Monday, August 2, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -13)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर, उसके  विदेश चला गया. तीसरी बेटी नमिता ने दूसरी जाति के लड़के से घर से विरोध होने पर,घर से भागकर शादी कर ली)

गतांक से आगे

नमिता के जाने के बाद घर बिलकुल भुतहा लगने लगा था. लोगों का आना-जाना वैसे ही कम हो गया था. ये दोनों बाप-बेटी किताबों में खोये रहते. ना घर में रेडियो पर  गाने गूंजते और ना टी.वी. चलाने का ही किसी को शौक था. अक्सर बैटरी चार्ज करने का ही ध्यान नहीं रहता. वे ही याद करके मीरा को बोलतीं, तो लगा देती चार्जर या फिर भूल जाती. ज़िन्दगी ठहर गयी सी लगती थी. ममता और स्मिता जब विदा होकर गयीं  तो उनके बाकी बच्चे छोटे थे, अम्मा-बाबूजी भी जिंदा थे, काम में बेटी का विछोह भूली रहतीं.

पर अब तो चारो तरफ उन्हें नमिता ही दिखती. कभी सीढियों से उतरती हुई, कभी तेज तेज हैंडपंप चला चेहरे पर छींटे मारती हुई तो कभी चारपाई पर लेटी तारों में जाने क्या खोजती हुई सी...जब दुबारा फिर देखती, तो सूनी सीढियाँ,शांत हैंडपंप और खाली चारपाई ही नज़र आती. अंदर के सन्नाटे  से घबराकर बाहर देखती तो एक बार लगता जैसे, अमरुद के पत्तों  के बीच कोई लाल रिबन झाँक रही है, फिर ठंढी सांस भर कर रह जाती,पता नहीं शहर में कैसी होगी,उनकी बिटिया इन पेड़-पौधों , खेत-खलिहानों के बिना.

पर एक दोपहर स्मिता का फोन आया. वे डर ही गयीं क्यूंकि स्मिता तो हमेशा ,रात ग्यारह के बाद ही फोन करती थी,तब पैसे कम लगते थे. भरी दोपहर को  फोन किया कुछ अघटित तो नहीं घट गया.मन आशंका से काँप उठा. स्मिता ने  धीरे से पूछा, "कोई आस-पास तो नहीं?" उनके 'ना' कहने पर उसने ख़ुशी से चीखते  हुए बताया, "माँ,नमिता का फोन आया था, नरेंद्र  ने भी बात की. नमिता बहुत रो रही थी...सबका हाल-चाल पूछ रही थी..... दोनों ठीक है, गृहस्थी बसा ली है. मुझे बुलाया है...मैं तो यहाँ नहीं बुला सकती..मेरे सास-ससुर हैं पर मैने संजीव से बात की, वे  मान गए हैं....जाकर एक बार दोनों को देख आउंगी"

उनकी आँखों से आँसू बह चले, चलो ठीक है लड़की. अब स्मिता से उसकी खबर मिलती रहेगी.

उनका चेहरा ख़ुशी से इतना  खिला-खिला था कि शाम को पति ने भी दो बार नज़रें उठा कर देखा,पर वे जल्दी से किसी काम में लग गयीं.
रात में चुपके से मीरा को बताया वो भी बहुत खुश हुई...'माँ कुछ दिन बाद पापा जी का गुस्सा शांत हो जायेगा तब दीदी घर आ  सकेगी, ना ?"

"क्या पता बेटा...." एक गहरी सांस ली उन्होंने. पति तो कभी नाम भी नहीं लेते उसका. और जो बातें उन्होंने नमिता को फोन पर बोली हैं, कैसे बताएं इस नन्ही लड़की को जो बातें बस बड़ी बड़ी करती है.

नमिता के जाने के बाद मीरा भी  बहुत अकेली पड़ गयी थी. गाँव में ,कॉलेज में, यूँ भी उसका कोई दोस्त और सहेली नहीं थे. सब उस से थोड़ी  दूरी रखते थे. हमेशा फर्स्ट आती क्लास में. टीचर्स भी बोलते कि ये तो प्रकाश,प्रमोद से भी ज्यादा तेज है. अंग्रेजी की  किताबें  धडाधड पढ़ जाती , स्कूल, कॉलेज  में कोई जरूरी चिठ्ठी लिखवानी हो तो शिक्षक भी उसे बुलाते, लिखने को. टी.वी. पर देर रात तक वो अंग्रेजी की बहस देखा करती.

सिवनाथ माएँ,कलावती सब उसे टोकती रहतीं..."क्या करोगी इतना दिन-रात पढके?...सादी  के बाद तो रोटी पकाने  और बच्चे ही संभालने होंगे...उहाँ ई किताब का ज्ञान काम नहीं आएगा.."

मीरा सिर्फ हंस देती.."तुम देखो, काकी मैं क्या क्या करती हूँ...."

"बस बिटिया भगवान जिंदा रखें...तुम्हारे बच्चे खिला लूँ,गोद में...फिर ले जाए, जमदूत "

"चुप रहो.....भरी सांझ को क्या बोल रही हो.." वे टोक देतीं,पर देखती सचमुच कितनी बूढी लगने लगी
हैं..उनसे २,३ साल ही बड़ी होंगी. इनलोगों की १२,१३ वर्ष की  उम्र में तो शादी हो जाती, १४-१५ साल में माँ बन जातीं, फिर कड़ी मेहनत और रुखा सूखा खाना , ३० में ही बुढ़ापा आ घेरता और ५० तक पहुँचते पहुँचते झुरकुट बुढ़िया लगने लगतीं.

