Saturday, July 10, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -8)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था और छोटा बेटा मेडिकल में.ससुर जी की छत्र छाया भी कैंसर जैसी  बीमारी ने छीन ली)

गतांक से आगे


पति को लेनदारों से ज्यादा फिकर अम्मा जी की हालत की थी. बाबू जी के जाने के बाद, अम्मा जी का सिर्फ बाहरी रूप ही नहीं बदला था,अंदर से भी वे बिलकुल बदल गयी थीं,ऐसा लगता था पुरानी अम्मा जी कहीं गुम हो गयी हैं....ना वह रौबदार आवाज़,ना वह चौकस निगाह...खुद में ही खोयी सी बैठी रहतीं.


गाँव में इतने काज-प्रयोजन होते पर अब वे कहीं नहीं जातीं. हर शादी में अम्मा जी की बड़ी खोज  होती थी...क्यूंकि सारे रस्मो-रिवाज उन्हें ही याद रहते थे. जबतक वे ना जाएँ रस्म शुरू नहीं होती थी. चाहे हल्दी की रस्म हो...मटकोर की या बिलोकी की. गाँव में शादी के दस दिन पहले से गीत गाने का रिवाज़ था. शुरू में पांच गीत भगवान के गाये जाते. लड़कियों को तो बस उन दिनों के चलन  वाले गीत याद रहते या फिर गीतों भरी  गालियाँ ..अम्मा जी ही सब याद रखती थीं.


किसी बच्चे के जनम की चिट्ठी आई गाँव में और घर घर न्योता पहुँच गया, सोहर  गाने का. औरतें जमा होतीं, गीत गाने के बाद  उनके बालों में तेल लगाए जाते और मांग में सिंदूर. और बताशे बांटे जाते. पर ये सब सिर्फ लड़के के जन्म पर ही होता. लेकिन स्मिता की बेटी के जनम पर उन्होंने आग्रह किया था गीत गवाने का. अम्मा जी मान गयी थीं और जब ममता के बेटे के जनम जैसा इस बार भी पति बताशे की जगह लड्डू लेकर आए तो गाँव वालों में कानाफूसी शुरू हो गयी थी, "का ज़माना आ गया है....लरकी लोग  सब कालेज जा रही है....बेटी के जनम पर बधाई,गाई जा रही है.....नयका चाल सब...पता नहीं आगे का का देक्खे को मिले"


अम्मा जी को  शादियों में जाने का भी बड़ा शौक था. सुन्दर चमकीली साड़ियाँ निकालतीं. ढेर सारे गहने पहनतीं, झुमके, हँसुली, सीता -हार, करधनी ...कभी कभी तो बाजू बंद भी. लम्बी सी चोटी, माथे पर बड़ी सी टिकुली और भर मांग सिंदूर..लम्बी चौड़ी काया थी, गोरा रंग,ऊँचा माथा,उस पर जब गर्वीले चाल से चलतीं तो किसी राजरानी सी ही लगतीं.

पर अब उनकी तरफ देखा नहीं जाता. सादी सी साड़ी, बिना किसी श्रृंगार के रूप...आभरण विहीन शरीर...चाल भी थकी थकी सी हो गयी थी. किसी भी शादी ब्याह में अब वो शामिल नहीं होतीं. लोग बुलाने आते, नमिता पीछे पड़ जाती,पर वे टाल जातीं...जबकि बड़ी बूढ़ियाँ शादी में शामिल होती थीं,पर एक किनारे बैठी होतीं.वहीँ से निर्देश दिया करती थीं. पर किसी चीज़ को हाथ नहीं लगातीं. दूर ही रहती थीं. अब तक हमेशा अम्मा जी केंद्र में रहती थीं. इस तरह हाशिये पर रहना उन्हें गवारा नहीं था.

कितनी बार अम्मा जी ने बात संभाली थी . पड़ोस के रामबिलास बाबू की लड़की की शादी में लेन देन को लेकर कुछ अनबन हो गयी,बारातियों और सरातियों के बीच. उसपर से गाँव के लड़कों ने अपनी नाराजगी दिखाने को,बारातियों के कपड़ों पर खुजली  वाले  पाउडर डाल दिए. लड़के के चाचा,भाई,नाराज़ होकर बारात वापस ले जाने लगे. बार बार लड़के को आवाज़ देते बाहर आने के लिए.. लड़का आँगन में मंडप में बैठ चुका था. उनकी आवाज़ सुन वह झट से खड़ा हो गया,बाहर जाने को.

