Thursday, July 8, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -7)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था और छोटा बेटा मेडिकल की तैयार)

गतांक से आगे
 


 प्रमोद की मेहनत रंग लाई और उसे मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया. नमिता ने यह खबर  सुनते ही कहा, "चलो अच्छा हुआ,डॉक्टर की फीस बची...अब छोटके भैया  अपना इलाज़ खुद कर सकेंगे, एकदम फूलकुमार है, जरा सी हवा चली और बीमार पड़े."

"अरे सुभ सुभ बोल....जब देखो उटपटांग ही बोलेगी" अम्मा जी ने डांटा.

पर प्रमोद इतना खुश था कि बुरा नहीं माना,बोला, " ना मैं तो दिमाग का डॉक्टर बनूँगा और सबसे पहले तेरा दिमाग खोल के देखूंगा...उसमे कुछ भी काम का है या नहीं?"

"माँ...देखो, ना..फिर से चिढाना शुरू.."

"अरी चुप कर...ये भी प्रकाश की तरह अब होस्टल में पढने दूर चला जायेगा...एक बात करने को भी तरसेगी...और झगड़ रही है.?" वे उदास हो गयीं...ये बेटा भी अब परदेसी हो जायेगा.

फिर से एडमिशन और हॉस्टल के खर्च की चिंता सताने लगी. अब तो जैसे यह जानी-बूझी बात हो गयी थी कि पैसे का इंतज़ाम पुरखों के विरासत में छोड़े खेतों से ही होगा. प्रकाश की भी जब फीस की बात आती, कोई ना कोई खेत गिरवी रखी जाती या निकाल दिया जाता. लेकिन अब गाँव वाले भी उनकी ये मजबूरी समझने लगे थे और बाज़ नहीं आते, मौके का फायदा उठाने से. अच्छे से अच्छे खेत के कम दाम लगाते.

इस बार तो हद ही हो गयी,जब गाँव के  नामी गिरामी रामनिवास बाबू  ने कह डाला, "खेतों में तो इतना लगाओ तब जाकर थोड़ा सा अन्न उपजे है. वो आम का बगीचा क्यूँ नहीं गिरवी रख देते. छुड़ा लीजियेगा जब जी चाहे. अब तो दूनो पोता डॉक्टर,इंजिनियर बनने वाला है. आपको क्या फिकर"

पर बाबूजी नाराज़ हो गए थे, "कैसी बातें करते हैं? ..उस बगान का आम ही पसंद है सबको...रामावतार जी को तो बचपन से बस उसी बाग़ के किसनभोग  और तोतापुरी आम के पेड़ का आम पसंद है. उसे कैसे हटा सकते हैं"

"सोच लीजिये...इस बार तो हमारा खेत पर पैसा लगाने का कौनो मन नहीं है" कहते रामनिवास बाबू उठ गए.

रात भर लगता है बाबू जी सोए नहीं..सुबह होते होते...किसना को रामनिवास बाबू के घर भेज दिया. अम्मा  जी भी उदास थीं. उन्होंने ही एक बार फिर हिम्मत की, "बाबू जी रहने दीजिये ना...कोई और रास्ता सोच लेंगे"

" ना बहू, वे  ठीके कहते हैं...तीन साल में तो परकास  नौकरी में आ जायेगा..फिर का डर?....और अब घर में लरिका सब रहेगा कहाँ आम खाने को??... भगवान की दया  से और भी तो बगान है...आम की कौनो कमी नहीं रहेगी. समझो कुछ दिन के लिए उनलोगों  को दे दिए हैं आम खाने को...बस"

पर बहुत ही भारी दिल से किए होंगे हस्ताक्षर उन्होंने. क्यूंकि तन कर चलने वाले बाबू जी ,कचहरी से लौटते समय बड़े कमजोर लगे..कंधे झुके हुए ,थके थके से. अब ये उनकी आँख का भरम था या सच्चाई,क्या पता.पर बड़ी ग्लानि हो आई ,उन्हें. बच्चों के लिए ऊँचे  अरमान रखने की क्या कीमत चुकानी पड़ती है. बच्चे समझ पाएंगे कभी?

