Tuesday, September 21, 2010

पराग, तुम भी...

शीना ने माथे पर हाथ लगा कर देखा..."बुखार तो नहीं है...फिर क्या हुआ"
"पता नहीं यार....नॉट फिलिंग वेल.....हैविंग सिव्हियर हेडेक ....आज ऑफिस नहीं जाउंगी "

"ओह!!..चलो कोई नहीं..तुम आराम करो..." और शीना तौलिया ले बाथरूम में चली गयी.

बाथरूम से निकल कर हमेशा की तरह हड बडाती हुई शीना ने अपना कबर्ड खोला..एक कपड़े  निकाले ,दस गिराए...फिर उन्हें उठा कर यूँ  ही ठूंस दिया.

छोटे से शीशे के पास आकर गीले बालों को जोर जोर से झटकती भी जाती और बुदबुदाती भी जाती..."एक ड्रेसिंग टेबल नहीं रख  सकती...कितनी कंजूस है ये ओल्ड वूमन ..गर्ल्स क्या इत्ते से शीशे में तैयार हो   सकती हैं.......पैसे तो  इतने ऐंठ लेती है....पर सुविधा देखो...सुबह रोज वही टोस्ट या पोहा...अरे आलू पराठे नहीं दे सकती...रात में बस  सूखी चपाती और बेस्वाद सब्जी......मैं तो यहाँ नहीं रह सकती...तन्वी  सोच ले...कोई दूसरी जगह ढूंढनी होगी."

रोज वह खुद ही तैयार  होने में लगी होती हैं..इन दृश्यों से वंचित रह जाती है...बस खटाक, खटाक....कबर्ड..और ड्रौर का खुलना बंद करना ही सुनती रहती है. उसे हंसी आ गयी....मुस्कराहट छुपाने को चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया. ऐसे ही चीज़ें इधर उधर  फेंकती शीना ने टेबल पर पड़ा नाश्ता छुआ भी नहीं और उसे हिदायत देती हुई.,जाने लगी...."ज्यादा तबियत खराब लगे तो मुझे फोन कर देना...दवाई जरूर ले लेना..."और दरवाजे पास एक पल को ठिठकी..."क्या मजे से सो रही है... आई  एन्वी यू यार....अपनी किस्मत में तो धक्के खाने ही लिखे हैं...चल,यू टेक केयर....."बोलती दरवाजे से निकल  कर भागी.

शीना के जाते ही उसने चादर फेंकी और उठ खड़ी हुई...ओह! कितने काम निबटाने हैं...और उस पे शीना ने कितना गन्दा कर के रखा है,कमरा...शीना से झूठ  बोलने का गिल्ट  भी हो रहा था....शीना उसे एक-एक बात बताती है...'आज अजय ने फ़ाइल पकडाते हुए...जानबूझकर उँगलियाँ टकरायीं,तो मैने  भी वापस  गुस्से में ,जरा जोर से ही  टकरा दीं तो चौंक कर देखने लगा...अब कभी हिम्मत नहीं करेगा...ऐसी हरकत की.....सोच क्या रखा है..बीसवीं सदी में हैं क्या हमलोग...कि उँगलियाँ टकराते ही झन... झन तार बजने लगेंगे...हा हा "

या फिर.."अब तो पक्का यकीन हो गया मेरा बॉस 'गे' है...आज भी मेरी तरफ नहीं देखा,उसने"..और एक वो है उसने हवा भी नहीं लगने दी कि आज पराग यहाँ आ रहा है..इसलिए उसने छुट्टी ली है ना कि कोई सरदर्द है...पर शीना फिर सवाल पूछ पूछ कर उसका सच्ची में सरदर्द करवा देती. बाद में सब विस्तार से बता देगी.

फुर्ती से पहले  शीना के ही बिखरे समान सही जगह पर रखने  लगी.

'पराग' को जब स्टेशन से सीधा रूम  पर ही आने को कहा तो वह भी चौंक गया, था ..."आर यू श्योर....लैंड लेडी ऑब्जेक्शन  तो नहीं करेगी...फिर तुम्हारा ऑफिस...सोच लो..."

"हाँ बाबा.....विल मैनेज  ऑल..तुम आओ तो.."

"देखो, फिर पलट मत जाना..." पराग ने शरारत से जोड़ा

"इडियट...ज्यादा उड़ने की कोशिश मत करो...चलो, सी यू देन"

"लव यू  स्वीटहार्ट  ..." ये एक नया सीखा है पराग  ने...उसे जरा अच्छा नहीं लगता,जैसे फिफ्टीज़   में हो. और पराग को ये बात पता है..इसीलिए उसे चिढाने को हर बार, बाय  की जगह यही कहता है  ..और उसने फोन काट दिया था.

बाहर कैफे,रेस्टोरेंट  में मिल कर थक  गयी थी...एक कप कॉफी यहाँ...सैंडविच  दूसरी जगह..तो डोसा तीसरी जगह . और पराग की ट्रेन दोपहर को आ रही थी,उसे पता था,वह अपने रूम पर जाकर एक बार सोएगा  तो फिर दूसरे दिन ही उठेगा...चाहे वो शाम को हज़ार रिंग करके थक जाए.यही सब सोच हिम्मत कर अपने रूम पर ही बुला लिया. वैसे तो लैंड लेडी ने पहले ही शर्त रख दी थी,' नो बोयज़', 'नो पार्टीज़' , 'नो लेट नाईट' और सर झुका आदर्श कन्या की तरह वे और शीना सब मान गयी थीं. अब तक निभाया भी था, पर आज रिस्क ले लिए उसने...देखती है...अगर लैंड लेडी की नज़र पड़  गयी तो बना देगी कोई बहाना....बैग भी तो होगा पराग के पास...कह देगी उसके शहर से कोई आया है.

पराग और वे साथ थे कॉलेज में...वैसे तो सारे समय लड़ते-झगड़ते ही रहते पर सब उन्हें  बेस्ट फ्रेंड ही मानते थे. क्यूंकि एक के बिना दूसरे का काम नहीं चलता था. नोट्स तैयार करने हों.लाइब्रेरी  से बुक लानी हो...क्लास बंक करके  मूवी देखनी हो या कैंटीन में गप्पे लड़ानी हों.....किसी दूसरे फ्रेंड को बर्थडे सरप्राइज़ देना हो..सबकुछ साथ में होता था. वैसे  तो पांच लोगों का ग्रुप था...पर वे दोनों ही हर जगह साथ जाते थे, अगर पराग नहीं आ पाया तो वो भी कोई बहाना बना देती और वो नहीं जा पायी तो पता नहीं कुछ ऐसे संयोग जुटते कि पराग भी नहीं जा पाता. फिर भी प्यार जैसा कोई अहसास नहीं जन्मा था. कभी उनकी तुर्की ब तुर्की बहस  से परेशान हो बाकी फ्रेंड्स कह देते... "यार...तुमलोग शादी कर लो...लड़ने का कोटा पहले ही ख़तम कर चुके हो...बाद में बस प्यार ही प्यार होगा".
और पराग कहता," शादी और इस स्नौबिश  से..सीधा एकाध क़त्ल करवा दो यार मेरे हाथों कि उस से पहले फांसी पर चढ़ जाऊं"

और वो कहती.."और वो कहती.."हलो......कौन सी लड़की करेगी तुम जैसे से शादी....पागल हो जाएगी..पागलखाने में मिलने  में जाना होगा उस से मिलने और बेचारी किसी को पहचान भी नहीं पाएगी..."
और इतने जोर के ठहाके लगते कि मैनेजर , टेढ़ी भृकुटी कर उन्हें गुस्से से  देख लेता. उनका ग्रुप था ही इतना शोर  शराबे वाला कि कुछ पढ़ाकू किस्म के लोग उसके ग्रुप को आता देख ही कैंटीन छोड़ चले जाते या फिर अंदर ही नहीं आते. रोज कैंटीन वालों  का चार,पांच कप चाय और कुछ समोसे पेस्ट्री का नुक्सान तो हो ही जाता.

