Monday, June 30, 2014

अंजलि

साहिल दौड़ता-भागता प्लेटफॉर्म पर पहुंचा तो  पता चलाट्रेन दो घंटे लेट है . ऑफिस से तो समय पर ही निकला था पर ट्रैफिक में बुरी तरह फंस गया . सोच रहा था ,पहली बार अंजलि ने उस से कोई मदद चाही है और वह समय पर पहुँच नहीं पायेगा. अजनबी शहर ,अनजान चेहरों के बीच अंजलि परेशान हो जायेगी. ऐसा न हो वो अकेले ही चल पड़े. पर आज मन ही मन भारतीय रेलवे का शुक्रिया अदा किया , आज ट्रेन के लेट होने से खीझ नहीं हुई बल्कि सुकून की सांस ली उसने. एक नीम्बू पानी लिया और प्लेटफॉर्म पर टहलने लगा. अच्छा हुआ थोड़ा समय मिला और बिखरी यादें अपने आप सिमटने लगीं. अंजलि उसकी छोटी बहन साक्षी की सहेली थी . दोनों एक ही क्लास में थीं और अक्सर साक्षी के साथ अंजलि भी घर पर आ जाया करती. साक्षी जब छोटी थी तो उस से बहुत डरती थी (अब तो दादी अम्मा बन कर सलाह दिया करती है ) उसकी देखा देखी अंजलि भी उस से डरने लगी. वो घर में घुसता और दोनों सहेलियां या तो छत पर भाग जातीं या घर के किसी महफूज़ कोने में छुप जातीं. और अगर सामने पड़ जातीं वो भी रौब जमाने को जोर से साक्षी को किसी न किसी बात पर डांट देता , “सारा दिन खी खी करके घूमती रहती हो...इम्तहान पास आ रहे हैं...पढ़ाई नहीं करनी “ “हाँ.. भैया” कहती साक्षी सहम जाती और अंजलि जल्दी से अपने घर चली जाती. 

जब साहिल को पता चला कि गली के कोने पर जो बड़ा सा आलीशान मकान हैवो अंजलि का घर है और वो अपने माता- पिता की इकलौती बेटी है तो उसने साक्षी को बहुत मना किया कि इतने बड़े घर की लड़की से दोस्ती न करे ,उनलोगों का रहन-सहन ..बात व्यवहार सब अलग होता है. दोस्ती बराबर वालों में ही अच्छी लगती है “ पर इस बार माँ ने साक्षी का साथ दिया बोलीं, “अंजलि बहुत अच्छी लड़की है ...घमंड ज़रा सा छू नहीं गया है...बहुत घुल मिल कर रहती है...बड़ों की इज्जत करती हैसब पैसे वाले खराब नहीं होते बेटा“ माँ ने उसे समझाने की कोशिश की. उसने कंधे उचका दिए...” उसे क्या...जिस से चाहे दोस्ती रखे....बस अमीर सहेली की देखादेखी कोई उटपटांग मांग न करे.” अब साक्षी उसके सामने कभी अंजलि को अपने घर पर नहीं बुलाती . काफी दिनों तक उसने अंजलि को देखा नहीं. और भूल ही गया .

