Tuesday, January 17, 2012

बंद दरवाजों का सच

(काफी दिनों बाद कहानी पोस्ट कर रही हूँ....पर साथ में इसे दूसरे ब्लॉग 'अपनी-उनकी-सबकी बातें' पर भी पोस्ट करनी पड़ रही है वरना वहाँ मैं अन्य विषयों पर लिखना शुरू कर देती हूँ और कहानियों की बारी आती ही नहीं. यहाँ कमेन्ट ऑप्शन बंद कर दे रही हूँ. पर एक ही जगह सारी कहानियाँ सहेज कर रखने की भी इच्छा है और कई पाठक ऐसे भी हैं जो एक साथ कई कहानियाँ पढ़ लेते हैं और फिर मुझे मेल पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. नए पाठक मेल ना भी करें पर अगर कुछ  कहानियाँ एक साथ पढना चाहें तो उन्हें सुविधा होगी )



आज रवि और शालू दोनों ही ऑफिस चले गए हैं...मुझे आए हुए आठ दिन हो गए..आखिर कब तक छुट्टी ले सकते थे, वे. जिस सूनेपन से डर कर मैं यहाँ आना नहीं चाहती थी...वही सूनापन मेरे चारो तरफ पसरा हुआ था. पर बच्चों की भी जिद, उनका स्नेह..उनका आग्रह.. अपने मन को समझाकर आना ही पड़ा. उनका भी मन था..माँ हमारी नई गृहस्थी देखे..माँ को हम नई जगह दिखाएँ. देख कर ख़ुशी ही हुई...ये कल के बेखबर, बेलौस से बच्चे आज जिम्मेदार गृहस्थ बन चुके हैं. दोनों ने मिलकर अच्छी गृहस्थी जमाई है..लगता ही नहीं....बस छः महीने पहले ही शादी हुई है...किचन- ड्राइंगरूम-बेडरूम..यहाँ तक कि बाथरूम भी सारी सुख-सुविधाओं से लैस. एक हमारा जमाना था...शादी के बाद पहली बार, बस एक बड़ा सा काला बक्सा एक अटैची और एक बेडिंग ले कर आई थी...पति के घर. बर्तन के नाम पर सिर्फ एक ग्लास एक प्लेट और एक पानी का जग था,घर में. हर महीने हम पैसे जोड़-जोड़ कर थोड़े थोड़े बर्तन खरीदते. पलंग,कुर्सी, गैस का चूल्हा, फ्रिज ,टी.वी...इतनी सारी चीज़ें जुटाने में बीस बरस  लग गए थे. हर चीज़ को खरीदने के पीछे की तैयारी... महीनो की प्लानिंग..खरीदने का दिन....सब एक कहानी सा याद है. और इन बच्चों को देखो...इतनी  जल्दी सब जुटा लिया...बताया तो था रवि ने, एंगेजमेंट के बाद से ही दोनों ने सामान जुटाना शुरू कर दिया था और शालू भी तो कमाती है...कौन सा अपनी पसंद की चीज़ खरीदने के लिए उसे रवि का मुहँ देखना था. मुझे  तो लम्बी मनुहार करनी पड़ती थी...उसके बाद भी कई बार पति  मेरी  पसंद को खारिज कर देते थे. वे हैं ही इतने जिद्दी...अभी ही कौन सा साथ आए...बहाना बना कर गाँव चले गए. आज साथ होते तो कम से कम मैं यूँ डांव डांव इस कमरे से उस कमरे तो ना डोलती...उनके चाय -नाश्ते का ख्याल रखने में ही समय निकल जाता. शालू खाना बना कर फ्रिज में रख गयी हैं....रवि ,अवन में गरम करके खाना खाने की ताकीद भी कर गया है...बचपन से वो देखता आ रहा है,.खुद के लिए कुछ करने में मैं हमेशा आलस कर जाती हूँ. पर अकेले खाने का मन नहीं हो रहा. भूख भी तो नहीं लगती...बैठे बैठे भूख भी क्या लगे...कितनी देर से बालकनी में खड़ी थी...पर कुछ नज़र भी तो नहीं आता बालकनी से...जहाँ तक नज़र जाए बस ऊँची-ऊँची  बिल्डिंग्स हैं...और सामने गेट...गेट पर बैठा वाचमैन हाथों पर खैनी मलता..रेडियो सुन रहा है. इन वाचमैन की भी ऐश की नौकरी है...जब भी बालकनी से देखती हूँ...या तो वह रेडियो सुनता रहता है या..पड़ोस की बिल्डिंग वाले से गप्पे लड़ाता रहता है. इक्का-दुक्का औरतें आती-जाती दिख जाती हैं...कोई थैले में सब्जी लिए होती..तो कोई बच्चों की बैग उठाये. शालू बता रही थी, आस-पास ज्यादातर नौकरी वाली ही हैं...वे सब तो शाम को ही नज़र आएँगी,अब.

