Thursday, July 1, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -5)



(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे.बड़ी बेटी ममता की शादी ससुर जी ने पति की इच्छा के विरुद्ध एक बड़े घर में कर दी.वे लोग ममता को तो कोई कमी नहीं महसूस होने देते पर उसे मायके नहीं आने देते. दो भाइयों के बाद जन्मी नमिता,बहुत निडर थी,साइकिल चलाती,पेड़ पर चढ़ जाती और गाँव भर में घूमती रहती )

गतांक से आगे


स्मिता भी दसवीं पास कर गयी और उसके भाग्य से पास के गाँव में ही एक कॉलेज भी खुल गया. पति बहुत प्रसन्न थे. बेटियों के कॉलेज में पढने का सपना अब साकार होता दिख रहा था. बार बार कहते, "पता नहीं शहर भेजने को अम्मा-बाउजी तैयार  होते या नहीं,अब तो झंझट ही ख़त्म. "

उन्होंने आशंका जताई, "वो गाँव भी तो इतना पास नहीं, बाबू जी मान जायेंगे? "

"हाँ, बिलकुल मानेंगे  कोई स्मिता अकेली थोड़े  ही ना जाएगी, शिवशंकर  बाबू की बिटिया भी जाएगी, रामबाबू मास्टर साहब की बेटी भी है,कुल पांच लडकियां हैं,हँसते बतियाते चली जाएँगी....सबसे बात हो गयी है. इसे तो जरूर बी.ए. तक पढ़ाऊंगा,किस्मत की धनी है...इसके इंटर करते ही बी.ए. की पढ़ाई भी शुरू हो जानी चाहिए"

बाबूजी, अनिच्छा से मान  गए,अम्मा जी ने जरूर बहुत विरोध किया ,"अरे लड़िका खोजने में चप्पल घिस जायेगी,पढ़ी लिखी लड़कियों से कोई ना चाहे है,शादी करना...क्या करेगी ई.ए. ,बी.ए. कर के ...आखिर घर संसार ही तो चलाना है"

"तुम नहीं समझोगी अम्मा,पढ़ लिख कर ,घर संसार भी बढ़िया से चलाएगी...अब ज़माना बदल रहा है..."

"हाँ ,बेटा ऊ तो देखिए रहें हैं...बेटी दूसर गाँव पढने जायेगी...जमाना तो बदल ही गया है."...अम्मा जी बेटे के इस तरह मुहँ उठा कर जबाब देने से ही आहत थीं.अब बिलकुल ही हथियार डाल दिए..."जो हरि इच्छा " कहतीं बाहर चली गयीं.

पर पति ने खुद ही  स्मिता को बी.ए.कराने का सपना देखा और खुद ही उसमे खलल डाल दिया. स्मिता बारहवीं में थी, तभी उनके साथी ,शिक्षक ने अपन भतीजे के लिए स्मिता का हाथ मांग लिया. उनका भतीजा बम्बई में रहता था. पति तो बस इस बात से ही रोमांचित हो रहें थे कि उनकी बेटी इतने बड़े शहर में जा रही है. वे कुछ आशंकित  हो रही थीं,इतनी दूर कैसे ब्याह दे बिटिया को. अम्मा -बाऊ जी ने भी टोका पर पति के उत्साह के आगे किसी कि ना चली, एक ही तर्क था 'क्या ज़िन्दगी भर कूप मंडूक बने रहेंगे बच्चे .बाहर निकलने दो उन्हें दुनिया देखने दो....हम ना देख सके तो क्या,उनकी आँखों से ही देखेंगे"

लड़के की भी बड़ी तारीफ़ करते कि उन शिक्षक की बेटी की शादी में आया था बंबई से, सारा दिन काम करता रहता. शहर  के होने का कोई रौब नहीं.बहुत सुसंस्कृत  लड़का है. परिवार भी बहुत बढ़िया है.