छोटा बेटा भी प्रकाश की तरह ही एक अजनबी शहर में अपने सपनो को सच करने चला गया . इसके लिए मन में और चिंता थी. थोड़ा बीमार रहता था. सर्दी जुकाम लगा ही रहता था. बस चैन की यही बात थी कि ननद उसी शहर में थीं, जरूरत पड़ने पर अपने घर ले जायेंगी..इतना संतोष था. बेचारे को कभी कभी घर का खाना नसीब हो जायेगा. नहीं तो प्रकाश जैसा ये भी कहेगा,
"वहाँ तो आलू -बैंगन हो या गोभी मटर  सब की एक सड़ी सी महक. स्वाद ही भूल गया हूँ,सब्जी का" और हंस के बताता, " इतवार को दाल भात और आलू  का भुजिया मिलता है...उस दिन तो हमलोग भात घटा देते हैं और फिर खूब हल्ला मचाते  हैं मेस में"

पति उसका एडमिशन कराने गए और इधर बाबू जी बीमार पड़ गए. पेट में दर्द और बुखार रहता. गाँव के डॉक्टर साब को बुलवा भेजा.जब तक दवा का असर रहता,आराम रहता फिर दर्द शुरू हो जाता.

पति वापस आए तो घबरा गए. बार बार कहते.."बाबू जी को उस बगीचे को गिरवी रखने  का दर्द समा गया है. मैने देखा था,उस दिन उन्होंने वो खिड़की बंद कर दी जिस से वो बगीचा दिखाई देता था...मैने क्यूँ देने दिया...कोई इंतज़ाम करता...लोन ले लेता, पर बगीचा नहीं  देना चाहिए था" भर आई पति की आँखें.

"अब यह सब सोचने का बखत नहीं है...आप कल ही बाबू जी को शहर ले जाने का इंतज़ाम कीजिये." उन्होंने ही जी कड़ा कर पति को ढाढस बंधाया.

अम्मा जी, बाबू जी को लेकर पति,शहर  चले गए. साथ में एक नौकर भी गया. दोनों बेटियों के साथ वे दरवाजे पर टकटकी लगाए रहतीं. आखिर दूसरे दिन गाँव का ही....एक आदमी संदेसा लेकर आया कि बाबू जी को अस्पताल में एडमिट कर लिया है, बहुत सारी जांच होनी है. तीन दिन बाद थके हारे पति कुछ घंटों के लिए ही आए. वह भी पैसों का इंतज़ाम करने.

अब तो जैसे  टोह लेने के लिए गाँव के लोग मक्खियों  की तरह भिनभिनाते रहते घर के आस-पास. देख वितृष्णा सी  हो जाती जिन बाबू जी के गुण गाते नहीं अघाते थे कि कैसे अकाल पड़ा था तब बाबू जी ने अनाज की कोठियां खोल दी थीं....सबको टोकरी भर भर के अनाज बांटा था और आज जब उन पर मुसीबत आई है तो वही गांववाले, जिन  खेतो के अन्न ने उनकी  जठराग्नि को शांत किया...आज उन्हीं  खेतों पर दांत पिजाये बैठे हैं.

पति के साथ, जिद करके बाबा की दुलारी नमिता भी चली गयी. बेचैन हो रही थी, अपने बाबा से मिलने के लिए.

घर में बस वे और मीरा थीं. मीरा शुरू से ही कम बोलती अब तो और भी उसकी हिरणी सी बड़ी बड़ी आँखें डरी डरी सी रहतीं. उन्हें दया  भी आती,इस बच्ची का बचपन छिना जा रहा है.जब से समझने लायक हुई है..कोई ना कोई झंझट घर में लगा ही हुआ है.

 नमिता के जाने से अच्छा ही हुआ. गाँव के ही एक लड़के के साथ, सास वापस आ गयीं. उन्हें लगा ,चलो अस्पताल  में दिन रात के जागरण से थक गयी होंगी. एक-दो दिन आराम कर लेंगी. पर वे तो आने के साथ ही कहीं चली गयीं. और हैरान रह गयीं वे अम्मा जी का ये रूप देखकर. सुबह से शाम वे किसी बाबा ,फ़कीर,ओझा के दरवाजे भूखी-प्यासी  भटकती रहतीं. कभी कभी कोई बाबा आते और तीन तीन घंटे पूजा करवाते. अपने चेलों के साथ..पूरी, मिठाई ,खीर का भोग लगाते, मोटी दक्षिणा लेते और चलते बनते.

