Sunday, August 8, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (समापन किस्त )

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर, उसके  विदेश चला गया. तीसरी बेटी नमिता ने दूसरी जाति के लड़के से घर से विरोध होने पर,घर से भागकर शादी कर ली.छोटी बेटी अपने भाई के यहाँ रहकर एम.बी.ए. कर रही थी.)

गतांक से आगे



घर वापस आ गयीं,पर मन नहीं लगता...सुबह पति को फूलों की क्यारियाँ ठीक करते देखतीं  और मस्तिष्क में मीरा का तेजी से रसोई में काम करना दिखता रहता...दोपहर को आराम करने को  लेटतीं और लगता वो कॉलेज में भूखे पेट पढाई कर रही होगी, रात देर तक नींद नहीं आती, किताबों पर झुका मीरा का  थका चेहरा दिखाई देता रहता.

छः महीने बाद मीरा घर आई और उन्होंने उसे एक ग्लास पानी भी लेकर पीने नहीं दिया. कलावती की बेटी छुटकी को ताकीद कर दी थी कि मीरा के आस-पास ही बनी रहें,ध्यान रहें कि एक बार उसे   हैण्ड-पम्प भी ना चलना पड़े. मीरा हंसती रहती, 

"माँ मेरी आदतें खराब कर रही हो"

वे उसे डांट देती, "चेहरा देख जरा...कैसा मुरझाया सा हो गया है...कोई रौनक ही नहीं.जबतक छुट्टी है,सिर्फ खाना खा और आराम कर "

"अउर नहीं त का....सहर  जाके अईसा चेहरा बना लिया है कि दमाद बाबू को पसंद नहीं आया तो?? अब सादी-बियाह होगा...जरा धियान रखो  अपना..."

"काकी तुम्हे सादी-बियाह के अलावा कुछ और सूझता है?..."

"लो कल्लो बात...इस उम्र में तुम्हारी माँ, तीन बच्चे की माँ बन  गयी थी."

"मैं जा रही हूँ बाहर पढने "..मीरा सचमुच नाराज़ हो कोई भारी भरकम किताब ले बाहर चल देती.

 कभी कुआँ के जगत पर बैठी पढ़ती होती..कभी हनुमान जी के चबूतरे पर तो कभी...अमरुद के पेड़ की छाँव पे. दिन  दुनिया से बेखबर. पता नहीं क्या सारा-दिन लिखती पढ़ती रहती.

पर उसकी यह मेहनत रंग लाई और फ़ाइनल रिजल्ट आने से पहले ही उसे एक अच्छी सी नौकरी मिल गयी. पति प्रकाश,प्रमोद की नौकरी लगने पर भी इतने खुश नहीं हुए थे,जितना अपनी छोटी बेटी मीरा की नौकरी लगने की खबर से.हुए. बिलकुल बाबूजी की तरह बाहर कुर्सी लगा बैठे होते और हर आने-जाने वालों को यह खबर सुनाते. "अरे जो मैं साल भर  में कमाता था ,मेरी बेटी के एक महीने की कमाई है..क्या ज़माना आ गया है...पर बच्चे मेहनत भी तो कितना करते हैं, कितनी सारी पढ़ाई करते हैं" उन्हें लगता पति की तरफ ,अब  बुढ़ापा तेजी से बढ़ता आ रहा है. बुढापे में सबलोग एक जैसी ही बातें और एक जैसा ही व्यवहार करते हैं.

मीरा की नौकरी दूसरे शहर में लगी और वे परेशान हो गयीं, अकेली कहाँ रहेगी कैसे जाएगी? उन्होंने प्रकाश से कहा साथ जाने को, मीरामना करती रही पर उनकी बात माँ,प्रकाश साथ गया. मीरा को उसकी नई नौकरी पर छोड़ उसे आश्वस्त किया,"माँ उसके साथ और भी लडकियाँ हैं, एक हफ्ते तो ऑफिस के गेस्ट हाउस में रुकेंगी सब फिर मिलकर एक फ़्लैट ले लेंगी,मीरा समझदार है,तुम चिंता मत करो"

कह देना आसान है,चिंता मत करो.इतने बड़े शहर में लड़की अकेली है, आगे नाथ ना पीछे पगहा....और कहता है चिंता मत करो.नाराज़ होकर बोलीं, "अब तू उसके लिया अच्छा सा लड़का देख,अब तो पढ़ भी ली,नौकरी भी लग गयी,अब तो हो गयी तुम भाई-बहन के मन की"

"अच्छा माँ....देखता हूँ.." प्रकाश ने हँसते हुए कहा और फोन रख दिया.

यह हंसी में उड़ाने वाली बात है कहीं? लड़की इत्ते बड़े शहर में अकेली है और भाई हंस रहा है .अब वे पति के पीछे पड़ीं,लड़का देखिए मीरा के लिए.पति ने गंभीरता से कहा, "अब कहाँ उसके लायक लड़का मैं खोज पाउँगा? अगर उसे कोई पसंद आ जाता है तो कह देना कोई मनाही नहीं है मेरी तरफ से"

वे आवाक मुहँ देखती रह गयीं. ये वही  पति कह रहें हैं? जिन्होंने नमिता के हाथ-पैर तोड़ घर बैठाने की  धमकी दी थी.और इनकी वजह से आज वे बेटी का मुहँ देखने को तरस गयी हैं.

आश्चर्य से बोलीं, " ये आप कह रहें हैं....नमिता के समय तो..."

" उसकी बात अलग थी, वो गाँव की लड़की थी...तुम नहीं समझोगी...जाओ  खाना  लगाओ..."

