Monday, September 27, 2010

हैप्पी बर्थडे ... मन का पाखी

'मन का पाखी' ने एक वर्ष की उड़ान भर ली और अब तक थका हो...ऐसा महसूस तो होता नहीं. वैसे भी मन के पाखी को इस  ब्लॉग आकाश की खबर बहुत दिनों बाद चली. और गलती मेरी थी, पिछले 5 साल से नेट  पर सक्रिय हूँ पर हिंदी ब्लोग्स   के बारे में मालूम नहीं था. बस कभी कभार 'चवन्नी चैप' पढ़ लिया करती थी. एक बार वहाँ हिंदी फिल्मो से सम्बंधित किसी के संस्मरण पढ़े और मेरा भी मन हो आया कि अपने अनुभवों को कलमबद्ध करूँ. मैने भी अपने  संस्मरण लिख कर अजय(ब्रहमात्मज) भैया को भेज दिए  (.हाँ, वे मेरे भैया भी हैं.) उन्हें पसंद आई और उन्होंने पोस्ट कर दी. उस पोस्ट पर काफी  कमेंट्स आए पर उस से ज्यादा लोगों ने  उन्हें फोन कर के बोला,कि 'बहुत अच्छा लिखा है.' मैने बेवकूफी भरा प्रश्न पूछ लिया कि "जब इतने लोगों को अच्छा लगा तो उन्होंने कमेंट्स क्यूँ नहीं लिखे?" और अजय भैया ने बताया "सबलोग कमेंट्स नहीं लिखते" (अब तो मैं भी यह बात बहुत अच्छी तरह जान गयी हूँ...इसलिए मेरे ब्लॉग के Silent Readers आप सबो का भी बहुत आभार,मेरा लिखा ,पढ़ते रहने के लिए:) )

अजय भैया ने मुझे अपना ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली . पर मैं  बहुत आशंकित थी. यूँ तो पहले भी मैं पत्रिकाओं में लिखती थी.पर लिखने और छपने के बीच एक एडिटर होता था. यहाँ खुद ही निर्णय लेना था,क्या लिखना है? पर अजय भैया रोज ही पूछने लगे थे. उन्हें ऑनलाइन देख मैं डर जाती. उन्हें पता था,मैने कहानियां लिख रखी हैं.कहने लगे कम से कम एक जगह एकत्रित  करने की सोच ही ब्लॉग बना डालो. और मैने ब्लॉग बना कर अपनी एक कहानी पोस्ट कर दी.,चंडीदत्त शुक्ल ,आशीष राय,रेखा श्रीवास्तव ,कुश, ममता ये लोग पहली पोस्ट से ही मेरे ब्लॉग के पाठक  बन गए और लगातार उत्साहवर्द्धन  करते रहें. आप सबका शुक्रिया .

दूसरी पोस्ट पर भी कई नए लोगों के कमेंट्स आए.उसके बाद तो मुझमे आत्मविश्वास आ गया,और किसी भी विषय पर लिखने लगी. आज जब पुरानी पोस्ट पर नज़र डाली तो कुछ नाम देख हैरान रह गयी.उड़न तश्तरी , डिम्पल, निर्मला कपिला, रश्मि प्रभा,दिलीप कवठेकर, कमल शर्मा, प्रवीण शाह,  सुलभ सतरंगी, रंगनाथ सिंह, पंकज उपाध्याय, गिरीश बिल्लोरे, दर्पण शाह , अपूर्व, विजय कुमार सप्पति, शमा, अनिल कांत, रंजना भाटिया, जाकिर अली, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, नीरज गोस्वामी, सुरेश चिपलूनकर, डा. दराल ये लोग शुरू से ही टिप्पणी देकर  मेरी हौसला  अफजाई करते रहें हैं ('जी' सबमे कॉमन है :))  आप सबो का शुक्रिया.

निर्मला जी ने जब लिखा "तुम्हारी शैली बहुत प्रभावित करती है" और अगले कमेंट्स में कई लोगों ने उसका अनुमोदन किया तो मैने आश्चर्य से सोचा, "अच्छा ! मेरी कोई शैली भी है. " ऐसे ही दीपक मशाल ,अजय झा,राज भाटिया जी, विवेक रस्तोगी जी  और कई लोगों ने कहा 'आपके लेखन में सहज प्रवाह  है" तो मन में संतोष हुआ. मुझे किसी भी लेख में सबसे ज्यादा उसका फ्लो पसंद आता है...और थोड़ा बहुत मेरे लिखने में भी आ गया है, अच्छा लगा,जान. नीरज गोस्वामी जी का ये कहना ,"आपके विचार बहुत स्पष्ट हैं" और गौतम राजरिशी का बार बार उल्लेखित करना कि "आप का विषय चयन अचंभित कर देता है '...हैरान कर देता, इतना कुछ दिख गया ,इनलोगों को मेरे लेखन में और मुझे कुछ पता ही नहीं था.

एक शाम  अमिताभ बच्चन के ब्लॉग में पढ़ा, कि वे मिडिया द्वारा ब्लॉग को महत्व नहीं दिए जाने से बहुत दुखी हैं और मैने एक पोस्ट लिख डाली  ,अमिताभ और ब्लॉग जगत का साझा दर्द उस पोस्ट पर काफी लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दीं अविनाश वाचस्पति, स्मित अजित गुप्ता, हरकीरत हकीर, गिरश बिल्लोरे, मुफलिस,रंजना ,शाहिद मिर्ज़ा शाहिद, कुलवंत हैप्पी,अर्क्जेश ,सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी,  दिगंबर नासावा, किशोर चौधरी,  डा.प्रवीण चोपड़ा,.इनमे से कुछ लोग तो  नियमित रूप से मेरी पोस्ट्स पढ़ते हैं. सबका आभार.

पर मैं हैरान थी, लोगों को मेरी पोस्ट के बारे में पता कैसे चल जाता है? अजय भैया के  कहने पर  मैने ब्लॉग वाणी पर रजिस्टर कर लिया था .पर ना मुझे वहाँ कुछ देखना आता था ना ही मैं कभी वहाँ 'लॉग इन' करती. ऐसे में  एक पोस्ट पर नमूदार हुए 'महफूज़ अली'. और गूगल  ने हमें दोस्त बना दिया.'हॉट  लिस्ट','चटका' ,वहाँ से दुसरो की पोस्ट पर कैसे जा सकते हैं, यह सब महफूज़ ने समझाया. महफूज़ की दोस्ती जिन्हें मिली है, उन्हें पता है कि सारी दुनिया आपके विरुद्ध हो जाए पर आप,महफूज़ को अपने साथ खड़ा पाएंगे. और महफूज़ अपने दोस्तों की कही किसी  बात का बुरा नहीं मानते. मैने दो,तीन बार किसी और की पोस्ट पर दिए ,महफूज़ के कमेन्ट पर  पब्लिकली बड़े कड़े शब्दों में आपत्ति प्रकट की है. महफूज़ की जगह कोई और होता तो मैं शब्दों में हेर-फेर कर माइल्ड बना देती.पर मुझे पता था,इस से महफूज़ से मेरी दोस्ती के इक्वेशन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा..और ऐसा ही हुआ. बस महफूज़,अपना उतावलापन जरा कम कर लो, और जल्दी से अपनी गृहस्थी बसा लो, अपने आप स्थिरता आ जाएगी.शुभकामनाएं.