पहले संदूक से कुछ भी निकलवाना हो, उन्हें चाभियाँ थमा देती थीं. अब खुद ही कमरा बंद कर के गहने निकालतीं.वे समझ रही थीं, औने पौने दाम में इसे बेच ओझा-फ़कीर को चढ़ावे चढ़ाए जायेंगे. क्या पता , गहने भी दिए जाते हों. पर वे मन मलिन  नहीं करतीं. ये अम्मा जी के गहने थे और ऐसे समय में जब पति बीमार हो...कोई भी स्त्री किसी भी तरह, चाहे उसे ओझा, गुणी, बाबा की शरण में ही क्यूँ ना जाना पड़े, कोई उपाय नहीं छोड़ती, बस अपने पति को  भला चंगा देखना चाहती है.

पर एक दिन उन्हें अम्मा जी को बहुत देर तक समझाना पड़ा. जब हमेशा एक आभिजात्य ओढ़े रखने वाली शख्सियत , गाँव की स्त्रियों के ऊपर एक रुआब, एक दबदबा  रखने वाली अम्मा जी, एक आम औरत की तरह बब्बन की माँ से झगड़ पड़ीं. गाँव की किसी औरत ने अम्मा जी कान भर दिए कि बब्बन की माँ डायन है और उसी ने बाबू जी को कुछ 'कर' दिया है. उस शाम वे उनकी घर की  तरफ से लौट रहें थे, तभी जानबूझकर मंगलवार के दिन को बब्बन की माँ ने सांझ के बखत उन्हें टोका.

बब्बन की माँ,बाबू जी का हालचाल पूछने आई थीं,अचानक जोर की आवाज़ सुन वे बाहर आयीं तो देखा,अम्मा जी हांफ रही हैं और जोर जोर से बोल रही हैं, " भौजी  कहते थे आपको....कुछ तो लेहाज़ करती...कौन बात के जलन है..का मिल जाएगा...कुछ बिगाड़े हैं,आपका...जहाँ तक हुआ है मदद ही किए हैं..आपकी बेटी के बियाह में केतना हंगामा हुआ था....रामवतार बबुआ के बाबू जी नहीं संभालते तो बरात चली जाती लौट के"

" का बोल रही है...भलाई का तो ज़माना नहीं...हम आए थे हाल चाल पूछने और हमी को गरिया रही हैं"

एक तरह से खींच कर वे ,अम्मा जी को कमरे में ले गयीं...उनसे भी माफ़ी मांगी.." चाची जी..अम्मा जी बहुत परेसान हैं..इनके कहने का बुरा मत मानियेगा"

ये सुनकर अम्मा जी का गुस्सा और बढ़ गया..." अरे ऊ का मानेगी बुरा...गाँव के दो दो लोग को खा के बैठी है..ऊ त खुस होगी"

" का बोली..किसको खाए हैं हम....तनका बताओ तो?" बब्बन की माँ जोर से गरजीं

" सिवनाथ माएँssss...." जोर से चिल्लाईं  वे. मामले की नजाकत समझते हुए.सिवनाथ माएँ ,बब्बन की माँ को खींच कर जबरन उनके घर ले गयी. वे अम्मा जी के लिए पानी लेकर आयीं .पर तब तक अम्मा जी का सारा गुस्सा,सारा तनाव आंसुओं की शक्ल ले चुका था. मुहँ पर पल्ला रख, वे जोर जोर से रोने लगीं. अम्मा जी को चुप कराते कराते उनके आंसुओं का बाँध भी टूट गया.और उनके गले से लग देर तक वे रोती रहीं. मीरा कब सहमी सी आकर परदे पकड़ कर खड़ी हो गयी...और भरी भरी आँखों से कांपती हुई सी उन्हें निहारने लगी...उनलोगों  को पता भी नहीं चला.
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बाबू जी का जांच पर जांच होता गया. काया क्षीण  होती गयी.पर बीमारी का पता नहीं चल रहा था. अब बारी बारी से वे, नमिता, अम्मा जी शहर आते जाते रहते. प्रमोद,प्रकाश के पढने के लिए जो घर लिया था,उसी घर में  लोग रहने लगे. बेटी दामाद सब आ गये. पति आए दिन गाँव जाते और ढेर सारे रुपये लेकर आते. सहम  जातीं वे , पता नहीं इस बार कौन से खेत का अन्न अब उनकी कोठी का मुहँ नहीं देख पायेगा?