पति अति-उत्साहित थे.सारा इंतजाम खुद देख रहें थे.वरना ममता की शादी में तो खुद ही मेहमान जैसे  लगते  थे. बाबूजी के हाथ में उस समय सारी बागडोर थी. अपने जमा किए हुए पैसे भी निकाल लाते बैंक से. उन्हें ही टोकना पड़ता,अभी दो बेटियाँ और हैं...दो बेटों की पढ़ाई -लिखाई है. हुलस कर कहते,"अरे ममता की माँ, सब अपना भाग लेकर आते हैं...तुमने कभी सोचा था, बेटी बम्बई में रहेगी...कभी सपना भी देखा था. ई तो स्मिता का भाग है"

खाना-पीना ,कपड़े लत्ते, इंतजाम बात सब नए ढंग का. पर बाराती इतने सीधे थे,कोई हंगामा नहीं किया,कहीं नाक-भौं नहीं सिकोड़ी...चढ़ावे में कोई नुक्स नहीं निकाले. लड़के वाले का कोई रौब था ही नहीं. वे लोग जैसा कहते झट से मान लेते. लड़का भी चाय-बिस्कुट पर पला,दुबला-पतला बिलकुल शहरी ही लग रहा था. पर मुस्कुराते हुए  अदब से सबके पैर छू रहा था.

वरना ममता के  पति, की अब सारी असलियत दिख रही थी. बिलकुल दामाद वाले नखरे. इतने दिनों में ममता को मुश्किल से तीन  बार मायके आने दिया. बाहर से ही मोटरगाड़ी से छोड़कर चले जाते. जब लेने आते तो सौ मनुहार के बाद घर में कदम  रखते  और  बस एक टुकड़ा मिठाई और एक गिलास पानी पीते और जल्दी मचाते जाने को. ममता के गुलगोथाने  से बेटे को भी वे स्मिता की शादी में ही देख पायीं. मन भर गोद में खिला भी नहीं पायीं. शादी का घर ,सौ काम में बझी रहतीं और वह, कभी इसकी गोद में  कभी उसकी गोद में चढ़ा , काजल लगाए उन्हें टुकुर  टुकुर निहारा करता. बस काम करती उस से बतियाती रहतीं...बेटियाँ हंसती ,"माँ को कुछ हो गया है..."..उन्हें क्या पता, नाती को जी भर कर  नहीं खिला पाने का दुख क्या होता है और दुख और बढ़ गया  जब सुबह स्मिता की विदाई हुई और शाम को ममता को लेने दामाद आ गए.

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प्रकाश का मैट्रिक  का रिजल्ट आया और उसे  जिला भर में पहिला स्थान मिला.कितने सारे ईनाम मिले. गाँव वाले तो उनकी किस्मत से सिहाने लगे...आते  जाते तंज कस देते..."का हो मास्टर बाबू...
भगवान तो छप्पर फाड़ के खुसी दे रहें हैं...बटोर लो दोनों हाथों से"

पति कभी खीझ कर ,कभी मुस्कार कर ,अनसुनी कर जाते ये बातें.

 ससुर जी को कोई कुछ कहने की हिम्मत तो नहीं  करता पर वे खुद ही शाम को चौपाल लगाए बैठे  होते.हर आने जाने वाले को बिठा कर जोर शोर से सुनाते, "अरे बड़की पोती  इतना बढ़िया घर में  गयी है, छोटकी का बंबई  बियाह हुआ...और अब देखो पोता जिल्ला भर में परथम इस्थान लाया." और फिर जोर से आवाज़ लगाते .."परकासsss......ओ  परकासsss ..... चलो पैर छू कर आसिरबाद लो,यही काम आएगा,  आगे जीबन में "

प्रकाश भुनभुनाता हुआ,वापस आता, "नुमाईश की चीज़ हूँ जैसे मैं...हाथ धुलाओ,इतने धूल धूसरित,कीचड़ लगे पैरों को हाथ लगा कर आ रहा हूँ "

"ऐसा नहीं कहते बेटे...मन से सब आशीर्वाद देते हैं.."

