Sunday, June 27, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -4)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से वे जग जाती हैं,और पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे.बड़ी बेटी ममता की शादी ससुर जी ने पति की इच्छा के विरुद्ध एक बड़े घर में कर दी.वे लोग ममता को तो कोई कमी नहीं महसूस होने देते पर उसे मायके नहीं आने देते )
 

गतांक से आगे
 

वे कनस्तर से आटा निकाल कर  काकी को दे रही थीं,गूंधने को. इसी बीच बाहर प्रमोद की जोर जोर से चिल्लाने की आवाजें सुनीं तो आटे सने हाथों से ही दरवाजे की तरफ भागीं और सामने जो नज़र गयी तो हतप्रभ रह गयीं,ध्यान भी नहीं रहा और वही आटे सने हाथ आश्चर्य से होठों पे रख लिए. दूर से पीले छींट की फ्रॉक पहने, कानों के पास लाल रंग के रिबन के दो फूल लगाए, नमिता साईकिल चलाती, उसकी घंटी टुनटुनाती हुई  चली आ रही थी. यहाँ प्रमोद ,गुस्से  से पागल हुआ जा रहा था, क्यूंकि उसके ट्यूशन जाने का समय हो रहा था और नमिता, साइकिल ले चली गयी थी. पर इस लड़की ने साइकिल चलाना कब सीखा? प्रमोद के शब्द उनके कानों तक जा ही नहीं रहें थे वे मंत्रमुग्ध सी नमिता को देख रही थीं,ऐसा लग रहा था, किसी मल्लिका की तरह वो राजहंस पर बैठी तैरती हुई चली आ रही है.

अहाते में पहुँचते ही, नमिता साइकिल से ठीक से उतरी भी नहीं थी की प्रमोद ने धक्का दे, उसे गिरा कर साइकिल छीन  ली. नमिता ने भी उठकर उसे जोर का धक्का  दिया पर प्रमोद ने उसके बाल खींच दो धौल पीठ पर जमा दिए और साइकिल ले चलता बना. नमिता वहीँ जमीन पर  बैठ कर पैर पटक पटक कर भाँ भाँ करके रोने लगी. उन्होंने इशारे से उसे बुलाया. क्या विवशता थी,वे देहरी लांघ,अपनी रोती बेटी को चुप भी नहीं करा सकती थीं. आँगन में काम करती, शिवनाथ माएं को आवाज दे ,नमिता को चुप करा लाने को कहा.वो उठाने गयी तो नमिता ने उसके हाथ झटक दिए और खुद ही चल पड़ी पर अंदर नहीं आई ,बाहर ही चौकी पर आँसू पोंछती बैठ गयी.



थोड़ी ही देर में बच्चों का झुण्ड "नमता नमता " की पुकार  लगाते हुए आया और वो उठ कर चल दी,गुल्ली-डंडा खेलने. बेटे गाँव के लड़कों के साथ ज्यादा घुलते मिलते नहीं थे. खुद को जरा विशिष्ट समझते पर नमिता, गाँव के हमउम्र लड़कों के साथ,"गुल्ली डंडा" ,कभी "कंचे" तो कभी "डेंगा पानी" खेला  करती. कभी भाइयों के जतन से छुपाये,गेंद-बल्ला ढूंढ निकालती और गाँव के लड़कों के साथ जम कर खेलती लेकिन उसे वापस उसी जगह पर रखने की बजाय लापरवाही से बाहर बरामदे में ही छोड़ देती. जब बेटे देख लेते फिर तो आँगन में जो महाभारत मचती कि लगता किसी का तो सर फूट कर रहेगा.

प्रमोद कहता, " इसी बल्ले से एक दिन तेरा सर फोड़ दूंगा...अगर फिर से छुआ है कभी?"

नमिता कमर पे हाथ रख कर कहती,"हिम्मत है तो आगे बढ़ के देख...सौ बार छूँऊँगी "

" पापा जी मेरे लिए शहर से लेकर आए हैं...लडकियां नहीं खेलतीं क्रिकेट...जा जा कर गुड़िया की शादी रचा..."

"नाम लिखा है उस पे तुमहरा?...और किस किताब में लिखा है लडकियां नहीं खेलती क्रिकेट...जाओ जाकर किताबों में माथा रगडो..."

"माँ समझा दो,वरना सच में बहुत मारूंगा .."

"और जैसे मैं छोड़ दूंगी..."

किसी तरह नमिता को पकड़ कमरे में ले जातीं.

 आज भी ,उनका मन हो रहा था,उसे अपने से चिपटा खूब दुलार करें और पूछे, "ये साइकिल चलाना कहाँ से सीखा?" पर नमिता, दादी की तरह उन्हें भी अपना विरोधी ही मानती थी. दो भाइयों के बाद उसका जनम था. बचपन से ही वह नौकरानियों की गोद में ही पलती आई. पांच साल के प्रमोद को सास गोद में उठाये रहतीं पर तीन साल की रोती नमिता को कलावती,सीला के हवाले कर देतीं.उनकी गोद में छोटी मीरा थी. ये विद्रोह के बीज तब से ही नमिता के मन में पड़ गए . जिसे आगे की रोज रोज घटती घटनाओं ने खूब खाद पानी दिया. स्कूल जाने से पहले सारे बच्चे खाना खाने बैठते और सास कलावती को अंदर से घी का डब्बा लाकर प्रकाश और प्रमोद की दाल में घी डालने को बोलतीं. उनके विचार से लड़कों को ही घी खाने का हक़ था. नमिता का जब ध्यान गया तो उसने दाल खाना ही छोड़ दिया,सब्जी चावल खा कर उठ जाती,कहती मुझे दाल नहीं पसंद. उनका मन कसमसा कर रह जाता, पर वे सास के विरुद्ध नहीं जा सकती थीं. यह बात पतिदेव ने भी गौर की और उन्हें अलग बुलाकर कहा, लड़कियों के शरीर को भी उतनी ही पौष्टिकता की जरूरत है,किसी बहाने उन्हें पौष्टिक भोजन दिया करो.

उन्होंने कहा,"आप ही क्यूँ नहीं कहते?"

"मैने आजतक माँ के विरुद्ध कुछ कहा है? कहेंगी, औरत की बातों में आ गया है. तुम रसोई संभालती हो , कोई उपाय निकालो."

 पर वे क्या करतीं,घर में एक पत्ता भी सास की मर्जी के बिना नहीं खड़कता था.

गाँव में आए दिन किसी की बेटी ससुराल से, तो बहू मायके से आती रहतीं. और घर घर बैना भेजा  जाता. लाल क्रोशिये से बुने मेजपोश से ढके डगरे में मिठाइयों की अलग अलग छोटी छोटी ढेरियाँ बनीं होतीं ,जिसे कोई कामवाली, घर घर बांटने के लिए जाती. उस से बहू,बेटी के हालचाल पूछे जाते और    कुछ पैसे दिए जाते. किस घर से कितने पैसे मिले हैं, यह लेखा-जोखा भी लिया जाता. सास हमेशा अच्छी मिठाइयां पोतों  के लिए रख देतीं. यहाँ भी नमिता कह देती मुझे मीठा नहीं पसंद. एक बार दुपहरिया में सास सो रही थीं. उन्होंने ही बैना लिया और जल्दी से कमरे में पैर फैलाए मीरा के साथ, गोटी खेलती  नमिता के पास मिठाई ले कर गयीं.

