देर में वे भी सहज हो गयीं और कार्यक्रम का आनंद लेने लगीं. जब मीरा के नाम की घोषणा के साथ प्रिंसिपल ने उसकी तारीफों के पुल बांधे तो आँखें भर आई उनकी. कभी कभी कितना धोखा दे देती हैं, आँखें. दुख हो,सुख हो, नाराज़गी हो  ,बेबसी हो , गर्व हो जब देखो भर आती हैं.

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प्रकाश, अब जब घर आने लगा था तो उन्होंने मीरा के लिए लड़का देखने की बात उसी से कही. कहने लगा ,"माँ अब जमाना बदल रहा है...मीरा इतनी तेज़ है पढने में...आगे पढना चाहती है...पढने दो,नौकरी करने दो....फिर देखेंगे उसके लिए लड़का...आजकल अच्छे लड़के भी खूब पढ़ी लिखी लड़की ही चाहते हैं जो जरूरत पड़ने पर नौकरी कर घर भी  संभाल सके."

यह नई बात थी उनके लिए,पर जब पूरा घर ही एकमत है तो वे क्या  कह सकती थीं. पति भी बेटे की हाँ में हाँ मिलाते रहते. जैसे अपनी जिम्मेदारियां उसके सर पर डाल निश्चिन्त हो गए हों. रिटायर होने के बाद, पूरा ध्यान बागवानी में ही रहता. नई नई किस्मों के फूल और अलग-अलग सी सब्जियां लगाते. कुछ सब्जियां तो तो उन्हें बनानी  भी नहीं आतीं . किताबों में पढ़कर मीरा  बताती, कैसे बनाते हैं.

अब बस किताबें ही उसकी साथी थीं. कुछ बिजनेस मैनेजमेंट करेगी,ऐसा कहती .वे समझ नहीं पाती,पढ़-लिख कर कैसे बिजनेस करेंगे. कुछ खरीदने -बेचने के लिए पढ़ाई की क्या जरूरत...पर होगा  कुछ.  नए जमाने की बहुत सारी बातें उन्हें समझ में नहीं आतीं. प्रकाश मोटी मोटी किताबें भेजता रहता उसके लिए. डाक से भी कुछ कागज़-पत्तर आते. कहती डाक से कोचिंग कर रही है. अब पढ़ाई भी चिट्ठी-पत्री से  शुरु हो गयी. अब इसी ज़िन्दगी में पता नहीं और क्या क्या देखेंगी वे.

मीरा परीक्षा देने शहर गयी. रिजल्ट आया तो पता चला उसका अच्छे कॉलेज में चयन हो गया है. वे डर रही थीं.अब उसे हॉस्टल में रखने का खर्चा कहाँ से आएगा??. बेटों  के सामने मुहँ तो नहीं खोलना पड़ेगा?? पर मीरा ने पहले से ही  सब कुछ तय कर रखा था.प्रकाश से बात कर ली थी और उसके शहर के कॉलेज में ही एडमिशन लिया. वह प्रकाश के घर ही  रहने वाली थी. उनकी छाती से चिंता का बोझ उतर गया. लड़की बड़े भाई की सुरक्षा में रहेगी.अब और क्या चाहिए.

मीरा के जाने के बाद तो अब घर काट  खाने को दौड़ता. वे भी पति के पीछे पीछे बागवानी में रूचि लेने लगीं. सुबह घंटा भर रामायण पढ़तीं पर फिर भी समय काटे नहीं कटता. पहले सारा दिन बच्चों को घर फैलाने के लिए डांटा करती थीं.अब एक बार सहेज देतीं तो हफ़्तों चीज़ें वैसी ही संभली हुई रहतीं. बस धूल की परत जमा होती रहती,उसे झाड़ते हुए आँखें फिर एक बार लबालब हो जातीं.

