कहानी अब तक
(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा . जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.बेटे के जन्म के बाद बेटे को उस से छीन लिया गया. उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. .उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया पहले एक स्कूल में फिर बैंक में नौकरी कर ली...पर राजीव बैंक में उसे बहाने से तंग करते रहे ..वहाँ के अधिकारियों ने भी उसका शोषण करना चाहा...उसके शिकायत करने पर उसे नौकरी से अलग कर दिया...कोर्ट ने बच्चों की जिम्मेदारी उसे सौंपी और राजीव को उनके भरण-पोषण के लिए एक निश्चित रकम देने का निर्देश दिया ..उसे दूसरी नौकरी मिल गयी...उसने अपना कविताओं का पुराना शौक फिर से अपनाया...एक पत्रिका में कविता को द्वितीय पुरस्कार मिला. )
गतांक से आगे
अब तो उसका उत्साह बहुत बढ़ गया. उसी पत्रिका में एक और कविता भेज दी...वो भी छप गयी..और पत्रिका में कई लोगो ने पत्र लिख कर उस कविता की सराहना भी की तो उसे अफ़सोस होने लगा..'ये वाली कविता...प्रतियोगिता में भेजनी चाहिए थीं...शायद फर्स्ट प्राइज़ मिल जाता.." और फिर खुद को ही डांट दिया...'मन कभी संतुष्ट नहीं हो सकता..छपना ही बड़ी बात थी...द्वितीय पुरस्कार मिल गया...अब सोच रही है...पहला क्यूँ नहीं मिला..'
पुरस्कार के पैसे तो मिले ही थे..दूसरी कविता छपने के भी दो सौ रुपये मिले तो सोचा उसने..'कविता से पैसे भी कमाए जा सकते हैं...ये तो कभी सोचा ही नहीं था'...और अब लोग जब उसे पढ़ रहे हैं..पसंद भी कर रहे हैं तो उसे अपने कविता-लेखन को गंभीरता से लेना होगा. पर लिखने के पहले ढेर सारा पढना ज्यादा जरूरी है..यही सोच..कई समकालीन कवियों की किताबें खरीद लाई. ऑफिस..घर और बच्चों के काम से बचा एक एक पल...उसने कविता को समर्पित कर दिया था. देर रात तक एक -एक कविता को चार -चार बार पढ़ती...उसका शिल्प-..शैली समझने की कोशिश करती.
उसका पूरा जीवन अब कवितामय हो गया था .. किसी भी बात की प्रतिक्रिया कविता के रूप में ही होती . बच्चों की खिलखिलाहट में...माँ के लाड़ में...जमाने की धूप में....भाई-बहन के स्नेह की शीतल बयार में...खाली बटुए में....पूजा में... हर चीज़ में एक नया रंग दिखता अब.... हज़ारों शब्द साथी बन गए थे जो उसके आस-पास विचरते रहते...वो लपक कर उन्हें मुट्ठियों में कैद कर लेती. किसी तितली के पंख से फडफडाते, वे शब्द...और जब उन्हें आज़ाद करती तो कविता का रूप लिए रंग-बिरंगी तितली सा खुले आकाश में उड़ जाते और वो हैरान रह जाती...'ये उसकी रचना है..?'..जब जब्त आंसुओं से कोई रचना बनती तो महादेवी याद आतीं.."मैं नीर भरी दुख की बदली..' मन जब प्रश्नों के चक्रव्यूह में होता तो निराला के शब्द तैरते मन में.." बांधों ना नाव इस ठांव बन्धु...पूछेगा सारा गाँव बन्धु.." . जरूरी कामों से दीगर वो अब कविता ही ओढती और कविता ही बिछाती.
और इन सारे उपक्रमों से कविता का स्त्रोत जो फूट निकला...वो एक सरिता बन...जो अबाध गति से बहने लगा था.
कई पत्रिकाओं में वो नियमित छपने लगी. कभी किसी पत्रिका का कोई विशेष अंक निकलता तो उस से विशेष रूप से कविताओं का अनुरोध किया जाता. सम्पादक लोग बड़े आदर से पेश आते. कई लोगों के पत्र भी आते.. जबाब तो वो किसी पत्र का नहीं देती पर उन्हें कई-कई बार जरूर पढ़ती .अब तक तो किसी पत्रिका में उसकी तस्वीर भी नहीं छपी थी..इसका मतलब लोगों को उसकी कविताएँ सचमुच पसंद आती हैं. ये पत्र उसका बहुत उत्साह बढाते...और वो एक जिम्मेदारी सी महसूस करती अपने लेखन को और बेहतर बनाने के प्रति .
