Thursday, October 28, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की ( कहानी -२)

(छोटी बहन सिम्मी ने ,एक लड़के रोहन से अपने प्रेम की बात बतायी थी. रोहन , अपनी माँ के साथ अकेले रहता था..उसके माता-पिता का डिवोर्स हो चुका था. )
 

गतांक से आगे 

आर्यन को ले, घर लौट आई थी पर पूरे  समय उसके दिमाग में सिम्मी और रोहन के रिश्ते ही छाये रहते . चाहे जो हो,वो अपनी बहन की खुशियाँ नहीं बिखरने देगी. खुद तो कभी प्यार जाना नहीं. माँ का इतना सख्त अनुशासन था . कॉलेज में कदम रखते  ही उसे बिठाकर एक घंटे लेक्चर  और ढेर सारी हिदायतें दी थीं. हर वाक्य के अंत में होता, 'तुम्हारी एक छोटी बहन भी है...तुम्हारी किसी भी हरकत का असर उस पर भी होगा." और वो पूरे समय  एक आदर्श बड़ी बहन का रोल निभाती रही और छोटी बहन ने ही गुल खिला दिए. माँ की उलझन वो समझती थी. उन्हें उसके माध्यम से अड़ोसी-पड़ोसी रिश्तेदारों सबको यह दिखाना था कि उन्होंने कितनी अच्छी परवरिश की है. जब भी छुट्टियों में अपने शहर जातीं...सब हिदायतें देते..'बड़े शहर में रहती हो जरा,लड़कियों पर ध्यान रखा करो...ऐसा ना हो बाद में रोना पड़े" और माँ का सख्त शिकंजा जरा और मजबूती से कस जाता.

वह भी डरी डरी सी ही रहती, कॉलेज में उस  मनीष ने कितनी बार करीब  आने की कोशिश की..असाईन्मेंट्स  के बहाने...बुक्स के बहाने. उसे भी घुंघराले बालों वाला, लम्बा -पतला...बेपरवाह चाल वाला ,मनीष अच्छा लगता,  पर वो अपनी सहेली संजना से ही  चिपकी रहती. आखिरकार  बाद में सुना उसका नाम 'आइस बेबी' रख छोड़ा है उसने. जिस दिन वो नहीं आती, संजना बताती...सारा दिन कहते रहता..'कितनी गर्मी है आज...वो 'आइस बेबी' भी तो नहीं आई.' फिर भी उसकी हिम्मत नहीं हुई. जब अपने नेटिव प्लेस की कजिन्स को देखती तो लगता छोटे शहर में रहकर भी वे ज्यादा आज़ाद हैं. छत पर अपनी सहेलियों से लड़कों की ऐसी ऐसी बातें करतीं कि वो दंग रह जाती. पर वो तो फ़्लैट में रहती थी और उसपर मम्मी के खड़े कान  और सतर्क नज़र. कॉलेज का भी सारा टाइम टेबल उन्हें पता होता. दस मिनट भी लेट हो जाती तो सौ सवालों  के जबाब देने पड़ते. बस कॉलेज बंक कर के कैंटीन और गार्डेन में टाइम पास किया है. इस से ज्यादा तफरीह नहीं की कभी.

फिर भी सोचती, चलो कॉलेज के बाद जॉब करेगी ,तब तो अपनी मर्जी की मालिक होगी.पर पापा को किसी ने सुनील का रिश्ता बताया और फिर चट मंगनी पट ब्याह . वैसे सिम्मी उसपर चुपचाप गाय जैसे सर झुका कर शादी कर लेने का इलज़ाम लगाती है .पर बात वो नहीं थी...उसने डरते-डरते ही सही, पर विरोध किया था. और तब पापा ने बड़े प्यार से समझाया था. संयोग से इसी  शहर का लड़का है...वो अपने शहर मे ही रहेगी. शादी के बाद भी आगे पढ़ना चाहे ..कोर्स करना चाहे..नौकरी... जो चाहे कर सकती है. दो साल  बाद पता नहीं किसी  दूसरे शहर  का लड़का मिले...तो उसे जाना पड़ेगा.आखिर दो-चार -पांच साल बाद शादी तो करनी  ही है. एक बार सुनील से मिल ले..ना अच्छा लगे तो ना कर दे और वे मान लेंगे.

सुनील उसे बहुत सुलझे हुए लगे. और हैन्डसम,वेल मैनर्ड भी ( सिम्मी कहती है, तुमने उसके पहले किसी लड़के को नजर भर देखा कहाँ था, पहला लड़का देखा और दिल हार गयी.) उसकी आगे पढने की चाह नौकरी की ख्वाहिश सबमे हामी भर दी. और वह तो ख़ुशी से नाच उठी. सुनील से शादी की ज्यादा ख़ुशी थी या माँ के सख्त अनुशासन से निकल जाने की वो तय नहीं कर पाती. पर सारे मंसूबे धरे रह गए.एक साल बाद ही आर्यन आ गया और अब तो बस उसकी  दुनिया ,आर्यन ही है.

उसकी ज़िन्दगी तो एक बनी बनायी लीक पर चलती रही...पर सिम्मी ने विद्रोह कर दिया था....उसने मम्मी-पापा से साफ़ कह दिया था, वो दीदी की तरह पढ़ाकू नहीं और उसे ज्यादा पढने का शौक भी नहीं...ग्रेजुएशन के बाद नौकरी करेगी और कुछ साल तक शादी नहीं करेगी. पापा कितना मना कर रह गए थे, एम.बी.ए. कर ले...कोई अच्छा सा कोर्स कर ले ...पर उसकी ना तो ना...खुद ही वेकेंसी पता कर इंटरव्यूज़ के लिए जाती और एक अच्छी सी जॉब भी मिल गयी, उसे.