पर अम्मा जी ने उसकी कलाई पकड़ ली और कहा, "चुपचाप बैठिये मंडप में...बिना फेरा लिए और लड़की की मांग में सिन्दूर भरे आप आँगन नहीं टप सकते."

लड़का कसमसा कर रह गया,बाहर जाने को..पर जा नहीं पाया....और अम्मा जी ने कड़े  स्वर में पंडित जी को आदेश दिया, "आप हल्ला गुल्ला पर ध्यान मत दीजिये,मंतर पढ़िए...सुभ मुहूरत नहीं बीतना चाहिए"

फिर लड़की की छोटी बहन को डांटा..."का मुहँ ताक रही है...जा, अपने बाबूजी को बुलाकर  ला,रसम करना होगा. बाहर उनके भाई-भतीजा सब सलट लेंगे और रामावतार बबुआ के बाबूजी भी हैं...सब संभाल लेंगे.


फिर रोती हुई लड़की की माँ को आवाज़ दी..." अबही बेटी बिदा नहीं हो रही है...जो इतना रो रही हो...अभी समय है...बईठो, सकुन्तला के बाबूजी के बगल में और रसम करो"

हर शादी -ब्याह के मौके पर इसकी चर्चा जरूर होती थी.

और अम्मा जी सिर्फ शादी ब्याह में ही बात नहीं संभालतीं .अनदिना भी कहीं कुछ झंझट हो तो एकदम मुसतैद  रहतीं. एक बार नमिता दौड़ती हुई आई कि कैलास बाबू के यहाँ बहुत रोना-पीटना मचा हुआ है. कैलास बाबू के बेटे  दिलीप की दूसरी सादी की बात चल रही है और दिलीप की पत्नी धाड़ें मार कर रोते रोते बेहोस हो गयी है. हमेशा कहीं भी कंघी-चोटी कर के , साड़ी बदल कर जाने वाली अम्मा जी,ने जल्दी से पैरों में चप्पल डाला और नमिता के साथ निकल गयीं. वे विकल हो रही थीं, जानने को,वहाँ क्या हुआ? नमिता तो सारी बात बिना सुने वहाँ से टस से मस नहीं होती.

उन्होंने मीरा को बोला, "तू थोड़ी देर में आके बता, वहाँ क्या हो रहा है"


पहली बार ऐसी कोई जिम्मेवारी मिलने पर मीरा ख़ुशी से फूली  नहीं समाई और  दस मिनट में दौड़ती हुई आई ..."माँ, दादी तो सबको डांट रही हैं...दिलीप चाचा को बोल रही हैं...तुमरे भाई के बच्चे का तुमरे बच्चे नहीं हैं जो दुसर बियाह करने चले हो...इनको ही अपना बेटा-बेटी के तरह पियार दो..अपने माँ-बाबू से जियादा तुमको मान देंगे .."
और मीरा ने पूछा..."फिर से जाऊं...और सुन के आके बताऊँ?"

पर उन्होंने  मना कर दिया..कैसे अपनी छोटी सी बेटी में ये आदत डालती कि दूसरों की बातें सुन कर बताये ...और फिर पता था...अभी तो हफ़्तों  तक गाँव में यही चर्चा रहेगी. एक एक बात दस दस बार दुहराई जाएगी. और उनके घर मे काम करने वाली सिवनाथ माएँ तो ऐसी जगहों पर जरूर मौजूद रहती.और फिर तफसील से उन्हें सारी बात बताती.

"अरे पता है दुलहिन, (दादी बन जाने के बाद भी गाँव के कुछ लोगों  के लिए वे दुलहिन ही थीं ) बड़की मलकिनी ने तो कैलास बाबू को अईसा डांटा की का बताएं, बोलीं.." "बौरा गए हैं का..बुढापा में?...ऊ औरत पर का बीतेगी..इसका तनको गुमान है?... कहाँ जायेगी वो ..?"

"भौजी...वो काहे  कहीं जायेगी ?..रानी बनके रहेगी..दिलीप के बच्चों को खेलाएगी"

"बहुत देखे हैं बबुआ...कए दिन  रानी बनके रहती है...सब पता है..ऐसा अनरथ  मत करो....भतीजा  भी तो बेटा सरीखे ही होवे है  और अबही कौनो उमर है...पांचे बरिस में उमीद छोर दिए? "

"अरे भगवान का दिया सब कुछ है भौजी...दुनो जन आराम से रहेंगी..कौन तकलीफ नहीं होगी,दिलीप के दुलहिन को...तुम चिंता जनी करो....मालकिन बड़की दुलहिन ही रहेगी.."

