Tuesday, October 26, 2010

चुभन, टूटते सपनो के किरचों की

अपना तकिया,अपना बिस्तर अपनी  दीवारें...और अपना खाली-खाली  सा कमरा...जिसने पूरे चौबीस साल तक उसकी हंसी-ख़ुशी-गम -आँसू सब देखे थे. उसके ग़मज़दा होने पर  कभी पुचकार कर अंक में भर लेता , कभी शिकायत करता ,इतना बेतरतीब क्यूँ रखा है तो कभी सजाने संवारने पर मुस्कुरा उठता . पिछले पांच बरस से जब-जब अपने कमरे में आती है लगता है ,जैसे शिकायत  कर रही हो दीवारें...इतने दिनों बाद सुध ली? तकिये पर सर रखते ही लगा,उसी पुरानी खुशबू ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है. पलकें मुंदने लगी थीं.

पलकों को जगाये रखने की वजहें भी आज नहीं थीं. कहीं किचन में कुछ फ्रिज में रखना ...या दही का जमान डालना तो नहीं भूल गयी ?. दरवाजे के बाहर याद से थैली टांगा ना..नहीं तो दूधवाला वहीँ डोरमैट पर दूध के पैकेट्स डाल चलता बनेगा.. सब जगह की लाईट -फैन बंद किए या नहीं. सिलसिलेवार ढंग से सब याद कर, थका शरीर नींद के आगोश में तो चला जाता है पर सुकून  की नींद कहाँ नसीब, आर्यन को रात भर चादर उढाओ, और इतने एहतियात से कि जरा करवट बदलने  की आवाज़ भी ना हो...वरना सुनील का खीझा  स्वर सुनाई देगा,'दिन भर  खट कर आओ...और चैन की नींद भी नहीं नसीब' गुस्सा आ जाता उसे ,जैसे वह सारा दिन राजगद्दी पर आराम फरमा  रही हो. फिर रात भर रेंगते  हाथों के स्पर्श की आशंका तो बनी ही रहती . आज, आर्यन तो माँ के पास सोया है. और सुनील दौरे पर हैं. अच्छा हुआ सिम्मी की जिद पर रुक गयी. दिनों बाद पुरसुकून नींद मिलेगी उसे. इन आशंकाओं से परे क्या पता मीठे सपने भी आ जाएँ. आजकल तो सपने भी यही आते कि 'दरवाजा चेक नहीं किया और कोई घुस आया घर में' ...या..' दूध फ्रिज में रखना भूल गयी  और दूध फट गया .अब आर्यन रो रहा है.....सुनील चाय के लिए आवाजें लगा रहे  है ...क्या करे'.

अंतिम बार कब देखा था , कोई खुशनुमा सपना? वो फूलों से भरी घाटियाँ, बर्फ लदी चोटियाँ या फिर चांदनी रात में दूर तक जाती ठंढी,अकेली सड़क. सुन्दर सपनो की सोच कर ही मीठी सी मुस्कान फ़ैल गयी थी चेहरे पर. सचमुच वो यह सब सोच रही है या सच में सपना ही देख रही है.पलकें भारी होने लगीं  थीं कि सिम्मी की फुसफुसाहट सुनायी दी,"दीदी...दीदी...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है"

"हम्म..." उसने आँखें नहीं खोलीं.

"दीदी..." सिम्मी ने फिर झकझोरा.

"सिम्मी प्लीज़...कल बता देना...सोने दे आज"

"ना आज.... अभी...."

"हम्म.. तेरी फिर से अनीता से अनबन हो गयी..." नींद थोड़ी थोड़ी खुलने लगी थी.

"ना ..."

"तो नया क्या होगा....वो नई सहेली...तेरा एडवांटेज ले रही है?...भाव देना बंद कर दे उसे...चल  अब सोने दे.."

"दीदी...तुम उठ कर बैठो ....और पूरी बात सुनो.."

"ओह फिर जरूर सेवेंथ  फ्लोर वाले अंकल को लिफ्ट में देख तुझे स्टेयरकेस  से जाना पड़ा"

" अब मैं नहीं डरती उनसे...अगर अब कभी बेटी बेटी कह कर कंधे पर हाथ रखा ना...तो ऐसी किक मारूंगी...कि परलोक ही सिधार जाएंगे" इतनी तेज़ आवाज़ में कहा,सिम्मी ने कि नींद पूरी तरह खुल गयी...पर आँखे खोलने का मन नहीं हो रहा था.