उसने भी हर कदम पर सिम्मी का साथ दिया था, कपड़ों के चयन की बात हो, या फ्रेंड्स के साथ देर रात न्यू ईयर पार्टी या गरबा में जाने की बात...हर बार वो माँ से उसके लिए लड़ पड़ती. जो कुछ, खुद नहीं जिया, सिम्मी के माध्यम से जीने की कोशिश थी,शायद. माँ ने उसे जींस पहनने से तो नहीं रोका..पर टी.शर्ट या कुर्ती लम्बी सी ढीली ढाली होनी चाहिए थी. माँ उसे खुद ही शॉपिंग  के लिए लेकर जातीं.और ओल्ड फैशंड कपड़े खरीदवा देतीं. हद्द  तो तब हो गयी थी,जब एक बार बारिश में उसके कपड़े नहीं सूखे थे और माँ ने बाकी कपड़े...प्रेस में दे दिए थे. माँ ने जबरदस्ती अपना सलवार कुरता पहनने पर मजबूर कर दिया था. उसके  आना-कानी करने पर डांट लगाई थी कि वो कॉलेज पढने के लिए जाती है या फैशन शो में भाग लेने. टेस्ट था इसलिए वो बंक भी नहीं कर सकी. सारा दिन मनीष की नज़रों से बचती  रही थी. पर उसने देख ही लिया और उसके ऊँचे गले और बेफिटिंग वाले कपड़ों को देख..'आइस बेबी' से बदल कर उसका नाम 'मुगले-आज़म' रख दिया था. घर पे आकर कितना रोई थी और सबने सोचा था, टेस्ट खराब हो गया है.

शायद इसी का बदला लेने को, सिम्मी के कॉलेज में जाते ही खुद उसे लेकर लिंकिंग रोड गयी थी और ढेर सारे तंग...छोटे टॉप्स खरीदवा दिए थे.माँ कुछ कहतीं..उसके पहले खुद ही कह दिया था....'मुझे तो मुगले-आजम के जमाने के कपड़े पहना ,  भेजती थी कॉलेज...अब इसे तो आज में जीने दो...." माँ के चेहरे का बदलता रंग देख..थोड़ा अपराधी मह्सूस  किया था और आगे जोड़ दिया.."ये इतनी दुबली-पतली है,इस पर अच्छे लगेंगे ये कपड़े" और मन ही मन कहा था.."मैं कौन सी मोटी थी...मुझपर क्या अच्छे नहीं लगते?? " . सुनील कोई टोका-टोकी नहीं करते...पूरी आजादी थी ,जो चाहे पहने ,पर आर्यन के जन्म के बाद खुद ही मन मसोस  कर रह जाती. जब किसी शॉप में शॉपकीपर  उसकी नाप के कपड़े के लिए अलग काउंटर पर भेज देता तो उसी वक़्त प्रण कर लेती, अब कल से ही जिम और डाइटिंग शुरू. पर यह प्रण बस रास्ते तक ही रहता घर आकर भूल ही जाती कि ऐसा कुछ सोचा भी था.अब कोई मोटिवेशन भी तो नहीं था.

माँ भी सिम्मी से उतनी सख्ती से पेश नहीं आतीं...शायद उन्हें संतोष हो गया था ,'एक बेटी को तो पारंपरिक  ढंग से पढ़ा-लिखा कर शादी कर दी' अब उनकी परवरिश पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकता. फिर भी रोहन से शादी की बात तो माँ भी ना मानें,चाहें रुमा आंटी उनकी कितनी ही अजीज़  हों. और पापा का तो सवाल ही नहीं उठता. उनकी तो साहनुभूति भी नहीं थी,रुमा आंटी के साथ. माँ के ,जिक्र करने पर अक्सर कह देते.."क्या पता, क्या बात थी,एक घर भी नहीं संभाल सकी. एक औरत का इतना इगो रखना अच्छा नहीं."  एक महिला सुचारू रूप से घर चला रही है, अकेले दम पर ,बच्चे की परवरिश कर रही है. शायद उनके पुरुष दर्प को यह बात आहत करती थी. फिर रोहन के पास अच्छी क्वालिफिकेशन भी नहीं थी. पापा भले  ही बरसों से महानगर में रह रहें हों.पर अभी भी डॉक्टर,इंजनियर, क्लास वन गवर्नमेंट ऑफिसर्स से आगे उनकी सोच नहीं जाती. सुनील का  भी आइ.आइ.टी. से होना उन्हें लट्टू कर गया था

उसे ही सब करना होगा.अगर माँ-पापा नहीं माने तो कोर्ट मैरेज करवा देगी,उनकी. विटनेस की जगह हस्ताक्षर करने की बात सोच ही रोमांचित हो उठती . आर्य समाज मंदिर में फेरे भी करवाने होंगे. पर इन सबके पहले सुनील को मनाना होगा. वे मम्मी -पापा के खिलाफ साथ देने को तैयार होंगे? ना तो ना सही...वो तो पूरा साथ देगी,उनका. फिर एक अपराध बोध भर आता मन में. क्या गुजरेगी, मम्मी- पापा  पर....छोटी लड़की उनकी मर्जी के खिलाफ शादी कर रही है और बड़ी बेटी साथ दे रही है...पर  कोई चारा भी तो नहीं...अब समय  के साथ नहीं बदलेंगे तो यह दुख तो सहना ही पड़ेगा...  रुमा आंटी के ना करने का तो सवाल ही नहीं. रोहन की ख़ुशी,उनकी ख़ुशी है. और अब तो रोहन से मिल भी चुकी है.बहुत पसंद आया था उसे.

