Wednesday, November 3, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की ( कहानी --समापन किस्त )

आर्यन के टेस्ट चल रहें हैं..सुबह से उसे पोएम रटवा कर परेशान. अब शरारत से या सचमुच पर हर  बार वो एक लाइन गलत बोल जाता. वो डाँटती तो , कभी मुहँ फुला लेता...और कभी अड़ के बैठ जाता...अब पोएम सुनाएगा ही नहीं. फिर खुद ही चॉकलेट देकर...गोद में लेकर बहलाना पड़ता. खुद पर ही झुंझला उठती , सबकुछ समझते हुए भी वह उस अंधी दौड़ में क्यूँ शामिल हो रही है ? अगर बेटे को 'ए प्लस' की जगह 'सी'  ही आ गया तो क्या पहाड़ टूट जायेगा. अभी चार साल का छोटा सा बच्चा है. ताजिंदगी तो हर घड़ी खुद को उसे कड़े अनुशासन में बंध प्रूव करते ही रहना है. पर फिर टीचर की चमकती आँखें याद आ जातीं, जब वो सारे पेरेंट्स के सामने आर्यन की तारीफ़ करती, और सबकी प्रशंसात्मक निगाहों का केंद्र बन वह, अपनी सारी खीझ, झुंझलाहट भूल जाती.

बच्चों का मासूम बचपन छीन, उन्हें तोतारटंत बनाने  की शुरुआत किसने की थी? इस समाज  के नियम आखिर कौन बनाता है.? खुद समाज के ही लोग ना...फिर खुद ही ये उलजुलूल  नियम बना,उसका पालन शुरू  कर देते हैं. आज बुरी तरह खीझ रहा था उसका मन. उसका मन था, तीन साल के बाद ही उसे स्कूल भेजेगी..पर आस-पास के पेरेंट्स  ने  डेढ़ साल से ही प्ले स्कूल में भेजना शुरू कर दिया. फिर पार्क में... सोशल गैदरिंग में सब पूछते, "किस प्ले स्कूल में जाता है. " और उसके यह कहने पर कि "अभी कहीं नहीं जाता " सब ऐसे आश्चर्य और उपहास से देखते, जैसे वो  अभी अभी बस किसी बीहड़ गाँव से उठ कर आ गयी हो. कितनी महिलायें तो उसे नसीहत देने लगतीं, "सोशल बिहेवियर  सीखेगा...दोस्त बनाना सीखेगा". और आर्यन की किसी छोटी सी शैतानी पर भी उसे ऐसे देखती जैसे कहती  हों, "कहा था ना..प्ले स्कूल में डालो" उसका मन होता कह दे..."प्ले स्कूल से और चार बदमाशियां सीख कर आयेगा.

लोगों की  बातों से इतना अपसेट रहने लगी थी .रोज ही सुनील से शिकायत करती...'आज इन्होने ऐसा कहा...वैसा कहा.." सुनील कहने लगे..तुम्हारे इस मूड का असर बच्चे पर भी पड़ेगा..इस डिप्रेशन में आने से तो अच्छा है, उसे दो घंटे के लिए स्कूल ही भेज दिया करो. पड़ोस के बच्चों को देख आर्यन  भी जिद करने लगा था, " इछ्कूल  जाऊँगा' फिर उसे लगा , कहीं इसमें हीन भावना ना आने लगे, चलो..अब माहौल के अनुकूल  ही तो चलना पड़ेगा. और उसने मन मार कर ढाई साल में उसे स्कूल भेज दिया. और उसके बाद से रेस शुरू हो गयी. पढ़ाई तो कुछ नहीं है. पर इतनी  छोटी उम्र में 'रंगों' फलों, सब्जियों, रिश्तों के नाम याद रखना क्या पढ़ाई से कम है? और अब चार साल  में  तो बाकायदा, पोएम,गिनती, छोटे छोटे शब्द , ड्राइंग-क्राफ्ट सब शुरू हो गए हैं. और इन सबमे 'ए प्लस' लाने की होड़ भी. बच्चे से ज्यादा पेरेंट्स के बीच.