"ई त नहीं होगा...आप जबरदस्ती बियाह करोगे दिलीप का..तो गाँव का कोई सामिल नहीं होगा...जाओ सहर में कागज़ी बियाह करो...और फिर सहर में ही बसा दो उनको. ई घर में तो इहे दुलहिन मलकिनी रहेगी...." मलकिनी ने  ने फैसला सुना दिया.


फिर अंदर जाकर रोती हुई दुलहिन को बच्चे की तरह छाती से चिपका कर उसकी सास से बोलीं, "तुमको तनिको दया नहीं आती...औरत हो, औरत का दर्द समझो.."


बड़की मलकिनी ने तो दिलीप के दुलहिन को उबार लिया ,उसका रोआं रोआं मलकिनी के रिन से कभी  उरिन नहीं होगा.


सिवनाथ माएँ, गर्व से फूली जा रही थी कि वह, उनके यहाँ काम करती है. और क्यूँ ना करती,अम्मा जी ने कई बार उसकी बस्ती के झगडे भी सुलझाए हैं. सास बहू के..माँ-बेटे के...पति -पत्नी के . सिवनाथ माएँ को भी उसकी बहू ठीक से खाना नहीं देती थी. यहाँ से उसे पूरा खाना मिलता लेकिन वह यहाँ  नहीं खाती.अपनी गहरी सी पीतल की थाली में दाल चावल सब्जी लेकर घर जाती और पोते पोतियों को खिला देती. उसके घर में जो साग-भात रुखा सूखा बना होता...वो भी उसकी बहू उसके लिए नहीं रखती.सिवनाथ माएँ, भूखी ही लेट  जाती और फिर सिर्फ पानी पीकर चेहरे पर मुस्कान लिए शाम के काम के लिए हाज़िर हो जाती.

वो तो भला हो घर घर  की बिल्ली नमिता का, उनकी बस्ती में वह  थरमामीटर ले एक बीमार बहू का बुखार देखने गयी थी. नमिता एक तरह से उस बस्ती की डाक्टर थी. किसी को बुखार की,किसी को सर दर्द की..पेट दर्द की तो जुलाब की दवा, वो ही दिया करती. अपने पापा जी से जिद कर बिस्किट के पैकेट भी मंगवाती और किसी बीमार को देकर आती. उसने ही एक दिन देखा कि सिवनाथ माएँ खाना लेकर आ रही थीं,उनके पोते पोतियाँ दौड़ते हुए उनके पास आए और सिवनाथ माएँ ने अपना सारा खाना पोते पोतियों को दे दिया. नमिता ने दबे पाँव उनकी झोपडी में कदम रखा  तो देखा, चूल्हा ठंढा पड़ा है और बर्तन  खाली. सिवनाथ माएँ ने घड़े से लोटे में ठंढा पानी निकाल कर पिया और चटाई पर जाकर लेट गयीं. वह दबे पाँव वापस आ गयी और दादी को सारी बात बतायी.


गुस्से से उबल रही थी,नमिता. सिवनाथ माएँ के आते ही उनपर बरस पड़ी.." काकी सब देख लिया मैने..जाओ तुम उधर ही रहो...अपनी पुतोह को खाना  भी बना कर दो. सब काम करो उसका,उस दिन देखा था तुम उसको तेल लगा रही थी.और वो तुमको पेट भर खाना भी नहीं देती."

"अरे तुमलोग के लिए ही करते हैं बिटिया..ओ दिन वो छटपटा रही थी देह बत्था से...त तनका तेल लगा के देह जाँत दिए...आज हम अनकर की बेटी की  सेवा करेंगे तो मेरी भी कमली , सुगनी की उसकी सास करेगी..वईसे ही तुमरी सास भी तुमरा ख़याल  रखेगी.."

"मुझे नहीं करना सादी बियाह ...माँ काकी को खाना दो पहले...इनका पेट बस बात करके ही भर जाता है."


बाद में , अम्मा जी ने सिवनाथ और उसकी  बहू को बुला कर बहुत  डांटा और उन्हें उस झोपडी से निकालने की धमकी भी दी अगर उन्होंने अपनी माँ का ठीक से ख़याल नहीं रखा. बाबू जी की दी हुई जमीन पर ही पूरी बस्ती बसी हुई थी,इसलिए उनकी बातों का सब मान रखते थे.


और अब वही अम्मा जी इतनी निरीह लगतीं.पहले मनिहारिन  सबसे पहले उनके घर ही आती. अपनी टोकरी का सब कुछ पहले उन्हें ही दिखाती. हर हफ्ते अम्मा जी चूड़ियाँ बदला करती थीं. टिकुली के नए पैकेट निकालतीं. अब तो मनिहारिन को देखते  ही वे इशारा कर देतीं कि मत आओ आँगन में. अम्मा जी भी उसकी आहट सुनते ही कमरे में जाकर लेट जातीं. उनका कलेजा कट कर रह जाता.