सिम्मी ने ही एक दिन पूछा,'रोहन से मिलोगी ?..मैने उसे  दिया है कि तुम्हे सब मालूम है.' उसने घर बुलाना चाहा ,दोनों को तो सिम्मी ने मना कर दिया..'ये सब झंझट मत पालो...तुम किचन में खटना शुरू  कर दोगी...ऐसे ही कहीं साथ में कॉफी पीते हैं."

"पर आर्यन..."

"क्या दीदी...कभी...तो उसके बिना भी कुछ सोच लिया करो...इतनी औरतें...बच्चों को छोड़कर बाहर जाती हैं या नहीं...मम्मी के पास...छोडो..या नेबर या  किसी फ्रेंड के यहाँ...ये सब तुम जानो....फिर मुझे बता दो...किस दिन का प्लान है."

माँ के पास ही छोड़ना ठीक लगा...आराम से जितनी देर चाहे रुक सकती है. सिम्मी के साथ शॉपिंग का बहाना बनाया कि वो ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकल  आएगी. उस दिन बड़े यत्न से तैयार हुई. ढूंढ ढाढ   कर एक फैशनेबल टॉप और जींस निकाला. बाल खुले छोड़े. मस्कारा और आई लाइनर भी ट्राई करने की कोशिश की पर इतने दिन नहीं यूज़ करने से ड्राई हो  गए थे सब. ट्रेंडी ज्वेलरी भी निकाले...और जैसे खुद को ही आइने में पहचान नहीं पायी.

आर्यन ने भी उसे गौर से देखा और एक हाथ कमर पर रख  एकदम मवाली की तरह बोला...'ओ  मम्मा ...तुम कित्ती ब्यूटीफुल लग रही हो..."और फिर सब  किरकिरा कर दिया,यह कह कर ," "एकदम मेरी 'मिस डे ' टीचर जैसी." पूत के पाँव पालने में...अभी से टीचर्स को गौर से देखना शुरू कर दिया है. सोचा  उसने.

माँ भी एकबार चौंकी.फिर बोलीं...'हम्म तो दोनों बहने आज एन्जॉय  करने जा रही हैं"

थोड़ा झिझकी वो,"अब सिम्मी के साथ जाना है..पता है,ना..जरा सा ढीली-ढाली रही तो बीच बाज़ार में ही डांट देगी मुझे"

"उस लड़की से तो भगवान बचाए...कैंची की तरह जुबान चलती है...पर तू बहुत अच्छी लग रही है, ऐसी ही रहा कर.."

गुस्सा आ गया उसे,मन ही मन कहा..."हाँ...जब अच्छी लगती थी तो पहनने  नहीं दिया...और अब ना  समय मिलता है .ना कपड़े फिट आते हैं...ना सजने-संवारने की चाह तो कहती हो..ऐसे ही रहा कर..."

जल्दी से बाहर निकली,पहला मौका था जब यूँ आर्यन के बिना...बाहर जा रही थी. कॉफी शॉप तो दूर किसी रेस्टोरेंट में जाना भी बंद हो गया था. एक बार आर्यन ने वेटर के प्लेट रखते ही चम्मच उठा खट से प्लेट पर मारा और प्लेट टूट गयी. और एक बार तो टेबल पर चढ़ डांस करने की कोशिश करने लगा. सारे लोग देख रहें थे. उसे तो उतना बुरा नहीं लगा, सबके बच्चे इस उम्र में ऐसा ही करते  हैं.पर सुनील काफी एम्बैरेस्ड हो गए थे और बिलकुल बंद कर दिया था,बाहर जाना...अब सिर्फ वे लोग गार्डेन में जाते या किसी 'बीच' पर. वहाँ जाने के लिए क्या तैयार होना? बहुत दिनों बाद ये मौका आया था.