सुबह से सारा काम छोड़ आर्यन में ही लगी थी. अब जल्दी-जल्दी सारे काम निबटा ले .आर्यन के स्कूल से आते ही खिला कर सुला देगी और फिर ड्राइंग की प्रैक्टिस भी करानी है. बुरी तरह थक जाती है. सब आर्यन के मूड पर निर्भर करता है. मूड हो तो एक बार में बना लेगा, ना हो तो मजा है जो एक मिनट बैठ भी जाए. आजकल सिम्मी-रोहन की शादी के प्लान्स बनाना भी छूट  गया था..पूरे समय आर्यन  के टेस्ट की टेंशन ही चलती रहित दिमाग में.
सारी बिखरी चीज़ें उठा कर संभाल कर रख रही थी कि फोन बज उठा. अब ये एक और मुसीबत. इस समय जो भी फोन करता है, गप्प के मूड में होता है और उसके पास जरा भी वक्त नहीं. मम्मी का नंबर दिखा , उनके कुछ बोलने से पहले ही बोल उठी,

"आर्यन के टेस्ट चल रहें हैं...सारा घर बिखरा पड़ा है...ढेरो काम पड़े हैं....उसके आने से पहले सब ख़त्म करना है...बोलो कैसे फोन किया "

"ओह! फिर तो तुम नहीं आ सकोगी ,ना...सोच रही थी जरा घर आ जाती तो कुछ आराम से डिस्कस करना था "

"क्या .." सोचा शायद यही होगा, "बाई बहुत तंग कर रही है...पुरानी है,ईमानदार है...पर इतनी छुट्टियां करती है निकालूं या रहने दूँ" या फिर होगा..." फलां की शादी में क्या भेजूं...उन्होंने तो तुम्हारी शादी में बड़ी साधारण सी साड़ी दी थी...देने को साधारण ही दे दूँ..पर देखने वाले क्या कहेंगे,  हम बड़े शहरों वाले से लोग उम्मीद रखते हैं.." ये सब बातें ममी के लिए बड़े गंभीर मसले होते थे...वो उनका रुख भांप वही कह देती और वे खुश हो जातीं. पर आज तो ये सब सुनने का  कोई मूड नहीं.

पर मम्मी  बोलीं, "ठीक है...रहने दो..बाद में बात करेंगे...असल  में सिम्मी के लिए एक रिश्ता आया है "

"माँ अब वो ज़माना नहीं है...कि तुम सिम्मी के रिश्ते के लिए मुझसे पूछोगी...पहले सिम्मी से पूछा??"

" दरअसल...मुझे और तेरे पापा को नहीं जंच रहा ..पर सिम्मी को पसंद है"

"क्या sssss ...." उसके हाथ से फोन नहीं छूटा यही गनीमत है .

"अरे इसमें इतना चौंकने की क्या बात है....दो साल  हो गए उसे नौकरी करते ...अब शादी का सोचना होगा ना.."

"पर सिम्मी ने 'हाँ'.. कहा...??"...उसने शब्दों को यथासंभव संयत रखते हुए कहा.

"हाँ...उसे प्रपोज़ल  ठीक लगा....आजकल के बच्चे..तुम्हे पता है ना...उनकी सोच अलग होती है...तुम भी आज की ही हो...पर इन सबसे अलग हो. "

"माँ एक फोन आ रहा है...मैं बाद में फोन करती हूँ..." कह कर फोन काट दिया और तुरंत सिम्मी को मिलाया

"हाय  दी....." उसकी चहक भरी आवाज़ सुनते ही पारा चढ़ गया.और सीधा पूछ लिया,
 "तेरा रोहन से झगडा हो गया है? ब्रेक अप हो गया और मुझे बताया भी नहीं??....यहाँ मैं....सारा दिन सोचती रहती हूँ...तेरी शादी कैसे करवाऊं...और तू है.." हर शब्द के साथ स्वर तेज होता जा रहा था...

"दीदी...दीदी...होल्ड ऑन प्लीज़....और इतनी तेज़ आवाज़ में मत बोलो..मुझे अपनी सीट से उठ कर आना पड़ा...तुम तो चिल्ला ही रही हो....कोई झगडा नहीं हुआ...तुम्हे सब बताउंगी,आराम से .." सिम्मी धीरे धीरे फुसफुसा आकर बोल रही थी.