पर अजीब दुविधा भी थी, उस गरीब की भी आस थी,दो पैसे कमाने की.पर उनकी ना हिम्मत होती ना ही मन होता, उसे अपने दरवाजे बुलाने का..


स्मिता ने भूगोल की किताब में पढ़ कर बताया  था कि सूरज स्थिर रहता है और हमलोग जिसपर जन्मे हैं वो पृथ्वी  उसके चारो तरफ चक्कर लगाती रहती है, वे  सोचने लगीं , क्या औरत आदमी का भी कुछ ऐसा ही रिश्ता है.? आदमी सूरज की तरह स्थिर रहता है और औरत की सारी दुनिया उसके  चारो तरफ ही घूमती रहती है. फिर यह भी विचार आया  मन में  और जब कभी सूरज डूब जाता है तो अँधेरी रात आ जाती है, पर सूरज तो दूसरे दिन फिर निकलता है. जबकि पति के जाने के बाद औरत की ज़िन्दगी में ऐसी अँधेरी रात आ जाती है जो कभी ख़त्म ही नहीं होती.

उसका सूरज तो हमेशा के लिए डूब जाता है, औरत की दुनिया ही रुक जाती है, अब वो किसके गिर्द चक्कर लगाए? वो चलना ही भूल जाती है. जबकि अगर औरत कहीं बिला जाए, गायब हो जाए तो आदमी को कौनो फरक नहीं पड़ता.  कोई दूसरी  औरत आ जाती है चक्कर लगाने नहीं तो वह अपनी जगह वैसे ही स्थिर रहता है. उसका कुछ नहीं बदलता. पर ये नियम किसने बनाए हैं ? भगवान ने या फिर खुद आदमी ने? उनका दिमाग कुछ काम नहीं करता.

कहीं भी शादी ब्याह हो, अब अम्मा  जी उन्हें ही जाने को कहतीं. खुद अँधेरे में लेटी रहतीं. फिर उनका मन भटकने लगता,अब ये नियम किसने बनाए? जिस दादी,चाची,माँ का ह्रदय बच्चे के लिए आशीष से लबालब रहता ,हरदम ओठों पर उनके सुख की कामना रहतीं उन्हीं के रस्मों में भाग लेने से कुछ अशौच  हो जायेगा?  कुछ छू देने से अपवित्र हो जायेगा? मन ही मन प्रण लिया उन्होंने, चाहे जो हो जाए...गाँव वाले कुछ भी कहें, दोनों  पोते और पोतियों के ब्याह में अम्मा जी हर रस्म करेंगी. उनको बिलकुल भी वे दूर नहीं रहने देंगी.

पर सोचा हुआ भी हुआ है कभी? अम्मा जी की अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही और खाने पीने से अरुचि बहुत महँगी पड़ी. सिर्फ मलेरिया हुआ. लगा ठीक  हो जाएँगी. डॉक्टर भी कहते, कोई चिंता की बात नहीं. पर अम्मा जी की कमजोर काया यह बीमारी झेल नहीं पायी और वे भी सबको रोते-बिलखते छोड़ ,बाबूजी के पास चली गयीं.


पति के चेहरे की तरफ देखा नहीं जाता. पहले ही कम बोलते थे अब तो ऐसे गुमसुम हुए कि मशीन की तरह बस श्राद्ध कर्म निबटाते  रहें. ननदें आयीं, ऎसी  दिल दहलाने वाली आवाज़ में रोयीं कि आज भी कलेजा काँप जाता है. ममता,स्मिता प्रकाश,प्रमोद सब आए.पर इतने लोगों के होते हुए भी घर मे सन्नाटा छाया रहता. छोटे बच्चे भी सहम  कर धीरे धीरे रोते. अब तो बिलकुल अनाथ हो गए  सब.
(क्रमशः)

33 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

रश्मि जी ,अब जबकि मैं आप की कहानियां बल्कि ये कहानी पढ़ रही हूं मुझे समझ में आ गया है कि वंदना आप की इतनी तारीफ़ क्यों करती है,इतनी सहजता से कैसे लिख लेती हैं आप?
यद्यपि मैं क़िस्त्वार कहानियां आम तौर पर नहीं पढ़ती पर इसे पढ़ने से ख़ुद को रोक भी नहीं पाती ,
बहुत बढ़िया !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक भाग प्रस्तुत किया इस कड़ी में....अम्माजी का पूरा चरित्र चित्रित हो गया...और पुरुष और स्त्री की सूरज और धरती से तुलना....बहुत सटीक लगी....सहजता से कही ,प्रवाहमयी कहानी....

shikha varshney said...