कार में खुद को अकेले पाकर एक अलग ही अनुभूति हुई. हालांकि आर्यन  के लिए ही गाड़ी चलानी सीखी. वरना सुनील तो कितनी बार कहते, 'मैं ट्रेन से जाता हूँ,कार पड़ी रहती है,सीख लो'. पर अंदर छुपी भीरु लड़की ने हिम्मत नहीं की. फिर एक बार सिग्नल पे इतना धुंआ था  कि आर्यन का तो गला चोक होते-होते बचा. ऐसी खांसी उठी कि चार घंटे हॉस्पिटल में रखना पड़ा. ऑक्सीजन दी गयी तब वो ठीक  हुआ. सुनील बहुत बरसे ," हफ्ते में दस दिन, अपनी  माँ के यहाँ जाना तो छूटेगा नहीं...बच्चे पर तो रहम करो...गाड़ी पड़ी रहती  है पर नहीं चलानी ...तुम्हे तो किसी गाँव में होना चाहिए था " (उनका गुस्सा देख, ध्यान भी नहीं दिलाया कि हफ्ते में दस नहीं, सात दिन होते हैं ) उसके बाद से ही हिम्मत कर गाड़ी चलानी सीखी.....वो अलग बात है कि ,वीकेंड्स पर सुनील का अधिकार रहता है कार पर और उनको हज़ार अदृश्य आवाजें सुनायी देने लगती हैं...शिकायत जारी रहती  है....'कार का ये खराब हो गया है..वो ख़राब हो गया है'. और जब वो चलाती तो वे सारी आवाजें गायब हो जाती हैं, शायद अगले वीकेंड्स तक और अब तो आदत ऐसी खराब हो गयी है  कि जरा 'धनिया पत्ता' भी लेना  हों तो गाड़ी लेकर ही जाती है ..हालाँकि, इसीलिए 'वेईंग  स्केल'  पर नंबर भी बढ़ते जा रहें हैं. पर आज तो इतने दिनों बाद हलके  मूड में है और  मौसम भी साथ दे रहा था. बादल छाये थे और हल्की हवा चल रही थी...मन हुआ ए.सी.बंद कर शीशे नीचे कर दे...फिर सोचा ..एक तो बाल खराब हो जाएंगे और फिर बाहर की सारी चिल्ल-पों भी अंदर आयेगी.सिग्नल पर बच्चों की भीड़  टूट पड़ेगी, सो अलग.. ना यही ठीक है. और ऍफ़.एम. का वो चैनल लगाया जहाँ सिर्फ नए गाने आते थे.....मन  ही मन कहा..'अंदर बाहर सब से वन  शुड फील यंग'....इतनी आज़ादी महसूस  हो रही थी कि मन हो रहा था...ये सफ़र ख़त्म ही ना हो..लौंग ड्राइव पर चली जाए. उलटी दिशा में जाने से ट्रैफिक भी नहीं था. गाना सुनते , कुछ गुनगुनाते स्टीयरिंग व्हील पर ही उँगलियों से ताल देते खुद में ही मगन थी कि मोबाइल बज उठा. देखा,सिम्मी का ही फोन था..पर उठाया नहीं..सामने ही कॉन्स्टेबल नज़र आ रहा  था...अगर फाइन ठोक दी तो अभी से सपनो की दुनिया से धरातल पर आ जाएगी.

पर सिम्मी के फोन ने धरातल पर ला ही दिया था...वो पहुँच गयी थी और उसका इंतज़ार कर रही थी. कार की स्पीड बढ़ा दी...कॉफी शॉप पर तो  पहुँच गयी.पर पार्किंग की झंझट .यही एक वजह है कि ऑटो से आना ही जमता है. काफी दूर जाकर ही पार्क किया और दूरी देखकर सोच में पड़ गयी. ऐसा रास्ता और उसकी हाई हील की सैंडल. कम से कम ये तो नहीं पहनती. उसने पूरी छूटी कसर निकालने की कोशिश की और अब फंस गयी. आदत भी छूट गयी थी.मन ही मन प्रार्थना की,रहम करना ईश्वर..सब संभाल लेना.

बाहर ही सिम्मी एक हैंडसम लड़के के साथ खड़ी  थी.ये रोहन इतना लम्बा कब हो गया? उसे तो गोरा,चिकना चुपड़ा चेहरा ही याद था पर फूटबाल खेल खेल  कर धूप ने अच्छा tan कर दिया था उसके स्किन को..उसपर वो rugged look . फौर्मल्स ही पहने थे.पर कमीज़ पैंट से बाहर  निकली हुई थी और शर्ट की बाहँ ऊपर तक मोड रखी थी. एक हाथ जेब में डाले लापरवाही से खड़ा था. सिम्मी ने ठीक ही कहा  था, टी.डी.एच. स्वभाव,मैनर्स की बात तो अलग...लडकियाँ तो इस रूप पर ही मर मिटें.

सिम्मी की आँखे फ़ैल गयी उसे देखते ही और होंठ गोल हो गए. शुक्र हुआ उसने सीटी नहीं बजायी. (घर मे तो बजा ही देती है.) उसने उसे आँखे दिखाईं और "हलो रोहन"...कहती आगे बढ़ गयी. रोहन बड़े अपनेपन से मिला. उनकी पुरानी जान-पहचान की लौ जैसे जल उठी. वे लोग बिल्डिंग में साथ मिलकर खेले जानेवाले दिनों की बात करने लगे. वो कई लड़कों के बारे पूछने लगी...'अभी क्या कर रहें हैं..कहाँ हैं'...सिम्मी ही थोड़ी उपेक्षित सी हो गयी थी और इसे, उस से पहले गौर किया रोहन ने..." क्या ऑर्डर किया जाए सिम्मी?" फिर खुद ही बोला..."इसकी तो फेवरेट है ब्राउनी और कोल्ड कॉफी ..आप क्या लेंगी दीदी?"

उसके दीदी कहने पर सिम्मी और वे दोनों चौंकी..पर रोहन की नज़रें मेन्यू कार्ड पर थीं...पर उसे कुछ आभास हो गया...नज़रें हटा कर उनकी तरफ देखा और समझ गया. मुस्कुरा कर बोला," दिन में बत्तीस बार तो दीदी... दीदी... सिम्मी के मुहँ से सुनता हूँ....तो मैने भी कह दिया...होप नो ऑब्जेक्शन?"

सिम्मी जैसे चिल्ला   पड़ी.."ऑब्जेक्शन??...अब तो तुम्हारे सात खून भी माफ़ होंगे,  किसी ने दीदी कहा इन्हें  और हमेशा के लिए गुडबुक्स में गोल्डेन लेटर्ज़ में नाम दर्ज. मुझसे भी ज्यादा भाव मिलेगा तुम्हे..."