महफूज़ ने अदा और शिखा को मेरे ब्लॉग से परिचित करवाया. अदा से आंचलिक  भाषा में टिप्पणियों के आदान-प्रदान को मैने बहुत एन्जॉय किया. अदा, इतनी व्यस्त रहने के बावजूद,अपने दोस्तों की प्रशंसा कर उन्हें आसमान पर बिठाना , नव-वर्ष और जन्मदिन पर शुभकामनाएं देना नहीं भूलती. सीखने पड़ेंगे ये सारे गुण.

शिखा और मैं तो अक्सर इनविजिबल मोड में रहकर पोस्ट लिखते रहते हैं और  डिस्कस भी करते रहते हैं. कमियां भी बताते हैं और एक दुसरे को आश्वस्त भी करते हैं,"न एडिट की जरूरत नहीं,रहने दो" शिखा से जाना कि ये 'फौलोवर लिस्ट' और 'डैश बोर्ड' क्या बला है. उसकी बहुत अच्छी आदत है कोई भी कमेन्ट करे वो उन्हें थैंक्स बोलती है,उनका ब्लॉग चेक करती है,फौलो करती है और कमेन्ट भी कर आती है. मैं बहुत कोशिश करती हूँ ये सब सीखने की,पर मेरी  लम्बी किस्तों को टाइप करने की थकान और कुछ मेरा laid back  attitude  आड़े आ जाता है. (शिखा, बहुत कुछ जमा हो गया है तुमसे सीखने को :))

शिखा और अदा के साथ वाणी गीत और संगीता स्वरुप जी भी मेरा ब्लॉग पढने लगीं. ये लोग इतनी सारगर्भित टिप्पणी देती हैं कि मेरी पोस्ट इनकी टिप्पणियों के बिना अधूरी रहती है. वाणी बहुत ही अच्छी सहेली है और उसके बेबाक विचार और सुन्दर लेखन शैली की तो फैन हूँ मैं.

मैने ब्लॉग जगत में कई जगह बहसों में जम कर हिस्सा लियाऔर खुल कर अपने विचार रखे. शायद
यही देख, ,रचना जी ने नारी ब्लॉग पर लिखने का निमंत्रण  दिया.और मैने वहाँ ,'मोनालिसा स्माइल फिल्म के बारे में लिखा,जो अब भी मेरे प्रिय पोस्ट में से एक हैं.एक पूरा सन्डे 'बेनामी  जी' के ब्लॉग पर बहस में व्यतीत  हुआ और मुझे पता भी नहीं था कि मेरी 'विवाह-संस्था' पर इतनी आस्था है. दूसरे पक्ष की वकालत ,'गिरिजेश राव जी, अमरेन्द्र त्रिपाठी, लवली गोस्वामी,दिव्या श्रीवास्तव जैसी शख्सियत कर रहें थे और मैं अकेले 'मोर्चा संभाले  थी. जब अंत में सबकी खिंचाई करने वाले, बेनामी जी ने कहा' आपकी सोच में एक सफाई है ,जो नमन मांगती है ' तो मेरा सन्डे बर्बाद होने का सारा मलाल चला गया. चिट्ठा चर्चा पर  भी अपनी असहमति जताने में मैने हिचक नहीं बरती.

पर चिट्ठा चर्चा ने एक बहुत ही प्यारी सहेली दी.'वंदना  अवस्थी दुबे' ,उस से बातें करते तो लगता है.'कॉलेज के नहीं स्कूल के दिन लौट आए हैं.बात बात पे कहती है,"विद्या कसम" जो मैने स्कूल के बाद अब तक नहीं सुना था .मेरे लेखन की सजग पाठक है और किसी भी कमी की तरफ तुरंत इंगित करती है. 'विद्या कसम' ,वंदना ऐसी ही पैनी नज़र रखना मेरे लिखे पर:)

पापा की सर्विस में उनकी पोस्टिंग के समय हुए कुछ रोचक (और भयावह भी ) घटनाओं पर लिखे संस्मरण और मुंबई की लोकल ट्रेन के संसमरण लोगों को खूब पसंद आए.चंडीदत्त जी ने सलाह दी कि, "संस्मरण, शब्द चित्र और रेखा चित्र " पर ज्यादा कंसंट्रेट करूँ. शरद जी के आश्वासन पर ,डायरी में कैद अपनी कुछ  कविताएँ भी पोस्ट करने की हिम्मत कर डाली. बच्चों के लिए खेल की अनिवार्यता..... काउंसलिंग की आवश्यकताऔर बाल मजदूर की त्रासदी पर भी लिखे मेरे पोस्ट, पसंद आए सबको. कई लोगों ने  मुझे बच्चों से संबंधित विषयों पर लिखने की सलाह दी. विजय कुमार सपत्ति जी शिवकासीमें काम कर रहें बाल मजदूरों  की दशा  के बारे में पढ़कर इतने  द्रवित हो गए कि मुझसे 'नुक्कड़ ब्लॉग' से जुड़ने का आग्रह किया ताकि मानस के मोती के जरिये , पोस्ट सब तक पहुँच सके. आप सबका आभार,मेरे लेखन पर इतनी बारीक नज़र रखने के लिए.

अलग-अलग  विषयों  पर लिखना जारी था और ममता कुमार (मेरी भाभी ) मुझसे पूछती रहतीं, "कहानी कब पोस्ट कर रही हैं?" प्रथम पोस्ट से अब तक की हर पोस्ट वे पढ़ती हैं और जहाँ सहमत ना हों,आपत्ति जताने से भी नहीं चूकती ,  इनके जैसे ही कुछ नॉन-ब्लॉगर सौरभ हूँका,आलोक, आदि कुछ अंग्रेजी पढने-लिखने -बोलने वाले लोग हैं पर मेरा लिखा बड़े शौक से पढ़ते हैं. शुक्रिया दोस्तों.

मैने कहानी की किस्तें डालनी  शुरू कर दीं.अब कई लोग नेट पर लम्बी कहानी पढने के आदी नहीं हैं. मैने भी दूसरे आलेखों  के लिए दूसरा ब्लॉग बना लिया.जिन्हें कहानियों का शौक था, बस  वे लोग ही इस ब्लॉग  पर आते रहें. पहले  लघु उपन्यास की  अंतिम किस्त पर आचार्य सलिल जी ,डा.अमर कुमार जी, रवि रतलामी जी, ज्ञानदत्त पण्डे जी, ताऊ रामपुरिया जी, इन लोगों की टिप्पणी से पता चला ये लोग भी मेरा लिखा पढ़ रहें थे.