पर जब फाइनल ईयर  के एग्जाम ख़त्म हो गए तो जैसे वास्तविकता सामने आई कि अब नहीं मिल पायेंगे  दोनों. एग्जाम की तैयारियों ने वैसे ही हंसी मजाक को अलविदा कह  रखा था,और अब कॉलेज छूटने  के गम ने उन्हें और संजीदा बना दिया था.
एक दिन लाइब्रेरी की सीढियों पर बैठे दूसरे दोस्तों का इंतज़ार करते,पराग ने कह ही दिया..."तुम्हारी आदत सी पड़  गयी है......तुमसे झगडे बिना कैसे कटेंगे  दिन..."

उसके दिल की धड़कन कई गुणा बढ़ गयी थी...किसी तरह साधते हुए कहा..."मिल जाएगी...कोई और इसी तरह झगड़ने वाली"

"ना यार....प्यार तो किसी से भी हो भी जाए...झगडा तो सिर्फ तुमसे ही  हो सकता है"...मुस्कुरा दिया था,पराग

और उसकी ठंढी सांस निकल आई .... एक पल में क्या क्या सोच लिया था...ये तो किसी और से  प्यार  की बात कर रहा है और जैसे पराग ने उसकी निराशा भांप ली.एकदम से उसका हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर बोला..." गोइंग टु मिस यू अलॉट....एक्चुअली कभी सोचा नहीं था....कि तुमसे दूर जाने की कल्पना भी इतनी भयावह होगी...नींद उड़ गयी है, यार... रातों की"

अभी भी वह श्योर नहीं थी कि पराग के मन में क्या है, हाथों में हाथ तो दोस्ती का जेस्चर भी हो सकता है. कुछ बोली नहीं तो पराग ने ही बड़ी असहजता से रुक रुक कर नीचे देखते हुए कहा..."आयम  सो कन्फ्यूज्ड .... कुछ समझ नहीं आ  रहा...सीम्स आयम फालिंग फॉर यू. "

ऐसे मौके पर कैंची  की तरह चलने वाई जुबान पता नहीं कैसे चिपक जाती है तालू से. अब भी कुछ बोल नहीं पायी बस पैर के अंगूठे से जमीन पर वृत्त बनाती  रही.

पराग ने मुस्कुरा कर सीधा  उसकी आँखों में  देखते हुए बोला, " व्हाट डू यू से......वी शुड गिव इट अ थॉट ?"

अब उसे यकीन हो गया, वो जो सोच रही है ,पराग वही कह रहा है, वह भी थोड़ी सहज हो आई...उसने भी उसे टीज़ करने की  सोची, "लेकिन कहते हैं , प्यार तो बिना सोचे-समझे होता है..."

और पराग ने एकदम से कह दिया "तो हो गया ना बिना सोचे-समझे...कभी सोचा था क्या...कि प्यार और तुमसे...नोss ..नेवर......पर देखो..हो गया..वैसे आयम नॉट  श्योर अबाउट यू..." और उसके हाथों की  पकड़ थोड़ी सी ढीली पड़ गयी.

उसने एक नज़र ,पराग को देखा...उसकी आँखें पनीली हो आई थीं और पराग को कुछ और समझने कि जरूरत नहीं पड़ी. जो भी लिखा था,आँखों में पराग ने आसानी से पढ़ लिया. उसके हाथो की  पकड़ फिर से कस गयी थी और वह दूसरी तरफ देखने लगा फिर तुरंत ही उसका हाथ खींचते हुए उठ खड़ा हुआ..."लेट्स मूव..अभी सब आ जाएंगे...मुझे किसी और से बातें करने का बिलकुल भी मूड  नहीं...कहीं और चलते हैं"

फिर तो एक हफ्ता जैसे जेट रफ़्तार से भी तेज़ निकल  गया. ज्यादा से ज्यादा वे दोस्तों से बचते रहें. पहली बार महसूस हुआ कि मौन भी मुखर हो सकता है. कई बार पार्क की बेंच पर बैठे बस एक दूसरे के अस्तित्व को ही जिया. बिना एक शब्द  भी बोले.
 दोस्त कुछ समझ  रहें थे...कुछ नहीं..पर उनलोगों ने भी ज्यादा से ज्यादा उन्हें अकेला छोड़ दिया. जाने के दो दिन पहले से ही हॉस्टल में सबकी आँखे गीली  रहतीं. पराग को देख कर मुस्कुराने की कोशिश करती तो वे और भीग जातीं.और पराग उसे कंधे से घेर कर चलता तो जाने कैसी सुरक्षा का अहसास होता. स्टेशन पर दोस्तों के हुजूम के बीच खड़े पराग और रफ़्तार पकडती ट्रेन के बीच का फासला, जैसे जैसे बढ़ता जा रहा  था, उसका दिल तेजी  से डूबता जा रहा था....क्या फिर हो सकेगा सब कुछ पहले जैसा...कभी लौटेंगे वो बेफिक्री भरे दिन.

कैम्पस सेलेक्शन तो हो चुका था, बस इंतज़ार था, अपोयेंटमेंट  लेटर का. रोज भगवान को हाथ जोड़ती, हे भगवान एक ही शहर में हो,पोस्टिंग हो जाए दोनों की.
पर रिसेशन भी इसी साल आना था, महीने पर महीने निकलते जा रहें थे और कंपनी से कोई खबर नहीं  आ रही थी. पराग की फ्रस्ट्रेशन बढती जा रही थी. घर वाले आस-पास होते,ज्यादा बात भी नहीं हो पाती. वह समझाने की कोशिश करती..मेरा भी तो नहीं आ रहा. तो पराग झट से कह देता," तुम तो लड़की हो...हम लड़कों की पीड़ा नहीं समझोगी...बेरोजगारी शब्द का क्या मतलब  होता है...सिर्फ हम लड़के ही महसूस कर सकते हैं " घर में रिश्तेदार ,शादी की बात उठाने लगे थे पर उसने ममी-पापा से साफ़ कह दिया था कि दो साल नौकरी के बाद ही वो सोचेगी....और उन्होंने मान  ली थी उसकी बात.

पर नौकरी  मिले तो सही और जब अपोयेंटमेंट लेटर आया भी तो पहले उसका ही आया. उसे यह खबर पराग को देने की हिम्मत नहीं हुई. पराग को ही कहीं से पता चला,और उसने जब अपराधी स्वर में ;हाँ' कहा तो पराग ने बहुत ही जोश में बधाई दी. कोई व्यंग्य नहीं  किया,जैसा कि उसे डर  था. सारी इन्फौर्मेशन ली और उसे गुड़ लक कहा. पर उसके  बाद से ही वह कन्नी काटने लगा. अब वह नए शहर में आ गयी थी. पेईन्ग गेस्ट बनने से पहले, ऑफिस के गेस्ट हाउस में थी. पापा ने भी हज़ार रुपये का रिचार्ज भरवा दिया था, पैसे भी दिए थे, एकांत भी था, जितना चाहे बात कर सकती थी. पर पराग का मूड ही नहीं होता बात करने का. कभी शो नहीं करता पर बहाने बना कर फोन रख देता. वह समझती थी  उसकी मनःस्थिति.

