Thursday, July 15, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -9)


(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग और छोटा बेटा,मेडिकल पढ़ रहा था. ससुर जी और सास का निधन हो गया और सारी जिम्मेवारी पति पर आ पड़ी.)

गतांक से आगे

अम्मा जी के जाने के बाद ..घर में अंदर-बाहर सब सन्नाटा सा छाया रहता. बाबूजी के जाने से ही अहाता सूना हो गया था.शाम होते ही शंकर की आदत थी,चार-पांच,कुर्सियां  अहाते में रख देता,बाज़ार आते-जाते कोई ना कोई  बैठ बाबूजी से गप्पें किया करता,ऊँची आवाज़ में उनलोगों के ठहाके गूंजते रहते. उनके जाने के बाद भी यह क्रम टूटा नहीं, बस बुजुर्गों के ठहाके की जगह,बच्चों की खिलखिलाहटों ने ले ली. अम्मा जी कुर्सी पर बैठी होतीं और ढेर सारे बच्चे अहाते में खेला करते. रौनक बनी रहती.

दिन में भी अम्मा जी,बरामदे में चौकी पर बैठी होतीं और गाँव की कोई ना कोई घास काटने वाली,या गाय - भैंस चराने वाले पाए से पीठ  टिकाये सुस्ताते होते. गाँव भर के हाल-चाल..अपने घर के पड़ोसी के किस्से, सुनाया करते. अक्सर अम्मा जी सिवनाथ  माएँ को आवाज़ देतीं और वह उनके लिए कुछ खाने-पीने का लेकर हाज़िर  होती. वे भी काम से खाली होतीं  तो चौखट के पास एक मचिया लिए बैठी जातीं और सबकी बातें,सुना करतीं.
शाम को तो उन्हें बिलकुल समय नहीं मिलता. शाम को पति स्कूल से लौटते, तो उनके चाय-नाश्ते,फिर रात के खाने की तैयारियों में लगी होतीं. अब दिन भर वह सूना बरामदा और शाम को सूना अहाता देख,उनकी आँखें भर आतीं.पर वे यह सोच आँसू अंदर ही अंदर  पी लेतीं कि शाम को आँसू गिराना  अपशकुन माना  जाता है.

वे पति को कहतीं,शाम को बाहर बैठने के लिए.पर पति ज्यादा सामाजिक नहीं थे, वे गाँव वासियों से ज्यादा मिलते जुलते नहीं थे...तुरंत ही ऊब जाते  और कमरे में आकर कोई किताब खोल लेते. एक उनका नया साथी भी बन गया था. गोपाल जी ,वह भी कमरे मे आकर ही बैठा रहता. अम्मा जी के श्राद्ध कर्म में काफी मदद की थी. अब भी जब पैसों की जरूरत पड़ती और जमीन या बगीचा गिरवी रखना या निकालना होता तो मदद करता. सही लोगों  से पहचान करवाता . पति तो एकदम अनाड़ी थे. बाबूजी के रहते कभी कुछ जानने की कोशिश ही नहीं की. फिर भी इतना मीठा बोलता कि उन्हें पसंद नहीं आता. उन्होंने अम्मा जी से उसके बारे में एक बार पूछा भी था कि उसका खर्च कैसे चलता है? सुन्दर पक्का मकान था, उसका. बीवी बड़ी सुन्दर  साड़ियाँ  पहना करती,बेटा दूर शहर में पढता था और जमीन जायदाद या नौकरी कुछ थी नहीं. सात भाई था ,सबके हिस्से बस टुकड़े भर जमीन आई थी. अम्मा जी ने बड़ी विद्रूपता से कहा था..."क्या करेगा...तेला-बेला करता है"

पर वे समझ नहीं पायी थीं. पर अब समझ रही थीं. उसका यही काम था और कमीशन से उसके घर के खर्चे चलते. मन में शंका भी जन्मी ...ना जाने कितना कमा लेता है ,बीच में. पति से भी जिक्र किया...पर उन्होंने  कहा..."अब मुफ्त में आगे-पीछे थोड़े ही ना करेगा...कोर्ट कचहरी सब जगह साथ जाता है,मुझे भी तो कोई साथ चाहिए."

और ये कोर्ट कचहरी का चक्कर   बढ़ता ही गया. रोज ही बेटों की मांगें सुरसा की तरह मुहँ बाए खड़ी रहतीं. जिनमे  सुन्दर खेत - खलिहान ,बाग़ बगीचे समाहित होते जा रहें थे.. एक बार प्रमोद से कहा  भी था, कि जरा खर्चे संभाल कर किया करो. तो उसने कह दिया था,"पता है एक एक किताब कितने की आती है? अब डाक्टर बनाने का शौक है तो खर्चा तो करना पड़ेगा."

