Monday, July 26, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -12)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर वह भी, उसके पिता के पैसों से अब विदेश चला गया)

गतांक से आगे

कॉलेज जाने के साथ ही वे नमिता में परिवर्तन देख तो रही थीं. अब ये उम्र का प्रभाव था या कॉलेज जाने का या फिर घर में टी.वी. आ जाने का .पर वह अब अपने रख रखाव के प्रति सजग दिखती थी.वरना पैरों में चप्पल पहनने के लिए कितनी डांट सुनती  थी. डांटने पर, घर से तो पहन कर निकलती पर किसी पेड़ के नीचे छोड़ कर आ जाती. बालों में तेल डालने को चोटियाँ बनाने को हमेशा, उसे घेर कर बिठाना पड़ता पर अब पेड़ पर चढ़ना,पुआल के ऊँचे ढेर पर बैठ ईख चबाना तो नहीं छूटा  पर पैरों में चप्पल अब नहीं भूलती  वह. उन्हें वह नज़ारा भी नहीं भूलता,जाड़ों की धूप में नमिता उसी  पुआल के ऊँचे ढेर  पर बैठी,ईख चबाती, हर आने जाने वालों से जोर जोर से बतियाती रहती...किसी के कंधे पर पड़े गमछे के एक किनारे पर बंधी पोटली को देख टोक देती, "क्या काका,लाई कचरी ले जा रहें हो मुनिया के लिए?" और मीरा उसी पुआल के ढेर के नीचे अधलेटी सी दिन-दुनिया से बेखबर किसी किताब में खोयी होती.

एक दिन उन्होंने नमिता के हाथों के लम्बे नाखून देखे और चौंक पड़ी,"अरे चलो तुम्हारे नाखून काट दूँ, इतना भी होश नहीं इस लड़की को".

"मैं खुद काट लूंगी" नमिता टाल गयी.

इस पर मीरा हंस पड़ी, " माँ ,दीदी ने फैशन में नाखून बढाए हैं,

" नाखून तो बस चुड़ैलों के लम्बे होते हैं,ये चुडैलों वाला कौन सा फैशन आ गया ?" उन्हें  आश्चर्य हुआ.

" हा हा...चुडैलों का फैशन..माँ ,टी.वी. में नहीं देखा...अच्छा रुको तुम्हे किसी पत्रिका में दिखाती हूँ..." मीरा  हंसी से लोट-पोट हो रही थी.

और उन्हें अब माजरा समझ में आया कि नमिता लालटेन,लैम्प साफ़ करने से क्यूँ कन्नी कटाने लगी है,आजकल. गाँव में बिजली थी पर फिर भी नियम से कलावती,लालटेन और लैम्प के शीशे साफ़ किया करती थी .क्यूंकि शाम होते ही जो बिजली जाती वह सुबह चार-पांच बजे आया करती. लेकिन नमिता को उसका काम पसंद नहीं था और अम्मा जी के जमाने से ही यह काम उसने अपने जिम्मे ले लिया था. बाल्टी में सर्फ़  घोल कर सारे लालटेन लैम्प के शीशे ऐसे चमकाती की झक झक रोशनी निकलती उनसे. शाम होते ही अम्मा जी सारे लालटेन,लैम्प जलातीं और किसी बच्चे को आवाज़ देती,सांझ दिखाने को. अम्मा जी के गुजर जाने के बाद वे ही यह काम करतीं और उनकी आँखें  भर आतीं,बरसों से अम्मा जी का यह नियम था. पर शाम का ख़याल कर वे अंदर ही अंदर आँसू पी मीरा को आवाज़ देतीं.

मीरा लालटेन ले घर के हर कमरे में, कोठी और गोदाम वाले कमरे में भी सांझ दिखा आती.फिर बाहर जाकर 'हनुमान जी के पताके' के पास लालटेन रख हाथ जोड़ती. फिर लालटेन को तुलसी चौरा, गाय के बथान, बैलों के पास, उनकी नाद, चारा काटने की मशीन, घूरा (जहाँ अहाते को बुहार कर पत्ते लकड़ी इकट्ठा  किया जाता और उसे जला दिया जाता. जाड़े के दिनों में तो कई सूखी लकड़ियाँ, टूटी टोकरी सब इकट्ठा कर जलाया  जाता,और आस-पास के लोग जमा  हो आग तापते और किस्से कहानियाँ सुनाया करते एक दूसरे को.) सब  जगह दिखा आती.

पर आजकल अपने  हाथों और नाखून का ख्याल कर नमिता ने लालटेन और लैम्प की कालिख साफ़ करनी बंद सी कर दी  थी और आजकल गाँव में काम करने वालों का मिलना भी मुश्किल हो गया  था. अब नई उम्र के लड़के सब पंजाब और असाम कमाने जाने लगे थे और वहाँ  से पैसे भेजते .अब उनके घर मे भी चौकियां थीं, सब मच्छरदानी लगा के सोते, ट्रांजिस्टर पर गाना बजता रहता. और उनकी पत्नियां अब काम नहीं करती. बगीचे से जलावन भी इकट्ठा नहीं करतीं बल्कि जलाने की लकडियाँ भी पैसे देकर खरीदतीं.वरना पहले किसी को भी आवाज़ दे, ये छोटे मोटे काम करवा लिए जाते थे और बदले में थोड़ा अनाज भी  दे दिया जाता था.

इन सबके साथ ,नमिता की नीना से दोस्ती भी बढती जा रही थी. शहर  से आई नीना की दोस्ती का भी असर लगता ये सब. वरना नमिता जैसी लड़की खुद आगे बढ़कर , नीना से सखी लगाने को कहती,कभी?

सावन में एक ख़ास दिन गाँव की लडकियाँ जिसे पक्की सहली बनाना चाहतीं. उस से  चूड़ी, रिबन, नेलपॉलिश के उपहार की अदला बदली करतीं और फिर एक दूसरे को किसी फूल के नाम से पुकारतीं. एक दूसरे का नाम नहीं लेतीं. ज्यादातर लड़कियां एक दूसरे को गुलाब,चमेली,जूही, जैसे नामों  से बुलातीं . पर नमिता ने कभी किसी को ख़ास सहेली नहीं बनाया.लड़कियां उस से सिफारिश करतीं,

"चाची  उसे कहिये ना...मुझसे सखी लगाए"

"मुझे नहीं अच्छा लगता ये सब.....आज सखी लगाती हैं और कल लड़ाई हो जाती है तो उसी का नाम लेकर जोर जोर से चिल्लाती है" वह हाथ में कोई छड़ी या रस्सी का टुकड़ा लहराते हुए बोलती और गिल्ल्ली डंडा खेलने भाग जाती.
वही नमिता आज खुद से कह रही थी, "माँ इस सावन में नीना से सखी लगाऊं?"

नीना अच्छी लड़की थी,कई बार अपने भाई के साथ मोटरसाइकिल पर उनके घर आ चुकी थी. भाई छोड़कर तो चला जाता पर जब उसे लेने आता तो तीनो काफी देर तक बाहर बातें करते रहते या बाग़ में घूमने चले जाते.यह सब उन्हें नहीं सुहाता. उसकी नौकरी लग गयी थी लेकिन अभी इंजीनियरिंग का रिजल्ट नहीं आया था. वह गाँव में रहकर अपने रिजल्ट का इंतज़ार कर रहा था. अक्सर ही नीना को छोड़ने लेने आ जाता. और अब अगर 'सखी लगाने की इजाज़त दे दी ,तब तो आना जाना और बढ़ जायेगा.पर मना भी कैसे करें?

पति को यह परिवार ख़ास पसंद नहीं था,एक तो वे लोग बैकवर्ड जाति से थे,दूसरे नीना के पिता, पति के सहपाठी थे. किसी तरह खींच-खांच कर पास होते थे पर रिजर्वेशन के बल पर अच्छी नौकरी पा गए थे और अब बड़े अफसर बन चुके थे. पति को यह बात खलती थी.

कुछ ऐसा नज़र भी नहीं आ रहा था कि वह नमिता को उसके घर जाने से रोकें, वैसे भी कॉलेज के रास्ते में ही नीना का घर था. अब नमिता ने इंटर पास कर बी.ए. में एडमिशन ले लिए था और उनकी व्यग्रता अब बढ़ने लगी थी,पति से कहतीं कि लड़का देखना शुरू करिए, मनपसंद लड़का ढूँढने में समय भी तो लगना था. ममता और स्मिता का हाथ तो, मांग कर ले गए. पर अब वह पहले वाला ज़माना नहीं रहा. रिश्ते अब सिक्कों में तुल रहें थे और अब उनलोगों  के पास ज्यादा पैसे भी नहीं थे.

पर पति यह बात समझते नहीं,उन्हें कोई भी लड़का पसंद नहीं आता. कही लड़के का रूप, तो कहीं नौकरी और कहीं उसका घर. जहाँ सब कुछ पसंद आता वहाँ, दहेज़ की इतनी मांग होती कि उसे चुकाना उनके सामर्थ्य के बाहर की बात थी. एक बेटा तो विदेश ही चला गया था और एक अपनी गृहस्थी में मस्त था. दो अनब्याही बहनें घर बैठी हैं,इसकी कोई चिंता ही नहीं. प्रकाश,एक बेटा और एक बेटी का बाप भी बन चुका था. दोनों के जन्म पर वे गयी थीं.पर मेहमान सी ही रहीं. बहू के मायके के लोगों  का ही दबदबा था. बच्चे के लिए शौक से ले गयी चीज़ों को भी निकालने में उन्हें हीनता महसूस होती. किसी तरह रस्म निबटा चली आयीं वापस. बहू भी गाँव में दो दिन से ज्यादा नहीं  रूकती,गर्मी, मच्छर,ठंढ का बहाना बना वापस चली जाती.

पति निश्चिन्त थे कि उनकी बेटियाँ भाग्य्वाली हैं, अच्छा लड़का, घरबार मिल ही जायेगा.पर उन्हें बेटी में आते  परिवर्तन के लक्षण कुछ अच्छे नहीं लग रहें थे.. घंटों अँधेरे में बैठी गाने सुनती रहती. एक दिन तो वे कमरा बंद कर रही थी कि कहीं बिल्ली आकर दही ना खा जाए तो बोली..'माँ, मैं अंदर ही हूँ." खिड़की से थोड़ी चांदनी छिटक कर कमरे में फैली थी और वह उसी में गुमसुम बैठी,खिड़की से चाँद निहार रही थी. एकदम डर गयीं वे. दूसरे दिन ही गोपाल जी, जो उन्हें ख़ास पसंद भी नहीं थे, से कहा," आप ही जरा अच्छे लड़के का पता कीजिये"  पर बात पैसों पर आकर रुक जाती, शादी का खर्चा,दान -दहेज़ सब कैसे पूरा होगा. अब अच्छी जमीन भी नहीं बची थी जिसे बेच कर सारे खर्चे पूरे किए जाएँ.

पति कहते, दो  साल में मैं रिटायर हो रहा हूँ, बस उसके बाद जो  पैसे मिलेंगे. उस से एक का ब्याह तो निबट जाएगा.पर उनका दिल धड़कता रहता इस बीच कोई अनहोनी ना हो जाए कहीं.

नीना के पिता का ट्रांसफर हो गया . नीना भी बी.ए. के इम्तहान तक रुकी थी, उसके बाद उसका परिवार वहाँ से चला गया तो उनकी जान में जान आई. दोनों सहेलियां ऐसे गले मिल कर रोयीं  जैसे सगी बहनें भी कभी क्या रोयेंगी.

पर अब तो मुश्किल और बढ़ गयी. नीना के फोन और ख़त आते रहते. जिस तरह से ख़त लेकर नमिता,छत पर भागती,उन्हें शुबहा तो होता ,पर क्या कहतीं. आजतक कभी उसके पत्रों की  जांच-पड़ताल की  ही नहीं. एकाध बार मन कड़ा कर किया भी तो कुछ नहीं मिला. इतने बड़े घर में वो कहाँ छुपा कर रखती,पता ही नहीं चलता. नीना के फ़ोन भी आते और घंटो बातें होती उनकी. कभी दूर से नमिता का लाल होता चेहरा और पैर से जमीन कुरेदते देख वे समझ  जातीं कि फोन पर नीना नहीं है. किसी बहाने कमरे में जातीं तो नमिता अचानक जोर जोर हंस कर बाते करना शुरू कर देती. सब उनकी समझ में आ जाता. एक दिन उन्होंने सोचा, पानी सर से ऊपर जाए इस से पहले , अब नमिता से साफ़-साफ़ पूछ ही लेना चाहिए.

दो तीन दिन यही सोचते गुजर गए कि बात शुरू कैसे  की जाए. और एक दिन यूँ ही तबियत नहीं ठीक लग रही थी और वे अपने कमरे में लेटी थीं कि नमिता आई. उन्होंने कहा, "लालटेन लेती आ, अँधेरे में क्यूँ आ रही है?"

"ना माँ रहने दो...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है ?" नमिता की आवाज़ की गंभीरता से वे चौंक जरूर गयीं,पर कुछ बोलीं नहीं.

उनके पास पलंग पर बैठ,नमिता ने ही शुरुआत की, "माँ, नरेंद्र मुझसे शादी ,करना चाहता है "

"हम्म..."

"जब से उसकी नौकरी लगी है, उसके घर वाले बहुत दबाब डाल रहें हैं, मुझे कब से कह रहा है,तुमलोगों से  बात करने को...पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी."

"नरेंद्र शादी करना चाहता है...और तुम ?"

पर नमिता  चुप रही, अँधेरे में उसका सल्लज चेहरा तो नहीं देख सकी ,पर उसकी ख़ामोशी ने ही सब कह दिया.

"नमिता तुझे पता है,ना...वे लोग अलग जाति के हैं...पापाजी ज्यादा पसंद भी नहीं करते उन्हें...वे मानेंगे??"

"माँ,  भैया लोगों की शादी भी तो हमारी जाति में नहीं हुई "

"हम्म ..." वे कैसे बताएं कि उनके पैसों की चमक में उनकी जाति का नाम धुंधला पड़ गया था .

" बड़के भैया को तो पापाजी ने मना नहीं किया...और छोटके भैया की शादी के लिए तो खुद ही, हाँ कहा....और माँ तुमको पता है,नरेंद्र भी इंजिनियर है,अच्छी कंपनी में काम  करता है....फिर क्यूँ मना करेंगे?"

"मैं बात करती हूँ..." उन्होंने कह तो दिया पर आशंका थी कि पति को मना पाएंगी या नहीं.

"माँ आज ही करना..नरेंद्र बहुत परेशान है...उसके परिवार वाले उसकी शादी के पीछे पड़े हैं....यहाँ से  हाँ हो तब वो अपने घर में बात करे" नमिता ने कहा और बाहर चली गयी.

उन्होंने भी सोचा दुविधा में रहने से क्या फायदा....और उसी रात पति से कह डाला पर  जो हुआ उसकी अपेक्षा तो उन्होंने कभी नहीं की थी. शांत-चित्त ,किताबों में खोये रहने वाले, मित-भाषी पति का ऐसा रौद्ररूप पहली बार देखा. चीखने -चिल्लाने लगे,  "सब तुम्हारी शह है....इस लड़की के लच्छन तो शुरू से ही नज़र आ रहें थे.जब देखो..पूरे गाँव में घूमती रहती थी और अब ये हाल है...तुम्हे तो नज़र रखना चाहिए था...अब भुगतो, अपनी छूट का नतीजा. मैं तो दिन भर घर से बाहर  रहता हूँ, एक लड़की नहीं संभाल सकी तुम"

"अरे धीरे बोलिए..."

"क्या बोलूं धीरे...अब कल को गाँव में फैलेगी ये बात,कहीं मुहँ दिखाने के लायक नहीं रहेंगे...जमीन-जायदाद गयी, बाग़-बगीचे गए...एक इज्जत बची थी ,उसे भी यह लड़की नीलाम करने पर तुली है"

"इज्जत क्यूँ नीलाम होगी...अगर बाजे-गाजे से लड़की को विदा करेंगे तो...किस का मुहँ रहेगा, कुछ कहने का...आखिर प्रकाश, प्रमोद की शादी भी तो दूसरे जात में हुई."

"वे हमारे बराबर की जात के थे...और उनकी लड़की लेकर आए हम..अपनी लड़की नहीं दी...और वो भी उस छोटी जात में...ये कब्भी नहीं होगा...कह दो उसे...हाथ-पैर तोड़ के घर में बिठा दूंगा ....नहीं तुम क्या कहोगी...तुम्हे समझ होती तो बेटी को संभाल कर नहीं रखती...बुलाओ उसे...नमिताss...नमिताsss..." जोर से गरजने लगे.

नमिता आई और सर झुका कर खड़ी हो गयी,पर कंधे बिलकुल तने हुए थे. मीरा भी उसके पीछे कांपती हुई सी  आकार खड़ी हो गयी.

"इसीलिए तुम्हे कॉलेज भेजा?....मैं उतनी दूर भेज सकता हूँ तो कमरे में बंद करके भी रख सकता हूँ...खबरदार जो तुझे देखा है, घर से बाहर कदम रखते...यही सब देखना बाकी था खानदान की इज्ज़त मिटटी में मिला दी..." पति गुस्से से काँप रहें थे.

"जब भैया लोगों  का दूसरी जात में ब्याह हुआ तब खानदान की इज्जत नहीं खराब हुई.??." नमिता ने  सर झुकाए ही पर सधे शब्दों में कहा .और पति गुस्से से पागल हो उठे.

"जुबान चलाती है....बाप को जबाब देती है...हाँ कॉलेज में पढ़ी , है ना...यही सीखा है...देखता हूँ  मैं भी..ये सब टेलीफोन और टी.वी का असर है...देखता हूँ अब कौन इस घर में टी.वी. देखता है. अभी फोड़ देता हूँ टी.वी. ....कहाँ है टेलीफोन मैं अभी तार काट देता हूँ..."और दूसरे कमरे की तरफ बढे. उन्होंने रोकना चाहा तो इतनी जोर से उन्हें  धक्का दिया कि गिरते गिरते बचीं. मीरा रोती हुई उन्हें आकर संभालने लगी. नमिता वैसे ही सीधी अपनी जगह पर खड़ी रही.

पति ने टेलीफोन के तार खींच कर निकाल डाले...टी.वी. के तार नोच डाले. फिर हताश पलंग पर गिर पड़े.

