Wednesday, November 3, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की ( कहानी --समापन किस्त )

आर्यन के टेस्ट चल रहें हैं..सुबह से उसे पोएम रटवा कर परेशान. अब शरारत से या सचमुच पर हर  बार वो एक लाइन गलत बोल जाता. वो डाँटती तो , कभी मुहँ फुला लेता...और कभी अड़ के बैठ जाता...अब पोएम सुनाएगा ही नहीं. फिर खुद ही चॉकलेट देकर...गोद में लेकर बहलाना पड़ता. खुद पर ही झुंझला उठती , सबकुछ समझते हुए भी वह उस अंधी दौड़ में क्यूँ शामिल हो रही है ? अगर बेटे को 'ए प्लस' की जगह 'सी'  ही आ गया तो क्या पहाड़ टूट जायेगा. अभी चार साल का छोटा सा बच्चा है. ताजिंदगी तो हर घड़ी खुद को उसे कड़े अनुशासन में बंध प्रूव करते ही रहना है. पर फिर टीचर की चमकती आँखें याद आ जातीं, जब वो सारे पेरेंट्स के सामने आर्यन की तारीफ़ करती, और सबकी प्रशंसात्मक निगाहों का केंद्र बन वह, अपनी सारी खीझ, झुंझलाहट भूल जाती.

बच्चों का मासूम बचपन छीन, उन्हें तोतारटंत बनाने  की शुरुआत किसने की थी? इस समाज  के नियम आखिर कौन बनाता है.? खुद समाज के ही लोग ना...फिर खुद ही ये उलजुलूल  नियम बना,उसका पालन शुरू  कर देते हैं. आज बुरी तरह खीझ रहा था उसका मन. उसका मन था, तीन साल के बाद ही उसे स्कूल भेजेगी..पर आस-पास के पेरेंट्स  ने  डेढ़ साल से ही प्ले स्कूल में भेजना शुरू कर दिया. फिर पार्क में... सोशल गैदरिंग में सब पूछते, "किस प्ले स्कूल में जाता है. " और उसके यह कहने पर कि "अभी कहीं नहीं जाता " सब ऐसे आश्चर्य और उपहास से देखते, जैसे वो  अभी अभी बस किसी बीहड़ गाँव से उठ कर आ गयी हो. कितनी महिलायें तो उसे नसीहत देने लगतीं, "सोशल बिहेवियर  सीखेगा...दोस्त बनाना सीखेगा". और आर्यन की किसी छोटी सी शैतानी पर भी उसे ऐसे देखती जैसे कहती  हों, "कहा था ना..प्ले स्कूल में डालो" उसका मन होता कह दे..."प्ले स्कूल से और चार बदमाशियां सीख कर आयेगा.

लोगों की  बातों से इतना अपसेट रहने लगी थी .रोज ही सुनील से शिकायत करती...'आज इन्होने ऐसा कहा...वैसा कहा.." सुनील कहने लगे..तुम्हारे इस मूड का असर बच्चे पर भी पड़ेगा..इस डिप्रेशन में आने से तो अच्छा है, उसे दो घंटे के लिए स्कूल ही भेज दिया करो. पड़ोस के बच्चों को देख आर्यन  भी जिद करने लगा था, " इछ्कूल  जाऊँगा' फिर उसे लगा , कहीं इसमें हीन भावना ना आने लगे, चलो..अब माहौल के अनुकूल  ही तो चलना पड़ेगा. और उसने मन मार कर ढाई साल में उसे स्कूल भेज दिया. और उसके बाद से रेस शुरू हो गयी. पढ़ाई तो कुछ नहीं है. पर इतनी  छोटी उम्र में 'रंगों' फलों, सब्जियों, रिश्तों के नाम याद रखना क्या पढ़ाई से कम है? और अब चार साल  में  तो बाकायदा, पोएम,गिनती, छोटे छोटे शब्द , ड्राइंग-क्राफ्ट सब शुरू हो गए हैं. और इन सबमे 'ए प्लस' लाने की होड़ भी. बच्चे से ज्यादा पेरेंट्स के बीच.

सुबह से सारा काम छोड़ आर्यन में ही लगी थी. अब जल्दी-जल्दी सारे काम निबटा ले .आर्यन के स्कूल से आते ही खिला कर सुला देगी और फिर ड्राइंग की प्रैक्टिस भी करानी है. बुरी तरह थक जाती है. सब आर्यन के मूड पर निर्भर करता है. मूड हो तो एक बार में बना लेगा, ना हो तो मजा है जो एक मिनट बैठ भी जाए. आजकल सिम्मी-रोहन की शादी के प्लान्स बनाना भी छूट  गया था..पूरे समय आर्यन  के टेस्ट की टेंशन ही चलती रहित दिमाग में.
सारी बिखरी चीज़ें उठा कर संभाल कर रख रही थी कि फोन बज उठा. अब ये एक और मुसीबत. इस समय जो भी फोन करता है, गप्प के मूड में होता है और उसके पास जरा भी वक्त नहीं. मम्मी का नंबर दिखा , उनके कुछ बोलने से पहले ही बोल उठी,

"आर्यन के टेस्ट चल रहें हैं...सारा घर बिखरा पड़ा है...ढेरो काम पड़े हैं....उसके आने से पहले सब ख़त्म करना है...बोलो कैसे फोन किया "

"ओह! फिर तो तुम नहीं आ सकोगी ,ना...सोच रही थी जरा घर आ जाती तो कुछ आराम से डिस्कस करना था "

"क्या .." सोचा शायद यही होगा, "बाई बहुत तंग कर रही है...पुरानी है,ईमानदार है...पर इतनी छुट्टियां करती है निकालूं या रहने दूँ" या फिर होगा..." फलां की शादी में क्या भेजूं...उन्होंने तो तुम्हारी शादी में बड़ी साधारण सी साड़ी दी थी...देने को साधारण ही दे दूँ..पर देखने वाले क्या कहेंगे,  हम बड़े शहरों वाले से लोग उम्मीद रखते हैं.." ये सब बातें ममी के लिए बड़े गंभीर मसले होते थे...वो उनका रुख भांप वही कह देती और वे खुश हो जातीं. पर आज तो ये सब सुनने का  कोई मूड नहीं.

पर मम्मी  बोलीं, "ठीक है...रहने दो..बाद में बात करेंगे...असल  में सिम्मी के लिए एक रिश्ता आया है "

"माँ अब वो ज़माना नहीं है...कि तुम सिम्मी के रिश्ते के लिए मुझसे पूछोगी...पहले सिम्मी से पूछा??"

" दरअसल...मुझे और तेरे पापा को नहीं जंच रहा ..पर सिम्मी को पसंद है"

"क्या sssss ...." उसके हाथ से फोन नहीं छूटा यही गनीमत है .

"अरे इसमें इतना चौंकने की क्या बात है....दो साल  हो गए उसे नौकरी करते ...अब शादी का सोचना होगा ना.."

"पर सिम्मी ने 'हाँ'.. कहा...??"...उसने शब्दों को यथासंभव संयत रखते हुए कहा.

"हाँ...उसे प्रपोज़ल  ठीक लगा....आजकल के बच्चे..तुम्हे पता है ना...उनकी सोच अलग होती है...तुम भी आज की ही हो...पर इन सबसे अलग हो. "

"माँ एक फोन आ रहा है...मैं बाद में फोन करती हूँ..." कह कर फोन काट दिया और तुरंत सिम्मी को मिलाया

"हाय  दी....." उसकी चहक भरी आवाज़ सुनते ही पारा चढ़ गया.और सीधा पूछ लिया,
 "तेरा रोहन से झगडा हो गया है? ब्रेक अप हो गया और मुझे बताया भी नहीं??....यहाँ मैं....सारा दिन सोचती रहती हूँ...तेरी शादी कैसे करवाऊं...और तू है.." हर शब्द के साथ स्वर तेज होता जा रहा था...

"दीदी...दीदी...होल्ड ऑन प्लीज़....और इतनी तेज़ आवाज़ में मत बोलो..मुझे अपनी सीट से उठ कर आना पड़ा...तुम तो चिल्ला ही रही हो....कोई झगडा नहीं हुआ...तुम्हे सब बताउंगी,आराम से .." सिम्मी धीरे धीरे फुसफुसा आकर बोल रही थी.

पर वो कुछ सुनने के मूड में नहीं थी..."क्या बताएगी....और अब तक क्यूँ नहीं बताया....मैं बेवकूफ की तरह तुम दोनों के बारे में सोचती रहती हूँ..."

"दीदी अभी बहुत काम है....तुम घर आ जाओ...बात करते हैं..मैं जा रही हूँ....काम करने" कह कर फोन काट दिया, उसने.

दो मिनट ठगी सी खड़ी रह गयी....अच्छा तमाशा है, जब चाहो अपने जीवन में शामिल कर लो, जब चाहे मक्खी की तरह निकाल  कर फेंक दो. दुबारा फोन  मिला ये सब कहने का मन हुआ...पर वो जानती है सिम्मी ने साइलेंट पर रख दिया होगा, मोबाइल और अब नहीं उठाएगी.