पति के सामने चिंता व्यक्त करतीं तो कहते..."अरे बस बेटों की नौकरी भर  लगने की देर है, देखो ..कैसे सब छुड़ा लेता हूँ "

पर उन्हें थोड़ा शक  होने लगा था, दोनों बेटे जैसे शहरी रंग ढंग में ढल रहें थे और घर से दूर होते जा रहें थे.उन्हें नहीं लगता था कि उनको कोई फिकर थी कि उनकी पढ़ाई के पैसे कहाँ से आ रहें हैं ? जब भी छुट्टियों में आठ- दस दिनों के लिए आते और साथ में आते उनके दोस्त. जिन लोगों  ने गाँव नहीं देखा होता. दिन भर बेटे फरमाईशी चीजें बनवाते और सारा दिन बागों में घुमा करते. रात को देर तक छत पर उनकी हंसी -मजाक चलती रहती. कभी दो पल, अपने पापा जी के पास या उनके पास बैठ उनका हाल-चाल लेने की जरूरत नहीं समझते.

नमिता से तो पहले ही नहीं बनती थी उनकी. और नमिता को भी उसके दोस्त फूटी आँखों नहीं सुहाते. प्रकाश का एक दोस्त साथ आया था और गले में कैमरा लटकाए सारे दिन गाँव में घूमता रहता और तस्वीरें उतारता रहता. एक बार उन्हें लगा  भी कि ये पेड़ पर चढ़ी नमिता की तस्वीर उतार रहा है या पेड़ की?? फिर उन्होंने सोचा...पत्तों में छिपी नमिता वैसे भी  नहीं दिख रही. क्या फोटो  लेगा.

लेकिन जब पुआल के ऊँचे ढेर पर बैठी, ईख चबाती नमिता की तस्वीर वो सामने से खींचने लगा तो उनका माथा ठनका....वे बाहर निकल,प्रकाश को बताने ही जा रही थीं कि देखा नमिता उस लड़के की तरफ बढ़ रही है. वे खिड़की के और करीब आ गयीं सुनने कि आखिर करती क्या है,लड़की? नमिता ने सीधा पूछा, "आपने मेरी फोटो  क्यूँ खींची??"

"वो मैने ऐसी लड़की कभी देखी  नहीं, ना ,पेड़ पर चढ़ने वाली....इतने ऊँचे ढेर पर बैठी ईख चबाने वाली...इसीलिए खींची..सब नया है मेरे लिए"

"अच्छा और भी नए तरह के फोटो  खींचने हैं आपको?"

हाँ.... जरूर"

और नमिता ने बगल की सड़क से गुजरते, भैंस  की पीठ पर लेटे किसना को आवाज़ दी.."किसना चल..भैंस को इधर लेके  आ"
उसके करीब आने पर बोला उसे .."उतर नीचे" और प्रकाश के दोस्त की तरफ मुड़ी..."आपको एकदम नए तरह का फोटो चाहिए ना?"

" हाँ..."

और आगे बढ़कर उसने उस लड़के के  हाथ से कैमरा ले लिया.."चलिए मैं खींच देती हूँ..एकदम नए तरह का फोटो...."

"क्या मतलब ...मेरा कैमरा दे दीजिये...अरे संभाल के" अब उसे कुछ आशंका होने लगी थी.

"मुझे पता है..कैसे फोटो  खींचते हैं,कैमरे से...मेरी बम्बे वाली दीदी के पास है" अब बाहर कहीं भी वो छोटकी दीदी की बजाए स्मिता को बम्बे वाली दीदी ही कहती थी.

"आप भैंस की पीठ पर बैठ जाइए...बुशर्ट पैंट में भैंसा  पर बैठा शहरी लड़का..एकदम नए तरह का फोटो लगेगा"...किसना और मीरा दोनों हाथों से मुहँ दबाये खी खी करके हंस रहें थे.

नमिता ने घुड़का..."हंस क्या रही है...ले ईख पकड़...."और कैमरा संभालने लगी.

"मेरा कैमरा दीजिये...अब मुझे नहीं खींचना..."

"क्यूँ नहीं खींचना...आपने मेरा खिंचा..हिसाब तो बराबर होना चाहिए...चलिए चलिए....किसना भैंस को भैया साब के करीब ला"

और उसने भैंस के साथ उस लड़के की फोटो  ले ली
तभी भैंस ने जोर से रम्भा कर  पूंछ हिलाई और थोड़े गोबर के छींटे लड़के के ऊपर पड़ गए और वह  डर कर दूर छिटक गया.

"अरे डरिए मत....वो थैंक्यू बोल रही है,आपको..आपने उसके साथ फोटो खिंचवाया ना." मीरा और किसना फिर से हंस पड़े.

"चल मेर ईख दे...ये लीजिये अपना कैमरा...सबको जरूर दिखियेगा..एकदम नए तरह का फोटो है"

वो लड़का...मुहँ लटकाए कैमरा लिए घर में वापस आ गया. और प्रकाश से कहने  लगा, अब उसे जाना है...शाम को कितने बजे बस मिलेगी?"

वे हंसती हुई वापस अपने काम में लग गयी..."ये लड़की है या अगिया बैताल...सारे मामले खुद सलट लेती है. किसी की मदद की जरूरत नहीं उसे.

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प्रकाश की एक बड़ी कंपनी में नौकरी लगने की खबर से आनंद की हिलोरें मचल उठीं घर में. हर आने जाने वाले का मुहँ  मीठा करातीं. पति भी जानबूझकर शाम को बाहर बैठने लगे थे. राह से गुजरते लोग, आकर बधाई दे जाते. और पति मीरा को आवाज़ देते, "अरे जा मिठाई लेकर आ,चाचा  का मुहँ मीठा करा दे." अंदर से  भले जल-भुन कर ख़ाक हो रहें हों...पर ऊपर से ढेरों आशीष दे जाते.