 वापस ड्राइंग रूम में आ गयी. ये बंद दरवाज़ा देख-देख कर कोफ़्त होती है...ऐसे कैसे लोग सारा दिन दरवाजे बंद कर के बैठ सकते हैं. नीचे आते जाते देखा था ...सारे फ्लैट्स के दरवाजे बंद रहते हैं...और उन बंद दरवाजों के पीछे एक सारा संसार होता होगा. इस शहर को तो बंद दरवाजों का शहर कहना चाहिए. मन बिलकुल ही उद्विग्न  हो उठा..और मैने बाहर का दरवाज़ा खोल दिया....थोड़ा आगे बढ़ कर झाँका तो देखा...गोल-गोल सीढियां दूर तक उतरती चली गयी हैं..मानो किसी तहखाने में जा रही हों...रवि का फ़्लैट  है भी तो नवीं मंजिल पर...देर तक उन सीढियों को ताकती रही तो चक्कर ही आ जायेगा. नज़रे हटाकर आस-पास दौड़ाया तो वही नज़ारा. इस फ्लोर पर चार फ़्लैट थे...बाकी तीनो दरवाजे बंद थे, पता भी नहीं चलता किसी फ़्लैट में  कोई है या यूँ ही दरवाज़ा बंद है...ताला भी तो नहीं लटकता कि पता चले कुछ. बस जोर से खींचो और दरवाज़ा बंद. दरवाजे में ही चाभी  घुमाओ और दरवाज़ा खुल जाएगा..अजीब है सब कुछ. अभी कुछ ही पल हुए थे, मुझे वहाँ खड़े हुए कि सामने वाले फ़्लैट  के भीतर से कुछ  आवाजें आने लगीं...पर सिर्फ तेज़ भागते कदमो की..कुर्सी खडखडाने की....इतनी जोर से मन डर गया...पूरी बिल्डिंग सुनसान...और इस बंद दरवाजे से ये आवाजें...कोई आदमी अपनी पत्नी को पीट तो नहीं रहा...पर चिल्लाने..नाराज़ होने का कोई स्वर नहीं सुनाई पड़ रहा...या कहीं दो बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे हों...या लड़ रहे हों...पर बच्चे इतना चुप रह कर कैसे लड़ सकते हैं. मन हुआ अंदर जाकर दरवाज़ा बंद कर लूँ...पर पैर जैसे वहीँ जम गए थे..इतने में ही भड़ाक से वो दरवाज़ा खुला और एक लड़की सीधी दौड़ती हुई..मुझे भी पार कर मेरे पीछे, मेरे फ़्लैट का दरवाज़ा पकड़ कर हांफती हुई सी खड़ी हो गयी. एक छाया सी दीखी उसके फ़्लैट में और फिर सब शांत...बीस-पच्चीस के आस-पास की उम्र होगी...ख़ूबसूरत सी थी....नीली सलवार कमीज पहन रखी थी..पर दुपट्टा नहीं था...बाल बिखरे हुए थे और वह एक हाथ से दरवाज़ा थामे नीचे सर झुकाए जोर -जोर से हांफ रही थी. 