ऑफिस में उसने खुद किसी को नहीं बताया...पर एक बार किसी ने पत्रिका में उसका नाम देख पूछ लिया और उसके हाँ कहते ही सारे ऑफिस में खबर फ़ैल गयी. लोगों ने शिकायत भी की 'अब तक क्यूँ नहीं बताया.."
उसके मुस्कुरा कर चुप रह जाने पर किसी दूसरे ने उत्तर दे दिया.."अरे इसे ही तो कहते हैं..असली टैलेंट....भरे घड़े से कभी कोई आवाज़ आती है??...कहते हैं ना..'अधजल गगरी छलकत जाए.. भरी गगरिया चुप्पे जाए'..ये पत्रिकाओं में छपती रहीं और कभी बताया भी नहीं...और याद हैं वो' मिस्टर प्रसाद ' अखबार में संपादक के नाम एक पत्र छपा था..तो कितना इतराए फिरते थे..दो दिन तक अखबार उनके हाथों में ही था....एक-एक को दिखाते फिरते थे. " सबलोग उन्हें याद कर हंसने लगे...
सब अब उसे बड़ी इज्जत भरी निगाहों से देखते. वो खुद में ही सकुचा सी जाती.
एक बार उसे एक आमंत्रण पत्र मिला. जिसमें शहर में हो रही एक कवि गोष्ठी में सम्मिलित होने का निमंत्रण था. वो सोच में डूब गयी. घर में बैठ कर कविता लिखना और पत्रिकाओं में भेजना अलग बात है और कवि-सम्मलेन में मंच से कविता पढना अलग. ये उसके वश का नहीं....नहीं कर पाएगी वो. माफ़ी माँग लेगी.
पर इस बार माँ ने बहुत हौसला दिया. बोलीं.."बेटा भगवान ने तुम्हे एक अवसर दिया है,आगे बढ़ने का..अपनी पहचान बनाने का...इसे ऐसे मत गंवाओ. इसी ईश्वर ने तुम्हारी इतनी कड़ी परीक्षा ली...इतना कुछ सहा तुमने..पर हिम्मत नहीं हारी..और सफल रही...अब खुश होकर वो ईनाम दे रहा है तो उसे मत ठुकराओ.."
बहनों ने सुना तो एक डांट लगाई , "चुपचाप जाकर गोष्ठी में शामिल हो या हमलोग वहाँ आकर तुम्हे धकेल कर मंच पर भेज देंगे ...सोचो जरा हमारे लिए ये कितने गौरव की बात है...हमारे परिवार में इस क्षेत्र में कोई आगे नहीं बढ़ा...कितना बड़ा सम्मान है ये परिवार के लिए..ना मत कर छुटकी..ह्रदय से आशीर्वाद दे रहे हैं..तू जरूर सफल होगी."
और बहनों माँ-बहनों का आशीर्वाद काम आया. उसने संयोजक से आग्रह किया था कि उसका नाम दो तीन कवियों के बाद डाले...पहला अनुभव है...दूसरों को पढ़ते देख लेगी तो हिम्मत आ जाएगी. उसने कागज़ पर कविता लिख कर रख ली थी...शायद लोगों को देख कर घबरा जाए तो नज़रें झुकाए कागज़ देखकर पढ़ देगी. माइक के सामने आई तो गला सूख रहा था...थूक निगल कर गला तर किया और हाथ में कांपते कागज़ पर नज़र डाली ..एक पंक्ति कागज़ देख कर पढ़ी..और फिर तो जैसे किसी और ही व्यक्तित्व ने उसपर कब्जा कर लिया...सामने बैठे लोग..उस पर टिकी इतनी आँखें...कुछ भी उसे नज़र नहीं आ रहा था...सामने सीधा देखती हुई...इतनी बुलंद आवाज़ में कविता पढ़ी कि तालियों की गड़गडाहट से ही वह फिर अपने में लौटी...हैरानी हो रही थी..'ये उसकी जगह कौन इतने जोश से कविता पढ़ रही थी...अपने कितने ही रूपों से वो खुद अनजान थी अब तक. मुस्करा कर सबका शुक्रिया अदा करते अपनी जगह पर वापस आ गयी.
इस कवि गोष्ठी की क्लिपिंग दूरदर्शन पर दिखाई गयी...और अब तक बस उसके घर वाले ,ऑफिस वाले या फिर पढ़ने की रूचि रखने वाले लोग ही उसके कविता लेखन के विषय में जानते थे. अब महल्ले-टोले के लोग भी जान गए. जहाँ पहले किसी समारोह में लोग ताने देते थे अब आगे बढ़कर उस से बातें करने का बहाना ढुंढते .
अपने रिश्तेदारों से बड़ी शान से मिलवाते.."ये बहुत बड़ी कवियत्री हैं..टी.वी. पर आती हैं.."