कोई -कोई व्यंग कर ही जाते, "क्या मास्साब अब तो अगुआ झूलेगा दरवाज़े पे....जम के दहेज़ लोगे अब तो..."

पति हाथ जोड़ लेते..."ना ना भगवान का दिया सब कुछ  है..बस सुशील लड़की और संस्कारी घर मिल जाए"

पर लोगों   का कहना सच हो गया.... जंगल की आग भी क्या फैलेगी,जैसी प्रकाश की नौकरी लगने की खबर फैली...रोज कोई  ना लड़की के पिता,फोटो,टीपन लेकर हाज़िर हो जाते. पति कितनी बार कह देते अभी शादी नहीं करनी..दो साल बाद करेंगे.पर लोग जबरदस्ती मेज पर फोटो.टीपन  रख कर चले जाते.

पति ने डब्बे भर भर के  बिस्कुट और शहर से सरबत की बोतल लाकर रख दी थी. सख्त हिदायत दी कि ख़तम होने के पहले ही बता दिया जाए और लाकर रख देंगे. कोई भी दरवाजे से बिना सरबत पानी के नहीं लौटना चाहिए. दूर से आने वालों के लिए तो बाकायदा नाश्ता और कभी कभी खाना भी बनता. वे भी रसोई के डब्बे हमेशा देख लेतीं,कि सूजी,घी चीनी सब हमेशा मौजूद रहें.

मीरा और नमिता का अच्छा मनोरंजन होता. लड़कियों के फोटो देख मीन-मेख निकालती, इसकी नाक मोटी है, इसकी आँखें छोटी  हैं.

वे फोटो छीनकर घुड़क देतीं, " ई मत भूलो ,तुमलोग का फोटो भी अईसही कहीं जाएगा और लोग मीन-मेख निकालेंगे. "

दोनों एक सुर से बोलतीं, "हमें नहीं करनी सादी"

अबकी सिवनाथ माएँ,बोलतीं, "त का..माँ -बाप के छाती पे मूंग दलोगी जिंदगानी भर?"

"क्यूँ..पढेंगे लिखेंगे बड़ा आफिसर बनेंगे...पर तुमको  क्या पता..तुमको तो बस लड़की लोग सादी के लिए ही जनम लेती है...ये ही लगता है..चल मीरा बाहर चलते हैं...इन्हें समझाने का कोई फायदा नहीं." और नमिता उछलती कूदती बाहर चल देती.

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पति कहते, अभी कुछ दिन उसे मौज करने दो..तुरंत ही गृहस्थी में मत जोतो. एक बार मन में आता ,कहीं ये कारण तो नहीं कि 'अभी से अपनी गृहस्थी बसा लेगा तो फिर पैसे कैसे भजेगा..और कुछ बाग़ बगीचे बस प्रकाश की नौकरी लगने की बाट जोह रहें थे कि कब आज़ाद हों अपने असली मालिक के पास लौटें.' पर पति से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं हुई. कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं कि खुद भी जिनका सामना करने की हिम्मत नहीं  होती, मन में आए विचार को भी झट से झटक दिए जाते हैं. जुबान पर लाकर पति से कैसे पूछतीं?

प्रकाश सिर्फ एक दिन के लिए घर आया.हॉस्टल का समान घर पर रखा. दुनिया भर का अल्लम गल्लम समान था. बोरी भर कर तो किताबें थीं. सिर्फ एक अटैची और बेडिंग ले कर चला गया. इतना समय भी नहीं दिया की वे ज्यादा कुछ बना पातीं. निमकी खजूर बना कर बाँध दिए. चिवड़ा देने लगीं तो मना कर दिया, फिर से एक नई चिंता सवार हो गयी.पता नहीं कहाँ रहेगा,रोज होटल में खायेगा. क्या सेहत रहेगी?

नमिता ने लड़कियों की तस्वीरें दिखानी चाहीं  तो प्रकाश ने एक नज़र नहीं डाली. और उन  से बोला,
 "माँ ये फोटो  वगैरह ना लिया करो और किसी से कोई वादा मत किया करो"

"अरे हमलोग कहाँ लेते हैं...वे लोग जबरदस्ती रख के चले जाते हैं."

"तो उठाकर वापस पकड़ा दिया करो..मुझे ये सब नहीं पसंद.."..उसे क्या  पता..कितना मुश्किल है, ये ...कितने लोग तो इतनी दूर से बार बार आते हैं और कहते हैं...बस आपलोगों से मिलने का मन हो आया...शादी की कोई बात नहीं करते, इधर उधर की  बातें करके चले जाते हैं....कोई कोई तो घंटों गाड़ी में ही बैठ, पति का इंतज़ार करते कि कब वे स्कूल से आएं. मीरा ,किसना ..गाँव के और बच्चे बताते कि दूर एक पेड़ के नीचे गाड़ी लगा कोई अंदर बैठा है"

इसे क्या  पता बेटी का  बाप होना क्या होता है...वे मन ही मन सोचतीं.