बाबू जी की बीमारी ने  सास का रुख नमिता के प्रति बहुत नरम कर दिया था और कैसे ना हो...नमिता ने बाबू जी का सिरहाना एक पल के लिए नहीं छोड़ा था. पूरी पूरी रात जाग, उनके तलवे सहलाती, पानी पिलाती, इधर उधर की  बात कर उनका जी बहलाती. जरूरत पड़ने पर ,बिना किसी का इंतज़ार किए दवा लाने भी चल देती. अम्मा जी का पूजा पाठ बहुत बढ़ गया था. रोज चार चार घंटे कोई ना कोई जाप करती रहतीं. बाबूजी तो बीमारी के कारण अपनी पुरानी काया की छाया भर दिखते पर अम्मा  जी   उनकी बीमारी की चिंता में घुल कर ही आधी रह गयी थीं.

आखिर जब, दूसरे सहर से बड़े डॉक्टर आए , उन्होंने जांच करके बताया कि कैंसर है. पति तुरंत उनको दिल्ली बम्बई ले जाकर इलाज़ कराने का सोचने लगे पर उस डॉक्टर  ने बताया कोई फायदा नहीं.अंतिम स्टेज है, अब कोई दवा असर नहीं करेगी. पूरा रोना -पीटना मच गया. सबको सम्भालना मुस्किल. फिर भी पति ने ननदोई के साथ मिलकर दिल्ली ले जाकर दिखाने का इंतज़ाम किया. बाबू जी बार बार कहते, "मुझे बस गाँव ले चलो..अंतिम दिन वहीँ गुजारने का मन है..." पर जबतक सांस तब तक आस..उन्हें ले जाने का सब इंतज़ाम हो गया,दूसरे दिन निकलना था और रात में ही बाबू जी के प्राण ने शरीर त्याग दिया. उनका नश्वर शरीर ही गाँव आ पाया. पूरा गाँव उमड़ पड़ा.

पति पर बहुत जिम्मेदारी आ गयी...सब कुछ अकेले  संभाल रहें थे. उन्होंने घोषणा कर दी...बाबू जी का श्राद्ध इतने धूमधाम से करूँगा...कि पूरा गाँव देखेगा. वे कुछ बोली नहीं ,पर सोचने लगीं...पैसे का इंतज़ाम कैसे होगा? और जब फिर से लोगों का जमघट बाहर के कमरे में देखा और पति को कागज़ पत्तर समेटते तो टोक बैठीं. आखिर दो बेटियाँ ब्याहनी बाकी थीं. दोनों बेटे की पढ़ाई अधूरी थी. पति का पिता प्रेम वे समझ रही थीं पर इस तरह आंखों के सामने, ऐसी लापरवाही वे नहीं देख पायीं.पर पति नाराज़ हो गए,
 "मेरे बाबू जी थे, मुझे पता है,क्या करना है क्या नहीं? ..तुम्हारे घर में यह सब होता होगा कि आदमी दुनिया से गया और भुला दिया. मैं तो ऐसा भोज दूंगा कि बरसों तक गाँव वाले बाबू जी का श्राद्ध ,याद रखेंगे."

काठ मार गया, उन्हें ... मेरे बाबू जी ??...तुम्हारा घर??..सारी ज़िन्दगी गुज़ार दी यहाँ और आज एक पल में पति ने पराया कर दिया. आँसू भरी आँखों से कुछ कहने को सर उठाया पर आजकल तो पति के पैर घर में टिकते ही नहीं. बोलने के बाद दनदनाते  हुए निकल गए. उनका दुख दूना-चौगुना हो गया.एक तो सर पर से बाबू जी का साया उठ गया और आज तो लगा भरी दुपहरिया में किसी ने बीच राह पर छोड़ दिया है, और दूर  तक बस जलती हुई राह पर नंगे पैरों,  अकेले ही चलना है.

इसके बाद होठ सिल लिए उन्होंने. पति पैसे लाकर देते, कहते, "संभाल कर रख दो"...वे रख देतीं. कहते "इतने निकाल कर दो".....वे दे देतीं. पूछतीं कुछ नहीं पर देखती रहतीं, बड़ा सा पलंग बनवाया गया, कपड़े लत्ते,बर्तन बासन की तो बात ही नहीं. घर में जन्मी,पली  गाय भी जब अपने नवजात बछड़े के साथ दान करने की बात सुनी तो आँखें भर आयीं,उनकी. मीरा बिना उसे रोटी खिलाये खाना नहीं खाती थी और जब से बछड़ा जन्मा था ..उसका नाम "भोला " रखा था और भोला के साथ खेलते थकती नहीं थी वो.बस सोच रही थीं, मीरा को कैसे , समझायेंगी.