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मीरा के बी.ए.के इम्तहान हो गए फिर भी वह पढ़ाई में वैसे ही गुम रहती, अब प्रकाश उनलोगों के अकेलेपन का ख़याल कर कभी कभी घर आने लगा था. उसके बच्चों को गाँव बहुत अच्छा लगता. इतनी खुली जगह...दौड़ने खेलने की छूट, पढ़ाई से छुट्टी, बहुत भाती उन्हें. बेटा राज़, तो अपने लाये खिलौनों को हाथ भी नहीं लगाता और टूटी टहनी, रस्सी के टुकड़े, टोकरी किन किन चीज़ों से वह नए नए तरीके से नहीं खेलता. एक लकड़ी के टुकड़े पर रस्सी बाँध किसी ऊँची जगह पर चुपचाप बैठ जाता.वे पूछतीं,

"यूँ अकेले चुपचाप बैठकर क्या कर रहा है??"

तो कहता,"फिशिंग कर रहा हूँ "

वे नहीं समझ  पातीं तो प्रकाश हँसता हुआ समझाता, "माँ, वो मछली मार रहा है"

" राम राम...ये कौन सा खेल है...यही बनेगा क्या बड़ा होकर"

"माँ, लोग शौक से भी मछली मारते हैं .."

"शौक से क्यूँ..."

"वो सब छोडो बताओ खाने  में क्या है...." प्रकाश बस जैसे खाने और सोने को ही आता. शहर की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से दूर यहाँ बहुत सुकून मिलता उसे. शाम होते ही छत पर चला जाता और एक चटाई पर लेट आकाश देखता रहता.

बिटिया 'रिनी' सारे घर में ठुमक ठुमक घुमा करती.जब वे रात में  उसके पैरों में तेल लगा मालिश करती हुई उसे राजा-रानी और परियों की कहानी  सुनातीं.तो वह अपनी नींद भरी आँखें खुली रखने की कोशिश करती रहती."अब सो जा,कल सुनाउंगी  कहानी,"कहने पर भी वो अपनी अधमुंदी आँखों से ही 'ना' का इशारा करती.

 एक प्रीति का मन शायद उतना नहीं लगता पर बच्चे जिद करते.."...मम्मा कुछ दिन और यही रहेंगे"  और उसे रुकना  पड़ता. वह भी मीरा की किताबें उलट पुलट करती रहती और मीरा से ही बातें करती रहती.

मीरा के बी.ए.का रिजल्ट आया और वह कॉलेज में ही नहीं,यूनिवर्सिटी में प्रथम आई. मीरा को भी विश्वास नहीं होता. बार-बार कहती, "अच्छे नंबर मिलेंगे ये तो सोचा था पर फर्स्ट क्लास फर्स्ट ...ये नहीं सोचा था कभी"

पति भी बड़े खुश थे,बड़ी सी हंडिया में रसगुल्ले लेकर आए और बहुत दिनों बाद शाम को कुर्सी निकाल अहाते में बैठे.

कॉलेज में भी सारे प्रोफ़ेसर बड़े खुश थे. उन्होंने कॉलेज के वार्षिक उत्सव में  मीरा को पुरस्कार देने की योजना बनायी.... माता-पिता दोनों को बुलाया. वे तो कभी जानने वालों के  सामने यूँ मुँह उघारे  नहीं गयीं.उन अजनबी लोगों के बीच कैसे बैठेंगी? उनके तो पैर काँप रहें थे.

पति से कहा तो उन्होंने घुड़क दिया, "क्या गंवारो जैसी बातें कर रही हो...इतनी उम्र हो गयी....बेटा विदेस में,बेटी मुंबई में और तुम्हे डर लग रहा है??"

"मन हुआ कहें..सारी उम्र तो गाँव में रहीं तो शहरियों  जैसी बातें कैसे करेंगी....और उम्र से डर का क्या रिश्ता?"...पर चुप रहीं.

मीरा उनकी घबराहट भांप गयी. और काफी देर तक उनका हाथ पकड़ कर बैठी रही. थोड़ी देर में वे भी सहज हो गयीं और कार्यक्रम का आनंद लेने लगीं. जब मीरा के नाम की घोषणा के साथ प्रिंसिपल ने उसकी तारीफों के पुल बांधे तो आँखें भर आई उनकी. कभी कभी कितना धोखा दे देती हैं, आँखें. दुख हो,सुख हो, नाराज़गी हो  ,बेबसी हो , गर्व हो जब देखो भर आती हैं.

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प्रकाश, अब जब घर आने लगा था तो उन्होंने मीरा के लिए लड़का देखने की बात उसी से कही. कहने लगा ,"माँ अब जमाना बदल रहा है...मीरा इतनी तेज़ है पढने में...आगे पढना चाहती है...पढने दो,नौकरी करने दो....फिर देखेंगे उसके लिए लड़का...आजकल अच्छे लड़के भी खूब पढ़ी लिखी लड़की ही चाहते हैं जो जरूरत पड़ने पर नौकरी कर घर भी  संभाल सके."