बस फोन की घंटी का इंतज़ार होता. रोज़ किसी ना किसी बच्चे का फोन आ ही जाता. फिर भी नमिता की आवाज़ सुनने को कान तरसते रहते......पर उसने भी पिता की डांट को दिल पे ले लिया था. भूले से भी कभी कोशिश नहीं करती, या फिर डरती थी कि कहीं फिर से पिता ही ना फोन उठा लें...जो भी हो पर इन  पिता-पुत्री के अहम् के पाट के बीच  एक माँ का दिल पीसा जा रहा था.

इस बार फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ...नन्ही 'रिनी' थी . उसका जन्मदिन आ रहा था और उसने जिद की कि इस बार दादा-दादी को उसके जन्मदिन पर आना ही है. उनका भी मन मीरा से मिलने को तरस रहा था. पति भी मान गए. पहली बार दोनों लोगो ने  अकेले जाकर शहर से खरीदारी की. उन्हें तो रिक्शे पर भी साथ बैठने में लाज आ रही थी. पति ने भी दूसरी तरफ मुहँ घुमा रखा था. ढूंढ ढूंढ कर उन्होंने बच्चों के लिए शहरी डिजाइन के कपड़े ख़रीदे . डर था, ऐसा ना हो ,बहू को पसंद ना आए तो वो पहनाये ही नहीं. ढेर सारे खिलौने लिए दोनों के लिए और जन्मदिन से एक दिन पहले बेटे के यहाँ पहुँच गए.

इतने लम्बे सफ़र की आदत नहीं थी.थक सी गयी थीं वे. पूरा दिन तो लेटे ही बीता. रात को भी पूरी तरह आराम करने के बाद, तबियत थोड़ी संभली लगी.आदतवश अल्ल सबेरे ही नींद खुल गयी. रसोई में बत्ती जलती देख और खटर-पटर होते देख सोचा,'अरे बहू इतनी जल्दी जाग गयी है, शहर हो या गाँव औरतों को सुबह की नींद नसीब नहीं. देखूं जबतक हूँ, थोड़ा मदद कर दूँ" यह सोच रसोई में पैर रखा तो देखा, बहू की जगह मीरा काम में लगी हुई है. बिजली की सी फुर्ती सी वह कभी एक तरफ सब्जी काट रही थी तो कभी, मिक्सी में घर्रर करके कुछ पीस रही थी तो कभी गैस पर चढ़ी कढाई में करछुल घुमाती.

उन्हें देखते ही बोली, "अरे माँ...जाग गयी....चाय पियोगी..?"

"ना बेटा...पर तू काम कर रही है...ला मैं कुछ मदद कर दूँ..." पर वे करतीं क्या? उन्हें तो खड़े होकर खाना पकाना आता ही नहीं. ना वे टी.वी. वालों की तरह फुर्ती से चाकू से सब्जी काट सकती हैं. बीच में चुपचाप खड़ी हो गयीं. मीरा कभी फ्रिज खोलती,कभी दौड़कर किसी डब्बे में से कुछ निकालती,बार बार उनसे टकरा जाती.

 उन्होंने ही बोला..."मैं एक तरफ खड़ी हो जाती हूँ....तुझे बार -बार टक्कर लग रही है.."

"कोई बात नहीं माँ..."और मीरा ने एक स्टूल लाकर रख दिया..."लो बैठो इस पर"

"पर बेटा तूने कब सीखा ये सब बनाना....और क्या तू ही रोज बनाती है,खाना ...बहू  नहीं आती,मदद को..."

"इसमें सीखना क्या है माँ...आ जाता है लड़कियों को सबकुछ...भाभी करती हैं....वो कल देर रात कोई फिल्म देखी होगी ना..इसलिए नींद नहीं खुली होगी....एक मिनट जरा मैं बच्चों को उठा दूँ..वरना लेट  हो जायेंगे  स्कूल को.."