पर वो कुछ सुनने के मूड में नहीं थी..."क्या बताएगी....और अब तक क्यूँ नहीं बताया....मैं बेवकूफ की तरह तुम दोनों के बारे में सोचती रहती हूँ..."

"दीदी अभी बहुत काम है....तुम घर आ जाओ...बात करते हैं..मैं जा रही हूँ....काम करने" कह कर फोन काट दिया, उसने.

दो मिनट ठगी सी खड़ी रह गयी....अच्छा तमाशा है, जब चाहो अपने जीवन में शामिल कर लो, जब चाहे मक्खी की तरह निकाल  कर फेंक दो. दुबारा फोन  मिला ये सब कहने का मन हुआ...पर वो जानती है सिम्मी ने साइलेंट पर रख दिया होगा, मोबाइल और अब नहीं उठाएगी.

माँ को ही फोन लगा कर कहा, " शाम को आती हूँ ...आर्यन को लेकर"

बुरी तरह परेशान हो रही थी...काम करने की गति भी कम हो गयी. किसी तरह , काम निबटाए और आर्यन के आते ही उसे खाना खिला.मम्मी के यहाँ चलने की तैयारी कर ली...आने दो ड्राइंग में 'सी ' या 'डी' अभी उसे सारी बात जाननी जरूरी थी. वह सोने को बेचैन हो रहा था पर उसे कार में जबरदस्ती डाला...सीट बेल्ट से बंधे  आर्यन का सर बार-बार इधर-उधर लुढ़क रहा था. दया  भी आ रही थी...एक नज़र सड़क पर..एक नज़र आर्यन पर रखते किसी तरह, घर पहुंची. (अब भी खुद से मायका नहीं निकलता...घर ही आता है जुबान पर)

माँ देख हैरान  रह गयीं, "अरे शाम को आनेवाली थी ,ना..इस बेचारे को नींद में ही उठा लाई...ओह.."..वे आर्यन को गोद में ले सुलाने चली गयीं.

जब उसे अच्छे से थपकी दे..चादर उढ़ा...लौटीं तो उसने निढाल स्वर में पूछा..."अब बताओ शुरू से...क्या बात है"

"पर तू खुद भी बहुत थकी हुई लग रही है....थोड़ा आराम कर ले...फिर बात करते हैं "

"मैं ठीक हूँ...शुरू से बताओ....." सोफे पर अधलेटी हो कहा. माँ को क्या पता, यहाँ..थकान शारीरिक नहीं मानसिक है.

"वो मिसेज शौरी हैं ना...फ्लोरेंस   बिल्डिंग वाली...वे एक दोपहर  आई थीं, और अपनी बहन के बेटे के लिए सिम्मी का रिश्ता मांगने लगीं...सब तो ठीक है...पर लड़का मर्चेंट नेवी में है...यह बात मुझे और तेरे पापा को नहीं जम रही...हमने तो ना का ही सोच लिया था  ,पर यूँ ही सिम्मी से जिक्र किया तो कहने लगी.. क्या बुरा है.... "

"सिम्मी ने कहा ये..." विश्वास नहीं हो रहा था उसे, जरूर इसकी रोहन से लड़ाई हो गयी है. और रिबाउंड में यह दूसरे रिश्तों में बंधने की सोच रही है...कितने फ्रेंड्स का देख चुकी है,जैसे ही एक रिश्ता टूटता है...तुरंत ही बिना ज्यादा सोचे-समझे तुरंत ही दूसरे रिश्ते बना शादी भी कर लेते हैं.

"हाँ उसने ही सारी जानकारी जुटाई...मिसेज़ शौरी का लड़का विवेक ,सिम्मी के फेसबुक में फ्रेंड्स लिस्ट में है...और वो नितिन , विवेक के फ्रेंड्स लिस्ट में...विवेक के प्रोफाइल से जाकर उसके एल्बम देखे सिम्मी ने और बस तब से उसकी आँखे चौंधियाई हुई हैं...उसका आलिशान फ़्लैट...बड़ी सी गाड़ी...और उसके फौरेन ट्रिप  के फोटो..."