"अरे बड़ी कहाँ...और टी.वी. पर तो बहुत लोग आते हैं.." वो सकुचा कर कहती.
"हम तो नहीं आते....हमारे लिए तो आप एक सेलिब्रिटी हैं.." ...वो हैरान रह जाती वक़्त कितना जल्दी बदल जाता है.
महिलाओं में उसे अपनी सबसे अच्छी दोस्त बताने की होड़ लगी होती. लडकियाँ उसे घेरे रहतीं...'हमें भी सिखाइए ना...कैसे लिखते हैं कविता'
कभी कभी कोई प्यारी सी लड़की..कभी कोई शर्मीला सा लड़का एक तह किया हुआ कागज़ लिए हुए उसके घर आते..." कुछ लिखने की कोशिश की है..एक बार देख कर बताइए ना कैसी है.." वो यथासंभव उन्हें सलाह देती... उन्हें बढ़ावा देती...समाज की नज़रें अब उसके प्रति बदल रही थीं.
सबसे छोटे देवर संजीव ने भी वो प्रोग्राम देखा था उसने बधाई देने को फोन किया...ख़ुशी उसके आवाज़ से छलकी पड़ रही थी. संजीव अब एक अच्छी नौकरी में था और उसकी शादी भी हो चुकी थी. यदा-कदा फोन कर लिया करता था...बच्चों का हाल-चाल ले लिया करता था. कभी कभी आकर मिल भी जाता. वो ही ज्यादा बढ़ावा नहीं देती. पता नहीं उसकी वजह से उसे अपने परिवारवालों से ना सुनना पड़े कुछ. उसकी पत्नी भी उसे कितना जानती है...शायद उसका भी यूँ संजीव का फोन करना अच्छा ना लगे.
पर संजीव के फोन ने चिंता में डाल दिया. अब तो उसके ससुराल वालों को पता चल गया...इसका मतलब राजीव को भी पता चल गया होगा..अब पता नहीं वो कैसे रिएक्ट करें. उनका डर नहीं था..पर बिना बात की बहस वो नहीं चाहती थी. थक गयी थी..उनकी जली-कटी सुनते सुनते...दिमाग शांत रखना चाहती थी. पर दो दिन बाद ही राजीव का फोन आ गया..उन्होंने तो नहीं देखा था..किसी ने उन्हें खबर की थी.
आदतवश गाली से ही शुरुआत की.."तो इसीलिए छटपटा रही थीं,अकेले रहने को कि मर्द लोगों के बीच में बैठकर गीत गा सकें....ये सब मेरे साथ रहने से नहीं होता ना...अनजान मर्द लोग के साथ..हंसी ठट्टा चल रहा है....तनिको सरम नहीं रह गया है आपको..."
वो आगे पता नहीं क्या क्या कहते रहे..उसने रिसीवर टेबल पर रख दिया था. इसके बाद अक्सर यही करती...पहले ही कह देती कि अगर आपको यही सब कहना है तो हम रिसीवर नीचे रख रहे हैं.."
"हाँ मेरा बोली तो खराब लगबे करेगा...हम सच जो कहते हैं.....ओर वो आगे सुनती ही नहीं....जितना हो सके निगेटिव वाइब्स को वो खुद से दूर रखना चाहती थी. अक्सर कोई ना कोई राजीव के किस्से सुनाने की कोशिश करता. वो शुरुआत में ही रोक देती या फिर वहाँ से चली जाती. पर वे लोग माँ को बता जाते और मना करते करते भी माँ टुकड़ों टुकड़ों में कह ही डालती...कि अब 'राजीव की रंगीन मिजाजी उन्हें महँगी पड़ रही थी. औरतें उन्हें ब्लैकमेल करने लगी थीं. उनपर झूठे आरोप लगा कर भी उनसे पैसे ऐंठने लगी थीं. खुद ही शाम ढले उनके क्वार्टर पर जातीं और फिर उनसे कहतीं, 'मुंहमांगा पैसे दो नहीं तो हल्ला मचा देंगे...पुलिस में खबर कर देंगे'. राजीव को पैसे भी देने पड़ते फिर आनन- फानन में ट्रांसफर ले वहाँ से भागना भी पड़ता.
माँ खुद ही उसके मन की बात कह देतीं.."जो जैसा करेगा....वैसा भरेगा.."
वो माँ को बरजती रहती..'माँ अब बच्चे बड़े हो रहे हैं...जितनी जैसी छवि अपने पिता की उनके मन में है..वो ही काफी मैली है..अब उस पर और गर्द की परत मत चढाओ...'