"क्या हुआ.." मैने पूछा...उसने नज़रें उठा कर मुझे देखा...और उन हिरणी सी बड़ी बड़ी आँखों में तेजी से पानी भरना  शुरू हो गया. होंठ काँप से रहे थे...ध्यान दिया...उसका पूरा बदन ही थरथरा रहा था . मैने उसके कंधे पर हाथ रखा...और उसकी आँखों से धार बंध गयी...तभी उसके फ़्लैट में कुछ आहट हुई...और वह डर कर थोड़ी सी और सिमट गयी...मेरी पीठ थी उसके दरवाजे की तरफ...पलट कर देखा..तो एक छाया सी दीखी जो तेजी से सीढियां उतर गयी...नवीं मजिल से सीढियां??... पर लिफ्ट के लिए उसे मेरे सामने आना पड़ता. मेरा  हाथ अभी भी उसके कंधे पर ही था...हाथ के अंदर ही एक कम्पन सा महसूस हुआ.

"क्या हुआ...बेटी?" ..कौन था ये??..तुम्हारा पति?"

"ना..." उसने सिर्फ सर हिलाया....और कन्धा जोर से हिला..उसने एक सिसकी ली थी.

"ओह! तो कोई अजनबी था...." ..पल भर में अखबारों में पढ़े किस्से आँखों के सामने घूम गए...जिसमे कहीं गैस का सिलेंडर देनेवाला..तो कहीं सामान लाने वाला..घर में अकेली औरत को देख कर छेड़खानी पर उतर आया था. अगर ऐसा कुछ है..तब तो शोर मचा कर उस आदमी को तुरंत पकडवा देना चाहिए.

पर उसने इस बार भी.." ना " कहा..और गर्दन थोड़ी और झुका ली.

अब मैं असमंजस  में थी...ये लड़की ना तो कुछ बोल रही थी...ना वहाँ से हिल रही थी..चुपचाप रोये जा रही थी.
 कुछ पल ऐसे ही  गुजर गए...फिर मैने पूछा.."पानी पियोगी..आओ बैठो थोड़ी देर मेरे पास..."

अब जैसे वो भी होश में लौटी...कुछ पल अनिर्णय की स्थिति में खड़ी  रही...फिर नज़रें झुकाए ही बोली "आती हूँ....चाभी  ले आऊं " .  ऐसी मनःस्थिति में भी उसे ये होश था कि चाभी  नहीं लिया तो उसके फ़्लैट का दरवाज़ा बंद हो जाएगा...और फिर वो बाहर ही रह जायेगी. रवि और शालू मुझे भी कई बार ताकीद कर गए थे...अगर नीचे गार्डेन में जाना तो चाभी  लेना मत भूलना. शालू ने तो अपनी ऑफिस की महिलाओं के कितने सारे किस्से सुना दिए थे कि कैसे कई बार वे महज कूड़ा देने को दरवाजे के बाहर निकलती हैं...और हवा के जोर से दरवाज़ा बंद हो जाता है...नंगे पैर...गाउन में..घर के बाहर...पड़ोसी भी ना हों तो घंटों उन्हें बाहर खड़े रहना पड़ता है....फिर तो चाभी  वाले को बुलाकर नई चाभी बनवानी पड़ती है...मनमाने पैसे ऐंठते हैं ,वे ..कई लोग एक दूसरे के यहाँ अपने घर की चाभियाँ  रखते हैं. अच्छा है..इस महानगर में एक दूसरे पर लोगों का इतना विश्वास तो है. 

चाभी  लाने के साथ उसने दुपट्टा भी ले लिया था..और चेहरा भी धो कर बालों को समेट कर पीछे एक क्लिप लगा ली थी. फिर भी आँखें वैसी ही भरी भरी सी थी...'जाने क्या हुआ है...अपने मन की  बात बताए या ना बताए..पर उस लड़की को उस समय किसी के साथ की सख्त जरूरत थी.' ..