यह नई बात थी उनके लिए,पर जब पूरा घर ही एकमत है तो वे क्या  कह सकती थीं. पति भी बेटे की हाँ में हाँ मिलाते रहते. जैसे अपनी जिम्मेदारियां उसके सर पर डाल निश्चिन्त हो गए हों. रिटायर होने के बाद, पूरा ध्यान बागवानी में ही रहता. नई नई किस्मों के फूल और अलग-अलग सी सब्जियां लगाते. कुछ सब्जियां तो तो उन्हें बनानी  भी नहीं आतीं . किताबों में पढ़कर मीरा  बताती, कैसे बनाते हैं.

अब बस किताबें ही उसकी साथी थीं. कुछ बिजनेस मैनेजमेंट करेगी,ऐसा कहती .वे समझ नहीं पाती,पढ़-लिख कर कैसे बिजनेस करेंगे. कुछ खरीदने -बेचने के लिए पढ़ाई की क्या जरूरत...पर होगा  कुछ.  नए जमाने की बहुत सारी बातें उन्हें समझ में नहीं आतीं. प्रकाश मोटी मोटी किताबें भेजता रहता उसके लिए. डाक से भी कुछ कागज़-पत्तर आते. कहती डाक से कोचिंग कर रही है. अब पढ़ाई भी चिट्ठी-पत्री से  शुरु हो गयी. अब इसी ज़िन्दगी में पता नहीं और क्या क्या देखेंगी वे.

मीरा परीक्षा देने शहर गयी. रिजल्ट आया तो पता चला उसका अच्छे कॉलेज में चयन हो गया है. वे डर रही थीं.अब उसे हॉस्टल में रखने का खर्चा कहाँ से आएगा??. बेटों  के सामने मुहँ तो नहीं खोलना पड़ेगा?? पर मीरा ने पहले से ही  सब कुछ तय कर रखा था.प्रकाश से बात कर ली थी और उसके शहर के कॉलेज में ही एडमिशन लिया. वह प्रकाश के घर ही  रहने वाली थी. उनकी छाती से चिंता का बोझ उतर गया. लड़की बड़े भाई की सुरक्षा में रहेगी.अब और क्या चाहिए.

मीरा के जाने के बाद तो अब घर काट  खाने को दौड़ता. वे भी पति के पीछे पीछे बागवानी में रूचि लेने लगीं. सुबह घंटा भर रामायण पढ़तीं पर फिर भी समय काटे नहीं कटता. पहले सारा दिन बच्चों को घर फैलाने के लिए डांटा करती थीं.अब एक बार सहेज देतीं तो हफ़्तों चीज़ें वैसी ही संभली हुई रहतीं. बस धूल की परत जमा होती रहती,उसे झाड़ते हुए आँखें फिर एक बार लबालब हो जातीं.

बस फोन की घंटी का इंतज़ार होता. रोज़ किसी ना किसी बच्चे का फोन आ ही जाता. फिर भी नमिता की आवाज़ सुनने को कान तरसते रहते......पर उसने भी पिता की डांट को दिल पे ले लिया था. भूले से भी कभी कोशिश नहीं करती, या फिर डरती थी कि कहीं फिर से पिता ही ना फोन उठा लें...जो भी हो पर इन  पिता-पुत्री के अहम् के पाट के बीच  एक माँ का दिल पीसा जा रहा था.

इस बार फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ...नन्ही 'रिनी' थी . उसका जन्मदिन आ रहा था और उसने जिद की कि इस बार दादा-दादी को उसके जन्मदिन पर आना ही है. उनका भी मन मीरा से मिलने को तरस रहा था. पति भी मान गए. पहली बार दोनों लोगो ने  अकेले जाकर शहर से खरीदारी की. उन्हें तो रिक्शे पर भी साथ बैठने में लाज आ रही थी. पति ने भी दूसरी तरफ मुहँ घुमा रखा था. ढूंढ ढूंढ कर उन्होंने बच्चों के लिए शहरी डिजाइन के कपड़े ख़रीदे . डर था, ऐसा ना हो ,बहू को पसंद ना आए तो वो पहनाये ही नहीं. ढेर सारे खिलौने लिए दोनों के लिए और जन्मदिन से एक दिन पहले बेटे के यहाँ पहुँच गए.

इतने लम्बे सफ़र की आदत नहीं थी.थक सी गयी थीं वे. पूरा दिन तो लेटे ही बीता. रात को भी पूरी तरह आराम करने के बाद, तबियत थोड़ी संभली लगी.आदतवश अल्ल सबेरे ही नींद खुल गयी. रसोई में बत्ती जलती देख और खटर-पटर होते देख सोचा,'अरे बहू इतनी जल्दी जाग गयी है, शहर हो या गाँव औरतों को सुबह की नींद नसीब नहीं. देखूं जबतक हूँ, थोड़ा मदद कर दूँ" यह सोच रसोई में पैर रखा तो देखा, बहू की जगह मीरा काम में लगी हुई है. बिजली की सी फुर्ती सी वह कभी एक तरफ सब्जी काट रही थी तो कभी, मिक्सी में घर्रर करके कुछ पीस रही थी तो कभी गैस पर चढ़ी कढाई में करछुल घुमाती.