 साक्षी कॉलेज में आ गयी थी. एक दिन कॉलेज में उसका साड़ी डे था . दो दिन से उसकी तैयारी चल रही थी और साहिल उसे चिढाये जा रहा था , “ये कॉलज जाने की तैयारी हो रही है या किसी शादी में जाने की ..कॉलेज में पढाई की जगह ये सब होता है....कैसा कॉलेज है तुम्हारा 
 “भैया परेशान मत करो..तैयार होने दो मुझे...” माँ ने भी उसे डांट कर बाहर वाले कमरे में भेज दिया, "जब तक ये तैयार होकर चली नहीं जातीमुझे कोई काम नहीं करने देगी..तंग मत कर इसे “.वो ड्राइंग रूम में टेबल पर पैर फैलाए टी.वी देखने लगा .तभी डोर बेल बजी. सामने एक परी सी ख़ूबसूरत लड़की नीली साडी में ख़ड़ी थी . वो बिना पलकें झपकाए देखता रह गया तो धीरे से बोली, “साक्षी है ? “
वह झेंप गया हाँ है...साक्षीsss...” उसने जोर से आवाज़ दी....और दरवाजा खुला छोड़ अन्दर चला गया . पर बरामदे से देखता रहा..ये कौन सी सहेली है साक्षी की ..इसे तो कभी नहीं देखा .साक्षी साडी संभालती हुई कमरे में आयी और चीख पड़ी..अंजलिss हाय तू कितनी सुन्दर लग रही है...” तो ये अंजलि थी. पर इतनी बदल कैसे गयी वो तो दो पोनिटेल बांधे फ्रॉक पहने रहती थी...इतनी बड़ी कैसे हो गयी ?? दोनों सहेलियां घर से निकल गयी और वह खिड़की के पास आ गया . उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ये अंजलि ही थी. दूर तक उसे जाते देखता रहा . बाद में साक्षी से पूछ भी लिया , “ वो अंजलि थी तुम्हारे साथ..तुम्हारी अंजलि से अब भी दोस्ती है 
लो हमारी दोस्ती ख़त्म कब हुई थी...हम तो स्कूल से ही पक्की सहेलियां हैं ...
कभी देखा नहीं न घर पर ...
वो तुमने डांट दिया था न कि अमीर लड़कियों से दोस्ती मत करोइसलिए तुम जब घर में होतेमैं अंजलि को नहीं लाती और अच्छा ये है कि तुम घर में रहते ही कितनी देर हो...कभी क्रिकेट...कभी दोस्त..कभी कॉलेज ...पर मेरी  सहेली के बारे में इतना क्यूँ पूछ रहे हो...ऊँ..
नहीं...वो तो यूँ ही...पहचाना नहीं न इसलिए...” कहकर उसने बात टाल दी .

पर अब वो अक्सर साक्षी से अंजलि के बारे में पूछ लेता...साक्षी भी सहज होकर सब बता देती . कभी कभी उसके लिए सहायता भी मांग लेती, “भैया तुम्हारे किसी दोस्त के पास इकोनौमिक्स के नोट्स हैं ? साक्षी के लिए ला दो न...या अमुक राइटर की कोई किताब लाने को कहती. वह कहीं से भी ढूंढ कर ला देता. धीरे धीरे साक्षी भी समझ गयी थी. अंजलि के लिए उसके मन में एक सॉफ्ट कॉर्नर है. पर अंजलि जब भी उसके सामने पड़ती..घबरा कर चली जाती. उसके मन में शायद उसके बचपन वाली डांट का अब तक असर था . पर साक्षी बताती कि अंजलि भी उसके बारे में अक्सर पूछती रहती है.

पर फिर वो गंभीर हो जाता, उसे पता था अंजलि और उसका कोई मेल नहीं . जब पढाई ख़त्म कर उसे एक अच्छी नौकरी मिल गयी तब साक्षी ने ही बात शुरू की , “भैया...अंजलि की शादी की बात चल रही है “ उसे एक धक्का सा लगा पर उसने जाहिर नहीं किया . बस एक छोटी सी ‘हम्म’ कही .साक्षी ने फिर से कहा भैया तुम भी अच्छी जॉब में हो और अंजलि बहुत बहुत अच्छी लड़की है... कितना अच्छा हो अंजलि हमारी भाभी बन जाए 
“साक्षी..बहुत पटर पटर बोलने लगी है तू,..ऐसा कुछ नहीं है और मैं चार-पांच साल शादी की सोच भी नहीं सकता. बहुत सारे काम करने हैं. घर की मरम्मत करवानी है...पूरा रिनोवेट ही करवाऊंगा...फिर घर के फर्नीचर बदलने हैं, गाड़ी लेनी है ..मामी-पापा को पूरा देश घुमाना है...लोन चुकाना है...तेरी शादी करनी है...अभी बहुत वक्त है 
पर तब तक अंजली के पैरेंट्स...इंतज़ार थोड़े ही करेंगे “ रुआंसी हो गयीसाक्षी
“इसीलिए तो कह रहा हूँ ,बेफजूल की बातें सोचना छोड़ दे...वैसे भी अंजलि को उसके स्टैण्डर्ड का घर ही मिलना चाहिए.
अंजलि वैसी लड़की नहीं है...हर जगह एडजस्ट कर लेगी 