कभी पूजा-पाठ नहीं किया, उसने  पर शाम को अक्सर ऑफिस से निकलते  ही के पास वाले मंदिर में जाने लगी थी, एक ही प्रार्थना  रहती  होठों पे..'किसी तरह पराग का अपोयेंटमेंट  लेटर आ जाए , भगवान'.. करीब तीन  महीने बाद ,जब पराग ने लगभग चीखते हुए खबर  दी कि उसे भी उसके शहर में ही नौकरी मिली है तो ऑफिस से जल्दी ही निकल गयी. मंदिर में हाथ जोड़ते ही उसकी आँखों से झर झर आँसू बह निकले.पहली बार जाना, भक्ति में भी कैसे आँसू निकल आते हैं.

जब से पराग आया सारे वीकेंड्स साथ ही गुजरने लगे. पर वही एक कैफे से दूसरे कैफे या फिर पार्क की बेंच या कोई मॉल या फिर कोई फिल्म. फिर भी कोई देखे ना देखे...आधे घंटे में ही उसे लगने  लगता सबकी नज़र उन दोनों पर ही है और वो पराग को ,वहाँ से उठने को मजबूर कर देती. अब इस नई मिली नौकरी ने या अजनबी शहर  के खुले माहौल ने या फिर इस नए उगे अहसास ने पराग को बेहद बेतकल्लुफ बना दिया था. हाथ तो उसका थामे ही रहता...कभी कंधे से घेर लेता...कभी बैठे बैठे कंधे पर सर टिका देता. पर उसकी झिझक नहीं टूटती , वो उसे परे धकेल देती और पराग नाराज़ हो जाता ," किसी गाँव की लड़की जैसा बिहेव करती हो तुम"

"हाँ ,तो.... तुम्हे किसने रोका है....चुन लो कोई मेट्रो वाली..."

" ऑफिस में एक से एक चिक्स हैं, बिलकुल बौम्ब्शेल्स ...चैलेंज मत करना "

"चैलेंज ही सही....मेरी तरफ से आज़ाद हो.."..फिर हंस कर आगे  जोड़  देती..."क्या सोचा मेरे ऑफिस में कूल हैंडसम डूड्स नहीं हैं...दे दूँ लिफ्ट??"

और वह गंभीर हो जाता...."संभल कर रहना...यहाँ के लड़के बड़े फास्ट होते हैं...तुम्हे लगेगा तुम्हारी बहुत हेल्प कर रहें  हैं..लेकिन बिना मतलब के कोई कुछ नहीं करता ."

वो हंस देती.."रिलैक्स बाबा...इतनी बच्ची नहीं हूँ मैं..."

पराग की पजेसिवनेस कभी अच्छी भी लगती कभी, उसे खीझ  भी होती..किसी  सोशल नेटवर्क पर उसे अपनी सिंगल फोटो नहीं डालने  देता, कहता ..."तुम्हे इस साइबर वर्ल्ड के बारे में कुछ नहीं पता..."

उसे हंसी आ जाती ,वह बार बार भूल जाता है कि दोनों क्लासमेट रहें हैं...वो उसकी  जूनियर नहीं है..पर उसका इतना केयर करना उसे अच्छा भी लगता और वो उसकी पसंद के खिलाफ कुछ भी नहीं करती .एक कैफे की कॉफी उसे बहुत पसंद थी..पर वहाँ  लड़कों का एक ग्रुप रेगुलर था जो  अक्सर उसे घूरा करता. वो तो नज़रंदाज़ कर देती पर पराग असहज  हो जाता और फिर बैन ही कर दिया वहाँ जाना.

ऑफिस के कलीग्स... वहाँ की पोलिटिक्स, डिस्कस करते दिन बीत रहें थे. अभी खुद के भविष्य की  योजनाओं के बारे में बात करने का  ध्यान ही नहीं होता.  पहली बार हाथ में आए इतने पैसे...नई  मिली आज़ादी को भरपूर एन्जॉय कर रहें थे, दोनों .ऐसे में पराग के एक मौसेरे भाई का कॉल आया कि दूसरे शहर में एक बहुत अच्छी कम्पनी में उसका इंटरव्यू फिक्स कियाहै.

 जाते वक़्त थोड़ा आशंकित था,पर उसे वह जॉब मिल गयी. फोन पर तो जैसे ख़ुशी छलकी पड़ रही थी. उस से ज्यादा बात भी नहीं की,उसे घर-परिवार और दोस्तों से ये  ख़ुशी बांटनी थी. और उसे सब विस्तार से जानने की उत्कंठा हो रही थी.इसीलिए आज ऑफिस की छुट्टी कर रूम पर ही बुला लिया.
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उसके हाथ तेजी से चल रहें थे,पर काम ख़त्म ही नहीं हो रहा था. सबकुछ व्यवस्थित कर सफाई करने को झाड़ू उठाया ही था कि लैंड लेडी आ गयी. शायद सुबह नाश्ता देने आई , मौसी  ने जाकर उन्हें, उसके ऑफिस ना जाने की बात बता दी थी. यह तो उसने सोचा ही नहीं था. उसे काम  करते देख, वे हतप्रभ रह गयी, "अरे तुम बीमार हो ना...ये सब क्या कर रही हो?"

उसने धूल से अटे बालों को चेहरे से हटाते हुए किसी तरह कहा..."वो दवा ली ना, तो अब काफी ठीक लग रहा है...सोचा जरा कमरा साफ़ कर लूँ...बहुत गन्दा हो रहा था.."

"ओह..और मैने सोचा देख आऊं...कहीं डॉक्टर की जरूरत तो नहीं...चलो, अच्छा है..मुझे भी बाहर जाना है...अब निश्चिन्त से जा  सकूंगी...यू  सीम औलराईट नाउ"

"येस्स  आंटी...थैंक्स अलॉट "

"ये सब छोडो...मौसी  को बुला लेना एक दिन..हेल्प कर देगी ,सफाई में ...मैं शाम तक लौटूंगी"

"ओके आंटी...बाय "

"बाय ..बट यू मस्ट टेक रेस्ट ...."

'आई विल आंटी..डोंट वरी"

वो गयीं तो जान में जान आई उसकी और वो झाड़ू लिए ही गोल गोल घूम गयी...' यिप्पीsss..अब कोई सफाई नहीं देनी पड़ेगी उसे...आंटी तो है ही नहीं...'

फिर जो घड़ी पर नज़र गयी तो जल्दी जल्दी सफाई में जुट गयी. सब कुछ साफ़ कर दोनों बेड पर साफ़, चादर बिछा ,जब एक कोने में खड़े होकर पूरे कमरे को निहारा तो संतोष से भर गयी. कमरा एकदम किसी होटल के कमरे की तरह चमक रहा था. बस  रूम फ्रेशनर की भीनी भीनी खुशबू और एक ताजे फूलों के गुलदस्ते की कमी थी.

पर जब अच्छे से चादर टक किए बिस्तर पर नज़र गयी तो अजीब सी अनुभूति हुई ,एकदम इनवाईटिंग सा लग रहा था. उसने दौड़कर जल्दी से कुछ किताबें उठा कर बिस्तर पर डाल दीं ...फिर भी काफी जगह खाली थी...कबर्ड से अपना पर्स ला...एक तरफ गिरा कर  रख दिया और पर्स का जिप खोल..कुछ चीज़ें यूँ ही बिखेर कर रख दीं.

शीना के बिस्तर पर नज़र गयी तो अभी अभी इतनी मेहनत से  तह किए उसके कुछ कपड़े आलमारी से निकाल  कर रख दिए  और तकिये को लापरवाही से बीच  में डाल दिया ..और संतुष्ट हो गयी...'हाँ ,अब ठीक लग रहा है.'