वे डर के मारे दूर ही बनी रहीं. दोनों लडकियाँ भी अपने कमरे में  चली गयीं. वे समझ रही थीं, पति की हताशा ये सब हरकतें करवा रही थी,उनसे. लड़कों को पढ़ाने में  जमीन-जायदाद बिक गए. लड़के अपनी गृहस्थी में मगन थे. दो अनब्याही लडकियाँ घर बैठी थीं. अच्छा लड़का वे खोज नहीं पा रहें थे, रिटायरमेंट का समय नजदीक आ रहा था. मन में चल रही यही सब परेशानी लावा बनकर फूट निकली और बहाना नमिता बन गयी.

दोनों लडकियाँ अपने कमरे में चली गयीं. आज तो चार जोड़ी आँखें छत देखते ही रात बिताने वाली थीं.

दूसरे दिन पति ने हमेशा की तरह, सुबह सब्जियों की क्यारियाँ ठीक की..पीले पत्ते तोड़े..फिर नहा-धोकर  बिना खाना खाए स्कूल चले गए. मीरा ने देखा और उन्हें आश्वस्त किया, "माँ वे चपरासी से मँगा कुछ खा लेंगे...तुम चिंता मत करो...मुझे खाना दो...कॉलेज के लिए देर हो रही है" बेटियाँ बिना बोले ही समझ जाती हैं, माँ के दिल का दर्द.

नमिता अब तक बिस्तर से उठी नहीं थी. सो तो क्या रही होगी. वे पास में बैठ  उसका सर सहला कर उठाने लगीं .वह उनका हाथ झटक कर पलंग से उतरी और कमरे से बाहर चली गयी. मन रुआंसा हो गया, दोनों उस पर ही गुस्सा हैं..... जबकि दोनों तरफ से वे ही बात संभालने की कोशिश कर रही हैं. फिर मन को समझाया ,आखिर किस पर गुस्सा उतारेंगे ये लोग,जिसे अपना समझेंगे उसी पर,ना. अब राह चलते लोगों पर तो  गुस्सा नहीं उतार नहीं सकते.

घर में शान्ति छाई रहती, पति फिर समय से खाना खाने लगे थे. पर बात बिलकुल नहीं करते. बस अखबार और  किताबें पढ़ते रहते. नमिता भी घर से बाहर नहीं निकलती,  दिन भर छत वाले कमरे में  रेडिओ लिए पड़ी रहती. खाना भी बस टूंगती  भर. टेलीफोन और टी.वी. के तार वैसे ही नुचे हुए पड़े थे. टेलीफोन की घंटी  ही बजती तो किसी से बात तो होती. टी.वी. भी नहीं चलता. नहीं तो घर के सारे लोगों के एक साथ बैठने का बहाना तो था एक.

सब अपने में गुम से रहते. सिवनाथ माएँ भी टोक देती.".का बात है सबलोग ऐसे चुप्पा काहे लगाए बैठे हो." पर उनकी बात हवा में ही खोकर रह जाती.

चार-पांच दिनों बाद फिर नमिता ने बाहर निकलना शुरू किया तो उन्हें थोड़ी राहत हुई. बाग़,नहर की तरफ कभी मीरा के साथ,कभी अकेली घूम कर आ जाती. एक दो बार उन्होंने उसे समझाने की कोशिश भी की, " हमेशा मनचाहा कहाँ हो पाया है, मुझे नहीं लगता नरेंद्र के घरवाले भी तैयार होते. उन्हें भी अच्छा दहेज़ मिलेगा...वे कब्भी ये मौका नहीं छोड़ेंगे...सबको पैसे का लालच होता है...नरेंद्र भी समझ जायेगा.ये सब बचपना  है, ज़िन्दगी में कई समझौते करने पड़ते हैं." नमिता कुछ जबाब नहीं देती पर उनकी बात भी नहीं सुनती ,वहाँ से उठ कर चली जाती.

गोपाल जी का आना जाना बढ़ गया था और शनिचर, इतवार को पति उनके साथ बाहर चले जाते. उन्हें लग रहा था.अब वे जोर-शोर से नमिता के लड़के के लिए तैयारी की खोज में हैं.पर उन्हें कुछ नहीं बताते और उन्हें गोपाल जी से पूछना अच्छा नहीं लगता.क्या कहते वे कि उन्हें अपने घर की  ही बातें नहीं पता. पर नमिता  के मामले में पति अभी भी उन्हें ही दोषी समझ रहें थे कि उन्होंने ही नज़र नहीं रखी.

नमिता को भी कई बार, पति के ब्रीफकेस के कागज़-पत्तर देखते हुए देखा,उन्होंने. सोचा,चलो अच्छा है, नमिता को भी पता तो होना चाहिए कि कहाँ बात चल रही है. अगर उसे कुछ  नहीं अच्छा लगे तो वो बता सकती  है. पर उन्हें ये नहीं पता था कि नमिता के इन कागजों को टटोलने का कुछ और ही नतीजा निकलेगा.

सुबह की तैयारियों में ही लगी थीं, कि मीरा दौड़ी हुई आई, "माँ....माँ ये देखो..."
उसके हाथों में एक कागज़ था. "क्या हुआ..इतना घबराई हुई सी क्यूँ है...??"

"माँ..माँ दीदी..."और मीरा के आँसू छलक आए.

उनका कलेजा बैठ गया, मीरा का कन्धा थाम लिया.."क्या हुआ....जल्दी बोल.."

"माँ....दीदी, घर छोड़ कर  चली गयी..."

"क्याssss.....    " वे वहीँ जमीन पर ही धम्म से बैठ गयीं.

लिखा है..."माँ, मैने बहुत कोशिश की लेकिन अब और कोई रास्ता नहीं था....नरेंद्र के घरवाले भी नहीं मान रहें. मैं नरेंद्र के साथ, उसकी नौकरी पर  जा रही हूँ.....हो सके तो माफ़ कर देना.' माँ ,बस दो लाइन ही लिखा है "...मीरा के आँसू बह चले.

उसी समय पति सुबह की बागबानी कर अंदर आ रहें थे. उन्हें यूँ जमीन पर बैठे और पास खड़ी रोती मीरा को देख उसके हाथों से कागज़ ले पढ़ा और सर पे हाथ मार वहीँ कुर्सी पर गिर पड़े.

थोड़ी देर बाद उठे और अंदर चले गए , वे घबरा कर पीछे से गयीं तो देखा,पलंग की पाटी पर सर झुकाए हुए हिलक हिलक कर रो रहें हैं. उन्होंने डरते हुए उनके कंधे पर हाथ रखा...तो दिल को चीर कर रख देने वाली आवाज़ में बोले..."इस लड़की ने कहीं का नहीं छोड़ा,ममता की माँ...क्या मुहँ दिखायेंगे हम गाँव में"

वे क्या कहती वे भी रोती हुई पलंग पर बैठ गयीं.

पर उन सबमे मीरा ही सबसे दिलेर निकली. थोड़ी देर बाद कमरे में आई, " इतना रोना-पीटना क्यूँ मचा हुआ है. कोई मर नहीं  गया है, चलो, माँ  हाथ मुहँ धो...पापा जी मैं चाय लेकर आ रही हूँ " और वह चाय बनाने चली गयी.

पति ने कहा, "प्रकाश से बात करता हूँ..." और टेलीफोन के नुचे तार ठीक करने लगे. किसी तरह तार जुड़ा और प्रकाश को फोन लगाया, इतनी  खडखडाहट, कि आवाज़ ना सुनाई पड़े.
प्रकाश ने सुना और  बोला,"पापा जी क्या कर सकते हैं...नमिता २१ साल की हो गयी है. बालिग़ है. हमलोग कुछ नहीं कर सकते...हाँ, समझा बुझा कर घर ला सकते हैं, कहिये तो पता करूँ...कोशिश करता हूँ.पर शादी तो उस लड़के से ही करनी पड़ेगी पर ये है कौन...नमिता कैसे जानती है उसे..."

"उसकी शादी तो  मैं नहीं कर सकता...उस छोटी जाति का लड़का मेरा दामाद बनेगा ...ये मैं नहीं बर्दाश्त कर सकता ....ये लो अपनी माँ से पूछो...इन्हीं के नाक के नीचे सब होता रहा...और इनको कुछ मालूम ही नहीं..खाली खाना बनाने और कपड़ा सहेजने में ही लगी रहीं.." पति ने हिकारत से उनकी तरफ देखा और फोन पकड़ा दिया.

उनके आँसू निकल आए पर पीती हुई बोलीं, "उसकी सहेली का भाई है...इंजिनियर है...किसी कंपनी में नौकरी करता है...बेटा यहाँ तक बात पहुँच जायेगी,मुझे नहीं पता था..."

"वो हो गया माँ...अब आगे क्या करना है सोचो...मैं पता कर सकता हूँ...पर, घर लाकर उसकी शादी तो उसी लड़के से करनी पड़ेगी...पर पापा जी मान नहीं रहें. "

"बेटा पता करो..कहाँ गए है...लड़के के घर वाले भी तैयार नहीं  थे.....दोनों अकेले पता नहीं कहाँ गए हैं?"

"उसकी चिंता मत करो,माँ..लड़का नौकरी में है तब सब इंतज़ाम कर लिया होगा....यार दोस्त होंगे साथ में..मंदिर में या कोर्ट में शादी भी कर लेंगे...पापा जी मान ही नहीं रहें...नहीं तो मैं कोशिश करता..."

"लो...अपने पापा जी से ही बात करो..."

फिर दोनों बाप-बेटे में कुछ देर बात हुई...और पति ने कहा.."ठीक है तुम ऑफिस जाओ.."
तभी मीरा चाय लेकर आई...और पति ने कहा..."जाओ पिलाओ अपनी माँ को...मुझे नहीं चाहिए "
और छत की सीढियां चढ़ ऊपर कमरे में चले गए.

काफी देर तक वह अवसन्न सी बैठी रहीं फिर नहा धोकर पूजा घर में जाकर बैठ गयीं. यही प्रार्थना की भगवान से..." जहां  भी हो ..मेरी बेटी को सुखी रखना, भगवान"

पति स्कूल नहीं गए, खाना भी नहीं खाया...वे भी परेशान सी बैठी रहीं. सोच रही थीं ,गाँव वालों से कह देंगी...'नमिता बम्बई  गयी है..स्मिता के पास...पता तो चलना ही है,एक दिन ,उँ सबको पर जब तक टाली जा सके....'

पर गाँव वालों को सारी खबर हो गयी. दिलीप  और मनमोहन की माँ , सीधा आँगन में आ गईं...और जोर जोर से बोलने लगीं..."ममता माँ..नमिता कहाँ है...घर में नहीं है..का"

वे कुछ कहतीं,इस से पहले ही उनमे से एक बोली..."त ठीके, कह रहा था मनमोहना....सुबह वाली बस से उतरा...तांगा मिला नहीं,पैदले आ रहा था तो देखा कि नमिता एगो बैग लिए कौनो लरिका के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही है...मैने  कहा,...ना तूने ठीक से नहीं  देखा होगा...कौनो  और लरकी होगी.....पर इहाँ त सच्चे में नमिता घर में नहीं  है...कौन लरिका था....??"

वे सर झुकाए चुप रहीं. तो उनके करीब आ कंधे पर हाथ रख के बोली..." कुल का नाम डूबा गयी लड़की....कालिख पोत गयी अपने खानदान के मुहँ पर....अब रोने के सिवा का करोगी...उसका लच्छन त सुरुये से ठीक नहीं था "

" कौन बिसबास करेगा....बिसेसर बाबू की पोती....मास्टर साहब की बेटी...एगो भाई, इंजिनियर एगो डागदर और उस लरकी का  ई लच्छन ...ई सब जादा पढ़ाने का नतीजा है...अब छोटकी को संभालो...बंद कर दो इसका भी कॉलेज जाना..."..दूसरी बोलीं.

वे सर झुकाए सब सुनती रहीं...पर मीरा से बर्दाश्त नहीं हुआ...बाहर आ बोली, "चाची..दीदी ने चोरी की है....डाका डाला है, किसी को सताया है.....खून किया है, किसी का??...ऐसा  क्या किया है कि कालिख पुत गयी. और ये सब  आपलोग, गांवालों के चलते ही हुआ..कि आपलोग दूसरी जाति में शादी करने से हँसेंगे. नहीं तो पापा जी मान जाते और दीदी को ऐसे नहीं  जाना पड़ता..."

"अरे बाप रे...छोकरी की बोली  तो देखो....बित्ता भर की लड़की और गज भर की जबान...हम त तुम्हारी माँ को दिलासा देने आए थे....पर ये लड़की तो हमें ही भाषण दे रही है...इनरा  गांधी बनी बैठी है...चलो मनमोहन की माँ...इनके घर का चाल ही निराला है..."

वे लोग बाहर निकली तो चार औरतें उनके ही घर की तरफ टकटकी लगाए,  खड़ी थीं ...ये दोनों औरतें उनसे हाथ चमका कर बोलने लगीं, "अरे जाओ जाओ...अपने घर,  अपना काम देखो...यहाँ किसी को कोई दुख नहीं है...कुछ बोलोगी तो वो इनरा गांधी बैठी है, भाषण देने लगेंगी."

मीरा ने दरवाजा बंद कर दिया. बरसों में पहली बार दिन में इस घर के दरवाजे बंद हुए.

पति दिन भर वैसे ही बिना खाए पिए पड़े रहें....शाम को मुश्किल से दो निवाले खाए  और सोने चले गए.

दूसरे दिन मीरा कॉलेज जाने को तैयार होने लगी तो उन्होंने मना किया, "कुछ दिन मत जा...लोग बातें बनायेंगे "

मीरा फिर भड़क उठी.."माँ मुझे कोई डर नहीं, जो मुझे एक कहेगा....वो दो सुनेगा....दीदी ने कोई अपराध नहीं किया है....मुझे तो बस ये अफ़सोस है, दीदी को मुझपर भरोसा नहीं था...मुझे कुछ भी नहीं बताया उसने " कहती उसकी आँखें भर आईं. हैरान रह गयीं वो..इतनी छोटी उम्र में कैसी कैसी बातें करती है वो...इतनी किताबें जो पढ़ती रहती है. लगता था,मीरा एक रात में ही बड़ी हो गयी.

पति भी सर झुकाए, स्कूल जाते. लोग जानबूझकर रास्ते में राम-राम बोलते कि आगे टोकें.पर पति जबाब ही नहीं देते उनकी राम-राम  का कि आगे बात बढे.

दो दिन बाद फोन की घंटी बजी..पति ने ही फ़ोन उठाया और जिस तरह से चिल्ला पड़े, दिल दहल  गया उनका. नमिता का फ़ोन था. पति ने बहुत बुरा-भला कहा और यहाँ तक कह दिया, " मेरे मरने के बाद ही  इस घर में कदम रखना. जीते जी, अपना चेहरा भी मत दिखाना कभी और आज के बाद,कभी फोन करने की कोशिश मत करना " वे दौड़ती हुई गयीं.."ये क्या कह रहें हैं....मुझे फोन दीजिये..." पर पति ने फोन पटक दिया था.

बहुत दुख हुआ उन्हें,. किसी के साथ इतने बरसों तक रहकर भी उसे पूरी तरह नहीं जाना जा सकता. धीमा बोलने वाले, अच्छी अच्छी किताबें पढनेवाले, शिक्षक पति का असली रूप ये है? जब बेटों की शादी में दहेज़ नहीं लिया, दूसरी जाति की बहू लाने को तैयार हो गए, बेटियों को कॉलेज में पढने भेजा  तो कितना गर्व हो आया था उन्हें पति पर. लेकिन नमिता के साथ उनका व्यवहार देख ,ऐसा लग राह था किसी अजनबी के साथ वे इतने दिनों रहती आयीं, पहचान में ही नहीं आ रहें थे. अपनी गोद में खेली संतान के साथ कोई ऐसा कर सकता है,भला.
(क्रमशः )

Wednesday, July 21, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -11)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर वह भी, उसके पिता के पैसों से अब विदेश जा रहा था )

 गतांक से आगे 

 बहू पूजा और नमिता के पीछे मीरा भी चली गयीं..पता नहीं तीनो ऊपर वाले कमरे में क्या क्या बतियाती रहीं. बाद में तीनो नीचे आयीं और नमिता , मीरा उसके स्नान  का इंतज़ाम करने चली गयीं. नहा कर वो लाल रंग के सलवार सूट, बिंदी और और चूड़ियाँ, यहाँ तक कि पायल भी पहन कर आई   तो वे उसे देखती ही रह गयीं. रूप निखर आया था,और चूड़ियाँ ,पायल कुछ ज्यादा ही छनक रहें थे ,लग  रहा था उनकी आवाज़ पर मुग्ध हो खुद ही ज्यादा खनका  रही थी.

अपनी तरफ  यूँ एकटक देखता पा मुस्करा कर बोली.."आप डर गयीं,ना...कि मैं, सिर्फ वैसे  कपड़े ही पहनती हूँ, वो तो रास्ते के लिए पहना था सिर्फ.  मुझे पता है...गाँव में साड़ी पहनते हैं...पर प्लीज़...मुझसे नहीं संभलेगा"...होठ बिसूरते हुए कहा....फिर बड़े आग्रह से उनकी  ओर देखा..."ये चलेगा ना... वैसे तो चुन्नी भी संभालने में कितनी मुश्किल होती है.." दुपट्टा ठीक करती बोली वह.

वे क्या कहतीं...उन्होंने तो उसके पैंट पहनने पर भी कुछ नहीं कहा...जब बेटे को पसंद है तो क्या बोलें वह...वो तो जानता है गाँव के रीती-रिवाज. बोलीं, "तुम्हे जिसमे आराम लगे, वही पहनो.."