मेरे लेखन ने,आचार्य सलिल जी, ज्ञानदत्त जी, सारिका,आलोक, डा. अमर कुमार, डा.तरु ...... कई लोगों को  (शायद भावनाओ की रौ में)  दिग्गज साहित्यकारों के लेखन  और उनकी कृतियों  की याद दिला दी. शायद मैं सातवें आसमान पर पहुँच जाती पर चंडीदत्त  जी, शरद जी, शहरोज़ भाई, अनूप शुक्ल जी,राजेश उत्साही जी  की टिप्पणियों ने हमेशा धरातल पर रखा. इन लोगों ने मेरा उत्साहवर्धन भी कम नहीं किया. पर यदा-कदा बताते भी रहें कि,यहाँ शिल्प की  कमी है,या साहित्यिक शब्दों की कमी खलती है,वगैरह.

प्रारम्भ से जिन लोगों  ने मेरी पोस्ट्स पढनी शुरू की,अब तक अपना स्नेह बनाये रखा है . बाद में कुछ नए नाम भी शामिल हो गए.
प्रथम उपन्यास से वंदना गुप्ता, सतीश पंचम जी, हरि शर्मा जी, दीपक शुक्ल जी, मनु जी,मुदिता, पूनम, शुभम जैन,  विनोदकुमार पाण्डेय, अबयज खान,पाबला जी हर किस्त पर  साथ बने रहे. खुशदीप भाई ने तो मुझे सीरियल में स्क्रिप्ट लेखन की कोशिश की सलाह भी दे डाली.

दूसरे लघु उपन्यास से , मुक्ति, संजीत त्रिपाठी, हिमांशु मोहन जी जुड़ गए और अपनी समीक्षात्मक  टिप्पणियों  से मेरी मेहनत  सार्थक करते रहें. अनूप शुक्ल जी ने कुछ अंशों को बॉक्स  में उद्धृत करने की तकनीकी सलाह भी दी.पर मैं नाकाम रही. (अब उन्हें सलाह देने के लिए थैंक्यू बोलूं या मेरे अमल ना कर पाने के लिए सॉरी, समझ में नहीं आता :))

तीसरा लघु उपन्यास तो इन्हीं पाठकों के साथ ने लिखवा ली.साधना वैद्य जी और शोभना चौरे , इंदु पूरी जी, प्रवीण पाण्डेय जी, घुघूती बासूती जी   ने भी पढ़ा और  ख़ास नज़र रखी,इस उपन्यास पर.

पिछली दो कहानियों पर अली जी  की समीक्षात्मक टिप्पणी ने अपनी ही लिखी कहानी को समझने में मदद की.  अभी और रोहित  की संवेदनशीलता भी कहीं गहरे छू गयी.

एक उल्लेख और करना चाहूंगी, "पराग, तुम भी.." में पहली बार मैने अपने लेखन में थोड़ी बोल्डनेस दिखाई (अपने स्टैण्डर्ड से ) दरअसल दिखानी पड़ी क्यूंकि वो 2010 की कहानी है ,और आज लड़के-लड़की साथ मिलकर सिर्फ चाँद और फूल नहीं देखते. किसी ने मुझे आगाह भी किया कि ये ब्लॉग जगत है, ज्यादातर लोग , सिर्फ उन्हीं उद्धरणों को कोट करके अपनी प्रतिक्रिया देंगे. पर एक भी पाठक ने ऐसा नहीं किया और कहानी के मूल स्वरुप को ही समझने की कोशिश की. सच , मुझे गर्व हो आया,पाठकों पर. और ब्लॉग जगत से कोई शिकायत नहीं ,यहाँ काफी  अच्छे लोग हैं जो बहुत अच्छा लिखते हैं और प्रोत्साहित भी करते हैं,अच्छा लिखने को..

सभी पाठकों का बहुत बहुत शुक्रिया, जिनके साथ और उत्साहवर्द्धन ने इस एक साल की ब्लॉग यात्रा को इतना खुशनुमा बनाए रखा.

मन के पाखी की, स्वच्छंद विचरण की यही जिजीविषा बनी रहें और थकान,ऊब, निराशा उसके पास भी ना फटके...बस यही  कामना है.

कुछ ऐसी टिप्पणियाँ, जो बेहतर लिखने को उत्साहित करती हैं और जिम्मेवारी का अहसास भी 

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल जी 
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/10/blog-post_13.html 
ज्ञानदत पाण्डेय जी
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/03/4.html
अविनाश वाचस्पति जी,
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html 
खुशदीप भाई
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html
शहरोज़ भाई
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html
हिमांशु  मोहन जी,
http://mankapakhi.blogspot.com/2010/05/blog-post.html
प्रवीण शुक्ल प्रार्थी जी,
http://mankapakhi.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html

Tuesday, September 21, 2010

पराग, तुम भी...

शीना ने माथे पर हाथ लगा कर देखा..."बुखार तो नहीं है...फिर क्या हुआ"
"पता नहीं यार....नॉट फिलिंग वेल.....हैविंग सिव्हियर हेडेक ....आज ऑफिस नहीं जाउंगी "

"ओह!!..चलो कोई नहीं..तुम आराम करो..." और शीना तौलिया ले बाथरूम में चली गयी.

बाथरूम से निकल कर हमेशा की तरह हड बडाती हुई शीना ने अपना कबर्ड खोला..एक कपड़े  निकाले ,दस गिराए...फिर उन्हें उठा कर यूँ  ही ठूंस दिया.

छोटे से शीशे के पास आकर गीले बालों को जोर जोर से झटकती भी जाती और बुदबुदाती भी जाती..."एक ड्रेसिंग टेबल नहीं रख  सकती...कितनी कंजूस है ये ओल्ड वूमन ..गर्ल्स क्या इत्ते से शीशे में तैयार हो   सकती हैं.......पैसे तो  इतने ऐंठ लेती है....पर सुविधा देखो...सुबह रोज वही टोस्ट या पोहा...अरे आलू पराठे नहीं दे सकती...रात में बस  सूखी चपाती और बेस्वाद सब्जी......मैं तो यहाँ नहीं रह सकती...तन्वी  सोच ले...कोई दूसरी जगह ढूंढनी होगी."

रोज वह खुद ही तैयार  होने में लगी होती हैं..इन दृश्यों से वंचित रह जाती है...बस खटाक, खटाक....कबर्ड..और ड्रौर का खुलना बंद करना ही सुनती रहती है. उसे हंसी आ गयी....मुस्कराहट छुपाने को चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया. ऐसे ही चीज़ें इधर उधर  फेंकती शीना ने टेबल पर पड़ा नाश्ता छुआ भी नहीं और उसे हिदायत देती हुई.,जाने लगी...."ज्यादा तबियत खराब लगे तो मुझे फोन कर देना...दवाई जरूर ले लेना..."और दरवाजे पास एक पल को ठिठकी..."क्या मजे से सो रही है... आई  एन्वी यू यार....अपनी किस्मत में तो धक्के खाने ही लिखे हैं...चल,यू टेक केयर....."बोलती दरवाजे से निकल  कर भागी.