"तो बता ना..फिर क्या बात है..."

"तुम मुझे बताने भी दे रही हो....खुद ही अँधेरे में तीर फेंके जा रही हो "

"हम्म... गौट इट ...सब सहेलियाँ, जैसे ही  टाइम मिले  अपने बॉयफ्रेंड  से 'एस एम एस' चैटिंग में बिजी हो जाती हैं  और तू बोर होती रहती है...." अंतिम पासा फेंका..शायद यह सही हो और वह दो मिनट में उसे थोड़ा ज्ञान दे...वापस सोने चली जाए.पर आगे जो सिम्मी ने कहा..उस से तो आँखें अपनी पूरी चौड़ाई में खुल गयीं.

"नहीं...अब मैं बोर नहीं होती...क्यूंकि अब मेरा भी बॉयफ्रेंड  है..." सिम्मी  ने चहक कर कहा.

"आएँs..." उसने करवट बदल  ली उसकी तरफ...."कब हुआ ये.....कौन है.."

सिम्मी पलंग से कूद, धीरे से दबे पाँव जाकर दरवाजा सटा आई." मम्मी  तो बातें सुनती नहीं...सूंघ लेती है...उन्हें तो खुशबू आ जाती  है....बाप रे...कैसे जान लेती हैं सब..तुम कभी ऐसी माँ मत बनना...जरा भी प्रायवेसी नहीं..."

"सिम्मी, इस मेट्रो में दो दो लड़कियों को बड़ा करना मजाक है?...और वो भी तेरी जैसी  तेज तर्रार....बीस आँखें रखनी पड़ती हैं..." अब नींद को तिलांजलि दे ही दी थी उसने..."छोड़ वो सब, अब बता पूरा किस्सा..."

"बता तो दिया..." अब सिम्मी भाव खा रही थी.

"मेरी इतनी प्यारी नींद ख़राब कर बस तुझे एक लाइन में यही कहना था..." गुस्सा आ गया उसे.

"तो और क्या बोलूं..." लाली  छिटक आई थी सिम्मी के चेहरे पर...कुशन गोद में दबाये यूँ ही आगे पीछे झूल रही थी.

वो भी उठ बैठी..."कौन है ये..पहले ये बता "

"तुम उसे जानती हो.."

" नाम..."

"रोहन  "

"वो...रुमा आंटी का बेटा...??" अविश्वास हुआ था  उसे. वो कहीं से भी सिम्मी के मैच का नहीं था. सीधा-साधा. पास की बिल्डिंग में ही रहता था. बचपन में साथ खेला करता था. पर उसके साथ....सिम्मी के नहीं. सिम्मी तो तब छोटे में आती थी. उनका ग्रुप अलग हुआ करता था. रोहन कभी खेल में झगडा नहीं करता. क्रिकेट में कई बार आउट ना होने पर भी दूसरे को बैटिंग दे देता. झगडा सुलझाने को झूठ-मूठ को सॉरी भी बोल दिया करता. वह उसके स्वभाव को हमेशा  उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से जोड़ती. रुमा आंटी डिवोरसी थीं. अकेले दम पर बड़ा किया उन्होंने रोहन को. उनकी कोई नौकरी भी नहीं थी. बस फ़्लैट अपना था. पर वो ट्यूशन लेतीं, क्रेच चलातीं, ग्रीटिंग्स कार्ड बनातीं, गिफ्ट बॉक्स भी बनातीं...और अचार ,चटनी, चकली भी. कभी दुकान पर बेचने भी नहीं गयीं,ना रोहन को इन्वॉल्व किया . आस-पास की औरतें ही खरीद लेतीं ये  सब और ऑर्डर भी दिया करतीं. माँ भी हमेशा उनसे ही अचार-चटनी लिया करती. उनकी तारीफ़ करते नहीं थकती. तारीफ़ तो वो रोहन की भी कम नहीं करतीं. बचपन में बर्थडे पार्टी में रोहन आया करता, पर हमेशा हेल्प करने को तत्पर. बाकी बच्चे शोर मचाते रहते यहाँ तक कि  वो भी सहेलियों से गप्पों में मशगूल रहती. माँ के दस बार बुलाने पर भी अनसुना कर देती और वहीँ रोहन...माँ के हाथों से ट्रे थाम लेता. प्लेटे लगाता ...इधर उधर गिरे ग्लास भी इकट्ठा कर डस्टबिन में डाल आता.