उन्होंने सोचा अब तो शायद कमरे के भीतर ही रहेगी, प्रमोद तो खाना खाते ही सो गया था. शाम होने वाली थी. सब काम करनेवालों  के आने का समय  हो रहा था. पर ये तो बरामदे में रखी कुर्सी पर आराम से बैठ गयी. कहा भी.."बहू जाओ, जरा आराम कर लो"

"ना मुझे अच्छा लग रहा है यहाँ बैठना....और आप मुझे पूजा कहें प्लीज़"

स्कूल से पति लौटे तो लपक कर उनके पैर छुए और वहीँ खड़ी रही. पति अंदर चले गए तो फिर वहीँ बैठ गयी. अब वे क्या कहें?  कलावती,सिवनाथ माएँ सब उसे हैरानी से देख रही थीं. मीरा, नमिता तो उसका साथ ही नहीं छोड़ रही थीं. कलावती खाना बनाने लगी तो चौके में जाकर हैरानी से लकड़ी के चूल्हे को देखने लगी." एक दिन मैं भी बनाउंगी ,ऐसे...सिखाओगी  मुझे..?" कलावती घुटनों में मुहँ छुपाये हंसने लगी.
सौ सवाल थे उसके..."ये बर्तन के ऊपर मिटटी का लेप क्यूँ लगाते हैं ?"

"बर्तन में कालिख ना लगे इसके लिए "

"तुम कितने आराम से लकड़ी अंदर डाल  आंच बढ़ा देती हो...और बाहर खींच कम कर देती हो..वाह जैसे गैस सिम करते हैं...पर हाथ नहीं जलता तुम्हारा?"

"हम गरीब लोगों  का हाथ जलेगा...तो काम कैसे करेंगे?" कलावती ने अपना ज्ञान बघारा...तो "हम्म.." करती सोच में पड़ गयी.

000

सुबह वे उठकर दातुन कर स्टोव पर पति के लिए चाय बना रही थीं कि पति ने आकर कहा, "बाहर बरामदे में पूजा  खड़ी है..."

"हे भगवान अब क्या करें  वह"....सुबह सुबह सारे राहगीर अचम्भे से देख रहें होंगे उसे. ये सब बातें लड़कियों को सिखाई नहीं जातीं. अपने घर में, अपने  आस-पास देख कर, सब सीख जाती हैं. पर लगता  है, इसके तो दादा-परदादा भी शहर  में ही पैदा हुए थे. इसे कुछ पता ही नहीं. खीझ गयीं वे. जाकर देखा तो दोनों हाथ बांधे वह सुनहरी कोमल धूप में नहाए, सामने फैले खेत-खलिहान,पेड़-पौधे निरख रही थी.

 उन्हें देखते ही बोली..."एकदम हिल-स्टेशन जैसा लग रहा है...कितनी लकी हैं आपलोग, इतनी हरियाली के बीच रहती हैं."

उन्होंने बात बदलते हुए उसे अंदर बुलाने को बहाने से कहा,..."चलो, पूजा अंदर चलो..चाय पियोगी?"

वो साथ में अंदर तो आ गयी...पर बोली.."ना... मैं तो नहा धोकर आपके लिए फूल तोड़ कर लाऊँगी पूजा के लिए"

अब ये और लो...पता नहीं गाँव की कौन सी तस्वीर है इसके मन में..लगता है, फिल्मों में देखा होगा.

"अच्छा पहले नहा तो लो..कलावती आती है तो पानी रख  देती है."..कह कर टाल दिया .

नहाने के बाद पूजा, प्रमोद को उठाने में लग गयी...किसी तरह वो औंघाते हुए , बरामदे में  कुर्सी पर आकर बैठ गया, "अरे हज़ार घंटे की नींद बाकी है, भाई ....पढ़ाई के दौरान रात- रात भर जाग के काटे हैं.....मौका मिला है तो सोने दो,ना...तुम नमिता,मीरा के साथ चली जाओ गाँव घूमने "

उनके काम करते हाथ जहाँ के तहां रुक गए...."गाँव घूमने...." अब ये कौन सा नया  चक्कर शुरू हो गया.

वो नमिता,मीरा को बुलाने उनके कमरे में गयी तो वे भागकर प्रमोद के पास आ गयीं " ये क्या कह रहा है...बहुएं दिन के उजाले में बाहर जाती हैं क्या?...तुझे तो सब पता है."

"पता है माँ...पर क्या करूँ....ये मानेगी नहीं...घूमने गए तो वहीँ से दूसरे दिन से हल्ला...घर चलो..मुझे गाँव देखना है...तभी हम इतनी जल्दी लौट आए . इसे गाँव देखने का बहुत शौक है....पता नहीं किताबों में क्या क्या पढ़ रखा है..और फिल्मों में क्या  देखा है...अगर  इसे उपले पाथने या दूध दुहने को कहोगी ना, तब भी मान जाएगी. जब हमारे आँगन में हैंडपंप देखा तो बड़ी निराश हो गयी...बोली,' कुएं से पानी क्यूँ नहीं लाते..मैं भी बड़े से पीतल के गागर में पानी भर के लाती"

हंस पड़ीं वे, पूजा का 'घर ' का संबोधन कहीं अच्छा भी लगा..फिर भी आशंकित थीं," बेटा पर दिन  के उजाले में कैसे घूमेगी ? ...गाड़ी से घुमा दे..क्या कहेंगे गांववाले ?"

"कहेंगे ...मास्टर साहब की  छोटी बहू पागल है...और सचमुच वो गाँव देखने के पीछे पागल ही है." फिर थोड़ा सोचता हुआ बोला..."माँ पर एक तरह से ठीक ही है..पूजा की देखा-देखी और भी बहुएं दिन के उजाले में निकल कर घूम सकेंगी. तुम ही बताओ...क्या तुम्हारा मन नहीं हुआ कभी वो आम का बगीचा देखूं..नीम के पेड़ देखूं ?...नहर देखूं ? केवल सब से सुन सुन कर संतोष करती रही.....जाने दो, घूमने दो इसे...और मना करोगी तो वो सत्याग्रह कर देगी...नमिता से कम नहीं...." और हँसता हुआ चला गया...दातुन-कुल्ला करने.

वे लौट आयीं अपनी जगह..पर एक सवाल चलता रहा दिमाग में " क्या तुम्हारा मन नहीं हुआ?" ..क्या सचमुच उनके मन में कभी कोई इच्छा नहीं जागी? बस उन्होंने स्थिति को आँखें  बंद कर स्वीकार कर लिया. उनका एक मन भी है..वह भी कुछ चाह सकता है, मांग सकता है...कभी ऐसे सोचा ही नहीं. जैसे  जैसे सास-ससुर-पति कहते गए करती गयीं. उन्होंने कभी अपने मन से क्यूँ नहीं पूछा कि 'उसे क्या  चाहिए?' शायद कभी मन ने चाहा होता तो कोई राह निकल ही आती. या उनके मन का नहीं हो पायेगा ऐसा सोच वे निराशा से बचने की कोशिश करती रहीं. खुद को दुख और निराशा से बचाने  का  यह कोई अनजाना प्रयास था, क्या?  पता नहीं कब तक सोचती रहतीं अगर नमिता ने आकर आशंकित मन से नहीं पूछा होता, "भाभी को लेकर जाऊं बाग़-बगीचे , नहर दिखाने?"

हँ जाओ..पर नाश्ते के बाद..."

"मीरा मैं ना कहती थी...माँ मना नहीं करेगी..चल जल्दी तैयार हो जा.." कहती नमिता उछलती कूदती चली गयी.

000

उन्हें पता था, गाँव में यह खबर आग की तरह फ़ैल गयी होगी और किसी ना किसी बहाने लोग उनके घर आयेंगे टोह  लेने और उलाहना देने.

अच्छा हुआ जब , कैलास की माँ और शम्भू की चाची आयीं तो पूजा थक कर सो गयी थी. "का ममता की माँ, नईकी  बहू के मायके की सब मिठाई अकेले अकेले खा लोगी"

"नहीं, मैं बस आज ही भेजने वाली थी...कलावती से "

"आ... ई का सुन रहें हैं..बिजली बता रहा था कि नईकी बहू खेते खेते....बगीचे  बगीचे...मुहँ उघारे सलवार कमीज़ पहने घूम रही थी."

"हाँ , उसने गाँव नहीं देखा ना...और अब विदेश जा रही है...फिर कब देखना नसीब हो अपना देस, अपनी धरती...इसीलिए भेज दिया " वे कभी भी अपने बच्चों की या घर की  बड़ाई नहीं बघारातीं थीं ...पर यहाँ बात मोड़ने के लिए जरूरी था.

"बिदेस...प्रमोद बबुआ बिदेस जा रहा है...?" उन दोनों का मुहँ खुला का खुला रह गया.

"हाँ, आगे और पढ़ाई करेगा...हमारी कहाँ औकात थी, विदेस भेजने की, दान- दहेज़ नहीं लिया तो बहू के पिताजी ने विदेस भेजने की बात कही...ठीक है, उनकी लड़की ही 'फौरेन  रिटर्न डाक्टर' की बीवी कहलाएगी"

"हाँ वो तो है...पर जो कहो...जोड़ी नहीं है...कहाँ प्रमोद...राम जी जैसा सुन्दर....बहू..उसके सामने तनिक फीकी पड़ जाती है...जोड़ी नहीं जमती " वे लोग कहाँ चूकने वाली थीं.

इस बार दरवाजे से आती सिवनाथ माएँ ने संभाल ली, "शम्भू की चाची...पिरार्थाना  करो कि तुम्हारी बिटिया को भी एहेन दामाद, मिले."

उनकी बेटी का रंग भी दबा हुआ था. सो चुप रहीं दोनों. उन्होंने मिठाई की प्लेट सामने रखी. उसे ख़त्म कर जल्दी से चली गयीं वे लोग.  अब गाँव में पूजा के गाँव घूमने से ज्यादा बड़ी खबर  प्रमोद के विदेश जाने की थी . सबको बताना होगा,जाकर. पहले जानने का सुख लूटने की बात ही अलग.

000

पूजा हफ्ते भर  रही. वह रम गयी थी,गाँव की ज़िन्दगी में. बिजली तो गाँव में रहती ही नहीं. वह छत पर देर तक तारों की छाँव में बैठी रहती. दिन में नमिता-मीरा के साथ गोटियाँ खेलना सीखती. नए नए व्यंजन शौक से खाती. कभी कभी उनसे पूछ , अपनी डायरी में भी नोट करती जाती. प्रमोद तो कुम्भकरण का अवतार ही लिए हुए था. सिर्फ खाता और सो जाता.

पति को घर के आस-पास फूल और सब्जियां लगाने का बड़ा शौक था. खुद ही इसकी देखभाल किया करते. पूजा भी अक्सर सुबह और शाम दोनों समय उनके साथ लगी होती और सैकड़ों सवाल पूछती.  वह मटर की फलियाँ, टमाटर,बैंगन,मिर्ची देख खुश हो जाती.और अपने हाथों से तोड़ने की जिद करती. छोटी सी टोकरी लेकर जाती और कुछ सब्जियां तोड़ लाती. एक दिन ढेर सारी मिर्ची तोड़ लाई. इतनी जलन हुई उन मेहँदी रचे हाथों में , शहद का लेप करना पड़ा. कई बार सब्जियां तैयार नहीं हुई होतीं.पर उसका बच्चों सा उत्साह देख पति कुछ नहीं कहते. पति के इस शौक में किसी  बच्चे ने कभी हिस्सा नहीं लिया, उन्हें भी अच्छा लगता.

प्रमोद कभी कह भी देता...'आजतक पापाजी को इतनी देर तक किसी से बतियाते नहीं देखा. पता नहीं क्या सर खाती रहती है'

"अब ये ससुर-बहू जानें, तू क्यूँ परेशान हो रहा है? ..." वे मुस्कुरा कर उसे आश्वस्त करतीं.

पूजा शायद और रुक जाती पर प्रमोद को ही शहर में काम था. विदेश जाने के कागज़ पत्तर तैयार करने थे. पूजा जब विदा होकर गयी तो लगा, ममता या स्मिता ही जा रही हैं. उसकी भी आँखें भरी भरी  थीं.

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नमिता कॉलेज में आ गयी थी. अब तो उसी कॉलेज में बी.ए. की भी पढ़ाई होने लगी थी. पति का बेटियों को बी.ए. पढ़ाने का सपना पूरा होता दिख रहा था. वे सोचतीं, वैसे भी अभी पैसे कहाँ हैं जो शादी हो पायेगी...समय लगेगा तब तक बी.ए. तो कर ही लेगी.

प्रमोद, और पूजा सिर्फ दो दिन के लिए आए इस बार. शादी के पहले से ही सारी लिखा-पढ़ी चल रही थी. अब सब तय हो गया था और उन्हें अगले हफ्ते विदेश के लिए हवाई जहाज में बैठना था. आजतक बस आँगन से आकाश में उड़ते जहाज को देखा  करती थीं. आज उसमे उनके बेटा बहू बैठनेवाले थे. उन्हें गर्व भी हो रहा था और विछोह की पीड़ा से छाती भी ऐंठ रही थी. अब पूरे एक साल बाद ही आ पायेगा. इतने दिन उसका मुहँ देखे बिना कैसे रहेंगी?

पूजा,मीरा और नमिता के लिए एक टी.वी. लेकर आई थी. मीरा खुश हो गयी पर दूसरे ही पल बुझी आवाज़ में बोली, ..."पर भाभी,बिजली कहाँ रहती है, यहाँ?"

"मैं बाज़ार से बैटरी और चार्जर का  इंतज़ाम कर देता हूँ,...तुमलोग देखा करो...दीन दुनिया की खबरें  मिलेगी,पर नमिता..सिर्फ फिल्मे और गाने ही मत देखना."

प्रमोद और नमिता तो चले गए, उनके पापाजी और मीरा शहर तक उनके साथ गए. इस बार नमिता  ने ही कहा, माँ अकेली कैसे रहेगी? मीरा को ले जाइए.

प्रमोद तो नमिता को हिदायत दे गया, ज्यादा फिल्मे मत देखना.पर नमिता की नज़र तो टी.वी.से हटती  ही नहीं.चाहे कुछ भी आ रहा हो,वह देखा करती. और अब उसे बनने संवारने का भी शौक होने लगा था.

उनकी सारी बेटियाँ सुन्दर थीं. पर ममता और स्मिता का रूप बदली में छुपे चाँद जैसा था. जबकि नमिता का रूप पूरनमासी की चाँद की तरह चमकता रहता. वह टी.वी. में देख देख के दरजी काका को अपने कपड़े की डिजाइन  बताती. उन्हें लगा दरजी काका खुद ही टाल देंगे.पर वे भी शायद सीधा -सादा सलवार कुरता सिल कर तंग आ गए थे. नमिता की बात ध्यान से सुनते और देर तक उस से डिजाइन  समझते.फिर वैसा ही सिल कर ला देते. बाल बनाने के तरीके में भी  वो टी.वी. में बोलने वाली लड़कियों की  नक़ल करती.लगता ही नहीं उनकी बेटी कभी गाँव से बाहर नहीं गयी.

इंटर पास करके बी.ए. पार्ट वन में आ गयी नमिता. ब्लॉक  में एक नए अफसर आए थे. उनकी बेटी नमिता की अच्छी सहेली बन गयी. पर उसका एक बड़ा भाई भी था.इंजीनियरिंग पढ़ रहा था, छुट्टियों में घर आता तो नमिता और अपनी बहन नीना के साथ ही बाग़-बगीचे में घूमता रहता. उसके गाँव में कोई दोस्त नहीं थे.पर उन्हें नमिता का उसके यहाँ जाना अच्छा नहीं लगता.

(क्रमशः)

Sunday, July 18, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -10)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग और छोटा बेटा,मेडिकल पढ़ रहा था. ससुर जी और सास का निधन हो गया और सारी जिम्मेवारी पति पर आ पड़ी.बड़े बेटे ने उनलोगों की रजामंदी से प्रेम-विवाह किया)

धीरे धीरे,ननदें,रिश्तेदार सब विदा हो गए. ममता भी ससुराल चली गयी, उसका बेटा अब स्कूल जाने लगा था और अब उसके स्कूल खुल गए थे. स्मिता भी ससुराल चली गयी,बम्बई लौटने से पहले कुछ दिन वहाँ रहना भी जरूरी था. आठ दिन कहकर प्रकाश गया था, वे रोज उसकी और बहू की बाट जोहतीं, रोज दाल भरी पूरी, खीर और पांच तरह की सब्जी बनाने का निर्देश देतीं,कलावती को. पर निराशा ही हाथ लगती और सुबह सारा बचा,खाना ,गाय को डालना पड़ता.

सिवनाथ माएँ उन्हें डांट भी देतीं, "अरे जब आ जाएंगे, बनवा लेना...रोज केतना गाय के नादी में डालोगी. उसकी भी आदत हो गयी रोज खीर पूरी खाने की तो घास नहीं खाया करेगी "

सिवनाथ माएँ,  अब उनकी सास की जगह पर थी, किसी भी बात पर पूरे हक़ से टोक देती. वे भी उसे पूरी  इज्जत देती ,आखिर वे ब्याह कर आयीं थी, तब से एक साल के सिवनाथ को गोदी में लेके सिवनाथ मायं काम पर आया करती थी.

ग्यारहवें दिन हैरान-परेशान सा प्रकाश अकेले ही आया. वे चौंक गयी..." दुल्हिन  कहाँ है?"

"वो अपने मायके में रुक गयी हैं माँ.....अब मेरे साथ चली जाएगी तो माँ-बाप के साथ रहने का समय नहीं मिलेगा, ना और फिर पैकिंग भी करनी थी."

"तू इतनी जल्दी, नौकरी पर ले जायेगा बहू को?"...उन्हें लग रहा था कुछ दिन बहू उनके साथ ससुराल में रहेगी. फिर प्रकाश अच्छा घर खोजेगा .तब वे भी साथ में जाएँगी. ये कल की लड़की क्या जानेगी,गृहस्थी कैसे जमाते  हैं? कौन सी चीज़ कहाँ रखनी है?. चूल्हा किस दिशा में रखना होगा. मंदिर किस कोने में ठीक होगा, रखना? कल तक किताब कॉपी में घुसी रहने वाले लड़की को ये घर-गृहस्थी  की बातें क्या मालूम?...पर प्रकाश ने तो चौंका दिया एकदम.पर ये सब उस से बोलीं नहीं वे.

" फिर छुट्टी नहीं मिलेगी ना माँ, और मुझे खाने  -पीने की इतनी तकलीफ हो रही है. प्रीति को साथ ही ले जाऊँगा.... सारी छुट्टी ख़तम हो गयी है, कल ही निकलना होगा. घर में फोन भी तो नहीं,नहीं तो मैं फोन पर ही बता देता...पर तुमलोग चिंता करोगी, इसलिए चला आया बताने." और फिर मीरा को आवाज़ दी.