शीना के जाते ही उसने चादर फेंकी और उठ खड़ी हुई...ओह! कितने काम निबटाने हैं...और उस पे शीना ने कितना गन्दा कर के रखा है,कमरा...शीना से झूठ  बोलने का गिल्ट  भी हो रहा था....शीना उसे एक-एक बात बताती है...'आज अजय ने फ़ाइल पकडाते हुए...जानबूझकर उँगलियाँ टकरायीं,तो मैने  भी वापस  गुस्से में ,जरा जोर से ही  टकरा दीं तो चौंक कर देखने लगा...अब कभी हिम्मत नहीं करेगा...ऐसी हरकत की.....सोच क्या रखा है..बीसवीं सदी में हैं क्या हमलोग...कि उँगलियाँ टकराते ही झन... झन तार बजने लगेंगे...हा हा "

या फिर.."अब तो पक्का यकीन हो गया मेरा बॉस 'गे' है...आज भी मेरी तरफ नहीं देखा,उसने"..और एक वो है उसने हवा भी नहीं लगने दी कि आज पराग यहाँ आ रहा है..इसलिए उसने छुट्टी ली है ना कि कोई सरदर्द है...पर शीना फिर सवाल पूछ पूछ कर उसका सच्ची में सरदर्द करवा देती. बाद में सब विस्तार से बता देगी.

फुर्ती से पहले  शीना के ही बिखरे समान सही जगह पर रखने  लगी.

'पराग' को जब स्टेशन से सीधा रूम  पर ही आने को कहा तो वह भी चौंक गया, था ..."आर यू श्योर....लैंड लेडी ऑब्जेक्शन  तो नहीं करेगी...फिर तुम्हारा ऑफिस...सोच लो..."

"हाँ बाबा.....विल मैनेज  ऑल..तुम आओ तो.."

"देखो, फिर पलट मत जाना..." पराग ने शरारत से जोड़ा

"इडियट...ज्यादा उड़ने की कोशिश मत करो...चलो, सी यू देन"

"लव यू  स्वीटहार्ट  ..." ये एक नया सीखा है पराग  ने...उसे जरा अच्छा नहीं लगता,जैसे फिफ्टीज़   में हो. और पराग को ये बात पता है..इसीलिए उसे चिढाने को हर बार, बाय  की जगह यही कहता है  ..और उसने फोन काट दिया था.

बाहर कैफे,रेस्टोरेंट  में मिल कर थक  गयी थी...एक कप कॉफी यहाँ...सैंडविच  दूसरी जगह..तो डोसा तीसरी जगह . और पराग की ट्रेन दोपहर को आ रही थी,उसे पता था,वह अपने रूम पर जाकर एक बार सोएगा  तो फिर दूसरे दिन ही उठेगा...चाहे वो शाम को हज़ार रिंग करके थक जाए.यही सब सोच हिम्मत कर अपने रूम पर ही बुला लिया. वैसे तो लैंड लेडी ने पहले ही शर्त रख दी थी,' नो बोयज़', 'नो पार्टीज़' , 'नो लेट नाईट' और सर झुका आदर्श कन्या की तरह वे और शीना सब मान गयी थीं. अब तक निभाया भी था, पर आज रिस्क ले लिए उसने...देखती है...अगर लैंड लेडी की नज़र पड़  गयी तो बना देगी कोई बहाना....बैग भी तो होगा पराग के पास...कह देगी उसके शहर से कोई आया है.

पराग और वे साथ थे कॉलेज में...वैसे तो सारे समय लड़ते-झगड़ते ही रहते पर सब उन्हें  बेस्ट फ्रेंड ही मानते थे. क्यूंकि एक के बिना दूसरे का काम नहीं चलता था. नोट्स तैयार करने हों.लाइब्रेरी  से बुक लानी हो...क्लास बंक करके  मूवी देखनी हो या कैंटीन में गप्पे लड़ानी हों.....किसी दूसरे फ्रेंड को बर्थडे सरप्राइज़ देना हो..सबकुछ साथ में होता था. वैसे  तो पांच लोगों का ग्रुप था...पर वे दोनों ही हर जगह साथ जाते थे, अगर पराग नहीं आ पाया तो वो भी कोई बहाना बना देती और वो नहीं जा पायी तो पता नहीं कुछ ऐसे संयोग जुटते कि पराग भी नहीं जा पाता. फिर भी प्यार जैसा कोई अहसास नहीं जन्मा था. कभी उनकी तुर्की ब तुर्की बहस  से परेशान हो बाकी फ्रेंड्स कह देते... "यार...तुमलोग शादी कर लो...लड़ने का कोटा पहले ही ख़तम कर चुके हो...बाद में बस प्यार ही प्यार होगा".
और पराग कहता," शादी और इस स्नौबिश  से..सीधा एकाध क़त्ल करवा दो यार मेरे हाथों कि उस से पहले फांसी पर चढ़ जाऊं"

और वो कहती.."और वो कहती.."हलो......कौन सी लड़की करेगी तुम जैसे से शादी....पागल हो जाएगी..पागलखाने में मिलने  में जाना होगा उस से मिलने और बेचारी किसी को पहचान भी नहीं पाएगी..."
और इतने जोर के ठहाके लगते कि मैनेजर , टेढ़ी भृकुटी कर उन्हें गुस्से से  देख लेता. उनका ग्रुप था ही इतना शोर  शराबे वाला कि कुछ पढ़ाकू किस्म के लोग उसके ग्रुप को आता देख ही कैंटीन छोड़ चले जाते या फिर अंदर ही नहीं आते. रोज कैंटीन वालों  का चार,पांच कप चाय और कुछ समोसे पेस्ट्री का नुक्सान तो हो ही जाता.

पर जब फाइनल ईयर  के एग्जाम ख़त्म हो गए तो जैसे वास्तविकता सामने आई कि अब नहीं मिल पायेंगे  दोनों. एग्जाम की तैयारियों ने वैसे ही हंसी मजाक को अलविदा कह  रखा था,और अब कॉलेज छूटने  के गम ने उन्हें और संजीदा बना दिया था.
एक दिन लाइब्रेरी की सीढियों पर बैठे दूसरे दोस्तों का इंतज़ार करते,पराग ने कह ही दिया..."तुम्हारी आदत सी पड़  गयी है......तुमसे झगडे बिना कैसे कटेंगे  दिन..."