हाँ, जब मुश्किल में पड़ जाओ,सवालों से घिर जाओ...तो बस..."नहीं समझोगी..खाना लगाओ ..."

वे वहाँ से चली तो गयीं,पर मीरा के लिए सचमुच चिंतित हो उठीं.

मीरा रोज फोन करती.अपने हाल-चाल के प्रति आश्वस्त कराती उन्हें. अब तीन लड़कियों ने मिलकर घर भी  ले लिया था.कहती काम भी अच्छा लग रहा है.जैसे ही छुट्टी मिलेगी,घर आऊँगी.

पर छुट्टी मिलने में उसे चार महीने  लग गए. जब आई तो दो बड़े बड़े बैग भरे हुए थे. पता नहीं क्या क्या लेकर आई थी. अपने पापाजी  के लिए कई सेट कपड़े, उनके लिए साड़ियाँ, अपने गोपाल चाचा के लिए भी कुरता पायजामा, घर के लिए भी तमाम तरह के सामान. सिवनाथ माएँ के लिए साड़ी,कलावती के लिए कपड़े और सुन्दर  सी चप्पल,उसकी बिटिया के लिए फ्रॉक और गुड़िया.

पर ये उपहार उसके सामने कुछ भी नहीं थे जो उसने अपने पापा जी को दिए. रात में खाना खाने के बाद जब पति अखबार की छूटी ख़बरें ढूंढ ढूंढ  कर पढ़ रहें थे तभी मीरा गयी और एक मोटा सा लिफाफा उनकी गोद में रख दिया.

पति चौंके ," ये क्या है?"

हिचकते हुए बोली मीरा, "पापाजी ,वो बाग़ जो गिरवी रखा था,ना कृष्णभोग आम के पेड़ वाला,उसे वापस ले लीजिये"

पति ने वो लिफाफा छुआ भी नहीं.बोले, "पहले इसे उठाओ."

"पापाजी..."

"पहले इसे उठाओ...फिर समझाता हूँ" थोड़ा जोर से बोले वह .

मीरा ने उनकी तरफ देखा,उन्होंने आँखों से इशारा किया...मीरा ने बड़े बेमन से वो  लिफाफा वापस ले लिया.

पति उसे समझाते रहें,अब घर में  है कौन आम खाने वाला? तुम सबलोग बाहर हो. हम बुड्ढे- बुढ़िया क्या खायेंगे इस उम्र में. इस उम्र में तो परहेज ही जरूरी है. जिसके पास है वह बगान, कम से कम  खा तो रहा है. यह सब भूल जाओ. इतना कुछ लाया तुमने, मैने कुछ बोला? आराम से रहो,इतनी मेहनत  की है, उसका फायदा उठाओ....ये सब भूल जाओ..." और अखबार रख वे सोने चले गए.

पर मीरा भी धुन की पक्की थी. उसने कब गुप-चुप गोपाल जी से बात की और वे मान गए, उन दोनों को खबर भी नहीं हुई.  सारा कागज़ पत्तर तैयार करवा जब पति से  हस्ताक्षर करने को बोला. तो वे एक बार फिर चौंके.पर गोपाल जी ने समझाया, "बिटिया का इतना मन है, तो कर दीजिये  ना...कितने बाल-बच्चे इतना सोचते हैं??...वह सोच रही है तो उसे करने  दीजिये. अब तो उनके बाल-बच्चे हैं वरना शम्भू बाबू जिंदा होते तो ऐसे ही बगान वापस कर देते. वे सिर्फ लोगों की मदद के विचार से गिरवी रखते थे,"
हस्ताक्षर करते पति की आँखों में आँसू आ गए जिसे छुपाने को वे हस्ताक्षर कर झट से बाहर चले गए.

मीरा ने पति के जाने के बाद कहा, "देखो मैं  कैसे सारे खेत,बगीचे वापस लाती हूँ.और उनकी चिंता और बढ़ गयी,जल्दी से अब इसकी शादी हो जाए और वो यहाँ की चिंता छोड़,अपना घर-बार संभाले.

चार-दिन रहकर, मीरा चली गयी. पर कहती गयी अब इस बार मैं नहीं आऊँगी,तुमलोगों को आना पड़ेगा. एक फ़्लैट ढूंढती हूँ. फिर मेरे साथ ही रहना...और पता है हवाई जहाज में चढ़ कर आना आप दोनों लोग"

"तेरा दिमाग तो ठीक है...हवाई जहाज में और मैं?? डर से मर ही जाउंगी..."

"अभी नहीं माँ...एकाध साल रुक जाओ बस....थोड़े पैसे जमा कर लूँ...फिर देखना...हवाई जहाज में ही सफ़र करोगी.."

"चल-चल खयाली पुलाव ना बना....मुझे लड्डू बनाने दे." वे ढेर सारा नाश्ता बना रही थीं बेटी और उसकी सहेलियों के लिए.उन्हें पता है काम से कितना थक जाती होंगी सब. कुछ घर का बना बनाया खाने को तो मिले.

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नमिता के जाने के बाद जो गम के बादल छा गए थे, वे अब धीरे धीरे छंटने लगे थे. पति ने गाँव के लोगों से मेल-जोल बिलकुल कम कर दिया था . पर अब फिर वापस मिलने-जुलने लगे थे.समारोहों में शामिल होने लगे थे. ऐसे ही जनार्दन  बाबू के बेटे की बारात में शहर गए और वापस आए तो तबियत खराब हो गयी.