पार्टी के बाद भी माँ उसे रोहन का उदाहरण देतीं पर उसे कभी रोहन से इर्ष्या नहीं हुई या गुस्सा नहीं आया.वो था ही इतना शांत और हंसमुख कि उस से लड़ने का ख्याल भी नहीं आता. उस से दो क्लास नीचे था. यहाँ  दीदी कहने का रिवाज़ नहीं था पर उसपर हमेशा एक छोटे भाई जैसा प्यार ही आता,उसे. पर सिम्मी ये क्या कह रही है...ये सब बातें अपनी जगह हैं...और रिश्ते बनाना अपनी जगह ... रोहन का नाम सुनते ही एक सेकेण्ड में सारी बातें दिमाग में घूम गयीं.
भगवान करे ये बस सिम्मी का  पासिंग फेज़ ही हो और रोहन तो कहीं सिम्मी के डैशिंग इमेज  वाले खांचे में फिट भी नहीं बैठता. पूछ ही लिया.

"रोहन इज  नॉट योर  टाइप ऑफ गाइ....हाउ डिड यू  टु मीट"

"व्हाट डू यू मीन...नॉट माई टाइप...क्या है मेरा टाइप ?" सिम्मी तुनक उठी थी.

"अरे ...वो बस मूवी,पार्टी, डिस्को..बाइक-रेसिंग....तुझे तो यही सब पसंद हैं,ना...."

"दीदी मैं सोलह साल वाली सिम्मी  नहीं हूँ...ही इज सो...मैच्योर.. केयरिंग एन स्वीट टू....आजकल के लड़कों जैसा एटीच्यूड्स वाला नहीं है.."

"अरे,वाह ...बहुत पता है तुझे, आजकल के लड़कों की.."

"होगा क्यूँ नहीं....तुम्हारी तरह कॉलेज के बाद गृहस्थी बसा ली क्या...दीदी, सच यू डोंट नो ...वाट यू मिस्ड..."

"अब तू अपना पुराण मत शुरू कर....अभी बात तेरी हो रही है..." बीच में ही बात काट दी उसने..वो हमेशा डरती है...कब सिम्मी ये किस्सा  छेड़ बैठे. सिम्मी ने कभी उसका इतनी जल्दी शादी के बंधन में बंध जाना स्वीकार नहीं किया. हमेशा उसे दो बातें सुना जाती है. पर आज तो सिम्मी की बातें सुननी थीं..."अरे बता तो सही....दोस्ती कैसे हुई रोहन से..."

"हाँ ,पहले दोस्ती ही हुई....ऑफिस जाने की हमारी टाइमिंग एक ही थी.हम दोनों ही गेट के सामने वाली बस स्टॉप के क्यू में खड़े होते. पर अपने अपने कानों में हेडफोन लगाए. मुझे याद है...रोहन तुमलोगों के साथ खेलने बिल्डिंग में आया करता था...पर तब तुमलोग मुझे 'कच्चा लिम्बू'  कह के साथ नहीं खिलाते और जब मैं बड़ी हो गयी तो रोहन फूटबाल  खेलने दूसरे ग्राउंड पर जाने लगा . बस मैं जानती थी कि वो रुमा आंटी का लड़का है और वो जानता था,मैं डिम्पी की बहन हूँ....ना वो कुछ बात करता...ना मैं. फिर एक दिन बस नहीं आ रही थी मैं भी परेशान थी....उसने एक ऑटो रोका और मुझसे पूछा और फिर हम दोनों साथ गए, ऑटो में. उसके बाद रोज ही हमलोग  ऑटो शेयर करने लगे, स्टेशन तक. मुझे थोड़ा एक्स्ट्रा टाइम भी मिलने लगा. वो ऑटो  लेकर मेरी गेट तक आता. बस वहीँ से बात चीत  शुरू हुई....फिर कभी कभी  शाम को भी साथ आने लगे...एंड देन कॉफी. एन मूवी....एन यू नो ना...."