पति का इस तरह पैसे लुटाना ,अम्मा जी को भी खटक गया. तीसरे दिन जब साधुओं को जीमाना था और हर साधू अलग से दक्षिणा मांग रहा था, पति उनकी मांग पूरी करते  जा रहें थे तब अम्मा जी ने ननद को आवाज दी, "परमिला जाकर बबुआ के  हाथ से बैग छीनो.....का जाने का मन में है उसके..बीवी बच्चों की कोई फिकर ही नहीं...तुमरे बाबू जी का बहुत खुस होते, अपना अरजा  हुआ धन दौलत ऐसे लुटते देख? "

वे भी जानती थीं., बाबू जी भले ही किताबें नहीं पढ़ते  थे पर उनके व्यावहारिक ज्ञान के आगे सब किताबी ज्ञान तुच्छ था. वे समय के अनुसार काम करते थे. बेटी के घर का पानी पीना, पोते के पढ़ाई के लिए आम का बगीचा तक गिरवी रखने में ना हिचकिचाना , नमिता की सारी लड़के जैसी बदमाशियां उन्होंने खुले मन से स्वीकार कर लीं थीं. पति का जीवन कुछ सूत्र वाक्यों के इर्द गिर्द घूमता था. इस से अलग वे नहीं देख पाते. और अपन जीवन उसी ढर्रे में ढाल लिया था.

श्राद्ध में तो अगल बगल के गाँव के लोग  भी शामिल  हुए . पगड़ी  की रस्म  के समय आँगन  दालान  सबमे  तिल  धरने  की भी जगह  नहीं थी. जब पति के सर  पर पगड़ी बांधी जाने लगी  तो एक भी आँख  ऐसी  नहीं थी कि सूखी हो. बाबू जी के रौब से ज्यादा लोग उनका सम्मान और स्नेह करते थे. किसी दुकान वाले ने एक बात नहीं पूछी, और घी के पीपे, शक्कर की बोरी,मिठाई की टोकरी, पता चलने की देर थी और घर पहुंचा दी.

पर सब शांत हो जाने के ,सबके चले जाने के बाद रोज कोई ना कोई लेनदार दरवाजे पर खड़ा होता. अब पति के माथे की लकीरें, गहरा जातीं.पर पैसे तो उन्हें देने ही थे. फिर से लोगो के जमघट के बीच, कागज़ पत्तर की उलट पुलट शुरू हो गयी.

(क्रमशः)

(सॉरी.... कुछ कारणवश इस किस्त को डालने में कुछ  देर हो गयी....कोशिश करुँगी, आगे से शिकायत का कोई मौका ना दूँ, और खुद को सॉरी कहने का भी )

28 comments:

shikha varshney said...

दुखभरी रही ये किश्त ..पर आपकी लेखन शैली का जादू जरा भी कम नहीं हुआ ...एक बात बताओ ये इतनी चुस्त क्षेत्रीय भाषा वाकई आती है आपको ? मतलब बोल लेती हो ? कमाल है यार ...गज़ब का प्रभाव छोडती है ये भाषा कहानी में .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत प्रभावशाली लेखन.....लोग झूठी प्रशंसा में भला बुरा नहीं सोच पते....

काठ मार गया, उन्हें ... मेरे बाबू जी ??...तुम्हारा घर??..सारी ज़िन्दगी गुज़ार दी यहाँ और आज एक पल में पति ने पराया कर दिया. आँसू भरी आँखों से कुछ कहने को सर उठाया पर आजकल तो पति के पैर घर में टिकते ही नहीं.

यह बात कितनी सहजता से लिखी है....स्त्रियां चाहें सारी ज़िंदगी घर गृहस्थी में झोंक दें पर वक्त बेवक्त ऐसे वाक्य दंश सुन कैसा महसूस होता है.. यह बखूबी लिखा है....

माधव said...

nice

ashish said...