उन्हें देखते ही बोली, "अरे माँ...जाग गयी....चाय पियोगी..?"

"ना बेटा...पर तू काम कर रही है...ला मैं कुछ मदद कर दूँ..." पर वे करतीं क्या? उन्हें तो खड़े होकर खाना पकाना आता ही नहीं. ना वे टी.वी. वालों की तरह फुर्ती से चाकू से सब्जी काट सकती हैं. बीच में चुपचाप खड़ी हो गयीं. मीरा कभी फ्रिज खोलती,कभी दौड़कर किसी डब्बे में से कुछ निकालती,बार बार उनसे टकरा जाती.

 उन्होंने ही बोला..."मैं एक तरफ खड़ी हो जाती हूँ....तुझे बार -बार टक्कर लग रही है.."

"कोई बात नहीं माँ..."और मीरा ने एक स्टूल लाकर रख दिया..."लो बैठो इस पर"

"पर बेटा तूने कब सीखा ये सब बनाना....और क्या तू ही रोज बनाती है,खाना ...बहू  नहीं आती,मदद को..."

"इसमें सीखना क्या है माँ...आ जाता है लड़कियों को सबकुछ...भाभी करती हैं....वो कल देर रात कोई फिल्म देखी होगी ना..इसलिए नींद नहीं खुली होगी....एक मिनट जरा मैं बच्चों को उठा दूँ..वरना लेट  हो जायेंगे  स्कूल को.."

आँखें मलती 'रिनी' को उसने गोद में लाकर उनके पास खड़ा कर  दिया और प्यार से बोली.."आज रिनी क्या ले जाएगी टिफिन में...बोलो क्या रख दूँ"

यानि टिफिन भी मीरा ही  तैयार करती है.उसके बाद वे चुपचाप देखती रहीं. बच्चों का टिफिन रखा,उन्हें तैयार  किया. इस बीच राज़ एक बार गुस्से में आया भी...'मेरा कैलेण्डर नहीं. मिल रहा...मुझे पनिशमेंट मिलेगी..." उसकी किताब खोज कर दी.रिनी के जूते के फीते बांधे...बाल ठीक किए, उन्हें दूध में  डब्बे से कुछ डालकर खिलाया और दोनों बच्चे बिलकुल तैयार हो बहू के कमरे में भागते हुए गए..बहू की उनींदी आवाज़ आई..."बाय बेटा..." और अपनी ममी के गालों पर पप्पी दे..दोनों बच्चे गेट की तरफ भाग गए. प्रकाश उठ कर उनके पीछे गया.

वे स्कूल बस में चढ़ गए तो बाहर से अखबार लेकर आते हुए,प्रकाश ने आवाज़ लगाई.."मीरा चाय देना,जरा"

वे हैरान हो बस देखती रही, मीरा ने कभी रसोई में काम नहीं किया था ,पता नहीं  इतना कुछ इतनी जल्दी कैसे सीख लिया. पसीने से नहाती मीरा बार बार एक हाथ से चेहरे से बाल हटाती जाती और पराठे बेलती जाती.

"अब ये पराठे किसके लिए बना रही है..??."

"खुद के लिए और भैया के लिए, माँ....मुझे भी तो लंच ले जाना है और अपने लिए बना लूँ, भैया के लिए नहीं तो कैसा लगेगा..."

रसोई का काम ख़त्म कर मीरा तैयार होने चली गयी. अपना लंच पैक किया, और चाय चढ़ा दी गैस पर...फ्रिज से एक पीस ब्रेड निकाला और एक टुकड़ा मुहँ में डाला और  चाय छानने लगी. उन्हें लगा ,अब शायद इत्मीनान से चाय पी सकेगी. पर नहीं उसने तो सिर्फ एक पीस ब्रेड खाया और चाय डाइनिंग टेबल पर रख आवाज़ दी.."भाभी चाय रखी है...मैं जा रही हूँ...बाय"

उनींदी सी बहू जल्दी से बाहर निकल कर आई...."आज जल्दी आ रही हो ना...और वो लिस्ट रख ली..जो समान लाने को दी थी मैने .."

"हाँ भाभी, लेती आउंगी  वो गुब्बारे, चॉकलेट  और डेकोरेशन का समान...जल्दी आ जाउंगी और रूम भी डेकोरेट कर दूंगी...आप टेंशन मत लो"

फिर कमरे में आई..."आज जल्दी आती हूँ माँ...फिर आराम से बातें करुँगी..."

"बेटा तूने सिर्फ एक  सूखी सी ब्रेड खाई  है...कुछ और नहीं खाएगी ??."

"माँ सुबह सुबह खाया कहाँ जाता है...देर हो रही है..अब चलूँ.."

शाम को ढेर सारा समान लिए हुए मीरा आई.....बस एक कप चाय पी, कपड़े भी नहीं बदले और काम में लग गयी. बहू  के साथ मिलकर कमरा सजाया, और फिर किचन में चली गयी. कामवाली को बहू ने रोक लिया था  पर ज्यादा काम मीरा ही कर रही थी.

कामवाली मीरा के गुण गाते नहीं थक रही थी. "बहुत कामकाजी है बिटिया, आपकी ...पूरा घर संभाल लिया है,सुबह भी सारा खाना बनाती है...और कितनी पढ़ाई भी करती है, भाभी  जी को बड़ा आराम हो गया है,इसके आने से....बस दोपहर को चावल बनाती हैं और छुट्टी.."