वो  यह सब तो सुन ही रही थी...साथ ही सोच रही थी, मम्मी कितनी सहजता  से फेसबुक, प्रोफाइल, फ्रेंड्स लिस्ट की बात कर रही हैं....सिम्मी के सान्निध्य में इन सारी चीज़ों से परिचित हो गयी हैं....और एक वो है...मम्मी से भी ज्यादा आउटडेटेड हो गयी है...बस नर्सरी राईम्स  और पिक्चर बुक में ही उलझी रहती है.

सिम्मी को दो बार मेसेज भेजा ...'जल्दी आओ'

कुछ समझ नहीं पा  रही थी. आखिर सिम्मी -रोहन के बीच क्या हो गया. मम्मी बता रही थीं...पापा  को भी यह रिश्ता पसंद नहीं..शिप्पीज़ के बारे में बहुत सारी बातें सुनी हैं...शराब पीते हैं...बहुत सारी बुरी आदतों के शिकार होते हैं...और उन्हें तो नहीं ही पसंद.....बेटी को अकेले  रहना पड़ेगा...अकेले घर संभालना पड़ेगा. हमेशा किसी की छत्रछाया में रहने वाली  माँ को यह सब गवारा होता भी नहीं. वह आधे मन से सब सुन रही थी....सिम्मी से बात करने की बेचैनी हो रही थी.

आर्यन उठ कर आ गया...उसकी ड्राइंग बुक..कलर पेन्सिल्स सब लेकर आई थी, पर मन नहीं हो रहा था, प्रैक्टिस करवाने का...वह भी उनींदा सा था..दूध का ग्लास सामने पड़ा था और वह ,शांत  सा बैठा था कि  कॉल बेल बजी और सिम्मी को देखते ही हज़ार वाट की मुस्कान छा गयी, चेहरे पर ...बिजली सा दौड़ा उसकी तरफ. सिम्मी ने भी..'मेरा राजा बेटा'...कहते उसे गोद में उठा...गोल-गोल घूमना शुरू कर दिया. यही सब आर्यन को  अच्छा लगता है...फिर दोनों छुक छुक रेल गाड़ी बना....पूरे फ़्लैट में घूमते रहें...वो गंभीर बनी बैठी रही..आखिर..सिम्मी ने ही पूछा..."ये दीदी को क्या हुआ है?"

"पता नहीं कुछ तबियत ठीक  नहीं लग रही इसकी..मना किया...फिर भी चली आई...." मम्मी ने चिंतित  हो, कहा.

सिम्मी भी गंभीर हो गयी...उसे पता चल गया...दीदी क्यूँ चुप है.

थोड़ी देर को उसका चेहरा म्लान हुआ फिर आर्यन के साथ खेलने लगी...आखिर उसने ही गुस्से में बोला, "आर्यन दूध ख़त्म करो.."

 सिम्मी ने ही डरने की एक्टिंग की "चलो..चलो...भागो यहाँ से..मम्मी गुच्छा है..."और दूध का ग्लास ले बालकनी में चली गयी.

दूध ख़तम करवा कर खाली  ग्लास लिए, सिम्मी आई..."देखो बता दो..मम्मा को, मैं कितना राजा बेटा हूँ ..सारा दूध फिनिच कर लिया ..."

उसने मम्मी से कहा, "मम्मी....आर्यन को गार्डेन में ले जाओ..."

"अरे, उसे प्रैक्टिस नहीं करवाएगी...उसके ड्राइंग का एग्जाम है ना कल"

"नहीं..मूड नहीं है..."

मम्मी उसे अबूझ सी देखती रहीं....क्या हो गया है उसे.

"आर्यन...नानी के साथ  जाओ गार्डेन में..."

"मुज्झे नहीं जानाssss...मैं मासी के साथ ट्रेन ट्रेन खेलूँगा...." आर्यन ने जिद की.

उसने उसे गोद में उठाया और हाथ पैर पटकते आर्यन  को लिफ्ट तक ले आई...मम्मी भी साथ चली आयीं...चीखते -चिल्लाते आर्यन  को उसने लिफ्ट में खड़ा कर, लिफ्ट बाहर से बंद कर दी ...मम्मी  ने उसे गोद में उठा पुचकारते हुए ग्राउंड  का बटन प्रेस कर दिया...पर उनके चेहरे से गुस्सा साफ़ झलक रहा था. उन्हें इस बात का क्या इलहाम कि वो किस कशमकश से गुजर रही है. आर्यन तो झूला देखते ही तुरंत बहल जाएगा...मम्मी को भी उनकी सारी सहेलियाँ मिल जाएँ तो अच्छा...घंटा- दो घंटा वो लोग नीचे ही रहें ताकि...वो आराम से बात कर सके सिम्मी  से.