"ऐसा नहीं है....प्लान करके नहीं....पर अगर अपनेआप मुहँ से निकल आए तो अच्छा लगता है... यू  कैन कॉल मी दीदी....वुड लव इट...एक्चुअली..तुम  हमेशा से छोटे भाई से ही लगते थे.."

तभी  सिम्मी ने हलके से मेज़ थपथपाई ...'हलो...ये म्युचुअल एडमायरेशन सोसाइटी से बाहर निकलो तुमलोग...मैं भी यहाँ हूँ.."

और रोहन ने इतनी प्यार भरी नज़र डाली सिम्मी पर कि उसने एक छोटी सी प्रार्थना  बोल डाली मन ही मन.."हे ईश्वर इन आँखों का प्यार यथावत कायम रखना हम्मेशा"

कॉफी के घूँट भरते  इतनी बेतकल्लुफी से बातचीत होती रही कि लगा, तीन पुराने दोस्त मिल बैठे हों. दोनों का व्यवहार बिलकुल संयत  था. ऐसे जैसे भी रहते हों..पर उसके सामने बड़े सलीके से बैठे थे. बस बीच-बीच में स्नेह से नहलाती ,रोहन की नज़रें...ठहर जातीं,सिम्मी पर और  सिम्मी सल्लज मुस्कान के साथ बाहर देखने लगती. उसने अनदेखा सा कर दिया वरना बेमतलब दोनों कॉन्शस हो उठते.

जब बिल देने की बारी आई तो रोहन ने अपने लम्बे हाथों से बिल उठा कर एकदम ऊपर कर लिया...."ना..इट्स अ मैन जॉब...नो वे..  एम नॉट गोइंग टु लेट यू  पे....सवाल  ही नहीं उठता..."

"रोहन मैं बड़ी हूँ...तुम दोनों से..."

"अरे दीदी छोडो,ना...मुझे आइसक्रीम खिला देना, नैचुरल्स में.. बस..."

"अच्छा  मुझे क्यूँ नहीं फिर..." रोहन था..

"हा हा...फिर ठीक है...तुम दोनों ही खा लेना,बाबा " उसने भी बिल छीनने की कोशिश छोड़ दी.

बाहर निकली तो सिम्मी बोल पड़ी..."आज तो ट्रेन के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे...दीदी तुम अक्सर आ जाया करो,ना...रोहन आज क्लास छोड़ो..चलो..कार की  सवारी मिल रही है..."

"ना..क्लास तो नहीं छोड़ सकता...ओके दी..मिलते हैं फिर...बाय दी..बाय सिमी.."

और वह सड़क पार कर  हाथ हिलाता चला गया. सिम्मी देर तक देखती रही  उसे. जब उसने उसके  कंधे पर हाथ रख  कहा, "चलें.." तो शर्माती हुई जल्दी जल्दी  कदम बढाने लगी. फिर बोली.."आज तो क्या लग रही हो तुम....मेरे बॉयफ्रेंड  से मिलने आई थी या अपने..."

"मैं तो अपने छोटे भाई से मिलने आई थी..."

"अहा...बड़ा छोटा भाई...बट दीदी यू आर लुकिंग सो प्रिटी..कितनी बार कहा....जरा अपनी तरफ ध्यान दो..."

"सब यही कह रहें हैं....जैसे पहले मैं कोई घसियारिन   लगती थी..." गुस्सा आ गया था,उसे. इतने बुरे तरीके से तो नहीं रहती थी.

जरा जोर से ही कार का दरवाजा खोल कर अंदर बैठी तो सिम्मी हंसने लगी.."कहाँ कहाँ से ये सारे वर्ड्स याद रखती हो..घसियारिन ..हा हा "

जब वो गुस्से में मुहँ फुलाए रही ...तो सिमी ने बिलकुल उसके ड्राइवर की  नकाल उतारी.."कबी बी गुस्से में गाड़ी नई  चलाने का...भूल गयी उस मराठी ड्राइवर का लेसन...."

वो भी हंस पड़ी..."क्या करूँ ..आर्यन तक ने यही कहा....अब जरा ढंग से रहना  पड़ेगा..."

"अच्छा दी..रोहन कैसा लगा?."....सिम्मी ने थोड़ा गंभीर होते हुए पूछा .

"डैम कूल.....क्या लुक्स हैं....क्या आवाज़..एन क्या पर्सनैलिटी...सोचा ही नहीं था वो पिद्दी सा लड़का.....इतने हैंडसम डूड में बदल  जायेगा...और उस पे इतने माइल्ड मैनर्स वाला.....स्वीट बॉय     यू  लकी रे..."

"हाँ और रोहन लकी नहीं है..." सिमी तुनक उठी थी

"है ना...डिम्पी की बहन जो मिली है उसे...' हंस पड़ी थी, वो पर फिर गंभीर हो  गयी. ,"तुम दोनों सच्ची सीरियस हो ना...क्यूंकि आगे की राह बहुत मुश्किल भरी है...मम्मी-पापा दोनों नहीं मानने वाले"

"आई  नो दी....पर क्या करें..."

"हम्म ..पर दोनों जॉब में हो...एंड एट राईट एज....तो देरी कैसी..बता दे ममी  को...टाइम लगेगा उन्हें मनाने में."

"ना दी..अभी रोहन को एम.बी.ए. कम्प्लीट करना है...फिर वो जॉब चेंज करेगा..तब जाकर सेटल होने की सोचेगा..."