"ले आज तेरे लिए अच्छी वाली मिठाई छांट कर लाई हूँ "

"जिस दिन दादी के सामने देने की हिम्मत हो,उस दिन देना" नमिता ने टका सा जबाब दे दिया.

 जब उन्होंने जबरदस्ती खिलाने की कोशिश की तो जमीन पर फेंक दी,मिठाई. ओह!! काँप जातीं वो,कितना गुस्सा भरा है,इस लड़की के मन में. बोलीं," गिरा क्यूँ दिया कम से कम मीरा को ही दे देती.."

"अच्छा है मीरा को इसका स्वाद ही ना पता चले...वरना उसका भी मन होगा खाने  का....ले मीरा तेरी बारी" और उसने गोटियाँ मीरा के हाथों में पकड़ा दीं.

 मन उदास हो गया ,उनका और  उस दिन तो कमरे में जाकर रो ही पड़ीं ,जब प्रकाश ने दादी से खीर खाने की फरमाइश की थी.

 उन्होंने बताया,  "अम्मा जी, चीनी ज्यादा नहीं है, खीर कल बना दूंगी".

इस पर सास ने कहा," घर के मर्दों के लिए चीनी वाली खीर बना दो और औरतों ,लड़कियों के लिए गुड़  वाली"

उन्होंने प्रतिवाद भी किया, "कल चीनी, मंगवा कर सबके लिए, चीनी की खीर बना दूंगी"

"आज लड़के का मन है तो खीर कल  बनेगी?...ये क्या बात हुई...आज बनाओ"..सास ने गुस्से से कहा.

और जब नमिता ने उनकी कटोरियों में सफ़ेद खीर और अपनी कटोरी में लाल खीर देखी तो
बहाने से पूरी कटोरी ही थाली में गिरा दी,और "अब खाने  का मन नहीं है" कहती उठ कर चली गयी.

"एकदम कोई शऊर  नहीं है इस लड़की को,इसके लच्छन तो देखो"...सास जोर से चिल्लाईं  पर नमिता ने कभी परवाह की ही नहीं.

वे कमरे में जाकर रो पड़ीं, उनकी  आँखों के सामने ही उनकी बेटियों  के साथ ये अन्याय हो रहा है और वे मुहँ सिल कर बैठी हैं. पर वे विरोध करतीं, तो उनके घर का आँगन भी ,गाँव के हर आँगन की तरह महाभारत में तब्दील हो जाता  और चूल्हे चौके अलग हो जाते. जो ना उन्हें गंवारा था ना उनके पति को.
ममता,स्मिता भी ये सब झेलतीं पर भाइयों के 'लड़के'  होने की वजह से विशिष्टता का भान उन्हें था.इसे खुले मन से स्वीकार कर लिया था उन दोनों ने .वैसे भी ,भाई उनसे छोटे थे और वे समझतीं ,भगवान ने उनकी पुकार पर ही भाइयों को उनके घर भेजा है. जबसे चलने बोलने  लायक हुई,किसी मंदिर या  किसी भी  पूजा में सास उनका सर जमीन से लगा देतीं और कहतीं,"भाई मांगो, भगवान से"

एक  नमिता ,इस विशिष्ट दर्जे को बिलकुल स्वीकार नहीं  कर पाती और सबसे उलझती रहती.

पर नमिता का गुस्सा सिर्फ घर वाले ही झेलते वरना वो पूरे गाँव की प्यारी थी. उसके  तेजी से साईकिल चलाने,पेड़ पर चढ़ जाने, बरगद की बड़ी बड़ी जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने पर पूरा गाँव मुग्ध था. सब कहते ,"किस नच्छत्तर में पैदा हुई है ये लड़की...लडको के भी कान काटती है."

घर के सामने ही एक अमरुद का पेड़ था,वह उसकी फुनगी पर चढ़ कर जोर से चिल्लाती "दादीsss "
और सास जोर जोर से भुनभुनाती, पेड़ की तरफ चल देतीं,"अरे,तुझे कब अक्कल आएगी... लड़कियों वाले कोई लच्छन  तो तुझमे हैं ही नहीं ..कही पैर वैर टूट गया तो कौन तुझ लंगड़ी से शादी करेगा...उतर नीचे"

और जैसे ही सास पेड़ के नीचे पहुंचतीं  वो उनके सामने ही धम्म से कूद जाती."

गाँव के हर घर में दिन में एक चक्कर उसका जरूर लग जाता. स्कूल से आ बाहर वाले कमरे में ही किताबें  फेंकती और चल देती, वो चिल्लाती रह जातीं,कुछ तो खा के जा पर गाँव का हर घर उसका अपना घर था. यह बात, बाद में स्मिता ने बतायी थी. तुम यहाँ  चिंता कर रही थी और वो फलां के घर बैठी कचरी खा रही थी या ठेकुआ खा रही थी. किसी के घर कुछ अच्छा बनता तो नमिता के लिए जरूर रख दिया जाता. कभी किसी घर में नहीं जा पातीं तो वे लोग किसी ना किसी के हाथ कटोरी  भेज देतीं.,ये कहते ,"नमिता को ये बहुत पसंद है "

पर कभी कभी वे घबरा भी जातीं. अँधेरा हो गया, नमिता घर नहीं आई. स्मिता की चिरौरी करतीं ,"जरा देख ना,किसके घर में है? "

स्मिता गुस्से में आकर बताती, "महारानी ,फुलेसर चाचा के घर रोटियाँ बना रही थीं"

"क्याsss  " उन्होंने आश्चर्य जताया

 तो नमिता गुस्से में बोल पड़ी," क्या करती??.....वे रोटी बना रही थीं और उनका चार महीने का बच्चा भूख से चीख  चीख कर रो रहा था..मैने कहा ,आप उसे देखो मैं बना देती हूँ...उनके घर, हमारे यहाँ  की तरह नौकर चाकर नहीं झूलते रहते...सारा काम वे खुद ही किया करती हैं." और मुहँ बिचका कर चली जाती.

एक बार छठ पूजा के लिए घाट पर जाने की तैयारी हो रही थी और नमिता का कुछ पता नहीं. फिर से स्मिता को भेजा,पता चला नरेन्  चाचा  के यहाँ बैठी ,पेटीकोट  सिल रही थी मशीन पे. क्यूंकि चाची दौरी सजा रही थीं.और उन्हें दिन में समय नहीं मिल पाया और नया कपडा पहनना जरूरी था. नमिता ने साइकिल चलाने से लेकर रोटी बनानी ,मशीन चलानी  सब सीख ली लेकिन सब घर से बाहर.