"मीराssss ...जा जरा गोपाल चाचा को बुला ला तो, उन्हें घर पर टेलीफोन लगवाने का जिम्मा देता हूँ. उन्हें ही पैसे थमा देता हूँ, जल्दी से लगवा देंगे. आज फोन ना होने की वजह से लंबा चक्कर पड़  गया"

वे खुश तो हुईं फोन लगने की खबर से ,अब अपनी बेटियों से बात कर सकेंगी.पर जिस वजह से प्रकाश फोन लगवा रहा था. वह खल गयी ,घर ना  आना पड़े, फोन पर ही बात कर छुट्टी पा ले फिर ऐसा फोन किस काम का?

000

प्रमोद, स्मिता ,ममता सब बड़े खुश हुए फोन लगने की खबर सुन. ममता ने कहा भी..."देखा माँ , कमाऊ पूत होने का फायदा. घर में नई चीज़ें आने लगी."

उनसे क्या कहती अपनी सुविधा के लिए लगवा कर गया है.

प्रमोद ने भी चैन की सांस ली, "बहुत अच्छा किया भैया ने, अब मुझे चिट्ठी नहीं लिखनी पड़ेगी. कितना झंझट लगता था..क्या लिखो...अब बस फोन पर हाल-चाल ले लिया करूँगा" मन में आया कहें ,'पहले कौन सा तू हाल-चाल लेने के लिए चिट्ठी लिखता था जब पैसे की जरूरत पड़े, तब ही दो लाइन की चिट्ठी आती थी.और वे घंटो नमिता की मिन्नतें कर उसके स्वास्थ्य की खबर जानने को लम्बी चिट्ठी लिखवाया करती थीं. पर कहा नहीं.

यही कहा ,"हाँ! बेटा तेरी आवाज़ सुन लिया करुँगी,अब "

लेकिन प्रमोद के फ़ोन भी बस पैसों के लिए ही आया करते. और पति के माथे पर चिंता की लकीरों में एक और इज़ाफ़ा कर जाया करते. उन्हें अब प्रमोद की पढ़ाई से ज्यादा चिंता दोनों बेटियों की शादी की हो रही थी. वो तो अच्छा था, कि अभी समय था, पर नमिता भी दसवीं  में आ चुकी थी. बस एक-एक दिन यही सोचते गुजरता कहाँ से आयेंगे  पैसे उसकी शादी के लिए? बेटों पर से भरोसा तो उठी ही चुका था. वे बाग़-बगीचे ,खेत-खलिहान  वापस लौटने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी.

उन्होंने कहा भी, " प्रमोद का अभी अंतिम वर्ष है...ना हो, एक साल के लिए  प्रकाश से कह दीजिये, प्रमोद को पैसे  भेज दिया करेगा. आखिर बड़ा भाई है...उसका भी कुछ कर्त्तव्य है. "

लेकिन आदर्शवादी पति ने कहा, "नहीं...प्रमोद मेरी जिम्मेवारी है....उसकी पढ़ाई के पैसे मैं ही दूंगा. चाहे जैस इंतज़ाम  करूँ."

"और बेटियों की शादी??"

" अभी तो सामने का खर्चा निबटाऊँ,ना...जब समय आयेगा देखा  जाएगा..बेच दूंगा सारी जमीन...हम दोनों को बुढापे में क्या चाहिए, मुट्ठी भर अन्न,...उतना जुगाड़ तो मेरी पेंशन से हो ही जाएगा...बेकार की चिंता मत करो"

पर चिंता थी की जाती ही नहीं थी...प्रमोद की डाक्टरी  की पढ़ाई पूरी हो गयी. और एक किसी अनजान आदमी का फोन आया घर पर कि मिलना चाहते हैं, आपके डाक्टर बेटे के बारे में, बात करनी है. मन एक बार धड़का. कौन सी बात?खैर पतिदेव ने बुला लिया.

इनकी कार कुछ और लम्बी थी. कपड़े कुछ और चमकदार. बहू प्रीति के दूर के चाचा लगते थे . इन सज्जन ने बताया कि वे प्रकाश की बारात में ही प्रमोद को देखकर अपनी लड़की के लिए पसंद कर चुके थे. और प्रमोद को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भेजने का खर्चा उठना चाहते हैं .उन्हें समझाने लगे कि खाली साधारण डाक्टरी की डिग्री, कुछ काम नहीं आएगी. विदेश से पढ़कर आएगा, तो बहुत  बड़ा डाक्टर बन जाएगा. आपलोगों की सम्मति हो तो आप लड़के से बात कर के बताइये. वे लड़की का फोटो भी लाये थे. शहर की लड़की लोग का फोटो तो कपड़े और बाल के डिजाइन से
ठीक ही लगता था.

वे सज्जन एक नई चिंता उन्हें सौंप कर चले गए. पति भी असमंजस में थे. उनका तो बिलकुल मन नहीं था कि  बेटे को सात समंदर पार भेजें. फिर मन में दबी हुई ये चाह भी थी कि जब प्रमोद की किसी लड़की से दोस्ती नहीं तो उसके लिए अपनी  जाति वाली लड़की लायें. दो दिन तक पति सोचते रहें ,फिर बोले.."ऐसा मौका प्रमोद को नहीं मिलेगा. हमारी तो औकात नहीं कि हम विदेश भेज सकें. सोचो गाँव का पहला डाक्टर वो भी 'फोरेन रिटर्न '..कितना रुतबा रहेगा....सबलोग ये भूल जाएंगे कि अब हमारे  पास उतनी जमीन जायदाद नहीं. हमारी खोयी हुई इज्ज़त वापस आ जाएगी"

वे ठंढी सांस भर कर रह गयीं..."इस इज्ज़त की चिंता इंसान से क्या क्या नहीं करवाती..." अब तो बेटे की सूरत देखने को भी तरसेंगी. फिर भी एक क्षीण आशा थी कहीं बेटे मना कर दें. बोली, "प्रकाश से तो बात कर लीजिये ,बड़ा बेटा है...उसकी राय जरूरी है"

प्रकाश सुनते ही खुश हो गया, "ये लोग तो प्रीति के पिता से भी कहीं  अमीर हैं.. प्रमोद के तो नसीब खुल गए....लड़की भी ठीक ही है.. " थोड़ा अटकते हुए बोला...फिर जल्दी से कहा, "मैं बताता हूँ..प्रमोद को..आपको बाद में फोन करता हूँ"

फिर सबकुछ प्रकाश और बहू ने ही तय किया. कैसे शादी होगी...कहाँ बारात जाएगी...पति-पत्नी दर्शक से बने  देखते रहें. उनमे पहले वाला उत्साह भी नहीं रह गया था.बस मशीन की तरह सारे रस्म निबटाती रहीं. बेटियाँ भी बारात में गयी थीं. दुल्हन की कार से पहले इनलोगों  की बस आ गयी.लौटीं तो थोड़ी बुझी बुझी थीं..."क्या बात है , बहुत थक गयी हो तुमलोग?"

"हाँ... माँ..." ममता और स्मिता ने एक साथ कहा पर नमिता कहाँ चुप रहती.

"माँ..दीदी लोग दुखी है...भाभी जरा भी भैया की जोड़ी की नहीं....भैया तो राजकुमार सा लग रहा था..भाभी ने इतना लम्बा हील (उसने बित्ता फैला कर दिखाया) पहना था फिर भी भैया के कंधे तक पहुँच रही थी. रंग भी..."...पर आगे कुछ बोलती क़ि ममता ने जोर से डपट दिया..."तू चुप करेगी या कपड़ा ठूंस कर मुहँ बंद कर दूँ, तेरा...बहुत चटर चटर जुबान चलती है....ये सब गलती से भी भाभी  के कान में पड़ गया तो.??...खुद को पता नहीं फिल्म की हिरोईन समझती है..सब भगवान के बनाए होते हैं...पता  नहीं कब अक्कल आएगी इस लड़की को.."

"नमिता,...प्रमोद ने प्रकाश के घर पर देखा है उसे..देख के पसंद किया है...अब एक बार भी इस तरह की बात मत करना " उन्होंने समझाया उसे. और पहली बार नमिता ने बिना बहस किए सीधी गाय की तरह सर हिला दिया. शायद सचमुच थक गयी थी, वह.

लेकिन वे सोचने लगीं, हर लड़के की इच्छा होती है,उसे परी सी ख़ूबसूरत लड़की मिले, प्रेम-विवाह हो तब तो ये चीज़ें मायने नहीं रखतीं. शकल से ज्यादा उसके मन की पहचान होती है.पर यहाँ प्रमोद ने अपनी विदेश की पढ़ाई के लिए, समझौता कर लिया. भगवान करे,लड़की मन की बहुत अच्छी हो. तन का रूप तो दो दिन का होता है.

अच्छा किया लड़कियों ने पहले से बता दिया, जब उन्होंने प्रमोद की दुल्हन को देखा तो अचंभित नहीं हुईं ना ही मन मलिन किया. रंग कम था पर नाक-नक्श कटीले थे और उन्हें ममता ही हो आई उस पर कहीं वो हीन ना समझे ,सबके बीच खुद को.

प्रमोद भी प्रकाश की तरह हनीमून पर गया. अब टेलीफोन था घर में तो चिंता नहीं थी कि  रोज  खाना बना कर रखें. पर इस बार प्रकाश ने छठे  दिन में ही फोन किया कि माँ दोपहर को पहुँच रहा हूँ... जल्दी जल्दी खुद ही चौके में लगीं. खाना बनाया. पूजा की थाली तैयार की. कार की आवाज़ सुन, पूजा की थाली संभालती दरवाजे की तरफ दौड़ीं कि ,बहू की आरती करेंगी ,तिलक  लगाएंगी.पर ये प्रमोद किसके साथ कार से उतर रहा है.? बहू कहाँ है? उस  लड़की ने पैंट पहने थे और लम्बा सा कुरता. मीरा उन्हें अचम्भे में देख  हंस पड़ी.."माँ... भाभी  हैं "

पास आकर  पैर छुए, उन्हें समझ नहीं आ रहा था,बिना सर पर पल्लू के वे टीका कैसे लगाएं?

उसने चप्पल उतारी , हैंडपंप पर पैर धोये और सीधा चौके में चली गयी, "मुझे तो बड़ी भूख लगी है"

बहू  के चौके में जाने की रस्म होती है यह तो बेधड़क अंदर चली गयी. किसी तरह नमिता को बुला कर खाना परोसा. फिर वो खुद ही पूरे घर में घूमने लगी, " दो दिन तक तो आपलोगों ने घर में कैद कर दिया था ..मैने तो कुछ देखा ही नहीं."

जब वो  छत पे जाने लगी तो वे घबरा गयीं, "नमिता उसे रोक किसी बहाने...आस-पास किसी ने देख लिया तो क्या कहेंगे?"

"माँ, सोचेंगे मेरी सहेली है....कौन सोचेगा...नई बहू होगी..जाने दो,ना..मैं भी जाती हूँ,साथ में" नमिता तो जैसे खुश हो रही थी उसके जैसी कोई आ गयी इस घर में.

(क्रमशः)

Thursday, July 15, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -9)


(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग और छोटा बेटा,मेडिकल पढ़ रहा था. ससुर जी और सास का निधन हो गया और सारी जिम्मेवारी पति पर आ पड़ी.)

गतांक से आगे

अम्मा जी के जाने के बाद ..घर में अंदर-बाहर सब सन्नाटा सा छाया रहता. बाबूजी के जाने से ही अहाता सूना हो गया था.शाम होते ही शंकर की आदत थी,चार-पांच,कुर्सियां  अहाते में रख देता,बाज़ार आते-जाते कोई ना कोई  बैठ बाबूजी से गप्पें किया करता,ऊँची आवाज़ में उनलोगों के ठहाके गूंजते रहते. उनके जाने के बाद भी यह क्रम टूटा नहीं, बस बुजुर्गों के ठहाके की जगह,बच्चों की खिलखिलाहटों ने ले ली. अम्मा जी कुर्सी पर बैठी होतीं और ढेर सारे बच्चे अहाते में खेला करते. रौनक बनी रहती.

दिन में भी अम्मा जी,बरामदे में चौकी पर बैठी होतीं और गाँव की कोई ना कोई घास काटने वाली,या गाय - भैंस चराने वाले पाए से पीठ  टिकाये सुस्ताते होते. गाँव भर के हाल-चाल..अपने घर के पड़ोसी के किस्से, सुनाया करते. अक्सर अम्मा जी सिवनाथ  माएँ को आवाज़ देतीं और वह उनके लिए कुछ खाने-पीने का लेकर हाज़िर  होती. वे भी काम से खाली होतीं  तो चौखट के पास एक मचिया लिए बैठी जातीं और सबकी बातें,सुना करतीं.
शाम को तो उन्हें बिलकुल समय नहीं मिलता. शाम को पति स्कूल से लौटते, तो उनके चाय-नाश्ते,फिर रात के खाने की तैयारियों में लगी होतीं. अब दिन भर वह सूना बरामदा और शाम को सूना अहाता देख,उनकी आँखें भर आतीं.पर वे यह सोच आँसू अंदर ही अंदर  पी लेतीं कि शाम को आँसू गिराना  अपशकुन माना  जाता है.

वे पति को कहतीं,शाम को बाहर बैठने के लिए.पर पति ज्यादा सामाजिक नहीं थे, वे गाँव वासियों से ज्यादा मिलते जुलते नहीं थे...तुरंत ही ऊब जाते  और कमरे में आकर कोई किताब खोल लेते. एक उनका नया साथी भी बन गया था. गोपाल जी ,वह भी कमरे मे आकर ही बैठा रहता. अम्मा जी के श्राद्ध कर्म में काफी मदद की थी. अब भी जब पैसों की जरूरत पड़ती और जमीन या बगीचा गिरवी रखना या निकालना होता तो मदद करता. सही लोगों  से पहचान करवाता . पति तो एकदम अनाड़ी थे. बाबूजी के रहते कभी कुछ जानने की कोशिश ही नहीं की. फिर भी इतना मीठा बोलता कि उन्हें पसंद नहीं आता. उन्होंने अम्मा जी से उसके बारे में एक बार पूछा भी था कि उसका खर्च कैसे चलता है? सुन्दर पक्का मकान था, उसका. बीवी बड़ी सुन्दर  साड़ियाँ  पहना करती,बेटा दूर शहर में पढता था और जमीन जायदाद या नौकरी कुछ थी नहीं. सात भाई था ,सबके हिस्से बस टुकड़े भर जमीन आई थी. अम्मा जी ने बड़ी विद्रूपता से कहा था..."क्या करेगा...तेला-बेला करता है"

पर वे समझ नहीं पायी थीं. पर अब समझ रही थीं. उसका यही काम था और कमीशन से उसके घर के खर्चे चलते. मन में शंका भी जन्मी ...ना जाने कितना कमा लेता है ,बीच में. पति से भी जिक्र किया...पर उन्होंने  कहा..."अब मुफ्त में आगे-पीछे थोड़े ही ना करेगा...कोर्ट कचहरी सब जगह साथ जाता है,मुझे भी तो कोई साथ चाहिए."

और ये कोर्ट कचहरी का चक्कर   बढ़ता ही गया. रोज ही बेटों की मांगें सुरसा की तरह मुहँ बाए खड़ी रहतीं. जिनमे  सुन्दर खेत - खलिहान ,बाग़ बगीचे समाहित होते जा रहें थे.. एक बार प्रमोद से कहा  भी था, कि जरा खर्चे संभाल कर किया करो. तो उसने कह दिया था,"पता है एक एक किताब कितने की आती है? अब डाक्टर बनाने का शौक है तो खर्चा तो करना पड़ेगा."

पति के सामने चिंता व्यक्त करतीं तो कहते..."अरे बस बेटों की नौकरी भर  लगने की देर है, देखो ..कैसे सब छुड़ा लेता हूँ "

पर उन्हें थोड़ा शक  होने लगा था, दोनों बेटे जैसे शहरी रंग ढंग में ढल रहें थे और घर से दूर होते जा रहें थे.उन्हें नहीं लगता था कि उनको कोई फिकर थी कि उनकी पढ़ाई के पैसे कहाँ से आ रहें हैं ? जब भी छुट्टियों में आठ- दस दिनों के लिए आते और साथ में आते उनके दोस्त. जिन लोगों  ने गाँव नहीं देखा होता. दिन भर बेटे फरमाईशी चीजें बनवाते और सारा दिन बागों में घुमा करते. रात को देर तक छत पर उनकी हंसी -मजाक चलती रहती. कभी दो पल, अपने पापा जी के पास या उनके पास बैठ उनका हाल-चाल लेने की जरूरत नहीं समझते.

नमिता से तो पहले ही नहीं बनती थी उनकी. और नमिता को भी उसके दोस्त फूटी आँखों नहीं सुहाते. प्रकाश का एक दोस्त साथ आया था और गले में कैमरा लटकाए सारे दिन गाँव में घूमता रहता और तस्वीरें उतारता रहता. एक बार उन्हें लगा  भी कि ये पेड़ पर चढ़ी नमिता की तस्वीर उतार रहा है या पेड़ की?? फिर उन्होंने सोचा...पत्तों में छिपी नमिता वैसे भी  नहीं दिख रही. क्या फोटो  लेगा.

लेकिन जब पुआल के ऊँचे ढेर पर बैठी, ईख चबाती नमिता की तस्वीर वो सामने से खींचने लगा तो उनका माथा ठनका....वे बाहर निकल,प्रकाश को बताने ही जा रही थीं कि देखा नमिता उस लड़के की तरफ बढ़ रही है. वे खिड़की के और करीब आ गयीं सुनने कि आखिर करती क्या है,लड़की? नमिता ने सीधा पूछा, "आपने मेरी फोटो  क्यूँ खींची??"

"वो मैने ऐसी लड़की कभी देखी  नहीं, ना ,पेड़ पर चढ़ने वाली....इतने ऊँचे ढेर पर बैठी ईख चबाने वाली...इसीलिए खींची..सब नया है मेरे लिए"

"अच्छा और भी नए तरह के फोटो  खींचने हैं आपको?"

हाँ.... जरूर"

और नमिता ने बगल की सड़क से गुजरते, भैंस  की पीठ पर लेटे किसना को आवाज़ दी.."किसना चल..भैंस को इधर लेके  आ"
उसके करीब आने पर बोला उसे .."उतर नीचे" और प्रकाश के दोस्त की तरफ मुड़ी..."आपको एकदम नए तरह का फोटो चाहिए ना?"