पर मीरा ने डांट दिया उसे..." शारदा...काम भी करोगी या सिर्फ बातें....ये सारी प्लेटें पोंछ कर रखो.."

फिर उनकी बाँह  पकड़ उन्हें कमरे में ले आई...उनकी अटैची खोल चुनकर एक साड़ी निकाली और बोली, "अब तुम तैयार हो जाओ, मेहमान आने ही वाले हैं...बाबू जी का भी कुरता -पायजामा दो...मैं देकर आती हूँ उन्हें   "

"और तुम ..."

" मुझे टाइम नहीं लगता....दो मिनट में तैयार हो जाउंगी.. किचन में थोड़ा काम बाकी है...और अब तुम किचन में मत आना जाकर लिविंग रूम में बाबूजी के पास बैठो..मेहमान आते ही होंगे..." सबसे छुटकी बेटी आदेश दे रही थी उन्हें.

ड्राइंग रूम में जाकर मूरत की तरह चुपचाप बैठ गयीं वे. जब कुछ काम नहीं कर रहीं तो रसोई में खड़े  हो  क्यूँ लोगों को सोचने का मौका दें कि दो दिन के लिए आई हैं बेटे के यहाँ और खट रही हैं.

बच्चों को बहू ने ही तैयार किया. रिनी ने जिद पकड़ ली थी, दादी की लाई हुई फ्रॉक ही पहनूंगी...बहू उनके पास आई...."माँ, इसे समझाइये ना..आपकी लाई फ्रॉक कल पहना दूंगी...मैने जो खरीदी है...उसके मैचिंग हेयरबैंड, जूते सब हैं."

"रिनी,जब हम मंदिर जाएंगे ना तब वो पहनना ...वो पहन कर तो भगवान को प्रणाम करना है, पहले...ठीक..." उन्होंने समझाया ...प्रकाश, पास के एक बड़े मंदिर में हर बार उन्हें जरूर लेकर जाता.

रिनी ने चाबी वाली गुड़िया की तरह, सर ऊपर नीचे किया और भाग गयी तैयार होने.

प्रकाश भी थका हुआ सा आया, बच्चे आए, गेम्स हुए, केक कटा, कुछ परिवार भी थे. सबने अदब से उनलोगों को नमस्ते की. मीरा के पैरों पर तो जैसे पहिये लगे हुए थे, भागकर कभी किचेन में जाती ...कभी बच्चों को गेम खिलाती.

पर एक बात अखर गयी उन्हें. इतने सारे फोटो खींचे गए,बच्चों के साथ उन बुड्ढे-बुढ़ियों के भी ढेर सारे फोटो  खींचे गए.पर किसी को काम में उलझी मीरा का ख़याल नहीं आया. उन्हें हर बार लगता,अब प्रकाश आवाज़ देगा या बहू बुलाएगी...पर मशीन की तरह खटती उस लड़की का किसी को ख़याल ही नहीं था.

बारह बज गए ,सारे मेहमान के जाते. मीरा ने ही कामवाली के साथ मिल कमरा साफ़ किया. बहू  तो मुस्करा मुस्करा कर ही थक गयी थी. मीरा कमरे में आ कपड़े बदल, बिस्तर पर ढह सी गयी....और बोली..."थोड़ा लेटती  हूँ...फिर उठ कर पढ़ाई करुँगी"

वे चौंक कर बिस्तर पर उठ कर ही बैठ गयीं..."तू पागल तो नहीं हो गयी...एक सुबह की उठी हुई है....कॉलेज गयी..इतना काम किया और अब पूरी नींद भी नहीं लेगी...बीमार पड़ जाएगी इस तरह..."

"चिंता मत करो माँ...आदत हो गयी है यूँ जागने की..कुछ नहीं होगा...तुम सो जाओ..."

पर उनकी आँखों की नींद उचट गयी  थी...अपने भाई के घर में लड़की का ये हाल  है...कितनी बड़ी कीमत चुका रही है...अपनी पढ़ाई के लिए.

दूसरे दिन भी ,मीरा का यही रूटीन था.उसने कहा था...'भाभी आती है मदद को'..पर उन्होंने एक दिन नहीं देखा उसे रसोई में आते."

उन्होंने एकाध बार मदद करने की कोशिश की पर मीरा का काम ही बढ़ा दिया. बोलीं "और कुछ नहीं तो  बच्चों के पानी के बोतल ही भर देती हूँ."

पर उन छोटी मुहँ वाले बोतल में पानी भरना भी एक कला है...नीचे पूरा पानी फ़ैल गया...जिसे मीरा  ने बिजली की फुर्ती से पोंछे का कपड़ा ले हँसते हुए पोंछ डाला. ताकि वे अपराधी ना महसूस करें.

वे कुछ सोचकर नहीं आई थीं कि कब लौटेंगी...पति से कहा भी था  ,मन  लग जायेगा तो कुछ दिन रह जाएंगे  बेटा बहू,पोते-पोती, बेटी सब तो हैं वहाँ...गाँव में यूँ भी सूनी दीवारें तकते  बीतते हैं दिन औ रात.