उसकी तरह बच्चों ने भी किताबों में ही शरण ढूंढ ली थी. कभी-कभी उसे महसूस होता....उसका बेटा अपने दोस्तों के साथ फिल्म जाने की जिद नहीं करता ..ना ही हर शाम चौराहे पर खड़ा गप्पे लगाता है. खेलने जरूर जाता है..पर वहाँ से सीधा घर. छुट्टी का दिन भी ज्यादातर घर पर ही बिताता है. इसलिए तो नहीं कि' वो भी डरता है कहीं कोई उसके पिता का जिक्र ना कर डाले?" फिर मन को समझाती...'अब कुछ पाने के लिए तो कुछ खोना ही पड़ेगा...अगर वो किताबों में डूबा रहता है..तो अपना भविष्य ही बना रहा है' .बाकी बच्चों की माँ उस से हमेशा कहतीं ."आपका रूद्र कितना मन लगाकर पढता है....हमेशा फर्स्ट आता है..मेरे बेटे का तो पढ़ने में मन ही नहीं लगता...क्या उपाय करूँ??.."
और रूद्र के लिए उसे चिंता करने की जरूरत पड़ी भी नहीं. दसवीं अच्छे नंबरों से पास हुआ. वो उसे इंजीनियरिंग या मेडिकल पढ़ना चाहती थी. पर रूद्र ने साफ़ कह दिया..इसके लिए पिता से पैसे मांगने होंगे..और उसे उनके पैसे नहीं चाहिए. उसे अपने लिए एक पैसे भी एक्स्ट्रा मांगना गवारा नहीं. उसने उन्हें आश्वस्त किया.."माँ तुम चिंता मत करो...मैने फर्स्ट अटेम्प्ट में ही यू.पी.एस.सी ना क्लियर किया तो कहना मुझे. मैं आज से ही उसकी तैयारी में जुटा हुआ हूँ.' वो समझती थी..वो जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था. जब उसने बी.ए. का इम्तिहान दे दिया तो वो अड़ गयी, उसे कसम दे दिया कि उसे यू.पी.एस.सी. के इम्तहान के लिए कोचिंग करनी ही पड़ेगी. वो अपने बेटे की इतनी मेहनत जाया होते नहीं देख सकती थी. वो अपनी तरफ से मेहनत कर रहा था तो उसका भी फ़र्ज़ था वो उसे सही मार्गदर्शन मुहैया करवाए. जब सारे बच्चे कोचिंग की सुविधा उठा रहे हैं तो वो अपने बेटे को इस से वंचित नहीं रखना चाहती थी.
उसने एक दिन नोटों की गड्डी उसके सामने रखी...और कहा.."पता करो कौन सा कोचिंग इंस्टीट्युट अच्छा है ..वहाँ चलकर एडमिशन ले लो.."
रूद्र चौंक कर उठ खड़ा हो गया..' माँ इतने पैसे कहाँ से??"
"चिंता मत करो..तुम्हारे पिता से नहीं लिए हैं..."
"फिर...??"
वो चुप रही..तो बोला.."तुमने गहने बेच दिए...क्यूँ माँ..तुम्हे बेटे पर पूरा भरोसा नहीं है..मैं नहीं कर पाऊंगा??"
"पूरा भरोसा है बेटा, तभी तो गहनों की परवाह नहीं की..मालूम है तू कम्पीट भी करेगा..और ऐसे दस सेट बनवा देगा.."
"पर माँ उस पर काव्या ,सौम्या का भी हक़ है.."
'हाँ बेटा...तीन हिस्से कर के तेरा हिस्सा ही बस निकाला है..और अगर जरूरत पड़ती तो उनका हिस्सा भी निकाल देती...तुम तीनो अलग अलग हो क्या..और क्या तू सौम्या,काव्या के लिए नहीं बनवा देगा.."
रूद्र...सोचता हुआ सा वापस बैठ गया..उसने उसके कंधे पर हाथ रखा..'चिंता मत करो बेटा...ये सब तुमलोगों का ही है.." और फिर वहाँ से चली गयी. रूद्र को अकेला छोड़ देना चाहती थी..जानती थी...आँसू मचल रहे होंगे पर खुद को घर का जिम्मेवार बड़ा लड़का समझता है ना..सारी ताकत लगा उन्हें अंदर ही घोंट लेगा..लड़का हुआ तो क्या...कभी-कभी आँखें नम करना उसके ही हित में अच्छा है..अंतर का सारा कल्मष बह जाएगा.