आँखें मलती 'रिनी' को उसने गोद में लाकर उनके पास खड़ा कर  दिया और प्यार से बोली.."आज रिनी क्या ले जाएगी टिफिन में...बोलो क्या रख दूँ"

यानि टिफिन भी मीरा ही  तैयार करती है.उसके बाद वे चुपचाप देखती रहीं. बच्चों का टिफिन रखा,उन्हें तैयार  किया. इस बीच राज़ एक बार गुस्से में आया भी...'मेरा कैलेण्डर नहीं. मिल रहा...मुझे पनिशमेंट मिलेगी..." उसकी किताब खोज कर दी.रिनी के जूते के फीते बांधे...बाल ठीक किए, उन्हें दूध में  डब्बे से कुछ डालकर खिलाया और दोनों बच्चे बिलकुल तैयार हो बहू के कमरे में भागते हुए गए..बहू की उनींदी आवाज़ आई..."बाय बेटा..." और अपनी ममी के गालों पर पप्पी दे..दोनों बच्चे गेट की तरफ भाग गए. प्रकाश उठ कर उनके पीछे गया.

वे स्कूल बस में चढ़ गए तो बाहर से अखबार लेकर आते हुए,प्रकाश ने आवाज़ लगाई.."मीरा चाय देना,जरा"

वे हैरान हो बस देखती रही, मीरा ने कभी रसोई में काम नहीं किया था ,पता नहीं  इतना कुछ इतनी जल्दी कैसे सीख लिया. पसीने से नहाती मीरा बार बार एक हाथ से चेहरे से बाल हटाती जाती और पराठे बेलती जाती.

"अब ये पराठे किसके लिए बना रही है..??."

"खुद के लिए और भैया के लिए, माँ....मुझे भी तो लंच ले जाना है और अपने लिए बना लूँ, भैया के लिए नहीं तो कैसा लगेगा..."

रसोई का काम ख़त्म कर मीरा तैयार होने चली गयी. अपना लंच पैक किया, और चाय चढ़ा दी गैस पर...फ्रिज से एक पीस ब्रेड निकाला और एक टुकड़ा मुहँ में डाला और  चाय छानने लगी. उन्हें लगा ,अब शायद इत्मीनान से चाय पी सकेगी. पर नहीं उसने तो सिर्फ एक पीस ब्रेड खाया और चाय डाइनिंग टेबल पर रख आवाज़ दी.."भाभी चाय रखी है...मैं जा रही हूँ...बाय"

उनींदी सी बहू जल्दी से बाहर निकल कर आई...."आज जल्दी आ रही हो ना...और वो लिस्ट रख ली..जो समान लाने को दी थी मैने .."

"हाँ भाभी, लेती आउंगी  वो गुब्बारे, चॉकलेट  और डेकोरेशन का समान...जल्दी आ जाउंगी और रूम भी डेकोरेट कर दूंगी...आप टेंशन मत लो"

फिर कमरे में आई..."आज जल्दी आती हूँ माँ...फिर आराम से बातें करुँगी..."

"बेटा तूने सिर्फ एक  सूखी सी ब्रेड खाई  है...कुछ और नहीं खाएगी ??."

"माँ सुबह सुबह खाया कहाँ जाता है...देर हो रही है..अब चलूँ.."

शाम को ढेर सारा समान लिए हुए मीरा आई.....बस एक कप चाय पी, कपड़े भी नहीं बदले और काम में लग गयी. बहू  के साथ मिलकर कमरा सजाया, और फिर किचन में चली गयी. कामवाली को बहू ने रोक लिया था  पर ज्यादा काम मीरा ही कर रही थी.

कामवाली मीरा के गुण गाते नहीं थक रही थी. "बहुत कामकाजी है बिटिया, आपकी ...पूरा घर संभाल लिया है,सुबह भी सारा खाना बनाती है...और कितनी पढ़ाई भी करती है, भाभी  जी को बड़ा आराम हो गया है,इसके आने से....बस दोपहर को चावल बनाती हैं और छुट्टी.."

पर मीरा ने डांट दिया उसे..." शारदा...काम भी करोगी या सिर्फ बातें....ये सारी प्लेटें पोंछ कर रखो.."

फिर उनकी बाँह  पकड़ उन्हें कमरे में ले आई...उनकी अटैची खोल चुनकर एक साड़ी निकाली और बोली, "अब तुम तैयार हो जाओ, मेहमान आने ही वाले हैं...बाबू जी का भी कुरता -पायजामा दो...मैं देकर आती हूँ उन्हें   "

"और तुम ..."