जल्दी से नहाने को, बाथरूम में भागी...गीले बाल पीठ पर छितराए, कबर्ड से कपड़े ढूंढ रही थी,क्या पहने..सोचा..'चूड़ीदार  कुरता' पहन ले...फिर लगा ना..बड़ा घरेलू माहौल जैसा लगेगा. कपड़े ढूंढते वो टॉप हाथ में आ गयी,जिसे पराग के साथ ही ख़रीदा था. और इतनी फिटिंग टॉप पर पराग ने आपत्ति की थी, " अब कॉलेज में नहीं हो...ऑफिस में हो ,जरा सोबर कपड़े पहना करो.."

गुस्से में जबाब दे तो दिया था, "मुझे ज्यादा पता है....क्या पहनना है क्या नहीं " पर सोचने लगी थी,'पराग..तुम भी....तुम भी,बिलकुल आम लड़कों जैसे ही निकले. सब, बगल से जींस में गुजरती लड़की को पलट कर जरूर देखेंगे ,पर अपनी गर्लफ्रेंड एकदम सीधे सादे  कपड़ों में  चाहिए. एक मन हुआ वही पहन ले..फिर लगा...ना वो खुद ही  अनकम्फर्टेबल हो जाएगी...और बिना ज्यादा सोचे एक 'राउंड नेक' की टी शर्ट निकाल कर पहन ली.

अभी बाज़ार भी जाना था, पराग की फेवरेट चाइनीज़ पैक करवा कर  लाने. औरेंज जूस भी लेती आएगी. फ्रिज नहीं होना अखर,गया ..वरना उसकी फेवरेट ब्लैक करेंट आइसक्रीम भी ले आती. पूरी ट्रीट हो जाती ,पराग की

अभी बाज़ार में ही थी कि पराग का फोन आ गया, बस पहुँचने ही वाला है. जल्दी से घर की राह ली. अभी पांच मिनट भी ना बीते होंगे कि कंधे पर  एयर बैग लटकाए,पराग आ गया.बिखरे बाल, अन्क्रीज़ड शर्ट, बिलकुल कॉलेज वाला लापरवाह पराग लग रहा था,वरना आजकल तो फार्मल कपड़ों और चमचमाते जूतों में कोई और ही पराग दिखता था.

आकर धम्म से कुर्सी पर बैठ गया..."वाऊ... ग्रेट....इतने बड़े कमरे में बस दो जन रहते हो...हमलोग तो पांच टिक जाते....जरा पानी पिलाओ यार...रखा भी है या नहीं..."

और जब उसने मिनट्स की बोतल  पकडाई...तो मुस्कुरा पड़ा..."क्या बात है..एकदम मेहमान नवाजी हो रही है"

"मेहमाननवाज़ी कैसी...लम्बा सफ़र करके आ रहें हो....चाइनीज़ भी पैक करा कर ले आई हूँ "

"हम्म...ये सब तुम लड़कियों से हमलोग नहीं सीख सकते...हर चीज़ का ध्यान रहता है..."

"वो सब छोडो बताओ तो सही.... क्या हुआ..कैसा रहा..इंटरव्यू...एकदम से कैसे ज्वाइन करने को कह दिया..."

"अरे उन्हें जरूरत है भई....वेकेंसी है और फिर चन्दन भाई की रेकमेंडेशन ...बात कैसे नहीं बनती...." और उसने विस्तार से एक एक बात बतानी  शुरू की...पर हर लाइन के बाद...'ओह! मैने इस शहर में रहने का सपना देखा था....बस देखना अब दो साल में यू.एस. निकल  जाऊँगा . ...आगे बढ़ने के ,बहुत औपर्चुनीटीज़ हैं, वहाँ . फिर उसी शहर में चन्दन भाई भी हैं और पता है....वो मेरे सीनियर निखिल, रौशन और क्लासमेट....अवनीश,समित,कँवल...सब उसी शहर  में हैं...वी विल हैव अ ग्रेट टाइम ...देखना कितना मजा आएगा...खूब पार्टीज़ ,पिकनिक किया करेंगे सब मिल कर.
'एंड यू नो वाट....एकदम ऑफिस के सामने ही फ्रेंच क्लासेज़ ...मैने तो पता कर लिया है...वीक में दो दिन ,शाम ८ बजे की क्लास हैं...ऑफिस से सीधा वहाँ ....कब से मेरा  फ्रेंच सीखने का मन था..." बीच बीच में औरेंज जूस के घूँट भरते  जाता....उस से एक बार भी नहीं पूछा...उसे नहीं चाहिए..पर पूछना तो चाहिए आखिर इक बार. अभी बताती है उसे..और जब...बिलकुल थोड़ी सी बची थी उसने फिर से बॉटल मुहँ से लगाई तो वो बोल पड़ी..." अरे थोड़ा सा मेरे लिए भी रहने देना..."

तबतक तो बॉटल खाली हो चुकी थी...पराग ने खाली बॉटल हवा में लहराते हुए कहा.."सॉरी...ख़तम हो गयी...पहले बोलना था,ना "

"तुम्हे भी तो पूछना चाहिए था...एक बार....सारी ख़तम कर दी.."

"अब ये सब उम्मीद मुझसे मत  रखो...चाहिए तो साफ़ बोल दो..मैं अन्तर्यामी नहीं कि मन की बात समझ जाऊं..."

"समझनी  चाहिए...." उसे गुस्सा आ रहा था...जब से आया है...अपनी हांके जा रहा है...उसकी योजनाओं में वो तो कहीं शामिल है ही नहीं. उसका क्या होगा?....उनकी रिलेशनशिप का क्या होगा?...उसकी नौकरी तो यहाँ है.

और उसे थोड़ा और चिढाने को , शायद पराग ने बॉटल  बेड के नीचे लुढका दी...."पराग...."...वो गुस्से से चीख ही पड़ी..."ये तुम्हारा कमरा नहीं है.."

पता है..वरना इस चेयर पर बैठने की  पनिशमेंट क्यूँ भुगतता...बेड पे नहीं पसर गया होता अब तक ?? .क्या कबाड़ पसार कर रखा है बेड पर.....और हम लड़कों को कहती हो....क्या यार एक सोफा तक नहीं है...साथ बैठ तो सकते थे, कम से कम...वी शुड मेक मोस्ट ऑफ इट यार...ये बंद कमरा..."
 "शट  अप...."बीच में ही डपट दिया उसने.

उसकी इन बातों से उसे सचमुच डर लगने लगा था.

चुप रही तो...पराग ने मनाने की गरज से बोला..."ले आऊं क्या बाहर से औरेंज जूस?.....इतना मुहँ फुला लिया..."

"अरे नहीं....वो तो मैं बस तुम्हे चिढ़ा रही थी..." हंसी आ गयी उसे..."कब तक ज्वाइन करना है वहाँ....?"

" महीने भर का टाइम माँगा है मैने...यहाँ भी तो नोटिस देनी पड़ेगी....और अब पैरेंट्स से बात कर लो...ज्यादा देर नहीं करनी..तुम्हे भी वहीँ आना होगा..यार, इतना अच्छा पैकेज है..तुम ना भी करो नौकरी...तो चलेगा...आराम से कटेगी.."

"व्हाट डू यू मीन....नौकरी ना  करो ...मैने भी तुम्हारे जैसे ही मेहनत से पढाई की है..."

"ओके..बाबा...ओके..सॉरी..इट वाज़ जस्ट अ थॉट...तुम्हे क्या मुश्किल होगी नौकरी मिलने में...वेल क्वालिफाइड हो, वर्किंग इन अ टॉप कम्पनी., कॉन्वेंट एडुकेटेड ....फ्लुयेंट इंग्लिश है...और...और ख़ूबसूरत भी हो..."शैतानी से एक आंख दबा दी ,पराग ने ...और उसने पास से एक किताब उठा कर फेंक कर मारी उसे..."ये मेंटालिटी है तुम्हारी??"