पर वो नहीं सुनता,गमछा से हाथ पोंछते भुनभुनाता रहता..."कब कॉलेज में एडमिशन हो और मैं शहर जाऊं...मन नहीं लगता अब यहाँ ,मेरा"

सोचतीं,अभी तो शहर गया नहीं और गाँव से मन उबने लगा...वहाँ जाने पर क्या होगा. और हुआ भी यही. एक घर लेकर एक नौकर, राशन पानी सबका इंतज़ाम हुआ और प्रकाश, पास के शहर  में पढने लगा. शुरू शुरू में इतवार सनीचर आ जाता ,अब तो दो दो महीने गुजर जाते और राम जाने सच या झूठ पर वो पढ़ाई और ट्यूशन  का बहाना कर घर नहीं  आता. पिता,प्रमोद और कभी कभी बहनें भी जाकर मिल आतीं. बस वे और अम्मा- बाउजी  उसकी बाट जोहते रह जाते. पर जब स्मिता बम्बई से आई तो दौड़ा दौड़ा चला आया बहन से मिलने.

स्मिता शादी के छः महीने बाद दस दिन के लिए आई थी. देखकर एक बार तो चौंक ही गयीं...एकदम दुबली पतली...चेहरा पीला पड़ गया था...आँखों के नीचे काले गड्ढे...घबरा गयीं वे...."बीमार थी क्या..."

"ना माँ...बस ऐसे ही ".

साथ में दामाद जी भी थे. बोल पड़े, "इसीलिए तो लेकर आया हूँ..इन्हें वहाँ का खाना रुचता ही नहीं. अब थोड़ा अपने हाथ का बना  खिलाइए कि इनके चेहरे की रंगत लौटे."

पहले तो उन्हें लगा...शायद ससुराल में ,ठीक व्यवहार  नहीं  करते. पर एक दिन में ही शंका निर्मूल सिद्ध हुई. जिस तरह दामाद उसका ख्याल रखते...देख मन को शांति मिलती. लगता बरसों बाद घर में इतनी हंसी ख़ुशी आई है. दामाद ,अपने साले -सालियों से खूब घुल -मिलकर बातें करते. सुबह सकारे ही गाँव में घूमने निकल जाते. बच्चे भी उन्हें दिन भर बगीचे, नहर, पोखर घुमाते रहते. कितनी सारी तो फोटो खींच डाली. उनका बनाया भी छक कर खाते और एक एक चीज़ की तारीफ़ करते. इतना तो कभी उनके बेटों ने भी नहीं की .सास ससुर से भी खूब गाँव के किस्से सुनते. पति से उनके स्कूल की सारी खबर ली. फिर स्मिता को मायके छोड़ अपने गाँव चले गए और उन्हें बार बार ताकीद कर दी..."अच्छे से खिलाइयेगा इन्हें "

उन्हें हंसी भी आई...आज लगा बेटी पराई हो गयी है...उसका ख़याल रखने को उन्हें ,कोई और बता रहा है. सारे बच्चे स्मिता के आगे पीछे घूमते रहते..."छोटकी दी..बंबई  के किस्से सुनाओ ना...फिर सब उसे घर कर बैठ जाते और वो वहाँ की बातें बताया करती..."इतने ऊँचे ऊँचे घर है...थक जाओगे पर गिन नहीं पाओगे, कितना मंजिला  मकान है??  इतनी तेज ट्रेन चलती है. लोग ऑफिस भी ट्रेन से जाते हैं...चारो तरफ बिजली रात तो कभी लगता ही नहीं...समंदर में
 इतनी ऊँची ऊँची लहरें "

सब आँखें फैला कर सुनते रहते और उनकी आँखों में बंबई एक सुनहरा सपना बन सज जाता.