पर अब चार दिन में ही मन ऊब गया था. अपनी फूल सी बच्ची की ऐसी कठोर दिनचर्या देखी नहीं जा रही थी. मीरा ने उनके जाने की बात सुनी तो उदास हो गयी. उन्होंने बता ही दिया..."इस तरह उसका काम करना नहीं देखा जा रहा..."

मीरा ने बड़े बूढों की तरह समझाया..." सिर्फ दो साल की तो बात है,माँ....पढ़ाई पूरी हो जाएगी...नौकरी लग जाएगी..फिर मैं यहाँ थोड़े ही रहूंगी.....अब जब रहती हूँ तो काम तो करना ही पड़ेगा, ना...मुफ्त में किसी का अहसान क्यूँ लूँ?"

"बेटा..प्रकाश तेरा भाई है...कोई कैसे हो गया?"

"माँ, भैया ने बहुत मदद की है....उनके भरोसे ही तो पढ़ रही हूँ....कितनी फीस लगती है , पढने में..तुम्हे अंदाज़ा भी नहीं होगा ,उसपर से किताबें ....पर उनकी कमाई पर  भाभी का भी तो हक़ है...उन्हें शायद अच्छा ना लगे ,उनके पैसों का यूँ बँटना...इसलिए अच्छा है...थोड़ा खुश रखो...किसी का मन मैला ना होने दो....थोड़ा काम ही तो करना पड़ता है बस......भाभी भी अच्छा व्यवहार करती हैं,माँ...कभी उल्टा-सीधा कुछ नहीं बोला"

उन्होंने गहरी सांस ली...उन्हें इस नई पीढ़ी का हिसाब-किताब समझ नहीं आता...उन्हें तो इतना पता है,बड़ा भाई ,बाप  की जगह होता है....क्या प्रकाश बिना फीस दिए ही इंजिनियर बन गया...आज अगर अपनी बहन को पढ़ा रहा है...तो कोई अहसान तो नहीं कर रहा...जिसे बहन उसके घर नौकरों की तरह खटकर चुकाए. और बहू किस बात पर मन मैला करेगी....घर बच्चों की तरफ से एकदम निश्चिन्त है. रात में भी देखती...अपने साथ बिठाकर मीरा ही पढ़ाती उन्हें. बहू तो कोई सीरियल देखती रहती,अपने कमरे में. प्रकाश भी सब समझता होगा, पर घर में शान्ति रहें इसलिए चुप रहता होगा.

ये नए ज़माने का घर ,नए जमाने की बातें...उनके गले नहीं उतरतीं और उन्होंने पति से सीधा कह  दिया..."सामान संभाल रही हूँ...कल चलेंगे यहाँ से"

पति चौंके...वे तो पूरा दिन बाहर वाले कमरे में ही बैठे रहते...अखबार पढ़ते..टी.वी. देखते और शाम को टहलने निकल जाते. दरवाजे पर भारी पर्दा पड़ा था...घर के अंदर क्या चल रहा  है,उन्हें कुछ पता ही नहीं चलता. और उन्हें कुछ बताने का मन भी नहीं हुआ...वे...समझेंगे ही नहीं,ये बातें. और समझ  भी जाएँ तो उसे मानेंगे नहीं....सौ तरह से उसे सही ठहराने की कोशिश करेंगे और कहेंगे ये सब उनका वहम है.

(क्रमशः)

17 comments:

वन्दना said...

आज तो कहानी मे ज़िन्दगी की एक और तल्ख सच्चाई की ओर इंगित कर दिया………………मीरा को बहुत ही समझदार और सुगढ दिखाया है तभी उसका रहना और पढना संभव हो रहा है मगर साथ ही एक माँ के दर्द को भी बखुबी उजागर किया है…………कहानी काफ़ी दिलचस्प चल रही है और ज़िन्दगी की सच्चाइयों से रु-ब-रु करा रही है।

वाणी गीत said...

गिव एंड टेक शहरी रिश्तों की पहली शर्त है ...माँ के लिए , जो बिना किसी शर्त सबको एक समान प्यार करती है , गृहस्थी संभालती है ...यह सब अजीब लगना स्वाभाविक ही था ...
@ कभी कभी कितना धोखा दे देती हैं, आँखें. दुख हो,सुख हो, नाराज़गी हो ,बेबसी हो , गर्व हो जब देखो भर आती हैं.
सच कहती हो ...ये आंसू आँख से बहने का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं ...
@ नीचे पूरा पानी फ़ैल गया...जिसे मीरा ने बिजली की फुर्ती से पोंछे का कपड़ा ले हँसते हुए पोंछ डाला. ताकि वे अपराधी ना महसूस करें...
कहानी में छोटी- छोटी बातों का भी तुम कितना खयाल रखती हो ...

मीरा पढ़ाकू होने के साथ ही बहुत ही सुघड़ भी है ...बहुत प्रभाशाली होगा उसका व्यक्तित्व ..
नमिता की खबर मिली ...धीरे- धीरे इस रिश्ते पर पड़ी बर्फ भी पिघलने लगेगी ...

अच्छी लगी यह कड़ी भी ...शुरू हुआ दूसरी कड़ी का इन्तजार ...!

ashish said...