लौटी तो सिम्मी ने छूटते ही कहा...." बच्चे पर क्यूँ गुस्सा निकाल  रही हो..."

"क्या करूँ तो....तुम तो ऐसे एक्टिंग कर रही हो जैसे....कुछ हुआ ही नहीं..." चिल्ला ही पड़ी जैसे वो...

"रिलैक्स दी...इतनी परेशान क्यूँ हो..."

वो भी शांत हो सोफे पर बैठ गयी..." सिम्मी क्या है ये सब..."

"हम्म....क्या पूछना है तुम्हे....पेश हूँ, तुम्हारे दरबार में...दागो..सवालों की गोली.." कुछ नाटकीयता से कहा उसने.

"सिम्मी ये सब एक्टिंग रहने दे....और बता..रोहन से झगड़ा हुआ....?"

"ना.."

"फिर इस रिश्ते के लिए हाँ...कैसे कह  दी?"

"हाँ... कहाँ..कहा है ??"

"पर  कंसीडर तो कर रही है ना..."

"कुछ सोचा नहीं दी...समझ नहीं आ रहा...मैं अभी का नहीं...पांच साल बाद का सोच रही हूँ...क्या हमारे रिश्ते इतने ही ख़ूबसूरत रह जाएंगे. क्या यही तस्वीर रहेगी रिश्तों की....लगता है सब कुछ बदल  जाएगा....वह ऑफिस से आकर किसी बात पर चिल्लाएगा...मैं किसी और बात पर झल्लाउंगी  और वजह कुछ और होगी. ...सब कुछ इतना रोज़ी रोज़ी नहीं रहेगा....उसपर से तुम्हारे  और मम्मी के रहने की वजह से मुझे घर का कुछ काम भी नहीं आता. रोहन क्या मुझपर नहीं चिल्लाएगा...उसकी मॉम इतनी एफिशिएंट हैं..."

"ये सब इतनी गंभीर बातें नहीं हैं....वैस भी खुद पर पड़ती  है..तभी सब सीखते हैं..तू भी सीख लेगी..."

"बात सिर्फ वही नहीं दी...किसी भी मैरिड कपल को देखो..पांच साल बाद बताया नहीं जा सकता कि   उनकी अरेंज्ड मैरेज है या लव मैरेज ...सब एक से दिखते हैं...वही एक दूसरे से, एक सी शिकायतें....एक से झगडे....एक से समझौते...जो ज्यादातर लेडीज़ को ही करने पड़ते हैं...चाहे उसने लव मैरेज की हो  या अरेंज्ड...फिर जब बाद में समझौते करने ही हैं...तो अभी क्यूँ नहीं..? "

"यानि कि तुमने फैसला  कर लिया है? "

"फैसला तो एज सच कुछ नहीं किया...एक्चुअली..एम सो कन्फ्यूज्ड.."

"हम्म...जब प्यार में सोचना..समझना पड़ जाए तो क्या कहा जाए..."

"दी..मैं तुम्हारी तरह भावुक नहीं हूँ....रियलिस्टिक वे में सोचती हूँ...रोहन के साथ लाइफ बहुत टफ नज़र आती है...सारी ज़िन्दगी निकल जायेगी..पैसे जोड़ते...एक बड़ा फ़्लैट ले लें..गाड़ी ले लें..वेकेशन ट्रिप पर जाएँ...हर चीज़ के लिए सोचना पड़ेगा....दोनों, दिन रात पसीना  बहायेंगे....फिर भी पूरा नहीं पड़ेगा..."

"तो ये तो तू पहले से जानती थी...कि पापा हर हाल में रोहन से ज्यादा कमाने वाला ही ढूंढेंगे...फिर क्यूँ कदम बढ़ाया ..."

"ये कभी नहीं सोचा था...इतना, ज्यादा .......सिम्मी कुछ कहते कहते रुक गयी..."