प्रकाश के पत्र आते, एक दोस्त के साथ मिलकर घर ले लिया है. होटल में खाता हूँ. बहुत ही महंगा शहर है, एक पैसा नहीं बचता. पति कहते, 'बेचारे के खुद के ही खर्च पूरे नहीं पड़ रहें,घर पर  क्या भेज सकेगा...और मुझे चाहिए भी नहीं...बस वो सुखी रहें"

छः महीने के बाद प्रकाश घर आया, उपहारों से लदा फंदा. बहनों के लिए सुन्दर सी घड़ी लाया था. उनके लिए कीमती साड़ी, पति के लिए बढ़िया  पोलिस्टर के शर्ट-पैंट का कपडा. यहाँ तक कि सिवनाथ काकी, राम-खिलावन काका के लिए भी साड़ी और कुरता लेकर आया था. बहुत खुश लग रहा था. उसकी  पसंद की सारी चीज़ें बनाईं. जब दोपहर को वो उनके पास आकर लेटा तो मन भर आया उनका.अब तक ये सब लाड़ वो दादी से ही करता था. उनसे ही अपनी फरमाईश की चीज़ें बनवाने को कहता. शहर की चीज़ों की बखान करता. मालूम है दादी, वहाँ दूध कैसे आता  है???...मशीन से..
लडकियां कैसे कैसे कपड़े  पहनती हैं,बताऊँ?"

और अम्मा जी डाँटती रहतीं, "तू यही सब करने गया है शहर में...पराई लड़की का केवल पैर का अंगूठा  देखना  चाहिए..."

"क्या दादी....मैं कहाँ देखता हूँ.....अब आँखें बंद कर चलूँ क्या सड़क पे...किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो,..."
"भाग तू यहाँ से...जो मुहँ  में आता है..बोलता है.." अम्मा जी सचमुच नाराज़ हो जातीं.

आज उनके पास लेटा नए शहर, अपने ऑफिस अपनी नौकरी  के बारे में बता रहा था .फिर अचानक बोला, "अभी भी लड़कियों के फोटो लेकर लोग आते हैं?"

"आते तो हैं ही बेटा..लड़की वाले भी मजबूर हैं..कहाँ बात बन जाए,क्या पता,इसलिए कोशिश करते रहते हैं "
"माँ...असल में मैने इसलिए मना किया था क्यूंकि मैने एक लड़की पसंद कर ली है. उसके माँ-बाप भी मान गए हैं....और जब से नौकरी लगी है...शादी के लिए जोर दे रहें हैं "

अब बेटे के सारे लाड़ की वजह समझ में आ गयी.वो उसकी साड़ी,घड़ी लाने की ख़ुशी एकदम से तिरोहित हो गयी. क्या क्या सपने देखे थे...अब पता नहीं...कहाँ की  ,किस जात की, किस बिरादरी की लड़की है"

"तुम्हारे पिताजी मानेंगे?"

"पापा जी क्या अनपढ़ गँवार हैं  जो नहीं मानेंगे....टीचर हैं....टीचर तो समाज को नया रास्ता दिखाता है...मुझे पता है...वो ना नहीं करेंगे , पर ये बात तुम्हे ही वहाँ तक पहुंचानी होगी...मुझे अच्छा नहीं लगेगा...बात करते"

"ठीक है बेटा...चलूँ जरा आँगन में देखूं...मिर्चा सूखने को डाला था..शाम होने से पहले उठा लूँ"....कहती वे उठ आयीं.

रात में जब पति को बताया...तो वे चौंक गए फिर एकदम हताश हो, सर पर हाथ रखकर बैठ गए, "अब क्या कर सकते हैं...कोई बच्चा तो है नहीं...अगर मना करेंगे  तो बेटा भी हाथ से जायेगा...अब जो करे...हमने अपना धरम निभाया..अच्छी शिक्षा दी...अभी तक एक पैसा उसका नहीं जाना..खेत-बाग़-बगीचा सब गिरवी रख दिए ,का उसको पता नहीं कि खाली टीचर की तनखाह में ई सब नहीं हो सकता. जब वो अपनी जिम्मेवारी खुद नहीं समझता तो हमारे समझाने से क्या  समझेगा..जाने दो..सबूर करो, ममता की माँ...हम अपने कर्त्तव्य से नहीं चुके...बस यही  संतोष है"

फिर थोड़ी देर बाद पूछे..."कौन जात है?"

"मैने नहीं पूछा "

"हाँ ठीक है..... क्या फरक पड़ता है."...और थके क़दमों से बिस्तर पर चले गए सोने ,पर उन्हें  पता था आज नींद उनकी आँखों से दूर ही रहेगी.

प्रकाश  ने कुछ नहीं पूछा,कि बाबूजी ने क्या बोला...बस इतना बताया कि कुछ दिनों में लड़की के पिता आयेंगे. सब बात कर लेना. यानि कि उनलोगों की सहमति-असहमति की कोई गुंजाईश ही नहीं छोड़ी  थी. दूसरे दिन ही वह चला गया, यह कहते कि छुट्टी नहीं है और फिर छुट्टी बचानी भी है. उसका इशारा वे समझ गयीं थीं.