काव्या शुरू से ही चंचल...बातूनी थी,..और प्रैक्टिकल भी. नौकरी भी उसे चैलेंज वाली ही पसंद थी. उसे कोई बोरिंग नौकरी नहीं करनी थी बल्कि वो कारपोरेट ऑफिस में काम करना चाहती थी. और इस के लिए उसे एम.बी.ए. करना था. उसे अपने पिता से पैसे लेने में कोई संकोच नहीं था. बल्कि वो उल्टा अपना हक़ समझती थी. उसने कहा भी..."तुम कुछ मत कहना..मैं ही बात करुँगी..आखिर उनका प्रमोशन भी होता जा रहा है...सैलरी बढती जा रही है...पर क्या ,महंगाई नहीं बढ़ रही??...हमें तो वही सालों पहले कोर्ट से तय किए पैसे ही मिलते हैं...तुम नौकरी ना करो..नानी की पेंशन ना हो...नाना जी का बनाया ये मकान ना हो तो हमारा खर्च चलता, उनके भेजे पैसे से??..वे पैसे भी वो कैसे रो रो के देते हैं..करेंगे क्या उन पैसों का...मैं तो भैया की तरह नहीं हूँ.....उनसे अपनी फीस के पैसे लेकर रहूंगी.."
उसने दो टूक बात की...और उसकी इतनी सीधी बात ने राजीव को कुछ कहने का अवसर नहीं दिया...वे भी शायद मुँहफट काव्या से डरते थे. जब गेस्ट हाउस में उनसे मिलने जाती तब भी काव्या उन्हें टोक देती थी.."आप इतना पान क्यूँ खाते हैं..माउथ कैंसर हो जाएगा.." ..इस तरह से लेटे रहने से कितने ओवरवेट हो गए हैं....कई बीमारी हो जायेगी आपको...."
राजीव उसे डांट देते.."हाँ इहे मना रही है..माँ सिखाई होगी.."
"नहीं हमने किताब में पढ़ा है...किसी ने सिखाया नहीं है.."..काव्या बिना डरे बोलती.
इस बार भी पता नहीं काव्या ने कैसे क्या बात की पर राजीव एम.बी .ए. की फीस देने को राजी हो गए.
पर मुश्किल सौम्या की थी. वो अपने दीदी भैया से अलग...मेडिकल पढना चाहती थी. और वो काव्या की तरह बड़बोली भी नहीं थी. पिता से उसका कभी संवाद भी नहीं होता. ना ही उनके साथ रहने की कोई स्मृति ही थी उसे. सौम्या गोद में ही थी तभी वो राजीव का घर छोड़ चली आई थी. राजीव के लिए भी वो जैसे अजनबी सी थी. कभी उसका हाल भी नहीं पूछते ना ही कभी उस से बात करते.
मेडिकल की कोचिंग...फिर महँगी पढ़ाई..राजीव तैयार होंगे इतने पैसे देने को ..शक था उसे. रूद्र होता तो शायद मान भी जाते..आखिर उनके खानदान का चिराग था वो.
पर ईश्वर ने जब उसे इतने कष्ट दिए तो उनके निवारण के रास्ते भी निकालता गया. देवर संजीव मिलने आया और हमेशा की तरह बच्चों से बातचीत करता रहा. सौम्या ने उत्साह से बताया..."वो डॉक्टर बनना चाहती है.."
संजीव ने शाब्बाशी दे पीठ ठोंकी उसकी.
पर सौम्या के अंदर जाने के बाद...उसने संजीव से पैसों की चिंता जतायी. संजीव ने कहा.."भाभी..आखिर हमलोग किस दिन के लिए हैं..चाचा हूँ उसका...कुछ तो मेरा भी हक़ बनता है..मुझे हमेशा ये अफ़सोस रहता है..आपके लिए कुछ नहीं कर सका..अब एक मौका मिला है..इसे मत छिनिये..."
"नहीं संजीव जी...मेरा ये मतलब नहीं था...पर मेडिकल की पढ़ाई लम्बी चलती है....बहुत रुपये लगते हैं...आपके अपने बच्चे भी हैं....और सौम्या के पिता के पास ऐसा नहीं कि पैसे नहीं हैं. बस उनसे बात कौन करे..क्यूंकि अब मेरी सहनशक्ति जबाब दे चुकी है. अब उनकी गाली-बात बिलकुल भी नहीं सुन पाती हूँ. हिम्मत नहीं होती है..उनसे बात करने की. "
"हम्म ..ठीक है...मैं बात करूँगा...मैं बाबूजी से भी बात करूँगा...हम सब समझायेंगे उन्हें...ये हम सबके लिए गर्व की बात है कि सौम्या डॉक्टर बनना चाहती है..हमारे खानदान में आज तक कोई डॉक्टर नहीं हुआ...पूरे घर का आशीर्वाद मिलेगा इसे. बाबूजी भी बहुत खुश होंगे ये सुनकर.... बिटिया का उत्साह बढ़ाइए. आज के ज़माने में बच्चे शॉर्ट कट चाहते हैं..जल्दी से जल्दी पैसे कमाना चाहते हैं...सौम्या इतनी पढ़ाई के लिए तैयार है तो हमें उसका हौसला बढ़ाना चाहिए....आप बिलकुल फ़िक्र ना करें...बिटिया तो डॉक्टर बन कर रहेगी.."