 उसके आते ही मैने कहा.."आओ अंदर आओ..थोड़ी देर बैठो..मैं भी अकेली हूँ...मुझे भी अच्छा लगेगा"
सर झुकाए ही वो सोफे पर बैठ गयी. 
"पानी  लोगी?"
उसने सिर्फ सर हिला कर ना कहा..नज़रें वैसे ही जमीन से लगी रहीं. लगा...बहुत ही असहज महसूस कर रही थी वो...मानो डर रही हो..मैं जाने क्या पूछ लूँ..
मैने कुछ बात करने के गरज से पूछा..." क्या नाम है तुम्हारा.."
"नीलिमा..." फंसी हुई सी आवाज़ निकली.
'बहुत प्यारा नाम है...कब से हो यहाँ.."
"जी..दो साल  हो गए.." सर झुकाए हुए ही जबाब दिया..उसने.
अब और क्या पूछूं....कहीं पुलिस की पूछ-ताछ  सा ना लगे.
 थोड़ी देर ख़ामोशी पसरी रही हमारे दरम्यान..और जैसे उसने भी महसूस किया..और कर्तव्य समझ धीरे से सर उठा कर पूछा..." आपको पहले कभी नहीं देखा...यहाँ "
"हाँ.. मैं हाल में ही आई हूँ...मेरे बेटे-बहू रहते हैं यहाँ...दोनों ऑफिस गए हैं "
"ओह.."..कहकर वो फिर चुप हो गयी...नज़रें फिर जमीन ताकने लगीं...और नीचे ताकते हुए ही उसने जैसे जमीन से ही कहा..." सब नौकरी वाले ही हैं यहाँ.."
मुझे कुछ क्लू मिला..बात करने का..." हाँ..शायद...सुबह-सुबह कई औरतों को ऑफिस जाते देखती हूँ..."
पूछने का मन था...'तुम घर में ही रहती हो?'...पर कहीं उसे बुरा ना लग जाए...ये सोचकर नहीं पूछा...

पर शायद उसने मेरे मन की बात भांप ली...और खुद ही बोल उठी..." मैं तो हाउसवाइफ ही हूँ '

"फिर तो तुम्हे बहुत अकेलापन लगता होगा...कोई मिलने जुलने वाला हो..तो समय अच्छा कट जाता  है.."...बातों के सिरे को मैं हाथ से छूटने नहीं देना चाहती थी.

उसने तड़प कर मेरी तरफ देखा....आँखों में जमे  पानी में  नाराज़गी की एक लहर उठी हो जैसे....  फिर सामने दीवार टोहती हुई बोली..." बहुत ज्यादा अकेलापन है यहाँ...जब हसबैंड  ने यहाँ ज्वाइन किया  तो मैं बहुत खुश हुई थी..इतने बड़े शहर में रहूंगी..कितना नाम सुन रखा था,इस शहर का . आस-पड़ोस वाले भी जल गए थे सुनकर. मुझमे भी जैसे थोड़ा घमंड आ गया था...जब यहाँ फ़्लैट  नहीं मिल रहा था और हसबैंड हमें यहाँ लाने में देर कर रहे थे...तो गुस्से में जल-भुन गयी थी मैं...रोज जैसे दिन गिन रही थी..और अब सोचती हूँ..काश उन्होंने ये नई नौकरी नहीं ली होती...हम वहीँ उस कस्बे में रहते...पैसे कम थे..पर ख़ुशी थी...एक जिंदगी थी."

मैने उसे बोलते रहने दिया.....वो भी जैसे मुझसे नहीं....अपनेआप से कह रही थी सब कुछ......"शुरू शुरू में तो मुझे बहुत अच्छा लगता...इतनी बड़ी -बड़ी बिल्डिंग्स....ये लिफ्ट से आना-जाना ...सुपर मार्केट में शॉपिंग...मॉल्स...शुरू में नरेश घुमाने भी ले जाते...समंदर का किनारा...सब मुझे जैसे  इक सपने सा लगता..पर सपना तो सपना ही होता है..कभी ना कभी आँख खुलनी ही है..और सच्चाई की धरातल पर आना ही है...एक महीना घूमते घामते..घर संवारते बीत गया. फिर बेटी का स्कूल शुरू हो गया."