औरत आदमी का भी कुछ ऐसा ही रिश्ता है.? आदमी सूरज की तरह स्थिर रहता है और औरत की सारी दुनिया उसके चारो तरफ ही घूमती रहती है और जब कभी सूरज डूब जाता है तो औरत की दुनिया ही रुक जाती है, अब वो किसके गिर्द चक्कर लगाए? वो चलना ही भूल जाती है. जबकि अगर औरत कहीं बिला जाए, गायब हो जाए तो आदमी को कौनो फरक नहीं पड़ता. कोई दूसरी औरत आ जाती है चक्कर लगाने नहीं तो वह अपनी जगह वैसे ही स्थिर रहता है. उसका कुछ नहीं बदलता. पर ये नियम किसने बनाए हैं ? भगवान ने या फिर खुद आदमी ने? उनका दिमाग कुछ काम नहीं करता

कितनी सहजता से आपने सारी बात कह दी ...इस बात पर तो मेरा दिमाग भी काम नहीं करता ..इस किश्त में बहुत सी सामाजिक समस्याओं की तरफ इशारा किया है आपने जिन्हें हम देखते हैं भोगते हैं ,नापसंद भी करते हैं लेकिन फिर भी कुछ नहीं कर पाते.
एक और दर्द भरी किश्त ....

kshama said...

Padhte,padhte aankh nam ho gayi...

सारिका सक्सेना said...

I don't have words to say anything. Your writing is amazing.

Sadhana Vaid said...

बहुत ही प्रभावशाली और सशक्त लेखन ही आपका ! हर बार कड़ी में एक पात्र का बहुत ही स्वाभाविक और रोचक चरित्र चित्रण कहानी के एक नये आयाम को पाठक के सामने खिडकी की तरह खोल देता है ! स्त्री पुरुष के सम्बंधों को आपने सूरज और धरती की उपमा से जिस तरह से व्याख्यायित किया है वह सर्वथा मौलिक और प्रशंसनीय है ! कहानी की यह कड़ी भी बहुए अच्छी लगी ! बधाई !

दीपक 'मशाल' said...

इस बार और भी रोचक हो गई कहानी.. अब घर में कम ही लोग बचे हैं.. सूरज-धरती को विज्ञान से जोड़ा और फिर उगने-डूबने से.. यहाँ कुछ मामला नहीं जमा दी(या मेरी ही समझ में नहीं आया).. अगर धरती सूरज के चारों तरफ घूमने का उदाहरण लिया तो डूबना और उगना तो गैर्वैज्ञानिक हो गया वो कैसे आपने लिया?.. बाकी बचे लोगों में अम्मा(दुल्हिन) के साथ क्या नमिता ही रहती है ये देखना है..

ashish said...

गाँव की सामाजिक व्यस्था में स्त्रिया महत्वपूर्ण होती है. अम्मा जी का सामाजिक सरोकार और ग्रामवासियों द्वारा उनकी इच्छा का सम्मान इस बात की पुष्टि करता है .और ये सम्मान उन्होंने किसी सूरज के चारो ओर घूमकर नहीं प्राप्त किया.., ये अम्माजी विशेषांक कड़ी बहुत प्रभावशाली बनी है. आभार.

rashmi ravija said...

दीपक...तुम हमेशा इतने ध्यान से पढ़ते हो...अच्छा लगता है..

विज्ञान से नहीं जोड़ा...बस इतना लिखा.."औरत की सारी दुनिया उसके चारो तरफ ही घूमती रहती है और जब कभी सूरज डूब जाता है ...आदि "
डूबने से मतलब "मृत्यु" से है....बस प्रतीकात्मक है कि औरत की दुनिया, अपने पति के चारो तरफ घूमती है,सुबह से लेकर रात तक. जबकि आदमी की नहीं...

rashmi ravija said...

@ आशीष जी,
जरूर किसी सूरज के चारो ओर घूम कर नहीं किया..यह उनका अपन व्यक्तित्व था लेकिन...पति की मृत्यु के बाद औरतों के लिए बहुत कुछ वर्जित हो जाता है. वे विवाह समारोह की रस्मों में भाग नहीं ले सकतीं...साज-श्रृंगार नहीं कर सकती....और जिन औरतों को श्रृंगार बहुत प्रिय हो...उनके लिए यह नई स्थिति स्वीकारनी बहुत मुश्किल हो जाती है. ऐसा लगता है सूरज की रोशनी में ही उनका अस्तित्व है अन्यथा नहीं.