संजीव की बातों से उसके सर से एक बोझ उतर गया...और बड़ी शान्ति मिली...अब जाकर ये अहसास उसके भीतर उतरने लगा कि उसकी बेटी एक दिन डॉक्टर बनेगी.
संजीव ने अपना वायदा निभाया...राजीव से क्या बात की कैसे समझाया, नहीं पता...पर संजीव ने ही अच्छे कोचिंग इंस्टीट्युट का पता किया और खुद सौम्या को लेकर एडमिशन के लिए गए. सौम्या ने भी जी जान लगाकर मेहनत की और अपना सपना पूरा किया. ख़ुशी होती उसे..तीनो बच्चों ने अपना -अपना सपना देखा..रास्ते खुद बनाये और मंजिल पाने में सफल भी हुए.
रूद्र के यू.पी.एस.सी. में सेलेक्शन की खबर और सौम्या के मेडिकल एंट्रेस टेस्ट में अच्छे रैंक की खबर आस--पास ही मिली. उसे सातवें आसमान पर होना चाहिए था. पर जैसे उसे विश्वास ही नहीं होता...सहम कर मन ही मन एक ही जप करती..'हे भगवान!! मेरे बच्चों की खुशियों को नज़र ना लगे..."
देर तक पूजाघर की शांत ठंढी जमीन पर बैठी रही..एकटक भगवान की मूर्ति निहारती..' अब कोई शिकायत नहीं भगवान...मुझे दुख भी दिया...उस से लड़ने का संबल भी..और मेरे बच्चों का भविष्य भी संवारा...' बार-बार आँखें भर आतीं...कभी सोचा था...तीनो बच्चों को अकेले दम पर बड़ा कर एक अच्छा भविष्य दे पाएगी...पर परिवार के आपसी प्यार विश्वास...ने सब संभव कर दिखाया. राजीव के घर से निकलने का ये कदम नहीं उठाती तो शायद उस कलहपूर्ण वातावरण में बच्चे असमय ही मुरझा गए होते और उन निराश कदमों से अपने भविष्य की सीढियां यूँ उत्साहपूर्वक नहीं चढ़ पाते.
बच्चों की पढ़ाई ..उसकी नौकरी और कविता लेखन सब सुचारू रूप से चलते आ रहे थे. अब पत्रिकाओं में वो एक जाना-पहचनाना नाम बन चुकी थी. कवि-सम्मेलनों में उसे नियमित बुलाया जाता. दूरदर्शन पर जो कवि गोष्ठियां होतीं उसमे भी उसे जरूर निमंत्रित किया जाता. जिन वरिष्ठ कवियों की कविताओं की मुरीद थी. अब वो उसके अच्छे मित्र थे. कभी किसी रचना में शंका होती तो बिलासंकोच उन्हें भेज देती. वे बढ़िया सलाह दिया करते.
ऐसे ही एक कवि सम्मलेन के दौरान एक वरिष्ठ कवि ने कहा.." जया जी..आप इतनी कविताएँ लिख चुकी हैं...इतनी पत्रिकाओं में छप चुकी हैं. सबका लेखा जोखा कुछ रखा है??"
"ह्म्म्म.. ऐसा सिलसिलेवार तो नहीं...पर सारी कविताएँ मेरी डायरी में सुरक्षित हैं...."
"तो उन सबको एक जगह संग्रहित कर एक संकलन क्यूँ नहीं छपवा लेतीं. आपकी कविताएँ लोगों को बहुत पसंद आती हैं....आपके प्रशंसक एक जगह आपकी कवितायें पढना चाहेंगे "
"प्रकाशक के संदेश तो आते हैं..पर वे लोग ये प्रस्ताव रखते हैं कि कुछ पैसे मैं खर्च करूँ...कुछ वे योगदान करेंगे तब वे संकलन प्रकाशित करेंगे...ये मुझे मंजूर नहीं..."
"अच्छा !! ये बात तो हमें पता ही नहीं थीं..."
"आप वरिष्ठ कवि हैं...ये सारी शर्तें नवोदित कवियों के लिए होती हैं.."