थोड़ा बुखार था. गाँव के डॉक्टर को बुलाया,उसने दवाएं दीं . बच्चों को फोन पर बताने ही नहीं दिया. उन्हें भी लगा मौसमी बुखार है. डॉक्टर साहब तो हर शाम आते और उन्हें आश्वस्त करते  सिर्फ फ़्लू है, कमजोर हो गए हैं, उम्र का भी असर है इसलिए समय लग रहा है. पर जब एक हफ्ते तक बुखार नहीं उतरा तो उन्हें चिंता हुई. कहीं मलेरिया ना हो,वैसे तो गाँव में भी कम मच्छर  नहीं थे, देर शाम तक जब पति बागबानी करते रहते तो मच्छरों  का झुण्ड उनके सर के ऊपर मंडराता रहता. पर ये शहर के गंदे बजबजाते नाले पर भिनभिनाते  मलेरिया वाले मच्छर नहीं थे. पति बता रहें थे कि जहाँ बारात ठहराई गयी थी...वहीँ पर एक बड़ा सा खुला,नाला भी बह रहा था.

डॉक्टर साहब से आशंका  जताई,तो उन्होंने कहा, खून जांच करके पता कर लेते हैं. कम्पाउडर आया घर से ही जांच के लिए खून ले गया. फिर डॉक्टर साहब दूसरी दवाएं लेकर आए,बोले, मलेरिया नहीं टाइफायड है. टाइफायड के  दवा की एक कोर्स कर लेंगे, ठीक हो जाएंगे. हर बार ,उनके कुछ कहने से पहले ही पति कहते,बच्चों को मत बताना, सब नौकरी,अपने बाल-बच्चों में व्यस्त हैं.बेकार परेशान होंगे. अब उम्र हो रही है तो बीमारी-सिमारी लगी ही रहेगी. वे बहुत घबरा जातीं. पर फोन  उनके सिरहाने के टेबल पर ही रहता छुप कर नहीं कर पातीं.बच्चों के फ़ोन भी आते तो कहना पड़ता,सो रहें हैं,पापाजी.

पर एक दिन बुखार की बेहोशी में वे कुछ कुछ बोलने लगे और बार-बार नमिता को बुलाने लगे तो वे एकदम घबरा गयीं और रोते -रोते प्रकाश को फोन कर दिया.पहले तो प्रकाश बहुत नाराज़ हुआ कि उसे पहले क्यूँ नहीं बताया. फिर डॉक्टर साहब का नंबर  लिया.उनसे बात करने के बाद बोला,मैं गाड़ी लेकर आ रहा हूँ. पापा जी को शहर लेकर आना है. दूसरे दिन ही पहुँच गया. पति मना करते रहें.पर अब डॉक्टर  भी थोड़े चिंतित लग रहें थे .उन्होंने भी मना  नहीं किया वरना अब तक तो वे दावा कर रहें थे कि उनकी दवाओं से ही ठीक हो जाएंगे.

प्रकाश के आने के बाद उन्हें थोड़ी राहत हुई. उन्होंने उसे पति के  पास बिठा....फोन का तार दूर खींचकर ममता,स्मिता,मीरा सबको फोन करके बता दिया. स्मिता से कह दिया कि जरा नमिता को भी खबर कर दे,उसे पापाजी बेहोशी में याद कर रहें थे. एक प्रमोद को फोन नहीं कर पायीं.विदेश फोन करने की सुविधा इस फोन में  नहीं थी.
प्रकाश से कहा,"बेटा , शहर जाकर प्रमोद को फ़ोन कर बता देना."

"माँ, वो बिचारा इतनी  दूर है...रहने दो ना...उसे क्यूँ परेशान किया जाए"

"ना बेटा, जैसे तू नाराज़ हो गया वो भी दो बात सुनाएगा....उसे भी बता दो"

डॉक्टर  साहब ने दो सूई लगाई पति को और गाड़ी से सीधा अस्पताल ही लेकर आया प्रकाश. उन्हें भरती कर लिया  गया और उन्हें संतोष हो गया. अब सही जगह आ गए हैं,सही इलाज हो जायेगा. पता चला मलेरिया ही है. बुखार भी कम हो गया था.पर कमजोरी  बहुत थी.

ममता,स्मिता  दिन में चार बार फोन करतीं ,उनके बच्चों के इम्तहान चल रहें थे.वे भी आश्वस्त करातीं, "हाँ अब पापा जी ठीक हो रहें हैं. बच्चों की पढ़ाई देखो. "

पति सो रहें थे वे पास बैठी खडकी से बाहर देख रही थीं कि तभी लगा,दवाजे पर पड़ा परदा हिला और नज़र घुमाई तो देखा,नमिता खड़ी है.

झपट कर  उनके गले लग कर ऐसे बेआवाज़ रोई जैसे इस जनम में ,उसे मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी . नरेंद्र अपराधी सा थोड़ा दूर ही खड़ा था. वे नमिता का कन्धा थपथपाते उसे लिए  बाहर आयीं. हाल-चाल पूछते बार-बार माँ-बेटी की आँखें भर आतीं. नमिता ने फुसफुसाते हुए पूछा, "पापा जी की नींद खुल जाएगी तो नाराज़ तो नहीं होंगे.."

उन्होंने आश्वस्त किया..."ना,बेहोशी में तुझे याद कर रहें थे...खुश ही होंगे देखकर." और नमिता गीले आँखों से मुस्करा उठी.बहुत देर तक उनके पैरों की तरफ खड़े एक टक पति के चहरे पर नज़रें जमाये खड़ी रही. नरेंद्र चुपचाप पीछे कुर्सी पर बैठा हुआ था.