"तुम्हारी बेटी भी है..."..मैने आश्चर्य से पूछा...मुझे तो वो न्यूली वेड सी लग रही थी..

"हाँ ..पांच साल की... गुड़िया के लिए ही नरेश और भी यहाँ आने को उत्सुक थे. कस्बे का स्कूल उन्हें पसंद नहीं था. वे गुड़िया को बढ़िया स्कूल में पढ़ाना  चाहते थे. स्कूल तो बहुत अच्छा है..पर मेरे लिए बहुत मुश्किल है. टीचर्स के साथ साथ सारे बच्चों की माएँ भी इंग्लिश में ही बात करती हैं और मैं हूँ छोटे शहर की...आदत रही नहीं कभी...कोशिश करते भी एक संकोच सा होता है और जुबान जैसे तालू से चिपक जाती है. इसलिए मेरी दोस्ती भी नहीं हो पाती. वैसे भी यहाँ खुद आगे बढ़कर कोई बात नहीं करता....नहीं तो हमारे यहाँ...कोई नया चेहरा दिखा नहीं कि
लोग सारा इतिहास-वर्तमान खंगाल डालते हैं...मायके ससुराल..परिवार में कौन हैं..पति की नौकरी..यहाँ तक कि पति की तनख्वाह तक पूछ डालते हैं....वो भी खलता था...और यहाँ का अनदेखापन भी खलता है. 
हम  तीन बहने हैं....और फिर पड़ोस की मेरी सहेली पहली कक्षा से लेकर कॉलेज  तक हम साथ पढ़े...कभी खुद आगे बढ़कर दोस्ती करने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई. शादी भी उसी शहर में हुई. पड़ोस के कितने  ही लोगों को मैं पहले से जानती थी. कभी कुछ अजनबीपन लगा ही नहीं.वाहन  गुड़िया को स्कूल-छोड़ने लाने जाती तो कितने ही पहचाने चेहरे मिल जाते....गेट के पास इंतज़ार करते ही कितने लोगो से बात हो जाती.... यहाँ तो गुड़िया के बस स्टॉप पर  ज्यादातर बच्चों के साथ उनकी आया होती हैं ... थोड़े बड़े बच्चे तो अकेले ही आते हैं. बस एक बच्चे की माँ आती है  पर वो घुटनों तक की पैंट और शर्ट पहने मोबाइल फोन पर ही लगी होती है....उस से कुछ बात करने में भी हिचक होती है. गार्डेन में शाम को गुड़िया को लेकर जाती हूँ..वहाँ भी वही माहौल है...सारी लेडीज़ जींस में होती हैं और चिल्ला-चिल्ला कर बच्चों को अंग्रेजी में ही डाँटती रहती हैं. वो तो अच्छा है...बाहर गुड़िया ज्यादा शरारत नहीं करती.....नहीं तो मुझे उसे डांटा भी नहीं जाता.." हल्की सी मुस्कराहट खेल गयी उसके होठों पर. थोड़ी देर पहले का हादसा जैसे भूल गयी थी वह.