ससुर जी से सब डरते. उनके दुलारे पोते भी उनसे थोड़ा दूर ही रहते. वैसे भी दोनों लड़के घर में दिखते भी कम.सुबह सुबह गणित पढने साइकिल से गणित के मास्टर साहब के यहाँ जाते.वहाँ से आते और नहा-खा कर स्कूल. स्कूल से आ एकाध घंटा क्रिकेट का बल्ला-गेंद ले दूर मैदान में खेलने  जाते.और घर आ फिर से विज्ञान  का ट्यूशन पढने के लिए साइकिल  लिए निकल जाते. रात में पति उन्हें अंग्रेजी और इतहास-भूगोल पढ़ाते. ननदें अपने पतियों के साथ शहर में रहतीं थीं. .जब छुट्टियों में आतीं तो उनके बच्चों के कपड़े, बोलने चालने के ढंग से प्रकाश,प्रमोद बहुत प्रभावित दिखते और उन्हें लगता पढाई ही वो कुंजी है जो इस गाँव के वातावरण से मुक्ति दिला सकती है. और इसी के सहारे उनके शहर में रहने का सपना साकार हो सकता है. इसी खातिर वे जी जान से पढाई में जुटे रहते. स्कूल के शिक्षकों से लेकर पूरे गाँव की जुबान पे उनके बेटों का नाम होता. वे भी यह सब देख सुन गर्व से फूली नहीं समातीं पर बेटे अपनी जरूरत की हर चीज़ दादी से ही कहते. कभी बीमार पड़ते तो दादी ही सिरहाने बैठी देखभाल करतीं. उनके जिम्मे वैसे भी घर के सैकड़ों काम होते.

 ससुर जी के खडाऊं की आवाज सुनते ही पूरे घर को सांप सूंघ जाता सिवाय नमिता के. जहाँ बैठी होती, वहीँ से चिल्लाती, "क्या खोज रहें हैं,बाबा? "

उनकी भी कडक आवाज में  मुलामियत घुल जाती, "अरे कल्याण नहीं मिल रहा, इधर ही तो पढ़ के रखा था"

वो लापरवाही से बोलती,"बाहर बरामदे में ताखे में तो रखा है...आपको कुछ याद नहीं रहता"

वे उसे आँख दिखातीं धीरे से कहतीं ,"जा कर दे दे ना"

पर ससुर जी सुन लेते, और प्यार से कहते, "अरे ले लूँगा बहू...उसे आराम करने दो . दिन भर गाँव में बहनडम सा घूमती रहती है....थक गयी होगी."

घर में एक ही ट्रांजिस्टर था ,जिस पर सुबह शाम ससुर जी, बरामदे में टेबल पर रख ऊँचे वॉल्यूम में समाचार और कृषि जगत  सुनते. ट्रांजिस्टर उनके कमरे में ही रहता. ममता,स्मिता चुपके से ले आतीं और धीमी  आवाज़ में फ़िल्मी गाने, नारी-जगत सुना करतीं. पर समाचार का  समय होते ही दबे पाँव ,कोठरी में रख आतीं. लड़कियों की इतनी रूचि देख उन्होंने पति से सिफारिश की, एक ट्रांजिस्टर ला दीजिये ना ,बच्चियों के लिए"

"ये सब फ़ालतू की चीज़ें हैं,पढाई से मन हट जायेगा ,इन सबका"

पर नमिता, बाबूजी के सामने से ही ट्रांजिस्टर उठा लाती ."समाचार ख़तम हो गया ना,ले जाऊं?"  और जोर जोर से गाने सुना करती. जाड़े के दिन में तो रजाई के अंदर देर रात तक गाना सुनते सुनते सोती. सुबह वे उसे उठा उठा कर परेशान हो जातीं, " समाचार का वक़्त हो रहा है,जा बाबूजी को रेडियो दे आ" पर वो नहीं उठती आखिरकार समाचार का वक़्त हो जाता और वे , 'नमिता...नमिता'  पुकारते उसके कमरे तक आ जाते. वो ढीठ लड़की,लेटे लेटे ही आँखें  बंद किए रजाई के बाहर हाथ निकाल रेडिओ पकड़ा देती और फिर से रजाई में घुस सो जाती.

नमिता को रात-बिरात भी कुछ डर नहीं लगता. एक बार खूब आंधी तूफ़ान आया.
सुबक के चार बज  रहें थे.  नमिता -स्मिता को चादर उढ़ाने गयीं, देखा तो नमिता बिस्तर पर नहीं  है. डर कर स्मिता,पति, अम्मा जी सबको उठा दिया.किसी की समझ में कुछ नहीं आया पर अम्मा जी बोलीं,"जरूर बगीचा में आम बीनने गयी होगी, चलो टॉर्च लो और चलो.."

ये तीनो पास के बगीचे में गए तो देखा कई लोग आस पास के बगीचे में थे और नमिता अपने बगीचे में गिरे आम उठा उठा कर एक जगह इकट्ठा कर रही है.

उन्हें देखते ही बोली,"ये सारे लोग हमारे बगान में थे, मुझे देखते ही भाग गए, मैं नहीं आती तो एक भी आम नहीं मिलता."

एक बार घर में ढेर सारी खीर पूरी  बच गयी थी. गर्मी के दिन थे.वे परेशान हो रही थीं, सुबह तक सब ख़राब हो जायेगा ,अगर किसी तरह थोड़ी दूर पर बनी झोपड़ियों में पहुंचा दिया जाता तो चीज़ भी नहीं बर्बाद होती और गरीबों का पेट भी भर जाता. पति और बेटे कोठरी में पढ़ाई कर रहें थे. दरवाजे पर बाबूजी बैठे थे. किस से कही जाए ये बात .

और नमिता आगे आ गयी," पूरनमासी है, पूरा उजाला है.....मैं और छोटकी दी चले जाते है." (ममता को बडकी दी और स्मिता को छोटकी दी कहा करते थे उनसे छोटे भाई-बहन.)

बहुत डर डर के  पिछले दरवाजे से उन्हें  भेजा.वे आँगन में पीछे की तरफ खुलती खिड़की पर टकटकी लगाएं खड़ी थीं. दोनों बेटियाँ  वापस आ रही थीं और अचानक नमिता ने जोर जोर से गाना शुरू कर दिया, "नीले गगन के तले धरती  का प्यार पले". स्मिता ने उसका मुहँ दबा कर चुप कराने की कोशिश की तो वो हाथ छुड़ा खेतों  की मेंड़ के बीच जोर जोर से गाते हुए दौड़ने लगी.

वे माथा पकड़ कर बैठ गयीं. रात के सन्नाटे में उसकी आवाज़ कहाँ कहाँ ना सुने दे रही होगी. ससुर जी,सासू माँ,पति सब बाहर निकल आए. डरते डरते बता दिया कि क्यूँ भेजा था? पर ससुर जी नाराज़ नहीं हुए बल्कि हँसते हुए कह रहें थे,"आ तुझे दिखाता हूँ धरती  का प्यार"

नमिता, अपने बाबा की लाडली थी. जो गुण वे अपने बेटे और पोतों में देखना चाहते थे, वो सब अपनी इस पोती में देखकर खुश हो जाते.
(क्रमशः)

Thursday, June 24, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -3)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से वे जग जाती हैं,और पुराना जीवन याद करने लगती हैं कि कैसे वे चौदह बरस की उम्र में शादी कर इस  घर में आई थीं.. दादी सास,सास-ससुर,ननदों से भरा पूरा घर था. उनकी भी चार बेटियाँ और दो बेटे पूरा घर गुलज़ार किए रहते.पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे.बड़ी बेटी ममता की शादी ससुर जी ने पति की सम्मति लिए बगैर तय कर दी थी.)
 

गतांक से आगे.