" हाँ..."

और आगे बढ़कर उसने उस लड़के के  हाथ से कैमरा ले लिया.."चलिए मैं खींच देती हूँ..एकदम नए तरह का फोटो...."

"क्या मतलब ...मेरा कैमरा दे दीजिये...अरे संभाल के" अब उसे कुछ आशंका होने लगी थी.

"मुझे पता है..कैसे फोटो  खींचते हैं,कैमरे से...मेरी बम्बे वाली दीदी के पास है" अब बाहर कहीं भी वो छोटकी दीदी की बजाए स्मिता को बम्बे वाली दीदी ही कहती थी.

"आप भैंस की पीठ पर बैठ जाइए...बुशर्ट पैंट में भैंसा  पर बैठा शहरी लड़का..एकदम नए तरह का फोटो लगेगा"...किसना और मीरा दोनों हाथों से मुहँ दबाये खी खी करके हंस रहें थे.

नमिता ने घुड़का..."हंस क्या रही है...ले ईख पकड़...."और कैमरा संभालने लगी.

"मेरा कैमरा दीजिये...अब मुझे नहीं खींचना..."

"क्यूँ नहीं खींचना...आपने मेरा खिंचा..हिसाब तो बराबर होना चाहिए...चलिए चलिए....किसना भैंस को भैया साब के करीब ला"

और उसने भैंस के साथ उस लड़के की फोटो  ले ली
तभी भैंस ने जोर से रम्भा कर  पूंछ हिलाई और थोड़े गोबर के छींटे लड़के के ऊपर पड़ गए और वह  डर कर दूर छिटक गया.

"अरे डरिए मत....वो थैंक्यू बोल रही है,आपको..आपने उसके साथ फोटो खिंचवाया ना." मीरा और किसना फिर से हंस पड़े.

"चल मेर ईख दे...ये लीजिये अपना कैमरा...सबको जरूर दिखियेगा..एकदम नए तरह का फोटो है"

वो लड़का...मुहँ लटकाए कैमरा लिए घर में वापस आ गया. और प्रकाश से कहने  लगा, अब उसे जाना है...शाम को कितने बजे बस मिलेगी?"

वे हंसती हुई वापस अपने काम में लग गयी..."ये लड़की है या अगिया बैताल...सारे मामले खुद सलट लेती है. किसी की मदद की जरूरत नहीं उसे.

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प्रकाश की एक बड़ी कंपनी में नौकरी लगने की खबर से आनंद की हिलोरें मचल उठीं घर में. हर आने जाने वाले का मुहँ  मीठा करातीं. पति भी जानबूझकर शाम को बाहर बैठने लगे थे. राह से गुजरते लोग, आकर बधाई दे जाते. और पति मीरा को आवाज़ देते, "अरे जा मिठाई लेकर आ,चाचा  का मुहँ मीठा करा दे." अंदर से  भले जल-भुन कर ख़ाक हो रहें हों...पर ऊपर से ढेरों आशीष दे जाते.

कोई -कोई व्यंग कर ही जाते, "क्या मास्साब अब तो अगुआ झूलेगा दरवाज़े पे....जम के दहेज़ लोगे अब तो..."

पति हाथ जोड़ लेते..."ना ना भगवान का दिया सब कुछ  है..बस सुशील लड़की और संस्कारी घर मिल जाए"

पर लोगों   का कहना सच हो गया.... जंगल की आग भी क्या फैलेगी,जैसी प्रकाश की नौकरी लगने की खबर फैली...रोज कोई  ना लड़की के पिता,फोटो,टीपन लेकर हाज़िर हो जाते. पति कितनी बार कह देते अभी शादी नहीं करनी..दो साल बाद करेंगे.पर लोग जबरदस्ती मेज पर फोटो.टीपन  रख कर चले जाते.

पति ने डब्बे भर भर के  बिस्कुट और शहर से सरबत की बोतल लाकर रख दी थी. सख्त हिदायत दी कि ख़तम होने के पहले ही बता दिया जाए और लाकर रख देंगे. कोई भी दरवाजे से बिना सरबत पानी के नहीं लौटना चाहिए. दूर से आने वालों के लिए तो बाकायदा नाश्ता और कभी कभी खाना भी बनता. वे भी रसोई के डब्बे हमेशा देख लेतीं,कि सूजी,घी चीनी सब हमेशा मौजूद रहें.

मीरा और नमिता का अच्छा मनोरंजन होता. लड़कियों के फोटो देख मीन-मेख निकालती, इसकी नाक मोटी है, इसकी आँखें छोटी  हैं.

वे फोटो छीनकर घुड़क देतीं, " ई मत भूलो ,तुमलोग का फोटो भी अईसही कहीं जाएगा और लोग मीन-मेख निकालेंगे. "

दोनों एक सुर से बोलतीं, "हमें नहीं करनी सादी"

अबकी सिवनाथ माएँ,बोलतीं, "त का..माँ -बाप के छाती पे मूंग दलोगी जिंदगानी भर?"

"क्यूँ..पढेंगे लिखेंगे बड़ा आफिसर बनेंगे...पर तुमको  क्या पता..तुमको तो बस लड़की लोग सादी के लिए ही जनम लेती है...ये ही लगता है..चल मीरा बाहर चलते हैं...इन्हें समझाने का कोई फायदा नहीं." और नमिता उछलती कूदती बाहर चल देती.

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पति कहते, अभी कुछ दिन उसे मौज करने दो..तुरंत ही गृहस्थी में मत जोतो. एक बार मन में आता ,कहीं ये कारण तो नहीं कि 'अभी से अपनी गृहस्थी बसा लेगा तो फिर पैसे कैसे भजेगा..और कुछ बाग़ बगीचे बस प्रकाश की नौकरी लगने की बाट जोह रहें थे कि कब आज़ाद हों अपने असली मालिक के पास लौटें.' पर पति से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं हुई. कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं कि खुद भी जिनका सामना करने की हिम्मत नहीं  होती, मन में आए विचार को भी झट से झटक दिए जाते हैं. जुबान पर लाकर पति से कैसे पूछतीं?

प्रकाश सिर्फ एक दिन के लिए घर आया.हॉस्टल का समान घर पर रखा. दुनिया भर का अल्लम गल्लम समान था. बोरी भर कर तो किताबें थीं. सिर्फ एक अटैची और बेडिंग ले कर चला गया. इतना समय भी नहीं दिया की वे ज्यादा कुछ बना पातीं. निमकी खजूर बना कर बाँध दिए. चिवड़ा देने लगीं तो मना कर दिया, फिर से एक नई चिंता सवार हो गयी.पता नहीं कहाँ रहेगा,रोज होटल में खायेगा. क्या सेहत रहेगी?

नमिता ने लड़कियों की तस्वीरें दिखानी चाहीं  तो प्रकाश ने एक नज़र नहीं डाली. और उन  से बोला,
 "माँ ये फोटो  वगैरह ना लिया करो और किसी से कोई वादा मत किया करो"

"अरे हमलोग कहाँ लेते हैं...वे लोग जबरदस्ती रख के चले जाते हैं."

"तो उठाकर वापस पकड़ा दिया करो..मुझे ये सब नहीं पसंद.."..उसे क्या  पता..कितना मुश्किल है, ये ...कितने लोग तो इतनी दूर से बार बार आते हैं और कहते हैं...बस आपलोगों से मिलने का मन हो आया...शादी की कोई बात नहीं करते, इधर उधर की  बातें करके चले जाते हैं....कोई कोई तो घंटों गाड़ी में ही बैठ, पति का इंतज़ार करते कि कब वे स्कूल से आएं. मीरा ,किसना ..गाँव के और बच्चे बताते कि दूर एक पेड़ के नीचे गाड़ी लगा कोई अंदर बैठा है"

इसे क्या  पता बेटी का  बाप होना क्या होता है...वे मन ही मन सोचतीं.

प्रकाश के पत्र आते, एक दोस्त के साथ मिलकर घर ले लिया है. होटल में खाता हूँ. बहुत ही महंगा शहर है, एक पैसा नहीं बचता. पति कहते, 'बेचारे के खुद के ही खर्च पूरे नहीं पड़ रहें,घर पर  क्या भेज सकेगा...और मुझे चाहिए भी नहीं...बस वो सुखी रहें"

छः महीने के बाद प्रकाश घर आया, उपहारों से लदा फंदा. बहनों के लिए सुन्दर सी घड़ी लाया था. उनके लिए कीमती साड़ी, पति के लिए बढ़िया  पोलिस्टर के शर्ट-पैंट का कपडा. यहाँ तक कि सिवनाथ काकी, राम-खिलावन काका के लिए भी साड़ी और कुरता लेकर आया था. बहुत खुश लग रहा था. उसकी  पसंद की सारी चीज़ें बनाईं. जब दोपहर को वो उनके पास आकर लेटा तो मन भर आया उनका.अब तक ये सब लाड़ वो दादी से ही करता था. उनसे ही अपनी फरमाईश की चीज़ें बनवाने को कहता. शहर की चीज़ों की बखान करता. मालूम है दादी, वहाँ दूध कैसे आता  है???...मशीन से..
लडकियां कैसे कैसे कपड़े  पहनती हैं,बताऊँ?"

और अम्मा जी डाँटती रहतीं, "तू यही सब करने गया है शहर में...पराई लड़की का केवल पैर का अंगूठा  देखना  चाहिए..."

"क्या दादी....मैं कहाँ देखता हूँ.....अब आँखें बंद कर चलूँ क्या सड़क पे...किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो,..."
"भाग तू यहाँ से...जो मुहँ  में आता है..बोलता है.." अम्मा जी सचमुच नाराज़ हो जातीं.

आज उनके पास लेटा नए शहर, अपने ऑफिस अपनी नौकरी  के बारे में बता रहा था .फिर अचानक बोला, "अभी भी लड़कियों के फोटो लेकर लोग आते हैं?"

"आते तो हैं ही बेटा..लड़की वाले भी मजबूर हैं..कहाँ बात बन जाए,क्या पता,इसलिए कोशिश करते रहते हैं "
"माँ...असल में मैने इसलिए मना किया था क्यूंकि मैने एक लड़की पसंद कर ली है. उसके माँ-बाप भी मान गए हैं....और जब से नौकरी लगी है...शादी के लिए जोर दे रहें हैं "

अब बेटे के सारे लाड़ की वजह समझ में आ गयी.वो उसकी साड़ी,घड़ी लाने की ख़ुशी एकदम से तिरोहित हो गयी. क्या क्या सपने देखे थे...अब पता नहीं...कहाँ की  ,किस जात की, किस बिरादरी की लड़की है"

"तुम्हारे पिताजी मानेंगे?"

"पापा जी क्या अनपढ़ गँवार हैं  जो नहीं मानेंगे....टीचर हैं....टीचर तो समाज को नया रास्ता दिखाता है...मुझे पता है...वो ना नहीं करेंगे , पर ये बात तुम्हे ही वहाँ तक पहुंचानी होगी...मुझे अच्छा नहीं लगेगा...बात करते"

"ठीक है बेटा...चलूँ जरा आँगन में देखूं...मिर्चा सूखने को डाला था..शाम होने से पहले उठा लूँ"....कहती वे उठ आयीं.

रात में जब पति को बताया...तो वे चौंक गए फिर एकदम हताश हो, सर पर हाथ रखकर बैठ गए, "अब क्या कर सकते हैं...कोई बच्चा तो है नहीं...अगर मना करेंगे  तो बेटा भी हाथ से जायेगा...अब जो करे...हमने अपना धरम निभाया..अच्छी शिक्षा दी...अभी तक एक पैसा उसका नहीं जाना..खेत-बाग़-बगीचा सब गिरवी रख दिए ,का उसको पता नहीं कि खाली टीचर की तनखाह में ई सब नहीं हो सकता. जब वो अपनी जिम्मेवारी खुद नहीं समझता तो हमारे समझाने से क्या  समझेगा..जाने दो..सबूर करो, ममता की माँ...हम अपने कर्त्तव्य से नहीं चुके...बस यही  संतोष है"

फिर थोड़ी देर बाद पूछे..."कौन जात है?"

"मैने नहीं पूछा "

"हाँ ठीक है..... क्या फरक पड़ता है."...और थके क़दमों से बिस्तर पर चले गए सोने ,पर उन्हें  पता था आज नींद उनकी आँखों से दूर ही रहेगी.

प्रकाश  ने कुछ नहीं पूछा,कि बाबूजी ने क्या बोला...बस इतना बताया कि कुछ दिनों में लड़की के पिता आयेंगे. सब बात कर लेना. यानि कि उनलोगों की सहमति-असहमति की कोई गुंजाईश ही नहीं छोड़ी  थी. दूसरे दिन ही वह चला गया, यह कहते कि छुट्टी नहीं है और फिर छुट्टी बचानी भी है. उसका इशारा वे समझ गयीं थीं.

उसके जाने के बाद, नमिता उनके पास आई और बड़े गहरे  राज़ भरे स्वर में बोली, " माँ नाराज़ तो नहीं होगी...कुछ दिखाऊं तुम्हे ?"

उनके 'क्या' का इशारा करने पर पीछे छुपे हाथ आगे कर दिए, "ये देखो अपनी बड़की पुतोह का फोटो..."

सुन्दर सी शहरी लड़की लग  रही थी,जैसे शहर में खाने को नहीं मिलता..सींक सलाई सी

उन्होंने कुछ नहीं बोला, तो नमिता बोली..."माँ भैया कह गए हैं...माँ को मनाना तुम्हारी जिम्मेवारी...क्या फर्क पड़ता है, माँ ज़िन्दगी तो भैया को बितानी है,ना..."

"मैने कहाँ मना किया है..प्रकाश को भी कुछ नहीं बोला..."

"ओह्ह तो तुम्हे सब मालूम  है..." वो अपने ऊपर से इतना जिम्मेवारी वाला काम हट जाने से दुखी हो गयी..
"हाँ सब मालूम है...और अब जरा घर दुआर को साफ़ सुथरा रखा कर...बाहर टेबल पर भी ममता का कढाई किया हुआ टेबल क्लॉथ बिछा दिया कर. कभी भी लड़कीवाले बात करने आ सकते हैं.

"अरे वाह...तब तो भैया का ब्याह जल्दी ही होगा...कितना मजा आएगा..." कहती खुश होती वो चली गयी.

आठ दिन भी नहीं बीते थे कि इक इतवार को ,एक चमचमाती कार दरवाजे पर रुकी.एक सूटेड बूटेड सज्जन कार से उतरे. वे जल्दी से  पति को बुलाने चली गयीं.."अरे जरा कुरता बदल लीजिये...ये दिन भर पहने से मुचड़ गया है..इस्त्री किया हुआ पहन लीजिये वो तो कदम सूट-बूट में डटे हुए हैं"

पति मुस्कुरा दिए.." तो क्या हुआ...बेटा के बाप तो हम हैं..मेरे दरवाजे पर वे आए हैं...हम तो ऐसे ही जाएंगे...तुम जाओ नाश्ता-पानी का इंतज़ाम देखो...बढ़िया नास्ता बनाना ...रिश्तेदारी जुड़ने जा रही है"

उनका मन नहीं लगता चौके में...कलावती को हलुआ बनाना समझा वे दरवाजे की ओट में जाकर बात सुनने की कोशिश करतीं. फिर दूसरे ही पैर चौके में लौटतीं.

पति बड़े इत्मीनान से उनसे बातें कर रहें  थे...आज उन्हें पढ़े -लिखे की कीमत समझ में आई. लड़की के बाप तो रंगीन कमीज़ में एकदम किसी फ़िल्मी हीरो जैसे लग  रहें थे.पर मैले कुरते में भी उनके पति उनसे एकदम समान स्तर पर बात कर रहें थे. शायद बेटे के बाप होने के दर्प ने भी उनका माथा ऊँचा रखा था. जब उन्होंने लेन -देन की बात छेड़ी तो पति ने एकदम कह दिया, " ना...मैं नहीं विश्वास करता दान -दहेज़ में. आप चाहें तो अपनी लड़की को दो कपड़ों में भेजें या नौलक्खा हार पहनाकर आपकी ख़ुशी.पर जो  देना हो अपनी बेटी को दें...मुझे कुछ नहीं चाहिए"

"लेकिन बारात लाने का खर्चा...शादी का खर्चा ..उतना तो ले लीजिये"

"ना..इतना दिया है भगवान ने कि मैं बेटे की शादी में एक भोज खिला सकूँ, गाँव को...आप माफ़ कीजिये हमें"..पति ने हाथ जोड़कर मना कर दिया.

वे दरवाजे के पास से कलावती और मीरा के हाथों,नाश्ता शरबत भेज रही थीं. लड़की के पिता ने आहट सुनकर कहा, "भाभी जी को भी बुलाइए,उनके भी दर्शन कर लूँ...इतने भाग्य वाली  है मेरी बेटी कि ऐसा घर-वर उसे मिला है....धन्य हो जाऊंगा मैं गृहलक्ष्मी के दर्शन करके"

"ममता की माँ...बाहर आओ...तुमसे  मिलना चाहते हैं.."

उनकी तो सांस रुक गयी...ऐसे कैसे चली जाएँ..गैर मर्द  के सामने.

"ममता  की माँ "..इस बार पति की आवाज़ में खीझ  और गुस्सा था.

वे जल्दी से सर पर पल्ला संभालते,बाहर चली आयीं.

वे सज्जन एकदम हाथ जोड़ते उठ खड़े हुए. उन्हें झुक कर नमस्ते कहा.और कुर्सी पर बैठने का  इशारा करने लगे.

उनकी पूरी ज़िन्दगी में किसी ने इतना सम्मान नहीं दिया था . वो भी एक गैर मर्द ने. लड़के की माँ होने का क्या इतना रुतबा होता है? किसी तरह फंसे गले से उनके नमस्ते का उत्तर दिया.और सर झुकाए ही खड़ी रहीं. कुर्सी पर तो बैठने का  सवाल ही नहीं था. खड़े होने में ही उनके पैर काँप रहें थे. फिर जल्दी से बोलीं, "मैं  गरम पूरियां भेजती हूँ..आप शुरू  कीजिये" इतना बोलने में ही उनका चेहरा लाल हो गया और वे हांफती हुई अंदर चली आयीं.