जब दामाद जी,स्मिता को लेने आए तो वे भी उसे देख हैरान  रह गए...इन आठ दिनों में ही उसके चेहरे का गुलाबीपन लौट आया था. चेहरे पर रौनक आ गयी थी. उसके विदा होते फिर से सबकी आँखें गीली हो गयीं. एक ही गुहार थी सबके मुहँ पे.."बेटी चिट्ठी लिखती रहना  "


और स्मिता की   चिट्ठी हर हफ्ते, दस दिन पर आ जाती. चार पन्नों की चिट्ठी में वो वहाँ का सब हाल लिखती.उसकी चिट्ठी आती और सबलोग हर काम छोड़ एक जगह जुट जाते. दरवाजे के अंदर सर पर पल्ला खींचे वे खड़ी होतीं. बाबूजी दरवाजे के बाहर कुर्सी पर बैठ जाते,अम्मा जी चौकी पर बैठी होतीं.पति कहते कि वे खुद बाद में पढेंगे पर खुद भी आँगन से लगे बरामदे में रखी  मेज कुर्सी पर बैठ जाते. नमिता  दरवाजे के बीचोबीच खड़ी, जोर जोर से  चिट्ठी पढ़ती. मीरा अपनी बड़ी बड़ी आँखें उस पर टिकाये ऐसे सुनतीं जैसे सारी बातें आँखों से ही पी रही हो. कोई बीच में जरा सा कुछ बोलता और नमिता के नखरे शुरू हो जाते. चिट्ठी वाला  हाथ पीछे कर लेती, "मैं नहीं पढ़ती अब...आपलोग हल्ला करते हैं  "

फिर दादी के उलाहने, दादा की प्यार भरी झिड़की ,उनकी डांट और मीरा के बार बार उसके फ्रॉक खींच कर मनाने "दीदी जल्दी जल्दी पढो,ना " के बाद ही वो शुरू करती...बीच बीच में कोई बात  अपनी तरफ से भी जोड़ देती,पर वो  सबलोग पकड़ लेते, "जा स्मिता नहीं लिख सकती ऐसा...तेरे जैसी शैतान नहीं रही वो कभी" और नमिता जोर से हंस पड़ती. चिट्ठी सुनने में व्यवधान  पड़ता देख सास बोल पड़तीं," "खुद दीदे फाड़ रही है,तब डिस्टरब नहीं हो रहा..हम बोलें तो कहती है...हल्ला काहे करते हैं " स्मिता पड़ोस वाले फुलेसर चाचा के दमे और  गाये के बछड़े से लेकर पूरे गाँव भर का हाल पूछती .

उसके बाद चिट्ठी के  जबाब देने का सिलसिला शुरू होता. तीन दिन तक सब अपनी अपनी बातें याद कर नमिता को बताते, ये लिख देना...ये भी लिख देना. यहाँ भी उसके नखरे सहने पड़ते. कलम बंद कर के रख देती. एक बार सारी बातें याद करके बताओ तब लिखूंगी. दोनों बहनों को वो अलग से चिट्ठी लिखती जिसे वे कमरे में जाकर  पढ़तीं और खी खी करके हंसतीं. वे कुछ नहीं पूछतीं, ये बहनों  की आपस की बात है. पर नमिता के पेट में तो पानी भी नहीं पच सकता...सारी बातें उगल देती, "माँ वहाँ .गणेश जी की पूजा होती है...विसर्जन में सड़क पर औरतें भी नाचती हुई जाती हैं.. वहाँ सब बालों में फूल लगाते हैं...औरतें भी क्या मोटरगाड़ी भगाती हैं..." एक दिन दोनों बहनें चिट्ठी लेकर अंदर गयीं और उलटे पैर ही चीखतीं हुईं निकलीं..."माँ.. माँ छोटकी दी ने लिखा है...हम मौसी बनने वाले हैं." स्मिता को उन्हें लिखते हुए लाज आई थी पर बहनों के माध्यम से बता दिया था. तुरंत अपने गिरधर गोपाल को माथा टेकने चली गयीं वे.