पति की नींद खुली और उनकी नज़र  सीधी नमिता पर पड़ी...उन्होंने एक दो बार आँखें झिपझिपा कर खोलीं,जैसे पहचानने की कोशिश कर रहें हों. फिर उनकी तरफ नज़र घुमाई.एक बार तो वे डर गयीं,फिर हिम्मत कर फंसे गले से बोलीं, " नमिता है..."

पति चुप रहें, वो दो पल की चुप्पी एक युग सी लगी.फिर उन्होंने मुस्करा कर नमिता की ओर इशारा किया और नमिता दौड़ कर कुर्सी पर बैठ उनके कंधे के पास सर रख, बेसंभाल फफक पड़ी.इस बार उसे यह ख़याल भी नहीं था कि ये अस्पताल है,जोर से आवाज़ नहीं होनी चाहिए. उसका सर सहलाते पति की आँखों के कोर भी भीग आए. उन्होंने पीछे नजर की और देखा, नरेंद्र कुर्सी पर बिना हिले डुले बिलकुल सीधा सर झुकाए बैठा था. जैसे इस दृश्य का अपराधी वह ही था. दया हो आई उन्हें उस पर, जब से आया था, मुहँ नहीं खोला था,उसने.

अब  स्थिति उन्हें ही संभालनी  थी. नमिता को डांटा ,"चुप कर अब...पापाजी की तबियत और ख़राब हो जाएगी.अभी अगर आवाज़ सुन कर नर्स आ गयी तो इनके पास बैठने भी नहीं देगी."

पति ने भी माहौल हल्का करने के लिए, मुस्कराकर  पूछा, "कहाँ है वो, तुम्हारा मोटरसाइकिल वाला डरपोक?? जैसे चुपचाप ले गया था वैसे ही तुम्हे यहाँ चुपचाप छोड़ गया है क्या??"

नमिता  आँखे  पोंछती उठ कर एक तरफ खड़ी हो गयी. उन्होंने ही नरेंद्र को बुलाया, उनके पैर छू चुपचाप सर झुकाए बिस्तर के पास खड़ा हो गया. पर पति ने शायद उसे क्षमा  कर दिया था. प्यार से बोले, "क्या हाल है बाबू...ये तुम्हे परेशान तो नहीं करती...सारा गाँव डरता था इस से....ठीक से रहती तो है तुम्हारे साथ..??"

नरेंद्र अपनी आवाज़ शायद बाहर ही छोड़ कर आया था,सिर्फ मुस्करा कर सर हिला दिया. उनके कलेजे से एक बोझ उतर गया. रोज इस क्षण के लिए भगवान से प्रार्थन की थी और आज वह साकार हो गया. मन ही मन धन्यवाद कहा अपने गिरधर गोपाल  को.

शाम को प्रकाश और बहू आए तो नमिता को देख चौंके....फिर साथ चलने पर जोर डालने लगे.पर नमिता नहीं मानी. उसे अस्पताल में ही रहना था. नरेंद्र को ले गए साथ.और अब नमिता ने जैसे बाबू जी की बीमारी में सारी जिम्मेवारी अपने सर ले ली थी वैसे ही यहाँ भी सारा भार उठा  लिया. नर्स के साथ लगी रहती,चादर  ठीक करना कपड़े बदलवाना, फल काट कर के देना, सब कुछ करती. बुखार कम हो रहा था,पर डॉक्टर  कहते कुछ दिन रहना पड़ेगा अस्पताल में क्यूंकि मलेरिया बहुत ज्यादा बढ़ गया था. खून की बहुत कमी हो गयी है.

ममता,स्मिता भी आ गए.प्रमोद भी रोज फोन पर बात करता और नाराज़ होता,"कैसे डॉक्टर हैं गाँव के..पढाई नहीं की क्या??....खून जांच करवाया तो कैसे मलेरिया नहीं पता चला??...इनलोगों को इतना तक पता नहीं कि बुखार में  ही खून जांच के लिए लेते हैं,तभी  मलेरिया के कीटाणु खून में आते हैं अन्यथा नहीं. जहाँ दो गोली में पापाजी ठीक हो जाते, इतना समय लग रहा है और..इतनी तकलीफ सहनी पड़ रही है..." फिर थोड़ा रुक कर कहता.."मैं भी आ रहा हूँ "

उन्हें एकबारगी लगता वो अपने पिता को देखने आ रहा है या उस डॉक्टर कि खबर लेने. करने.

सारे बच्चे परेशान थे , पति एक अनुशासित दिनचर्या के आदी थे. रोज घूमने जाते ,सात्विक भोजन करते. अब तक कभी दो दिन से ज्यादा बीमार नहीं रहें. और अस्पताल में भरती होने की तो यह पहली घटना थी. मीरा को छुट्टी नहीं मिल रही थी.अस्पताल में रोज फोन कर देर तक नमिता से बातें करती. और अफ़सोस  करती कि सारे भाई-बहन जमा हैं और वो ही नहीं आ पा रही. सब उसे समझाते..'फिकर ना करो..हम सब यहाँ हैं"

पर अब पति ठीक हो रहें थे, शारीरिक रूप से भी और मानसिक निश्चिन्तता भी फैली रहती चेहरे पर. ममता,स्मिता भी अब लौटने की तैयारी कर रहें थे. ऐसे में ही, एक रात नमिता उनकी चादर ठीक करने उठी और जोर से डॉक्टर....डॉक्टर चिल्लाती हुई बाहर भागी. उनका किसी आशंका से मन काँप गया और जैसे काठ मार गया उन्हें. वे हिली तक नहीं. बस जड़ बनी देखती रहीं, कई डॉक्टर नर्स सब जमा हो गए...जल्दी से कुछ मशीन लाये गए पर ममता के पापाजी...नींद में ही शान्ति से इस दुनिया से विदा हो गए.