आपकी कलम का जादू जैसे सर पर चढ़ बोल रहा है. मै तो झूलता रहता हूँ कहानी के साथ , कभी त्याग, कभी वितृष्णा , कभी मोह , कभी क्षोभ . आपकी नजर ग्राम्य जीवन के हर पहलू का जीवंत चित्र उभर देती है मस्तक पटल पर., वैसे शिखा जी ने आपसे बड़ा वाजिब सा सवाल पुछा है. कोई कैसे बिना भाषा बोले उस भाषा का इतना जानकर हो सकता है और उचित प्रयोग कर सकता है.

rashmi ravija said...

@संगीता जी,
शुक्रिया संगीता जी...आपके कमेंट्स हमेशा उत्साहवर्द्धन करते हैं.

@शिखा एवं आशीष जी
किसने कहा मुझे भोजपुरी नहीं आती..बिलकुल आती है, ये अलग बात है...अब कोई भोजपुरी में बात करनेवाला नहीं रहा...अपनी दादी से हमलोग भोजपुरी में ही बतियाते थे.
और सुना तो खूब है...बहुत पहले की बात है...पर भूली नहीं कुछ...एक एक चीज़ें और शब्द याद आते जा रहें हैं...(ऐसा ना हो अंतिम कड़ी मैं हिंदी की जगह भोजपुरी में ही लिख दूँ...हा हा हा )

शुभम जैन said...

wakai didi laga jaise sab kuch samne hi ho rha ho...kitne bhav umad pade dil me...namita ka apne baba ka apne baba ke prati prem dekh mujhe apni bahu(dadi)ki yaad aa gyi...ek stri ke manobhav ki bahut hi sahaj abhivyakti...

महफूज़ अली said...

उफ्फ्फ ..... मुझे तो पूरा फिर से पढना पड़ेगा ... पिछली और यह वाली कड़ी..... टाइम की बहुत शोर्टेज है.... पता नहीं कब दिन छत्तीस घंटे के होंगे.......

Divya said...

Beautifully written !..waiting for the nest fragment.

Divya said...

next ** [correction]

वन्दना said...

आज की कडी तो बहुत ही मार्मिक रही……………फ़िलहाल तो कुछ भी कहने मे असमर्थ हूँ…………………सिर्फ़ इतना ही कि यूँ लगा जैसे सब कुछ आँखों के आगे घटित हो रहा हो………………।

kshama said...

Sach..ek chalat chitr kee bhaanti chaukhat dar chaukhat katha aage badhti jaati hai..ghar,khet,bageeche,log sab nazar aane lagte hain..

Maria Mcclain said...

You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.

Mired Mirage said...

रश्मि, तुम्हारे लेखन में जादू है।
घुघूती बासूती

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही मार्मिक है आज की कहानी भी, अब जल्दी से आगे भी लिखे, धन्यवाद

rashmi ravija said...

वाणी गीत
की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी

स्त्री का अपना घर कौन सा होता है ...पूरी उम्र यह तय करने में ही निकल जाती है ...
तुम्हारे लेखन का जादू तो सचमुच सर चढ़ कर बोल रहा है ...ग्राम्य जीवन के साथ इंसानी रिश्तों के मनोविज्ञान और विविधता को बहुत ही अच्छी तरह पेश करती हो की सब कुछ आँखों के सामने घटित होता सा महसूस होता है ....
और उसपर भाषा और शब्दों पर पकड़ ...क्या कहने ...मान गए ..

rashmi ravija said...

@शमा जी, घुघूती जी, राज जी,शुभम, दिव्या ,वंदना एवं वाणी
बहुत ख़ुशी हुई कि आप सबों को कहानी पसंद आ रही है...बहुत बहुत शुक्रिया

घुघूती जी एवं वाणी प्लीज़ ये ' जादू है' जैसी बात ना करें...अभी अभी तो लिखना शुरू किया है...कृपया कमियाँ भी निकाला करें ताकि लेखन में सुधार का अवसर मिले.

निर्मला कपिला said...

धाराप्रवाह-- मार्मिक --- बीच मे भाई बहन की नोक झोंक-- देखते हैं आगे क्या होता है। शुभकामनायें।

शोभना चौरे said...

रश्मिजी इतने इंतजार के बाद अक पल में किस्त समाप्त |आपकी लेखनी में में जादू है और सबसे बड़ी बात है आम जिन्दगी के अनुभवो को को इतनी सहजता से गढना |आपकी इस किश्त को पढ़कर अनामिकाजी की ये पंक्तिया स्मरण हो आई
अपनी जगह से गिरकर
कही के नहीं रहते
केश ,औरते और नाख़ून -

Sadhana Vaid said...