मैं भी मुस्कुरा दी..पर कुछ कहा नहीं...नीलिमा के  अंदर जैसे बरसों का गुबार जमा था..." जिंदगी में बहुत सूनापन आ गया था...नरेश सुबह आठ बजे के गए रात के दस बजे आते...थक कर चूर....उसके बाद भी कभी फोन पर लगे होते तो कभी लैप टॉप पर. टोको तो कह देते हैं...'तुम्ही लोगों के लिए सब कुछ कर रहा हूँ...फ़्लैट लेना है...गाड़ी लेनी है...बेटी के हायर एडुकेशन के लिए पैसे जमा करने हैं...काम नहीं करूँगा तो कैसे होगा सब कुछ'...अब बात तो सही ही कहते हैं..मैं क्या कहूँ...सन्डे भी बस सोने और खाने में निकल जाता है. कहीं चलने को कहो तो कह देते हैं...'एक दिन तो आराम करने को मिलता है...आज के दिन मुझे तंग मत किया  करो... यहाँ सारी लेडीज़ अकेले ही सारा काम करती हैं..तुम भी आदत डाल लो'....अब तो आदत पड़ ही गयी है...और काम भी क्या है..जरूरत की सारी चीज़ें तो पास में मिल जाती हैं....मुझे मार्केट गए भी जमाना गुजर जाता है. जाती भी हूँ तो बस गुड़िया के खिलौने या कपड़े लेने.पता नहीं कब से ...खुद के लिए कुछ नहीं लिया..लेकर भी क्या करती ..कहाँ  जाती पहन कर...कोई सखी-सहेली नहीं...कोई रिश्तेदार नहीं. और नरेश यह समझते ही नहीं...उन्हें लगता है...रहने -पहनने -खाने की सुविधा है...पति है..बेटी है..मन लगाने को टी.वी. है..किसी को और क्या चाहिए.." कहते उसका गला रुंध सा गया. मेरा भी मन भर आया..अधिकांशतः पुरुष यही समझते हैं..उन्हें नारी मन की थाह ही नहीं होती...कि दो मीठे बोल...दो पल के साथ के सामने ये सब फीके हैं. 

उसने आंसुओं को अंदर ही घोटने की कोशिश की...और गला साफ़ करते हुए बोली..."पता नहीं आप सब सुनकर क्या सोचेंगी मेरे बारे में.....पर अब भी तो कुछ सोच ही रही होंगी....कि क्या बात हुई...."
सोच तो रही थी...पर उस से  कैसे कह दूँ...या फिर क्या कहूँ...अच्छा हुआ मेरे उत्तर का इंतज़ार किए बिना वो बोल पड़ी..."मेरा यहाँ बिलकुल मन नहीं लगता था...धीरे-धीरे हर काम एक बोझ सा लगने लगा...ना तो घर संभालने का मन होता...ना खुद को संवारने का...पर नरेश का कभी ध्यान ही नहीं जाता... मेज पर धूल पड़ी होती...अखबार बिखरे होते...मैं उधड़ी हुई रंग उड़ी कमीज पहने होती..पर तब भी नरेश नोटिस नहीं करते...कई बार तो मैं जान-बूझ कर उनके सामने एक ही गाउन पहने होती...सुबह धो कर डाल देती..शाम को वही पहन लेती...पूरे एक हफ्ते तक एक गाउन में देख कर भी नरेश ने कुछ नहीं टोका....या शायद उन्होंने गौर  ही नहीं किया . उन्हें सिर्फ थाली में खाना मनपसंद चाहिए था. खाने में नमक-मिर्च कम होने पर जरूर चिल्ला पड़ते...कोई शर्ट या मोज़े नहीं मिलते..तो घर सर पर उठा लेते...समझ ही नहीं आता....वे सचमुच कपड़े ना मिलने पर ही नाराज़ हो रहे हैं या ऑफिस की किसी टेंशन की वजह से....सच क्या था...पता नहीं....पर उनका यह रूप मैने यहीं आकर देखा...जबकि वहीँ पहले सास-ससुर के साथ रहने की वजह से नहीं चिल्लाते  थे या फिर वहाँ इतनी टेंशन ही नहीं थी...कुछ समझ में नहीं आता. गुडिया की देखभाल की भी सारी जिम्मेवारी मुझपर ही डाल दी थी...रात  में आते तो गुड़िया अक्सर सो जाती या नींद में होती...सुबह नरेश ऑफिस जाने की जल्दी में होते...बस आते-जाते उसके गाल थपथपा दिए..इतना सा ही बाप-बेटी का रिश्ता रह गया है...गुड़िया तो अपने कार्टून अपने खिलौनों में मगन रहती है..पर मुझे बहुत खलता है....पर करूँ तो क्या...अगर मैं कभी उसकी पढ़ाई की चर्चा करती तो कहते 'इन सब झंझट में मुझे मत घसीटो...काम का पहले ही बहुत प्रेशर है....और कभी झल्ला पड़ते...' पढ़ी-लिखी बीवी रखने  से क्या फायदा...फर्स्ट स्टैण्डर्ड को भी नहीं पढ़ा सकती?"..पढ़ा तो मैं लेती थी...मैं तो बस उनसे कुछ बात करने के बहाने के लिए चर्चा करती....कि कुछ बात भी हो जाए और वे गुड़िया से भी जुड़े रहें.  ऑफिस की बातें वे करते नहीं....यहाँ पड़ोसी रिश्तेदार कोई है नहीं...जिनके विषय में बात की जाए....पसंद भी एक नहीं हमारी...वे टी.वी. पर या तो न्यूज़ देखते हैं...या फिर अंग्रेजी फिल्मे...जो मेरी समझ में नहीं आतीं. यहाँ आने से पहले भी नरेश मुझसे बहुत बात नहीं करते थे...पर तब लगता था..'अपने माँ-पिता के सामने असहज महसूस करते हैं'...और फिर समय भी कहाँ मिलता था...रात का खाना निबटाते...रसोई समेटते...जब मैं कमरे में आती, नरेश सो चुके होते. इतवार को तो वे देर तक सोते रहते और फिर अपने दोस्तों से मिलने चले जाते....मैं भी अक्सर इतवार को मायके जाने के फिराक में रहती....रोज किसी ना किसी का आना-जाना लगा ही रहता...इसलिए कभी ये कमी महसूस भी  नहीं हुई  कि सिर्फ हम दोनों बैठकर आपस में बातें नहीं करते हैं........यहाँ जब सिर्फ हम दोनों हैं...तो समझ में ही नहीं आता...बात क्या की जाए...बस देह-धर्म पर ही रिश्ते की बुनियाद टिकी है. 