"अरे जस्ट जोकिंग यार...समझा करो..बट सीरियसली....इन नो टाइम यू विल लैंड विद अ गुड़ जॉब.....बट पैरेंट्स से बात तो करनी  होगी,ना..मेरी तरफ से सब क्लियर है..बचपन से ही  पैरेंट्स मेंटली प्रिपेयर्ड  हैं...हमेशा कहते थे.."ये तो कभी भी किसी को मिलवाने ले आएगा...हमें इसके लिए लड़की नहीं ढूंढनी पड़ेगी."

"क्या बात करूँ मैं...तुमने प्रपोज़ तक तो किया नहीं अब तक...." उसने भी हंस कर माहौल  हल्का करने की कोशिश की.

"रियली??...करूँ प्रपोज़?...पर मेरा तरीका जरा जुदा होगा..." शरारत उतर आई थी उसकी नज़रों में और वह एकदम से खड़ी हो गयी..."अब सर्व करती हूँ......चाइनीज़ ठंढा हो जायेगा तो बिलकुल मजा नहीं आएगा..."

उसकी हडबडाहट पर हंस पड़ा,पराग.."चिल बेबी..यू विल बी सेफ..डोंट वरी.."

खाते हुए भी उसकी अपनी कहानी ही चलती रही...भविष्य की ढेरो योजनायें...क्या..क्या..कब..कब करना है. खाते ही वह उठ खड़ा  हुआ..."अब रूम पर जाकर सोऊंगा....बहुत थक गया हूँ..."

वह थोड़ी निराश हो गयी...अभी तो आधा दिन बाकी है...क्या करेगी वो...सोचा था...आज तो देर तक गप्पें मारेगी...लैंड लेडी का भी डर नहीं . पर वो नहीं कहेगी रुकने को...उसे उसका ख्याल नहीं कि अकेले वो क्या करेगी...तो वो क्यूँ ध्यान दिलाये.

पर जाते हुए ...अचानक दरवाजे  से पलट कर पराग ने उसे बाहों में ले लिया....इस अप्रत्याशित प्रेम प्रदर्शन के लिए वह तैयार नहीं थी .उसकी बॉडी बिलकुल स्टिफ हो गयी तो उसकी आँखों में देख मुस्कुराते हुए बोला..."इतने से डर गयी...अभी तो मैं बहुत कुछ करने वाला हूँ"...अब उसकी सांस भी रूकती सी लगी..तो हंस कर पराग ने उसे रिलीज़  कर दिया और बोला..."प्लीज़...अब तैयारी कर लो  तुम भी...मैं वहाँ अकेला नहीं रह पाऊंगा "

पराग के जाने के बाद कुछ देर तो वो वैसे ही निश्चल खड़ी  रही. उसकी गर्म साँसे अब तक कंधे पर महसूस हो रही थीं. एक स्ट्रोंग मैस्क्युलिन स्मेल ने घेर रखा था...सर भारी हो गया.... पानी की बोतल थामे ताज़ी हवा लेने को खिड़की के पास आ गयी. परदे सरका दिए.

ठंढी हवा से ,कुछ दिमाग क्लियर हुआ तो बहुत सारी बातें क्लियर होने लगीं......पराग बहुत खुश है....सपनो का शहर, अच्छी नौकरी, पुराने दोस्त, फ्रेंच क्लासेज़ ..पर इन  सबमे वो कहाँ है?...साथ रहने का सपना तो दोनों ने साथ देखा था पर यहाँ ,वो पराग के सपनो के साथ खड़ी थी और उसके सपने? उसकी ट्रेनिंग पीरियड पूरी हो गयी है और अब वो पे रौल पर आ गयी है. ऑफिस में एक जगह बना ली है और सब छोड़ वो एक अनिश्चितता की तरफ कदम बढ़ा दे? फिर से एक बार नई शुरुआत. और कह देना आसान है...मन लायक जॉब मिलती है क्या इतनी आसानी से?

एक ही  शहर में पराग की  जॉब के लिए रोज भगवान के सामने हाथ जोड़े थे. आज ऑफिस से छुट्टी ली, फ्रेंड से झूठ बोला, लैंड लेडी कहीं रूम खाली करने को ना कह दे...ये रिस्क लिया, सुबह से सफाई में जुटी है, उसकी फेवरेट डिश लेकर आई, उसकी पसंद के कपड़े पहने. उसकी सारी सोच की केंद्र में पराग था और पराग की सोच में? उसने तो एक बार पूछा भी नहीं कि वो, वहाँ जाना चाहती भी है या नहीं? उसकी तरफ से फैसला कर लिया. प्यार सम्पूर्ण समर्पण  मांगता है तो क्या बस उस से ही अपेक्षित है यह? कितनी आसानी से पराग ने कह दिया..."अच्छा पैकेज है,नौकरी ना करो तब भी चलेगा".. लड़की नौकरी तभी तक करे, जब तक आर्थिक रूप से सहायता की जरूरत हो. आर्थिक रूप से सक्षम होते ही, उसे बस 'वाल फ्लावर' ही बनना  है. उसकी पढ़ाई...उसकी क्षमताओं का क्या...त्याग की अपेक्षा बस उस से ही, क्यूँ? ..क्या बदल गया है. यह भी सदियों पुरानी परंपरा सा नहीं ,कि लड़की  सबकुछ छोड़ कर लड़के के साथ चल दे और उसके सपनो को ही अपना मान ले. क्यूंकि वो उसके बिना जी नहीं पायेगा...लेकिन वो तो कितनी चीज़ों के बिना नहीं जी पायेगा...फिर से सर पर भारीपन तारी होने लगा.

'विमेन एम्पावरमेंट ' का पक्षधर....नारी के सम्मान की बात करने वाला..घंटो 'विडो के कंडीशंस ', 'डोमेस्टिक वायलेंस' पर आग उगलने वाले शख्स को नारी मन की कितनी समझ है?

सुबह का सारा उत्साह कपूर की मानिंद उड़ चुका था. कंधे झूल आए. बेहद थका  सा महसूस करने लगी. खिड़की के बाहर तेज आंधी चलने  लगी थी. धूल के गुबार और सूखे पत्ते उड़ने लगे थे. उसने खिड़की बंद कर दी. पर मन  में चलती आंधी का क्या...उन्हें बंद करने को कपाट कहाँ से लाए.

(समाप्त )









36 comments:

shikha varshney said...

बहुत डूब के लिखी है कहानी आजकल के परिवेश और युवाओं की मानसिकता को पूरी तरह परिलक्षित किया है
विमेन एम्पावरमेंट ' का पक्षधर....नारी के सम्मान की बात करने वाला..घंटो 'विडो के कंडीशंस ', 'डोमेस्टिक वायलेंस' पर आग उगलने वाले शख्स को नारी मन की कितनी समझ है?
बहुत कुछ बदल गया ...पर कुछ है जो कभी नहीं बदलेगा शायद.

वन्दना said...

एक झकझोर देने वाली कहानी है……………अब इस तूफ़ान को कैसे समेटा जा सकता है जब तक कि किसी निर्णय पर ना पहुँच पाये……………यही तो आज की पढी लिखी लडकी की भी त्रासदी है।एक सोचनीय प्रश्न्।

Sadhana Vaid said...