ममता के बेटे के जन्म पर टोकरी भर भर कर मिठाई, फल,घर भर के कपड़े लेकर सबलोग ममता की ससुराल गए थे, बस उन्हें और अम्मा जी को छोड़. पर इतनी दूर बम्बई सबलोग तो नहीं जा सकते. लेकिन किसी का जाना भी जरूरी है. अगर बेटा हुआ तब तो ठीक वरना, बेटी हुई तो फिर पिता ,बेटी के घर का पानी कैसे पियेंगे? और बम्बई  में वे रहेंगे कहाँ? लोग मानते हैं कि अगर बेटा हुआ  तो फिर वह सारा धन नाती का हो गया, इसलिए पिता, बेटी के घर भोजन,जल ग्रहण कर सकते हैं. सब बड़े पेशोपेश में थे लेकिन ससुर जी ने ही समस्या  का हल निकाला, कहने लगे, "अब लड़की सब कॉलेज जा रही है,बेटी का ब्याह इतना दूर कर दिए हो....तब पुरानी बात कैसे चलेगी...कोई हर्जा नहीं है बेटी के यहाँ का अन्न-जल ग्रहण करने में. "

और अच्छा हुआ कि ये सारी मंत्रणा  पहले ही हो गयी क्यूंकि स्मिता ने एक प्यारी सी बेटी को ही जन्म दिया. पति, छोटे बेटे प्रमोद के साथ बम्बई  जाने की तैयारी करने लगे.पर प्रमोद बीमार पड़ गया और प्रकाश की परीक्षा चल रही थी. इतनी दूर का सफ़र पति अकेले कैसे करें और ना जाएँ तो बेटी की क्या नाक रह जायेगी ससुराल में कि ऐसे मौके पर भी मायके से कोई नहीं आया.

ऐसे में  ससुर जी ही आगे आए, बोले ,"ई नमिता रानी को काहे नहीं ले जाते...सौ लड़कों के बराबर है...रास्ता भर चौकस,चौकन्नी रहेगी एक बिलाई की तरह...तुमको भी कोई दिक्कत नहीं होगा."

नमिता जोर से पलंग पर से कूद कर, दौड़ कर बाबू जी से लिपट गयी...."अच्छे बाबा.....मेरे अच्छे बाबा

बाबू जी की पूरी जिंदगानी में कोई उनसे इस  तरह नहीं लिपटा होगा. उनके बेटा- बेटी  तो उनसे भर मुहँ कभी बोलते भी नहीं थे.पर बाबू जी हँसते रहें..."अरे छोड़...गिराएगी क्या "

नमिता बंबई  जाने की तैयारी में लग गयी. शहर से नए डिजाईन का कपडा भी खरीद कर ले आई कि कहीं दीदी के ससुराल वाले उसकी बहन को गँवार ना बोले. रोज मीरा को सामने बैठा तरह तरह से बाल बनाती.

ढेरों साज-समान और स्मिता और उसकी बिटिया के लिए पूरे गाँव भर का आशीर्वाद लेकर दोनों बाप-बेटी बंबई  के लिए रवाना हो गए.

दस दिन बाद जब वे लौटे तो निचुड़े हुए आम से निस्तेज दिख रहें थे. लगा शायद सफ़र की थकान है.पर ये सफ़र से ज्यादा मन की थकान थी. हमेशा के मितभाषी पति ने तो बस पूछी गयी बातों का  जबाब दिया .."स्मिता और उसकी बिटिया ठीक है....उनलोगों  को समान बहुत पसंद आया...अच्छी खातिरदारी की हमलोगों की....दामाद जी को जैसे ही छुट्टी मिलेगी वे स्मिता को लेकर गाँव आयेंगे" और " बहुत थक गया हूँ...आराम करने जा रहा हूँ " और ये कहते वे कोठरी में चले गए.