उसके दिल की धड़कन कई गुणा बढ़ गयी थी...किसी तरह साधते हुए कहा..."मिल जाएगी...कोई और इसी तरह झगड़ने वाली"

"ना यार....प्यार तो किसी से भी हो भी जाए...झगडा तो सिर्फ तुमसे ही  हो सकता है"...मुस्कुरा दिया था,पराग

और उसकी ठंढी सांस निकल आई .... एक पल में क्या क्या सोच लिया था...ये तो किसी और से  प्यार  की बात कर रहा है और जैसे पराग ने उसकी निराशा भांप ली.एकदम से उसका हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर बोला..." गोइंग टु मिस यू अलॉट....एक्चुअली कभी सोचा नहीं था....कि तुमसे दूर जाने की कल्पना भी इतनी भयावह होगी...नींद उड़ गयी है, यार... रातों की"

अभी भी वह श्योर नहीं थी कि पराग के मन में क्या है, हाथों में हाथ तो दोस्ती का जेस्चर भी हो सकता है. कुछ बोली नहीं तो पराग ने ही बड़ी असहजता से रुक रुक कर नीचे देखते हुए कहा..."आयम  सो कन्फ्यूज्ड .... कुछ समझ नहीं आ  रहा...सीम्स आयम फालिंग फॉर यू. "

ऐसे मौके पर कैंची  की तरह चलने वाई जुबान पता नहीं कैसे चिपक जाती है तालू से. अब भी कुछ बोल नहीं पायी बस पैर के अंगूठे से जमीन पर वृत्त बनाती  रही.

पराग ने मुस्कुरा कर सीधा  उसकी आँखों में  देखते हुए बोला, " व्हाट डू यू से......वी शुड गिव इट अ थॉट ?"

अब उसे यकीन हो गया, वो जो सोच रही है ,पराग वही कह रहा है, वह भी थोड़ी सहज हो आई...उसने भी उसे टीज़ करने की  सोची, "लेकिन कहते हैं , प्यार तो बिना सोचे-समझे होता है..."

और पराग ने एकदम से कह दिया "तो हो गया ना बिना सोचे-समझे...कभी सोचा था क्या...कि प्यार और तुमसे...नोss ..नेवर......पर देखो..हो गया..वैसे आयम नॉट  श्योर अबाउट यू..." और उसके हाथों की  पकड़ थोड़ी सी ढीली पड़ गयी.

उसने एक नज़र ,पराग को देखा...उसकी आँखें पनीली हो आई थीं और पराग को कुछ और समझने कि जरूरत नहीं पड़ी. जो भी लिखा था,आँखों में पराग ने आसानी से पढ़ लिया. उसके हाथो की  पकड़ फिर से कस गयी थी और वह दूसरी तरफ देखने लगा फिर तुरंत ही उसका हाथ खींचते हुए उठ खड़ा हुआ..."लेट्स मूव..अभी सब आ जाएंगे...मुझे किसी और से बातें करने का बिलकुल भी मूड  नहीं...कहीं और चलते हैं"

फिर तो एक हफ्ता जैसे जेट रफ़्तार से भी तेज़ निकल  गया. ज्यादा से ज्यादा वे दोस्तों से बचते रहें. पहली बार महसूस हुआ कि मौन भी मुखर हो सकता है. कई बार पार्क की बेंच पर बैठे बस एक दूसरे के अस्तित्व को ही जिया. बिना एक शब्द  भी बोले.
 दोस्त कुछ समझ  रहें थे...कुछ नहीं..पर उनलोगों ने भी ज्यादा से ज्यादा उन्हें अकेला छोड़ दिया. जाने के दो दिन पहले से ही हॉस्टल में सबकी आँखे गीली  रहतीं. पराग को देख कर मुस्कुराने की कोशिश करती तो वे और भीग जातीं.और पराग उसे कंधे से घेर कर चलता तो जाने कैसी सुरक्षा का अहसास होता. स्टेशन पर दोस्तों के हुजूम के बीच खड़े पराग और रफ़्तार पकडती ट्रेन के बीच का फासला, जैसे जैसे बढ़ता जा रहा  था, उसका दिल तेजी  से डूबता जा रहा था....क्या फिर हो सकेगा सब कुछ पहले जैसा...कभी लौटेंगे वो बेफिक्री भरे दिन.

कैम्पस सेलेक्शन तो हो चुका था, बस इंतज़ार था, अपोयेंटमेंट  लेटर का. रोज भगवान को हाथ जोड़ती, हे भगवान एक ही शहर में हो,पोस्टिंग हो जाए दोनों की.
पर रिसेशन भी इसी साल आना था, महीने पर महीने निकलते जा रहें थे और कंपनी से कोई खबर नहीं  आ रही थी. पराग की फ्रस्ट्रेशन बढती जा रही थी. घर वाले आस-पास होते,ज्यादा बात भी नहीं हो पाती. वह समझाने की कोशिश करती..मेरा भी तो नहीं आ रहा. तो पराग झट से कह देता," तुम तो लड़की हो...हम लड़कों की पीड़ा नहीं समझोगी...बेरोजगारी शब्द का क्या मतलब  होता है...सिर्फ हम लड़के ही महसूस कर सकते हैं " घर में रिश्तेदार ,शादी की बात उठाने लगे थे पर उसने ममी-पापा से साफ़ कह दिया था कि दो साल नौकरी के बाद ही वो सोचेगी....और उन्होंने मान  ली थी उसकी बात.

पर नौकरी  मिले तो सही और जब अपोयेंटमेंट लेटर आया भी तो पहले उसका ही आया. उसे यह खबर पराग को देने की हिम्मत नहीं हुई. पराग को ही कहीं से पता चला,और उसने जब अपराधी स्वर में ;हाँ' कहा तो पराग ने बहुत ही जोश में बधाई दी. कोई व्यंग्य नहीं  किया,जैसा कि उसे डर  था. सारी इन्फौर्मेशन ली और उसे गुड़ लक कहा. पर उसके  बाद से ही वह कन्नी काटने लगा. अब वह नए शहर में आ गयी थी. पेईन्ग गेस्ट बनने से पहले, ऑफिस के गेस्ट हाउस में थी. पापा ने भी हज़ार रुपये का रिचार्ज भरवा दिया था, पैसे भी दिए थे, एकांत भी था, जितना चाहे बात कर सकती थी. पर पराग का मूड ही नहीं होता बात करने का. कभी शो नहीं करता पर बहाने बना कर फोन रख देता. वह समझती थी  उसकी मनःस्थिति.

कभी पूजा-पाठ नहीं किया, उसने  पर शाम को अक्सर ऑफिस से निकलते  ही के पास वाले मंदिर में जाने लगी थी, एक ही प्रार्थना  रहती  होठों पे..'किसी तरह पराग का अपोयेंटमेंट  लेटर आ जाए , भगवान'.. करीब तीन  महीने बाद ,जब पराग ने लगभग चीखते हुए खबर  दी कि उसे भी उसके शहर में ही नौकरी मिली है तो ऑफिस से जल्दी ही निकल गयी. मंदिर में हाथ जोड़ते ही उसकी आँखों से झर झर आँसू बह निकले.पहली बार जाना, भक्ति में भी कैसे आँसू निकल आते हैं.