"हाँ हाँ कह दे....सोचा था जीजू जैसा ही कोई ढूंढेंगे......"

"दी..तुम पर्सनली क्यूँ ले रही हो....वी  ऑल नो...जीजू अर्न्स सो वेल.."

"पर हमारा...पौश कॉलोनी में घर तो नहीं है..फौरेन ट्रिप्स पर तो नहीं जाते..बी.एम.डबल्यू. तो नहीं है...
"ही ही  दी.....बी.एम.डबल्यू तो उसके पास भी नहीं है...".सिम्मी खी खी कर हंसने लगी...

"सिम्मी तुझे सिर्फ पैसे की चमक दिख रही है....क्या सारा सुख पैसों से ही  मिल जाएगा...उन घरों में परेशानी... फ्रस्ट्रेशन...झगडे .. नहीं होते?

"वो रहेगा कहाँ...झगडे करने के लिए...वो तो शिप पर होगा "

"यू आर सो मीन....फिर रोहन का दिल क्यूँ तोडा...तुझे शुरू में ही कहा था....सोच समझ कर ही आगे बढ़ना"
"
दी..ऐसा भी कुछ नहीं है...आजकल सब मेंटली प्रिपेयर्ड रहते हैं...नहीं वर्क आउट हुआ रिलेशनशिप... तो टाटा बाई बाई...कोई देवदास नहीं बनता...एक्चुअली..कभी भी नहीं बनते थे ..नहीं तो इतने  सालो से एक ही देवदास का नाम क्यूँ लिया जा रहा है....दस-बीस-सौ देवदास क्यूँ नही हुए?...और रोहन भी इतना  कोई आइडियल लड़का नहीं है...आजकल का है..सबकी अपनी कमियाँ  हैं...उसने भी मुझे ही गर्लफ्रेंड क्यूँ चुना...स्मार्ट कॉन्फिडेंट लड़की..सबको चाहिए ताकि दोस्तों में धाक जम सके...वरना उस निधि को क्यूँ  एवोयाड करता रहता है..बेचारी कितना केयर करती है इसका...रोज़ एस.एम.एस करती है....अपनी सारी बातें शेयर करती है...रोहन के बर्थडे पर इतने सुन्दर गिफ्ट देती है....रोहन भी ये सब एन्जॉय करता है...कितनी बार कहा...'उसे ऐसी झूठी आशाएं मत दिलाओ...वो तुमसे प्यार करती है''...तो हंस कर उड़ा देता है कि वो डम्ब है...उसे डम्ब लगती है क्यूंकि...सीधी साधी सी है...फील सो बैड समटाइम्स ."

" बट रोहन लव्स यू...इसलिए उसे भाव नहीं देता..."

"तो फिर साफ़-साफ़ उस से कह क्यूँ नहीं देता....उसे मेरे बारे में बताता क्यूँ नहीं...रोहन भी इतना सीधा  नहीं है...जितना दिखता है..इगो कूट कूट कर भरा हुआ है...मेरा सेल एक बार घर पे छूट गया था...दो बार कॉल किया...मैने नहीं उठाया तो बस नाराज़ हो गया कि मैं उसे इग्नोर कर रही हूँ....वहीँ मैं...एक बार उसका फोन नहीं लग रहा  था...उसके कितने दोस्तों को फोन कर डाला ..ऑफिस  में फोन किया...आखिर उसको ढूंढ ही निकाला...और इसने कोई एफर्ट नहीं लिया, मेरे बारे में पता करने का......दी, हम लडकियाँ सेंटीमेंटल होती हैं...इन्हें सारी ज़िन्दगी मान लेती हैं...जबकि  ये लोग हमें अपनी ज़िन्दगी का बस एक पार्ट ही समझते हैं..

"पता नहीं तेरी बातें..मेरी समझ  में नहीं आतीं...मैने तुम दोनों को साथ देखा है.....और तुम्हारी आँखों में एक दूसरे के लिए स्नेह भी...

"हम्म...जो दिन गुजरे..अच्छे थे..नो डाउट....पर इसकी गारंटी नहीं कि हमेशा अच्छे ही रहेंगे..."
"
"गारंटी किस चीज़ की है...एक शिप्पी के साथ लाइफ कितनी टफ होती है...पता है...?..सब कुछ अकेले संभालना पड़ता है...छः से आठ महीने तो वो शिप पर रहेगा.."