शादी की रस्मे होती रहीं और दूसरे दिन लाल चुनरी में सजी गठरी बनी ममता ससुराल चली गयी. मेहमानों से घर भरा  था फिर भी,एक ममता के बिना सब सूना लगता.अपने नन्हे नन्हे पैरों में  पायल पहने छमछम करती मीरा, हर कमरे  में घूमती और बड़ी बड़ी आँखें फैला कर पूछती, "दीदी?" और उनका ह्रदय विदीर्ण हो जाता. वे उसे उठा कलेजे से लगा लेतीं तो उनकी आँखों में आँसू देख वो अबूझ सा उन्हें देखती रहती.

एक हफ्ते बाद फिर से हलवाइयों का मजमा लगा रात भर मिठाइयां बनी.अब दोनों भाई कलेवा लेकर ममता के ससुराल जाने वाले थे,उसे विदा करा लाने को. लडकियां घर सजाने में जुटी थीं.  'मेहमान' पहली बार घर आ रहें थे. सुन्दर परदे,ममता के कढाई किए तकिये के गिलाफ ,चादरें सब बिछाई गयीं. गाँव की ममता की सहेलियां स्मिता के साथ मिलकर तरह तरह के उपाय सोचने लगीं कि कैसे 'मेहमान'  को छकाया जाए. कभी चाय और खीर में नमक डालने की जुगत सोची जाती तो कभी पत्तों के पकौड़े बनाने की. वे भी खीर,दाल भरी पूड़ी ,पांच तरह की सब्जी बनाकर पलक पांवड़े बिछाए बेटी -दामाद का इंतज़ार करने लगीं.

सब लोग अच्छे अच्छे कपड़े पहने, नए नवेले दामाद के  इंतज़ार में थे .पति खिड़की के पास  रास्ते की तरफ टकटकी लगाए बैठे थे.सासू माँ  बाहर बरामदे में चौकी पर बैठीं पंखा झल रही थीं.पर कान किसी मोटरगाड़ी की आवाज़ के लिए सतर्क थे. बाबूजी भी गाय भैंसों को देखने भालने के बहाने बाहर अहाते में ही चहल-कदमी कर रहें थे. पूरे घर की व्यग्रता ने ऐसा सन्नाटा कर दिया था कि लगता था चिड़िया भी इस सन्नाटे से घबराकर, बिना चहके ही आँगन में से उड़ जातीं.

पर दोनों बेटे अकेले लौट  आए. ममता के ससुराल वालों ने उनकी खातिरदारी तो बहुत अच्छी की. और विदाई में बड़े कीमती कपड़े और १०० रुपये दिए. पर बहाना ये बनाया कि अभी बहुत सारे मेहमान हैं जो नई बहू के साथ रहना चाहते हैं.ममता को बाद में भेजेंगे.  दोनों बेटे उनके घर,और वहाँ से मिले कपड़े और पैसे पर इतने मुग्ध थे कि,बहन कैसी है, यह बता ही नहीं पा रहें  थे.पूछने पर यही कहते, "चिंता ना करो...दीदी बहुत खुश है...इतने जेवर और कीमती कपड़े पहने थे,वहाँ मुंहदिखाई  में बहुत सारा गहना मिला है. हमें इतनी मिठाई खिलाई दीदी ने" वे ठंढी सांस भर कर रह जातीं,एक तो लड़के उसपर से इतने  छोटे ,क्या समझ  पाए होंगे.

इसके बाद से ही हर पंद्रह दिन पर, सासू माँ, पंडित को बुलवातीं ,वे पतरा देखकर अच्छा दिन बतलाते और ममता को मायके लाने की तैयारियां शुरू हो जातीं. मिठाइयां बनतीं, टोकरी पर लाल कागज़ चिपकाए जाते और दोनों भाई चल देते बहन को विदा कराकर लाने. पर हर बार अकेले ही लौटते. पड़ोस की निर्मला को भी ससुराल वालों ने भेजने में आनाकानी की थी तो उसके भाई ने वहाँ जाकर डेरा जमा दिया था और अड़ गया था कि जबतक वे उसकी बहन को विदा नहीं करेंगे, वो वहाँ से नहीं जायेगा. पर वे अपने बेटों से ऐसा नहीं कह सकती थीं. यूँ जबरदस्ती बार बार भेजे जाने पर वे  चिढने  भी लगे थे.उनकी पढ़ाई का हर्जा होता और अब पहले की तरह वहाँ खातिरदारी भी नहीं होती. खीझ कर कहते,"पता नहीं माँ को इतना बुलवाने की क्यूँ पड़ी है,इतने बड़े घर में अच्छे कपड़े,जेवरों से लदी दीदी कितनी खुश है." आखिरकार ममता के ससुर ने एक बार कह ही दिया,यूँ बिना वजह वे अपनी बहू को नहीं भेजेंगे. कोई बड़ा पूजा,अनुष्ठान हो या शादी-ब्याह, तब ही भेजेंगे वे. तब से वे श्रावणी पूजा की राह देखने लगीं.शायद इस अवसर पर वे भेजने को तैयार हो जाएँ. और भगवान ने उनकी सुन ली,इस बार बेटे बहन को साथ लेकर लौटे.

और जब छः महीने बाद ममता मायके आई तो उनकी गाड़ी देखते ही यह भूल कि दिन के उजाले में वे देहरी  से बाहर पैर नहीं रखतीं.दौड़ कर अहाते में निकल आयीं. ससुर जी को देखा तब जल्दी से पूरे सर तक साड़ी का आंचल खींचा. पति,सास, बच्चे सब जमा हो गए. ममता की आँखें छलक रही थीं और लाल साड़ी ,बिंदी, सिंदूर से घिरे उसके मोती से  दांत ,चमकीली हंसी बिखेर रहें थे. ससुर जी के पैरों पर झुकी तो बिना कुछ बोले देर तक उसके सर पे हाथ फेरते रहें. सास ने तो बढ़कर  अंकवार में भर लिया. पति ने भी देर तक गले से लगाए रखा. आँखें गीली हो आई थीं,सबकी.उनसे तो ममता ऐसे चिपटी जैसे नन्ही बच्ची हो. और उसकी नज़र मीरा पर पड़ी,झपटकर उसे उठाने को बढ़ी.पर मीरा थोड़ी दूर हो गयी  उस से.उसकी दीदी तो सीधीसादी सलवार कुरता पहनती थी.साड़ी;गहनों में सजी,बड़ी सी बिंदी लगाए  इस दीदी को वह नहीं पहचान रही थी. जबरदस्ती ममता ने उसे गोद में उठाया तो उसे दोनों हाथों से धकेलते वो जोर जोर से रोने लगी.छोटी नमिता ने आगे बढ़कर उसे संभाला. इतनी देर से अकेले गाड़ी के पास खड़े मेहमान पर अब सबका ध्यान गया. ससुर जी कंधे पर हाथ रखकर बोले,'चलो बेटा अंदर चलो" पर वो अंदर नहीं आए,कहा" जरूरी काम है,कल आऊंगा ममता को लिवाने".वे हतप्रभ रह गयीं,"कल??...इतनी जल्दी??"....."हाँ पूजा तो सुबह ही है ना...मैं शाम को आऊंगा" ममता भी सर झुकाए खड़ी थी.पर वे लोग कुछ और कहते इसके पहले ही वो सबको हाथ जोड़ते हुए गाड़ी में बैठ गए. ससुर जी ने कहा,"जरूरी काम होगा कोई"

दो दिन तो  दो घंटे जैसे भी  महसूस ना हुए. ममता से मिलने को घर में मेला सा लगा रहा. दो बातें करने का भी मौका ना मिला.बस रात को सोते वक़्त,बेटी के सर पे हाथ फेरते हुए पूछा," तेरा मन तो लगता है वहाँ ,दामाद बाबू, घर के सारे लोग तुझसे अच्छा व्यवहार तो करते  हैं?" .."हाँ, माँ " ममता ने बस यही कहा और पता था इसके सिवा वह कुछ कहेगी भी नहीं.