माँ को ही फोन लगा कर कहा, " शाम को आती हूँ ...आर्यन को लेकर"

बुरी तरह परेशान हो रही थी...काम करने की गति भी कम हो गयी. किसी तरह , काम निबटाए और आर्यन के आते ही उसे खाना खिला.मम्मी के यहाँ चलने की तैयारी कर ली...आने दो ड्राइंग में 'सी ' या 'डी' अभी उसे सारी बात जाननी जरूरी थी. वह सोने को बेचैन हो रहा था पर उसे कार में जबरदस्ती डाला...सीट बेल्ट से बंधे  आर्यन का सर बार-बार इधर-उधर लुढ़क रहा था. दया  भी आ रही थी...एक नज़र सड़क पर..एक नज़र आर्यन पर रखते किसी तरह, घर पहुंची. (अब भी खुद से मायका नहीं निकलता...घर ही आता है जुबान पर)

माँ देख हैरान  रह गयीं, "अरे शाम को आनेवाली थी ,ना..इस बेचारे को नींद में ही उठा लाई...ओह.."..वे आर्यन को गोद में ले सुलाने चली गयीं.

जब उसे अच्छे से थपकी दे..चादर उढ़ा...लौटीं तो उसने निढाल स्वर में पूछा..."अब बताओ शुरू से...क्या बात है"

"पर तू खुद भी बहुत थकी हुई लग रही है....थोड़ा आराम कर ले...फिर बात करते हैं "

"मैं ठीक हूँ...शुरू से बताओ....." सोफे पर अधलेटी हो कहा. माँ को क्या पता, यहाँ..थकान शारीरिक नहीं मानसिक है.

"वो मिसेज शौरी हैं ना...फ्लोरेंस   बिल्डिंग वाली...वे एक दोपहर  आई थीं, और अपनी बहन के बेटे के लिए सिम्मी का रिश्ता मांगने लगीं...सब तो ठीक है...पर लड़का मर्चेंट नेवी में है...यह बात मुझे और तेरे पापा को नहीं जम रही...हमने तो ना का ही सोच लिया था  ,पर यूँ ही सिम्मी से जिक्र किया तो कहने लगी.. क्या बुरा है.... "

"सिम्मी ने कहा ये..." विश्वास नहीं हो रहा था उसे, जरूर इसकी रोहन से लड़ाई हो गयी है. और रिबाउंड में यह दूसरे रिश्तों में बंधने की सोच रही है...कितने फ्रेंड्स का देख चुकी है,जैसे ही एक रिश्ता टूटता है...तुरंत ही बिना ज्यादा सोचे-समझे तुरंत ही दूसरे रिश्ते बना शादी भी कर लेते हैं.

"हाँ उसने ही सारी जानकारी जुटाई...मिसेज़ शौरी का लड़का विवेक ,सिम्मी के फेसबुक में फ्रेंड्स लिस्ट में है...और वो नितिन , विवेक के फ्रेंड्स लिस्ट में...विवेक के प्रोफाइल से जाकर उसके एल्बम देखे सिम्मी ने और बस तब से उसकी आँखे चौंधियाई हुई हैं...उसका आलिशान फ़्लैट...बड़ी सी गाड़ी...और उसके फौरेन ट्रिप  के फोटो..."

वो  यह सब तो सुन ही रही थी...साथ ही सोच रही थी, मम्मी कितनी सहजता  से फेसबुक, प्रोफाइल, फ्रेंड्स लिस्ट की बात कर रही हैं....सिम्मी के सान्निध्य में इन सारी चीज़ों से परिचित हो गयी हैं....और एक वो है...मम्मी से भी ज्यादा आउटडेटेड हो गयी है...बस नर्सरी राईम्स  और पिक्चर बुक में ही उलझी रहती है.

सिम्मी को दो बार मेसेज भेजा ...'जल्दी आओ'

कुछ समझ नहीं पा  रही थी. आखिर सिम्मी -रोहन के बीच क्या हो गया. मम्मी बता रही थीं...पापा  को भी यह रिश्ता पसंद नहीं..शिप्पीज़ के बारे में बहुत सारी बातें सुनी हैं...शराब पीते हैं...बहुत सारी बुरी आदतों के शिकार होते हैं...और उन्हें तो नहीं ही पसंद.....बेटी को अकेले  रहना पड़ेगा...अकेले घर संभालना पड़ेगा. हमेशा किसी की छत्रछाया में रहने वाली  माँ को यह सब गवारा होता भी नहीं. वह आधे मन से सब सुन रही थी....सिम्मी से बात करने की बेचैनी हो रही थी.

आर्यन उठ कर आ गया...उसकी ड्राइंग बुक..कलर पेन्सिल्स सब लेकर आई थी, पर मन नहीं हो रहा था, प्रैक्टिस करवाने का...वह भी उनींदा सा था..दूध का ग्लास सामने पड़ा था और वह ,शांत  सा बैठा था कि  कॉल बेल बजी और सिम्मी को देखते ही हज़ार वाट की मुस्कान छा गयी, चेहरे पर ...बिजली सा दौड़ा उसकी तरफ. सिम्मी ने भी..'मेरा राजा बेटा'...कहते उसे गोद में उठा...गोल-गोल घूमना शुरू कर दिया. यही सब आर्यन को  अच्छा लगता है...फिर दोनों छुक छुक रेल गाड़ी बना....पूरे फ़्लैट में घूमते रहें...वो गंभीर बनी बैठी रही..आखिर..सिम्मी ने ही पूछा..."ये दीदी को क्या हुआ है?"

"पता नहीं कुछ तबियत ठीक  नहीं लग रही इसकी..मना किया...फिर भी चली आई...." मम्मी ने चिंतित  हो, कहा.

सिम्मी भी गंभीर हो गयी...उसे पता चल गया...दीदी क्यूँ चुप है.

थोड़ी देर को उसका चेहरा म्लान हुआ फिर आर्यन के साथ खेलने लगी...आखिर उसने ही गुस्से में बोला, "आर्यन दूध ख़त्म करो.."

 सिम्मी ने ही डरने की एक्टिंग की "चलो..चलो...भागो यहाँ से..मम्मी गुच्छा है..."और दूध का ग्लास ले बालकनी में चली गयी.

दूध ख़तम करवा कर खाली  ग्लास लिए, सिम्मी आई..."देखो बता दो..मम्मा को, मैं कितना राजा बेटा हूँ ..सारा दूध फिनिच कर लिया ..."

उसने मम्मी से कहा, "मम्मी....आर्यन को गार्डेन में ले जाओ..."

"अरे, उसे प्रैक्टिस नहीं करवाएगी...उसके ड्राइंग का एग्जाम है ना कल"

"नहीं..मूड नहीं है..."

मम्मी उसे अबूझ सी देखती रहीं....क्या हो गया है उसे.

"आर्यन...नानी के साथ  जाओ गार्डेन में..."

"मुज्झे नहीं जानाssss...मैं मासी के साथ ट्रेन ट्रेन खेलूँगा...." आर्यन ने जिद की.

उसने उसे गोद में उठाया और हाथ पैर पटकते आर्यन  को लिफ्ट तक ले आई...मम्मी भी साथ चली आयीं...चीखते -चिल्लाते आर्यन  को उसने लिफ्ट में खड़ा कर, लिफ्ट बाहर से बंद कर दी ...मम्मी  ने उसे गोद में उठा पुचकारते हुए ग्राउंड  का बटन प्रेस कर दिया...पर उनके चेहरे से गुस्सा साफ़ झलक रहा था. उन्हें इस बात का क्या इलहाम कि वो किस कशमकश से गुजर रही है. आर्यन तो झूला देखते ही तुरंत बहल जाएगा...मम्मी को भी उनकी सारी सहेलियाँ मिल जाएँ तो अच्छा...घंटा- दो घंटा वो लोग नीचे ही रहें ताकि...वो आराम से बात कर सके सिम्मी  से.

लौटी तो सिम्मी ने छूटते ही कहा...." बच्चे पर क्यूँ गुस्सा निकाल  रही हो..."

"क्या करूँ तो....तुम तो ऐसे एक्टिंग कर रही हो जैसे....कुछ हुआ ही नहीं..." चिल्ला ही पड़ी जैसे वो...

"रिलैक्स दी...इतनी परेशान क्यूँ हो..."

वो भी शांत हो सोफे पर बैठ गयी..." सिम्मी क्या है ये सब..."

"हम्म....क्या पूछना है तुम्हे....पेश हूँ, तुम्हारे दरबार में...दागो..सवालों की गोली.." कुछ नाटकीयता से कहा उसने.

"सिम्मी ये सब एक्टिंग रहने दे....और बता..रोहन से झगड़ा हुआ....?"

"ना.."

"फिर इस रिश्ते के लिए हाँ...कैसे कह  दी?"

"हाँ... कहाँ..कहा है ??"

"पर  कंसीडर तो कर रही है ना..."

"कुछ सोचा नहीं दी...समझ नहीं आ रहा...मैं अभी का नहीं...पांच साल बाद का सोच रही हूँ...क्या हमारे रिश्ते इतने ही ख़ूबसूरत रह जाएंगे. क्या यही तस्वीर रहेगी रिश्तों की....लगता है सब कुछ बदल  जाएगा....वह ऑफिस से आकर किसी बात पर चिल्लाएगा...मैं किसी और बात पर झल्लाउंगी  और वजह कुछ और होगी. ...सब कुछ इतना रोज़ी रोज़ी नहीं रहेगा....उसपर से तुम्हारे  और मम्मी के रहने की वजह से मुझे घर का कुछ काम भी नहीं आता. रोहन क्या मुझपर नहीं चिल्लाएगा...उसकी मॉम इतनी एफिशिएंट हैं..."