सब लूटे-पिटे से गाँव आ गए.बस प्रमोद और मीरा उनके अंतिम दर्शन नहीं कर सके. प्रमोद दो दिन बाद आया और रोता रहा, "क्या फायदा मेरे डॉक्टर  बनने का, वहाँ मैं अपना सुख-चैन,नींद खोकर गैरों का इलाज़ करता हूँ और यहाँ मेरे पिता का गलत इलाज़ होता रहा."

मीरा जैसे पत्थर की हो गयी थी. विश्वास ही नहीं कर पाती. उसे अभी अपने पापाजी के लिए कितना कुछ करना था और वे यूँ चले गए. सारे काम वही देख रही थी. ममता.स्मिता बहुत पहले ही गाँव से जा चुकी थीं, उनके समय काम करनेवाले सब बूढे हो गए थे. उनके बेटे-बेटियों को वे लोग अब नहीं पहचानती थीं. प्रकाश-प्रमोद ने तो गाँव में रहकर भी अपने पढ़ाई के सिवा और कुछ नहीं जाना. नमिता उनका साथ एक पल को नहीं छोडती. कमरे में वे बैठी होतीं और उनके एक तरफ नमिता और एक तरफ प्रमोद,सारा सारा दिन उनका हाथ पकड़ बैठे रहते. मीरा बेचारी अकेली गोपाल जी के साथ सारा इंतजाम देखती. प्रकाश भी उसकी सलाह से ही कुछ करता.

उनके लिए तो समय रुक गया सा लगता. इतने वर्षों से सुबह उठ पति को दातुन देने  और चाय बनाने के साथ..जो दिन शुरू होता वो..रात में पानी का ग्लास रखने के साथ ही ख़त्म होता. अब वे क्या करेंगी..अपने दिन और रात का.

फिर भी बच्चों का मुहँ देख, अपना दुख अंदर ही पी लेतीं. रात में भी नमिता और प्रकाश तो उनके साथ बने होते. प्रकाश,मीरा और गोपाल जी लालटेन की रोशनी में ,किस दिन क्या करना है,भोज के लिए क्या क्या तैयारियाँ करनी हैं,सबकी रूप-रेखा बनाते रहते. दोनों ननदें, ममता,स्मिता और दोनों बहुएं बच्चों के साथ आँगन में चारपाइयों पर बैठी होतीं या फिर छत पर चटाइयाँ बिछा जमी होतीं. बातों के बीच कभी कभी उनकी हंसी भी सुनाई दे जाती. आखिर इतने दिनों बाद सब मिली थीं...कोई बात हंसी वाली भी हो जाती होगी. पति ऊपर से देख,प्रसन्न ही होते होंगे...अपने पीछे एक बहरी-पुरी हंसती-मुस्कुराती दुनिया छोड़ कर गए हैं.

सारा कुछ निबट गया, दूर के रिश्तेदार,गाँव के लोग,स्कूल के शिक्षक-छात्र ,सब जमा हुए. आँसू भरी आँखों से सबने पति को याद किया.वे वैसे ही पत्थर बनी सबके शोक सन्देश स्वीकारती रहीं.

अब बच्चे अपने अपने घरौंदों में लौटने वाले थे. प्रकाश,मीरा,नमिता सब आपस में बहस कर  रहें थे ,माँ मेरे साथ जाएगी,नहीं मेरे साथ जायेगी. प्रमोद चुप था,बोला ,"दो महीने बाद तो माँ को मैं ले जाऊंगा...अभी माँ की मर्जी,जिसके पास रहें." और उन्होंने अपनी मर्ज़ी सुना दी कि अभी तो कुछ दिन गाँव में ही रहेंगी,फिर जबतक मीरा कि शादी नहीं हो जाती,उसके साथ ही रहेंगी.

पर मीरा नमिता ने गुपचुप प्लान बनाया और नमिता गाँव में ही रुक गयी.फिर पंद्रह दिनों बाद मीरा वापस पहुँच गयी, "माँ..दीदी ,कबतक तुम्हे अगोर कर बैठेगी.उसे अपनी गृहस्थी देखने दो और मेरे साथ चलो,मैने घर ले लिया है"

"मैने कब रोका है इसे...ये खुद अपनी मर्जी से यहाँ है....."

"तुम्हे हम अकेला कैसे छोड़ सकते हैं...तुम मीरा  के साथ जाओ..जरा देखो लड़की कितनी दुबली हो गयी है...उसे ठीक से खाना-वना खिलाओ.." नमिता बोली.

वे कुछ नहीं बोलीं और मीरा के साथ शहर आ गयीं. खाना-वाना खिलाना तो एक बहाना था,यह दोनों बहनों की मिलीभगत थी, उन्हें मीरा के साथ लाने की. मीरा ने एक कामवाली रखी थी जो सारे काम किया करती. मीरा ने ऑफिस से आते ही हाथ मुहँ धोया और एक किताब जैसी बड़ी सी मशीन खोल ली.उन्होंने टोका..."सारा दिन तो काम किया करती है...अब तो आराम कर ले"

"माँ, ये काम नहीं है....पास आओ तुम्हे कुछ दिखाती हूँ. और उनका चश्मा उठा कर ले आई,जरा इसे पहनो और देखो अपने बहू बेटे को...और सिनेमा जैसे  उस छोटे से सफ़ेद परदे पर प्रमोद, पूजा और उसकी बिटिया की कई तस्वीरें देखीं.फिर मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "भैया की कविता सुनोगी?"