उसके जाने के बाद, नमिता उनके पास आई और बड़े गहरे  राज़ भरे स्वर में बोली, " माँ नाराज़ तो नहीं होगी...कुछ दिखाऊं तुम्हे ?"

उनके 'क्या' का इशारा करने पर पीछे छुपे हाथ आगे कर दिए, "ये देखो अपनी बड़की पुतोह का फोटो..."

सुन्दर सी शहरी लड़की लग  रही थी,जैसे शहर में खाने को नहीं मिलता..सींक सलाई सी

उन्होंने कुछ नहीं बोला, तो नमिता बोली..."माँ भैया कह गए हैं...माँ को मनाना तुम्हारी जिम्मेवारी...क्या फर्क पड़ता है, माँ ज़िन्दगी तो भैया को बितानी है,ना..."

"मैने कहाँ मना किया है..प्रकाश को भी कुछ नहीं बोला..."

"ओह्ह तो तुम्हे सब मालूम  है..." वो अपने ऊपर से इतना जिम्मेवारी वाला काम हट जाने से दुखी हो गयी..
"हाँ सब मालूम है...और अब जरा घर दुआर को साफ़ सुथरा रखा कर...बाहर टेबल पर भी ममता का कढाई किया हुआ टेबल क्लॉथ बिछा दिया कर. कभी भी लड़कीवाले बात करने आ सकते हैं.

"अरे वाह...तब तो भैया का ब्याह जल्दी ही होगा...कितना मजा आएगा..." कहती खुश होती वो चली गयी.

आठ दिन भी नहीं बीते थे कि इक इतवार को ,एक चमचमाती कार दरवाजे पर रुकी.एक सूटेड बूटेड सज्जन कार से उतरे. वे जल्दी से  पति को बुलाने चली गयीं.."अरे जरा कुरता बदल लीजिये...ये दिन भर पहने से मुचड़ गया है..इस्त्री किया हुआ पहन लीजिये वो तो कदम सूट-बूट में डटे हुए हैं"

पति मुस्कुरा दिए.." तो क्या हुआ...बेटा के बाप तो हम हैं..मेरे दरवाजे पर वे आए हैं...हम तो ऐसे ही जाएंगे...तुम जाओ नाश्ता-पानी का इंतज़ाम देखो...बढ़िया नास्ता बनाना ...रिश्तेदारी जुड़ने जा रही है"

उनका मन नहीं लगता चौके में...कलावती को हलुआ बनाना समझा वे दरवाजे की ओट में जाकर बात सुनने की कोशिश करतीं. फिर दूसरे ही पैर चौके में लौटतीं.

पति बड़े इत्मीनान से उनसे बातें कर रहें  थे...आज उन्हें पढ़े -लिखे की कीमत समझ में आई. लड़की के बाप तो रंगीन कमीज़ में एकदम किसी फ़िल्मी हीरो जैसे लग  रहें थे.पर मैले कुरते में भी उनके पति उनसे एकदम समान स्तर पर बात कर रहें थे. शायद बेटे के बाप होने के दर्प ने भी उनका माथा ऊँचा रखा था. जब उन्होंने लेन -देन की बात छेड़ी तो पति ने एकदम कह दिया, " ना...मैं नहीं विश्वास करता दान -दहेज़ में. आप चाहें तो अपनी लड़की को दो कपड़ों में भेजें या नौलक्खा हार पहनाकर आपकी ख़ुशी.पर जो  देना हो अपनी बेटी को दें...मुझे कुछ नहीं चाहिए"

"लेकिन बारात लाने का खर्चा...शादी का खर्चा ..उतना तो ले लीजिये"

"ना..इतना दिया है भगवान ने कि मैं बेटे की शादी में एक भोज खिला सकूँ, गाँव को...आप माफ़ कीजिये हमें"..पति ने हाथ जोड़कर मना कर दिया.

वे दरवाजे के पास से कलावती और मीरा के हाथों,नाश्ता शरबत भेज रही थीं. लड़की के पिता ने आहट सुनकर कहा, "भाभी जी को भी बुलाइए,उनके भी दर्शन कर लूँ...इतने भाग्य वाली  है मेरी बेटी कि ऐसा घर-वर उसे मिला है....धन्य हो जाऊंगा मैं गृहलक्ष्मी के दर्शन करके"

"ममता की माँ...बाहर आओ...तुमसे  मिलना चाहते हैं.."

उनकी तो सांस रुक गयी...ऐसे कैसे चली जाएँ..गैर मर्द  के सामने.

"ममता  की माँ "..इस बार पति की आवाज़ में खीझ  और गुस्सा था.

वे जल्दी से सर पर पल्ला संभालते,बाहर चली आयीं.

वे सज्जन एकदम हाथ जोड़ते उठ खड़े हुए. उन्हें झुक कर नमस्ते कहा.और कुर्सी पर बैठने का  इशारा करने लगे.

उनकी पूरी ज़िन्दगी में किसी ने इतना सम्मान नहीं दिया था . वो भी एक गैर मर्द ने. लड़के की माँ होने का क्या इतना रुतबा होता है? किसी तरह फंसे गले से उनके नमस्ते का उत्तर दिया.और सर झुकाए ही खड़ी रहीं. कुर्सी पर तो बैठने का  सवाल ही नहीं था. खड़े होने में ही उनके पैर काँप रहें थे. फिर जल्दी से बोलीं, "मैं  गरम पूरियां भेजती हूँ..आप शुरू  कीजिये" इतना बोलने में ही उनका चेहरा लाल हो गया और वे हांफती हुई अंदर चली आयीं.