"तू भी कर ले एम.बी..ए तब तक...और फुल टाइम कर...पापा तो कब से पीछे हैं....जॉब भी छोड़ दे."

"हाँ...रोहन भी कहता रहता है...पर पढना पड़ेगा, ना...' सिम्मी ने रुआंसी होकर कहा.

"हाँ वो तो पड़ेगा..." हंसी  आ गई थी उसे...आज भी एकदम छोटी बच्ची  सा जी चुराती है पढ़ाई से.

"हम्म.... तो तुमलोग रोज मिलते हो...?? "

"जाते बस साथ हैं...आने का तो कुछ फिक्स नहीं रहता ,ना...और वीकेंड्स में तो बस रोहन को सोना अच्छा लगता है...फिर मम्मी के सौ सवाल....मेरा भी उस दिन ड्रेस-आप होने का मन नहीं होता....टी.और ट्रैक पैंट में ही सारा दिन निकाल देती हूँ.....कम ही मिलते हैं वीकेंड्स पे....बस यही ऑफिस से  कभी जल्दी निकल  पाए तो..."

"हम्म...देन नो खतरा...वैसे होप यू नो, योर  लिमिट्स ....यू  नो, ना..... वाट  आइ मीन..." जरा उसे टीज़ करने की सोची.

" दीदीss...."..एकदम से धक्का दे दिया...सिम्मी ने और उसके हाथों में स्टीयरिंग डगमगा उठा. जल्दी से ब्रेक पर पैर रखा...तो पीछे से कई गाड़ियां हॉर्न बजा उठीं...

"सिम्मी मरवाएगी क्या ....वो तो स्पीड ज्यादा नहीं है....नहीं तो क्या हो जाता आज....इडियट है तू बिलकुल..."

"तो तुम क्यूँ ऐसी बातें करती हो....ड्राइविंग पे कंसंट्रेट करो, ना..."

"अरे बड़ी बहन हूँ ना..फ़र्ज़ बनता है...सही रास्ता दिखाने का."

"दुनिया को जानने   के मामले में तुम कहीं छोटी हो मुझसे...अपनी छोटी सी दुनिया में महफूज़...जरा बाहर निकालो..तो देखो कदम कदम पर क्या मुश्किलें आती हैं..."

"ओके... मैडम जी....अब आप अपने भाषण मोड में मत आइये........ अब मम्मी को क्या कहेंगे....शॉपिंग तो कुछ की नहीं...कुछ ले लें क्या...यूँ ही दिखाने को ."

"अरे चिल दी...मेरे सर पे डाल देना सब कि इसने बीस कपड़े ट्राई किए और इसे एक भी पसंद नहीं आई .और मुझे भी कुछ लेने नहीं दिया.......मम्मी मान  जाएँगी"

"तू ना रग-रग से वाकिफ हो गयी है...." हंस पड़ी वो...

"हे शsशss  दी..क्या गाना आ रहा है..." और वो साथ-साथ गुनगुनाने लगी...

"आजकल बड़े  रोमैंटिक गाने पसंद आ रहें हैं तुझे...या चैटिंग  पे कंसंट्रेट करना है?....तब से तेरी मोबाइल की टीं टीं  सुन रही हूँ "

"पूछ रहा था..."होप... दीदी इज नॉट डिसएपोयेंटेड "...मैने लिख दिया.."शी इज लट्टू ओवर यू" हा हा ठीक लिखा ,ना...ओह तुम्हारी बातों में वो स्टेंज़ा निकल गया...तुम भी ना दी..अब सुनने दो ये गाना ..मेरा फेवरेट  है"

सिम्मी ने फिर होठों पर ऊँगली रख ' शsशs ' का इशारा किया और आँखें बंद कर गाने में डूब गयी..."

वो भी चुप हो गाना सुनने लगी...उसे ये मौके नहीं मिले तो क्या..एन्जॉय करने दे उसे. ये लम्हे,ये अहसास, पता नहीं उसकी ज़िन्दगी में फिर कभी आयें या नहीं.

दिमाग अब घर की तरफ दौड़ रहा था...पता नहीं आर्यन कहीं तंग ना कर रहा हो मम्मी को. एकाध घंटे तो वे एन्जॉय करती हैं फिर थक जाती हैं. आदत भी नहीं रही. परेशान हो जाती हैं बिलकुल. इसी वजह से ज्यादा देर छोड़ती भी नहीं वो आर्यन को,उनके पास. पर आज तो मजबूरी थी. सब ठीक हो वहाँ ...वरना देखेंगी इतनी देर में उनलोगों ने कुछ खरीदा नहीं तो बुरी तरह चिडचिड़ा जायेंगी. सारे मूड का कबाड़ा हो जायेगा.
(क्रमशः )

33 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच, संवेदनाओं की इंतेहा।
अगली कडी की प्रतीक्षा रहेगी।

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत सुन्दर और बड़ी बहन पर माँ पापा सारे अरमान पूरे कर ही लेते हैं. फिर छोटे के लिए काफी छूट मिलने लगती है. इसमें बहुत बड़ा गैप तो नहीं होता लेकिन फिर भी बदल जाता है बहुत कुछ. एकदम से चित्र की तरह घूम रही है कहानी. बहुत बढ़िया चल रही है....................
इन्जार .........

रश्मि प्रभा... said...

rashmi .....jaldi jaldi aage ki batao......dilchaspi aur darr dono saath hain ....