दूसरे दिन वायदे अनुसार ,मेहमान शाम को आए,दो घंटे ही रुके पर सबकी शिकायतें दूर कर दीं, उसके भी पैर छुए ,सालियों से हंसी मजाक किया. मीरा को बार बार अपने पास बुलाना चाहा.पर उस नन्ही लड़की में ना जाने कैसी दहशत बैठ गयी थी,जीजा के नाम से,इतना डर गयी थी,उसे लगता बस वो सबको रुलाते हैं.आस-पड़ोस में भी किसी शादी में जाने के नाम से रोने लगती कि सबलोग रोयेंगे और दीदी चली जाएगी.

मेहमान सबसे इतनी अच्छी तरह पेश आए वे एक बार सोचने लगीं,उनकी शंका गलत थी क्या?.पर फिर सोचा दो घंटे में कोई भी अपना सबसे अच्छा रूप ही दिखायेगा ना.असली रूप तो बस ममता ही देखेगी.
.इस बार तो ममता विदाई से भी ज्यादा रोई. अब उसे भी लग गया था,पता नहीं फिर कब देखना नसीब हो यह घर बार.

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पर ममता के जाने के बाद घर जैसे बिखर सा गया. छोटे भाई बहनों को ना जाने किस अनुशासन के डोर से उसने बाँध रखा था कि उसके जाने के बाद ही सब छुट्टे बैल से आपस में भिड़ने लगे. पर वे सबसे ज्यादा नमिता के व्यवहार से परेशान थीं. दोनों भाई उस से बड़े थे, और 'लड़के' थे लिहाजा दादा-दादी के ज्यादा दुलारे थे. नमिता ने बचपन से  इस भेदभाव को समझा था. शायद ममता उसे समझा-बुझा लेती पर अब उसके जाने के बाद वह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होती और हर बात में भाइयों की बराबरी चाहती.
(क्रमशः)

Monday, June 21, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -२)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से वे जग जाती हैं,और पुराना जीवन याद करने लगती हैं कि कैसे वे चौदह बरस की उम्र में शादी कर इस  घर में आई थीं,पति कॉलेज में थे.बाद में वही स्कूल में शिक्षक बन गए. दादी सास,सास-ससुर,ननदों से भरा पूरा घर था. उनकी भी चार बेटियाँ और दो बेटे पूरा घर गुलज़ार किए रहते)
 

गतांक से आगे.

पति को पढने का बड़ा शौक था,पूरे ध्यान से बच्चों को पढ़ाते. खुद भी टीचर ट्रेनिंग का कोर्स किया,एम.ए किया.  चारो बच्चों को सुबह शाम बिठा कर खुद  पढ़ाते. बच्चियों के सुघड़ अक्षरों में लिखी  कापियां देखतीं तो दिल गर्व से भर आता. उन्हें तो बस रामायण और व्रत, उपवास की पोथियाँ पढने  लायक अक्षर ज्ञान करवाया गया था. पर पति स्कूल के पुस्तकालय से और जब भी शहर जाते,अच्छी अच्छी पत्रिकाएं और किताबें खरीद लाते. बच्चों के नाम भी किताबों से पढ़करएकदम अलग सा रखा था.ममता तो सासू माँ ने रखा उसके बाद,स्मिता, प्रकाश, प्रमोद ,नमिता सब पति ने ही रखे.स्मिता कितना झल्लाती 'कोई मेरा नाम सही नहीं बोलता,सब मुझे सिमता कहते हैं .और पति जबाब में कहते, "तो तुम सुधार दिया करो,इस तरह सबलोग एक नया शब्द तो सीख जाएंगे" स्मिता कहती,"वे लोग क्या सीखेंगे मैं भी यही समझने   लगूंगी कि मेरा नाम सिमता ही है" वे बाप-बेटी की इस नोंक झोंक पर हंस पड़तीं   

स्कूल में लम्बी गर्मी छुट्टी होती. और दिन में लू के डर से लोग घर के अंदर ही रहते.उन्हीं दिनों उनके पठन-पाठन का कार्यक्रम चलता.पति उन्हें खुद पढने के लिए बहुत उकसाते.पर घर के काम-धाम से थकी उन्हें सुनना ज्यादा अच्छा लगता. वे पंखा झलती  और पति उन्हें पत्रिकाओं और किताबों से पढ़कर,कहानियां आलेख  सुनाते. एक नया संसार ही उनके सामने खुलता चला जाता.पूरी गर्मी की दुपहरिया ऐसे ही कटती.

पति कहते , लड़कियों को कॉलेज में भी पढ़ाएंगे.हॉस्टल में रख देंगे. अपने साथ पढने वाली लड़कियों की बातें बताते की कैसे वे बिलकुल नहीं डरतीं,मर्दों के सामने भी खुलकर बोलती हैं तो वे समझ नहीं पाती, 'कैसी होती होंगी ये लडकियां?' एक बार ननदें मायके आई थीं और सबलोग मिलकर पास के शहर में सिनेमा देखने गए थे.वे बाद में पति से पूछ बैठीं थीं, इन फ़िल्मी हिरोईन  जैसी लडकियां पढ़ती थीं,उनके साथ,कॉलेज में? पति जोर से हंस पड़े थे फिर बहुत ढूंढ कर किसी पत्रिका में कॉलेज में पढने वाली लड़कियों की तस्वीरे लेकर आए थे. तब वे देखती रह गयीं,ये तो बिलकुल गाँव की लड़कियों जैसी हैं...हाँ बस थोड़े कपड़े,अलग ढंग के पहने हैं...दुपट्टा पेट तक लम्बी रखने की बजाय गले में डाल रखा है. और कस कर दो चोटियाँ बनाने के बदले बिलकुल एक ढीली ढाली चोटी बनायी है. खुल नहीं जाती उनकी चोटी...वे सोचती रह जातीं.

फिर भी हॉस्टल में रखने की बात वे नहीं समझ पातीं, घर वालों से दूर बेटियाँ कैसे रह पाएंगी? ममता थी भी गाय सी सीधी. पति की लाई किताबें पढ़ती रहती या फिर छोटे भाई बहनों की देखभाल में लगी रहती. सबसे छोटी मीरा की तो जैसे बालिका माँ ही थी.हर वक़्त गोद में उठाये फिरती .मीरा भी स्कूल से आकर उसे किताबें भी नहीं रखने देती और गोद में चढ़ने   को मचल पड़ती.