प्रकाश की बारात शहर में ही गयी. नमिता,स्मिता,ममता सब बारात में गयीं.पहले लड़की लोग नहीं जाती थी  पर प्रकाश और बच्चों ने जिद किया. तो पति को भी उनकी बात माननी पड़ी. सारा काम प्रमोद देख रहा था. खाने नहाने की भी सुध नहीं रहती उसे. लौट कर चपर चपर करनेवाली नमिता ने बताया.."माँ ऐसा सजा  था मंडप कि गाँव वाले लोग तो आँख फाड़ कर देख रहें थे...और खाना तो बस क्या बताएं. बहुत बढ़िया इंतज़ाम था माँ. और भाभी तो किसी परी सी लग रही थी."

बहू सचमुच अच्छी थी,अब प्रकाश ने पट्टी पढाई थी या वो ही सीधी थी.पर रस्म निबटाती रही,उनके कहे अनुसार.

जब दूसरे दिन मुहँ दिखाई की रस्म होने वाली थी तो दोनों बहनों में ही बहस हो गयी. ममता का मन था जैसा गाँव में होता है, आँखें बंद कर बहू  का घूँघट उठा कर सब मुहँ देखते हैं,वैसा ही होना चाहिए. जबकि स्मिता ने कहा, :"ना दीदी अब शहर की कोई लड़की घूंघट  निकालने को तैयार नहीं होती. एक कुर्सी पर भाभी को तैयार करके बिठा देते हैं.और आस-पास कुछ  कुर्सी लगा देते हैं .पलंग तो है ही कमरे में. लोग आएँगी वहीँ बैठकर भाभी का मुहँ देख लेंगी"

"पर गाँव वाले बातें बनायेंगे"

"बनाने दो...वो तो वैसे भी बनायेंगे..कोई ना कोई कमी खोज ही लेंगे..चाहे तुम कुछ भी करो..और हमलोग बदलाव नहीं  लायेंगे तो ई सब कैसे बदलेगा...किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी,ना..अपने घर से ही शुरुआत होने दो. "

ममता भी  मान गयी...और उन्हें संतोष हो आया...ऐसे ही ममता को गाँव में ब्याह कर वे थोड़ी असंतुष्ट थीं. कहीं दोनों  बहनों में कोई द्वेष ना हो जाए.अब स्मिता , बंबई की दुनिया में रम गयी थी, पहले सी बीमार नहीं दिखती,चेहरे की रंगत भी लौट आई थी.

पर कुछ लोगों ने कमी निकालने में कोई कोर कसर  नहीं छोड़ी. दिलीप की माँ तो वहीँ पर जोर से बोली..."इ देखो..नईकी बहुरिया त  कुर्सी डटा कर बैठी है, ना घूंघट ना पर्दा....ई त सहर नहीं हैं...इहाँ त गाँव का रिवाज़ चलना चाहिए"

"चाची..बढ़िया है ना...जी भर के देखो बहुरिया को...घूंघट उठा के एक पल को, बस देखने को मिलता...और इतना गर्मी है,कहीं घूंघट के चलते बेहोस हो जाती तो वो भी देखने को नहीं मिलता." ममता ने सफाई दी .

"हाँ आखिर दादी की पोती हो ना..उनपर ही जाओगी ..ऊ भी हमेसा गाँव में नया चाल चलाती थीं." उनके बेटे की दूसरी शादी होने से अम्मा जी ने रोका था यह बात वे भूली नहीं थी जबकि शादी के आठ साल बाद, दिलीप की बहू के गोद में फूल सा बेटा खेला, ये बात वो याद नहीं रखतीं.

सब कुछ हंसी ख़ुशी  निबट रहा था. वो एक एक रस्म याद करके करवा रहीं थीं. दूसरे दिन ही प्रकाश ने बोला, 'माँ आज शाम हम लोगों  को निकलना है.."

"हम लोगों को?"....वे बिलकुल नहीं समझीं.

"हाँ माँ,मुझे और प्रीति को वो क्या है ना....प्रीति के पिताजी ने कश्मीर का टिकट कटवा दिया है...वहाँ घूमने जाना है...नहीं तो टिकट बेकार हो  जायेगा.."

"बस तुम और दुल्हिन?"

"हाँ माँ..प्रकाश कुछ झेंप गया "...तो वो बडबोली,नमिता बोली.."का माँ .तुमको तो कुछ पता ही नहीं..भैया हनीमून पर जा  रहें हैं.."

"हनीमून....वो कौन सी जगह है...कश्मीर तो सुना है.."

प्रकाश उठकर बाहर चला गया. स्मिता धीरे से हाथ पकड़ उन्हें एक तरफ  ले गई , "माँ आजकल लड़का -लड़की शादी के बाद घूमने जाते हैं...उसे ही हनीमून कहते हैं.."

"अकेले??" उन्हें ये बात बिलकुल समझ  नहीं आ रही थी.