शोभना चौरे said...

हमारे रीती रिवाजो अनुष्ठानो में विधवा महिलाओ की उपस्थिति को मान्यता नहीं दी जाती है एक जीते जागते इन्सान के साथ इस तरह का व्यवहार उसको सार्वजनिक रूप से अपमानित करना ही कहलाता है |
बहुत सी जगहों पर इन सबका विरोध हुआ है और सकारात्मक नतीजे भी निकले है |अम्माजी का इस तरह से अपने आप को समाज से अलग कर लेना इन चीजो को और बढवा देना ही हुआ है |जो महिला इतने प्रगतिशील विचारो वाली है
उन्हें विधवा महसूस करवाना? न करवाना? आगे की पीढ़ी की जिम्मेवारी है ?
नमिता की निस्वार्थ समाज सेवा मन को भा गई |

Udan Tashtari said...

शानदार लेखन...अम्मा जी का जाना दुख दे गया...वाकई, प्रभाव छोड़ गई यह कड़ी..आगे इन्तजार है.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अम्मा जी का रुतबा, गांव में उनकी हैसियत, और आत्मविश्वास सब सजीव हो उठा है. अम्मा जी का जाना, किसी अपने बुजुर्ग के जाने जैसा लगा. मार्मिक अंक.

Mired Mirage said...

यह किश्त भी बहुत बढ़िया रही।
घुघूती बासूती

रवि धवन said...

ऑफ डे पर आपकी कहानी पढ़ी। नहीं तो "आय हेट लव स्टोरी" मूवी देखने का प्रोग्राम था। पिछली कहानी की एक एक किस्त पढऩे से मूड खराब हो जाता था। जब मजा आने लगता तब कहानी रूक जाती। आंखें नम कर दी इस कहानी ने...। "उन्हें हंसी भी आई। आज लगा बेटी पराई हो गई है...उसका ख्याल रखने को उन्हें, कोई ओर बता रहा है"। वाह! अब ये बता दो कि कितनी किस्तों तक कहानी चलेगी ताकि अगले ऑफ डे पर अंत पढ़ सकूं। वैसे ह्रदय की बात तो यह है कि ये कहानी बस चलती रहे...।

वाणी गीत said...

जिन्दगी भर श्रृंगार में सजी स्त्री को इसके बिना देखना बहुत मुश्किल होता है...
स्त्री और पुरुष सूरज और धरती ...रिश्तों का ऐसा ग्रह -उपग्रही समानीकरण ...गज़ब ...
पत्नी के समाप्त होने पर पति की जीवन यात्रा रूकती नहीं ...मगर पत्नियों की जिंदगी तो बस पति के होने तक ही होती है ...हाँ आज समय बदल गया है ...अपने आस पास इतने तलाक और पुनर्विवाह के किस्से देख रही हूँ ...मगर तुम्हारी कहानी जिस समय के लिहाज़ से है ...पति पत्नी के रिश्ते की यही तुलना ठीक लग रही है
एक और सुन्दर रोचक कड़ी ...
पिछली पोस्ट में तुमने कमियां बताने का आग्रह किया था ...तुम्हारे लेखन में क्या कमी निकालूं मैं ...तुम तो भावनाओं और रिश्तों को इतनी ख़ूबसूरती से जकड कर रखती हो की पाठकों को अपने ही आस पास की कहानी लगने लगती है ...और मैं खुद तुमसे बेहतर लिख सकूँ तब तो कुछ कमी निकालूं ...:):)

Saurabh Hoonka said...

दीदी,
व्यस्तता के कारण कई दिनों बाद पढ़ पा रहा हूँ . लेकिन कहना होगा की आपकी range बहुत ज्यादा है. स्टील वेटिंग... और उदास आँखे... ...........जहाँ तक मुझे लगता है अब आने वाली किस्तों मै नमिता की कहानी आगे बढेगी.देखते है नमिता की किस्मत उसको कहा ले जाती है. सो दीदी इ ऍम स्टील वेटिंग फॉर नेक्स्ट किस्त............. :)

rashmi ravija said...

@वाणी..तुम लकी हो, कि तुमने इतने पुनर्विवाह के किस्से देखे है. पर मुझे अभी तक ऐसा कुछ देखने की खुशकिस्मती नहीं मिली है. जबकि मैं खुद मुंबई में हूँ, मेरे रिश्तेदार, दिल्ली, लखनऊ,कानपुर, भोपाल, इंदौर, कलकत्ता, चेन्नई जैसी जगहों में हैं. इतनी सारी सहेलियां हैं, उनके रिश्तेदार हैं. पर स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं देखे.