प्रकाश की बारात शहर में ही गयी. नमिता,स्मिता,ममता सब बारात में गयीं.पहले लड़की लोग नहीं जाती थी  पर प्रकाश और बच्चों ने जिद किया. तो पति को भी उनकी बात माननी पड़ी. सारा काम प्रमोद देख रहा था. खाने नहाने की भी सुध नहीं रहती उसे. लौट कर चपर चपर करनेवाली नमिता ने बताया.."माँ ऐसा सजा  था मंडप कि गाँव वाले लोग तो आँख फाड़ कर देख रहें थे...और खाना तो बस क्या बताएं. बहुत बढ़िया इंतज़ाम था माँ. और भाभी तो किसी परी सी लग रही थी."

बहू सचमुच अच्छी थी,अब प्रकाश ने पट्टी पढाई थी या वो ही सीधी थी.पर रस्म निबटाती रही,उनके कहे अनुसार.

जब दूसरे दिन मुहँ दिखाई की रस्म होने वाली थी तो दोनों बहनों में ही बहस हो गयी. ममता का मन था जैसा गाँव में होता है, आँखें बंद कर बहू  का घूँघट उठा कर सब मुहँ देखते हैं,वैसा ही होना चाहिए. जबकि स्मिता ने कहा, :"ना दीदी अब शहर की कोई लड़की घूंघट  निकालने को तैयार नहीं होती. एक कुर्सी पर भाभी को तैयार करके बिठा देते हैं.और आस-पास कुछ  कुर्सी लगा देते हैं .पलंग तो है ही कमरे में. लोग आएँगी वहीँ बैठकर भाभी का मुहँ देख लेंगी"

"पर गाँव वाले बातें बनायेंगे"

"बनाने दो...वो तो वैसे भी बनायेंगे..कोई ना कोई कमी खोज ही लेंगे..चाहे तुम कुछ भी करो..और हमलोग बदलाव नहीं  लायेंगे तो ई सब कैसे बदलेगा...किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी,ना..अपने घर से ही शुरुआत होने दो. "

ममता भी  मान गयी...और उन्हें संतोष हो आया...ऐसे ही ममता को गाँव में ब्याह कर वे थोड़ी असंतुष्ट थीं. कहीं दोनों  बहनों में कोई द्वेष ना हो जाए.अब स्मिता , बंबई की दुनिया में रम गयी थी, पहले सी बीमार नहीं दिखती,चेहरे की रंगत भी लौट आई थी.

पर कुछ लोगों ने कमी निकालने में कोई कोर कसर  नहीं छोड़ी. दिलीप की माँ तो वहीँ पर जोर से बोली..."इ देखो..नईकी बहुरिया त  कुर्सी डटा कर बैठी है, ना घूंघट ना पर्दा....ई त सहर नहीं हैं...इहाँ त गाँव का रिवाज़ चलना चाहिए"

"चाची..बढ़िया है ना...जी भर के देखो बहुरिया को...घूंघट उठा के एक पल को, बस देखने को मिलता...और इतना गर्मी है,कहीं घूंघट के चलते बेहोस हो जाती तो वो भी देखने को नहीं मिलता." ममता ने सफाई दी .

"हाँ आखिर दादी की पोती हो ना..उनपर ही जाओगी ..ऊ भी हमेसा गाँव में नया चाल चलाती थीं." उनके बेटे की दूसरी शादी होने से अम्मा जी ने रोका था यह बात वे भूली नहीं थी जबकि शादी के आठ साल बाद, दिलीप की बहू के गोद में फूल सा बेटा खेला, ये बात वो याद नहीं रखतीं.

सब कुछ हंसी ख़ुशी  निबट रहा था. वो एक एक रस्म याद करके करवा रहीं थीं. दूसरे दिन ही प्रकाश ने बोला, 'माँ आज शाम हम लोगों  को निकलना है.."

"हम लोगों को?"....वे बिलकुल नहीं समझीं.

"हाँ माँ,मुझे और प्रीति को वो क्या है ना....प्रीति के पिताजी ने कश्मीर का टिकट कटवा दिया है...वहाँ घूमने जाना है...नहीं तो टिकट बेकार हो  जायेगा.."

"बस तुम और दुल्हिन?"

"हाँ माँ..प्रकाश कुछ झेंप गया "...तो वो बडबोली,नमिता बोली.."का माँ .तुमको तो कुछ पता ही नहीं..भैया हनीमून पर जा  रहें हैं.."

"हनीमून....वो कौन सी जगह है...कश्मीर तो सुना है.."

प्रकाश उठकर बाहर चला गया. स्मिता धीरे से हाथ पकड़ उन्हें एक तरफ  ले गई , "माँ आजकल लड़का -लड़की शादी के बाद घूमने जाते हैं...उसे ही हनीमून कहते हैं.."

"अकेले??" उन्हें ये बात बिलकुल समझ  नहीं आ रही थी.

नमिता फिर टपक पड़ी..."तो क्या पूरे गाँव को लेकर जाएंगे?..दीदी तुम छोडो माँ को समझ में नहीं आएगा."

तभी छटंकी मीरा बोल पड़ी.."हनीमून में क्या मून को देख के हनी खाते हैं " आजकल उसे अंग्रेजी पढने का बहुत शौक चढ़ा था. पति छोटी छोटी अंग्रेजी की कहानियों की किताबें ले आते और वो उनमे से पढ़ उन्हें भी सुनाया करतीं...और शब्दों के अर्थ मोटी सी डिक्सनरी से ढूंढ कर बताया करती.पति की तरह इसे भी पढने का बड़ा शौक था. हर वक़्त किताबें थामी रहती.

पर स्मिता ने डांट दिया उसे, "भाग यहाँ से अंग्रेजी की बच्ची जब देखो...बड़ों के बीच में घुसी रहती है..जा बाहर जा के खेल"

"पर 'चौठारी 'कैसे होगा...रोज़ ही कोई ना कोई रस्म होते...हर दिन एक रस्म  का तय था"

"माँ , अब तुम अपने आप कर लेना रसम. भैया  की शादी क्या आम शादी जैसी है?...जब दूसरे जात की लड़की लाने में परहेज़ नहीं की तो फिर ई सब रसम के पीछे क्यूँ पड़ी हो." ..अपनी छोटी बेटी को कंधे पर थपकाते ममता बोल पड़ी.

"धीरे बोल.... गाँव में अभी किसी को नहीं  मालूम...."

"क्या माँ...सबको पता होगा..ऐसी बातें नहीं छुपतीं..तुम्हारे मुहँ पे कोई नहीं बोलता...सब काना फूसी करते होंगे"...और वे सोचने लगीं..कितनी सयानी हो गयी हैं उनकी बेटियाँ...उन्हें ही घेर कर समझा रही हैं.

और अब उन्हें पता चला कि बहू के मायके की गाड़ी और ड्राइवर अब तक क्यूँ रुका हुआ था. इन्हें वापस ले जाने को. और बहू क्यूँ सर झुकाए सारे रसम कर रही थी. उसे तो पता था, दो दिन बाद चले ही जाना है..चलो सुखी रहें दोनों..जहाँ रहें, उन्हें और क्या चाहिए. सोचती पर मन ही मन उदास होती वे गाँव में बयना भेजने की तैयारी करने लगीं. हफ्ते भर में सारे मेहमान चले जाएंगे. बहू  तो शाम को ही चली जाएगी. लगेगा ही नहीं इस घर में अभी अभी ब्याह हुआ है और दुल्हन उतरी है.

(क्रमशः)

Saturday, July 10, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -8)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था और छोटा बेटा मेडिकल में.ससुर जी की छत्र छाया भी कैंसर जैसी  बीमारी ने छीन ली)

गतांक से आगे


पति को लेनदारों से ज्यादा फिकर अम्मा जी की हालत की थी. बाबू जी के जाने के बाद, अम्मा जी का सिर्फ बाहरी रूप ही नहीं बदला था,अंदर से भी वे बिलकुल बदल गयी थीं,ऐसा लगता था पुरानी अम्मा जी कहीं गुम हो गयी हैं....ना वह रौबदार आवाज़,ना वह चौकस निगाह...खुद में ही खोयी सी बैठी रहतीं.


गाँव में इतने काज-प्रयोजन होते पर अब वे कहीं नहीं जातीं. हर शादी में अम्मा जी की बड़ी खोज  होती थी...क्यूंकि सारे रस्मो-रिवाज उन्हें ही याद रहते थे. जबतक वे ना जाएँ रस्म शुरू नहीं होती थी. चाहे हल्दी की रस्म हो...मटकोर की या बिलोकी की. गाँव में शादी के दस दिन पहले से गीत गाने का रिवाज़ था. शुरू में पांच गीत भगवान के गाये जाते. लड़कियों को तो बस उन दिनों के चलन  वाले गीत याद रहते या फिर गीतों भरी  गालियाँ ..अम्मा जी ही सब याद रखती थीं.


किसी बच्चे के जनम की चिट्ठी आई गाँव में और घर घर न्योता पहुँच गया, सोहर  गाने का. औरतें जमा होतीं, गीत गाने के बाद  उनके बालों में तेल लगाए जाते और मांग में सिंदूर. और बताशे बांटे जाते. पर ये सब सिर्फ लड़के के जन्म पर ही होता. लेकिन स्मिता की बेटी के जनम पर उन्होंने आग्रह किया था गीत गवाने का. अम्मा जी मान गयी थीं और जब ममता के बेटे के जनम जैसा इस बार भी पति बताशे की जगह लड्डू लेकर आए तो गाँव वालों में कानाफूसी शुरू हो गयी थी, "का ज़माना आ गया है....लरकी लोग  सब कालेज जा रही है....बेटी के जनम पर बधाई,गाई जा रही है.....नयका चाल सब...पता नहीं आगे का का देक्खे को मिले"


अम्मा जी को  शादियों में जाने का भी बड़ा शौक था. सुन्दर चमकीली साड़ियाँ निकालतीं. ढेर सारे गहने पहनतीं, झुमके, हँसुली, सीता -हार, करधनी ...कभी कभी तो बाजू बंद भी. लम्बी सी चोटी, माथे पर बड़ी सी टिकुली और भर मांग सिंदूर..लम्बी चौड़ी काया थी, गोरा रंग,ऊँचा माथा,उस पर जब गर्वीले चाल से चलतीं तो किसी राजरानी सी ही लगतीं.

पर अब उनकी तरफ देखा नहीं जाता. सादी सी साड़ी, बिना किसी श्रृंगार के रूप...आभरण विहीन शरीर...चाल भी थकी थकी सी हो गयी थी. किसी भी शादी ब्याह में अब वो शामिल नहीं होतीं. लोग बुलाने आते, नमिता पीछे पड़ जाती,पर वे टाल जातीं...जबकि बड़ी बूढ़ियाँ शादी में शामिल होती थीं,पर एक किनारे बैठी होतीं.वहीँ से निर्देश दिया करती थीं. पर किसी चीज़ को हाथ नहीं लगातीं. दूर ही रहती थीं. अब तक हमेशा अम्मा जी केंद्र में रहती थीं. इस तरह हाशिये पर रहना उन्हें गवारा नहीं था.

कितनी बार अम्मा जी ने बात संभाली थी . पड़ोस के रामबिलास बाबू की लड़की की शादी में लेन देन को लेकर कुछ अनबन हो गयी,बारातियों और सरातियों के बीच. उसपर से गाँव के लड़कों ने अपनी नाराजगी दिखाने को,बारातियों के कपड़ों पर खुजली  वाले  पाउडर डाल दिए. लड़के के चाचा,भाई,नाराज़ होकर बारात वापस ले जाने लगे. बार बार लड़के को आवाज़ देते बाहर आने के लिए.. लड़का आँगन में मंडप में बैठ चुका था. उनकी आवाज़ सुन वह झट से खड़ा हो गया,बाहर जाने को.

पर अम्मा जी ने उसकी कलाई पकड़ ली और कहा, "चुपचाप बैठिये मंडप में...बिना फेरा लिए और लड़की की मांग में सिन्दूर भरे आप आँगन नहीं टप सकते."

लड़का कसमसा कर रह गया,बाहर जाने को..पर जा नहीं पाया....और अम्मा जी ने कड़े  स्वर में पंडित जी को आदेश दिया, "आप हल्ला गुल्ला पर ध्यान मत दीजिये,मंतर पढ़िए...सुभ मुहूरत नहीं बीतना चाहिए"

फिर लड़की की छोटी बहन को डांटा..."का मुहँ ताक रही है...जा, अपने बाबूजी को बुलाकर  ला,रसम करना होगा. बाहर उनके भाई-भतीजा सब सलट लेंगे और रामावतार बबुआ के बाबूजी भी हैं...सब संभाल लेंगे.


फिर रोती हुई लड़की की माँ को आवाज़ दी..." अबही बेटी बिदा नहीं हो रही है...जो इतना रो रही हो...अभी समय है...बईठो, सकुन्तला के बाबूजी के बगल में और रसम करो"

हर शादी -ब्याह के मौके पर इसकी चर्चा जरूर होती थी.

और अम्मा जी सिर्फ शादी ब्याह में ही बात नहीं संभालतीं .अनदिना भी कहीं कुछ झंझट हो तो एकदम मुसतैद  रहतीं. एक बार नमिता दौड़ती हुई आई कि कैलास बाबू के यहाँ बहुत रोना-पीटना मचा हुआ है. कैलास बाबू के बेटे  दिलीप की दूसरी सादी की बात चल रही है और दिलीप की पत्नी धाड़ें मार कर रोते रोते बेहोस हो गयी है. हमेशा कहीं भी कंघी-चोटी कर के , साड़ी बदल कर जाने वाली अम्मा जी,ने जल्दी से पैरों में चप्पल डाला और नमिता के साथ निकल गयीं. वे विकल हो रही थीं, जानने को,वहाँ क्या हुआ? नमिता तो सारी बात बिना सुने वहाँ से टस से मस नहीं होती.

उन्होंने मीरा को बोला, "तू थोड़ी देर में आके बता, वहाँ क्या हो रहा है"


पहली बार ऐसी कोई जिम्मेवारी मिलने पर मीरा ख़ुशी से फूली  नहीं समाई और  दस मिनट में दौड़ती हुई आई ..."माँ, दादी तो सबको डांट रही हैं...दिलीप चाचा को बोल रही हैं...तुमरे भाई के बच्चे का तुमरे बच्चे नहीं हैं जो दुसर बियाह करने चले हो...इनको ही अपना बेटा-बेटी के तरह पियार दो..अपने माँ-बाबू से जियादा तुमको मान देंगे .."
और मीरा ने पूछा..."फिर से जाऊं...और सुन के आके बताऊँ?"

पर उन्होंने  मना कर दिया..कैसे अपनी छोटी सी बेटी में ये आदत डालती कि दूसरों की बातें सुन कर बताये ...और फिर पता था...अभी तो हफ़्तों  तक गाँव में यही चर्चा रहेगी. एक एक बात दस दस बार दुहराई जाएगी. और उनके घर मे काम करने वाली सिवनाथ माएँ तो ऐसी जगहों पर जरूर मौजूद रहती.और फिर तफसील से उन्हें सारी बात बताती.

"अरे पता है दुलहिन, (दादी बन जाने के बाद भी गाँव के कुछ लोगों  के लिए वे दुलहिन ही थीं ) बड़की मलकिनी ने तो कैलास बाबू को अईसा डांटा की का बताएं, बोलीं.." "बौरा गए हैं का..बुढापा में?...ऊ औरत पर का बीतेगी..इसका तनको गुमान है?... कहाँ जायेगी वो ..?"

"भौजी...वो काहे  कहीं जायेगी ?..रानी बनके रहेगी..दिलीप के बच्चों को खेलाएगी"

"बहुत देखे हैं बबुआ...कए दिन  रानी बनके रहती है...सब पता है..ऐसा अनरथ  मत करो....भतीजा  भी तो बेटा सरीखे ही होवे है  और अबही कौनो उमर है...पांचे बरिस में उमीद छोर दिए? "

"अरे भगवान का दिया सब कुछ है भौजी...दुनो जन आराम से रहेंगी..कौन तकलीफ नहीं होगी,दिलीप के दुलहिन को...तुम चिंता जनी करो....मालकिन बड़की दुलहिन ही रहेगी.."

"ई त नहीं होगा...आप जबरदस्ती बियाह करोगे दिलीप का..तो गाँव का कोई सामिल नहीं होगा...जाओ सहर में कागज़ी बियाह करो...और फिर सहर में ही बसा दो उनको. ई घर में तो इहे दुलहिन मलकिनी रहेगी...." मलकिनी ने  ने फैसला सुना दिया.


फिर अंदर जाकर रोती हुई दुलहिन को बच्चे की तरह छाती से चिपका कर उसकी सास से बोलीं, "तुमको तनिको दया नहीं आती...औरत हो, औरत का दर्द समझो.."


बड़की मलकिनी ने तो दिलीप के दुलहिन को उबार लिया ,उसका रोआं रोआं मलकिनी के रिन से कभी  उरिन नहीं होगा.


सिवनाथ माएँ, गर्व से फूली जा रही थी कि वह, उनके यहाँ काम करती है. और क्यूँ ना करती,अम्मा जी ने कई बार उसकी बस्ती के झगडे भी सुलझाए हैं. सास बहू के..माँ-बेटे के...पति -पत्नी के . सिवनाथ माएँ को भी उसकी बहू ठीक से खाना नहीं देती थी. यहाँ से उसे पूरा खाना मिलता लेकिन वह यहाँ  नहीं खाती.अपनी गहरी सी पीतल की थाली में दाल चावल सब्जी लेकर घर जाती और पोते पोतियों को खिला देती. उसके घर में जो साग-भात रुखा सूखा बना होता...वो भी उसकी बहू उसके लिए नहीं रखती.सिवनाथ माएँ, भूखी ही लेट  जाती और फिर सिर्फ पानी पीकर चेहरे पर मुस्कान लिए शाम के काम के लिए हाज़िर हो जाती.