वर्तमान परिदृश्य में आधुनिक कैरियर ओरिएंटड वर्किंग वीमेन की मानसिकता का बड़ी सूक्ष्मता से विश्लेषण किया है आपने ! कहानी बहुत जीवंत बन पड़ी है ! कहानी में नायक और नायिका दोनों की महत्वाकांक्षाएं और उनकी मंजिल अलग अलग स्थानों पर निरूपित हैं ! पराग ने नायिका को प्रपोज़ तो किया ही है शायद मन माफिक नौकरी पाने के उल्लास में बहुत परम्परागत तरीके से नहीं किया इसीलिये वह कुछ अपसेट है ! लेकिन उसकी क्या अपेक्षा है पराग से ? क्या पराग को उसके कैरियर को अधिक अहमियत देकर अपने अवसर को गँवा देना चाहिए और उसके साथ उसी शहर में छोटी सी नौकरी करनी चाहिए ? शादी के बाद वह उसे साथ ले जाना चाहता है तो भी उसके अहम को चोट पहुँचती है कि पराग कौ उसके कैरियर की परवाह नहीं है ! अगर साथ रहने की चाह है तो किसी न किसी को तो त्याग करना ही पडेगा ! वरना अलग अलग शहरों में रह कर तो दोनों अपना कैरियर अपने मन माफिक बना ही सकते हैं ! एक ज्वलंत समस्या को प्रस्तुत करती सुन्दर कहानी ! आजकल अनेकों युवा इसी दुविधा का सामना कर रहे हैं ! समाधान का सूत्र भी बता देतीं तो सबका सही मार्ग दर्शन हो जाता !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कहानी में आई हर परिस्थिति का सटीक वर्णन किया है ...आज कल के माहौल की जो स्थिति है ....लड़कियां जो आज नौकरी करती हैं , उनकी सोच , और सारे दृश्य बहुत सही अंदाज़ में लिखे हैं ...लडके और लड़की की मन:स्थिति का वर्णन सहज और रोचक है ...सच है बहुत कुछ बदला है पर अभी भी वो पुरुष वाली सोच नहीं बदल पाई ..त्याग करे तो नारी ही करे ...कहानी का अंत भी झकझोर देने वाला ..दिमाग में आंधियां सी चल गयीं ../
बहुत रोचक और विचारणीय प्रस्तुति ...

H P SHARMA said...

जो कुछ भी विचार किया था संगीता स्वरूप जी ने लिख दिया है दोहराव नहीं करते हुए यही कहूँगा - विवाहित जिंदगी के चुनौतियो के बारे मे पुरुष समझ मे कोई बदलाब नहीं है। आपने बहुत अच्छे से इस हक़ीकत को सामने रखा है
'विमेन एम्पावरमेंट ' का पक्षधर....नारी के सम्मान की बात करने वाला..घंटो 'विडो के कंडीशंस ', 'डोमेस्टिक वायलेंस' पर आग उगलने वाले शख्स को नारी मन की कितनी समझ है?
रोचक प्रस्तुति.

रश्मि प्रभा... said...

ek sashakt vichaaron ko sampreshit kiya hai....

mukti said...

दी, बहुत-बहुत अच्छी कहानी है ये. मेरी अपनी एक सहेली के साथ ऐसी घटना घट चुकी है. और हॉस्टल की तो बहुत सी लड़कियों के साथ. सच में अभी भी अधिकांश लड़के ये मानकर चलते हैं कि अगर वो बहुत अच्छा कमाते हैं, तो लड़कियों को नौकरी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. लड़कियों की मर्ज़ी के बारे में नहीं सोचते.
इस कहानी के प्रेम पेज दृश्य बहुत अच्छे लगे. और सच में आपने लड़कों की मानसिकता और एक उच्च शिक्षित लड़की के मनोभावों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है.

सारिका सक्सेना said...

आज की धरातल पर भावनाओं और वास्तविकता से बुनी हुई एक सशक्त कहानी! आप सब कुछ इतना अच्छे से वर्णित कराती हैं की लगता है की एक फिल्म की तरह कहानी हमारी आँखों के सामने घट रही है...

प्रवीण पाण्डेय said...

कितनी सरलता से कथा को ग्राह्ययोग्य विस्तार दे देती हैं आप।

अनिल कान्त : said...

एक बेहद सधी हुई कहानी.....मुझे अंत, प्रारंभ से आभासित होने लगा था.....सही मुद्दा उठाया कहानी ने....बहुत अच्छी लगी

सतीश पंचम said...

साधना जी और संगीता जी के कमेंट को मेरा भी कमेंट माना जाय। इन दोनों कमेंटों के बाद और कुछ कहने को रह नहीं जाता।

फिर भी यह जरूर कहूंगा कि कहानी का सहज प्रवाह वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिखने के कारण लगता ही नहीं कि यह कोई कहानी है। एकदम सच्ची घटना का साक्षात विवरण सा लगता है।

शानदार कहानी है और नेरेशन ने इसमें और जान डाल दी है।

दीपक 'मशाल' said...

हिट हिट हिट... नारी स्वतंत्रता के पक्षधर होने का दिखावा करते लोगों की पुरुषवादी सोच को उजागर करती आपकी ये समसामयिक विषय पर लिखी गई कहानी आपकी सबसे बेहतरीन कृतियों में एक है दी..

वाणी गीत said...

हमारा समाज बदल रहा है ...बदलाव की प्रक्रिया या यूँ कहूँ के नवनिर्माण की प्रक्रिया तकलीफदेह होती ही है ...हर स्त्री पुरुष के दिल और दिमाग की रस्साकसी है ...व्यवहारिकता और भावनाओं के बीच का युद्ध ...
महिला सशक्तिकरण की बात करना और उस दिशा में कार्य करना दोनों अलग बात है ...कहने में कुछ जाता नहीं है , मगर अमल करना पड़े तो मुश्किल ....कम से कम हमारे भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में तो ...

रोचक अंदाज कहानी का हमेशा की तरह ..!

मुदिता said...

रश्मि जी
हमेशा की तरह प्र्व्हामय और सटीक कहानी ..एक सांस में पढ़ गयी... मनोभावों का अद्भुत चित्रण...बहुत बधाई ...

ali said...

रश्मि जी,

पुरुष और स्त्रियों की भूमिकाओं का शताब्दियों पुराना निर्धारण जैसे अवचेतन में गहरे पैठ गया हो , तभी तो बदलते परिवेश और सामाजिक हालात में भी वो अन्दर से बाहर झांक ही लेता है !

कहानी में शीना , आंटी , यहां तक कि पराग के किरदार मूलत: तनवी के व्यक्तित्व को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करनें के लिये गढे गये हैं ! अगर मैं तनवी को वर्तमान परिवेश में नारी अस्मिता का प्रतीक मान लूं तो वो कथा की 'एकमेव नायिका' है और शेष तीनों कैरेक्टर केवल सपोर्टिव भूमिका तक सीमित हैं !...गौर करें तो इन तीनो कैरेक्टर्स के अपने अपने निगेटिव शेड्स हैं ,पराग यथास्थितिवादी पुरुष , शीना कैजुअल और अव्यवस्थित किस्म की लडकी , तथा आंटी विशिष्ट निषेध / बन्दिशों के प्रति अपने आग्रह के चलते सकारात्मक गुण खोने लगते हैं , बस इसी बिन्दु से तनवी का चरित्र इन सब पर बढत हासिल कर लेता है ! अगर नारी अस्मिता / मनोभावों की अभिव्यक्ति के नज़रिये से देखें तो आपनें कथा के मूल उद्देश्य से न्याय किया है !

अब ज़रा कथा के दूसरे पक्ष पर ध्यान दिया जाये , झगडों के ज़रिये प्रेम का चित्रण , कथा का सबसे सशक्त पक्ष है क्योंकि इससे उभय पक्ष के अन्दर की असहमतियां / कलुषता और कुंठायें बाहर बिखर जाती हैं फिर शेष रह जाता है केवल प्रेम ! उभय पक्ष के स्वस्थ सम्बन्धों में अचानक , शताब्दियों से छुपा बैठा दैत्य एक संकेत करता है और कथा एक ज्वलंत प्रश्न पर समाप्त हो जाती है !