आगे बताने से सिम्मी हिचकिचा रही थी...बड़ी बहन कितनी भी सहेली जैसी हो...पर बड़ी बहन ही होती है और वो तो उस से पांच साल बड़ी थी...उसने भी गंभीरता से कहा.."या कैन गेस...बट रियली आर यू गाईज़ सीरियस?"

"डोंट नो..." सिम्मी ने कंधे उचका दिए तो उसे गुस्सा आ गया..."ओह! तो ये तेरा टी.पी. है "

"नहीं दी...वी आर रियली सीरियस...नहीं तो तुम्हे नहीं बताती...एक साल हो गया हमें मिले...बट कमिट हाल में किया है"

"सिम्मी...तुझे सब पता है,ना..रोहन के बारे में...पापा कभी मानेंगे ?

"तुमसे ज्यादा पता है...तुमसे क्या ..किसी से भी ज्यादा पता है...और पापा से मैं नहीं डरती...वे मेरी ज़िन्दगी का फैसला नहीं करेंगे .."

"इतना आसान नहीं हैं...पर वो तो बाद की बात है...पहले तुमलोग तो गंभीर हो जाओ एक दूसरे के प्रति...वन इयर इज टू शॉर्ट,अ पीरियड टु नो एनीवन.....गिव  सम मोर टाइम टु योर रिलेशनशिप ...पर सिम्मी प्लीज़ इसे टाइम पास की तरह मत लेना...सब सोच-समझ कर...कमिटेड हो तभी आगे बढ़ना...उस बेचारे ने बहुत दुख देखे हैं,बचपन से...उसे हर्ट मत करना "

"यू नो दी..रोहन को नफरत है...इस बेचारे शब्द से....उसे बहुत गुस्सा आता है कि लोग उसे बेचारागी की नज़र से क्यूँ देखते हैं...बता रहा था एक दिन...उसने तो कुछ भी अलग महसूस नहीं किया...सब बच्चों की तरह ही स्कूल जाता,खेलता...बर्थडे पार्टी में जाता...फ्रेंड्स को अपने घर बुलाता...और फिर यहाँ कितनो के डैडी इन्वोल्व रहते हैं,बेटे की ज़िन्दगी में. शिप पर काम करने वाले, आठ महीने नहीं रहते घर पर...क्या अलग  है उसका घर उनलोगों  से? फिर भी लोग सिम्पैथी दिखाते हैं....हाँ वो अपनी माँ को लेकर वरीड रहता है..तुम्हे पता है...उसने कितनी कोशिश की है, अपने ममी-पापा को नज़दीक लाने की..."

"अच्छा...उसका अपने डैडी से कम्युनिकेशन है??...उनके बारे में तो कितने रयूमर्स  थे कि वे गल्फ में हैं या शायद स्टेट्स में...कभी फोन नहीं करते...कोई पैसा नहीं भेजते.."

"हाँ फोन नहीं करते..पैसे नहीं  भेजते....पर इसी शहर  में रहते हैं...अपनी बहन के पास...ये फ़्लैट उसकी ममी के नाम करके अपने कर्त्तव्य  की इतिश्री समझ ली...रोहन तो बहुत छोटा था...उसे पता  भी नहीं कि क्या प्रोबलम थी ममी-पापा के बीच....पर जब उसके बोर्ड का रिजल्ट आया तो उसके डैडी ने फोन किया था...और उसे लंच के लिए ले गए थे....रोहन के मन में कटुता नहीं है,अपने डैडी  को लेकर...और इसका श्रेय वो अपनी ममी को देता है...उसके बाद से ही उसने कोशिश शुरू कर दी...घर पर गणपति की पूजा भी रखी  और इसी बहाने अपने डैडी को जबरदस्ती घर आने पर मजबूर किया...उसने बहुत कोशिश की, दी..ममी से डैडी के बर्थडे पर विश करवाया...डैडी को ममी के बर्थडे पर फोन करने को कहा...लेकिन पता नहीं...उसकी बुआ ने क्या कान भर रखे हैं...आखिर उसके डैडी, सारे पैसे अपनी बहन  के बच्चों पर ही तो खर्च करते हैं...पर यह बात उसके डैडी को समझ नहीं आती...रोहन जितना कहता उसके ममी-डैडी उसका मन रखने को कर लेते..बट एक्चुअली दे आर ड्रीफटेड अपार्ट ...एक दो साल के बाद रोहन ने भी कोशिश छोड़ दी...एंड यू नो दी...नाउ हिज़ डैडी वांट्स टू रिटर्न....अब खुद अपने मन से अक्सर फोन करते हैं..."