"अब आप नवोदित कहाँ रहीं...फिर भी मैं देखता हूँ...इस सिलसिले में क्या कर सकता हूँ...पर आप संकलन की तैयारी शुरू कर दीजिये...जो कविताएँ आप संकलन में देना चाहती हैं...उन्हें एक अलग डायरी में नोट करती जाइए...कभी भी प्रकाशक उसकी मांग कर सकते हैं. "
उसके पास प्रकाशकों के संदेश तो आते थे पर उसने इस तरफ गंभीरता से कभी नहीं सोचा था. और इसके लिए पैसे देना भी उसे गवारा नहीं था. पत्रिकाओं में छप जाती..लोग पढ़ लेते..बस इतने से ही संतुष्ट थी. अब इन कवि महोदय ने एक नया सपना बो दिया था उसकी आँखों में. और वो उसमें खाद-पानी डालने में जुट गयी.
कवि जी के वायदानुसार एक प्रकाशक का संदेश आया...फिर तो महीना भर आवरण चुनने ...भूमिका लिखने की कवायद चलती रही. उन कवि महोदय ने अपनी तरफ से संकलन के लिए बड़े उत्साहवर्द्धक दो शब्द लिखे . संकलन जब छप कर आया...तो कवर पेज को देर तक सहलाती रह गयी..वही अहसास मन में हिलोरें ले रहे थे...जो पहली बार रूद्र के सर पर हाथ फेरते हुए जन्मे थे.
कुछ ही दिनों बाद शहर में एक पुस्तक मेला लगा था...प्रकाशक ने बताया था उसका कविता - संग्रह भी रख रहे हैं. वो ऑफिस से निकलते ही पुस्तक -मेले का एक चक्कर लगा आती....चोरी छुपे अपनी किताबों की कतार पर बार-बार नज़र डालती. कभी किसी को अपनी किताब पलटते देख लेती तो अजब संकोच से भर जाती . जब विमोचन के समय कुछ लोगों ने उसके संकलन पर उसके ऑटोग्राफ मांगे तो अजीब सी अनुभूति हुई. यह सपना तो कभी देखा ही नहीं था. पता होता तो जरा अपने हस्ताक्षर की ही थोड़ी प्रैक्टिस कर आती.
और कल जब नवोदित कवि के कविता संग्रह के रूप में उसके संकलन को पुरस्कार मिलने का समाचार मिला तब से तो जैसे कोई अहसास समा ही नहीं रहा. यंत्रचालित सी पत्रकारों के सवाल के जबाब देती रही...शुभचिंतकों - प्रशंसकों की बधाई सब स्वीकार करती रही .जब काव्या ने उस से लिपट कर कहा..."माँ ...यू डिड इट...यू डिड इट...हमें गर्व है तुम पे माँ..." तब भी वो अबूझ सी उसे देखती रह गयी. काव्या ने उसे झकझोर दिया.."अरे हंसो..खुश हो...ख़ुशी के मारे बस बेहोश मत हो..रुको मैं भैया को फोन करती हूँ..."
उसके जाने के बाद भी वो वैसी ही मूर्ति बनी खड़ी रही...अब सौम्या ने उसे जकड लिया .."एम सो हैपी फॉर यू.....सो हैपी ..माइ स्वीट मम्मा...वी आर प्राउड ऑफ यू " सौम्या का सर सीने से लगाते उसकी आँखें तरल हो आयीं . 'इतना तो माँगा भी नहीं था ईश्वर..आपने तो मेरी झोली ऊपर तक भर दी...जितने कष्ट दिए... उसके सौ गुणा तो खुशियाँ दे डालीं. ये भी ख्याल रखा कि ये खबर तब आए जब दोनों बेटियाँ साथ हों.' वरना किस से ख़ुशी बांटती वो?..कौन संभालता उसे.? माँ ..भैया के पास गयीं हुईं थीं. ...और रूद्र अपनी नई नई पोस्टिंग पर. वो तो दोनों बेटियों की छुट्टियाँ चल रही थीं..इसलिए दोनों घर पर थीं.
"माँ... भैया..." कहते हुए सौम्या ने उसे मोबाइल थमाया.
रूद्र की आवाज ख़ुशी से भीगी हुई थी.."क्या बात है माँ...अब तो तुम सुपर स्टार बन गयी हो...स्टार तो थी ही.."
"पागल...हम लिखने वाले लोग कहाँ के स्टार..." मुस्कुरा पड़ी वो..
"देखाss देखाss...भैया से बात करते हुए कैसे मुस्कुरा रही है...हमारे कहने पर तो कोई रिएक्शन ही नहीं.."
उसने आँखों से बरजा...बात तो करने दे...