पर सोचा हुआ,कब हो पाया  है. ममता ने दसवीं के इम्तहान दिए और ससुर जी ने फरमान सुना दिया. पास के गाँव के सबसे बड़े रईस जो उनके मित्र भी थे के पोते  से ममता की शादी पक्की कर दी है. पति को वह लड़का बिलकुल पसंद नहीं था.उनके स्कूल का ही पढ़ा हुआ था.अव्वल नंबर का बदमाश और हर क्लास में फेल होने वाला.बस पिता के रसूख की वजह से पास होता रहा. पढने के नाम पर पास के शहर तो चल गया पर उसकी आवारगी के किस्से छन छन कर आते रहते. लेकिन ससुर जी का कहना था उन्होंने इन दोनों के बचपन में ही बात पक्की कर दी थी. लड़के के लायक ना होने की बात को वे सिरे से ही खारिज कर देते. पिता के सम्मुख कभी मुहँ ना खोलने वाले, पति ने भी जरा जोर से कहा, यह लड़का  मुझे बिलकुल नहीं पसंद' इस पर ससुर जी ने हमेशा की तरह जोर से डांट दिया, "तुम्हे क्या पता,दुनियादारी क्या होती है,सिर्फ किताबों में घुसे रहो, इस उम्र में लड़के ऐसे ही होते हैं,सबलोग तुम्हारी तरह नहीं होते. शादी हो जायेगी, तो उसे अक्कल आ जाएगी" अपने ऊपर किए कटाक्ष को पति झेल नहीं पाए और भन्नाए हुए से बाहर निकल गए.

वे घबरा कर सास के पास गयीं. सास से उनके रिश्ते एक निश्चित फासले पर चलते. सास आज भी चाबियों का गुच्छा कमर में खोंसे रहतीं.पर काम सारे उनसे ही करवातीं,जरा संदूक में से ये निकाल दे,जरा वो रख दे. वे भी सास के अधिकारों में कोई भी अतिक्रमण नहीं करतीं. कुछ भी रसोई में नया बनाना हो तो सासू माँ से पूछ कर ही बनातीं, और वे अंदर से खुश होते हुए झूठा गुस्सा दिखाती,"अरी पूछती क्या है...बना लिया कर जो जी  चाहे "  मनिहारिन  आँगन में बड़े से टोकरे से बिंदी,आलता,रंग बिरंगी चूड़ियाँ निकाल कर कपड़े पर सजा देती पर वे  पूछतीं,"अम्माजी, ये  लाल चूड़ियाँ ले लूँ?" और सास बदले में कहतीं "हाँ और वो कत्थई  वाली भी ले लो". उनके पति कमाते थे ,वे जो चाहे खरीद सकतीं थीं,पर इतना सा पूछ लेना,सास को जो ख़ुशी  देता वे,उस से उन्हें वंचित नहीं करना चाहती थीं. वो मनिहारिन धूप में बड़ा सा टोकरा उठाये, गाँव में घर घर घूमा करती थी.पर वो विजातीय थी इसलिए कोई उसे पानी भी नहीं पूछता. भले  ही उस से ख़रीदे श्रृंगार के सामन ,'चूड़ी आलता,बिंदी ,कंघी,रिबन' गाँव की सारी औरतें मंदिर में देवी माँ को चढ़ातीं. एक दिन उन्होंने डरते डरते सास से कहा,' बिचारी धूप में, इतना घूमती है प्यास लग जाती होगी...कुछ चना-चबैना देकर पानी दे दूँ? " सास चौंकी और जरा रुक्ष स्वर में बोलीं,"किस बर्तन में दोगी?" और उन्होंने स्वर में  शहद घोल कर कहा था,"ये शहर से शीशे के ग्लास और प्लेट लाये हैं ना,उनमे से ही एक में दे देती हूँ और अलग रख दूंगी, वो जब भी आयेंगी उसी में दे दिया करुँगी " सास ने बड़ी अनिच्छा से कहा था,"जाओ जैसा मन में आए करो...ये बिटवा ने चार किताबें पढ़ पढ़ कर तुम्हारा भी दिमाग खराब कर दिया है...जाओ दे दो" और वे बच्चों को बुलाने भागीं कि जाती हुई मनिहारिन को आवाज़ देकर बुलाएं. वे जोर से चिल्ला भी नहीं सकती थीं.

आज भी उन्हें पूरी उम्मीद थी कि हमेशा की तरह सासू माँ उनकी बात मान जाएँगी.ममता को वे भी तो कितना प्यार करती हैं.उसका नाम भी उन्होंने ही रखा था.पर सास तो उन लोगों के  नए ढंग से बने मकान पर रीझी हुई थीं. और उनलोगों की कार ने और भी मन मोह लिया था उनका. कई बार बाबूजी से कह चुकी थीं.पर बाबूजी नहीं माने थे,"यह सब पैसे की बर्बादी है, हमें गाड़ी का क्या काम,जब शहर जाना हो किराए पर मिल जाती है." सास मन मसोस  कर रह गयी थीं और आज अपनी कल्पना में पोती को गाड़ी में घूमती देखने के सिवा  उनका मन कुछ और देखने को तैयार नहीं  था. बोलीं," अरे ,इतने सुन्दर घर में बिटिया जा रही है,और क्या चाहिए. धनधान्य से पूर्ण अमीर लोग,देखने में लड़का क्या बांका लगता है,ममता राज करेगी."

वे चुपचाप अपने कमरे में लौट आयीं. लेकिन एक दिन शाम को सहेलियों के साथ खेतों में घूमने गयी ममता तेजी से दौड़ती हुई आई और सीधा कमरे में जाकर पलंग पर गिर कर रोने लगी. वे घबराई हुई सी पीछे भागीं. तब तक स्मिता भी आ गयी और कहने लगी कि "वे सब साथ में घूम रही थीं,पर दीदी तो हमेशा कि तरह प्रकृति के रूप निहारती खोयी हुई सी थोड़ा आगे निकल गयी .तभी जीप पर वो लड़का जिससे दीदी  की शादी होने वाली है , चार लड़कों के साथ आया और खेत की मेंड़ पर पता नहीं दीदी से क्या पूछा कि दीदी तो रोते हुए भागी और वे सब लड़के ठठा कर हंस पड़े " ममता रोये जा रही थी,उन्हें पता था ममता का आभिजात्य मन कभी भी पूरी बात बताने की इजाजत नहीं देगा.लेकिन वे ऐसे लड़के से अपनी बेटी की शादी नहीं होने देंगी और वे तेज क़दमों से सीधा ससुर जी के कमरे तक पहुँच गयीं.

उन्होंने कभी बाबूजी से मुहँ भर बात नहीं की थी.  उनके कदम ,कमरे के दरवाजे पर जाकर ठिठक गए .बाबूजी कुछ बही-खाता देख रहें थे. आहट सुन, सर घुमाया फिर तुरंत  ही नज़र फेर दरवाजे पर टिका दीं. कभी कभार बच्चों की या सास की बीमारी के समय दो बात करते तो यूँ ही सर, ऊपर की तरफ कर दीवार की ओर मुहँ करते और आँखें मींचे उनकी बात का जबाब धीरे धीरे एक एक शब्द पर जोर देते हुए देते. आज भी उसी अंदाज़ में पूछा,"क्या बात है बहू" और उनका गला भर आया, बोल पड़ीं,"बाबूजी वो लड़का ठीक नहीं है,ममता के लिए. " और वे उन्हें समझाने लगे,"देखो बहू, जमाना बदल रहा है,अब सीधे साधे लोगों का गुजारा नहीं है. सब लोग रामावतार जी  की तरह नहीं हो सकते.( वे अपने बेटे के नाम के आगे भी जी लगाया करते थे) उनके जैसा लड़िका खोजोगी तो मेरी पोती सबकी शादी कभी नहीं होगी. देखो जमीन जायदाद बचाने के लिए थोड़ी बदमासी दिखानी ही पड़ती है.  ये तो पुरुखों का मान है और गाँव में मेरी इज्जत है कि सब बचा हुआ है.उस लड़के का बाप ,हमेसा अपने बाप के पीठ पर खड़ा रहता था,देखो केतना तरक्की कर गया, चमचम घर, मोटरगाड़ी सब है.और हम, जो है खाली उसी को बचाने में लगे हुए हैं. वो तो पुरखों का मान है और सब मेरी इज्जत है इसलिए अब तक कोई बखेड़ा नहीं हुआ.मेरे बाद क्या होगा,राम जाने. रामावतार जी को तो खाली किताब से मतलब है.  तुम चिंता ना करो. जरा लड़ीकपन  है, नया  उम्र है..शादी होते ही सब ठीक हो जायेगा"