"हाँ..क्यूँ नहीं...अब बुढापे में सेवा जो करवानी होगी...अब कौन पूछेगा,उन्हें बहन के यहाँ..." उसका मन तिक्त हो आया था...इसी शहर में रहकर एक बार सुध नहीं ली ,अपने बीवी बच्चे  की. रुमा आंटी की मेहनत देखी है उसने...सुबह पांच बजे से रात के बारह बजे तक वो खटती रहतीं...रोहन की देखभाल के लिए नौकरी भी नहीं की उन्होंने और घर से ही सब सम्भाला.

"एग्जैक्टली दी..यही बात है...पर रोहन कहता है...आखिर फादर हैं...उनकी देखभाल तो उसी  की जिम्मेवारी है....बुआ मुहँ फेर लेंगी,तो वे कहाँ जाएंगे....पर कहता है,अपनी ममी को मजबूर नहीं करेगा...उनकी सेवा के लिए..."

"ही  रियली इज अ नाइस गाइ...तू आजकल बड़ी समझदारहो गयी है.. फिर हंस कर जोड़ा..."पर तेरे मुहँ से इतनी समझदारी की बातें...शोभा नहीं देतीं..तू तो लड़ती-झगड़ती ही अच्छी लगती है...अच्छा चेंज लाया है..इस रोहन की कंपनी ने ...अब कैसा दिखता है...मैने  तो कब लास्ट देखा था उसे...याद भी  नहीं.."

"तुम्हारी दुनिया...बस जीजू..और आर्यन हो गए हैं....उनके आगे-पीछे घूमना...और बस उनकी ही बातें करना...तुम्हे बाकी दुनिया से कोई मतलब भी है??" विद्रूपता से कहा, सिम्मी ने.

"सिम्मी...तू फिर शुरू हो गयी...बात रोहन की हो रही है...बता ना..कैसा दिखाता है अब..

"एकदम 'टी.डी.एच'...." सिम्मी मुस्कुरा रही थी.

"ओए.. होए.. 'टी.डी.एच'.....तो वो गोरा-चिट्टा लड़का...अब काला हो गया..."

"ना..फेयर तो अब भी है...लो..थिंक ऑफ द डेविल  एन डेविल इज हियर...आज तो घर आने में उसे ज्यादा ही देर हो गयी है.." .सिम्मी के मोबाइल का मेसेज टोन बज उठा था.

"इस वक़्त घर आता है वो...??"

"हाँ...जॉब के साथ...पार्ट टाइम एम.बी.ए. कर रहा है..लेट नाईट क्लास होती हैं....पर मुझे गुडनाईट कहे बिना नहीं सोता..." सिम्मी मुस्कुराते हुए ...मेसेज टाइप करने में लगी थी.

"हाँ...नींद कैसे आएगी,उसे ...चल अब तू अपनी 'एस.एम.एस' चैटिंग कर...मैं चली  सोने..."

सिम्मी  ने भी मुस्कुराते हुए तकिया खींच दूसरी तरफ करवट बदल ली थी.

सिम्मी का राज़ सुन जाने कैसी अनजानी ख़ुशी भर गयी थी मन में. चेहरे से मुस्कान मिट नहीं रही थी. दिल की धड़कने बढ़ गयी थीं...'माई लिल सिस इज इन लव'...इतनी बड़ी हो गयी है, छुटकी. अब. उसपर एक बड़ी जिम्मेवारी आ गयी है. सिम्मी की खुशियाँ अब उस पर निर्भर  हैं...मम्मी -पापा को उसे ही मनाना होगा...फिर सर झटक दिया...एक मन कहता,अभी दोनों को शादी का फैसला तो करने दे...फिर दूसरा मन कहता, जब कमिट कर लिया है तो अगला कदम शादी ही तो होगा...पता नहीं क्या क्या सोच रही थी कि सिम्मी ने मोबाइल हेडबोर्ड  पर रखा...और 'गुडनाईट दी'..कहती सिमट कर सो गयी.