'हाँ हाँ...कर लो अपने लाड़ले से बात...अब तो माँ...सबको भूल जायेगी.....'बेटा खाना खाया..बेटा पानी पिया..बेटा रात भर सोया..." सौम्या को हमेशा मजा आता उसे चिढाने में. पहली बार रूद्र निपट अकेले रह रहा था..उसे चिंता होती पर सौम्या बाज़ नहीं आती..." माँ वो बच्चा है क्या..अपना ख्याल रख सकता है.." अब सौम्या क्या जाने एक माँ का दिल..खुद जिस दिन माँ बनेगी उस दिन जानेगी माँ का प्यार और चिंता.
उसने फिर से आँख दिखाया तो कान पकड़ते हुए बोली.."सॉरी..आज तो तुम्हारा दिन है...मैं जा रही हूँ...मिठाई लेने.."और फिर वो यह जा वह जा..
सारे आने जाने वालों के लिए लगातार चाय कॉफी बना और चहक चहक कर सारे रिश्तेदारों..अपनी सहेलियों को ये खबर सुना दोनों बच्चियां थक कर चूर हो गयीं थीं..और अब बेसुध सो रही थीं. पर उसकी आँखों में नींद कहाँ...सोफे से बालकनी और किचन का चक्कर लगाते एक रात में ही अपना सारा विगत जी गयी वह. आज अपना पूरा जीवन चलचित्र सा घूम गया आँखों के समक्ष पर अब इन आँखों को थोड़ा आराम देना होगा. पुरस्कार मिलने से कुछ बदल नहीं जाता. जिंदगी वैसी ही बदस्तूर चलती रहेगी. सुबह ऑफिस भी तो जाना है..या शायद बेटियाँ ना जाने दें....देखेगी पर अभी एकाध घंटे की नींद तो ले ले.
अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा ही रही थी कि मोबाइल बज उठा..."इतनी सुबह कौन हो सकता है?'
फोन उठाया...तो राजीव थे उस तरफ....नशे में डूबी आवाज़ में बोल रहे थे..." एकदम्मे से फोन उठा लीं...सुतिं नहीं का रात भर...हाँ खुसी के मारे नीदं त गायबे हो गया होगा...सुना है बड़ा प्राइज़ उराइज़ मिला है आपको..."
वो चुप रही...पर उन्हें क्या फर्क पड़ता था..उन्हें तो एकतरफा बोलने की आदत थी...बोलते जा रहे थे.."अ ई सबका क्रेडिट किसको जाता है...ई जो इतना कबिता-फबिता लिखती हैं..मर्द सबके बीच बईठ के गाती हैं...ई सब मौका मिला कईसे???...हमरा सुकर कीजिए...आपको जो नहीं सताए होते तो ई कबित्त फूटता का??..ऊ कौन कवि कह गए हैं..." दुखी होके ही कोई गीत लिख सकता है..."
"कौन कवि बोले हैं??"..उन्होंने दुबारा दुहराया..
वो चुप रही तो आगे बोले...'आपको त मालूमे होगा,नाम ...मत बताइए पर ऊ बहुत सही कह गए हैं ..आज जो अकास पे चल रही हैं....उसके पीछे हम ही हैं...त हमको थैंकू बोलिए...अगर आपसे हम सादी नहीं किए होते तो और ई सब फेर बदल नहीं हुआ होता आपकी जिंदगी में तो रहतीं कहीं रोटी पकाती...और घर संभालती....ई कवित्त उवित्त चूल्हे में गया होता."
"हाँ एकदम ठीक.." कह उसने फोन काट दिया...उन्हें सुधारने का मन भी नहीं हुआ कि ये सुमित्रानंदन पन्त ने कहा था.." वियोगी होगा पहला कवि...आह से उपजा होगा गान "
नंबर सेव किया कि इस नंबर का फोन अब नहीं उठाना है..वो हमेशा राजीव के नंबर सेव करती रहती और वे अलग-अलग नंबरों से फोन ट्राई करते रहते
पर अब उसे राजीव पर गुस्सा नहीं आता...बल्कि तरस आता. एक भरा- पूरा घर ...बीवी..तीन तीन होनहार बच्चे होते हुए भी आज वो व्यक्ति कितना अकेला है. अगर थोड़ी सी समझदारी दिखाई होती..अपने गुस्से पर काबू किया होता... जानवर से इंसान बनने की ज़रा सी कोशिश की होती...तो ये सारी खुशियाँ उसके आँगन में चहक रही होतीं . यूँ अकेलेपन में उसे शराब का सहारा नहीं लेना पड़ता.
एक गहरी उसांस ले ...फोन सोफे पर फेंका..और अपने कमरे की बजाय बेटियों के कमरे में चली गयी.. दोनों को खिसका बीच में थोड़ी सी जगह अपने लिए बनाई...और दोनों बेटियों को सीने से लगाए पुरसुकून नींद में डूब गयी.
(समाप्त )
