Saturday, July 3, 2010

♫ उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -6)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. दो बेटियों में से एक की शादी गाँव में हुई थी,उसे  सब सुख था,पर ससुराल वाले कड़क मिजाज थे. दूसरी की शादी बंबई  में हुई थी, घर वाले अच्छे थे पर जीवन कष्टमय था. छोटी बेटी नमिता गाँव में लड़कों की तरह साइकिल चलती,पेड़ पर चढ़ जाती.)

गतांक से आगे

प्रकाश ने इंजीनियरिंग  की परीच्छा  में बढ़िया नंबर लाये और दूर कलकत्ता के पास खरगपुर में उसको एडमिशन  मिल गया. जब कॉलेज और होस्टल के खर्चे की बात उन्होंने सुनी तो उन्हें चक्कर आ गया. इतने पैसे कहाँ से आयेंगे?? वो भी चार साल तक?? पति की अब तक की सारी जमा पूँजी, स्मिता के ब्याह में खर्च हो गयी थी. जमीन जायदाद तो बहुत थी. पर उसे बेचने की बात, सोचना भी जैसे पाप था. पीढ़ियों से इस जमीन जायदाद में कुछ ना कुछ  बढ़ोत्तरी ही होती आ रही थी तभी,आज इसका ऐसा रूप था, उसमे इज़ाफ़ा करने के बजाए  कुछ कमी करने की सोच कर भी  कलेजा मुहँ को आ जाता.ससुर जी को ये जमीन के टुकड़े अपने जिगर के टुकड़े जैसे प्यारे थे.आज भी वो कोई ना कोई जुगत भिड़ाते रहते कि कौन सी जमीन कैसे खरीदी जाए.

 फसलों से घर के सारे खर्च....तीज़-त्योहार...न्योता-व्यवहार....निकल जाते..फिर इतने नौकर चाकर...गाय बैल...बीज,खाद... कटाई बुवाई की मजदूरी...ट्यूबवेल...ट्रैक्टर... हज़ारों खर्च थे. पति की तनख्वाह तो कपड़े लत्ते...बच्चों की किताब-कापियाँ, दूसरे खर्चों में ही ख़त्म हो जाती.

इस अतिरिक्त खर्च का बोझ कैसे उठाया जाए ?? कुछ समझ नहीं आ रहा था.पति चिंतित थे. चार दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गए.फिर एक शाम  बाबू जी ने पति को बुलाया.उन्हें भी आने को कहा. अम्मा जी पहले से ही वहाँ बैठी थीं. बाबू जी ने पूछा,

" का सोचे हो परकास के लिए?"

"हम्म...." पति चुप थे.

"कुछ इंतजाम बात किए हो....बेटा इतना कठिन परिच्छा पास किया है...उसे आगे तो पढाना होगा"

"हम्म.." पति की वैसे भी बाबू जी के सामने आवाज़ नहीं निकलती और आज तो कुछ था भी नहीं बोलने के लिए.

"तुम पता करो केतना पैसा चाहिए...इंतजाम हो जाएगा"

"कईसे ..??" अब जाकर पति के मुख से बोल फूटा.
"अरे..दूर दूर जो जमीन सब है..ऊ सब हटा देंगे...वैसे भी धीरे धीरे  झोपडी बाँध  के सब कब्ज़ा कर रहें हैं...देखभाल ठीक से हो नहीं पाता...मेरी भी उमर   हो रही है...तुम्हे मास्टरी से फुर्सत नहीं है...निकाल देंगे सब."

"बाबूजी...." उन्होंने फंसे गले  से क्षीण प्रतिवाद किया. उन्हें पता था...बाबू जी को जमीन कितनी प्यारी  है. कभी ऐसा करते भी हैं तो बदले में पास की जमीन खरीदने के लिए. 'बेचना' शब्द  का उच्चारण तक  उनके लिए नागवार था. इसीलिए 'हटा' देंगे...'निकाल' देंगे जैसे शब्द बोल रहें थे.


"बाबू जी....मेरा गहना है...उस से अगर..." वे अटकती हुई सी बोलीं...पर इस पर अम्मा जी ने जोर से डांट दिया.

"बहू ई सब, हमारे खानदान में नहीं होता...कि औरत लोग का जेवर लिया जाए...मेरा बेटा तो  कमाता भी  है..डूब मरने वाली बात होगी उसके लिए अगर औरत का गहना  बेचने तक बात पहुँच जाए"

"ना बहू भगवान ओ दिन कब्भी ना दिखाए.....रामावतार जी को पढ़ाया...दो बेटी का बियाह  किया...पर  पिलानिंग कर के....दोनों बेटी की सादी आलू के फसल के बाद की...अब पढ़ाई का सीज़न और फसल का सीज़न तो साथ साथ नहीं चलते ना...कौनो बात नहीं..सब ठीक हो जाएगा..तुम चिंता जनी करो.."
फिर बेटे से बोले  "जाओ चा  पानी करो....अईसे मुहँ लटका के मत घूमो....बेटा पूरे गाँव का नाम रौसन करेगा......हम त जिंदा रहेंगे नहीं देखने को...पर मेरा पोता तो कहलायेगा ,ना .लोग कहेंगे बिसेसर  बाबू के पोते ने ये पुल बनवाया है...ये सड़क बनवाई है...ये बिल्डिंग खड़ी  की है...हमरा भी तो नाम होगा...""