“बेकार की बातें माँ मत कर..चल चाय बना...” उसे साक्षी से यह सब डिस्कस करने का मन नहीं हो रहा था . अंजलि उसे अच्छी लगती थी. माँ और साक्षी से उसकी तारीफ़ भी सुनता रहता था. अब कॉलेज ख़त्म हो जाने के बाद उसकी आवारागर्दी भी कम हो गयी थी. वीकेंड्स पर अक्सर घर पर ही होता, अंजलि कभी रास्ते में मिल जाती, कभी छत पर से नज़र आ जाती . साहिल को देखते ही अंजलि के चेहरे पर एक घबराहट सी छा जाती, उसके केश की जड़ें पसीने की नन्ही नन्ही बूंदों से लद जातीं .और लाला चेहरा लिए वो कतरा कर निकल जाती . वो कभी मुस्करा देता , कभी सोचने लगता, ‘ इतना भी क्या घबराना ,इतने दिनों में उसे नहीं पहचाना ..क्या वो कोई बदतमीजी कर बैठेगा “ एक बार उसने उसे थोड़ा और परेशान करने के लिए पूछ भी लिया , “वो नोट्स साक्षी ने दिए न...ठीक थे ?”
“हाँ, अच्छे थे “ सपाट स्वर में कहा उसने और फिर थोडा रुक कर कहा “थैंक्यू ‘ और चली गयी.
फिर उसने खुद को ही रोक लिया...क्या फायदा जिस राह की कोई मंजिल नहीं उस पर क्यूँ कदम बढ़ाना . उसने मन ही मन एक दुआ कर डालीकि अंजलि को खूब अच्छा घर और वर मिलेउसे जीवन की सारी खुशियाँ मिले. 

कुछ महीनों बाद सुना अंजलि की शादी ठीक हो गई  है . उसके कुछ दिन बाद एक दिन वो घर की तरफ आ रहा था और अंजलि जा रही थी. अंजलि ने नज़रें उठा कर बहुत गुस्से में उसे देखा...वो उन नज़रों का मतलब देर तक तलाशता रह गया. अंजलि नाराज़ है उस से पर उसने तो हमेशा उसकी मदद ही की है फिर उन नाराज़ निगाहों का माजरा क्या था. उसे समझ नहीं आया. अंजलि की शादी के दिन नजदीक आते जा रहे थे साक्षी की तैयारियां जोरों पर थीं . बस एक ही विषय था उसके पास, ‘कब क्या पहनेगी ‘ जब दो दिन रह गए तो उसका मन डूबने लगा और वो ऑफिस के काम का बहाना बना शहर से दूर चला गया. अंजलि की विदाई के बाद ही लौटा .अंजलि का घर वैसा ही था पर सूना सूना लग रहा था. छत पर से देखा अंजलि की छत पर बने मंडप की सजावट धूप में फीकी पड़ गयी थी. छत पर अक्सर अंजलि के रंग  बिरंगे  कपडे-दुपट्टे सूखते रहते थे ,आज छत वीरान लग रहा था, उसके मन के एक कोने जैसा. साक्षी से अंजलि की शादी के किस्से उसके दूल्हे की हाज़िरजबाबी सुनता रहा. मन में एक टीस तो उठती पर वह मन को समझा देता ,यही दुआ तो की थी अंजलि के लिए. वो हमेशा खुश रहे.

दो साल बाद साक्षी की भी शादी हो गयी . साक्षी की शादी में अंजलि अपने एक साल के बेटे के साथ शामिल हुई थी. अब वो पहले से भी ख़ूबसूरत हो गयी थी. बेटा भी बहुत प्यारा था . अपने घर में हमेशा अंजलि को सहमे-सकुचाये हुए सा देखा था .पर इस बार माँ के साथ वो बहुत सारा काम संभाल रही थी. साक्षी के सारे काम वही कर रही थी. अच्छा था ,वह काम में इतना व्यस्त था कि ज्यादा आमना-सामना नहीं हुआ. पर दूर से उसने कई बार अंजलि को देखा इस बार अंजलि के चहरे पर कोई सल्लजता नहीं थी. आत्मविश्वास से भरी वो बहुत खुलकर हंसती थी . अच्छा लगा देख, चलो उसकी दुआ क़ुबूल हुई. अंजलि बहुत खुश है.