"ये सब इतनी गंभीर बातें नहीं हैं....वैस भी खुद पर पड़ती  है..तभी सब सीखते हैं..तू भी सीख लेगी..."

"बात सिर्फ वही नहीं दी...किसी भी मैरिड कपल को देखो..पांच साल बाद बताया नहीं जा सकता कि   उनकी अरेंज्ड मैरेज है या लव मैरेज ...सब एक से दिखते हैं...वही एक दूसरे से, एक सी शिकायतें....एक से झगडे....एक से समझौते...जो ज्यादातर लेडीज़ को ही करने पड़ते हैं...चाहे उसने लव मैरेज की हो  या अरेंज्ड...फिर जब बाद में समझौते करने ही हैं...तो अभी क्यूँ नहीं..? "

"यानि कि तुमने फैसला  कर लिया है? "

"फैसला तो एज सच कुछ नहीं किया...एक्चुअली..एम सो कन्फ्यूज्ड.."

"हम्म...जब प्यार में सोचना..समझना पड़ जाए तो क्या कहा जाए..."

"दी..मैं तुम्हारी तरह भावुक नहीं हूँ....रियलिस्टिक वे में सोचती हूँ...रोहन के साथ लाइफ बहुत टफ नज़र आती है...सारी ज़िन्दगी निकल जायेगी..पैसे जोड़ते...एक बड़ा फ़्लैट ले लें..गाड़ी ले लें..वेकेशन ट्रिप पर जाएँ...हर चीज़ के लिए सोचना पड़ेगा....दोनों, दिन रात पसीना  बहायेंगे....फिर भी पूरा नहीं पड़ेगा..."

"तो ये तो तू पहले से जानती थी...कि पापा हर हाल में रोहन से ज्यादा कमाने वाला ही ढूंढेंगे...फिर क्यूँ कदम बढ़ाया ..."

"ये कभी नहीं सोचा था...इतना, ज्यादा .......सिम्मी कुछ कहते कहते रुक गयी..."

"हाँ हाँ कह दे....सोचा था जीजू जैसा ही कोई ढूंढेंगे......"

"दी..तुम पर्सनली क्यूँ ले रही हो....वी  ऑल नो...जीजू अर्न्स सो वेल.."

"पर हमारा...पौश कॉलोनी में घर तो नहीं है..फौरेन ट्रिप्स पर तो नहीं जाते..बी.एम.डबल्यू. तो नहीं है...
"ही ही  दी.....बी.एम.डबल्यू तो उसके पास भी नहीं है...".सिम्मी खी खी कर हंसने लगी...

"सिम्मी तुझे सिर्फ पैसे की चमक दिख रही है....क्या सारा सुख पैसों से ही  मिल जाएगा...उन घरों में परेशानी... फ्रस्ट्रेशन...झगडे .. नहीं होते?

"वो रहेगा कहाँ...झगडे करने के लिए...वो तो शिप पर होगा "

"यू आर सो मीन....फिर रोहन का दिल क्यूँ तोडा...तुझे शुरू में ही कहा था....सोच समझ कर ही आगे बढ़ना"
"
दी..ऐसा भी कुछ नहीं है...आजकल सब मेंटली प्रिपेयर्ड रहते हैं...नहीं वर्क आउट हुआ रिलेशनशिप... तो टाटा बाई बाई...कोई देवदास नहीं बनता...एक्चुअली..कभी भी नहीं बनते थे ..नहीं तो इतने  सालो से एक ही देवदास का नाम क्यूँ लिया जा रहा है....दस-बीस-सौ देवदास क्यूँ नही हुए?...और रोहन भी इतना  कोई आइडियल लड़का नहीं है...आजकल का है..सबकी अपनी कमियाँ  हैं...उसने भी मुझे ही गर्लफ्रेंड क्यूँ चुना...स्मार्ट कॉन्फिडेंट लड़की..सबको चाहिए ताकि दोस्तों में धाक जम सके...वरना उस निधि को क्यूँ  एवोयाड करता रहता है..बेचारी कितना केयर करती है इसका...रोज़ एस.एम.एस करती है....अपनी सारी बातें शेयर करती है...रोहन के बर्थडे पर इतने सुन्दर गिफ्ट देती है....रोहन भी ये सब एन्जॉय करता है...कितनी बार कहा...'उसे ऐसी झूठी आशाएं मत दिलाओ...वो तुमसे प्यार करती है''...तो हंस कर उड़ा देता है कि वो डम्ब है...उसे डम्ब लगती है क्यूंकि...सीधी साधी सी है...फील सो बैड समटाइम्स ."

" बट रोहन लव्स यू...इसलिए उसे भाव नहीं देता..."

"तो फिर साफ़-साफ़ उस से कह क्यूँ नहीं देता....उसे मेरे बारे में बताता क्यूँ नहीं...रोहन भी इतना सीधा  नहीं है...जितना दिखता है..इगो कूट कूट कर भरा हुआ है...मेरा सेल एक बार घर पे छूट गया था...दो बार कॉल किया...मैने नहीं उठाया तो बस नाराज़ हो गया कि मैं उसे इग्नोर कर रही हूँ....वहीँ मैं...एक बार उसका फोन नहीं लग रहा  था...उसके कितने दोस्तों को फोन कर डाला ..ऑफिस  में फोन किया...आखिर उसको ढूंढ ही निकाला...और इसने कोई एफर्ट नहीं लिया, मेरे बारे में पता करने का......दी, हम लडकियाँ सेंटीमेंटल होती हैं...इन्हें सारी ज़िन्दगी मान लेती हैं...जबकि  ये लोग हमें अपनी ज़िन्दगी का बस एक पार्ट ही समझते हैं..

"पता नहीं तेरी बातें..मेरी समझ  में नहीं आतीं...मैने तुम दोनों को साथ देखा है.....और तुम्हारी आँखों में एक दूसरे के लिए स्नेह भी...

"हम्म...जो दिन गुजरे..अच्छे थे..नो डाउट....पर इसकी गारंटी नहीं कि हमेशा अच्छे ही रहेंगे..."
"
"गारंटी किस चीज़ की है...एक शिप्पी के साथ लाइफ कितनी टफ होती है...पता है...?..सब कुछ अकेले संभालना पड़ता है...छः से आठ महीने तो वो शिप पर रहेगा.."

"साथ में सेल करने को तो मिलेगा, ना...वो पेरिस...स्विट्ज़रलैंड...वेनिस...वाऊ...कभी सोचा भी नहीं था..देख पाउंगी...रोहन के साथ तो दस साल में बहुत हुआ तो सिंगापुर और मॉरिशस से ज्यादा के सपने भी नहीं देख सकती."

"इट्स सो डिस्गस्टिंग...कितनी मेटेरियालिसटीक  है तू...बाद  का नहीं सोचती...अकेले गृहस्थी संभालनी पड़ेगी...बच्चे आ जाएंगे तो सेल कर पाएगी...सब अकेले देखना पड़ेगा."

"अब ये सब फंडे मुझे मत दो...तुम क्या अकेले नहीं संभालती सब..? यहाँ की सारी औरतें..अकेले ही तो ढोती हैं..गृहस्थी का बोझ...मुझे इतना गुस्सा आया था...जब तुम लेबर रूम में  दर्द से छटपटा रही थी...और जीजू किसी दूसरे शहर में मुस्कुरा कर मीटिंग अटेंड कर रहें थे...मैं सोच रही थी...अभी खबर सुन कर लड्डू बाँट देंगे..लो मैं बाप बन गया...और मिल जाएगा  बेटे को उनका नाम. क्या फर्क पड़ता है....पति सात समंदर दूर  हो..या सात सौ किलोमीटर दूर...पास तो नहीं होता,ना.."
"वे लोग बीवी-बच्चों   के लिए ही तो करते हैं ये सब..."

"अब उनकी जुबान भी मत बोलो...सब समझौता है.....औरतें खुद को धोखा देती हैं...ये सोच...जो मैं खुली आँखों से स्वीकार करना चाहती हूँ...दीदी तुम नहीं समझोगी..एक सिक्योर्ड घर से दूसरे सिक्योर्ड घर में चली गयी हो...ज़िन्दगी सिर्फ, गुलज़ार की नज्मे और जगजीत की गज़लें नहीं हैं दी...और ये फूल,खुशबू, चाँद की बातें भी तभी अच्छी लगती हैं...जब रोटी-कपड़ा-मकान की फ़िक्र ना हो..."
"हम्म....तो ये मुझ पर व्यंग्य है.."
"ऑफ कोर्स नॉट...बस तुम्हे नेकेड ट्रुथ दिखाना चाह रही हूँ..."

"इट्स नॉट नेकेड ट्रुथ...तुम्हारा सच है ये....और आधा सच....आज भी  लोग हैं...प्यार, विश्वास और ईमानदारी पर मर-मिटने वाले..."

"मैने कब कहा नहीं हैं...होंगे इमोशनल फूल्स...पर मैं नहीं बनना चाहती..."

"इट्स गुड़...सिम्मी..कि तूने इतनी जल्दी ही फैसला ले लिया...और उसकी ज़िन्दगी से निकल आई...तुम दोनों एक दूसरे के लिए नहीं बने थे....और तुम्हे क्या लगता है...इस शिप्पी गाइ ने तुम्हे क्यूँ पसंद किया....उसे भी एक ख़ूबसूरत स्मार्ट बोल्ड...बीवी चाहिए बस...जो उसकी अनुपस्थिति में उसके पैसों का.... उसके घर का अच्छी तरह ख़याल रख सके.."