वो तो भला हो घर घर  की बिल्ली नमिता का, उनकी बस्ती में वह  थरमामीटर ले एक बीमार बहू का बुखार देखने गयी थी. नमिता एक तरह से उस बस्ती की डाक्टर थी. किसी को बुखार की,किसी को सर दर्द की..पेट दर्द की तो जुलाब की दवा, वो ही दिया करती. अपने पापा जी से जिद कर बिस्किट के पैकेट भी मंगवाती और किसी बीमार को देकर आती. उसने ही एक दिन देखा कि सिवनाथ माएँ खाना लेकर आ रही थीं,उनके पोते पोतियाँ दौड़ते हुए उनके पास आए और सिवनाथ माएँ ने अपना सारा खाना पोते पोतियों को दे दिया. नमिता ने दबे पाँव उनकी झोपडी में कदम रखा  तो देखा, चूल्हा ठंढा पड़ा है और बर्तन  खाली. सिवनाथ माएँ ने घड़े से लोटे में ठंढा पानी निकाल कर पिया और चटाई पर जाकर लेट गयीं. वह दबे पाँव वापस आ गयी और दादी को सारी बात बतायी.


गुस्से से उबल रही थी,नमिता. सिवनाथ माएँ के आते ही उनपर बरस पड़ी.." काकी सब देख लिया मैने..जाओ तुम उधर ही रहो...अपनी पुतोह को खाना  भी बना कर दो. सब काम करो उसका,उस दिन देखा था तुम उसको तेल लगा रही थी.और वो तुमको पेट भर खाना भी नहीं देती."

"अरे तुमलोग के लिए ही करते हैं बिटिया..ओ दिन वो छटपटा रही थी देह बत्था से...त तनका तेल लगा के देह जाँत दिए...आज हम अनकर की बेटी की  सेवा करेंगे तो मेरी भी कमली , सुगनी की उसकी सास करेगी..वईसे ही तुमरी सास भी तुमरा ख़याल  रखेगी.."

"मुझे नहीं करना सादी बियाह ...माँ काकी को खाना दो पहले...इनका पेट बस बात करके ही भर जाता है."


बाद में , अम्मा जी ने सिवनाथ और उसकी  बहू को बुला कर बहुत  डांटा और उन्हें उस झोपडी से निकालने की धमकी भी दी अगर उन्होंने अपनी माँ का ठीक से ख़याल नहीं रखा. बाबू जी की दी हुई जमीन पर ही पूरी बस्ती बसी हुई थी,इसलिए उनकी बातों का सब मान रखते थे.


और अब वही अम्मा जी इतनी निरीह लगतीं.पहले मनिहारिन  सबसे पहले उनके घर ही आती. अपनी टोकरी का सब कुछ पहले उन्हें ही दिखाती. हर हफ्ते अम्मा जी चूड़ियाँ बदला करती थीं. टिकुली के नए पैकेट निकालतीं. अब तो मनिहारिन को देखते  ही वे इशारा कर देतीं कि मत आओ आँगन में. अम्मा जी भी उसकी आहट सुनते ही कमरे में जाकर लेट जातीं. उनका कलेजा कट कर रह जाता.

पर अजीब दुविधा भी थी, उस गरीब की भी आस थी,दो पैसे कमाने की.पर उनकी ना हिम्मत होती ना ही मन होता, उसे अपने दरवाजे बुलाने का..


स्मिता ने भूगोल की किताब में पढ़ कर बताया  था कि सूरज स्थिर रहता है और हमलोग जिसपर जन्मे हैं वो पृथ्वी  उसके चारो तरफ चक्कर लगाती रहती है, वे  सोचने लगीं , क्या औरत आदमी का भी कुछ ऐसा ही रिश्ता है.? आदमी सूरज की तरह स्थिर रहता है और औरत की सारी दुनिया उसके  चारो तरफ ही घूमती रहती है. फिर यह भी विचार आया  मन में  और जब कभी सूरज डूब जाता है तो अँधेरी रात आ जाती है, पर सूरज तो दूसरे दिन फिर निकलता है. जबकि पति के जाने के बाद औरत की ज़िन्दगी में ऐसी अँधेरी रात आ जाती है जो कभी ख़त्म ही नहीं होती.

उसका सूरज तो हमेशा के लिए डूब जाता है, औरत की दुनिया ही रुक जाती है, अब वो किसके गिर्द चक्कर लगाए? वो चलना ही भूल जाती है. जबकि अगर औरत कहीं बिला जाए, गायब हो जाए तो आदमी को कौनो फरक नहीं पड़ता.  कोई दूसरी  औरत आ जाती है चक्कर लगाने नहीं तो वह अपनी जगह वैसे ही स्थिर रहता है. उसका कुछ नहीं बदलता. पर ये नियम किसने बनाए हैं ? भगवान ने या फिर खुद आदमी ने? उनका दिमाग कुछ काम नहीं करता.

कहीं भी शादी ब्याह हो, अब अम्मा  जी उन्हें ही जाने को कहतीं. खुद अँधेरे में लेटी रहतीं. फिर उनका मन भटकने लगता,अब ये नियम किसने बनाए? जिस दादी,चाची,माँ का ह्रदय बच्चे के लिए आशीष से लबालब रहता ,हरदम ओठों पर उनके सुख की कामना रहतीं उन्हीं के रस्मों में भाग लेने से कुछ अशौच  हो जायेगा?  कुछ छू देने से अपवित्र हो जायेगा? मन ही मन प्रण लिया उन्होंने, चाहे जो हो जाए...गाँव वाले कुछ भी कहें, दोनों  पोते और पोतियों के ब्याह में अम्मा जी हर रस्म करेंगी. उनको बिलकुल भी वे दूर नहीं रहने देंगी.

पर सोचा हुआ भी हुआ है कभी? अम्मा जी की अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही और खाने पीने से अरुचि बहुत महँगी पड़ी. सिर्फ मलेरिया हुआ. लगा ठीक  हो जाएँगी. डॉक्टर भी कहते, कोई चिंता की बात नहीं. पर अम्मा जी की कमजोर काया यह बीमारी झेल नहीं पायी और वे भी सबको रोते-बिलखते छोड़ ,बाबूजी के पास चली गयीं.


पति के चेहरे की तरफ देखा नहीं जाता. पहले ही कम बोलते थे अब तो ऐसे गुमसुम हुए कि मशीन की तरह बस श्राद्ध कर्म निबटाते  रहें. ननदें आयीं, ऎसी  दिल दहलाने वाली आवाज़ में रोयीं कि आज भी कलेजा काँप जाता है. ममता,स्मिता प्रकाश,प्रमोद सब आए.पर इतने लोगों के होते हुए भी घर मे सन्नाटा छाया रहता. छोटे बच्चे भी सहम  कर धीरे धीरे रोते. अब तो बिलकुल अनाथ हो गए  सब.
(क्रमशः)

Thursday, July 8, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -7)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था और छोटा बेटा मेडिकल की तैयार)

गतांक से आगे
 


 प्रमोद की मेहनत रंग लाई और उसे मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया. नमिता ने यह खबर  सुनते ही कहा, "चलो अच्छा हुआ,डॉक्टर की फीस बची...अब छोटके भैया  अपना इलाज़ खुद कर सकेंगे, एकदम फूलकुमार है, जरा सी हवा चली और बीमार पड़े."

"अरे सुभ सुभ बोल....जब देखो उटपटांग ही बोलेगी" अम्मा जी ने डांटा.

पर प्रमोद इतना खुश था कि बुरा नहीं माना,बोला, " ना मैं तो दिमाग का डॉक्टर बनूँगा और सबसे पहले तेरा दिमाग खोल के देखूंगा...उसमे कुछ भी काम का है या नहीं?"

"माँ...देखो, ना..फिर से चिढाना शुरू.."

"अरी चुप कर...ये भी प्रकाश की तरह अब होस्टल में पढने दूर चला जायेगा...एक बात करने को भी तरसेगी...और झगड़ रही है.?" वे उदास हो गयीं...ये बेटा भी अब परदेसी हो जायेगा.

फिर से एडमिशन और हॉस्टल के खर्च की चिंता सताने लगी. अब तो जैसे यह जानी-बूझी बात हो गयी थी कि पैसे का इंतज़ाम पुरखों के विरासत में छोड़े खेतों से ही होगा. प्रकाश की भी जब फीस की बात आती, कोई ना कोई खेत गिरवी रखी जाती या निकाल दिया जाता. लेकिन अब गाँव वाले भी उनकी ये मजबूरी समझने लगे थे और बाज़ नहीं आते, मौके का फायदा उठाने से. अच्छे से अच्छे खेत के कम दाम लगाते.

इस बार तो हद ही हो गयी,जब गाँव के  नामी गिरामी रामनिवास बाबू  ने कह डाला, "खेतों में तो इतना लगाओ तब जाकर थोड़ा सा अन्न उपजे है. वो आम का बगीचा क्यूँ नहीं गिरवी रख देते. छुड़ा लीजियेगा जब जी चाहे. अब तो दूनो पोता डॉक्टर,इंजिनियर बनने वाला है. आपको क्या फिकर"

पर बाबूजी नाराज़ हो गए थे, "कैसी बातें करते हैं? ..उस बगान का आम ही पसंद है सबको...रामावतार जी को तो बचपन से बस उसी बाग़ के किसनभोग  और तोतापुरी आम के पेड़ का आम पसंद है. उसे कैसे हटा सकते हैं"

"सोच लीजिये...इस बार तो हमारा खेत पर पैसा लगाने का कौनो मन नहीं है" कहते रामनिवास बाबू उठ गए.

रात भर लगता है बाबू जी सोए नहीं..सुबह होते होते...किसना को रामनिवास बाबू के घर भेज दिया. अम्मा  जी भी उदास थीं. उन्होंने ही एक बार फिर हिम्मत की, "बाबू जी रहने दीजिये ना...कोई और रास्ता सोच लेंगे"

" ना बहू, वे  ठीके कहते हैं...तीन साल में तो परकास  नौकरी में आ जायेगा..फिर का डर?....और अब घर में लरिका सब रहेगा कहाँ आम खाने को??... भगवान की दया  से और भी तो बगान है...आम की कौनो कमी नहीं रहेगी. समझो कुछ दिन के लिए उनलोगों  को दे दिए हैं आम खाने को...बस"

पर बहुत ही भारी दिल से किए होंगे हस्ताक्षर उन्होंने. क्यूंकि तन कर चलने वाले बाबू जी ,कचहरी से लौटते समय बड़े कमजोर लगे..कंधे झुके हुए ,थके थके से. अब ये उनकी आँख का भरम था या सच्चाई,क्या पता.पर बड़ी ग्लानि हो आई ,उन्हें. बच्चों के लिए ऊँचे  अरमान रखने की क्या कीमत चुकानी पड़ती है. बच्चे समझ पाएंगे कभी?

छोटा बेटा भी प्रकाश की तरह ही एक अजनबी शहर में अपने सपनो को सच करने चला गया . इसके लिए मन में और चिंता थी. थोड़ा बीमार रहता था. सर्दी जुकाम लगा ही रहता था. बस चैन की यही बात थी कि ननद उसी शहर में थीं, जरूरत पड़ने पर अपने घर ले जायेंगी..इतना संतोष था. बेचारे को कभी कभी घर का खाना नसीब हो जायेगा. नहीं तो प्रकाश जैसा ये भी कहेगा,
"वहाँ तो आलू -बैंगन हो या गोभी मटर  सब की एक सड़ी सी महक. स्वाद ही भूल गया हूँ,सब्जी का" और हंस के बताता, " इतवार को दाल भात और आलू  का भुजिया मिलता है...उस दिन तो हमलोग भात घटा देते हैं और फिर खूब हल्ला मचाते  हैं मेस में"

पति उसका एडमिशन कराने गए और इधर बाबू जी बीमार पड़ गए. पेट में दर्द और बुखार रहता. गाँव के डॉक्टर साब को बुलवा भेजा.जब तक दवा का असर रहता,आराम रहता फिर दर्द शुरू हो जाता.

पति वापस आए तो घबरा गए. बार बार कहते.."बाबू जी को उस बगीचे को गिरवी रखने  का दर्द समा गया है. मैने देखा था,उस दिन उन्होंने वो खिड़की बंद कर दी जिस से वो बगीचा दिखाई देता था...मैने क्यूँ देने दिया...कोई इंतज़ाम करता...लोन ले लेता, पर बगीचा नहीं  देना चाहिए था" भर आई पति की आँखें.

"अब यह सब सोचने का बखत नहीं है...आप कल ही बाबू जी को शहर ले जाने का इंतज़ाम कीजिये." उन्होंने ही जी कड़ा कर पति को ढाढस बंधाया.

अम्मा जी, बाबू जी को लेकर पति,शहर  चले गए. साथ में एक नौकर भी गया. दोनों बेटियों के साथ वे दरवाजे पर टकटकी लगाए रहतीं. आखिर दूसरे दिन गाँव का ही....एक आदमी संदेसा लेकर आया कि बाबू जी को अस्पताल में एडमिट कर लिया है, बहुत सारी जांच होनी है. तीन दिन बाद थके हारे पति कुछ घंटों के लिए ही आए. वह भी पैसों का इंतज़ाम करने.

अब तो जैसे  टोह लेने के लिए गाँव के लोग मक्खियों  की तरह भिनभिनाते रहते घर के आस-पास. देख वितृष्णा सी  हो जाती जिन बाबू जी के गुण गाते नहीं अघाते थे कि कैसे अकाल पड़ा था तब बाबू जी ने अनाज की कोठियां खोल दी थीं....सबको टोकरी भर भर के अनाज बांटा था और आज जब उन पर मुसीबत आई है तो वही गांववाले, जिन  खेतो के अन्न ने उनकी  जठराग्नि को शांत किया...आज उन्हीं  खेतों पर दांत पिजाये बैठे हैं.

पति के साथ, जिद करके बाबा की दुलारी नमिता भी चली गयी. बेचैन हो रही थी, अपने बाबा से मिलने के लिए.

घर में बस वे और मीरा थीं. मीरा शुरू से ही कम बोलती अब तो और भी उसकी हिरणी सी बड़ी बड़ी आँखें डरी डरी सी रहतीं. उन्हें दया  भी आती,इस बच्ची का बचपन छिना जा रहा है.जब से समझने लायक हुई है..कोई ना कोई झंझट घर में लगा ही हुआ है.

 नमिता के जाने से अच्छा ही हुआ. गाँव के ही एक लड़के के साथ, सास वापस आ गयीं. उन्हें लगा ,चलो अस्पताल  में दिन रात के जागरण से थक गयी होंगी. एक-दो दिन आराम कर लेंगी. पर वे तो आने के साथ ही कहीं चली गयीं. और हैरान रह गयीं वे अम्मा जी का ये रूप देखकर. सुबह से शाम वे किसी बाबा ,फ़कीर,ओझा के दरवाजे भूखी-प्यासी  भटकती रहतीं. कभी कभी कोई बाबा आते और तीन तीन घंटे पूजा करवाते. अपने चेलों के साथ..पूरी, मिठाई ,खीर का भोग लगाते, मोटी दक्षिणा लेते और चलते बनते.

पहले संदूक से कुछ भी निकलवाना हो, उन्हें चाभियाँ थमा देती थीं. अब खुद ही कमरा बंद कर के गहने निकालतीं.वे समझ रही थीं, औने पौने दाम में इसे बेच ओझा-फ़कीर को चढ़ावे चढ़ाए जायेंगे. क्या पता , गहने भी दिए जाते हों. पर वे मन मलिन  नहीं करतीं. ये अम्मा जी के गहने थे और ऐसे समय में जब पति बीमार हो...कोई भी स्त्री किसी भी तरह, चाहे उसे ओझा, गुणी, बाबा की शरण में ही क्यूँ ना जाना पड़े, कोई उपाय नहीं छोड़ती, बस अपने पति को  भला चंगा देखना चाहती है.

पर एक दिन उन्हें अम्मा जी को बहुत देर तक समझाना पड़ा. जब हमेशा एक आभिजात्य ओढ़े रखने वाली शख्सियत , गाँव की स्त्रियों के ऊपर एक रुआब, एक दबदबा  रखने वाली अम्मा जी, एक आम औरत की तरह बब्बन की माँ से झगड़ पड़ीं. गाँव की किसी औरत ने अम्मा जी कान भर दिए कि बब्बन की माँ डायन है और उसी ने बाबू जी को कुछ 'कर' दिया है. उस शाम वे उनकी घर की  तरफ से लौट रहें थे, तभी जानबूझकर मंगलवार के दिन को बब्बन की माँ ने सांझ के बखत उन्हें टोका.

बब्बन की माँ,बाबू जी का हालचाल पूछने आई थीं,अचानक जोर की आवाज़ सुन वे बाहर आयीं तो देखा,अम्मा जी हांफ रही हैं और जोर जोर से बोल रही हैं, " भौजी  कहते थे आपको....कुछ तो लेहाज़ करती...कौन बात के जलन है..का मिल जाएगा...कुछ बिगाड़े हैं,आपका...जहाँ तक हुआ है मदद ही किए हैं..आपकी बेटी के बियाह में केतना हंगामा हुआ था....रामवतार बबुआ के बाबू जी नहीं संभालते तो बरात चली जाती लौट के"

" का बोल रही है...भलाई का तो ज़माना नहीं...हम आए थे हाल चाल पूछने और हमी को गरिया रही हैं"

एक तरह से खींच कर वे ,अम्मा जी को कमरे में ले गयीं...उनसे भी माफ़ी मांगी.." चाची जी..अम्मा जी बहुत परेसान हैं..इनके कहने का बुरा मत मानियेगा"

ये सुनकर अम्मा जी का गुस्सा और बढ़ गया..." अरे ऊ का मानेगी बुरा...गाँव के दो दो लोग को खा के बैठी है..ऊ त खुस होगी"

" का बोली..किसको खाए हैं हम....तनका बताओ तो?" बब्बन की माँ जोर से गरजीं

" सिवनाथ माएँssss...." जोर से चिल्लाईं  वे. मामले की नजाकत समझते हुए.सिवनाथ माएँ ,बब्बन की माँ को खींच कर जबरन उनके घर ले गयी. वे अम्मा जी के लिए पानी लेकर आयीं .पर तब तक अम्मा जी का सारा गुस्सा,सारा तनाव आंसुओं की शक्ल ले चुका था. मुहँ पर पल्ला रख, वे जोर जोर से रोने लगीं. अम्मा जी को चुप कराते कराते उनके आंसुओं का बाँध भी टूट गया.और उनके गले से लग देर तक वे रोती रहीं. मीरा कब सहमी सी आकर परदे पकड़ कर खड़ी हो गयी...और भरी भरी आँखों से कांपती हुई सी उन्हें निहारने लगी...उनलोगों  को पता भी नहीं चला.
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बाबू जी का जांच पर जांच होता गया. काया क्षीण  होती गयी.पर बीमारी का पता नहीं चल रहा था. अब बारी बारी से वे, नमिता, अम्मा जी शहर आते जाते रहते. प्रमोद,प्रकाश के पढने के लिए जो घर लिया था,उसी घर में  लोग रहने लगे. बेटी दामाद सब आ गये. पति आए दिन गाँव जाते और ढेर सारे रुपये लेकर आते. सहम  जातीं वे , पता नहीं इस बार कौन से खेत का अन्न अब उनकी कोठी का मुहँ नहीं देख पायेगा?