मैं सोच रही थी..'पता नहीं ,ये कितने बंद दरवाजों के पीछे का सच  है...ज़माना बदल गया है...माहौल  बदल गया है...पर इंसान के बदलने में अभी वक़्त है.." और जहाँ दरवाजे खुले रहते हैं वहाँ की कथा भी कितनी अलग है?? कभी इस  तरफ ध्यान नहीं गया..पर आज नीलिमा की बातों ने उस कोने-कतरे में छुपे सच को खींचकर सामने ला खडा किया  था ज्यादातर तो पति-पत्नी के रिश्तों में बस देह-धर्म ही रहा गया है. पत्नी घर संभालती है...पति ऑफिस से आकर टी.वी. देखता है या अखबार पढता है...या फिर मिलने-जुलने वालों से गप्पें." चाय दे दो...नाश्ता दे दो...मेरी कमीज़ कहाँ है.....बच्चों के स्कूल की फीस देनी है...अमुक की शादी तय हो गयी है... डॉक्टर के यहाँ जाना है..'पति-पत्नी के बीच बस इन सरीखे संवाद ही कायम होते हैं. उम्र के पडाव निकलते जाते हैं और ये व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है. मन खिन्न हो आया और मैने नीलिमा से सहानुभूति जताई .

"समझ सकती हूँ....ऐसे में दिन बिताना कितना मुश्किल होता है...."