Mukesh Kumar Sinha said...

uffffffffffff rashmi jee, itna padha, aur fir aapne " to be contd.........." ka board laga diya...:)

badhiya kahani.......puri ek baar me padhne ki ikshha thi.......lekin intzaar karna parega

waise blog pe comment karna bhi mutual admiration wala hi kaam hai , hai na........:D

shikha varshney said...

घरवालों की खातिर अपनी जिंदगी से समझौते की कशमकश बेहतरीन ढंग से दिखाई है आपने. वो चुभन जिसपर बहन के अरमान पूरे कर मरहम लगा देना चाहती है डिम्पी.
संवेदनशीलता की ओर बडती हुई कहानी.

Vivek Rastogi said...

ओह्ह क्या क्या रंग समेटे हैं आपने बहुत छोटी छोटी बातों को भी ध्यान में रखा है, पुरे डूब चुके हैं इस कहानी में अब अगले अंक की प्रतीक्षा है

kshama said...

Bachpan jaisi dilchaspi se padh rahee hun...bas sheershak padhke dar-sa lagta hai,ki,aage na jane kya hoga?

मनोज कुमार said...

@ मैने उसे दिया है
मैने उसे कह दिया है

मनोज कुमार said...

अब तक कहानी का जितना अंश पढा उस आधार पर कह सकता हूं कि कहानी कथ्य और शिल्प दोनों में बेजोड़ है। और यह भी कि कथा बुनने का आपका कौशल सधा हुआ है। आगे की बेसब्री से प्रतेक्षा है। इस जेनेरेशन के लोगों के हाव-भाव विचारधारा से परिचय हो रहा है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
राजभाषा हिन्दी पर - ये अंधेरों में लिखे हैं गीत!
मनोज पर -आंच – समीक्षा डॉ. जे. पी. तिवारी की कविता ‘तन सावित्री मन नचिकेता’

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...
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शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

रश्मि जी, कहानी का समापन कहां होना है, ये आप बेहतर जानती हैं...
लेकिन ये दूसरा भाग पढते हुए बहुत आनन्द आया...
जो लेखन पाठकों को ऐसे बांधकर रखे, उसे तो 100% नंबर मिलने ही चाहिए.

ali said...

तौबा...फिर से क्रमश: :)

...रोहन का तो ख्याल था पर...अब मनीष की भी चिंता करना पडेगी :)

निर्मला कपिला said...

bahut lambee kahaanee hai kal aatee hoon.shubha.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कहानी कि दूसरी कड़ी भी बहुत दिलचस्प ....हर छोटी छोटी बात का ध्यान रखा गया है ..बहनों के बीच वार्तालाप ....डिम्पी के जीवन से जुड़े पल ..सभी को अच्छे से व्यक्त किये हैं ...अब आगे ..

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगा यह हिस्सा भी कहानी का, दोनो बहनो का प्यार बहुत लुभाया. धन्यवाद

Sadhana Vaid said...

कथानक, चरित्र चित्रण, संवाद और कहानी का सहज प्रवाह सभी कुछ बेजोड है ! प्यार के रंग में आकण्ठ डूबी सिम्मी का उतावलापन और और उसकी व्यवहार कुशलता और डिम्पी के मन की कुंठा और छोटी बहन के प्रति उसके प्यार और समर्पण की भावना को बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आपने ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी ! जल्दी ही लेकर आइयेगा !

Ravi Shankar said...

बहुत मर्मस्पर्शी कथानक है रश्मि जी ! शुरु से आखिर तक गुजरती चली गयी कहानी आँखों के सामने से… किसी चलचित्र कि तरह्…! सम्वेदनाओं को बहुत बारीकि से उतारा है कहानी में…।

बहुत बेसब्री से प्रतीक्षा है अगले भाग की…… !

प्रवीण पाण्डेय said...

बँधकर पढ़ गये बस।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हम भी पढ रहे हैं चुपचाप बस :) ( बतर्ज़ प्रवीण जी)

सतीश पंचम said...

कथ्य और शिल्प बहुत रोचक अंदाज में चल रहा है। नौजवान पीढ़ी और उसके मनोभावों को बहुत सुंदर ढंग से दर्शाया है।

अगली कड़ी का इंतजार है।

Udan Tashtari said...

वाह..एक ओर जिम्मेदारी..कुछ छूटा जी लेने की चाह..बड़ी बहन का रोल..फिर एक लड़की होने का अहसास...बहुत कुछ बह रहा है इस लेखन नदिया में...आगे इन्तजार है.

abhi said...

ये हुई न कोई बात...एक साथ दोनों पार्ट पढ़ लिया मैंने तो :)

दोनों कहानियों में मैंने हर चीज़ों को जबरदस्त विश़ूअलाइज़ कर रहा था...लग रहा था की सब कुछ मैं देख सकता हूँ...और सिम्मी का वो एक्सप्रेसन जब वो अपनी बड़ी बहन को देखती है और उसका सिटी बजाने का दिल करता है...या फिर तब जब रोहन उसे दीदी कह के बुलाता है और फिर बिना कुछ एक्सप्रेसन दिए मेनू देखने लगता है...

कसम से...मजा आ गया...

नेक्स्ट पार्ट जल्दी लाया जाये....:) cant wait :)

abhi said...

और आपने अपना वादा क्या खूब निभाया...सच कहूँ, मैं इंतज़ार में था इस कहानी के :)

विनोद कुमार पांडेय said...