उसने करवट बदल ,उसके चेहरे पर भरपूर नज़र डाली. सिम्मी का चहरा दमक रहा था और एक शांतिपूर्ण  स्मित  थी होठों  पर. उसके चेहरे की दमक और होठों की स्मित कायम रखना अब उसकी जिम्मेवारी है.सिम्मी तो सो गयी...पर वो ना जाने कब तक इन्ही सपनो में डूबती उतराती,जागती रही.

(क्रमशः )

34 comments:

Udan Tashtari said...

बड़ी लम्बी कहानी है...आराम से पढ़ रहा हूँ. :)

shikha varshney said...

अच्छी खुशगवार सी रही पहली किश्त ,चुहल करती गुदगुदाती सी.आगे देखते हैं क्या होता है अब.

बी एस पाबला said...

लौट कर आते हैं, फिर होगी टिप्पणी :-)

kshama said...

Ek hee saans me padh gayi...aage kee bahut jigyasa hai!

रश्मि प्रभा... said...

simmi per to pure pyaar ka nasha hai... sar chadhker bol raha hai , bas ye geet yaad aaya
chalo n gori machal machal ke , abhi to balapan hai......

Ravi Shankar said...

bahut achchha aur rochak maloom padta hai kathanak ! bahut utsuk hoon aage ki kisht ke liye...

प्रवीण पाण्डेय said...

मेट्रो की जिन्दगानी,
दुख जाती है, किन्तु सुहानी।

सतीश पंचम said...

कई तरह के नेरेशन देते हुए कहानी का आगे बढ़ते जाना एक तरह से कहानी को कुछ अलग ही मायने प्रदान करता है।

शहरी मनोवृति, पारिवारिक टूट, विसंगतियों के बीच खिंचती कशिश को सुंदर ढंग से बयां करती कहानी।

Udan Tashtari said...

सिम्मी तो बता कर सो गई और हम जागे हैं आगे का किस्सा सुनने कि सिम्मी के घर वाले माने कि नहीं..रोहन के पिता जी लौटे के नहीं..बड़ी चिन्ता सी लग है अब....:)

जारी रहिये. बढ़िया प्रवाह है.

राज भाटिय़ा said...

आधी पढ ली हे, बहुत रोचक लगी, शेष पढने से पहले टिपण्णी दे दुं, कही भुल ना जाऊं

इस्मत ज़ैदी said...

बहुत मज़ा आ रहा था पर क्रमश: ने सारे मज़े पर पानी फेर दिया
जल्दी भेजिये पूरी कहानी

वाणी गीत said...

प्यारी सी कहानी लग रही है ...
रोहन को बेचारा कहलाना अच्छा नहीं लगता ...अच्छा लगता है जब मांगने वालों (भिखारी नहीं , और भी कई तरीके हैं , सहानुभूति मांगने के ) के इस दौर में रोहन जैसे व्यक्तित्व से मिलना जो सिर्फ देना जानता है ...
सिम्मी की कहानी कहाँ तक आगे बढ़ी ...रूमाजी के लिए दिल में बहुत सारा सम्मान इकठ्ठा हो गया है ..

और ये दीदी तो पूरी फ़िल्मी है , बहना की प्रेमकथा सुनकर भी मजे से सो गयी ...:)

दीपक 'मशाल' said...

नहीं पढूंगा.. नहीं पढूंगा.. नहीं पढूंगा.. पूरी होने से पहले नहीं पढूंगा.. क्या करुँ दी मजबूरी है.. अगले महीने भारत आना है तो काम भी सिमेटना है ना.. :(
प्लीज समझा करो मेरी अच्छी दी..

ali said...

कथा और चरित्रों के बारे में धारणा बनाने से पहले ही दो बार ब्रेक लगे ! एक कथा का 'शीर्षक' और दूसरा 'क्रमश:' ! अब क्या करूं ? क्या आप कथा अगली किश्त में पूरी कर रही है :)

इस एपिसोड के मजे ले चुका हूं आगे पढूं तो बयान करूं !

वन्दना said...

कथानक अच्छा चल रहा है……………आगे का इंतज़ार है।

मनोज कुमार said...