 अब उसे नौकरी करते हुए कई साल हो गए थे ,उसने अपनी सारी जिम्मेवारियां पूरी कर दी थीं. पुराने घर की ऐसी कायापलट कर दी थी कि लोग पहचान नहीं पाते. माँ-पापा- साक्षी  कब से उसके पीछे पड़े थे ,”शादी कर लो” रोज ही माँ कोई न कोई तस्वीर दिखातीं और उस लड़की के गुण गातीं. वो बहाने बना कर टाल देता ,पर अब कोई बहाना भी शेष नहीं बचा था . उसने भी हाँ कहने की सोच ही ली थी कि साक्षी के एक फोन ने जैसे उसे सुन्न सा कर दिया. रोती हुई साक्षी कह रही थी...भैया..अंजलि की दुनिया उजड़ गयी ..एक एक्सीडेंट में अंजलि के पति की मौत हो गयी “ सुन कर उसकी आँखों के आगे अन्धेरा सा छ गया. वो सोफे पर गिर पड़ा...अंजलि और उसके बेटे का चेहरा बार बार सामने नज़र आ जाता . कैसे सह पाएगी, अंजलि  ये पहाड़ सा दुःख. माँ को जैसे ही खबर पता चली...वे अंजलि के घर चली गयीं . अंजलि को उसके माता-पिता अपने पास लेकर आ गए थे ..साक्षी भी अपनी सहेली का दुःख बांटने आ गयी थी. सुबह होते ही अंजलि के घर चली जाती. रोज रात में रुंधे स्वर में अंजलि की दशा का वर्णन करती, ”बड़ी मुश्किल से उसे एक रोटी खिलाई है..अंजलि तो पत्थर हो गयी है....आंसू भी नहीं बहते उसके बस सारा समय छत घूरती रहती है.” यह सब सुनकर उसका कलेजा टूक टूक हो जाता. एक नज़र अंजलि को देखने की उत्कट इच्छा जाग जाती .उसे पता था ,वो कुछ कह नहीं पायेगा पर एक बार अंजलि के सामने जाकर ये तो जता दे कि उसके दुःख से वह भी कितना दुखी है.  एक दिन उसने साक्षी से कह ही दिया, “ मुझे लगता है...एक बार मुझे भी जाना चाहिए अंजलि के माता-पिता जब भी मिलते हैं  मेरा हाल-चाल पूछते रहते हैं...उनके ऐसे दुःख के समय मुझे भी उनसे मिलना चाहिए 
“और क्या बिलकुल जाना चाहिए...कल ही चलना तुम मेरे साथ 