वे थके क़दमों से लौट आयीं पहली बार ससुर जी के दिल का दर्द जाना, उनके मन में भी शायद दबी हुई चाह थी कि उनका बेटा उनका साथ देता,जब उन्हें  रात-बिरात खेतों में जाना पड़ता है तो उनके साथ चलता, जब बहस मुसाहिबा होता है तो उनके पीठ पर बोलता.

अब कोई चारा ना देख वे ममता को समझाने में जुट गयी,"बेटा, सबलोग दुनिया में एक जैसे नहीं होते,उनके घर का रहन सहन अलग होगा, तू तो इतनी समझदार है, अच्छे से निभा लेना. हो सकता है वो तुझे देखना चाहता हो ,इसलिए इस गाँव में आया हो.ऐसा कई लोग करते हैं " शायद कई बार वे ये बातें दुहरा गयी क्यूंकि एक बार जब फिर से ममता के बालों में तेल लगाते यही सब कह रही थीं तो स्मिता  बोल पड़ी," माँ लगता है तुम्हे दीदी की समझ पर भरोसा नहीं है, तभी एक ही बात रटे जा रही हो" उन्होंने देखा,ममता ने धीरे से स्मिता का हाथ दबा दिया. ओह , इतनी छोटी  सी लड़की समझ रही है कि माँ बहुत परेशान है, और ये सब कह कर अपनी परेशानी से उबरना चाहती है. वे चुप हो गयीं और ख़याल आ गया अब तक उसके बालों में वही तेल लगाती आई हैं, कभी कभी चोटियाँ भी बना देतीं अब ससुराल में कौन इसकी कंघी चोटी करेगा और साड़ी की कोर से उन्होंने आँसू पोंछ लिए.

धूमधाम से बारात दरवाजे आई, लड़के को देखा तो आँखें जुड़ा गयीं.सिल्क के कुरते, पीली धोती और सर पे मौरी ,एकदम राजकुमार लग रहा था. ननदोई की बात याद आ गयी कि ,"लड़की की माँ को तो बस सुन्दर दामाद चाहिए .सुन्दर चेहरा देखते ही वे रीझ जाती हैं" परिछावन करते, मन ही कितनी बार भगवान के आगे गुहार लगाई .."हे भगवान तन के जैसा इसका मन भी सुन्दर रखना"
(क्रमशः )

Thursday, June 17, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान


गहरी नींद में थीं वे,लगा कहीं दूर कोई गाना बज रहा है,पर जैसे जैसे नींद हलकी होती गयी,गाने का स्वर पास आता प्रतीत हुआ, पूरी तरह आँख खुलने के बाद उन्हें अहसास हुआ ये आवाज तो मेज पर पड़े मोबाईल से रही है. ओह! इस मुए रमेसर ने लगता है फिर से गाना बदल दिया,इसीलिए नहीं पहचान पायीं.खुद तो घोड़े बेचकर बरामदे में सो रहा है, अब बिटिया नाराज़ होगी,फोन नहीं उठाया. संभाल कर पलंग से नीचे कदम रखा,आहिस्ता आहिस्ता कदम रखते जब तक मेज तक पहुँचती,मोबाईल थक कर चुप हो चुका था. लालटेन की बत्ती तेज की,बिजली तो बस भरे उजाले में ही आया करती है,गाँव में ,घुप्प अँधेरा देख वो भी डर कर भाग जाती है. चश्मा लगाया और मोबाईल लेकर संभल कर पलंग पर बैठ गयीं.
देखभाल कर कॉल का बटन दबाया,कितनी माथा पच्ची करके बिटिया ने सिखाया था. पर ये क्या, यहाँ तो अंग्रेजी में कुछ गिटपिट बोल रही है.मतलब वे समझती हैं, यानि की बैलेंस नहीं है अब,ये भी रमेसर की ही कारगुजारी है,कल फिर उसकी खबर लेंगी...अभी तो बस इंतज़ार कर सकती हैं,बिटिया के कॉल की. आज जरूर दफ्तर में देर हो गयी होगी, तभी इतनी देर से फोन किया है वरना उसे भी पता है,नौ बजे ही गाँव में आधी रात हो जाती है.

आंगन की तरफ खुलते दरवाजे से आँगन में छिटकी ठंढी चांदनी नज़र आई...और एक गहरा उसांस लिया, क्या ठंढी चांदनी और क्या गरम दुपहरिया,वैसा ही सन्नाटा,पसरा होता घर में...बस यह तय करना मुश्किल कि उनके मन का सन्नाटा बड़ा है या उनके घर का.. कभी कितना गुलज़ार हुआ करता था. चौदह बरस की थीं,जब ब्याह कर आई थीं. पति कॉलेज में पढ़ रहें थे. सास ससुर, ननदों से भरा-पूरा घर, पति की दादी भी जिंदा थीं, तब.दिनभर घर में मेला सा लगा रहता. बाहर बड़ी बड़ी चटाइयों पर अनाज सुखाए जाते. आँगन में पिसाई कुटाई चलती रहती. कभी कोई बड़ा सा टोकरा सर पर लिए आता तो कभी कोई पके केले का घौद लिए. बाहर के बरामदे से ही वे लोग जोर से खांसते कि अगर नई बहुरिया यानि 'वे' आँगन में हों तो अंदर चली जाएँ. जल्दी से वे उठ कर भागतीं तो पैरों की पायल जोर की छनक उठती और लोग समझ जाते अब रास्ता खाली है.

काम तो उन्हें कुछ होता नहीं .बस सज धज कर पूरे घर में डोला करतीं. कभी एक ननद हाथों में मेहंदी लगाती तो कभी दूसरी पैरों में महावर. नई नवेली भाभी को गुड़िया सी सजा कर रखतीं.

दादी सास बहुत कड़क मिजाज थीं. ससुर जी की रोबदार आवाज बाहर गूंजती रहती पर एक बार दादी सास जोर की आवाज़ लगातीं,"कितना बोला करे है, गला ना दुखे है तेरा?" और वे चुप हो जाते. पर दादी सास उन्हें बहुत प्यार करतीं. अपने सारे काम उन से ही करवातीं और काम भी क्या, पूजा के बर्तन धो दे,उनके राधा श्याम के कपड़े सिल दे. और जब वे राधा-श्याम के कपड़े सिल उसपर गोटे सितारे भी टांक देतीं तो दादी सास निहाल हो जातीं. जब तब उसे पास बिठा लेतीं, "एक भजन सुना" उन्होंने मीठा गला ,पाया था. जब वे अपने मीठे स्वर में गातीं, "मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई" तो उनके पति भी सबकी आँख बचाते पिछले दरवाजे पर खड़े होते. उनकी नज़रें मिलतीं और स्वर में थोड़ी मिठास और घुल जाती.