"आइ नो..मैं किसी मुगालते में नहीं हूँ...उसने मेरे फेसबुक प्रोफाइल्स पर मेरे अपडेट्स पढ़कर और मेरे फ़ोटोज़ देखकर ही प्रपोज़ल भेजा है..विवेक बता रहा था...सो इट्स गिव एन टेक...मैं ये नाइन टु फाइव जॉब छोड़ एक बढ़िया सा बुटिक खोल लूंगी...अपना काम होगा...आराम की ज़िन्दगी...पति सारे समय सर पे नहीं बैठा होगा...और जब आएगा...तब भी मेरे पीछे ही घूमेगा,...यू नो ना..इन शिप्पिज़ का कोई सोशल सर्कल नहीं बन पाता...जहाँ बीवी ले जाए...वहीँ जाएंगे...सो नो टेंशन.
"हम्म तो अब क्या बोलूं...जब तूने इतनी दूर तक सोच लिया है...जो सोच तू तेरी ज़िन्दगी है,ये

"थैंक्स  दी..मुझे ये डिसीज़न लेने में हेल्प करने में...तुम्हे सारे तर्क देते देते...खुद को भी समझा  लिया. "

बिलकुल थक गयी थी, वो.... लगा मीलों दौड़ कर आई हो...अब थोड़ी देर अकेले रहना चाहती थी...बोली," चलो..जाकर आर्यन को ले आऊं...अब जाना भी होगा..."

"सॉरी दी..यू  आर हर्ट.....कैन सी दैट.....बट एम हेल्पलेस...हमारा ज़िन्दगी को देखने  का नजरिया बिलकुल अलग है...'

"तू बस खुश रहें...मुझे और क्या चाहिए.."

थके कदमो से बाहर निकल आई....मन में भी यही कहा...'आज इसे पैसों की चमक में ही असली ख़ुशी लग रही है...कल कहीं इन्हीं पैसों से भाग...योगा, मेडिटेशन, विपासना में मन की शान्ति ढूँढती ना फिरे.'

खुद पर भी गुस्सा आ रहा था...उसे जो सब नहीं मिला..इनके माध्यम से पूरा करने की कोशिश क्यूँ कर रही थी...यह सिम्मी की  ज़िन्दगी थी..उसके सपने थे...पर देख वो रही थी...और तभी जब ये सपने टूटे तो उसकी किरचें चुभ कर उसका ह्रदय लहू-लुहान किए जा रही थीं. हताश सी लिफ्ट का बटन प्रेस कर दिया और सोचती रही..काश कोई परिचित चेहरा ना मिले और थोड़ी देर अकेली बैठ वो इन चुभती किरचों को निकाल सके.

(समाप्त )

( आपलोगों को सॉरी भी बोल दूँ..एक तो इस किस्त  को पोस्ट करने में इतनी देर हो गयी...और फिर मॉडरेशन भी लगाना पड़ा...इस असुविधा के लिए सचमुच खेद है ,पर मजबूरी थी.  कुछ  विचारों  की असहमति की वजह से एक पुराने पाठक ने  अलग-अलग फेक प्रोफाइल बना पहले तो मुझे विधर्मी , धर्म विशेष की अनुयायी वगैरह  कहा.जब कमेन्ट नहीं पब्लिश किए तो उनकी  अंतर्दृष्टि अचानक जाग गयी और उन्हें अब मेरा लिखा, वाहियात,घटिया और सस्ता लगने लगा...जैसे किसी सस्ती पत्रिका ,मनोहर कहानियाँ से कॉपी किया गया हो. समय के साथ विचार भी परिवर्तनशील होते हैं. कोई बात नहीं...और उन्हें विचारों  की अभिव्यक्ति की भी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए .पर अपनी सही प्रोफाइल के साथ कहने की हिम्मत होनी चाहिए. लाइव ट्रैफिक से ही उनकी सही प्रोफाइल का अंदाज़ा हो गया था क्यूंकि कमेन्ट और ब्लॉग विजिट का समय एक ही था. फिर एक शुभचिंतक ने आइ.पी एड्रेस ट्रेस करके  भी उनका सही नाम-पता बता दिया.

उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत थी कि किसी ने अपनी साईट पर मेरा परिचय 'साहित्यकार ' कह कर कैसे दिया? अब क्या जबाब दूँ इसका?..आज ही 'स्वाभिमान टाइम्स' में मेरे आलेख के साथ मेरे परिचय में 'साहित्यकार' लिखा है. :) (कटिंग साइड बार में लगा दी है ) .अब ये मुझसे पूछकर तो नहीं लिखते...:) यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  है.

एक अपील है...फेक प्रोफाइल वालों के आरोपों ,प्रश्नों का मैं कोई उत्तर नहीं दूंगी...यह मेरी कहानियों का ब्लॉग है और इसकी sanctity  मैं बनाए रखना चाहती हूँ )

52 comments:

वन्दना said...

कहानी इस मोड पर आ जायेगी सोचा ही नही था………………शायद आजकल के लडके और लडकियाँ ज्यादा प्रेक्टिकल हो गये हैं इसीलिये ऐसे निर्णय आसानी से ले लेते हैं और देखा जाये तो अच्छा भी है वरना तो भावनात्मक स्तर पर इंसान कमजोर हो जाता है और अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर देता है………………बाकी तुम अपना काम करती रहो यहाँ ऐसे ना जाने कितने लोग मिलेंगे ।

Ravi Shankar said...

रश्मि जी !

कहानी बहुत सम्वेदनशील है ! भावनात्मक और तथाकथित यथार्थवादी सोचों के सच को गहराई से कुरेदती हुई एक ऐसे मोड़ पर पहुँच कर खत्म हुई जहाँ कहानी के भविष्य का निर्णय पाठक के अपने विवेक पर रह गया ! यही बात इस कहानी का X-फ़ैक्टर है।


और अब बात छुपे हुए उपद्रवियों की……… तो ये कहुँगा कि ऐसे लोगों की मन्शा बस माहौल बिगाड़ने और हतोत्सहित करने की होती है…… just ignore them ! कहानी बस कहानी होती है चाहे वो मनोहर कहानियाँ में प्रकाशित हों, कादम्बिनी में या हंस या ताप्तिलोक में। हर व्यक्ति की सोच और मानसिकता अलग अलग स्तर की होती है…… उस से विचलित न हों तो बेहतर होगा !

सादर !

abhi said...

कहानी ने जबरदस्त वी.टर्न लिया...कभी नहीं सोचा था की ऐसा होगा...लेकिन हाँ, कहानी के शीर्षक से अंदाजा लगा था की कुछ तो ऐसा होने वाला है...

ज़माना ज्यादा प्रैक्टिकल तो हो ही गया है...क्या कहा जाये...सिम्मी ने वो निर्णय बिना किसी दबाब में लिया, ठीक ही था उसका नजरिया भी शायद..
कई लोगों को इससे भी कड़े फैसले मजबूरी में लेने होते हैं...वो अलग बात है...
प्यार बस यशराज के फिल्मों में सुहाना सा दीखता है, असल जिंदगी में ऐसा होता कहाँ है....

shikha varshney said...

कहने को तो ये कहानी आजकल के परिवेश में पल बड रहे बच्चों की मानसिकता की है,पर इसके साथ ही और भी कई सामाजिक बिंदुओं को छूती है .जैसे बच्चे के स्कूल ग्रेड - भेडचाल में शामिल होने की मजबूरी,न चाहते हुए भी उसी रेस का हिस्सा बनना.या ५ साल बाद सभी कपल के रिश्ते एक जैसे ही होजाते हैं.वगेरह वगेरह.बहुत सहजता से इन बातों पर प्रकाश डाला गया है.
जहाँ एक और सिम्मी के व्यवहार और मानसिकता से होने वाले उसकी बहन के दुःख को देख कर दुःख की अनुभूति होती है वहीँ सिम्मी की प्रेक्तिकलिटी से सहमत होने का भी मन करता है
कुल मिला कर मुझे कहानी रोचक लगी और सिम्मी के कुछ छोड़ कर बाकी तर्क भी सही लगे :)

abhi said...

पिछले कमेन्ट में क्या लिखा मैंने, खुद समझ नहीं आ रहा :) इग्नोर कीजियेगा..

और हाँ, वो आर्टिकल जो पेपर में छपा है उसके लिंक(बड़ा फोटो) शेयर कीजिये, फेसबुक पे या ब्लॉग पे

राज भाटिय़ा said...