दूसरे दिन साक्षी के साथ अंजलि के घर गयापैर मन मन भर के हो रहे थे पर किसी तरह जी कड़ा कर गेट के अन्दर प्रवेश किया. अंजलि की माँ बाहर वाले कमरे में ही अंजलि के तीन साल के बेटे को गोद में लेकर बैठी थीं. उसे देखते ही पल्लू आँखों पर रख लिया...बेटा मेरी बिटिया की दुनिया वीरान हो गयी...कैसे जियेगी अब वह.. ये छोटा  सा बच्चा किसे कहेगा अब पापा “अंजलि का बेटा उनकी गोद से कूद कर अन्दर की तरफ भागा और दरवाजा बंद करने की कोशिश करने लगा  “आपलोग अन्दर नहीं आओ...आपको देख के मम्मी रोती है...” पर उसके छोटे छोटे हाथो से दरवाजा बंद नहीं हो रहा था साक्षी ने उसे गोद में उठा लिया...अच्छा ऐसा है...चलो हमलोग मम्मी को गुदगुदी करके हंसाते हैं...ऐसे ऐसे...और साक्षी अनय को गुदगुदी करने लगी... अनय  हंसता हुआ..उसकी गोद से उतरने को छटपटाता रहा . साक्षी अन्दर चली गयी. वह अंजलि की माँ के पास बैठा रहा ...थोड़ी देर बाद अंजलि की माँ उठीं ,”देखूं..अंजलि ने कुछ खाया या नहीं...साक्षी का बड़ा सहारा है...अनय और अंजलि को बहुत संभाला है उसने “ तुम भी आओ बेटा और उसे अन्दर बुला कर ले गयीं. अंजलि एक कुर्सी पर निस्पंद बैठी थी. साक्षी पलंग पर अनय को एक पिक्चर बुक दिखा रही थी...” अंजलि ने आँखें उठा कर उसे देखा और थोड़ी देर देखती रही...पत्थर सी आँखें थीं उसकी ,उनमें कोई भाव नहीं था जैसे एक वीरानी सी ठहर गयी हो ” फिर खिड़की के बाहर नज़रें टिका दीं ,अंजलि ने . अंजलि की माँ ने साक्षीसे पूछा“अंजलि ने खाया कुछ 
खाया क्या.. छुआ भर 
अंजलि की माँ ने ही दूसरी कुर्सी खींच कर उसे बैठने के लिए कहा और बोली..चाय के लिए बोल कर आती हूँ..
नहीं चाहिए....चाय रहने दीजिये..
“अरे तुमलोगों के बहाने इसके गले में भी दो घूँट उतर जाएगा...
वो अपनी हथेलियों को घूरते जड़ बना बैठा रहा, कुछ भी नहीं बोल पाया . अंजलि खिड़की से बाहर देखती रही...अनय  ही उसे शांत बैठा देख अपनी किताब उसके पास लेकर आ गया “अंकल ये देखो..जिराफ “ फिर वो जानवरों के नाम पूछने लगाअंजलि वैसे ही बाहर देखती रही...चाय पीने के बाद वो बाहर निकल आया और एक संकल्प लिया..इन वीरान आँखों में नए सपने उगा कर रहूँगा...

कुछ दिनों बाद साक्षी भी चली गयी .पर वह सुबह शाम अंजलि को फोन करती .और उसे भी अंजलि का हाल पता चलता रहता. साहिल ने साक्षी से ही अंजलि को आगे पढने के लिए प्रोत्साहित करने को कहा. पर साक्षी का कहना था, “अंजलि बिलकुल तैयार नहीं 
आखिर एक दिन वह अंजलि की माँ से मिलने गया...और उन्हें बोला, “अंजलि को एम.ए. करने के लिए बोलिए...घर से बाहर निकलेगी तो उसका दिल भी बहलेगा...”
“साक्षी ने तो कितनी बार कहा है...मुझसे भी कहा..पर ये सुनती ही नहीं..कहती है, “मेरा पढने में मन नहीं लगेगा..,इसके पापा भी कहते हैं ,अभी रहने दो..उसे तंग मत करो “अंजलि की माँ ने मजबूरी जताई .
“चाची पर अगले महीने  सेशन शुरू होने वाला है...अभी एडमिशन नहीं लिया गया तो फिर पूरा एक साल रुकना पड़ेगा और तब तक अंजलि क्या करेगी...ऐसे ही  दुःख में डूबी रहेगी.”
“पर क्या करूं ,बेटा ये सुनती ही नहीं...और अपने पापा की लाडली है, वे जोर डालते नहीं “
चाची, मैं बात करूँ..?”
हाँ बेटा..तुम्ही समझा कर देखो...मुझे भी उसका यूँ सारे दिन कमरे में अकेले पड़े रहना देखा नहीं जाता ..इसके पापा तो सारा दिन घर पर नहीं रहते न....अपनी बेटी को ऐसे हाल में देख कर क्या  गुजरती है, वे क्या  जाने..” उनका गला भर आया था 
अंजलि ने नीचे नज़रें किये पर दृढ स्वर में उस से भी यही कहा..” आगे पढने में मेरी कोई रूचि नहीं है...और मुझे नौकरी करने की जरूरत नहीं है, इतना है पास में कि अनय के भविष्य के लिए सोचना नहीं पड़ेगा “
“नौकरी के लिए कौन कह रहा है, पर वो बाद की बात है..अभी एडमिशन तो ले लो..चाहे यूनिवर्सिटी मत जाना “
“मुझे कहीं नहीं जाना ...कुछ नहीं पढ़ना “..अंजलि ने जैसे एक जिद से कहा .
“फिर क्या करोगी...यूँ ही उदास बैठे रहा करोगी . अनय  की तरफ देखो.. तुम्हे यूँ उदास देखउसका बचपन कैसे गुजरेगा. उसे भी एक हंसती मुस्कुराती मम्मी चाहिए या नहीं ..तुम्हारी कोई जिम्मेवारी है उसके प्रति या नहीं ? बचपना छोडो..मैं एम. ए.  का एडमिशन फॉर्म लेकर आता हूँ ..तुम उसे भर दो और पढाई शुरू करो..
अंजलि कुछ नहीं बोली ..दूसरे दिन  ही उसने फॉर्म लाकर अंजलि की माँ को दे दिया . हर दूसरे तीसरे दिन जाकर पूछताछ करता .पता चला ,’ अंजलि ने फॉर्म नहीं भरा है और जब लास्ट डेट बिलकुल नजदीक आ गयी. तो उसने अंजलि की माँ से कहा , “मुझे फॉर्म दीजिये...मैं भरवा कर लाता हूँ .वो खुद फॉर्म लेकर अंजलि के कमरे में गया और बोला..जैसे साक्षी  को डांट सकता हूँ ,वैसे ही  तुम्हे भी...चलो फॉर्म भरो...” और पेन आगे कर दिया ” शायद अंजलि ने गुस्से में कुछ कहने को सर उठाया पर साथ ही अपनी माँ को और उनकी साडी पकड़ कर सहमे से अनय को खड़े देख कुछ कहा नहीं .और फॉर्म भरने लगी .