यहां यह भी कहता चलूं कि कथा की नायिका भी उसी दैत्य के इशारों पर पराग का स्वागत , तैयारियों में बिछ सा जाना , शीना से झूठ बोलना और आंटी से झगडे के लिये तत्पर हो जाने जैसे कार्य करती हुई साधारण मानवी साबित होती है ! अगर उसे देवी के तौर पर स्थापित किया जाता तो कथा , मिथक में बदल जाती !

इसलिये केवल इतना ही कहूंगा इंसानी अपेक्षाओं और अहसास पर बुनी हुई अच्छी कथा , जिसमें तनवी और पराग के बीच की असहमतियां अभी पूरी तरह से खत्म नही हुई हैं !


शुभकामनाओं सहित ,

एक अदना सा पाठक
अली

Rakesh Jain said...

हम्म्म्म....जब दोनों पक्ष सक्षम हो तो प्यार का अन्तत: यही हाल होता हैं...सिर्फ सर भारी होने के सिवा और कुछ नहीं बचता....बहुत अच्छी पोस्ट..मर्मस्पर्शी...

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत गंभीर बात को सहजता से कह दिया है, हाँ सबकी सोच यही होती है कि मैं अगर अच्छा कमा सकता हूँ तो पत्नी घर में रहे और घर देखे. चाहे लड़का हो या उसके घर वाले ही क्यों फिर लड़की के घर वाले भी यही चाहते हैं कि पहले वैवाहिक जीवन अच्छे से सेट हो जाये तो फिर करती रहना नौकरी. ये तो आपसी मामला है, मेरे सामने भी मामला आया कि आप सगाई कर दो, फिर हम देखेंगे कि लड़की को नौकरी करनी
है या नहीं दोनों अलग अलग शहर में तो रहेंगे नहीं. मैंने भी कहा कि मेरी लड़की वहीं रहेगी अगर लड़के को वहाँ कंपनी भेज देती है तभी सगाई होगी नहीं तो उसके लिए और भी विकल्प हैं मेरे सामने.

abhi said...

वाह.बहुत अच्छी कहानी है....आपकी अगली कहानी का इंतज़ार है, जिसके बारे में आप बता रही थी.

ताऊ रामपुरिया said...

एक सहज धाराप्रवाह है कहानी में. शुरुआत मे लगा था कहानी लंबी है, फ़ुरसत में आकर पढेंगे, लेकिन शुरुआती चंद लाईनों पर नजर डालते हुये कब कहानी पूरी होगई, यह पता ही नही चला. वर्तमान जीवन की कशमकस को आपने बिल्कुल सहज और सटीक शब्द दे दिये. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इतना लम्बा अन्तराल जाहिर कर रह था कि कुछ बेहतर आने वाला है. :) बहुत शानदार कहानी है. अब ज़रा विस्तार हो जाये-

"पराग की फ्रस्ट्रेशन बढती जा रही थी. घर वाले आस-पास होते,ज्यादा बात भी नहीं हो पाती. वह समझाने की कोशिश करती..मेरा भी तो नहीं आ रहा. तो पराग झट से कह देता," तुम तो लड़की हो...हम लड़कों की पीड़ा नहीं समझोगी...बेरोजगारी शब्द का क्या मतलब होता है."

लड़कियों का नौकरी के लिये चिन्ता करना ही हास्यास्पद मान लिया गया है. जैसे वे तो टाइम पास करने के लिये पढाई करती हैं. रोजगार तो केवल लड़कों की बपौती है.

"पर नौकरी मिले तो सही और जब अपोयेंटमेंट लेटर आया भी तो पहले उसका ही आया. उसे यह खबर पराग को देने की हिम्मत नहीं हुई."

पता नहीं क्यों, यदि लड़कियों के साथ तुलनात्मक रूप से कुछ अच्छा होता है तो वे अपराध-बोध से भर जाती हैं, जैसे पराग का अपोयमेंट लेटर उसके कारण नही आया हो... बहुत सही चित्रण.

" एक ही प्रार्थना रहती होठों पे..'किसी तरह पराग का अपोयेंटमेंट लेटर आ जाए , भगवान'"
ऐसी निष्कपट दुआ केवल लड़कियां ही मांग सकती हैं.

"पराग की पजेसिवनेस कभी अच्छी भी लगती कभी, उसे खीझ भी
होती.."
लेकिन आमतौर पर लड़कियों को ये पजेसिवनैस अच्छी लगती है. ये अलग बात है कि शादी के बाद यही फ़ंदे की तरह हो जाती है :)

"'पराग..तुम भी....तुम भी,बिलकुल आम लड़कों जैसे ही निकले. सब, बगल से जींस में गुजरती लड़की को पलट कर जरूर देखेंगे ,पर अपनी गर्लफ्रेंड एकदम सीधे सादे कपड़ों में चाहिए."

हां ऐसा ही होता है. दूसरों को देखेंगे, लेकिन अपनी पत्नी या प्रेयसी को कोई न देखे....

"उसकी योजनाओं में वो तो कहीं शामिल है ही नहीं. उसका क्या होगा?....उनकी रिलेशनशिप का क्या होगा?...उसकी नौकरी तो यहाँ है."

पत्नी के पक्ष से भी कोई योजनाएं बनाता है? उसे तो बस पति की राय और योजना पर अमल करना होता है. समाज कितने ही आगे बढ जाये, हिन्दुस्तानी पतियों की मानसिकता में बहुत बदलाव सम्भव नही है. कुछ बातें यथावत ही रहेंगी.

"त्याग की अपेक्षा बस उस से ही, क्यूँ? ..क्या बदल गया है. यह भी सदियों पुरानी परंपरा सा नहीं ,कि लड़की सबकुछ छोड़ कर लड़के के साथ चल दे और उसके सपनो को ही अपना मान ले. क्यूंकि वो उसके बिना जी नहीं पायेगा."

अभी तक तो ऐसा ही हो रहा है. पत्नी की नौकरी के कारण कभी पति ने अपनी नौकरी छोड़ी? लेकिन पत्नी को तो जैसे ये मालूम ही होता है, कि यदि पति की नौकरी कही दूसरे शहर मे होगी, तो पत्नी को ही अप्ना काम छोड़ना पड़ेगा. आज भी लड़कियों की नौकरी और उनकी पढाई को गम्भीरता से लिया ही कहां जाता है?

बहुत सुन्दर कहानी. लगा ही नहीं कि कहानी पढ रहे हैं, जसे एक जीवन जी लिया तन्वी के बहाने...

Mired Mirage said...

एक सच को दिखाती कहानी है। यह मानसिकता बहुत गहरे पैंठ किए हुए है , सरलता से नहीं बदलेगी। कठिन समस्याओं के कठोर निर्णय ही लेने होते हैं।
घुघूती बासूती

अनूप शुक्ल said...

अच्छी सहज प्रवाह वाली कहानी। अच्छा लगा इसे पढ़ना!
वन्दनाजी की टिप्पणी से सहमत!

निर्मला कपिला said...

कितना भी पढ लिख ले मगर हमारे समाज की सोच नही बदल सकती। भला सदियों से बना पुरुश का वर्चस्व कैसे सवीकार कर सकता है कि उसेनारी के बराबर समझा जाये। बिलकुल यही हो रहा है आज कल और बेचारी लडकियाँ? क्या कहूँ? कहानी का प्रवाह और रोचकता प्रभावित करती है।
बधाई

शोभना चौरे said...