आज के बच्चे.... राम राम,कहानी बहुत अच्छी लगी, लेकिन सब बच्चे भी ऎसे नही हे जमाना तो बदला हे ऎसा बदलेगा यह नही पता था,
कोई गलत टिपण्णी दे या मेल करे तो ज्याद ध्यान ही ना दे

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जैसी कहानी चल रही थी और जैसा शीर्षक था तो लग तो रहा था की अंत कुछ ऐसा ही होगा ..लेकिन इस तरह होगा यह एहसास नहीं था ..आज कल वाकई नयी पीढ़ी बहुत व्यावहारिक हो गयी है ...ज्यादा भविष्य को सुरक्षित रखने की सोचने वाली ...कहानी के अंत के साथ साथ बहुत सी बातें आयीं ...जैसे घर गृहस्थी की सारी ज़िम्मेदारी स्त्रियों को ही संभालनी पड़ती हैं ..हर काम और व्यवस्था से जूझती हुई नारी की बात कही है ...लेकिन आज कल इसमें भी तो बदलाव आया है ...आज कल पुरुष ( नयी पीढ़ी के ) घर में भी काफी काम में सहयोग देते देखे जाते हैं ...
कहानी ऐसी जगह खत्म होती है जहाँ से पाठक सोचने पर मजबूर होता है ...आज के परिवेश की अच्छी कहानी ..

रवि धवन said...

दीदी ह्रदय टूटा ही नहीं चूर चूर भी हो गया। इतनी बेदर्द पोस्ट। शायद यही कटु सत्य है।
रोहन तो यही गीत गा रहा होगा...।
ये महलों, ये तख्तो, ये ताजों की दुनिया
ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।
प्लीज मुस्कुराइए मत। वैसे एक नजरिए से सही भी है, प्रैक्टिल दुनिया में प्रैक्टिल नजरिया नहीं रखेंगे तो पिछड़ जाएंगे।

रश्मि प्रभा... said...

आजकल सब मेंटली प्रिपेयर्ड रहते हैं...नहीं वर्क आउट हुआ रिलेशनशिप... तो टाटा बाई बाई...कोई देवदास नहीं बनता...एक्चुअली..कभी भी नहीं बनते थे ..नहीं तो इतने सालो से एक ही देवदास का नाम क्यूँ लिया जा रहा है....दस-बीस-सौ देवदास क्यूँ नही हुए?...और रोहन भी इतना कोई आइडियल लड़का नहीं है...आजकल का है..सबकी अपनी कमियाँ हैं...उसने भी मुझे ही गर्लफ्रेंड क्यूँ चुना...स्मार्ट कॉन्फिडेंट लड़की..सबको चाहिए ताकि दोस्तों में धाक जम सके...वरना उस निधि को क्यूँ एवोयाड करता रहता है..बेचारी कितना केयर करती है इसका...रोज़ एस.एम.एस करती है....अपनी सारी बातें शेयर करती है...रोहन के बर्थडे पर इतने सुन्दर गिफ्ट देती है....रोहन भी ये सब एन्जॉय करता है...कितनी बार कहा...'उसे ऐसी झूठी आशाएं मत दिलाओ...वो तुमसे प्यार करती है''...तो हंस कर उड़ा देता है कि वो डम्ब है...उसे डम्ब लगती है क्यूंकि...सीधी साधी सी है...फील सो बैड समटाइम्स ."
baap re baap...

प्रवीण पाण्डेय said...

बिटिया को रटाते रटाते मन दुखी हो गया है।

vandana said...

आजकल सब मेंटली प्रिपेयर्ड रहते हैं...नहीं वर्क आउट हुआ रिलेशनशिप... तो टाटा बाई बाई...कोई देवदास नहीं बनता...एक्चुअली..कभी भी नहीं बनते थे ..नहीं तो इतने सालो से एक ही देवदास का नाम क्यूँ लिया जा रहा है....दस-बीस-सौ देवदास क्यूँ नही हुए?...और रोहन भी इतना कोई आइडियल लड़का नहीं है...आजकल का है..सबकी अपनी कमियाँ हैं...उसने भी मुझे ही गर्लफ्रेंड क्यूँ चुना...स्मार्ट कॉन्फिडेंट लड़की..सबको चाहिए ताकि दोस्तों में धाक जम सके...वरना उस निधि को क्यूँ एवोयाड करता रहता है..बेचारी कितना केयर करती है इसका...रोज़ एस.एम.एस करती है....अपनी सारी बातें शेयर करती है...रोहन के बर्थडे पर इतने सुन्दर गिफ्ट देती है....रोहन भी ये सब एन्जॉय करता है...कितनी बार कहा...'उसे ऐसी झूठी आशाएं मत दिलाओ...वो तुमसे प्यार करती है''...तो हंस कर उड़ा देता है कि वो डम्ब है...उसे डम्ब लगती है क्यूंकि...सीधी साधी सी है...फील सो बैड समटाइम्स ....


khanai pasand aayi ...ocompletely logo k beech jeeti hui :)
ho sakta hai aajkal Simmi ya rohan jaise practical log hi aaj k time ke xample hain but simmi ki bahan bhi isi time ki hai ..to ye sab soch par nirbhar karta hai na ki time par :)

vandana said...

aapko padhna accha lagta hai ..aap ese hi likhti rahiye ...bahut bahut shubhkaamnaye ...:)

वन्दना अवस्थी दुबे said...

वो यह सब तो सुन ही रही थी...साथ ही सोच रही थी, मम्मी कितनी सहजता से फेसबुक, प्रोफाइल, फ्रेंड्स लिस्ट की बात कर रही हैं....सिम्मी के सान्निध्य में इन सारी चीज़ों से परिचित हो गयी हैं....और एक वो है...मम्मी से भी ज्यादा आउटडेटेड हो गयी है...बस नर्सरी राईम्स और पिक्चर बुक में ही उलझी रहती है.

हाहा.... खूब पकड़ा है यहां. वैसे मैने भी सोचा ही नहीं था कि कहानी इस तरह टर्न होगी.लेकिन ठीक ही है. आज अधिकांशत: लड़कियां इस रिश्तों में भी बहुत व्यावहारिक होने लगी हैं. सुन्दर कहानी.
और हां, कोई क्या कह रहा है, इस पर ध्यान क्यों देती हो? अपना काम करती रहो. १०० में से एक ने ही कहा न? जब ९९ कहें तब चिन्ता करना.

rashmi ravija said...

@ वंदना
हा हा...ये क्यूँ ना सोचें हज़ार में से एक ने कहा :)

और वो भी...कहानियों पर नहीं...अपनी खुन्नस निकालने को कहा...:)

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जाने दो उसे रश्मि, तुम्हारा ब्लॉग किसी की व्यक्तिगत खुन्नस निकालने, या बेहूदी बहस का मंच नहीं है. तुम्हारे लिये साहित्यकार शब्द पर जिसे आपत्ति हुई हो, उसे शायद इस शब्द के माने नही मालूम.

मनोज कुमार said...

किसी भी मैरिड कपल को देखो..पांच साल बाद बताया नहीं जा सकता कि उनकी अरेंज्ड मैरेज है या लव मैरेज ...सब एक से दिखते हैं...वही एक दूसरे से, एक सी शिकायतें....एक से झगडे....एक से समझौते...जो ज्यादातर लेडीज़ को ही करने पड़ते हैं...चाहे उसने लव मैरेज की हो या अरेंज्ड...फिर जब बाद में समझौते करने ही हैं...तो अभी क्यूँ नहीं..? "
--- इस लड़की को कोई समझाए कि "जब तक दोनों पक्षों की जीत नहीं होती, तब तक कोई समझौता स्थाई नहीं होता।"
जो समझौता की यह बात कर रही है उसमें ....
बदलते समय का स्पष्ट प्रभाव प्रेम की अवधारणा पर देखने को मिलता है। एक ओर जहां नैतिकताओं और मर्यादाओं से लुकाछिपी है तो दूसरी ओर स्वच्छंदताओं के लिए एक नया संसार बनाने का प्रयास है। ... कहानी कथ्य और शिल्प दोनों मामले में बेजोड़ है। कथा बुनने का आपका कौशल सधा हुआ है।

इस्मत ज़ैदी said...

बहुत बढ़िया कहानी !
नायिका की ज़ह्नी कश्मकश का बहुत सुंदर चित्रण
वैसे ये सच है कि आज के दौर में व्यवहारिकता इन रिश्तों में भी पांव पसारने लगी है ,यही कारण है कि रिश्ते बनते कम टूटते ज़्यादा हैं

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आधुनिक युग में इसे ही प्रेक्टिकल होना कहते हैं शायद...
रश्मि जी, कहानी बहुत अच्छी लगी...बांधकर रखने वाली...अंत का पूर्वानुमान गलत साबित हुआ.

दीपावली की शुभाकामनाएं.

Udan Tashtari said...

ऐसा टर्न लेगी कहानी...वाकई नहीं जान पाये थे. बहुत जबरदस्त!!



अपील देख कर जरा आश्चर्य हुआ...इनको इग्नोर करना सीखो बिना किसी तरह की तवज्जो दिये.




सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

-समीर लाल 'समीर'

Udan Tashtari said...

अभी पूरी कहानी एक साथ एक बार और पढ़कर शायद फिर कुछ कहूं

सतीश पंचम said...