"बस इहे असुभ निकालिए मुहँ से....बेर बखत देखना नहीं है..सांझ का बखत हो रहा है...और ऐसी असुभ भासा " अम्मा जी एक बार फिर गुस्सायीं.

"त तुम का बैठी रहोगी??...जिसकी बेटी बियाह कर लाये हैं...उसका हीला लगा कर ही जायेंगे"

हम त परकास की सादी देख के... गोदी में पर पोता खेलाने के बाद ही, ई दुनिया से जाएंगे "

वे मुहँ पर पल्ला रख कर हंसी दबाती हुई चली गयीं वहाँ से. ऐसी नोक झोंक चलती रहती थी,सास ससुर के बीच में . अगर किसी दिन ससुर जी ने कह दिया, "बुढ़िया कहाँ हैं?"

बस अम्मा  जी का गुस्सा सातवें  आसमान पर "हमरा बुढ़िया उढ़िया मत कहा करें..कह दे रहें हैं...हाँ" :

"काहे अभी बूढ़ायी  नहीं हो...परनाती खेला ली गोदी में " और उनलोगों की लम्बी नोंक झोंक चल पड़ती.

पर वे चाय बनाती हुई सोच रही थीं. पति ज्यादा बाबू जी के सामने पड़ते भी नहीं. लगता था बाप- बेटा दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी हैं.पर बाबू जी, बेटे के दिल की परेसानी एकदम से भांप गए.इसका मतलब नज़र रहती है उनके अपने बेटे की एक एक बात पर.

पति को चाय का कप पकडाया तो इतना ही बोले.."अच्छा है प्रकाश  नानीघर  गया हुआ है...वरना ये  सब उसके कान में पड़ता तो अच्छा नहीं होता "
पर अब वे सोचती हैं,अच्छा होता कि उसे पता चल जाता कि उसकी पढ़ाई के लिए किस तरह पैसों का इंतज़ाम होता था .  उन पैसों की कीमत पता चलती. वरना उसे तो ,यही लगता रहा कि ..पैसों की तो कोई कमी ही नहीं है.

प्रकाश नए बुशर्ट पैंट पहन, नए जूते मोजों से लैस दूर शहर में पढने चला गया. उन्होंने ढेर सारे  निमकी, खजूर, बेसन के लड्डू बाँध दिए साथ में. क्या पता वहाँ क्या मिले खाने को. बीच में भूख लगे तो किस से बोलेगा, "जरा सूजी का हलुआ बना कर दो"

प्रकाश के जाते समय उनका दिल दो टूक हो गया. बेटियों के विदा के समय तो बिलख बिलख का रो  ली थीं .पर यहाँ आँसू जैसे छाती में जम गए थे और सांस लेना भारी  पड़ रहा  था. अट्ठारह साल का बेटा, जिसकी बस हलकी हलकी मूंछें आई थीं,यूँ अकेला इतनी दूर नए शहर में कैसे रहेगा? बेटियों को विदा करते समय इतनी आश्वस्त तो थीं कि किसी समर्थ हाथों में सौंप रही हैं,जो उनका ख़याल रखेगा.पर बेटे का ख़याल कौन रखेगा . जिस बेटे ने एक रूमाल तक नहीं धोया  कभी उसे अपने सारे कपड़े फींचने पड़ेंगे.और आँसू ढरक पड़े,उनके.

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प्रमोद भी मैट्रिक में जिला भर में तो नहीं...पर आस-पास के बीसों गाँव में सबसे ज्यादा नंबर लाया. वह भी प्रकाश की तरह, पास के शहर में पढने चला गया. छुट्टियों में प्रकाश आता तो उसकी बातों से, उसकी चिट्ठियों से प्रमोद इतना प्रभावित होता कि कमर कस लेता,उसे भी बहुत मेहनत करनी है और इस छोटे से शहर  से निकल बड़े शहर में जाना  है. वह अपने बड़े भाई से दो कदम आगे ही रहना चाहता था. और उस पर डाक्टरी पढने का भूत सवार हो गया था. इतनी पढ़ाई की कि उसकी तबियत खराब हो गयी. पूरे साल में एकाध बार शहर आने वाली उन्हें. प्रमोद की  देखभाल के लिए शहर में उसके पास आ कर रहना पड़ा. और अपने बेटे को इस तरह पढ़ते देख, वे भी चिंता में पड़ जातीं. कहीं उसकी तबियत फिर से ना  खराब हो जाए. रात के दो बजे भी उठकर उसके  पीछे जाकर खड़ी हो जातीं ,तो उसे पता नहीं चलता. और वह पढता रहता. "बेटा दूध ला दें...सर में तेल लगा दें?
"ना माँ कुछ नहीं चाहिए तुम जा कर सो जाओ...और वो फिर किसी मोटी सी किताब पर झुक जाता.