"कविता...और प्रमोद....??" उन्हें विश्वास नहीं हुआ.

"हाँ, माँ...भैया का एक ब्लॉग है...वह उसपर कविताएँ लिखा करता है.." फिर हंस पड़ी..."चाहे उस बरगद के पेड़ के नीचे कभी ना बैठा हो...नहर के किनारे ना घूमा हो...कुएँ के जगत पर बैठ चाँद ना निहारा हो.. ...पर इन सबपर  कविताएँ लिखी हैं....गाँव का एक एक कोना उतर आया है उसकी कविता में...कभी कभी अपने मन की बातें भी लिखता है....अपने देश की मिटटी को बहुत याद करता है, माँ...पर वहाँ का ऐशो आराम भी नहीं छोड़ना....दोनों हाथों में लड्डू कैसे मिलेंगे....."

मीरा और पता नहीं क्या क्या कहती रही...पर उनका मन तो एक ही बात पर अटक गया. उनका छोटे...कविताएँ लिखता है??...और उन्हें पता नहीं??. अपने बच्चे की बातें ही उन्हें नहीं पता??...इसे समझ नहीं....अभी उम्र छोटी है इसलिए हंस रही है...अपनी मिटटी से दूर रहना क्या होता है...इसे क्या पता?

वे  तो चार दिन में ही ऊब गयी थीं.सारा  दिन कमरे के भीतर. खुली हवा को तरस जातीं. मीरा दिन में तीन बार फोन करती.ऑफिस से आते ही उन्हें पार्क में लेकर जाती. शनिचर -इतवार मंदिर  के दर्शन के लिए ले जाती. पर वे पीली पड़ती जा रही थीं. शिकायत नहीं करतीं कुछ. आखिर बिटिया भी अकेली है...ऑफिस से आने के बाद कोई दो बात करने को तो है,उसके पास.

पर मीरा उनकी क्षीण पड़ती काया  और मायूस  चेहरा देख समझ गयीं...उनका यूँ सारे दिन अकेला इस शाहर में रहना मुश्किल है. खुद ही बोली..."चलो तुम कुछ दिन गाँव रह आओ..वहाँ दिन भर लोगों का आना-जाना रहेगा तो मन लगा रहेगा....तुम्हारा मन तो वहाँ  के पेड़ ,पौधे , खेत खलिहान ही बहला देंगे. "

"पर तू अकेले...ना मैं ठीक हूँ...तेरा अकेले रहना मुझे नहीं जमता..."

"उसकी फ़िक्र ना करो...एक अच्छी सी सहेली है...उसे बुला लेती हूँ...पर हाँ...अपना ख़याल रखना , ठीक से खाना-पीना वरना फिर ले आऊँगी यहीं."

और मीरा  उनके  साथ गाँव आई..सिवनाथ माएँ,कलावती...गोपाल जी सबको समझा गयी कि उसका ख़याल कैसे रखें. रमेसर को रात में ओसारे  पर सोने की ताकीद कर गयी. और दादी अम्मा रोज फोन कर सारी रिपोर्ट लेती.

रमेसर का नाम आते ही जैसे वह चौंकी....आँगन की तरफ देखा तो पाया, चांदनी ख़तम हो, अब सुबह का उजास फ़ैल रहा था. ओह सारी रात वह बैठी ही रह गयीं? हाथ में रखे मोबाइल पर नज़र गयी और हडबडा गयीं. जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाएँ .वरना नींद खुलते ही मीरा फोन करेगी और जो नहीं उठाया तो गाँव आ धमकेगी और जिद करेगी, "मेरे साथ चलो,माँ"

समाप्त

31 comments:

mukti said...

आज तो आपने रुला दिया. कुछ नहीं कह सकती. अंत बहुत अच्छा लगा.

Himanshu Mohan said...

बहुत ख़ूब। कुछ मोड़ उम्मीद के मुताबिक, तो कई अनसोचे घुमाव। समाप्त तो हुई - पर क्या वाकई समाप्त हुई? शायद इस अध्याय का पटाक्षेप हुआ। मगर ज़िन्दगी का ये मोड़ - जो फ़ोन के आतंक और अपनत्व से सहमा हुआ जी रहा है, सारी कथा फ़्लैश-बैक में ही……
उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद, जो जी लिया - उसके भी बाद - उसके बरसों बाद - एक और कहानी पूरा आकार ले लेती है - जब अपनी विदा का समय आता है। जब अपनी तैयारी शुरू हो जाती है, जब यह कहते नहीं बनता कि अभी और जीने की इच्छा शेष है, और यह भी सहते नहीं बनता कि अपने हाथों अपनी पैकिंग की जाय - सबसे लम्बी यात्रा के लिए।
भरे-पूरे घर में सबके साथ सदा रहकर जो जीवन का अन्तिम उद्देश्य ही लिप्ति में पा सके - उसे इससे आगे किसी वैराग्य से क्या…?
मगर बहुत सुन्दर!
मजबूर किया आपकी लेखनी ने फिर - कुछ अगड़म-बगड़म अपने भाव व्यक्त करने को। यही लेखनी की ऊर्जा और सफलता है कि पाठक सह-जीवन के लिए मजबूर हो जाए - अपनी कथा के पात्रों से। सीरियल लेखिका हैं आप, मगर टीवी पर जहाँ एपिसोड-दर-एपिसोड बोर करने के बाद भी खींचते जाते हैं - उसके विपरीत आप ने एकाएक तनी हुई पतंग - खींच-खाँच-कर, उतार कर, लटाई लपेट कर धर दी।
अब आओ - देखो सूना आसमान - देखें अगली पतंग कब उड़ती है………

मुदिता said...

rashmi ji...

namita ke milan ne to rula diya....bhavon ki kya gazab abhivyakti ki hai aapne....ek lamba saans chhod ke ye ehsaas kachot raha hai ki kahani samapt ho gayi...

bahut badhayi...ek sashakt kahani ke liye

ashish said...