पर चरखी जैसा मुहँ चलाने वाली नमिता बिना पूछे ही बोलती गयी...."माँ कैसे रहती है..छोटकी दीदी वहाँ...बाप रे! एक कमरे का मकान है माँ, एक कमरे का. ..और तुम्हारी बेटी कहाँ सोती है पता है?...रसोई में जमीन पर "

"जमीन पर.??..क्या कह रही है तू"....उन्होंने आश्चर्य से पल्ला मुहँ पर ले लिया....अब तो गाँव में खेतों में काम करने वाले खेतिहर भी चौकी और चारपाई पर सोते हैं...और उनकी बेटी बम्बई जैसे शहर  में जमीन पर सोती है?...यकीन  नहीं कर पा रही थीं वे.

"हाँ...माँ...और वो भी चटाई जितनी जगह पर...और पता है, वो भी चैन से नहीं...रात के दो बजे उठकर बड़े बड़े ड्रम में पानी भरती है. वहाँ, नल में रात में पानी आता है... छत पर जिस कमरे में मीरा गुड़िया खेलती है ना, वह कमरा भी दीदी के घर से बड़ा है... कहाँ ब्याह दिया तुमने छोटकी दी को...." कहते गला भर आया उसका.

पर तुरंत ही आँसू गटक कर बोली..."तुम पूछती थी ना , ऐसी पीली काहे पड़  गयी है...पीली नहीं पड़ेगी  तो और क्या, ना उस घर में धूप आती है,ना बयार...बस दिन भर एक पंखा टुक टुक करके हिलता रहता है. इतनी गर्मी सारा बदन चिप चिप करता रहता है...और नहाने को पानी नहीं... माँ जीजाजी को बोलो ना ,नौकरी छोड़ कर गाँव में आकर हमारे साथ रहें...उनको भी तो गाँव कितना पसंद है...दीदी की बिटिया चलना कैसे सीखेगी वहाँ..इतना छोटा तो घर है ...किधर चलेगी वो.."

"अच्छा चल..अब कल सुनाना अपना बंबई पुराण...कुछ खा-पीकर आराम कर ले "...उनसे यह सब सुना नहीं जा रहा था. वे उठ कर चली गयीं.

मीरा बंबई  के और भी किस्से सुनने को बेताब थी..."दीदी बताओ ना कहाँ कहाँ घूमी....समंदर देखा? "

"अरे क्या घुमूंगी, वहाँ केवल पानी का समंदर  ही नहीं,आदमी का भी समंदर  है...जिधर देखो खाली सर दिखता है...इतना धक्का-मुक्की.....फिलम जैसा कुछ नहीं है रे...सब झूठ दिखाते हैं..फिलम में"

मीरा भी निराश हो चली गयी.

वे दीवार का सहारा  लिये चुपचाप ढलते सूरज को देख रही थीं..ये क्या लिखा है उनकी बेटियों के भाग में...एक के पास धन धान्य सबकुछ है तो घरवाले इतने कड़क हैं. एक के घर वाले अच्छे हैं पर उसका जीवन इतना कष्टमय और आँचल  की कोर से आँसू पोंछ लीं  उन्होंने.
(क्रमशः)

21 comments:

चण्डीदत्त शुक्ल said...

सुंदर और सच्ची कथा. प्रवाह बनाए रखें.

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी लगी ये कडी भी। अगली?? शुभकामनायें

सारिका सक्सेना said...

ये कडी तो मुम्बई की कडवी सच्चाई दिखा गयी। मुम्बई में फिल्मों के साथ-साथ ये आदमियों के समन्दर और मौसम के मिज़ाज को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
कहानी का प्रवाह अच्छा चल रहा है, देखें आगे क्या होता है।

ashish said...