हाँ, अब दुर्व्यवहार नहीं होता उनके साथ, इतना तो है....लेकिन दुख की अनुपस्थिति,सुख की गारंटी तो नहीं है?? शादी ब्याह में आज भी वे शामिल नहीं हो सकतीं. लाल-गुलाबी-पीले-नारंगी रंगों को सदा के लिए अलविदा कहना पड़ता है....चूड़ियाँ, बिंदी..सजना संवारना बंद...नॉन-वेज़ नहीं खा सकतीं.

इतनी बातें ध्यान में आ रही हैं कि एक पोस्ट ही लिख डालती हूँ :)

और मेरी इतनीsssssss तारीफ करने का शुक्रिया...वैसे किसी ने अपनी दही को खट्टा कहा है आजतक? :)

rashmi ravija said...

@इस्मत जी,...आप शायद पहली बार मेरे ब्लॉग पर आई हैं...और इतनी सारी तारीफ भी कर दी...बहुत बहुत शुक्रिया
कई लोग कहते हैं किस्तों में पढना उनके लिए मुश्किल होता है...पर क्या करूँ..ब्लॉग पर एक साथ लिखना मुश्किल है...और लोगों के लिए पढना भी :)
वंदना आपकी भी बहुत तारीफ करती है..

rashmi ravija said...

संगीता जी, शमा जी, शोभना जी, समीर जी, आशीष जी, दीपक,शिखा, वंदना ,सारिका,
सबका बहुत बहुत धन्यवाद...हमेशा इतने ध्यान से पढ़ते हैं आपलोग ,(तभी लिखने की भी प्रेरणा मिलती है )
शोभना जी,सही कहा...ये हमारी और आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेवारी है कि इन कुरीतियों को जड़ से मिटा डालें. और इस बात का ध्यान रखें कि पति को खोने के बाद भी स्त्री के जीवन में कोई बदलाव ना आए.

rashmi ravija said...

@ रवि जी, आपने एक साथ ही सारी कड़ियाँ पढ़ीं और डायलौग याद भी रखे...शुक्रिया
पर ये कैसे बताऊँ...कौन सी कड़ी समापन किस्त होगी....जब मुझे ही नहीं पता.:)

rashmi ravija said...

@सौरभ , तुम भी अपने इतने बिजी शेड्यूल से समय निकाल कर पढ़ रहें हो..शुक्रिया .
range का तो नहीं पता...पर स्वीकार करती हूँ,गाँव की पृष्ठभूमि पर लिखने में थोड़ी सशंकित जरूर थी,कि न्याय कर पाउंगी या नहीं. पर जब सबको अच्छी लग रही है तो ...ठीक ही होगा,सब.

shikha varshney said...

रश्मि ये कड़ी और इसमें दिखाई कुछ सामाजिक कुसंगतियाँ मेरे दिल के इतने करीब हैं कि पहले सोचा था कि कुछ नहीं कहूँगी ..परन्तु शोभना जी कि टिपण्णी इतनी अच्छी लगी मुझे कि अब अखे बिना रहा नहीं जा रहा,
कितना ठीक कहा है शोभना जी ने कि नै पीडी ही कुछ कर सकती है .गाँव की तो बात छोडो हमारे शहरों में आजतक पति की मृत्यु के बाद रस्मो के नाम पर को काम कराये जाते हैं ( मेने खुद अपने पापा की मृत्यु के समय देखा )उन्हें याद कर आज भी मेरी आँखे क्रोध और क्षोभ से भर आती हैं.हम अपने घर के कामो में तो इन कुसंगातियों से लड़ सकते हैं पर कहीं और विरोध करना बहुत ही मुश्किल होता है.
आपको एक आँखों देखा किस्सा बताती हूँ दिल्ली जैसी जगह का .एक घर में कुछ पूजा थी जहाँ बेटी की विधवा माँ को बेटी की सभ्य सास ने कहा कि आइये अपनी बेटी के साथ पूजा में बैठिये ..तो उनके पास बैठा उनका ( सास ) भतीजा जो एक पढ़ा लिखा ,मल्टीनेशनल कम्पनी का हेड है ये कहता पाया गया .."पागल हो गई हो क्या? क्यों बुला रही हो उन्हें चुपचाप अपनी पूजा करो".कुछ नहीं बदला रश्मि मंजिल अभी बहुत दूर है ..

Shubhra said...