नमिता फिर टपक पड़ी..."तो क्या पूरे गाँव को लेकर जाएंगे?..दीदी तुम छोडो माँ को समझ में नहीं आएगा."

तभी छटंकी मीरा बोल पड़ी.."हनीमून में क्या मून को देख के हनी खाते हैं " आजकल उसे अंग्रेजी पढने का बहुत शौक चढ़ा था. पति छोटी छोटी अंग्रेजी की कहानियों की किताबें ले आते और वो उनमे से पढ़ उन्हें भी सुनाया करतीं...और शब्दों के अर्थ मोटी सी डिक्सनरी से ढूंढ कर बताया करती.पति की तरह इसे भी पढने का बड़ा शौक था. हर वक़्त किताबें थामी रहती.

पर स्मिता ने डांट दिया उसे, "भाग यहाँ से अंग्रेजी की बच्ची जब देखो...बड़ों के बीच में घुसी रहती है..जा बाहर जा के खेल"

"पर 'चौठारी 'कैसे होगा...रोज़ ही कोई ना कोई रस्म होते...हर दिन एक रस्म  का तय था"

"माँ , अब तुम अपने आप कर लेना रसम. भैया  की शादी क्या आम शादी जैसी है?...जब दूसरे जात की लड़की लाने में परहेज़ नहीं की तो फिर ई सब रसम के पीछे क्यूँ पड़ी हो." ..अपनी छोटी बेटी को कंधे पर थपकाते ममता बोल पड़ी.

"धीरे बोल.... गाँव में अभी किसी को नहीं  मालूम...."

"क्या माँ...सबको पता होगा..ऐसी बातें नहीं छुपतीं..तुम्हारे मुहँ पे कोई नहीं बोलता...सब काना फूसी करते होंगे"...और वे सोचने लगीं..कितनी सयानी हो गयी हैं उनकी बेटियाँ...उन्हें ही घेर कर समझा रही हैं.

और अब उन्हें पता चला कि बहू के मायके की गाड़ी और ड्राइवर अब तक क्यूँ रुका हुआ था. इन्हें वापस ले जाने को. और बहू क्यूँ सर झुकाए सारे रसम कर रही थी. उसे तो पता था, दो दिन बाद चले ही जाना है..चलो सुखी रहें दोनों..जहाँ रहें, उन्हें और क्या चाहिए. सोचती पर मन ही मन उदास होती वे गाँव में बयना भेजने की तैयारी करने लगीं. हफ्ते भर में सारे मेहमान चले जाएंगे. बहू  तो शाम को ही चली जाएगी. लगेगा ही नहीं इस घर में अभी अभी ब्याह हुआ है और दुल्हन उतरी है.

(क्रमशः)

21 comments:

रश्मि प्रभा... said...

itni achhi kahani ... to aalochna kya karen !

Mired Mirage said...

रश्मि, इतना अच्छा जब लिखती जाओगी तो आलोचना कैसे करूँगी? आलोचना का अवसर तो दो! वैसे भी गाँव की ये सब बातें लगभग नई हैं मेरे लिए। बस एक बात है, यह स्त्री सारे परिवार, हर पीढ़ी के साथ निभाए जा रही हैं। जैसे निभाना इनका ही उत्तरदायित्व हो। इनके पति को शायद पता नहीं कि अनजाने में उनके घर कौन रत्न आ गया।
घुघूती बासूती

ashish said...

सुन्दर कड़ी , नमिता का लड़के को भैंस पर बिठाकर फोटो लेना रोमांचित कर गया.. गाँव में हो रहे सामाजिक बदलाव को अच्छी तरह रेखांकित किया है आपने.

Sadhana Vaid said...

यह कड़ी भी बहुत खूबसूरत लिखी है आपने ! नमिता का चरित्र चित्रण बहुत मन भाया ! उसमें एक आग है, जला कर राख करने वाली नहीं, सेक कर उपचार करने वाली, सहेजने वाली, संवारने वाली ! कहानी बहुत सुन्दर जा रही है ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा है !

shikha varshney said...

"ये लड़की है या अगिया बेताल " .....हा हा हा अहह ..मुझे सबसे ज्यादा यही पसंद आया ..मतलब कि पूरी कहानी में नमिता का चरित्र ही छाया रहा दिमाग पर ...
ग्रामीण परिवेश के बदलते रंग.. कैसे अनजाने ही बदल जाते हैं अपने आप ही ..बहुत खूबसूरत चित्रण किया है आपने.

शेरघाटी said...

सुन्दर चित्र लेखन तो है ही प्रभावी .
हमज़बान पर पढ़ें प्रभाष जोशी को

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत धैर्य से कहानी आगे बढ़ रही है...माँ - पिता की भूमिका अच्छी लगी...कम से कम समय की मांग के अनुसार सोचा...आज भी ऐसे माता पिता मिल जाते हैं जो जाति को आगे ला कर अपने ही बच्चों की इच्छाओं को नज़रंदाज़ करते हैं...गांव में भी बदलाव की प्रक्रिया अच्छी लगी....नमिता का बिंदास होना मन को भाया ...आज लड़कियों को हर बात के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए ... और लोगों की कानाफूसी की बात भी ...लोग तो हमेशा ही कुछ ना कुछ कहते ही हैं...बहुत सकारात्मक सोच को दिखाया है....प्रकाश का चरित्र भी आज के हिसाब से दर्शाया है...बच्चे कहाँ सोच पते हैं कि उनकी खुशियों के लिए माँ बाप ने क्या कुर्बानी की है...कुल मिला कर अच्छी प्रस्तुति....बस इसी को आलोचना समझ लेना :):)

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर लगी यह कडी भी थोडी लम्बी हो गई लेकिन रोचक थी इस लिये पुरी पढी अगली कडी का इंतजार है

शोभना चौरे said...