जब से पराग आया सारे वीकेंड्स साथ ही गुजरने लगे. पर वही एक कैफे से दूसरे कैफे या फिर पार्क की बेंच या कोई मॉल या फिर कोई फिल्म. फिर भी कोई देखे ना देखे...आधे घंटे में ही उसे लगने  लगता सबकी नज़र उन दोनों पर ही है और वो पराग को ,वहाँ से उठने को मजबूर कर देती. अब इस नई मिली नौकरी ने या अजनबी शहर  के खुले माहौल ने या फिर इस नए उगे अहसास ने पराग को बेहद बेतकल्लुफ बना दिया था. हाथ तो उसका थामे ही रहता...कभी कंधे से घेर लेता...कभी बैठे बैठे कंधे पर सर टिका देता. पर उसकी झिझक नहीं टूटती , वो उसे परे धकेल देती और पराग नाराज़ हो जाता ," किसी गाँव की लड़की जैसा बिहेव करती हो तुम"

"हाँ ,तो.... तुम्हे किसने रोका है....चुन लो कोई मेट्रो वाली..."

" ऑफिस में एक से एक चिक्स हैं, बिलकुल बौम्ब्शेल्स ...चैलेंज मत करना "

"चैलेंज ही सही....मेरी तरफ से आज़ाद हो.."..फिर हंस कर आगे  जोड़  देती..."क्या सोचा मेरे ऑफिस में कूल हैंडसम डूड्स नहीं हैं...दे दूँ लिफ्ट??"

और वह गंभीर हो जाता...."संभल कर रहना...यहाँ के लड़के बड़े फास्ट होते हैं...तुम्हे लगेगा तुम्हारी बहुत हेल्प कर रहें  हैं..लेकिन बिना मतलब के कोई कुछ नहीं करता ."

वो हंस देती.."रिलैक्स बाबा...इतनी बच्ची नहीं हूँ मैं..."

पराग की पजेसिवनेस कभी अच्छी भी लगती कभी, उसे खीझ  भी होती..किसी  सोशल नेटवर्क पर उसे अपनी सिंगल फोटो नहीं डालने  देता, कहता ..."तुम्हे इस साइबर वर्ल्ड के बारे में कुछ नहीं पता..."

उसे हंसी आ जाती ,वह बार बार भूल जाता है कि दोनों क्लासमेट रहें हैं...वो उसकी  जूनियर नहीं है..पर उसका इतना केयर करना उसे अच्छा भी लगता और वो उसकी पसंद के खिलाफ कुछ भी नहीं करती .एक कैफे की कॉफी उसे बहुत पसंद थी..पर वहाँ  लड़कों का एक ग्रुप रेगुलर था जो  अक्सर उसे घूरा करता. वो तो नज़रंदाज़ कर देती पर पराग असहज  हो जाता और फिर बैन ही कर दिया वहाँ जाना.

ऑफिस के कलीग्स... वहाँ की पोलिटिक्स, डिस्कस करते दिन बीत रहें थे. अभी खुद के भविष्य की  योजनाओं के बारे में बात करने का  ध्यान ही नहीं होता.  पहली बार हाथ में आए इतने पैसे...नई  मिली आज़ादी को भरपूर एन्जॉय कर रहें थे, दोनों .ऐसे में पराग के एक मौसेरे भाई का कॉल आया कि दूसरे शहर में एक बहुत अच्छी कम्पनी में उसका इंटरव्यू फिक्स कियाहै.

 जाते वक़्त थोड़ा आशंकित था,पर उसे वह जॉब मिल गयी. फोन पर तो जैसे ख़ुशी छलकी पड़ रही थी. उस से ज्यादा बात भी नहीं की,उसे घर-परिवार और दोस्तों से ये  ख़ुशी बांटनी थी. और उसे सब विस्तार से जानने की उत्कंठा हो रही थी.इसीलिए आज ऑफिस की छुट्टी कर रूम पर ही बुला लिया.
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उसके हाथ तेजी से चल रहें थे,पर काम ख़त्म ही नहीं हो रहा था. सबकुछ व्यवस्थित कर सफाई करने को झाड़ू उठाया ही था कि लैंड लेडी आ गयी. शायद सुबह नाश्ता देने आई , मौसी  ने जाकर उन्हें, उसके ऑफिस ना जाने की बात बता दी थी. यह तो उसने सोचा ही नहीं था. उसे काम  करते देख, वे हतप्रभ रह गयी, "अरे तुम बीमार हो ना...ये सब क्या कर रही हो?"

उसने धूल से अटे बालों को चेहरे से हटाते हुए किसी तरह कहा..."वो दवा ली ना, तो अब काफी ठीक लग रहा है...सोचा जरा कमरा साफ़ कर लूँ...बहुत गन्दा हो रहा था.."

"ओह..और मैने सोचा देख आऊं...कहीं डॉक्टर की जरूरत तो नहीं...चलो, अच्छा है..मुझे भी बाहर जाना है...अब निश्चिन्त से जा  सकूंगी...यू  सीम औलराईट नाउ"

"येस्स  आंटी...थैंक्स अलॉट "

"ये सब छोडो...मौसी  को बुला लेना एक दिन..हेल्प कर देगी ,सफाई में ...मैं शाम तक लौटूंगी"

"ओके आंटी...बाय "

"बाय ..बट यू मस्ट टेक रेस्ट ...."

'आई विल आंटी..डोंट वरी"

वो गयीं तो जान में जान आई उसकी और वो झाड़ू लिए ही गोल गोल घूम गयी...' यिप्पीsss..अब कोई सफाई नहीं देनी पड़ेगी उसे...आंटी तो है ही नहीं...'

फिर जो घड़ी पर नज़र गयी तो जल्दी जल्दी सफाई में जुट गयी. सब कुछ साफ़ कर दोनों बेड पर साफ़, चादर बिछा ,जब एक कोने में खड़े होकर पूरे कमरे को निहारा तो संतोष से भर गयी. कमरा एकदम किसी होटल के कमरे की तरह चमक रहा था. बस  रूम फ्रेशनर की भीनी भीनी खुशबू और एक ताजे फूलों के गुलदस्ते की कमी थी.

पर जब अच्छे से चादर टक किए बिस्तर पर नज़र गयी तो अजीब सी अनुभूति हुई ,एकदम इनवाईटिंग सा लग रहा था. उसने दौड़कर जल्दी से कुछ किताबें उठा कर बिस्तर पर डाल दीं ...फिर भी काफी जगह खाली थी...कबर्ड से अपना पर्स ला...एक तरफ गिरा कर  रख दिया और पर्स का जिप खोल..कुछ चीज़ें यूँ ही बिखेर कर रख दीं.

शीना के बिस्तर पर नज़र गयी तो अभी अभी इतनी मेहनत से  तह किए उसके कुछ कपड़े आलमारी से निकाल  कर रख दिए  और तकिये को लापरवाही से बीच  में डाल दिया ..और संतुष्ट हो गयी...'हाँ ,अब ठीक लग रहा है.'