ओह...तो कहानी इस तरह से घूम गई....बहुत बढ़िया। सच ही तो कहा है कि कोई देवदास नहीं बनता वरना बार बार लोग एक ही का नाम क्यों लेते।

और फेसबुक और तमाम नेटवर्कस के बारे में भी बढ़िया कहा .... आजकल कई तरह के नेटवर्किंग माध्यमों के चलते जिंदगी उतनी सीधी नहीं रह गई है। इस तरह के माध्यमों से दो चार होना ही पड़ता है एट लीस्ट, नेटिजन्स के लिए तो यह बात लागू होती ही है। बाकि तो जो नेटिजन्स या टेक सेवी नहीं हैं, उनके लिए इन माध्यमो के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन आज कल देख रहा हूं कि वाकई कई उम्रदराज लोग भी इन माध्यमों से जुड़ते जा रहे हैं ।

और जहां तक बात फर्जी प्रोफाइल से टूँ टाँ लिख कर निकल लेने वालों की तो दो चार दिनों की खुन्नस एंव हो हो हा हा करके ऐसे लोग निकल लेते हैं। ऐसे लोगों पर ज्यादा तवज्जो नही देनी चाहिए।

रही बात कि साहित्यकार कहने पर आपत्ति वाली, तो जहां तक मैं समझता हूं कि ऐसे लोग अभी भी पुरानी मानसिकता में पेपर पर छपे शब्दों और उसके असर से बाहर नहीं निकल पाए हैं।

शायद उन लोगों के लिए प्रिंट के सिवा साहित्य हो ही नहीं सकता। जब तक दो चार उपन्यास न छप जाय, किसी को साहित्यकार मानेंगे ही नहीं। शायद उनके लिए पब्लिशर्स के माध्यम से किसी का गुजरना ही साहित्यकार की कसौटी है।

ऐसे लोग इस तरह की मुगालते से कब निकल पाएंगे भगवान जाने।

ali said...

[फेक प्रोफाइल के बारे में : आपका रवैया सही है ,पर उसके अलावा , सोचियेगा कहीं आपने आस्तीन में ... :) तो नहीं पाल रखे ]

अब कहानी के बारे में :
कथा अंक बढ़ने पर मेरी प्रतिक्रिया ठहर सी गयी थी अब ये कि , आखिरी अंक जल्दबाजी में समेटा गया सा लगा ! शायद 'फेक आई डी' के दुराग्रह, मुझसे पाठकों के आग्रह और सामने खड़े त्योहार की वज़ह से ऐसा हुआ हो :)

डिम्पी घर की बड़ी लड़की है और अपने पैरों में खड़ी भी ना पाई कि अभिभावकों ने उसे संपन्न वर के हवाले किया उसका अपना प्रेम , अपना अभिमत यदि रहा भी हो तो , उसे जानने की कोशिश नहीं की गई ! आर्यन की मां और सुनील की पत्नी के संबंधों को वफादारी से निबाहते हुए भी यही खलिश उसके मन में अब भी है कि शादी जैसे महती निर्णय में उसकी अपनी मर्जी का कोई 'मान' नहीं था ! इधर सुनील दिन भर खटने की दौड में है , उसे पत्नी को प्रेयसी बतौर देखने की फुर्सत नहीं , आर्यन और सुनील मूलतः डिम्पी के हवाले हैं और डिम्पी ? उसका ख्याल रखने वाला कोई बंदा कम से कम ससुराल नाम की जगह में मौजूद नहीं दिखता सो उसे अपने विवाह पूर्व के कमरे और तकियों में अपनापन ढूंढना है , वर्ना अपने वैवाहिक संबंधों में उसे रात को रेंगते हुए हाथों के स्पर्श का भय तो बना ही रहता है , घरेलू जिम्मेदारियों को नितांत एकतरफा तौर पर ढोते हुए उसके 'रोमांटिक अहसास' में यह बदलाव विरक्ति के संकेत देता है और वो भी कुल जमा ५ वर्ष के वैवाहिक जीवन में ! वो अपनी छोटी बहन को उन घटनाओं और हालातों से बचाना चाहती है जोकि उसके जीवन में घट चुकी हैं और जिनकी चुभन उसे शिद्दत से होती है , बस इसीलिए वो सिम्पी और रोहन के जीवन में उल्लसित सारथी की भूमिका में स्वयं को देख रही है कि अचानक उसकी ही बहन उसे जीवन और दुनियादारी की नई नसीहत दे जाती है ! एक बार फिर से ठगी सी रह गयी वो !

कथा में सिम्पी का चरित्र रोमांस और पैसे में से ,पैसे वाले रोमांस को चुनता है उसका शुरुवाती जीवन बड़ी बहन की ओट में पल्लवित होता है जो सारे धक्के स्वयं बर्दाश्त करती है और सिम्पी इस सहनशीलता को किसी और नज़रिये से देखती है , उसे लगता है कि उसकी दीदी की तुलना में वह अधिक स्वतंत्र है फैसले लेने में ! पर अभिभावकों के सामने खड़े होने के लिए उसे बड़ी बहन की सेवाओं / शील्ड की ज़रूरत है लेकिन जैसे ही उसके अभिभावक उसकी 'सोच' के अनुकूल वर सुझाते हैं वो निर्णय तक पहुंचने में बहन की मदद लेने के बारे में सोचती तक नहीं ! मेरे ख्याल से नई पीढ़ी रिश्तों में अवसरवाद की पतवार चलाने को बेहतर समझती है , जैसा कि सिम्पी ने किया , उसे ज़रूरत थी तो बहन को इस्तेमाल किया और रोहन को भी ! अब उसकी नज़र किसी और पर है जोकि रोहन से संपन्न है सो रोहन का केयरिंग नेचर उसके जिंदगी भर के पिछडेपन का सबूत हो गया ! उसकी अच्छाइयां , उसका जीवन अनुभवों में तप कर सोना होना , सिम्पी के अगले लक्ष्य की चकाचौंध में पीतल लगने लगा ! सिम्पी को परवाह नहीं कि उसका भावी पति महीनों घर से बाहर रहेगा ..उसकी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं !

रोहन अपने अभिभावकों के अलगाव के दरम्यान विकसित हुआ पौधा है जिसमें जीवन से जूझने का सामर्थ्य अधिक है पर उसके सिम्पी से अलगाव के लिए कोई वज़ह वो स्वयं हो ऐसा नहीं लगता , सिम्पी ने उसकी चारित्रिक विशेषताओं , जिनपर कि वह स्वयं मोहित होने का ढोंग कर रही थी , को अचानक ही उसकी नकारात्मकता के तौर पर प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया , मैं ये नहीं कहता कि इस जोड़ी के टूटने में रोहन का रोल जीरो होगा पर ये ज़रूर मानता हूं कि ये श्रेय मूलतः सिम्पी का है , सच कहूं तो सिम्पी रोहन के लायक नहीं थी अच्छा हुआ जो रिश्ता पहले ही खत्म हुआ ! रोहन को बचपन से ही रिश्तों में वंचित होकर जीने का अनुभव है सो वो इस सदमे को बर्दाश्त कर ही लेगा !

डिम्पी के माता पिता और सिम्पी का नया वर एज यूजुअल , चरित्र हैं सो बेटा आर्यन भी सदाबहार पुत्र है ! बस इसी वज़ह से इनके ऊपर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं ! मेरे हिसाब से कथा की नायिका डिम्पी है और अपनों से चोट खाने का दर्द उसमें किरचों सी चुभन पैदा कर रहा है !
रिश्तों और कथा चरित्रों की मन: स्थितियों के सफल प्रस्तुतिकरण के लिये रश्मि रविज़ा जी को एक बेहतर कथाकार माना जायेगा !

साधु साधु साधु !

अपूर्ण said...

सच कहूँ तो कहानी ने दिल तोड़ दिया | मानता हूँ कि कहानी दिल तोड़ने के लिए ही लिखी थी लेकिन सिर्फ ३ किश्तों में ही? चरित्रों को अधूरा छोड़ कर ? इमोशन नदारद, क्या नयी पीढ़ी की कहानी होने की वजह से ?

प्रेम सरोवर said...

The concluding part of your story is realistic in nature and impressive in
truest sense of its term.Thanks for this post.

निर्मला कपिला said...

बहुत लम्बी पोस्ट है कल आराम से पडःाती हूँ आज दीपावली है। आपको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

Dorothy said...

खूबसूरत, संवेदनशील प्रस्तुति. आभार.

इस ज्योति पर्व का उजास
जगमगाता रहे आप में जीवन भर
दीपमालिका की अनगिन पांती
आलोकित करे पथ आपका पल पल
मंगलमय कल्याणकारी हो आगामी वर्ष
सुख समृद्धि शांति उल्लास की
आशीष वृष्टि करे आप पर, आपके प्रियजनों पर

आपको सपरिवार दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
सादर
डोरोथी.

निर्मला कपिला said...

कहानी का अन्त कुछ कुछ ऐसा ही सोचा था। मेरी साहित्यकार बेटी को बहुत बहुत बधाई। नयी पीढी की कहानियाँ अब इसी तरह की होंगी मुझे तो यही आशंका है। ऐसे रिश्तों को आखिर एक कहानी मे कोई कहाँ तक खींच पायेगा?

rashmi ravija said...

@वंदना
पता नहीं..प्रैक्टिकल होना सही है..या भावात्मकता ......वह तो बाद में पता चलता है...क्या खोया..क्या पाया..
@रवि शंकर जी,
आपको कहानी संवेदनशील लगी...और उसका X-फैक्टर भी पसंद आया..शुक्रिया.
@अभी,
सही कहा....अगर प्यार में सब कुछ सुहाना हो जाए..फिर कहानी कैसे बने?
@शिखा,
तुम्हे कहानी पसंद आई, मेहनत सफल...सिम्मी ने कई तर्कसंगत बातें भी कही हैं.
@राज जी,
बिलकुल सही..सब बच्चे ऐसे नहीं होते...सिम्मी की बहन डिम्पी भी इसी जमाने की है...पर छोटी बहन की तरह स्वार्थी नहीं.

rashmi ravija said...