साहिल पता करता रहता कि कब से क्लास शुरू होने वाले हैं और जब क्लास शुरू हो गए तो उसने साक्षी को बुलवा लिया. शुरू में कुछ दिन साक्षी ही जबरदस्ती अंजलि को यूनिवर्सिटी लेकर गयी . अंजलि  सिर्फ पढाई शुरू करने में आनकानी कर रही थी. एक बार पढ़ना शुरू किया तो फिर उसमे ही रम गयी . पर उस से वैसी ही दूरी बनी रही. एकाध बार अंजलि के घर गया भी ,पूछा ,”पढ़ाई ठीक से चल रही है न ...कुछ जरूरत हो तो कहना ” पर अंजलि ने बड़ी रुखाई से कहा , “ हाँ ,ठीक चल रही है...मैं खुद मैनेज कर लूंगी“ उसके बाद वह फिर नहीं गया . कभी कभी रास्ते में अनय के साथ मिल जाती तो वो अनय से बातें कर लेता उस से भी औपचारिकता वश पूछ लेता ,”कैसी हो ?“ अक्सर तो वो ,”ठीक हूँ ,चलो अनय देर हो रही है..कह आगे बढ़ जाती .
एक दिन अंजलि ने कुछ गुस्से में ही कहा, “ आजतक तो कभी बात भी नहीं की आपने...अब इतनी हेल्प क्यूँ कर रहे हैं..मैं अपना ख्याल रख सकती हूँ “ और फिर आगे बढ़ गयी. वो अबूझ सा खड़ा रह गया .समझ नहीं पाया ,उसकी नाराजगी इस बात पर थी कि उसने अब तक उस से बात नहीं की थी या इस बात पर कि उसकी हेल्प क्यूँ करना चाहता है “

अंजलि ने खुद को पढाई में झोंक दिया था और उसकी मेहनत रंग लाई .उसने फर्स्टक्लास से एम.ए. पास किया और फिर पी.एच डी. करने लगी . उसे यह सब देख बहुत ख़ुशी होती. उसने जो राह दिखाई ,उस पर अंजलि आगे ही बढती जा रही है.

माँ अब भी अक्सर साहिल पर शादी के लिए जोर डालतीं . पर अब अंजलि  को यूँ अकेला देखउसे अपनी दुनिया बसाने की इच्छा नहीं होती. साक्षी समझती थी. अब वह कुछ नहीं कहती. इसी बीच साहिल को एक कंपनी में बहुत अच्छी जॉब मिल गयी और उसे शहर से दूर जाना पड़ा. अनय के स्कूल की छुट्टियां चल रही थीं और अंजलि उसे लेकर ससुराल गयी हुई थी. मन में एक कसक तो रहती कि आते वक़्त अंजलि को एक नज़र देख भी नहीं पाया. मिल पाता या नहीं...कुछ कह पाता या नहीं,ये तो अलग बात पर एक नज़र देख तो लेता. अंजलि की मनस्थिति समझता था ,इसीलिए वो कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था .