"कोई नहीं समझ  सकता...आंटी...." फिर से उसकी आवाज़ की तुर्शी बढ़ गयी थी. "बहनों..रिश्तेदारों के फोन आते हैं तो एक ईर्ष्या सी होती है,उनके स्वर में...उन्हें इन हालात का क्या पता...." उसने एक गहरी सांस ली और कहना जारी रखा..." मेरे किचन और बेडरूम की खिड़की के सामने एक बिल्डिंग का टेरेस पड़ता है. दोपहर में अक्सर एक लड़के को मैं वहाँ टहलते देखती. कभी-कभी वो मेरी खिड़की की तरफ नज़र उठा कर देखता...मैं पर्दा खींच देती...पर सामने का दरवाज़ा भी बंद और खिड़की पर भी परदे खींच कर कब तक रखती...मेरा दम घुटने लगा था...और मैने परदे हटा दिए...देखना है तो देखे...मुझे क्या..पर जैसे मेरे लिए भी एक खेल सा हो गया था...मैं जब-तब दीवार से सट कर छुपकर देखने की कोशिश करती....वो देख तो नहीं रहा....एकाध बार उसने मुझे झांकते हुए देख भी लिया...हमारी नज़र भी मिल गयी....फिर मैं एकाध दिन जी कड़ा कर उस तरफ देखती भी नहीं...पर वो भी थोड़ा ढीठ हो गया था...जब भी मैं कपड़े फैलाने या उतारने जाती तो देखती वो हाथ बांधे खड़ा नज़रें इधर ही जमाये रहता...आंटी...पता नहीं आप क्या सोचें...पर मैं जैसे यह सब किसी से नहीं कहूंगी तो मेरा सर फट जाएगा....एक दिन कपड़े फैलाते मुझे ध्यान आया...मेरे नाखून तो बड़े टेढ़े-मेढ़े हैं...मैने ढंग से कब से उन्हें शेप नहीं दिया...कितना गँवार समझेगा मुझे...और मैने नेल फाइलर से घिसकर नाखूनों  को शेप दिया...और गहरे गुलाबी रंग की नेलपौलिश भी लगाई...पता नहीं उसने ध्यान दिया या नहीं...पर मैने उस दिन खूब समय लगा कर धीरे-धीरे कपड़े फैलाए. घर में  मैं कभी भी कपड़ों पर ध्यान नहीं देती थी...किसी भी रंग की सलवार किसी भी रंग की समीज पहन लेती थी...बाल भी नहीं संवारती...गुड़िया का स्कूल बारह बजे का है...तब तक तो काम ही ख़त्म नहीं होते...जल्दी से एक क्लिप लगा...उसे छोड़ने को उतर जाती....आने के बाद भी इतना आलस आता....टी.वी. का चैनल सर्फ़ करते...अखबार पलटते ही..कभी यूँ ही छत देखते...छः बज जाते और फिर से मैं जल्दबाजी में वैसे ही भागती उसे लेने. ..पर अब मैं मैचिंग सलवार समीज पहनने लगी थी...बाल अच्छे से कंघी करने लगी थी....आंटी ,मैं ये सब कोई उसे लुभाने के लिए नहीं कर रही थी....ऐसा कुछ भी नहीं था मेरे मन में....बस यही लगता कि बाल बिखेरे ....मुझे उलटे सीधे कपड़े पहने देख,पता नहीं कहीं मुझे गँवार ना समझ ले....आंटी प्लीज़ मुझे गलत मत समझिएगा...मैं बिलकुल भी वैसी लड़की नहीं हूँ......कभी लड़कों की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा...मेरे महल्ले में भी कई लड़के थे...कुछ ने दोस्ती की कोशिश भी की थी....ग्रीटिंग कार्ड्स भेजे थे...ख़त भेजे थे...पर मैं उन्हें बिलकुल ही इग्नोर कर देती थी...बी .ए. पास किया और शादी हो गयी...नरेश को छोड़कर मैने किसी दूसरे आदमी की तरफ कभी देखा तक नहीं.....पर यहाँ पता नहीं मुझे क्या होता जा रहा था....मैं ऐसे क्यूँ बिहेव कर रही थी...." फिर से उसका गला रुंध गया और वह चुप हो गयी.
क्रमशः 
चाहें तो अपनी प्रतिक्रिया यहाँ दे सकते हैं