जल्दी से नहाने को, बाथरूम में भागी...गीले बाल पीठ पर छितराए, कबर्ड से कपड़े ढूंढ रही थी,क्या पहने..सोचा..'चूड़ीदार  कुरता' पहन ले...फिर लगा ना..बड़ा घरेलू माहौल जैसा लगेगा. कपड़े ढूंढते वो टॉप हाथ में आ गयी,जिसे पराग के साथ ही ख़रीदा था. और इतनी फिटिंग टॉप पर पराग ने आपत्ति की थी, " अब कॉलेज में नहीं हो...ऑफिस में हो ,जरा सोबर कपड़े पहना करो.."

गुस्से में जबाब दे तो दिया था, "मुझे ज्यादा पता है....क्या पहनना है क्या नहीं " पर सोचने लगी थी,'पराग..तुम भी....तुम भी,बिलकुल आम लड़कों जैसे ही निकले. सब, बगल से जींस में गुजरती लड़की को पलट कर जरूर देखेंगे ,पर अपनी गर्लफ्रेंड एकदम सीधे सादे  कपड़ों में  चाहिए. एक मन हुआ वही पहन ले..फिर लगा...ना वो खुद ही  अनकम्फर्टेबल हो जाएगी...और बिना ज्यादा सोचे एक 'राउंड नेक' की टी शर्ट निकाल कर पहन ली.

अभी बाज़ार भी जाना था, पराग की फेवरेट चाइनीज़ पैक करवा कर  लाने. औरेंज जूस भी लेती आएगी. फ्रिज नहीं होना अखर,गया ..वरना उसकी फेवरेट ब्लैक करेंट आइसक्रीम भी ले आती. पूरी ट्रीट हो जाती ,पराग की

अभी बाज़ार में ही थी कि पराग का फोन आ गया, बस पहुँचने ही वाला है. जल्दी से घर की राह ली. अभी पांच मिनट भी ना बीते होंगे कि कंधे पर  एयर बैग लटकाए,पराग आ गया.बिखरे बाल, अन्क्रीज़ड शर्ट, बिलकुल कॉलेज वाला लापरवाह पराग लग रहा था,वरना आजकल तो फार्मल कपड़ों और चमचमाते जूतों में कोई और ही पराग दिखता था.

आकर धम्म से कुर्सी पर बैठ गया..."वाऊ... ग्रेट....इतने बड़े कमरे में बस दो जन रहते हो...हमलोग तो पांच टिक जाते....जरा पानी पिलाओ यार...रखा भी है या नहीं..."

और जब उसने मिनट्स की बोतल  पकडाई...तो मुस्कुरा पड़ा..."क्या बात है..एकदम मेहमान नवाजी हो रही है"

"मेहमाननवाज़ी कैसी...लम्बा सफ़र करके आ रहें हो....चाइनीज़ भी पैक करा कर ले आई हूँ "

"हम्म...ये सब तुम लड़कियों से हमलोग नहीं सीख सकते...हर चीज़ का ध्यान रहता है..."

"वो सब छोडो बताओ तो सही.... क्या हुआ..कैसा रहा..इंटरव्यू...एकदम से कैसे ज्वाइन करने को कह दिया..."

"अरे उन्हें जरूरत है भई....वेकेंसी है और फिर चन्दन भाई की रेकमेंडेशन ...बात कैसे नहीं बनती...." और उसने विस्तार से एक एक बात बतानी  शुरू की...पर हर लाइन के बाद...'ओह! मैने इस शहर में रहने का सपना देखा था....बस देखना अब दो साल में यू.एस. निकल  जाऊँगा . ...आगे बढ़ने के ,बहुत औपर्चुनीटीज़ हैं, वहाँ . फिर उसी शहर में चन्दन भाई भी हैं और पता है....वो मेरे सीनियर निखिल, रौशन और क्लासमेट....अवनीश,समित,कँवल...सब उसी शहर  में हैं...वी विल हैव अ ग्रेट टाइम ...देखना कितना मजा आएगा...खूब पार्टीज़ ,पिकनिक किया करेंगे सब मिल कर.
'एंड यू नो वाट....एकदम ऑफिस के सामने ही फ्रेंच क्लासेज़ ...मैने तो पता कर लिया है...वीक में दो दिन ,शाम ८ बजे की क्लास हैं...ऑफिस से सीधा वहाँ ....कब से मेरा  फ्रेंच सीखने का मन था..." बीच बीच में औरेंज जूस के घूँट भरते  जाता....उस से एक बार भी नहीं पूछा...उसे नहीं चाहिए..पर पूछना तो चाहिए आखिर इक बार. अभी बताती है उसे..और जब...बिलकुल थोड़ी सी बची थी उसने फिर से बॉटल मुहँ से लगाई तो वो बोल पड़ी..." अरे थोड़ा सा मेरे लिए भी रहने देना..."

तबतक तो बॉटल खाली हो चुकी थी...पराग ने खाली बॉटल हवा में लहराते हुए कहा.."सॉरी...ख़तम हो गयी...पहले बोलना था,ना "

"तुम्हे भी तो पूछना चाहिए था...एक बार....सारी ख़तम कर दी.."

"अब ये सब उम्मीद मुझसे मत  रखो...चाहिए तो साफ़ बोल दो..मैं अन्तर्यामी नहीं कि मन की बात समझ जाऊं..."

"समझनी  चाहिए...." उसे गुस्सा आ रहा था...जब से आया है...अपनी हांके जा रहा है...उसकी योजनाओं में वो तो कहीं शामिल है ही नहीं. उसका क्या होगा?....उनकी रिलेशनशिप का क्या होगा?...उसकी नौकरी तो यहाँ है.

और उसे थोड़ा और चिढाने को , शायद पराग ने बॉटल  बेड के नीचे लुढका दी...."पराग...."...वो गुस्से से चीख ही पड़ी..."ये तुम्हारा कमरा नहीं है.."

पता है..वरना इस चेयर पर बैठने की  पनिशमेंट क्यूँ भुगतता...बेड पे नहीं पसर गया होता अब तक ?? .क्या कबाड़ पसार कर रखा है बेड पर.....और हम लड़कों को कहती हो....क्या यार एक सोफा तक नहीं है...साथ बैठ तो सकते थे, कम से कम...वी शुड मेक मोस्ट ऑफ इट यार...ये बंद कमरा..."
 "शट  अप...."बीच में ही डपट दिया उसने.

उसकी इन बातों से उसे सचमुच डर लगने लगा था.

चुप रही तो...पराग ने मनाने की गरज से बोला..."ले आऊं क्या बाहर से औरेंज जूस?.....इतना मुहँ फुला लिया..."

"अरे नहीं....वो तो मैं बस तुम्हे चिढ़ा रही थी..." हंसी आ गयी उसे..."कब तक ज्वाइन करना है वहाँ....?"

" महीने भर का टाइम माँगा है मैने...यहाँ भी तो नोटिस देनी पड़ेगी....और अब पैरेंट्स से बात कर लो...ज्यादा देर नहीं करनी..तुम्हे भी वहीँ आना होगा..यार, इतना अच्छा पैकेज है..तुम ना भी करो नौकरी...तो चलेगा...आराम से कटेगी.."

"व्हाट डू यू मीन....नौकरी ना  करो ...मैने भी तुम्हारे जैसे ही मेहनत से पढाई की है..."