साक्षी के जरिये अंजलि की खबर मिलती रहती थी. अंजलि की पी.एच डी पूरी हो गयी और अब वह एक कॉलेज में लेक्चरार नियुक्त हो गयी.
कभी अपने शहर जाता और अंजलि पर नज़र पड़ जाती तो उसे आत्मविश्वास से भरपूर देख अच्छा लगता . हाल चाल पूछ लेता, अब अंजलि की आँखों में उतना गुस्सा नहीं नज़र आता फिर भी वो ज्यादा बात नहीं करती . छोटा सा जबाब दे आगे बढ़ जाती. पर इतना सा बदलाव भी उसे भला लगता वह अंजलि को भरपूर समय देना चाहता था . उसे अपने दिल की बात कहने की कोई जल्दी नहीं थी. वह पहले अंजलि को अपने दुःख से उबरने देना चाहता था .उसे अपने पैरों पर खड़े देखना चाहता था ताकि अंजलि को ये न लगे कि वह उसे कोई सहारा देने के उद्देश्य से यह सब कह रहा है.

और कल जैसे एक राह मिल गयी. साक्षी का फोन आया “भैया तुम्हारे शहर के कॉलेज में एक सेमीनार है जिसमे अंजलि  को भाग लेना है. ठहरने का इंतजाम कॉलेज में ही है..पर वहाँ ट्रेन शाम को पहुँचती है . नया शहर है और अंजलि ने कभी अकेले सफ़र नहीं किया...वो थोडा डर रही है...तुम उसे स्टेशन से लेकर कॉलेज तक पहुंचा देना 
अंजलि तैयार है,इसके लिए...? “
हाँ भैया..अंजलि ने ही मुझे फोन पर बताया है, कि तुम्हारे शहर उसे जाना है  और जब मैंने कहा भैया तुम्हे स्टेशन से रिसीव कर कॉलेज पहुंचा देंगे तो वह मान गयी 
ट्रेन की डिटेल्स ,कोच नंबर सीट नंबर सब उसे एस.एम.एस. करने की ताकीद कर ..अंजलि का नंबर ले फोन रख दिया . पर अंजलि को फोन करने की हिम्मत नहीं हुई. बार बार नंबर घूरता और फिर मोबाइल बंद कर देता . उसे रात भर नींद नहीं आयी . ऑफिस में भी जैसे तैसे काम निबटाया और अब यहाँ था .क्या पता अंजलि कैसे बात करेगी . अब तक अजनबी जैसे ही थे दोनों .पर एक  तसल्ली थी, जब खुद ही साक्षी से कहा है तो रूखेपन से तो बात नहीं ही करेगी.



दूर से ट्रेन की सीटी सुनायी दी . ट्रेन पास आती जा रही थी और उसके दिल की धडकनें बढती जा रही थीं. ट्रेन रुकी .वो कोच के सामने ही खडा था .अंजलि गेट पर ही बैग थामे खड़ी थी...उसे देखते ही मुस्कुरा दी...और इस मुस्कराहट ने अजनबीपन की पहली दीवार गिरा दी .

5 comments:

abhi said...

Waah...bahut dino baad didi is blog par, zamaane baad :)

Achhii lagi kahani...bahut achhii...but iska agla bhaag bhi aayega na? aana hi chaahiye :)
Ye ant nahi ye to shuruaat hai

neha said...

behtareen kahani..kahani ka sukhad ant accha laga...der se hi sahi par Sahil kee bhavnayon ko aatmiyata ka sahara mila...sach hi hai ek chhoti si muskaan kitna kuchh kah jaati hai

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर कहानी.

घनश्याम मौर्य said...

बढि़या। कहानी का अन्‍त हमारी भारतीय परम्‍परा के सुखान्‍त की तरह ही है।

i Blogger said...

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