शादी के बाद भी उनकी प्रेमलीला आँखों में ही चलती. इतने बड़े घर में वे बातें करने को भी छुप कर मिला करते. कभी अटारी पर तो कभी लोहे लक्कड़ से भरे पिछवाड़े के गलियारे में. रात के सन्नाटे में तो उनकी आवाज़ ही नहीं निकलती.उनके कमरे से लगा ही दादी सास का कमरा था. दादी सास पूरी रात खांसती रहतीं,राम जाने कभी सोती भी या नहीं. पर दिन में मिलने के हज़ार तरीके और जगह ढूंढ लिए थे, उन दोनों ने. वे एक ख़ास अंदाज़ में चूड़ियाँ खनकातीं और किताबों से घिरे पति ,शायद इंतज़ार में ही होते,झट किताबें बंद कर निकल आते.

दो साल बाद जब वे माँ बनीं,तब पति कॉलेज में ही थे. पूरा घर उनके आगे बिछा जाता.घर के मामलों में रूचि ना लेने वाले ,ससुर जी भी खाना खाते वक़्त,पूछ ही लेते, "बहू की तबियत कैसी है? डॉक्टर के यहाँ जाना हो तो बता देना, गाड़ी का इंतज़ाम कर दूंगा." दोनों ननदें रोज नए नए नामों को लेकर झगडा किया करतीं. मितभाषी पति के चेहरे पर भी धूपखिली मुस्कान सजी होती.उन्हें भी विशिष्ट होने का अहसास होता.

जब ममता गोद में आई तो थोड़ा डर गयीं, शायद सबको बेटे की चाह हो पर इतने दिनों बाद घर में गूंजी एक नन्ही किलकारी ने सबका मन मोह लिया..और सबकी आँखों का तारा बन गयी ,नन्ही ममता. एक बेटी को इतना प्यार मिलता देख ही शायद भगवान ने दो साल बाद भी इक बिटिया ही भेज दी. इस बार सबने खुल कर तो कुछ नहीं कहा ,पर सबके चेहरे की मायूसी ही दिल का हाल बयाँ कर गयी. वैसे भी तोतली जुबान में बोलती और डगमग पैरों से चलती ममता ही सबकी दुलारी थी. स्मिता की देखरेख का भार उन पर ही था और लगता सही अर्थों में अब वे माँ बनी हैं.

पति की पढ़ाई पूरी हो गयी थी और उन्होंने घरवालों से छुपकर रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन पत्र दिया था. सिर्फ उन्हें ही बताया था और सुन कर वे भी थोड़ी घबरा गयी थीं. पूरी ज़िन्दगी गाँव में गुजारी.कैसे शहर में रह पाएंगी?वहाँ तो सुना था लाली, पाउडर लगाए औरतें.सर उघाड़े घूमा करती हैं. उनके तो सर से पल्ला भी नहीं सरका कभी. एक बार पति ने शहर से लाकर फेस पाउडर का एक डब्बा दिया था,जिसे कभी कभी वे घरवालों के डर से सोते वक़्त लगातीं. बाद में जब बेटियों को बताया था तो कैसे लोट पोट हो हंसी थीं वे. याद करके उनके मुख पर भी मुस्कान तिर आई. शहर के नाम से एक अनजाना भय तो था ,पर नई जगह देखने की ख़ुशी भी थी,कहीं.

पर नौकरी के कागज़ ने वो हंगामा किया घर में कि आज भी डर जाती हैं,याद करके. ससुर जी एकदम आपे से बाहर हो गए," नौकरी करेगा??..इतने बड़े जमीन जायदाद का मालिक नौकरी करेगा??. शौक था पढने का पढ़ा दिया ,कॉलेज में. अब नौकरी भी करेगा? क्यूँ देख रेख करूँ फिर मैं इस जायदाद की...जाकर काशी ना बस जाऊं?" पति ने ससुर जी के सामने कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं की.उनके सामने पड़ते भी कम. आने जाने के लिए भी पूरब वाला बरामदा इस्तेमाल करते.सामने से नहीं आते कभी. सर झुकाए खड़े रहें.

फिर खाना खाते वक़्त ससुर जी थोड़ा पिघले ."ठीक है दस बजे, बुशर्ट पैंट पहिन कर घर से निकलने का ही शौक है तो स्कूल की नौकरी कर लो,जब शौक पूरा हो जाए तो खेती बाड़ी संभाल लेना." उन दिनों नया नया हाई स्कूल खुला था गाँव में और बी..पास करके उनके पति शिक्षक बन गए.पर गाँव में रहकर भी ठाट शहरों वाले. अब वे भी नई बहुरिया नहीं रह गयीं थीं. दिन भर दोनों बच्चियों की देखभाल में लगी होतीं. पति के नखरे ही इतने थे. बच्चियां बिलकुल साफ़ सुथरी शहरी अंदाज़ में पलनी चाहिए.उनके लिए चाहे बस एक पाउडर ही लाया हो.पर बेटियों के लिए सुन्दर फ्रॉक, रिबन,हेयर बैंड ,लाल गुलाबी चप्पलें, सब शहर से लाते.पूरे गाँव में उनकी बेटियाँ अलग से पहचानी जातीं.

शहर में रहकर पढने पर उनका खान पान भी बदल गया था.पूरा गाँव शाम को चना चबेना,भूंजा वगैरह खाया करता.पर उनके पति को हलवा,पकौड़े चाहिए होते. चाय तो हर आधे घंटे पर.यह सब उन्हें ही बनाना पड़ता, रसोई में काम करने वाली काकी के बस का नहीं था यह सब. अब महावर और मेहन्दी क्या,चूड़ियाँ बदले भी दिन गुजर जाते. कमजोर भी हो गयी थीं और उसी में दो साल के अंतर पर दो बेटों की माँ भी बन गयीं. पूरा घर खुशियों में डूब गया. तीन दिन तक तो हलवाई लगे रहें.पूरे गाँव को न्योता था. दोनों बेटे भी पांच बरस की उम्र तक नहीं जानते थे कि गोदी के अलावा कोई और भी जगह होती है बैठने की. सास ससुर के दुलारे थे दोनों पर पति की जान बेटियों में ही बसती थी.

धीरे धीरे उन पर जिम्मेवारियों का बोझ बढ़ने लगा. दोनों ननदों का ब्याह हो गया. दादी सास भी लम्बी बीमारी के बाद गुजर गयीं. बेटे भी अब स्कूल जाने लगे और उनके गिरधर गोपाल को लगा थोड़ी देर को भी उनके घर का आँगन सूना क्यूँ रहें और फिर से दो लक्ष्मी उनके गोद में डाल दी. सबसे छोटी बेटी के तो नाम रखने का भी उत्साह किसी में नहीं था. कभी मीरा के भजन वे बड़े शौक से गाती थीं,उन्होंने प्यार से उसका नाम रख दिया,मीरा.
(क्रमशः )