@संगीता जी,
सच है..आजकल के पति भी काफी सहयोग देते हैं घर में...पर कुछ लोगों का nature of job ही ऐसा होता है कि समय ही नहीं बचता...सहायता करें भी तो कैसे ?

@रवि,
सच में तुम्हारे कमेंट्स पढ़कर मुस्कुरा रही थी कि देखा तुमने नीचे लिखा है...प्लीज मुस्कुराइए मत।(तब भी हमने बंद नहीं किया, मुस्कुराना )

@रश्मि जी,
हम भी कभी कभी आज की पीढ़ियों की बात सुन कर कहते हैं...
baap re baap...:)

@प्रवीण जी,
अच्छा है...एक काम तो खुद के जिम्मे ले लिया है..बेटी को कविता रटवाते हुए ,खुद भी बचपन की गलियों में घूम रहें होंगे.

@ वंदना,
शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया.....यही मैं भी कहना चाह रही थी कि डिम्पी भी तो इसी जमाने की है...सही कहा,यह सब सोच पर निर्भर करता है...समय पर नहीं.

@वंदना दुबे
हाँ ,आजकल लडकियाँ भी बहुत व्यावहारिक होने लगी हैं...और सेल्फिश भी.

@मनोज जी,
शुक्रिया..पर इस अंक की बुनावट बड़ी ढीली-ढाली रही...:)

@इस्मत जी,
अब त्याग की भावना कम होती जा रही है...इसलिए रिश्ते भी टूट रहें हैं...दोनों ही पक्ष अब बराबर के जिम्मेवार होते हैं.

rashmi ravija said...

@ समीर जी,
आपने तो दुखती रग फिर से छू ली
इग्नोर ही किया अब तक....जगह जगह महाशय...मेरे लेखनी की...मेरी न्यूज़ रीडिंग की त्रुटियाँ बताते रहें...चुप रही...यहाँ नज़रंदाज़ कर ,कमेन्ट पब्लिश नहीं किया तो ....'नारी ' ब्लॉग पर उछल-कूद मचाने लगे कि "मैने उनकी सारी कहानी पढ़ ली..,बहुत बकवास लगी..उनकी किसी अच्छी कृति का नाम बताएं..." अब कोई अहमक ही होगा,जो सच ना समझे कि इतना सारा लिखा हुआ घटिया लगा, तो अब कैसे अच्छा लगने लगेगा?..किसी का लिखा दो पेज पढ़कर ही पता चल जाता है..उसका लेखन कैसा है.

इस तरह सबका समय बर्बाद होता है...कुछ मित्र मेरी तरफ से उनसे बहस करने लगे...फिर भी मैं इग्नोर करती रही...पर बाद में उन्हें जबाब देने आना पड़ा क्यूंकि .रचना जी की पोस्ट तो कोई पढ़ ही नहीं रहा था...अब भी इग्नोर करती तो कल को किसी और के ब्लॉग पर जाकर उछल-कूद मचाते यही वजह है कि लोगों को उनकी औकात बतानी जरूरी हो जाती है. वरना किसी TOm Dick and Harry का अस्तित्व ही क्या है. जो उसे जबाब देने की जहमत मोल ली जाए.

किसी ने सलाह दी, "एक चुप सौ को हराए " कैसी हार और कैसी जीत?..ये कोई रेस है क्या? मैं यथार्थवादी कहानियाँ और आलेख लिखती हूँ....उन महाशय ने अभी अभी कुछ संस्कृत निष्ठ शब्दों का प्रयोग कर तुकबन्दियाँ शुरू की हैं...सॉरी...हो सकता है,उनका लेखन 'जयशंकर प्रसाद' के समकक्ष का हो और कल ज्ञानपीठ पुरस्कार ही मिल जाए....शुभकामनाएं

फिर भी तुलना कैसी? और Audacity ये कि इतनी जिल्लत के बाद भी अपनी कविता में 'रश्मि' शब्द का प्रयोग करते हैं.....pure disgusting

@सतीश जी,
फेसबुक और तमाम सोशल नेटवर्क, आजकल रिश्ते,बनाने और बिगाड़ने में अहम् भूमिका निभाने लगे हैं.
और लोंग भले ही नेट पर लिखे को सीरियसली ना लें...प्रिंट मिडिया को ही महत्व दें...उनका अपना नजरिया है..पर इसके लिए लिखनेवाले को दोषी कैसे ठहरा सकते हैं?
जिसने 'साहित्यकार' कह दिया , उस से पूछो ना....विरोध करो, उसके घर के सामने प्रदर्शन करो...उसके घर के कांच के शीशे तोड़ दो...पर मुझे परेशान करने का क्या मतलब है???....मैने तो खुद को कहीं लेखिका तक नहीं कहा.

rashmi ravija said...

@अली जी,
हमने कोई सांप नहीं पालें....वैसे भी ...वे बीहड़ जंगलों में ही अच्छे लगते हैं....आबादी के आस-पास भी ना फटकें तो बेहतर :)...बात सिर्फ अलग विचारों की असहिष्णुता की है...हमारे सुर में सुर मिलाकर तारीफ़ करो...सुर में सुर मिलाकर गाली दो...अगर नहीं दी..तो फिर हम तुम्हे गाली देंगे ..बस.

कहानी के लिए तो आपने सही ही कहा...'बहुत जल्दी में समेटा..और जैसी कि आशंका थी....पूरी तरह न्याय नहीं कर पायी....अब सोच रही हूँ.....खुद से कमिटमेंट...या खुद अपने लिए डेडलाइन तय करना कितना सही है?? creativity...पर असर पड़ता है.

आपने उन बिन्दुओं को भी विस्तार दे दिया है..जिसे कहानी में सिर्फ छुआ भर गया है...शुक्रिया इतने ध्यान से कहानी पढने के लिए.


@अपूर्ण.
मैं आप जैसे पाठकों की गुनाहगार हूँ...जो इतने मन से पढ़ते हैं, मेरी कहानियाँ ...निराश करने के लिए वेरी वेरी सॉरी....वजहें वहीँ हैं...जो अली जी ने बतायी....आगे से बिलकुल ध्यान रखूंगी...देर भले ही हो जाए...पर कहानी दुरुस्त रहें.

शायद, आपने मेरी 'आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू शची'... पढ़ी है. इसीलिए इस कहानी की और किस्तों की भी उम्मीद थी. यह कहानी तो एक ही किस्त की सोचकर लिखी थी..पर संवादों की वजह से लम्बी हो गयी और शायद संवाद...इमोशंस पर भी हावी हो गए.

अगली कहानियों से नई पीढ़ी के इमोशंस का ख़ास ख़याल रखूंगी...दरअसल...कहानी शुरू करने से पहले ही..कहानी के प्लाट में ,सिम्मी एक स्वार्थी लड़की थी जो, अपने फायदे के लिए सबको इस्तेमाल करती है...और सिर्फ अपना सुख देखती है...रोहन एक जहीन, संस्कारी लड़का है जिसे सिम्मी dump कर देती है...पर लिखते वक्त..मैं सिम्मी का कैरेक्टर बिलकुल ही निगेटिव नहीं लिख पायी...इसी लिए उसका अपनी दीदी के प्रति चिंता, बच्चे से प्यार...और कुछ तर्कसंगत बातें कहलवा दीं. वैसे ही रोहन को बिलकुल निरीह और बेचारा दिखाने का मन नहीं हुआ... (वैसे सोच-समझकर नहीं किया...लिखते वक्त हो गया...शायद इसीलिए असली इमोशंस नज़र नहीं आए..sorry again

rashmi ravija said...

@ 'Prem Sarovar ji
U liked the end part....thanx allot

@शुक्रिया डोरोथी..
आशा है दिवाली अच्छी गुजरी होगी.

@ निर्मला जी,
काहे की साहित्यकार..
दरअसल लोगों के मेल आते हैं...'आपकी अमुक पोस्ट अपने साइट पर डालने की इजाज़त चाहते हैं.' मैं 'हाँ' कह देती हूँ. कभी वे लोंग लिंक भेजते हैं..कभी नहीं...भेजते हैं तब भी मैं जाकर चेक नहीं करती कि मेरे परिचय में क्या लिखा है?...इन महाशय ने वहीं कही साहित्यकार लिखा देख लिया और इतना बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया. और उसके बाद 'स्वाभिमान टाइम्स' वालों ने भी लिख दिया है. मैने उन्हें मेल भेज कर कह दिया है कि ' कहानीकार' या 'कथाकार' शब्द का ही प्रयोग करें.

अगर कहानीकार बन सकूँ तो उसे ही अपनी बहुत बड़ी खुशकिस्मती मानूंगी.

muskan said...

दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें ... ...

वाणी गीत said...

पूरी कहानी पढ़ी एक साथ ...
हम लोंग(या हमारी-तुम्हारी पीढ़ी )जो अतिअधुनिकता और पुरातन के बीच की कड़ी हैं , ऐसी व्यवहारिकता देखकर दुखी हो ही जाते हैं , मगर नयी पीढ़ी का फंडा इसी तरह का है ...मन उदास हो जाता है, कितनी अजीब बात है ना , जिनकी जिन्दगी से जुडी है कहानियां , उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है और हम जो ऐसे रिश्तों को दूर से देखते हैं , इन्वोल्व हो जाते हैं ...
तुम्हारी कहानियों में छोटी -छोटी बातों को इतनी ख़ूबसूरती से बयान करने और मनोवैज्ञानिक दृष्टि पर मैं अचंभित होती रहती हूँ ...
डिस्क्लेमर पढ़कर हैरानी हुई ...लोकप्रियता की सीढ़ी चढ़ने वालों को ऐसे कमेंट्स मिलते रहते हैं ...मस्त रहो ...!