कहानी सागर अपने मंथर गति से, मन को ख़ुशी और गम के ज्वार भाटा से आह्लादित और उद्वेलित करते हुए प्रवाहमान है..समय और परिस्थितियों के साथ इन्सान को कैसे तालमेल बिठाना चाहिए, ये ससुर जी सिद्ध कर दिया , बेटी के घर पानी पीने को समस्या का निदान करके..दादी का डिस्टरब बोलना अच्छा लगा... आंचलिक भाषा पर आपका अधिकार अच्छा है , और सुक्ष्तम घटनावो पर आपकी पारखी नजर पड़ना , कहानी को सरस बना देते है. अगली कड़ी जल्दी लायी जाय..

सतीश पंचम said...

आंचलिक शब्दों ने एकदम सोंधापन ला दिया है कथा सागर में। और मुंबई में तो ज्यादातर घरों की सच्चाई है कि लोगों को किचन मे सोने पर मजबूर होना पड़ता है।

बहुत सुंदर कहानी।

mukti said...

"बाबू जी की पूरी जिंदगानी में कोई उनसे इस तरह नहीं लिपटा होगा. उनके बेटा- बेटी तो उनसे भर मुहँ कभी बोलते भी नहीं थे.पर बाबू जी हँसते रहें..."अरे छोड़...गिराएगी क्या "
बहुत ही स्वाभाविक वर्णन है दी. हमारे समाज में प्यार दिखाने पर इतनी पाबंदियाँ हैं कि पूछो मत और बेटियाँ तो अपने बाबा या पिता के गले लगने की सोच भी नहीं सकतीं.
और बम्बई का हाल तो बहुत सही लिखा है... किसी ज़माने में मेरी मौसी भी ऐसे ही छोटे से घर में रहती थीं. कहने को तो तीन कमरे थे... पर परिवार बड़ा होने से जगह की कमी थी... हमलोग वहाँ गए हैं और वहाँ के हालात देखे... नमिता के मुख से वर्णन सुनकर ऐसा लगा मानो मौसी के घर पहुँच गयी होऊं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत धाराप्रवाह कहानी....पढ़ कर आनंद आ गया....मुंबई कि एक आम आदमी कि ज़िंदगी का खाका बहुत बढ़िया खींचा है....मुझे जया भादुरी कि पिक्चर याद आ गयी...पिया का घर...

बढ़िया लेखन...

Sanjeet Tripathi said...

pahle hi sundar kahna thoda ajeeb lag raha hai kynki patro ke saath pahle hi jud chuke hain hum pathak, lekin jis taralta se aapne likha hai use sundar hi kahna chahiye, baki ashish aur satish pancham ji ke kathan se sehmat hu.... u know is kahani ko aap apni pichhale laghu upanyaas se bhi vistrut bana sakti hai, han aap aisa kar sakti hain. agli kisht ki pratikshaa.

Sadhana Vaid said...

कहानी बहुत ही नैसर्गिक प्रवाह के साथ आगे बढ़ रही है ! ग्राम्य जीवन और मुम्बई जैसे महानगर की जीवनशैली के विरोधाभास को आपने बहुत सूक्षमता से उकेरा है ! कथानक में सचमुच ही उपन्यास सा कलेवर है ! और पढते हुए यही अनुभव हो रहा है कि उपन्यास ही पढ़ रहे हैं ! अगली कड़ी की अधीरता से प्रतीक्षा है ! अधिक इंतज़ार मत करवाइयेगा !

रश्मि प्रभा... said...

kahin dhoop to kahin chhanw

Divya said...

kahani bahut achhi chal rahi hai...interest badhta ja raha hai...agli kisht ka besabri se intezaar hai....