बाबू जी की बीमारी ने  सास का रुख नमिता के प्रति बहुत नरम कर दिया था और कैसे ना हो...नमिता ने बाबू जी का सिरहाना एक पल के लिए नहीं छोड़ा था. पूरी पूरी रात जाग, उनके तलवे सहलाती, पानी पिलाती, इधर उधर की  बात कर उनका जी बहलाती. जरूरत पड़ने पर ,बिना किसी का इंतज़ार किए दवा लाने भी चल देती. अम्मा जी का पूजा पाठ बहुत बढ़ गया था. रोज चार चार घंटे कोई ना कोई जाप करती रहतीं. बाबूजी तो बीमारी के कारण अपनी पुरानी काया की छाया भर दिखते पर अम्मा  जी   उनकी बीमारी की चिंता में घुल कर ही आधी रह गयी थीं.

आखिर जब, दूसरे सहर से बड़े डॉक्टर आए , उन्होंने जांच करके बताया कि कैंसर है. पति तुरंत उनको दिल्ली बम्बई ले जाकर इलाज़ कराने का सोचने लगे पर उस डॉक्टर  ने बताया कोई फायदा नहीं.अंतिम स्टेज है, अब कोई दवा असर नहीं करेगी. पूरा रोना -पीटना मच गया. सबको सम्भालना मुस्किल. फिर भी पति ने ननदोई के साथ मिलकर दिल्ली ले जाकर दिखाने का इंतज़ाम किया. बाबू जी बार बार कहते, "मुझे बस गाँव ले चलो..अंतिम दिन वहीँ गुजारने का मन है..." पर जबतक सांस तब तक आस..उन्हें ले जाने का सब इंतज़ाम हो गया,दूसरे दिन निकलना था और रात में ही बाबू जी के प्राण ने शरीर त्याग दिया. उनका नश्वर शरीर ही गाँव आ पाया. पूरा गाँव उमड़ पड़ा.

पति पर बहुत जिम्मेदारी आ गयी...सब कुछ अकेले  संभाल रहें थे. उन्होंने घोषणा कर दी...बाबू जी का श्राद्ध इतने धूमधाम से करूँगा...कि पूरा गाँव देखेगा. वे कुछ बोली नहीं ,पर सोचने लगीं...पैसे का इंतज़ाम कैसे होगा? और जब फिर से लोगों का जमघट बाहर के कमरे में देखा और पति को कागज़ पत्तर समेटते तो टोक बैठीं. आखिर दो बेटियाँ ब्याहनी बाकी थीं. दोनों बेटे की पढ़ाई अधूरी थी. पति का पिता प्रेम वे समझ रही थीं पर इस तरह आंखों के सामने, ऐसी लापरवाही वे नहीं देख पायीं.पर पति नाराज़ हो गए,
 "मेरे बाबू जी थे, मुझे पता है,क्या करना है क्या नहीं? ..तुम्हारे घर में यह सब होता होगा कि आदमी दुनिया से गया और भुला दिया. मैं तो ऐसा भोज दूंगा कि बरसों तक गाँव वाले बाबू जी का श्राद्ध ,याद रखेंगे."

काठ मार गया, उन्हें ... मेरे बाबू जी ??...तुम्हारा घर??..सारी ज़िन्दगी गुज़ार दी यहाँ और आज एक पल में पति ने पराया कर दिया. आँसू भरी आँखों से कुछ कहने को सर उठाया पर आजकल तो पति के पैर घर में टिकते ही नहीं. बोलने के बाद दनदनाते  हुए निकल गए. उनका दुख दूना-चौगुना हो गया.एक तो सर पर से बाबू जी का साया उठ गया और आज तो लगा भरी दुपहरिया में किसी ने बीच राह पर छोड़ दिया है, और दूर  तक बस जलती हुई राह पर नंगे पैरों,  अकेले ही चलना है.

इसके बाद होठ सिल लिए उन्होंने. पति पैसे लाकर देते, कहते, "संभाल कर रख दो"...वे रख देतीं. कहते "इतने निकाल कर दो".....वे दे देतीं. पूछतीं कुछ नहीं पर देखती रहतीं, बड़ा सा पलंग बनवाया गया, कपड़े लत्ते,बर्तन बासन की तो बात ही नहीं. घर में जन्मी,पली  गाय भी जब अपने नवजात बछड़े के साथ दान करने की बात सुनी तो आँखें भर आयीं,उनकी. मीरा बिना उसे रोटी खिलाये खाना नहीं खाती थी और जब से बछड़ा जन्मा था ..उसका नाम "भोला " रखा था और भोला के साथ खेलते थकती नहीं थी वो.बस सोच रही थीं, मीरा को कैसे , समझायेंगी.

पति का इस तरह पैसे लुटाना ,अम्मा जी को भी खटक गया. तीसरे दिन जब साधुओं को जीमाना था और हर साधू अलग से दक्षिणा मांग रहा था, पति उनकी मांग पूरी करते  जा रहें थे तब अम्मा जी ने ननद को आवाज दी, "परमिला जाकर बबुआ के  हाथ से बैग छीनो.....का जाने का मन में है उसके..बीवी बच्चों की कोई फिकर ही नहीं...तुमरे बाबू जी का बहुत खुस होते, अपना अरजा  हुआ धन दौलत ऐसे लुटते देख? "

वे भी जानती थीं., बाबू जी भले ही किताबें नहीं पढ़ते  थे पर उनके व्यावहारिक ज्ञान के आगे सब किताबी ज्ञान तुच्छ था. वे समय के अनुसार काम करते थे. बेटी के घर का पानी पीना, पोते के पढ़ाई के लिए आम का बगीचा तक गिरवी रखने में ना हिचकिचाना , नमिता की सारी लड़के जैसी बदमाशियां उन्होंने खुले मन से स्वीकार कर लीं थीं. पति का जीवन कुछ सूत्र वाक्यों के इर्द गिर्द घूमता था. इस से अलग वे नहीं देख पाते. और अपन जीवन उसी ढर्रे में ढाल लिया था.

श्राद्ध में तो अगल बगल के गाँव के लोग  भी शामिल  हुए . पगड़ी  की रस्म  के समय आँगन  दालान  सबमे  तिल  धरने  की भी जगह  नहीं थी. जब पति के सर  पर पगड़ी बांधी जाने लगी  तो एक भी आँख  ऐसी  नहीं थी कि सूखी हो. बाबू जी के रौब से ज्यादा लोग उनका सम्मान और स्नेह करते थे. किसी दुकान वाले ने एक बात नहीं पूछी, और घी के पीपे, शक्कर की बोरी,मिठाई की टोकरी, पता चलने की देर थी और घर पहुंचा दी.

पर सब शांत हो जाने के ,सबके चले जाने के बाद रोज कोई ना कोई लेनदार दरवाजे पर खड़ा होता. अब पति के माथे की लकीरें, गहरा जातीं.पर पैसे तो उन्हें देने ही थे. फिर से लोगो के जमघट के बीच, कागज़ पत्तर की उलट पुलट शुरू हो गयी.

(क्रमशः)

(सॉरी.... कुछ कारणवश इस किस्त को डालने में कुछ  देर हो गयी....कोशिश करुँगी, आगे से शिकायत का कोई मौका ना दूँ, और खुद को सॉरी कहने का भी )

Saturday, July 3, 2010

♫ उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -6)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. दो बेटियों में से एक की शादी गाँव में हुई थी,उसे  सब सुख था,पर ससुराल वाले कड़क मिजाज थे. दूसरी की शादी बंबई  में हुई थी, घर वाले अच्छे थे पर जीवन कष्टमय था. छोटी बेटी नमिता गाँव में लड़कों की तरह साइकिल चलती,पेड़ पर चढ़ जाती.)

गतांक से आगे

प्रकाश ने इंजीनियरिंग  की परीच्छा  में बढ़िया नंबर लाये और दूर कलकत्ता के पास खरगपुर में उसको एडमिशन  मिल गया. जब कॉलेज और होस्टल के खर्चे की बात उन्होंने सुनी तो उन्हें चक्कर आ गया. इतने पैसे कहाँ से आयेंगे?? वो भी चार साल तक?? पति की अब तक की सारी जमा पूँजी, स्मिता के ब्याह में खर्च हो गयी थी. जमीन जायदाद तो बहुत थी. पर उसे बेचने की बात, सोचना भी जैसे पाप था. पीढ़ियों से इस जमीन जायदाद में कुछ ना कुछ  बढ़ोत्तरी ही होती आ रही थी तभी,आज इसका ऐसा रूप था, उसमे इज़ाफ़ा करने के बजाए  कुछ कमी करने की सोच कर भी  कलेजा मुहँ को आ जाता.ससुर जी को ये जमीन के टुकड़े अपने जिगर के टुकड़े जैसे प्यारे थे.आज भी वो कोई ना कोई जुगत भिड़ाते रहते कि कौन सी जमीन कैसे खरीदी जाए.

 फसलों से घर के सारे खर्च....तीज़-त्योहार...न्योता-व्यवहार....निकल जाते..फिर इतने नौकर चाकर...गाय बैल...बीज,खाद... कटाई बुवाई की मजदूरी...ट्यूबवेल...ट्रैक्टर... हज़ारों खर्च थे. पति की तनख्वाह तो कपड़े लत्ते...बच्चों की किताब-कापियाँ, दूसरे खर्चों में ही ख़त्म हो जाती.

इस अतिरिक्त खर्च का बोझ कैसे उठाया जाए ?? कुछ समझ नहीं आ रहा था.पति चिंतित थे. चार दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गए.फिर एक शाम  बाबू जी ने पति को बुलाया.उन्हें भी आने को कहा. अम्मा जी पहले से ही वहाँ बैठी थीं. बाबू जी ने पूछा,

" का सोचे हो परकास के लिए?"

"हम्म...." पति चुप थे.

"कुछ इंतजाम बात किए हो....बेटा इतना कठिन परिच्छा पास किया है...उसे आगे तो पढाना होगा"

"हम्म.." पति की वैसे भी बाबू जी के सामने आवाज़ नहीं निकलती और आज तो कुछ था भी नहीं बोलने के लिए.

"तुम पता करो केतना पैसा चाहिए...इंतजाम हो जाएगा"

"कईसे ..??" अब जाकर पति के मुख से बोल फूटा.
"अरे..दूर दूर जो जमीन सब है..ऊ सब हटा देंगे...वैसे भी धीरे धीरे  झोपडी बाँध  के सब कब्ज़ा कर रहें हैं...देखभाल ठीक से हो नहीं पाता...मेरी भी उमर   हो रही है...तुम्हे मास्टरी से फुर्सत नहीं है...निकाल देंगे सब."

"बाबूजी...." उन्होंने फंसे गले  से क्षीण प्रतिवाद किया. उन्हें पता था...बाबू जी को जमीन कितनी प्यारी  है. कभी ऐसा करते भी हैं तो बदले में पास की जमीन खरीदने के लिए. 'बेचना' शब्द  का उच्चारण तक  उनके लिए नागवार था. इसीलिए 'हटा' देंगे...'निकाल' देंगे जैसे शब्द बोल रहें थे.


"बाबू जी....मेरा गहना है...उस से अगर..." वे अटकती हुई सी बोलीं...पर इस पर अम्मा जी ने जोर से डांट दिया.

"बहू ई सब, हमारे खानदान में नहीं होता...कि औरत लोग का जेवर लिया जाए...मेरा बेटा तो  कमाता भी  है..डूब मरने वाली बात होगी उसके लिए अगर औरत का गहना  बेचने तक बात पहुँच जाए"

"ना बहू भगवान ओ दिन कब्भी ना दिखाए.....रामावतार जी को पढ़ाया...दो बेटी का बियाह  किया...पर  पिलानिंग कर के....दोनों बेटी की सादी आलू के फसल के बाद की...अब पढ़ाई का सीज़न और फसल का सीज़न तो साथ साथ नहीं चलते ना...कौनो बात नहीं..सब ठीक हो जाएगा..तुम चिंता जनी करो.."
फिर बेटे से बोले  "जाओ चा  पानी करो....अईसे मुहँ लटका के मत घूमो....बेटा पूरे गाँव का नाम रौसन करेगा......हम त जिंदा रहेंगे नहीं देखने को...पर मेरा पोता तो कहलायेगा ,ना .लोग कहेंगे बिसेसर  बाबू के पोते ने ये पुल बनवाया है...ये सड़क बनवाई है...ये बिल्डिंग खड़ी  की है...हमरा भी तो नाम होगा...""

"बस इहे असुभ निकालिए मुहँ से....बेर बखत देखना नहीं है..सांझ का बखत हो रहा है...और ऐसी असुभ भासा " अम्मा जी एक बार फिर गुस्सायीं.

"त तुम का बैठी रहोगी??...जिसकी बेटी बियाह कर लाये हैं...उसका हीला लगा कर ही जायेंगे"

हम त परकास की सादी देख के... गोदी में पर पोता खेलाने के बाद ही, ई दुनिया से जाएंगे "

वे मुहँ पर पल्ला रख कर हंसी दबाती हुई चली गयीं वहाँ से. ऐसी नोक झोंक चलती रहती थी,सास ससुर के बीच में . अगर किसी दिन ससुर जी ने कह दिया, "बुढ़िया कहाँ हैं?"

बस अम्मा  जी का गुस्सा सातवें  आसमान पर "हमरा बुढ़िया उढ़िया मत कहा करें..कह दे रहें हैं...हाँ" :

"काहे अभी बूढ़ायी  नहीं हो...परनाती खेला ली गोदी में " और उनलोगों की लम्बी नोंक झोंक चल पड़ती.

पर वे चाय बनाती हुई सोच रही थीं. पति ज्यादा बाबू जी के सामने पड़ते भी नहीं. लगता था बाप- बेटा दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी हैं.पर बाबू जी, बेटे के दिल की परेसानी एकदम से भांप गए.इसका मतलब नज़र रहती है उनके अपने बेटे की एक एक बात पर.

पति को चाय का कप पकडाया तो इतना ही बोले.."अच्छा है प्रकाश  नानीघर  गया हुआ है...वरना ये  सब उसके कान में पड़ता तो अच्छा नहीं होता "
पर अब वे सोचती हैं,अच्छा होता कि उसे पता चल जाता कि उसकी पढ़ाई के लिए किस तरह पैसों का इंतज़ाम होता था .  उन पैसों की कीमत पता चलती. वरना उसे तो ,यही लगता रहा कि ..पैसों की तो कोई कमी ही नहीं है.

प्रकाश नए बुशर्ट पैंट पहन, नए जूते मोजों से लैस दूर शहर में पढने चला गया. उन्होंने ढेर सारे  निमकी, खजूर, बेसन के लड्डू बाँध दिए साथ में. क्या पता वहाँ क्या मिले खाने को. बीच में भूख लगे तो किस से बोलेगा, "जरा सूजी का हलुआ बना कर दो"

प्रकाश के जाते समय उनका दिल दो टूक हो गया. बेटियों के विदा के समय तो बिलख बिलख का रो  ली थीं .पर यहाँ आँसू जैसे छाती में जम गए थे और सांस लेना भारी  पड़ रहा  था. अट्ठारह साल का बेटा, जिसकी बस हलकी हलकी मूंछें आई थीं,यूँ अकेला इतनी दूर नए शहर में कैसे रहेगा? बेटियों को विदा करते समय इतनी आश्वस्त तो थीं कि किसी समर्थ हाथों में सौंप रही हैं,जो उनका ख़याल रखेगा.पर बेटे का ख़याल कौन रखेगा . जिस बेटे ने एक रूमाल तक नहीं धोया  कभी उसे अपने सारे कपड़े फींचने पड़ेंगे.और आँसू ढरक पड़े,उनके.

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प्रमोद भी मैट्रिक में जिला भर में तो नहीं...पर आस-पास के बीसों गाँव में सबसे ज्यादा नंबर लाया. वह भी प्रकाश की तरह, पास के शहर में पढने चला गया. छुट्टियों में प्रकाश आता तो उसकी बातों से, उसकी चिट्ठियों से प्रमोद इतना प्रभावित होता कि कमर कस लेता,उसे भी बहुत मेहनत करनी है और इस छोटे से शहर  से निकल बड़े शहर में जाना  है. वह अपने बड़े भाई से दो कदम आगे ही रहना चाहता था. और उस पर डाक्टरी पढने का भूत सवार हो गया था. इतनी पढ़ाई की कि उसकी तबियत खराब हो गयी. पूरे साल में एकाध बार शहर आने वाली उन्हें. प्रमोद की  देखभाल के लिए शहर में उसके पास आ कर रहना पड़ा. और अपने बेटे को इस तरह पढ़ते देख, वे भी चिंता में पड़ जातीं. कहीं उसकी तबियत फिर से ना  खराब हो जाए. रात के दो बजे भी उठकर उसके  पीछे जाकर खड़ी हो जातीं ,तो उसे पता नहीं चलता. और वह पढता रहता. "बेटा दूध ला दें...सर में तेल लगा दें?
"ना माँ कुछ नहीं चाहिए तुम जा कर सो जाओ...और वो फिर किसी मोटी सी किताब पर झुक जाता.

पर नींद आती कहाँ से? गाँव का इतना बड़ा घर , इस कमरे से उस कमरे...आँगन..छत करते ही थक जातीं. यहाँ दो कमरे के घर में बिना चले तो लगता जैसे पैर ही अकड गए हैं. वे तहाए हुए कपड़े फिर से तहाने लगतीं. एक जगह से चीज़ें उठा दूसरी जगह रख देतीं. पर उस से क्या थकान होती. नींद आँखों से कोसों दूर रहतीं. सुन कर विश्वास नहीं हुआ था.लोग शहरों में नींद लाने को भी गोलियाँ खाते हैं. अब लगता है,खाना ही पड़ता होगा.
(क्रमशः)