रश्मिजी
बहुत ही सुन्दर रही यह कड़ी कहानी की |बदलते समाज की हुबहू तस्वीर खिची है आपने ,वो भी सहजता के साथ न ही कोरा आदर्शवाद है न ही दकियानूसी मानसिकता |
नमिता का चरित्र आज की नारी का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने मूल्यों को लेकर अपना मुकाम बना रही है |नदी की धरा के साथ बहने वाले पिता कितनी सहजता के साथ परिवर्तन को स्वीकार कर रहे है यह मिसाल है |
अगली कड़ी का इतजार |मई तो आपकी सहज और रोचक भाषा शैली की कायल हो गई हूँ |
शुभकामनाये |

mukti said...

घुघूती बासूती जी की बात से सहमत हूँ. आपने इस कड़ी में तो कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी. बहुत ही रोचक ढंग से कहानी का ये हिस्सा लिखा है आपने. शुरू से अंत तक औत्सुक्य बना रहा.
साधना जी की बात भी सही है नमिता के चरित्र के बारे में. मुझे लग रहा है जैसी मेरी तारीफ़ हो रही है :-) क्योंकि मैं बिल्कुल ऐसी ही थी बचपन में और अब भी :-)
पिछली कड़ी पर कमेंट लिखकर रखा था कि नेटवर्क ने धोखा दे दिया. आज पोस्ट कर देती हूँ.

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त कहानी चल रही है....

लड़की है या अगिया बैताल...दादी की याद आ गई...:)

बढ़िया प्रवाह..आगे इन्तजार करते हैं.

वाणी गीत said...

लड़की है या अगिया बैताल ....
कहानी (इसे उपन्यास ही कहना ठीक रहेगा t)के इस अंश में तो नमिता ही छाई हुई है ...
नमिता और प्रकाश के माता -पिता नयी पीढ़ी के साथ सामंजस्य करते हुए नए समय की आहट को निरुपित कर रहे हैं ...

निर्मला कपिला said...

अज की किश्त कुछ लम्बी हो गयी मगर रोचकता इतनी थी कि एक साँस मे पढी गयी। बहुत अच्छी चल रही है कहानी । शुभकामनायें

शुभम जैन said...

Di, ek baar padhna shuru karti hu to pura khatam karke hi najar uthti hai aisa bandh leti ho aap apni lekhni se...aurat ke charitra ka sundar chitran kiya hai...badlate samay ke saath saamanjasy baitate huye bakhubi wo apne sare dayitav nibhati ja rhi hai...namita ka charitar bahut manbhavan aur majbut hai...uske liye utsukta aur badhti ja rhi hai...jaldi bataiye aage jakar wo kya banane wali hai kahi dono bahno ki tarah uski bhi jaldi shadi to nahi ho jayegi???...kai sari baate maan me aati hia agli kadi ka intjar hai jaldi likhiyega...

वन्दना said...

सबने कह दिया और अब मेरे लिये तो कुछ छोडा ही नही……………बेहद सुन्दर चित्रण्……………… जो वक्त के अनुसार खुद को ढाल ले वो ही समझदार कहलाता है और यही वक्त की माँग़ भी थी………………बेहद रोचक कहानी चल रही है।

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रवाह बना हुआ है। कहानी में समय घुल जाता है।

PKSingh said...

bahut achhi kahani...behad rochak.


गौरतलब पर आज की पोस्ट पढ़े ... "काम एक पेड़ की तरह होता है."

Harsh said...

bahut achchi lagi aapki kahani ...........lekhan jaari rakhiye isi tarah .............

अनामिका की सदाये...... said...

बहुत सशक्त लेखन को दर्शा रही है आपकी कहानी. मैं क्रम से पढ़ रही हू सारी कड़ियाँ. हर एक चरित्र को वक्त वक्त पर उबार कर हर एक के साथ न्याय किया है. एक दम सधे हुए बहाव में चल रही है कहानी.

सुद्ड तरीके से गाँव की सोच को भी उभारा है.
बधाई.

दीपक 'मशाल' said...

एकदम गजबे चित्रण किये जा रही हैं दी... बस घर के बूढ़े लोगों का चला जाना अखरा.... अम्मा जी का बेटी के बाप से सम्मान मिलने पर लजाना.. लड़के का हनीमून के लिए भागना.. नमिता का भाई के समर्थन में बात करना... आदि आदि..

Sanjeet Tripathi said...

beautiful, ghughuti ji ne kitni sahi baat kahi, aalochana ke liye koi point dikh hi nahi raha kam se kam is kisht me to ....

baki namita ka charitra chitran bahut hi pasand aaya.....

muaafi is kisht par der se aane ke liye...