मीरा का व्यक्तित्व प्रभावशाली लगा , वैसे इतना तो कहूँगा की माँ के ह्रदय में अपने बच्चो किये कितनी ममता होती है , ये पता लगाना असंभव है. ह्म्म्म मुझे और कुछ सूझ नहीं रहा है लिखने को लेकिन ये भी कहूँगा की मीरा का उसके भाई के घर में रहने के लिए ,परिस्थितियों को ठन्डे मन से लेना और अपनी मां को आश्वस्त करना सराहनीय लगा. बाकी बाते मेरे पूर्ववर्ती टिप्पणियों में लिखी जा चुकी है . वैसे एक पुरुष होते हुए अगर मेरे दिल में उनके लिए करुना का भाव आया तो , नारियो के दिल तो करुना से छलछला जायेंगे.

रश्मि प्रभा... said...

परिवेशीय सूक्ष्म विश्लेषण ......बहुत अच्छा लगता है हर पात्रों से गुजरना

Sadhana Vaid said...

बहुत अच्छी लगी यह कड़ी भी ! मीरा की सोच बहुत परिपक्व है ! अपनी एम. बी. ए. की पढाई की कीमत जिस तरह वह प्रकाश के घर में गृहस्थी का काम करके और बच्चों की नैनी बन कर चुका रही है पढ़ कर दिल भर आया ! लेकिन जिस तरह समझदारी के साथ उसने माँ को आश्वस्त किया देख कर उसके व्यक्तित्व की गंभीरता का अनुमान लग जाता है ! प्रकाश की पत्नी का व्यवहार वर्तमान युग के व्यक्तिवादी रिश्तों की खुरदुरी सच्चाई को बखूबी रेखांकित करता है ! नमिता से मिलने का बहुत दिल है ! संभावनाओं से भरपूर एक विद्रोही और कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखने वाले पात्र का इस तरह खामोशी से पलायन कर लेना गले के नीचे आसान से नहीं उतर पा रहा है ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कहानी मैं एक बार पढ़ कर जा चुकी थी पर फिर से पढ़ने का मन था इत्मीनान से.. :):)...अब बाकी सब पीछे छूट रहा है और मीरा का चरित्र उभर कर आ रहा है...एक मजबूत इरादे वाली लडकी के रूप में ...सबसे बड़ी बात कि वाह अपने भाई के यहाँ रह कर पढ़ रही है तो वाह यह जानती है कि उसे यह सब करना होगा ...आज के रिश्तों पर रोशनी डाली है इस प्रसंग से ....माँ के हृदय की बात बखूबी लिखी है .@@.कभी कभी कितना धोखा दे देती हैं, आँखें. दुख हो,सुख हो, नाराज़गी हो ,बेबसी हो , गर्व हो जब देखो भर आती हैं.. मानवीय संवेदनाओं को बताती पंक्ति....मन को छू गयी ...
मीरा को काम करते देख माँ का मन कैसा हो जाता है कि वो वापस जाने को तत्पर हो जाती है ...
कहानी में सूक्ष्म से सूक्ष्म बात को ध्यान में रखा है ....बहुत अच्छी लगी यह कड़ी .....आगे अब मीरा की नौकरी का इंतज़ार है ...

मुदिता said...

रश्मि जी,
कहानी में छोटी छोटी बातों में मानवीय संवेदनाएं उभर आती हैं जो आपके लेखन की विशेषता है...बहुत कसा हुआ लेखन ..बधाई आपको

शहरोज़ said...

आपका लेखन नित्य नयी ऊंचाईयां पा रहा है.ख़ुशी होती है.

पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार-लेखक गिरीश पंकज को : बाज़ार में मीडिया
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

mukti said...

आपने नमिता की माँ के द्वारा उसके स्मरण का बड़ा ही सुन्दर चित्र खींचा है कि कैसे वह इधर-उधर घूमती-फिरती हुयी नज़र आती है उन्हें.
"बड़ी होकर चूल्हा-चौका ही तो करना है..." यह कहकर हमें भी बहुत टोका जाता था गाँवों में हँसी आती थी उन लोगों की बात सुनकर.

हमलोगों का हर साल गाँव जाना नहीं हो पाता था, पर जब जाने को मिलता था, तो समझो मौज हो जाती थी. और मज़े की बात हमलोग भी बचपन में छत पर बैठकर फ़िशिंग करते थे...

नारी चरित्रों का बहुत ही स्वाभाविक वर्णन किया है आपने. पहले मैं खुद को नमिता से आइडेन्टिफ़ाइ कर रही थी, और अब मीरा अपने जैसी लगने लगी है. क्योंकि मैं कितनी भी उजड्ड रही होऊँ, पढ़ने में बहुत तेज थी... मीरा के टॉप करने के वर्णन को पढ़्कर वो दिन याद आ गये, जब मैंने हाईस्कूल में जिला टॉप किया था. अम्मा उसके कुछ महीने पहले ही गुजर गयी थीं. नहीं तो वो भी रो देतीं, जैसा आपने कहा है."...कभी कभी कितना धोखा दे देती हैं, आँखें. दुख हो,सुख हो, नाराज़गी हो ,बेबसी हो , गर्व हो जब देखो भर आती हैं."