पुरुष प्रधान वाली सामाजिकता गहरे तक पैठी है कपड़ों से आधुनिक कहे जाने का स्वांग अभी भी रचा जा रहा है और जहाँ अपने निर्णय लेने की बात होती है वहां अपने पेरेंट्स के सहारे की बात दोहराई जाती है |कितना कुछ बदलने की बात करते है ?पर अभी बहुत कुछ नहीं बदला है इस मामले में |
कहानी का मूल उद्देश्य नायिका की अपनी सोच उसे सशक्त बनाती है जहाँ उसका कोई न ही मानसिक रूप से और नहीं शारीरिक रूप से शोषण कर सकता है |
और ये सबकुछ मिला है उसे अपनी शिक्षा और उससे मिले आत्मविश्वास से |
एक भवर में जाने के पहले ही अपने आप को उससे दूर रहने का या उससे निकलने का सफल प्रयास करती हुई आज के माहौल में अपनी अलग पहचान रखने वाली नारी की सफलता की सुन्दर कहानी |
सरल ,सहज प्रवाहमयी भाषा के साथ बहती हुई बहुत ही अच्छी कहानी |

गजेन्द्र सिंह said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति .......

कृपया इसे भी पढ़े :-
क्या आप के बेटे के पास भी है सच्चे दोस्त ????

Akanksha~आकांक्षा said...

अंत तक बांधे रहती है यह कहानी...सुन्दर प्रस्तुति.
______________
'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

mamta said...

Story was very good,but I'm still waiting for a 'happily ever after' from you.Bahut darte -darte ye comment likha hai ,with sincere apologies to all the serious and thinking readers.

boletobindas said...

आप कहानी को उस मोड़ पर लाकर खत्म कर देती हैं जहां से सोच का चिंतन का विराट रास्ता खुलता है। यानि आपकी कहानी खत्जाम नहीं होती....अंदर लोगो को सोचने के लिए चितंन करने के लिए छोड़ती है। पिछली कहानी में भी यही स्थास्थिती छोड़ी है आपने औऱ यहां भी। बदलाव आने के बावजूद समाज अभी उहोपोह की स्थिती में है। आज कहीं-कहीं पुरुष पत्नी के करियर के लिए शहर छोड़ देता है। पर ये मामले तब तक रहेंगे जब तक पुरुषवादी समाज रहेगा। चंद उदाहरण आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। पर अभी काफी रास्ता तय करना बाकी है। पर स्त्री के घर बैठने से बेहतर है कि शिक्षा का सदुपयोग हो।

Sanjeet Tripathi said...

aapki kahaniyan aur patr apne saath bahaa le jaate hain...

नीरू said...

हाय रश्मि,

आपके पात्र बहुत नोर्मल और मीनिंगफुल कन्वर्सेशन करते है| कोई क्लिष्ट भाषा या जटिल मनोविज्ञान नहीं | कहानी बिलकुल सरलता से पाठक को वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुआ चलती है और अंत में उन्हें इक सवाल दे जाती है |

'विमेन एम्पावरमेंट ' का पक्षधर....नारी के सम्मान की बात करने वाला..घंटो 'विडो के कंडीशंस ', 'डोमेस्टिक वायलेंस' पर आग उगलने वाले शख्स को नारी मन की कितनी समझ है?

ऑफ दी रिकॉर्ड : और हमें हमेशा पराग जैसे लोगों से गालियाँ पड़ती थी कि तुम साले मेल शौविनिस्ट | :)

अभिषेक ओझा said...

टिपण्णी ईमेल से.

vijaymaudgill said...

paraag tum bhi...... :) sahi batau to rashmi ji kahani k title ne hi clear kar diya tha ki ye behti dhara hai. kyuki title bahut kush keh jata hai. sach main bilkul bhi nahi pata chala ki kahani kab khatam ho gayi.
sahi bolu to mujhe ye kahani shoti lagi. kyuki ye ek aisa subject hai jo thora aur lamba chal sakta tha.ek aur baat kahani main kahi-2 kush-2 aise seen hai jo parhte time ek meetha aur teekha swad dete hain. jo bandhe rakhta hai. kul mila kar kahani acchi lagi.

मीनाक्षी said...

"ah...last lines of this story touched my heart"

राजन said...

कहानी में जो समस्या बताई गई है उस पर तो जो साधना जी ने कहा उसे मेरी भी टिप्पणी माना जाए ।पुरूष को क्या चाहिए वह अपने बारे में बताता रहता है।तभी स्त्री उसकी इच्छाओं का ध्यान रखती है वहीं स्त्री की इच्छा पर समाज के प्रतिबंध तो है ही लेकिन सच यह है कि महिला खुद भी ये ही चाहती है कि जो उससे प्रेम करता है वह बिना कुछ कहें ही उसकी भावनाओं और जरूरतों को समझे।बस यही पुरुष नहीं कर पाते।सदियों से ऐसा हो रहा है न पुरुष बदला और न स्त्री ।लेकिन बदलने की शुरुआत तो उसे ही करनी होगी जिसे वर्तमान में समस्या है।पराग नायिका से यही तो कह रहा है जो उसे चाहिए बोल दे।देखिए फिर कैसे पुरुष भी अपनी योजनाओं में स्त्री को भी शामिल करने लगेगा ।
आज पता नहीं कितने सालों बाद कोई कहानी पढ़ी है।कब पढना शुरू किया और कब खत्म पता ही नहीं चला।कहानी में ऐसा प्रवाह ही सबसे जरूरी होता है ताकि पाठक की रुचि बराबर बनी रहे।भाषा का सरल होना भी बहुत जरूरी है।आपकी कहानी मे ये दोनो ही चीजे देखने को मिली।आपने पात्रों के चरित्र को कितनी बारीकी से उकेरा है यह इस उदाहरण से पता चलता है जैसे पराग के लापरवाह स्वभाव को दिखाने के लिए उसका जूस की बोतल अकेले पी जाना ।

Basant said...

बहुत सशक्त कहानी है. प्रेम सम्बन्ध में पुरुष अपने बारे में सोचता है और बाकी सब कुछ उसके लिए ग्रांटेड होता है. अन्य की भावना समझना, उसे पूछना अधिकांशतः प्रेम में होता नहीं. स्त्री और पुरुष की सोच और स्वभाव का अंतर बहुत खूबी सी उजागर किया गया है. संवाद क्रिस्प हैं और वातावरण के अनुकूल भी. अंग्रेज़ी के कुछ शब्द सही उच्चारण के साथ लिखे जाने की ज़रूरत कहीं - कहीं है. कुल मिलाके कहानी पढ़ने का अनुभव बहुत सुखद रहा.

Neha said...

बहुत सटीक कहानी...कहानी नहीं यथार्थ ही है..आज भी लड़कियों के काम करने को शौक़ का ही दर्जा मिलता है कई जगह..एक बार तो किसी को कहते सुना था लड़कियों के काम करने के कारण बेरोज़गारी बढ़ रही है..क्यूँकि लड़कों को काम नहीं मिल पा रहा उनके कारण..किसी और की क्या कहें..एक बार अपने लिए ही एक बुज़ुर्ग कलीग को दूसरे कलीग बोलते सुना था.."इसका क्या है लड़की है एक अच्छा सा लड़का पकड़ेगी शादी करके सेटल हो जाएगी..पर तुम तो लड़के हो तुम्हें मेहनत करनी पड़ेगी"...कितना सम्मान था उनके लिए नज़रों में और वो भी बहुत प्यार सा पेश आते थे..बाद में भी आते रहे..मैंने भी सम्मान में कमी नहीं की..पर उनकी सोच हमेशा खटकती रही..आज भी खटकती है।
बहुत छोटे बदलाव भी आ रहे हैं..पूरी मानसिकता बदलने में वक़्त लगेगा..कितना..ये कहना मुश्किल है।ये सब लिखने के लिए आपका दिल से आभार