दो बहनों की आपसी रिश्ते को लेकर चलती एक बढ़िया कहानी हैं...घर में अगर २ संतान हैं तो ज़रूरी नही दोनों एक जैसे हो बड़ी बेटी ने तो माँ की डर या सम्मान जो भी कहें मान कर उनके हिसाब से जीवन की शुरुआत कर ली..पर छोटी बहन उसी रास्ते पे चली जिसपे माँ को दर था.....रश्मि जी रोचकता को साथ लिए बढ़िया कहानी जा चल रही है...अभी आधा पढ़ पाया हूँ पर खुद को रोक नही पा रहा कहानी आज के परिवेश में जो चल रही है...बेहतरीन लेखन के लिए बधाई...

रवि धवन said...

मजेदार शब्दों के साथ नब्ज पकड़ी है आपने। बीच-बीच में स्पाट शब्द तो मुस्कुराने पर मजबूर कर देते हैं। अब यही देखो।

'दिन भर खट कर आओ...और चैन की नींद भी नहीं नसीब' गुस्सा आ जाता उसे, जैसे वह सारा दिन राजगद्दी पर आराम फरमा रही हो.

गुल खिला दिए : और वो पूरे समय एक आदर्श बड़ी बहन का रोल निभाती रही और छोटी बहन ने ही गुल खिला दिए।

कहानी में जान डाल देते हैं विद्रूपता और घसियारिन जैसे शब्द।

बेहद सुंदर। सबसे खास बात लगी, डिंपी का नाम केवल दो जगहों पर है। पर कहीं भी महसूस नहीं होता बड़ी दीदी मिस हो रही है। वो तो हर जगह है।

mukti said...

कुछ बातें हैं आपके लेखन की, जो आपके सूक्ष्म विश्लेषण की क्षमता को दिखाती हैं. जैसे--
"जब अपने नेटिव प्लेस की कजिन्स को देखती तो लगता छोटे शहर में रहकर भी वे ज्यादा आज़ाद हैं."
मुझे लगता है कि महानगर में रहने वाले छोटे शहरों के लोग ज्यादा कन्ज़रवेटिव होते हैं और आपने ये बात बखूबी आब्ज़र्व की है.

" सिम्मी कहती है, तुमने उसके पहले किसी लड़के को नजर भर देखा कहाँ था, पहला लड़का देखा और दिल हार गयी."
ये बिल्कुल सही बात है. अकसर बेहद अनुशासन में पली-बढ़ी लड़कियाँ इसी कारण माँ-बाप द्वारा पसंद किये गये लड़के के लिये हाँ कर देती हैं.

जो भी आपकी कहानियों को गम्भीरता से पढ़ता है, उसी ने देखा होगा कि आप बेहद मामूली सी दिखने वाली बातों में स्त्री-विमर्श की बात सहज ही कर देती हैं--
"एक महिला सुचारू रूप से घर चला रही है, अकेले दम पर ,बच्चे की परवरिश कर रही है. शायद उनके पुरुष दर्प को यह बात आहत करती थी."

मैं भी एक साँस में दोनों कड़ियाँ पढ़ गयी हूँ. अगली कड़ी का इंतज़ार है...

एस.एम.मासूम said...

रश्मि जी एक बेहतरीन कहानी, कल वक़्त निकाल के आऊँगा और आपकी और कहानिया भी पढूंगा. बहुत दिनों बाद ऐसी कहानिया पढने को मिलीं.

अपूर्ण said...

कहानियाँ पढ़ने का शौक है| ग़ज़ल, समसामयिक चर्चा, कविता ये सब उतना आकर्षित नहीं करते| आप कहानियाँ बहुत अच्छी लिखती हैं| आपको पढता हूँ तो अपने नारी पात्रो की मनोदशा का सही चित्रण करने की कोशिश कर पाता हूँ| अक्सर आपकी कहानियों में बहनों का आपसी तालमेल, माँ -पिता का पुराना नजरिया, पुरुषप्रधान समाज का दृष्टिकोण आदि विषयों पर मर्मस्पर्शी टिप्पणी गुंथी हुई रहती है|

उपेन्द्र said...

इस कहानी का अंत कब होगा....अब तो पूरा पड़ना पड़ेगा.

स्वाति said...

अगली कडी की प्रतीक्षा रहेगी।

वन्दना said...

बडा गज़ब का रेखाचित्र खींचा है……………और कहानी ये जो बीच मे रूक जाती है न तो बहुत बुरा लगता है……………कितने मज़े से पढ रही थी और ये क्रमश: का बोर्ड बीच मे आ गया और सारा मज़ा खराब हो गया अब ना जाने कब तक इंतज़ार करना पडेगा ……………प्लीज़ जल्दी लगाना।

Shaivalika Joshi said...

Waiting for next

गिरिजेश राव said...

@ तुमने उसके पहले किसी लड़के को नजर भर देखा कहाँ था, पहला लड़का देखा और दिल हार गयी

कितनी आसानी से कह गईं आप! पूरी कहानी में नरेटिव मुम्बई के जीवन की तरह ही भागता सा लगा लेकिन लम्बाई का पता नहीं चलता। मुझे ठहराव पसन्द है। शायद इसीलिए मुम्बई मुझे पसन्द नहीं ;)
सम्वेदनायें बिखरी पड़ी हैं। ... बचपन में एक आश्रम की बगिया में भागना याद आ गया। पलाश के फूल बिखरे हुए थे चारो ओर... दूसरों को पढ़ना चाहिए। यादें जाग उठती हैं।
हाँ, एक आश्वस्ति मिली कि मैं बिल्कुल लम्बा नहीं लिखता। ठीक चल रहा हूँ।