जीवन के तानो-बानो, सुख -दुःख, हर्ष -विषाद , रीतियों-कुरीतियों के हर पहलू पर आधारित ये कहानी अपने अंतिम सोपान पर पलके भिगो गयी .ग्राम्य जीवन कि सरलता , शहरी जीवन से तारतम्य बिठाने की प्रवीणता , माँ की ममता, पिता की जीवटता , औलादों के सुखमय जीवन की चाह के लिए माता पिता का सपने का साकार होना, सभी कुछ तो था कहानी में. . कहानी से जुड़ गए थे .नमिता का अपने पिता से अंतिम मिलन के क्षण नेत्रों को अश्रु पल्लवित कर गया.. एक बृहत् कैनवास वाली कहानी का अंत भी लुभा गया . कुछ खट्टी , कुछ मीठी यादो को साथ छोड़ गयी ये कहानी. धन्यवाद.

kshama said...

Dekhte hee dekhte kahani khatm ho gayi...ab kuchh din ek soonapan ghere rahega...paatr yaad aate rahenge...is kishtne baar,baar aankhen nam kar deen!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अंतिम कड़ी ने मन भिगो दिया ....सब कुछ बहुत सहजता से समेटा है...जीवन की धूप छाँव सबका मिश्रण किया है ....बहुत सुन्दर प्रस्तुति .....

राज भाटिय़ा said...

ऎसा भी होता है.............कभी कभी हम उन से अंतिम समय मै मिल भी नही पाते, जिन्हे बहुत चाहते है.....बहुत भावुक कर दिया आप ने आज

दीपक 'मशाल' said...

मैं कुछ नहीं बोलूंगा आज.. बहुत गुस्सा हूँ.. हद है कमेन्ट चोरी की भी.. :(

वाणी गीत said...

मीरा के चरित्र ने बहुत प्रभावित किया ...कितने बच्चे होते हैं जो इस तरह सोच पाते है अपने माता पिता के लिए ...
आखिरकार नमिता लौटी ...पिता ने माफ़ किया ...अच्छा लगा ...ये भी गनीमत है कि माफीनामा जल्दी मिल गया ...वरना उम्र के लम्बे पड़ाव के बाद माफ़ी इतना महत्व नहीं रखती ...जो समय खो जाता है ..वापस नहीं आता ...
प्रमोद को दुःख सालता रहेगा उम्र भर ...आखिरी समय में पिता के पास ना होने का ...और डॉक्टर होकर खुद पिता का इलाज़ नहीं कर पाने का ...
नम गीली आँखों से कुछ- कुछ सुखांत सी कहानी पढ़ी तुम्हारी ...
तुमसे ऐसे और उपन्यासों की दरकार है ...!

सारिका सक्सेना said...

पता नहीं मन भरा था कि क्या बस जार जार रोना आया आज ये समापन किस्त पढकर. अच्छी समाप्ति हुई है. कई लाइनो ने बहुत प्रभावित किया:
बुढापे में सबलोग एक जैसी ही बातें और एक जैसा ही व्यवहार करते हैं.

अपनी मिटटी से दूर रहना क्या होता है...इसे क्या पता?

प्रमोद के ब्लाग का जिक्र भी खूब रहा.

Sadhana Vaid said...

आशानुरूप अंत था ! कहानी बहुत प्रभावित कर गयी ! नमिता को पिता से माफी मिल गयी तो लगा कि मन से एक बड़ा बोझ उतर गया ! पिता की बीमारी के समय सभी बच्चों का आत्मीयता भरा व्यवहार और माता पिता के प्रति उनकी निष्ठा मन को भिगो गयी ! कहीं मन में संतोष हुआ कि इतने अच्छे माता-पिता के संस्कार झूठे नहीं हो सकते थे सो आपने उन्हें वैसा ही निभाया भी ! कहानी का समापन आपने बहुत अच्छा किया है ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

रश्मि प्रभा... said...

jaise taise kahani khatm ki n? meri hichkiyaan bandh gain , shukra hai...shabd dhulne se bach gaye

shikha varshney said...

आज तो कुछ नहीं कहा जा रहा ..न जाने कितनी बार आँखें भीगीं ...हाँ अंत बहुत ही अच्छा लगा.

Mukesh Kumar Sinha said...

ek achchhi kahanai.........jiska ant jayda achchha laga!!

वन्दना said...

अरे सबने तो सब कुछ कह दिया अब मेरे लिये तो कुछ बचा ही नही फिर भी इतना जरूर कहूँगी इस कहानी के माध्यम से आपने एक जीवन के हर उतार चढाव को जिस तरह प्रस्तुत किया है वो काबिल-ए-तारीफ़ है कभी भी ऐसा नही लगा जैसे कहानी हो बल्कि यूँ लगा जैसे आस पास ही तो घटित हो रहा है।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही संवेंदन शील और भावुक रचना, बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Mired Mirage said...

कहानी का अन्त चाहे मृत्यु के साथ हुआ सुखद था। नमिता को माफी नहीं मिली, पिता को मिली। नमिता का माँ, बहन से फिर से मिलना जुलना बहुत अच्छा लगा।
एक सुन्दर कथा की सफल समाप्ति के लिए बधाई।
घुघूती बासूती

प्रवीण पाण्डेय said...