" मुझे टाइम नहीं लगता....दो मिनट में तैयार हो जाउंगी.. किचन में थोड़ा काम बाकी है...और अब तुम किचन में मत आना जाकर लिविंग रूम में बाबूजी के पास बैठो..मेहमान आते ही होंगे..." सबसे छुटकी बेटी आदेश दे रही थी उन्हें.

ड्राइंग रूम में जाकर मूरत की तरह चुपचाप बैठ गयीं वे. जब कुछ काम नहीं कर रहीं तो रसोई में खड़े  हो  क्यूँ लोगों को सोचने का मौका दें कि दो दिन के लिए आई हैं बेटे के यहाँ और खट रही हैं.

बच्चों को बहू ने ही तैयार किया. रिनी ने जिद पकड़ ली थी, दादी की लाई हुई फ्रॉक ही पहनूंगी...बहू उनके पास आई...."माँ, इसे समझाइये ना..आपकी लाई फ्रॉक कल पहना दूंगी...मैने जो खरीदी है...उसके मैचिंग हेयरबैंड, जूते सब हैं."

"रिनी,जब हम मंदिर जाएंगे ना तब वो पहनना ...वो पहन कर तो भगवान को प्रणाम करना है, पहले...ठीक..." उन्होंने समझाया ...प्रकाश, पास के एक बड़े मंदिर में हर बार उन्हें जरूर लेकर जाता.

रिनी ने चाबी वाली गुड़िया की तरह, सर ऊपर नीचे किया और भाग गयी तैयार होने.

प्रकाश भी थका हुआ सा आया, बच्चे आए, गेम्स हुए, केक कटा, कुछ परिवार भी थे. सबने अदब से उनलोगों को नमस्ते की. मीरा के पैरों पर तो जैसे पहिये लगे हुए थे, भागकर कभी किचेन में जाती ...कभी बच्चों को गेम खिलाती.

पर एक बात अखर गयी उन्हें. इतने सारे फोटो खींचे गए,बच्चों के साथ उन बुड्ढे-बुढ़ियों के भी ढेर सारे फोटो  खींचे गए.पर किसी को काम में उलझी मीरा का ख़याल नहीं आया. उन्हें हर बार लगता,अब प्रकाश आवाज़ देगा या बहू बुलाएगी...पर मशीन की तरह खटती उस लड़की का किसी को ख़याल ही नहीं था.

बारह बज गए ,सारे मेहमान के जाते. मीरा ने ही कामवाली के साथ मिल कमरा साफ़ किया. बहू  तो मुस्करा मुस्करा कर ही थक गयी थी. मीरा कमरे में आ कपड़े बदल, बिस्तर पर ढह सी गयी....और बोली..."थोड़ा लेटती  हूँ...फिर उठ कर पढ़ाई करुँगी"

वे चौंक कर बिस्तर पर उठ कर ही बैठ गयीं..."तू पागल तो नहीं हो गयी...एक सुबह की उठी हुई है....कॉलेज गयी..इतना काम किया और अब पूरी नींद भी नहीं लेगी...बीमार पड़ जाएगी इस तरह..."

"चिंता मत करो माँ...आदत हो गयी है यूँ जागने की..कुछ नहीं होगा...तुम सो जाओ..."

पर उनकी आँखों की नींद उचट गयी  थी...अपने भाई के घर में लड़की का ये हाल  है...कितनी बड़ी कीमत चुका रही है...अपनी पढ़ाई के लिए.

दूसरे दिन भी ,मीरा का यही रूटीन था.उसने कहा था...'भाभी आती है मदद को'..पर उन्होंने एक दिन नहीं देखा उसे रसोई में आते."

उन्होंने एकाध बार मदद करने की कोशिश की पर मीरा का काम ही बढ़ा दिया. बोलीं "और कुछ नहीं तो  बच्चों के पानी के बोतल ही भर देती हूँ."