"ओके..बाबा...ओके..सॉरी..इट वाज़ जस्ट अ थॉट...तुम्हे क्या मुश्किल होगी नौकरी मिलने में...वेल क्वालिफाइड हो, वर्किंग इन अ टॉप कम्पनी., कॉन्वेंट एडुकेटेड ....फ्लुयेंट इंग्लिश है...और...और ख़ूबसूरत भी हो..."शैतानी से एक आंख दबा दी ,पराग ने ...और उसने पास से एक किताब उठा कर फेंक कर मारी उसे..."ये मेंटालिटी है तुम्हारी??"

"अरे जस्ट जोकिंग यार...समझा करो..बट सीरियसली....इन नो टाइम यू विल लैंड विद अ गुड़ जॉब.....बट पैरेंट्स से बात तो करनी  होगी,ना..मेरी तरफ से सब क्लियर है..बचपन से ही  पैरेंट्स मेंटली प्रिपेयर्ड  हैं...हमेशा कहते थे.."ये तो कभी भी किसी को मिलवाने ले आएगा...हमें इसके लिए लड़की नहीं ढूंढनी पड़ेगी."

"क्या बात करूँ मैं...तुमने प्रपोज़ तक तो किया नहीं अब तक...." उसने भी हंस कर माहौल  हल्का करने की कोशिश की.

"रियली??...करूँ प्रपोज़?...पर मेरा तरीका जरा जुदा होगा..." शरारत उतर आई थी उसकी नज़रों में और वह एकदम से खड़ी हो गयी..."अब सर्व करती हूँ......चाइनीज़ ठंढा हो जायेगा तो बिलकुल मजा नहीं आएगा..."

उसकी हडबडाहट पर हंस पड़ा,पराग.."चिल बेबी..यू विल बी सेफ..डोंट वरी.."

खाते हुए भी उसकी अपनी कहानी ही चलती रही...भविष्य की ढेरो योजनायें...क्या..क्या..कब..कब करना है. खाते ही वह उठ खड़ा  हुआ..."अब रूम पर जाकर सोऊंगा....बहुत थक गया हूँ..."

वह थोड़ी निराश हो गयी...अभी तो आधा दिन बाकी है...क्या करेगी वो...सोचा था...आज तो देर तक गप्पें मारेगी...लैंड लेडी का भी डर नहीं . पर वो नहीं कहेगी रुकने को...उसे उसका ख्याल नहीं कि अकेले वो क्या करेगी...तो वो क्यूँ ध्यान दिलाये.

पर जाते हुए ...अचानक दरवाजे  से पलट कर पराग ने उसे बाहों में ले लिया....इस अप्रत्याशित प्रेम प्रदर्शन के लिए वह तैयार नहीं थी .उसकी बॉडी बिलकुल स्टिफ हो गयी तो उसकी आँखों में देख मुस्कुराते हुए बोला..."इतने से डर गयी...अभी तो मैं बहुत कुछ करने वाला हूँ"...अब उसकी सांस भी रूकती सी लगी..तो हंस कर पराग ने उसे रिलीज़  कर दिया और बोला..."प्लीज़...अब तैयारी कर लो  तुम भी...मैं वहाँ अकेला नहीं रह पाऊंगा "

पराग के जाने के बाद कुछ देर तो वो वैसे ही निश्चल खड़ी  रही. उसकी गर्म साँसे अब तक कंधे पर महसूस हो रही थीं. एक स्ट्रोंग मैस्क्युलिन स्मेल ने घेर रखा था...सर भारी हो गया.... पानी की बोतल थामे ताज़ी हवा लेने को खिड़की के पास आ गयी. परदे सरका दिए.

ठंढी हवा से ,कुछ दिमाग क्लियर हुआ तो बहुत सारी बातें क्लियर होने लगीं......पराग बहुत खुश है....सपनो का शहर, अच्छी नौकरी, पुराने दोस्त, फ्रेंच क्लासेज़ ..पर इन  सबमे वो कहाँ है?...साथ रहने का सपना तो दोनों ने साथ देखा था पर यहाँ ,वो पराग के सपनो के साथ खड़ी थी और उसके सपने? उसकी ट्रेनिंग पीरियड पूरी हो गयी है और अब वो पे रौल पर आ गयी है. ऑफिस में एक जगह बना ली है और सब छोड़ वो एक अनिश्चितता की तरफ कदम बढ़ा दे? फिर से एक बार नई शुरुआत. और कह देना आसान है...मन लायक जॉब मिलती है क्या इतनी आसानी से?

एक ही  शहर में पराग की  जॉब के लिए रोज भगवान के सामने हाथ जोड़े थे. आज ऑफिस से छुट्टी ली, फ्रेंड से झूठ बोला, लैंड लेडी कहीं रूम खाली करने को ना कह दे...ये रिस्क लिया, सुबह से सफाई में जुटी है, उसकी फेवरेट डिश लेकर आई, उसकी पसंद के कपड़े पहने. उसकी सारी सोच की केंद्र में पराग था और पराग की सोच में? उसने तो एक बार पूछा भी नहीं कि वो, वहाँ जाना चाहती भी है या नहीं? उसकी तरफ से फैसला कर लिया. प्यार सम्पूर्ण समर्पण  मांगता है तो क्या बस उस से ही अपेक्षित है यह? कितनी आसानी से पराग ने कह दिया..."अच्छा पैकेज है,नौकरी ना करो तब भी चलेगा".. लड़की नौकरी तभी तक करे, जब तक आर्थिक रूप से सहायता की जरूरत हो. आर्थिक रूप से सक्षम होते ही, उसे बस 'वाल फ्लावर' ही बनना  है. उसकी पढ़ाई...उसकी क्षमताओं का क्या...त्याग की अपेक्षा बस उस से ही, क्यूँ? ..क्या बदल गया है. यह भी सदियों पुरानी परंपरा सा नहीं ,कि लड़की  सबकुछ छोड़ कर लड़के के साथ चल दे और उसके सपनो को ही अपना मान ले. क्यूंकि वो उसके बिना जी नहीं पायेगा...लेकिन वो तो कितनी चीज़ों के बिना नहीं जी पायेगा...फिर से सर पर भारीपन तारी होने लगा.

'विमेन एम्पावरमेंट ' का पक्षधर....नारी के सम्मान की बात करने वाला..घंटो 'विडो के कंडीशंस ', 'डोमेस्टिक वायलेंस' पर आग उगलने वाले शख्स को नारी मन की कितनी समझ है?

सुबह का सारा उत्साह कपूर की मानिंद उड़ चुका था. कंधे झूल आए. बेहद थका  सा महसूस करने लगी. खिड़की के बाहर तेज आंधी चलने  लगी थी. धूल के गुबार और सूखे पत्ते उड़ने लगे थे. उसने खिड़की बंद कर दी. पर मन  में चलती आंधी का क्या...उन्हें बंद करने को कपाट कहाँ से लाए.

(समाप्त )