शुभम जैन said...

sangita ji se sahmat hu jaya bhadudi ki wo film yaad dilati ye kadi...bumbai ke zivan ka saziv varnan...wakai mumbai me sirf samandar hi hai ek pani ka dusra logo ka...mumbai ke charm ko kitni khubsurti se shabdo me piroya...chote shahro me log bilkul aise hi sochte hia aur yahan aane ke baad.....

namita ka kirdar bahut ahccha lag rha hai...chtthi padhne se lekar likhne tak me uske chote chote nakhre maan moh lete hai...

वन्दना said...

अज तो इसे पढकर पिया का घर फ़िल्म की याद आ गयी…………हालातों का बहुत ही सजीव चित्रण किया है………………अब अगली कडी का इंतज़ार है।

शोभना चौरे said...

वाह
सन १९७४ में मै शादी होकर बम्बई (जब बम्बई ही कहते थे )गई थी तो ठीक इसी तरह के हाल थेआपने तो सब कुछ अतीत ताजा करवा दिया |मुंबई है ही ऐसी फिर भी लोग वहा ही जाते है |
हम एक फ़्लैट में दो परिवार रहते थे जो की बिलकुल रेलवे लाइन के पास था और लोकल ट्रेन की लगातार आवाजो के इतने आदि हो गये की जब वापिस घर जाते तो एक दो दिन तक नींद ही नहीं आती उस धड धड़ा हट की आवाज सुने बिना |
उपन्यास बहुत रोचक और आम जिन्दगी के करीब है और सुन्दर सहज भाषा शैली के साथ आनंद दे रहा है \
शुभकामनाये

प्रवीण पाण्डेय said...

भाषा की सरलता से, सामाजिक परिवेश को भाव-प्रवाह में उतार गयी आपकी कहानी ।

Mired Mirage said...

बहुत ही बढ़िया प्रवाह है। पढ़ते पढ़ते व्यक्ति खो जाता है।
घुघूती बासूती

roohshine said...

सुन्दर प्रवाह,सटीक अभिव्यक्ति..पढते पढते जब क्रमश: लिखा दीखता है तब एहसास होता है कि इतनी जल्दी कड़ी समाप्त हो गयी.. और तुरंत ही दूसरी कड़ी का इंतज़ार शुरू :)

दीपक 'मशाल' said...

इतना सटीक और मार्मिक वर्णन किया दी कि मेरी समझ में नहीं आ रहा कि कैसे आपने एक ग्रामीण के मन की वो सब बातें जान लीं. जो वो एक बड़े शहर के बारे में सोच सकता है... चिट्ठी पढ़ते वक़्त नमिता कि चुहलबाजी अच्छी लगी.. दादा से पोती के लिपटने पर स्नेह का भाव आना, एक ग्रामीण लड़के का शहर के प्रति आकर्षण... दादा-बाबा का पोते की तारीफ में कसीदे गढ़ना.. कई-कई लोगों से आशीर्वाद लेने के लिए मजबूर करना.. सब बिलकुल आँखों के सामने घटता सा लगा.. लगता है आप पात्र नहीं गढ़तीं बल्कि पात्र स्वयं उन्हें गढ़े जाने के लिए आपको चुन लेते हैं..
आज के लेखन के लिए तो यही कहूँगा कि, ''तेरी मिसाल ये है कि तू बेमिसाल है..'

shikha varshney said...

गाँव और शहर के परिवेश को बखूबी उभारा है आपने ..भाषा शैली गज़ब की है ..कहानी में प्रवाह बढ़ रहा है ,लग रहा है बहुत ट्विस्ट एंड टर्न्स लेगी कहानी ....

अनामिका की सदाये...... said...

मेरा पठान पाठन निरंतर चल रहा है आपकी कहानी पर...दिल नहीं चाहता की कहानी खत्म हो...लेकिन हो जाती हें ना...और इंतज़ार करना पड़ता हें मुझे कितना आपकी अगली कड़ी का.

हा.हा.हा.

बहुत इंटरेस्ट आ रहा है.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मन द्रवित हो उठा।
………….
दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?