इतने पर कोई टिप्पणी करना बनता नहीं। इतना ही कहूंगा कि शुरु से अंत तक रोचकता बनी रही, संवाद अदएगी में भी। शहरी और आधुनिक ज़िन्दगी का सजीव चित्रण उभर कर आया। आगे देखना है यह मेट्रो वाली मनसिकता है, या गांवों वाली या फिर हमारी पारंपरिक....। इंतज़ार है अगली कड़ी का। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
राजभाषा हिन्दी पर - कविताओं में प्रतीक शब्दों में नए सूक्ष्म अर्थ भरता है!
मनोज पर देसिल बयना - जाके बलम विदेसी वाके सिंगार कैसी ?

Arvind Mishra said...

दही का जमान
जामन न ?

Rakesh Jain said...

पहला पार्ट तो काफी इंट्रेस्टिंग लगा..दूसरे का इन्तजार है...

नीरज गोस्वामी said...

पहली किश्त...बेहद रोचक...अगली का इन्तेज़ार...

rashmi ravija said...

@दीपक,
अरे किसने जोर डाला कि अभी ही पढ़ डालो....मैने तो बताया भी नहीं ना मेल ही भेजा :)
हाँ तुमसे और 'अभी' से वादा जरूर किया था इस कहानी का....सो हमने तो वादा, निभाया ...तुम आराम से पढो...भारत से लौटने के बाद....कोई जल्दी नहीं..:)

और हाँ..'अच्छी दी', कहने का शुक्रिया....कभी कभी कितना सच बोल जाते हो ना..हा हा

rashmi ravija said...

@अली जी,
सच कहा...दो दिन शीर्षक के चक्कर में पोस्ट करना टालती रही....
पर फिर सोचा..जाने दो....असमंजस की स्थिति बनी रहेगी..

rashmi ravija said...

@अरविन्द जी,
आपको इतना परफेक्ट कैसे पता??
'जामन ' डालने की जिम्मेवारी कहीं आपकी तो नहीं :)
.या कभी कोई लड़की/ महिला कटोरी लेकर आपसे जामन मांगने तो नहीं आ गयी (अमिताभ बच्चन से इलाहबाद में एक बार छत पे एक लड़की जामन मांगने आ गयी थी और देखिए कितनी शिद्दत से याद रखा, उन्होंने कि अपने संस्मरण में लिख डाला ) ...आप भी याददाश्त पर जोर डालिए.:)

जयकृष्ण राय तुषार said...

behtaren post badhai rashmi ji

जयकृष्ण राय तुषार said...

very nice post thanks with regards

Sadhana Vaid said...

कथानक और दोनों बहनों का संवाद बहुत रोचक है ! अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा ! बहुत प्रतीक्षा मत करवाइयेगा !

रेखा श्रीवास्तव said...

कहानी बहुत अच्छी जा रही है, आगे का इन्तजार.

Mired Mirage said...

बहुत रोचक कहानी है।
घुघूती बासूती

कविता रावत said...

Aapsi kareebi rishton kee kashmkash bhari uljhano ko pradarshit karti marmsparshi rachne ke liye aabhar...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

रोचक...
बांधकर रखा है...
क्रमश???
ठीक है, करते हैं इंतज़ार.

ZEAL said...

Interesting story . Waiting for the next part.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रोचक कहानी ...बहुत से घरों की कहानी को समेटती है ...अच्छा प्रवाह है ..आगे का इंतज़ार है

Vivek Rastogi said...

वाह क्या बात है, कहानी में मजा आ रहा है

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बढिया कहानी. दोनों बहनों ई बातचीत, छोटी बहन का अपनी दीदी पर भरोसा, और दीदी का छोटी बहन के सपने पूरे होने की खुशी में खुद को हर्षित पाना, सब कुछ बहुत स्वाभाविक है रश्मि.
अगली किस्त का इन्तज़ार कर रही हूं.... अरे!! पोस्ट हो गई है अगली किस्त .

madansharma said...

अरे बाप रे बाप! इतनी लम्बी कहानी वो भी अधूरी!!
रोचक तो लगी किन्तु अधूरी सी!! नामुराद सारा मजा किरकिरा हो गया!
हमारी शुभकामनाये आपके साथ है,