बहुत ही प्रभावशाली एवं ह्रदय स्पर्शी कहानी ! आज की कड़ी पढ़ कर आँखें भर आयीं ! बहुत ही सुन्दर लिखती हैं आप ! बहुत बहुत बधाई !

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचकता बनी हुयी है । अन्तराल अधिक न कीजिये ।

गिरिजेश राव said...

मुझे ई मेल फीड दीजिए। तसल्ली से पढ़ेंगे। सीखेंगे भी और मीन मेख भी निकालेंगे :)

roohshine said...

bahut pravahmay karun kadi....bhasha ka madhurya ..dekhte hi banta hai...aur saas aur bahu ka marmik drishy ..bahu ka saas ki manasthiti samjhna.. aur is kadi ki jaan wah paragraph ..janhan pati dwara ye ehsaas hua ki mera kuchh hai hi nahin..

bahut bahut badhayi ...

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मेरे बाबू जी ??...तुम्हारा घर??..सारी ज़िन्दगी गुज़ार दी यहाँ और आज एक पल में पति ने पराया कर दिया
बहुत सार्थक वाक्य. लगभग सभी पत्नियां भुक्तभोगी होंगी इन पंक्तियों की.खेत,बगीचा गिरवी रखना, बाबूजी का बीमार होना और इन से उपजी अम्मा जी की विक्षिप्तता, कमाल है. बधाइयां.
अच्छा हो, कि तुम्हें सॉरी कहने की ज़रूरत न पड़े :)

Sanjeet Tripathi said...

kisht der se milti hai lekin jab padhne baitho to aisa lagta hai ki bas pal bhar me hi samaapt kaise ho gai yah kishht..

ghughuti ji ne kitna sahi kaha, aapke pichhle laghu upanyaas aur is chal rahi kishto ko padhne ke baad unse asehmat hone ka to koi sawal hi nai dikhta mujhe.......

agli kisht ki pratikshha me.....

दीपक 'मशाल' said...

कहानी अच्छी जा रही है पर इस बार शिल्प कमज़ोर रहा दी..

rashmi ravija said...

@दीपक..सच बताऊँ...लोगों के कमेंट्स पढने से पहले...ये प्रवाह,शैली,शिल्प मुझे कुछ पता नहीं था.
जब तुम कह रहें हो ,'शिल्प कमजोर रहा ' तो जरूर होगा...पर मैं सायास नहीं लिखती,इसलिए कहाँ कमी रह गयी...समझ भी नहीं पाती.
ये जरूर है कि काफी अंतराल हो गया था, तो यह किस्त जरा जल्दी में लिखी और पोस्ट कर दी...हो सकता है इस जल्दबाजी में ही कुछ ठीक से नहीं लिख पायी हों.
और तुम्हारा फिर से शुक्रिया...इतने ध्यान से पढने के लिए...ऐसे ही बताते रहना...कुछ कमी देखे तो.

mukti said...

बहुत सी बातें इस एक कड़ी में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में कह दीं आपने...घर के अवसर पाकर सस्ते में खेत खरीद लेने की गाँववालों की आदत, मजबूरी में बाग गिरवी रखने का मन पर पड़ा बोझ, घर के मुखिया के बीमार पड़ने पर घर में व्याप्त तनाव और सबसे बढ़कर अपने ही घर में पराया माने जाने पर स्त्री के मन की पीड़ा ... सच ही बहुत खूबसूरती से आपने ये सारी बातें एक साथ पिरो दीं हैं.
और ये किसी के अंतिम संस्कार के बाद होने वाला भोज ...अच्छे-अच्छों का दम निकाल देता है. एक शादी के जैसा खर्च हो जाता है और हमारे यहाँ तो दसवीं और तेरही को अंतिम बिदाई कहते हैं और उसे ब्याह के सामान ही मानते हैं... ये संस्कार हैं, करने ही पड़ते हैं, पर इतना अपव्यय किसलिए??? क्या जिनकी हैसियत इतना खर्च करने की नहीं होती वो अपने माँ-बाप से प्यार नहीं करते ... सम्मान या प्रेम दिखाने का यही तरीका है क्या?
गुस्सा तब आता है, जब पढ़े-लिखे लोग भी अंधाधुंध खर्च करते हैं ऐसे आयोजनों पर.

संजय गढ़वाली said...

क्या बात हा जी मजा आगया आप के लेख पड़ने में