JHAROKHA said...

rashmi ji ,puri kahani ko padhne me samy jaroor laga par sach maniye to laga ki bilkul sahi likha hai hi aapne aaj sab practical life me ab vishwaash karte hain isi liye jyada bhavnao me nahi bahte unko jo aage nazar aata hai vahi sach dikhta hai .aur duusaron ka samjhana bekar.
par jo ho kahani vastav me dil ko chhoo gai.
aap yu hi likhte rahe aur ham padhne ka aananad uthate rahe inhi shubh-kamnaoo ke saath-----
poonam

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

रश्मि जी, प्रारम्भिक किश्‍त के बाद समापन किश्‍त पर कमेंट कर रहा हूँ (आपके मेल से डर जो गया था)।
आजके हालात को आपने बहुत सलीके से लफ्जों में बॉंध दिया है। इसी कारण यह पाठकों के हृदय को छूने में सक्षम है।

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इंटेली‍जेन्‍ट ब्‍लॉगिंग अपनाऍं, बिना वजह न चिढ़ाऍं।

rashmi ravija said...

@ वाणी,
शुक्रिया ,तुम्हे पसंद आई कहानी...और तुम तो पता नहीं क्या-क्या देख लेती हो मेरी कहानी में...जो मैं शायद सायास लिखती भी नहीं.

और अगर लोकप्रियता की ऐसी कीमत चुकानी पड़े तो किसे चाहिए ऐसी लोकप्रियता???....इतना मानसिक संताप झेलकर??...हम गुमनाम ही भले .

rashmi ravija said...

@जाकिर जी
आप डरिए मत,बाबा....वो तो एक मजाक था...मेरे पोस्ट करते ही आपका कमेन्ट तुरंत आ गया तो मैने उसी वक्त यूँ ही आपका मेल पाते ही रिप्लाई कर, मजाक में कह दिया था कि 'पढ़ी भी आपने या ऐसे ही टिप्पणी कर दी'...मुझे पता है...आप पढ़कर ही करते हैं..

Was just joking...Dont take it seriously

गिरीश बिल्लोरे said...

तीसरी और अंतिम किश्त बेहतरीन लगी कथानक की सुगढ़्ता सरल प्रवाह सहज अभिव्यक्ति बेशक पूर्ण कहाने उद्देश्य से भटकती भी नहीं लगी
अत: सार्थक भी कहानी
मिसफ़िट पर ताज़ातरीन

विनोद कुमार पांडेय said...

रश्मि जी, यह ब्लॉगिंग जगत भी बड़ा विवादित जगह हो गया है लोगों की आदत हो गई है कुछ ना कुछ मुद्दा उठाने की ..ऐसे लोगों की बातों का कोई मतलब नही है....ऐसे ही चुप हो जाएँगे.... सार्थक लेखनी के लिए धन्यवाद...

P.N. Subramanian said...

यहाँ तो कभी देखा ही नहीं था. यह कहानी अजीब जरूर हो परन्तु यही वास्तविकता है.मै शिखा जी का भी समर्थन करता हूँ.

mukti said...

दी, आप मानो या ना मानो. पर सिम्पी के चरित्र को देखकर मुझे यही लगा था कि कोई सों काल्ड "अच्छा वर" मिलने पर वो रोहन को छोड़ देगी. इसलिए मेरे लिए कहानी का अंत स्वाभाविक था. मैंने महानगरों की लड़कियों को बहुत करीब से देखा है. वो सच में बहुत प्रैक्टिकल होती हैं और इमोशनल फूल नहीं बनतीं. लड़के तो खैर शुरू से ही लड़कियों को घूमने-फिरने के लिए साथ लेते हैं और शादी माँ-बाप की मर्ज़ी से. देखा जाए तो लड़कियों में ये परिवर्तन सकारात्मक है.
पर पता नहीं क्यों मुझे डिम्पी का पक्ष इस मामले में सही लगता है, " आज भी लोग हैं...प्यार, विश्वास और ईमानदारी पर मर-मिटने वाले..."... इमोशनल फूल बनना नहीं मंज़ूर पर प्यार के ऊपर सुख-सुविधाओं को रखना भी नहीं स्वीकार.
मेरे ख्याल से जो सच्चा प्यार करते हैं, वो जिंदगी भर साथ रहते हैं. क्योंकि प्यार का रूप बदलता रहता है, पर प्यार नहीं बदलता. वो शाश्वत है. हमेशा से था और रहेगा.
अली जी ने आपकी कहानी की समीक्षा करके उसकी कीमत बढ़ा दी है. जब कभी इसे कहीं छपने के लिए दीजियेगा, तो इस समीक्षा के साथ ही दीजियेगा.

Avinash Chandra said...

आमतौर पर कहानियाँ पढना मेरे लिए मुश्किल काम है, आपकी कहानियाँ पढना जरा ज्यादा ही मुश्किल हो जाता है. किश्तें...??
तो इकठ्ठा पढने की ही कोशिश रहती है, आज कई दिन बाद आया तो देखा ये पूरी हो गई है.
जैसा की अपूर्ण जी (नाम नहीं पता, अजीब सा लगता है ये कहना) ने कहा, कहानी जरा जल्दी सिमट गई पर मुझे ये बहुत अच्छा लगा की आपने समापन नोक से जरा पहले कर दिया, पाठक अंत खुद सोचे-महसूसे, कहानी की उम्र थोड़ी और लम्बी हो जेहन में.
ये सिर्फ मेरा मत है...वैसे कहानियों के बारे में कुछ नहीं पता, ऐसे ही लिखी जाती हों अच्छी कहानियाँ, संभवतः.

विषयवस्तु के बारे में कहने से अच्छा होगा, अली जी से उधार शब्द माँग के कर paste दूँ (?).

हाँ! सिम्मी से मौन असहमति चाहता हूँ. ज्यादातर (संभव है सभी) बातें सही हैं उसकी (उनकी?) इसलिए शायद objection/argument नहीं कर सकता, पर सही मान लूँ यह भी नहीं कर सकता.
gray color इसे ही कहते होंगे शायद.


और हाँ! माँ भी आज तक घर ही जाती हैं, मायके नहीं :)

अंत में, यहाँ यही Sanctity बनी रहे, आभार!

singhsdm said...

बहुत सुन्दर कहानी...... बचपन के हिस्से और माओं की चिंता परेशानी क्या खूब चित्रण किया है आपने .....वाह वाह !!!!

शोभना चौरे said...

रश्मिजी
बहुत दिनों बाद ही सही पर पूरी कहानी पढने का आनन्द ही कुछ और है |
मै तो इतना ही कहूँगी |आज का सच पूरी(आँखों देखा )ईमानदारी से कहानी के रूप में परिवर्तित हो गया है |
सशक्त कहानी |आभार |

केवल राम said...

पूरी कहानी पढने के बाद एक ही निष्कर्ष निकला ..खुद को संभालो , नहीं तो हालात संभलने का मौका नहीं देंगे ...बहुत खूब ...इस कहानी की पूरी समीक्षा करने का दिल कर रहा है ...फुर्सत मिली तो जरुर कोशिश करूँगा ...शुक्रिया
चलते -चलते पर आपका स्वागत है

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

कथा-प्रवाह के साथ ही आपकी भाषा का प्रवाह देखकर मुग्ध हूँ...पात्रानुकूल भाषा का चयन कहानी में प्राण डाल देता है...ख़ुशी है कि आपने इसे बख़ूबी निभाया भी! पुनः पढ़ूँगा आकर...ज़्यादा समय लेकर आना होगा आपके पास!

Amrita Tanmay said...

भावनात्मक ,संवेदनशील ......सुन्दर कहानी ,आपको बधाई

mahendra verma said...

बचपन को स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना प्रत्येक अभिभावक की नैतिक जिम्मेदारी है।

एक श्रेष्ठ कहानी के लिए आभार।

गिरिजेश राव said...

आर्यन और उसका बचपन।
कमाल है कि इसके पहले की कड़ी में मैंने बगिया में भागते हुए पलाश के फूल चुनते एक बच्चे की बात कही है जिसका बचपन सिर्फ इस दबाव में बीता कि उसे हमेशा अव्वल रहना है।...
अंत और कहानी पर नो कमेंट्स। ... शायद मैं पिछ्ड़ा हुआ हूँ लेकिन 'प्रेम' ऐसा नहीं होता।
कोई और नाम दिया जा सकता है।
हाँ, अब आप के ब्लॉग पर नियमित रहूँगा।

संतोष पाण्डेय said...

आज के परिवेश की रोचक कहानी.

Mrs. Asha Joglekar said...

आज आपके ब्लॉग पर आई और टूटी किरचें तीनो भाग पढ गई । कहानी का अंत काफी चौंकाने वाला था इतने ही प्रेक्टिकल होते हैं लोग तो किसी दूसरे की भावनाओं से क्यूं खेलते हैं । पर कहानी तो समाज का ही आइना होती है । शायद यही होता है ।