पर नींद आती कहाँ से? गाँव का इतना बड़ा घर , इस कमरे से उस कमरे...आँगन..छत करते ही थक जातीं. यहाँ दो कमरे के घर में बिना चले तो लगता जैसे पैर ही अकड गए हैं. वे तहाए हुए कपड़े फिर से तहाने लगतीं. एक जगह से चीज़ें उठा दूसरी जगह रख देतीं. पर उस से क्या थकान होती. नींद आँखों से कोसों दूर रहतीं. सुन कर विश्वास नहीं हुआ था.लोग शहरों में नींद लाने को भी गोलियाँ खाते हैं. अब लगता है,खाना ही पड़ता होगा.
(क्रमशः)

28 comments:

दीपक 'मशाल' said...

इस बार कलम और भी चौकस हो गई लग रही है.. बारीक से बारीक पहलू पर ध्यान दे रही हैं आप.. चाहे गंवई भाषा हो या फिर..बच्चों के बारे में माँ-बाप की सोच हो.. चाहे ये बात हो कि घर में पैसों की किल्लत के बारे में लाल को पता ना चले या फिर उसके अपने हाथ से कपड़े धोने का दुःख.. सब बहुत ही स्वाभाविक तरीके से स्पष्ट किया.. बिना किसी ज्यादा ताम-झाम के कहानी(लघु-उपन्यास) खूबसूरती से आगे बढ़ रही है.. :)

kshama said...
This comment has been removed by the author.
kshama said...

Deepakji se sahmat hun..behad saral aur taral lekhan hai..

रश्मि प्रभा... said...

itna baandhker chalti ho ki utkanthaa bani rahti hai

ashish said...

हर बार मुश्किल होती है प्रशंसा के शब्द ढूढने में , कहानी के लिए.. आज तो ढूंढे भी नहीं मिल रहे है .पलके नम हो गयी.
रश्मि जी , सब तो पढ़ कर चिकित्सक , अभियंता बने जा रहे है , किसी को तो गाँव में रहने दीजियेगा. वरना मास्साब के बाद खेती बारी कौन देखेगा.? ऐसा दादी कहती थी.

mukti said...

बाबूजी और अम्माजी की नोंक-झोंक बड़ी रोचक है. बुढ़ौती में अक्सर होती है... :-)
गाँवों में खेत बेचना अपराध माना जाता है...मेरे बाऊ ने दीदी की शादी में एक छोटा सा हिस्सा बेचा था तो चाचा लोग बुरा मान गए थे, जबकि ज़मीन बाऊ के हिस्से की थी, पर खानदान की बदनामी के डर से.
पिता लोगों की यही बात तो निराली होती है कि मुँह से कुछ नहीं कहते, लेकिन एक-एक सदस्य के मन की बात जानते हैं.
और एक बात आपने बहुत पते की कही है
"...पर अब वे सोचती हैं,अच्छा होता कि उसे पता चल जाता कि उसकी पढ़ाई के लिए किस तरह पैसों का इंतज़ाम होता था ." ...मेरे ख्याल से बच्चों को ये पता होना ही चाइये कि उनकी पढ़ाई के लिए माँ-बाप को क्या-क्या झेलना पड़ता है. यह जानकारी उन्हें ज़िम्मेदार बनाती है.
कहानी की स्वाभाविकता और रोचकता बनी हुयी है...उत्सुकता बढती जा रही है.

ज्योति सिंह said...

itni badhiya aur lambi kahani ke liye thoda waqt to do yaar ,blog par pahunch bhi nahi paate agli kisht taiyaar ho jaati hai ,is umra me ghode ki tarah daudaogi to beech raah me hi gir jaayenge .kuchh to mohalat dijiye janab .jisse shuru kiya to ant bhi brabar kar sake .baki kahani to bahut achchhi hai ,kuchh vystata hai jo aa nahi pa rahi bhag bhag .

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सही कह रही हैं आराधना. अम्मां-बाबू जी की नोक-झोंक बहुत अच्छी और सच्ची लगी. आंचलिक भाषा का भी स्वाभाविक प्रयोग किया है तुमने.
वैसे तीन दिन नेट से गायब क्या रही, दो-दो अंक डाल दिये तुमने?? x(

नीरज गोस्वामी said...