Rashmi di
Blog khholte hi itani damakedar kahani padhne ko mili(kahani,ya upnyas)maja aya.kahani par bad mi likhhugi,aaj ek jaruri bat......pratibha apna rasta khhud banati hai.yah bat sach hai"kahani bahut rochak lag rahi hai,

निर्मला कपिला said...

ये कडी और खास कर इस पर प्रतिक्रियायें मन को छू गयीं। रश्मि --अब दुर्व्यवहार नहीं होता उनके साथ, इतना तो है....लेकिन दुख की अनुपस्थिति,सुख की गारंटी तो नहीं है?? ये शायद बहुत अच्छा मुद्दा है जो इस कहानी के माध्यम से उठा है और मुझे इन्तजार रहेगा इस पर तुम्हारी पोस्ट का। शुभकामनायें

JHAROKHA said...

rashmi ji ,
aapki har kahaani dil par ek gahari chhap chhod jaati hai.ek baar jo padhna shuru kiya to uska(the end) kiye bina chhodne ka man hi nahi karta. aapka lekhan hamesh se bahut hi prabhav shali va dil tak sama jaane waala hota hai.
poonam

रश्मि प्रभा... said...

अम्मा जी का स्वरुप अनुकरणीय है.... पर उनका जाना ....! कहानी में बाँध लेती हैं आप

वन्दना said...

बहुत ही संजीदगी से अम्मा जी का चरित्र और हालात का वर्णन किया है…………………ग्रामीण परिवेश को बहुत ही सुन्दरता से चित्रित किया है……………चाहे भाषा हो या वहाँ के गीत्……………एक मँज़े हुये कहानीकार की तरह लिखा है।

Sanjeet Tripathi said...

सबसे पहले तो मुआफी, इतनी देर से आने के लिए, पिछले कुछ दिन इतने व्यस्तता भरे रहे कि सुबह से निकला दिन के खाने के लिए घर भी नहीं पहुंच पाया, ब्लॉग पढ़ना तो दूर्।

आपकी हर किश्त कहीं न कहीं अपने से जुड़ी लगती है लेकिन यह किश्त कुछ ज्यादा ही।
दर-असल जब तक बाबूजी (पिताजी) थे तब तक माता जी का रुआब देखा था, हर जगह कहां कहीं भी शादी ब्याह या कोई और रस्म हो माता जी केंद्र में रहती थीं।
बाबूजी के जाने के बाद वे केंद्र से हटकर खुद ही किनारे रहकर हर निर्देश देती आ रही हैं यह तो खुद ही देखा है।

कभी कभी यह बड़ा ही अजीब भी लगता है। हालांकि अपने घर में ऐसा नही है कि किसी मौके पर माताजी दरकिनार हो, लेकिन सामाजिक स्तर पर विधवाओं की जो हालत देखते आए हैं उसे देखते हुए आपकी कहानी की यह किश्त
समसामयिक है।

आज 8-10 ब्लॉग पढ़ा और रोमन में कमेंट भी किया, लेकिन इकलौती आपकी इस पोस्ट ने मजबूर किया कि नहीं, यहां हिंदी में लिखकर अपनी बात रखूं।

इंटरनेट पर किश्तों में कहानी पढ़ना एक तो आपके ब्लोग से और एक पंजाबी अनुवाद घर, बस ये दो ब्लॉग से ही सीखा।

शुक्रिया।

रेखा श्रीवास्तव said...

poori 4 kishten eka saath padheen hai. gaanv men shahr ke liye palati bhranti ko jis tarah se ukera hai, bahut khoobsoorat hai. badon ko apane mulyon ko samay ke saath badlane ka bahut sundar chitran kiya hai. graanya jeevan ki sajeev prastuti sarahneey hai.
intjaar agali kadi ka.

Mrs. Asha Joglekar said...

अम्माजी के चरित्र को आपकी लेखनी ने जीवन्त कर दिया है । अम्माजी जैसी औरतें बिरला जरूर लेकिन होती तो हैं ।

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

प्रभावशाली

mukti said...

इस पोस्ट में अम्मा जी के चरित्र को बहुत ख़ूबसूरती से उभारा है आपने. उनके जैसा रौबीला व्यक्तित्व हमारी एक बुआ जी का भी था. ऐसे ही शादी-ब्याह में रस्मों के लिए उन्हें ही याद किया जाता. वैधव्य की पीड़ा का भी मार्मिक चित्रण है. घर की मालकिन जो कभी घर की धुरी होती है वो अचानक से अपशकुन कैसे बन जाती है? अब भी गाँवों में विधवा की स्थिति वैसी ही है... बहुत थोड़ा अंतर आया है.