"साथ में सेल करने को तो मिलेगा, ना...वो पेरिस...स्विट्ज़रलैंड...वेनिस...वाऊ...कभी सोचा भी नहीं था..देख पाउंगी...रोहन के साथ तो दस साल में बहुत हुआ तो सिंगापुर और मॉरिशस से ज्यादा के सपने भी नहीं देख सकती."

"इट्स सो डिस्गस्टिंग...कितनी मेटेरियालिसटीक  है तू...बाद  का नहीं सोचती...अकेले गृहस्थी संभालनी पड़ेगी...बच्चे आ जाएंगे तो सेल कर पाएगी...सब अकेले देखना पड़ेगा."

"अब ये सब फंडे मुझे मत दो...तुम क्या अकेले नहीं संभालती सब..? यहाँ की सारी औरतें..अकेले ही तो ढोती हैं..गृहस्थी का बोझ...मुझे इतना गुस्सा आया था...जब तुम लेबर रूम में  दर्द से छटपटा रही थी...और जीजू किसी दूसरे शहर में मुस्कुरा कर मीटिंग अटेंड कर रहें थे...मैं सोच रही थी...अभी खबर सुन कर लड्डू बाँट देंगे..लो मैं बाप बन गया...और मिल जाएगा  बेटे को उनका नाम. क्या फर्क पड़ता है....पति सात समंदर दूर  हो..या सात सौ किलोमीटर दूर...पास तो नहीं होता,ना.."
"वे लोग बीवी-बच्चों   के लिए ही तो करते हैं ये सब..."

"अब उनकी जुबान भी मत बोलो...सब समझौता है.....औरतें खुद को धोखा देती हैं...ये सोच...जो मैं खुली आँखों से स्वीकार करना चाहती हूँ...दीदी तुम नहीं समझोगी..एक सिक्योर्ड घर से दूसरे सिक्योर्ड घर में चली गयी हो...ज़िन्दगी सिर्फ, गुलज़ार की नज्मे और जगजीत की गज़लें नहीं हैं दी...और ये फूल,खुशबू, चाँद की बातें भी तभी अच्छी लगती हैं...जब रोटी-कपड़ा-मकान की फ़िक्र ना हो..."
"हम्म....तो ये मुझ पर व्यंग्य है.."
"ऑफ कोर्स नॉट...बस तुम्हे नेकेड ट्रुथ दिखाना चाह रही हूँ..."

"इट्स नॉट नेकेड ट्रुथ...तुम्हारा सच है ये....और आधा सच....आज भी  लोग हैं...प्यार, विश्वास और ईमानदारी पर मर-मिटने वाले..."

"मैने कब कहा नहीं हैं...होंगे इमोशनल फूल्स...पर मैं नहीं बनना चाहती..."

"इट्स गुड़...सिम्मी..कि तूने इतनी जल्दी ही फैसला ले लिया...और उसकी ज़िन्दगी से निकल आई...तुम दोनों एक दूसरे के लिए नहीं बने थे....और तुम्हे क्या लगता है...इस शिप्पी गाइ ने तुम्हे क्यूँ पसंद किया....उसे भी एक ख़ूबसूरत स्मार्ट बोल्ड...बीवी चाहिए बस...जो उसकी अनुपस्थिति में उसके पैसों का.... उसके घर का अच्छी तरह ख़याल रख सके.."

"आइ नो..मैं किसी मुगालते में नहीं हूँ...उसने मेरे फेसबुक प्रोफाइल्स पर मेरे अपडेट्स पढ़कर और मेरे फ़ोटोज़ देखकर ही प्रपोज़ल भेजा है..विवेक बता रहा था...सो इट्स गिव एन टेक...मैं ये नाइन टु फाइव जॉब छोड़ एक बढ़िया सा बुटिक खोल लूंगी...अपना काम होगा...आराम की ज़िन्दगी...पति सारे समय सर पे नहीं बैठा होगा...और जब आएगा...तब भी मेरे पीछे ही घूमेगा,...यू नो ना..इन शिप्पिज़ का कोई सोशल सर्कल नहीं बन पाता...जहाँ बीवी ले जाए...वहीँ जाएंगे...सो नो टेंशन.
"हम्म तो अब क्या बोलूं...जब तूने इतनी दूर तक सोच लिया है...जो सोच तू तेरी ज़िन्दगी है,ये