अन्त बहुत अच्छा लगा। अब एक बार सुकून से बैठकर पूरी पुनः पढ़ी जायेगी।

शोभना चौरे said...

रश्मिजी
तीन बार में कहानी पढ़ पाई नमिता, मीरा ,सारा परिवार ही अपने आसपास महसूस किया |भाई बहनों का दूर होकर एक साथ मिलना रहना भारतीय परिवार की कभी न टूटने वाली परम्परा का प्रतीक है |जिसे आपने बड़ी ही कुशलता से
शब्दों में ढाला है और शब्द और भावनाओ ने तो आँखे ही नम कर दी |बहुत सुंदर सुखांत किया कहानी का |
बहुत सुन्दर लेखनी |

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कहां-कहां से घूमती हुई कहानी अपने अन्तिम पड़ाव पर आ पहुंची और हमें पता भी नहीं लगा. सुन्दर अन्त किया है कहानी का. सफल लघु-उपन्यासिका के लिये बधाई.

शुभम जैन said...

aaj kafi dino baad blog chek kiya to dekha lo ye to kahani ka anat bhi ho gya lekin wakai di bahut hi achchi lagi ye samapan kadi...ab aap wapas mumbai aaiye to ek nayi kahani shuru kariye...:)

शोभना चौरे said...

mera cment gayb ho gya

रवि धवन said...

बढिय़ा लगी कहानी। आपकी अनुमति हो तो प्रिंट निकालकर अपने मित्र को पढ़ा सकता हूं इसे।

रेखा श्रीवास्तव said...

पूरी कहानी का सर पढ़ लिया और अंत बहुत ही अच्छा रहा, नमिता के लिए खाली कोना लिए पिता न चले गए , सब कुछ एक पूर्णता का आभास देने वाला. कहानी की तारीफ करने जैसे मेरे पास शब्द नहीं हैं.
--

जयकृष्ण राय तुषार said...

very nice

Vijay Pratap Singh Rajput said...

बहुत सुन्दर

Manoj K said...

कहानी पूरी पढ़ ली है, आज ही आपके ब्लॉग पर आया हूँ, बहुत अच्छा लगा.. लगता है पहले आता तो और अच्छा रहता.

कहानी की समापन किस्त बहुत ही बढ़िया . बिटिया ने माँ को लैपटॉप पर भाई का फोटो और ब्लॉग दिखाए. बहुत ही सुन्दर चित्रण.

आभार
मनोज खत्री

Sanjeet Tripathi said...

कहानी का अंत और भी बढ़िया लगा. लेकिन ऐसा लगा जैसे यहाँ पर कहानी ख़त्म नहीं हुई बल्कि इसे और भी आगे बढाया जा सकता है... कभी समय मिले तो आगे लिखियेगा

Divya said...

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@--हाँ, जब मुश्किल में पड़ जाओ,सवालों से घिर जाओ...तो बस..."नहीं समझोगी..खाना लगाओ ...

"जब समझा नहीं पाते तो कहते हैं .. " नहीं समझोगी "॥

बहुत सुन्दर कहानी लिखी आपने। पिछले एपिसोड्स पढने में समय लग गया । हमेशा की तरह शानदार और जानदार लिखा है आपने, संजीत जी से सहमत हूँ, इसे और आगे बढाइये।

अभी न करो ख़तम इसे, की दिल अभी भरा नहीं....

आपकी संवेदनशीलता और imagination को नमन ।
.

Saurabh Hoonka said...

हमेशा की तरह पहली किस्त से आखिरी तक.... मुझसे इंतज़ार सहन नहीं होता, इसलिए दिल पे पत्थर रख कर अंतिम किस्त क़ी प्रतीक्षा करता हूँ | दी, रुलाने क़ी कला तो आपमें है ही, लेकिन बेहद ही संवेदनशील कहानी थी ये, मानवीय रिश्तो को एक धागे मै कैसे पिरोया जाए,ये आप से सीख रहा हूँ. वैसे तो पूरी कहानी बेहद अच्छी थी, लेकिन कुछ संवाद दिल को छू गए, जैसे मीरा का बिना किसी शिकायत के चुपचाप सारा काम करना, नमिता का घर से भाग जाना (वैसे सच कहू तो उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी, मुझे लगा वो माँ का ख्याल रखेगी ), और अंत मै मीरा ने दिल जीत लिया, वैसे एक बात याद आती है मुझे , जब मै कॉलेज मै था, तो हमेशा अपना शो सबसे आखिर मै रखवाता था, क्यूकि मेरा मानना था क़ी आखिरी क़ी चीज़े दिमाग मै हमेशा याद रहती है, मै हमेशा फर्स्ट prize जीता और यहाँ भी
मीरा ने बाज़ी मार ली. कुल मिला के भावनाओ के उतार चढाव वाली एक बेहतरीन कहानी थी ये. अपने आप को काफी खुशनसीब मानता हूँ, क़ी मै आपके समकालीन युग का हूँ. इतिहास मै आपकी रचनाओ के साथ मेरा भी नाम दर्ज हो जाएगा................. :)
आपका नोना काका
सौरभ

Pankaj Praveen said...

प्रणाम

आज ऑफिस में फ्री होने के कारण इंटर नेट पर मन बहलाने के लिए कहानिया ढूढ़ रहा था तब तक आप के पेज पर नजर पद गया ..दो -तीन एकल कहानिया पढने के बाद इ लम्बी कहानी पढना शुरू किया और शुरुवात से अंत होने तक बस पढता ही गया..

अब कहानी के विषय में टिप्पड़ी करना मेरी गुस्ताखी होगी...

-पंकज प्रवीण
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