और मीरा की पढ़ाई के लिये जद्दोजहद खूबसूरती से वर्णित की है आपने. "इसमें सीखना क्या है माँ...आ जाता है लड़कियों को सबकुछ" . और अगर कोई लड़की बाहर जाकर पढ़ना चाहती है, तो उसे जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, "कितनी बड़ी कीमत चुका रही है...अपनी पढ़ाई के लिए."
इसीलिये कहा जाता है कि आजकल की पीढी बहुत समझदार है और स्वाभिमानी भी. माँ का यह समझना स्वाभाविक है कि बेटे को उसके पिता ने पढ़ाया तो उसकी ज़िम्मेदारी है कि अपनी बहन को पढ़ाये, पर बहन को इससे क्या लेना? उसके लिये तो भाई एहसान ही कर रहा है. लड़कियाँ ऐसी ही आत्मसम्मान की बातें करती हुयी अच्छी लगती हैं मुझे किसी पर बोझ बनी हुयी नहीं.
वाणी जी की टिप्पणी को भी मेरी टिप्पणी में शामिल कर लीजिये.

shikha varshney said...

ye net ki vajah se aazkal bahut kam padh pa rai hoon ..aur likh to pa hi nahi rahi ..isliye yahan bhi deri se aa pai ..par aakar is chhutki ko dekh kar bahut achha laga ..paristhitiyan kitni jaldi mature kar deti hain insaan ko ..
sorry roman men likhna padh raha hai..isliye jyada nahi likhungi :)

शोभना चौरे said...

महिलाओ की परिस्थियों से समझौता करने की शक्ति को बहुत ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया है मीरा के चरित्र के माध्यम से आपने इस कड़ी में |
अपने पोते पोतियों के माध्यम से बेटे का घर गाँव आकर रहना बहुत कुछ कह जाता है सीखने के लिए |कभी कभी आशा पूर्णा जी की लिखे उपन्यास की झलक पाती हूँ आपके इस उपन्यास में |

बहुत ही सहजता से आज के सारे पारिवारिक परिवेश को ,परिवार में चलती हुई समस्याओ को सुलझी हुई मानसिकता के साथ रचा है |

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कितनी सारी छोटी छोटी सम्वेदनाएं समेट ली हैं तुमने!! हर कड़ी में कहानी के अलग-अलग पात्रों का चरित्र बखूबी उभार रही हो. एक कड़वी सच्चाई को उभारा है, मीरा और उसके भाई-भाभी के माध्यम से. सुन्दर कड़ी.

दीपक 'मशाल' said...

हकीकत के और करीब आ गई ये कहानी.. पर एक बात समझ नहीं आई दी.. सारी लड़कियां हीरोइन निकलीं और सारे लड़के विलेन.. ऐसा क्यों? :P

rashmi ravija said...

@मुक्ति...
बहुत दिन गुज़र गए...पर हमें अब पता चला...तो बधाई तो अभी ही देंगे :)...बहुत बहुत बधाई

बड़ा गर्व होता है यह सुनकर...कि तुम जिले में प्रथम आई थी...कितने खुश हुए होंगे...बाबूजी ,दीदी...माँ भी वहीँ कहीं आस-पास ही होंगी.....बस तुम्हे नज़र नहीं आयीं...उनके आशीष से ही तो तुम सफलता के सोपान तय करती आई....और आगे भी करती रहोगी....ढेरों शुभकामनाएं

rashmi ravija said...

@दीपक
ऐसा नहीं है कि लड़के विलेन है....प्रकाश, अब गाँव भी आता-जाता है...नमिता के लिए भी माता-पिता को समझाया कि शादी तो उसी लड़के से करनी होगी....छोटी बहन को पढ़ाने को उत्साहित किया...उसे पूरा सहयोग दे रहा है...

पर हाँ, घर के मामले में वह कुछ नहीं बोलता..क्यूंकि यह सच्चाई है...अक्सर घर की शान्ति भंग ना हो ,इसलिए पुरुष..चुप लगा जाते हैं.

और सच कहूँ तो आस-पास ऐसे बहुत उदाहरण देखे हैं...हाल में ही मेरी कामवाली अपने आँसू पोंछ कर बता रही थी कि उसने दोनों लड़कों को अच्छे स्कूल में डाला, ट्यूशन रखा, फिर भी वे फेल हो गए और म्युनिसिपल स्कूल में पढने वाली लड़की ,घर में खाना बनाकर, कपड़े धोकर, पानी भरकर भी पास हो गयी.

तुमने एक पड़ोसी की याद दिला दी..जिनकी छोटी चार बहनें अनब्याही थीं और वे अपने दो बेटे, पत्नी के साथ अपनी गृहस्थी में मगन थे..पार्टी, घूमना,बच्चों के लिए महंगे खिलौने..पर बहनों की कोई फिकर नहीं.
अब तुम्हारे जैसे अनमोल हीरे बहुत कम होते हैं..I mean it

और तुमने तो मेरी दूसरी कहानियाँ भी पढ़ी हैं....तुम्हे पता है कि मेरी कहानी के पुरुष पात्र...रियल हीरो होते हैं :)

Mired Mirage said...

बहुत अच्छी लगी यह किश्त भी। मीरा की समझ व मेहनत अवश्य रंग लाएगी।
घुघूती बासूती

sunil said...

kya ham aapke lekho ko prakashit kar sakte hain?
kripiya uttar den.
thanks,
itwariakhbar.com
itwari@gmail.com