इतनी सरस लेखनी है आपकी के कब पोस्ट ख़तम हुई पता ही नहीं चला...आँखे सजल हो गयीं सो अलग...लिखती रहिये...अगली कड़ी की बेसब्री से प्रतीक्षा है,....
नीरज

Mithilesh dubey said...

mujhe ummid hee nahi pura viswas hai ki aap log bilkul bhi hatoutsahit nahi honge kam comment milne se , mujhe pata hai ki aap logono ko bahut dukh hai blogvani ke band hone se , comment to kam ho hee gayen hain sath hee pasnad bhi nahi mil raha , koi bat nahi keep it up

वन्दना said...

कहानी धाराप्रवाह चल रही है……………हर बार की तरह पूरी तरह बाँध रखा था.......बाकी सब तो दीपक जी ने कह ही दिया है।

roohshine said...

bahut rochak prastuti..bhavnao ka anupam chitran....bas ek kami lagi..is baar ki post chhoti thi ..bahut jaldi khatam ho gayi :(

राज भाटिय़ा said...

पढने मै मन लग रहा है, बहुत सुंदर चल रही है कहानी धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

धाराप्रवाह लेखन ....मन बंधा हुआ है कहानी से....दादा दादी की नोक झोंक...और बेटे की परेशानी में पिता की भूमिका...साथ ही साथ बच्चों को यह भी एहसास करने की प्रेरणा कि उनके भविष्य को उज्जवल बनाने में माँ बाप कि क्या भूमिका होती है....सभी बातों को इस कड़ी में लिया गया है....बहुत ही रोचक प्रस्तुति....अब आगे इंतज़ार फिर शुरू...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक बात और....ज़रा टाइम कि सेट्टिंग ठीक करो ना....यहाँ AM क्यों दिखाई दे रहा है..कमेन्ट में .. :):):)

Sadhana Vaid said...

कहानी ने पूरी तरह से बाँध कर रखा है ! मन इस तरह से रम गया है कि अचानक सामने आया 'क्रमश:' अखर जाता है ! अगली कड़ी की अधीरता से प्रतीक्षा है !

सतीश पंचम said...

आराधना जी के कमेंट को मेरा भी कमेंट माना जाय।

कहानी एकदम सही जा रही है....बढने दिजिए।

shikha varshney said...

इस किश्त का सबसे मजबूत पहलु रहा इसकी भाषा...गज़ब का प्रावाह और आकर्षण पैदा किया है गाँव कि भाषा में संवादों ने ..बहुत अच्छी चल रही है कहानी ..

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक व प्रवाहमयी ।

अनामिका की सदाये...... said...

कहानी बहुत ही असरदार तरीके से आगे बढ़ रही है और यही लेखन की सफलता है की हर छोटी से छोटी बात इस कहानी की मन में बस्ती जा रही है...और बेसब्री रहती है आगे पढ़ने की और हाँ लेकिन ये भी चाह रहती है की ये कभी खतम न हो...बस यूँ ही चलती रहे...हा.हा.हा.

सशक्त लेखन और बढ़िया कहानी.
आभार.

शोभना चौरे said...

रश्मिजी अब मै क्या कहू?मुग्ध हूँ तुम्हारी लेखनी और कल्पना शीलता पर |
बस इंतजार है ?अगली कड़ी का |

Sanjeet Tripathi said...

hmm, muaafi, ek din der se aaya aapke blog par, dar-asal apne bapy ki shadi me gaion gaya hua tha, aap to bas photo dalte rah gain gaon ki shadi ki kal ham vaha khud hi maujud ho kar aa gaye...

baki kahani apni sahi ravaani par chal rahi hai, har kisi ko kahi andar tak touch karte hue..... aur ek safal kahani ki yahi paribhasha hoti hai....... agli kisht ki pratikshha kar raha hu fir se...

Akshita (Pakhi) said...

बहुत सुन्दर कहानी...
__________________
"पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

शुभम जैन said...

gaon ki bhasa ka itna sahaj prayog...bina kisi laar-lapet ke ek aur sundar kadi, agli kadi ki utsukta badhati hui is kadi me amma baba ki nok-jhok bahut achchi lagi...

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान) और राष्ट्रीय अध्यक्ष-बास/ Dr. Purushottam Meena Nirankush, Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Raj. and N. P.-BAAS said...

तलाश जिन्दा लोगों की ! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!
काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=

सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

Mired Mirage said...

वाह, रश्मि! गजब का लिख रही हो।
घुघूती बासूती

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

pahli baar aapke blog par aaya hun aur puri khaani padh li ab to intejaar rahega aage ke bhaag ka... kripya jald prakashit karein...

कविता रावत said...

Bahut achha likhti hai aap.. printout lekar fursat mein aapki kahani padhti hun.. bahut achha lagta hai...
Haardik Shubhkammayne...