पर उन छोटी मुहँ वाले बोतल में पानी भरना भी एक कला है...नीचे पूरा पानी फ़ैल गया...जिसे मीरा  ने बिजली की फुर्ती से पोंछे का कपड़ा ले हँसते हुए पोंछ डाला. ताकि वे अपराधी ना महसूस करें.

वे कुछ सोचकर नहीं आई थीं कि कब लौटेंगी...पति से कहा भी था  ,मन  लग जायेगा तो कुछ दिन रह जाएंगे  बेटा बहू,पोते-पोती, बेटी सब तो हैं वहाँ...गाँव में यूँ भी सूनी दीवारें तकते  बीतते हैं दिन औ रात.

पर अब चार दिन में ही मन ऊब गया था. अपनी फूल सी बच्ची की ऐसी कठोर दिनचर्या देखी नहीं जा रही थी. मीरा ने उनके जाने की बात सुनी तो उदास हो गयी. उन्होंने बता ही दिया..."इस तरह उसका काम करना नहीं देखा जा रहा..."

मीरा ने बड़े बूढों की तरह समझाया..." सिर्फ दो साल की तो बात है,माँ....पढ़ाई पूरी हो जाएगी...नौकरी लग जाएगी..फिर मैं यहाँ थोड़े ही रहूंगी.....अब जब रहती हूँ तो काम तो करना ही पड़ेगा, ना...मुफ्त में किसी का अहसान क्यूँ लूँ?"

"बेटा..प्रकाश तेरा भाई है...कोई कैसे हो गया?"

"माँ, भैया ने बहुत मदद की है....उनके भरोसे ही तो पढ़ रही हूँ....कितनी फीस लगती है , पढने में..तुम्हे अंदाज़ा भी नहीं होगा ,उसपर से किताबें ....पर उनकी कमाई पर  भाभी का भी तो हक़ है...उन्हें शायद अच्छा ना लगे ,उनके पैसों का यूँ बँटना...इसलिए अच्छा है...थोड़ा खुश रखो...किसी का मन मैला ना होने दो....थोड़ा काम ही तो करना पड़ता है बस......भाभी भी अच्छा व्यवहार करती हैं,माँ...कभी उल्टा-सीधा कुछ नहीं बोला"

उन्होंने गहरी सांस ली...उन्हें इस नई पीढ़ी का हिसाब-किताब समझ नहीं आता...उन्हें तो इतना पता है,बड़ा भाई ,बाप  की जगह होता है....क्या प्रकाश बिना फीस दिए ही इंजिनियर बन गया...आज अगर अपनी बहन को पढ़ा रहा है...तो कोई अहसान तो नहीं कर रहा...जिसे बहन उसके घर नौकरों की तरह खटकर चुकाए. और बहू किस बात पर मन मैला करेगी....घर बच्चों की तरफ से एकदम निश्चिन्त है. रात में भी देखती...अपने साथ बिठाकर मीरा ही पढ़ाती उन्हें. बहू तो कोई सीरियल देखती रहती,अपने कमरे में. प्रकाश भी सब समझता होगा, पर घर में शान्ति रहें इसलिए चुप रहता होगा.

ये नए ज़माने का घर ,नए जमाने की बातें...उनके गले नहीं उतरतीं और उन्होंने पति से सीधा कह  दिया..."सामान संभाल रही हूँ...कल चलेंगे यहाँ से"

पति चौंके...वे तो पूरा दिन बाहर वाले कमरे में ही बैठे रहते...अखबार पढ़ते..टी.वी. देखते और शाम को टहलने निकल जाते. दरवाजे पर भारी पर्दा पड़ा था...घर के अंदर क्या चल रहा  है,उन्हें कुछ पता ही नहीं चलता. और उन्हें कुछ बताने का मन भी नहीं हुआ...वे...समझेंगे ही नहीं,ये बातें. और समझ  भी जाएँ तो उसे मानेंगे नहीं....सौ तरह से उसे सही ठहराने की कोशिश करेंगे और कहेंगे ये सब उनका वहम है.

(क्रमशः)