"थैंक्स  दी..मुझे ये डिसीज़न लेने में हेल्प करने में...तुम्हे सारे तर्क देते देते...खुद को भी समझा  लिया. "

बिलकुल थक गयी थी, वो.... लगा मीलों दौड़ कर आई हो...अब थोड़ी देर अकेले रहना चाहती थी...बोली," चलो..जाकर आर्यन को ले आऊं...अब जाना भी होगा..."

"सॉरी दी..यू  आर हर्ट.....कैन सी दैट.....बट एम हेल्पलेस...हमारा ज़िन्दगी को देखने  का नजरिया बिलकुल अलग है...'

"तू बस खुश रहें...मुझे और क्या चाहिए.."

थके कदमो से बाहर निकल आई....मन में भी यही कहा...'आज इसे पैसों की चमक में ही असली ख़ुशी लग रही है...कल कहीं इन्हीं पैसों से भाग...योगा, मेडिटेशन, विपासना में मन की शान्ति ढूँढती ना फिरे.'

खुद पर भी गुस्सा आ रहा था...उसे जो सब नहीं मिला..इनके माध्यम से पूरा करने की कोशिश क्यूँ कर रही थी...यह सिम्मी की  ज़िन्दगी थी..उसके सपने थे...पर देख वो रही थी...और तभी जब ये सपने टूटे तो उसकी किरचें चुभ कर उसका ह्रदय लहू-लुहान किए जा रही थीं. हताश सी लिफ्ट का बटन प्रेस कर दिया और सोचती रही..काश कोई परिचित चेहरा ना मिले और थोड़ी देर अकेली बैठ वो इन चुभती किरचों को निकाल सके.

(समाप्त )

( आपलोगों को सॉरी भी बोल दूँ..एक तो इस किस्त  को पोस्ट करने में इतनी देर हो गयी...और फिर मॉडरेशन भी लगाना पड़ा...इस असुविधा के लिए सचमुच खेद है ,पर मजबूरी थी.  कुछ  विचारों  की असहमति की वजह से एक पुराने पाठक ने  अलग-अलग फेक प्रोफाइल बना पहले तो मुझे विधर्मी , धर्म विशेष की अनुयायी वगैरह  कहा.जब कमेन्ट नहीं पब्लिश किए तो उनकी  अंतर्दृष्टि अचानक जाग गयी और उन्हें अब मेरा लिखा, वाहियात,घटिया और सस्ता लगने लगा...जैसे किसी सस्ती पत्रिका ,मनोहर कहानियाँ से कॉपी किया गया हो. समय के साथ विचार भी परिवर्तनशील होते हैं. कोई बात नहीं...और उन्हें विचारों  की अभिव्यक्ति की भी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए .पर अपनी सही प्रोफाइल के साथ कहने की हिम्मत होनी चाहिए. लाइव ट्रैफिक से ही उनकी सही प्रोफाइल का अंदाज़ा हो गया था क्यूंकि कमेन्ट और ब्लॉग विजिट का समय एक ही था. फिर एक शुभचिंतक ने आइ.पी एड्रेस ट्रेस करके  भी उनका सही नाम-पता बता दिया.

उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत थी कि किसी ने अपनी साईट पर मेरा परिचय 'साहित्यकार ' कह कर कैसे दिया? अब क्या जबाब दूँ इसका?..आज ही 'स्वाभिमान टाइम्स' में मेरे आलेख के साथ मेरे परिचय में 'साहित्यकार' लिखा है. :) (कटिंग साइड बार में लगा दी है ) .अब ये मुझसे पूछकर तो नहीं लिखते...:) यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  है.

एक अपील है...फेक प्रोफाइल वालों के आरोपों ,प्रश्नों का मैं कोई उत्तर नहीं दूंगी...यह मेरी कहानियों का ब्लॉग है और इसकी sanctity  मैं बनाए रखना चाहती हूँ )