Monday, July 26, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -12)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजिनियर था,उसने प्रेम विवाह किया. छोटा बेटा डॉक्टर था, एक अमीर लड़की से शादी कर वह भी, उसके पिता के पैसों से अब विदेश चला गया)

गतांक से आगे

कॉलेज जाने के साथ ही वे नमिता में परिवर्तन देख तो रही थीं. अब ये उम्र का प्रभाव था या कॉलेज जाने का या फिर घर में टी.वी. आ जाने का .पर वह अब अपने रख रखाव के प्रति सजग दिखती थी.वरना पैरों में चप्पल पहनने के लिए कितनी डांट सुनती  थी. डांटने पर, घर से तो पहन कर निकलती पर किसी पेड़ के नीचे छोड़ कर आ जाती. बालों में तेल डालने को चोटियाँ बनाने को हमेशा, उसे घेर कर बिठाना पड़ता पर अब पेड़ पर चढ़ना,पुआल के ऊँचे ढेर पर बैठ ईख चबाना तो नहीं छूटा  पर पैरों में चप्पल अब नहीं भूलती  वह. उन्हें वह नज़ारा भी नहीं भूलता,जाड़ों की धूप में नमिता उसी  पुआल के ऊँचे ढेर  पर बैठी,ईख चबाती, हर आने जाने वालों से जोर जोर से बतियाती रहती...किसी के कंधे पर पड़े गमछे के एक किनारे पर बंधी पोटली को देख टोक देती, "क्या काका,लाई कचरी ले जा रहें हो मुनिया के लिए?" और मीरा उसी पुआल के ढेर के नीचे अधलेटी सी दिन-दुनिया से बेखबर किसी किताब में खोयी होती.

एक दिन उन्होंने नमिता के हाथों के लम्बे नाखून देखे और चौंक पड़ी,"अरे चलो तुम्हारे नाखून काट दूँ, इतना भी होश नहीं इस लड़की को".

"मैं खुद काट लूंगी" नमिता टाल गयी.

इस पर मीरा हंस पड़ी, " माँ ,दीदी ने फैशन में नाखून बढाए हैं,

" नाखून तो बस चुड़ैलों के लम्बे होते हैं,ये चुडैलों वाला कौन सा फैशन आ गया ?" उन्हें  आश्चर्य हुआ.

" हा हा...चुडैलों का फैशन..माँ ,टी.वी. में नहीं देखा...अच्छा रुको तुम्हे किसी पत्रिका में दिखाती हूँ..." मीरा  हंसी से लोट-पोट हो रही थी.

और उन्हें अब माजरा समझ में आया कि नमिता लालटेन,लैम्प साफ़ करने से क्यूँ कन्नी कटाने लगी है,आजकल. गाँव में बिजली थी पर फिर भी नियम से कलावती,लालटेन और लैम्प के शीशे साफ़ किया करती थी .क्यूंकि शाम होते ही जो बिजली जाती वह सुबह चार-पांच बजे आया करती. लेकिन नमिता को उसका काम पसंद नहीं था और अम्मा जी के जमाने से ही यह काम उसने अपने जिम्मे ले लिया था. बाल्टी में सर्फ़  घोल कर सारे लालटेन लैम्प के शीशे ऐसे चमकाती की झक झक रोशनी निकलती उनसे. शाम होते ही अम्मा जी सारे लालटेन,लैम्प जलातीं और किसी बच्चे को आवाज़ देती,सांझ दिखाने को. अम्मा जी के गुजर जाने के बाद वे ही यह काम करतीं और उनकी आँखें  भर आतीं,बरसों से अम्मा जी का यह नियम था. पर शाम का ख़याल कर वे अंदर ही अंदर आँसू पी मीरा को आवाज़ देतीं.

मीरा लालटेन ले घर के हर कमरे में, कोठी और गोदाम वाले कमरे में भी सांझ दिखा आती.फिर बाहर जाकर 'हनुमान जी के पताके' के पास लालटेन रख हाथ जोड़ती. फिर लालटेन को तुलसी चौरा, गाय के बथान, बैलों के पास, उनकी नाद, चारा काटने की मशीन, घूरा (जहाँ अहाते को बुहार कर पत्ते लकड़ी इकट्ठा  किया जाता और उसे जला दिया जाता. जाड़े के दिनों में तो कई सूखी लकड़ियाँ, टूटी टोकरी सब इकट्ठा कर जलाया  जाता,और आस-पास के लोग जमा  हो आग तापते और किस्से कहानियाँ सुनाया करते एक दूसरे को.) सब  जगह दिखा आती.

पर आजकल अपने  हाथों और नाखून का ख्याल कर नमिता ने लालटेन और लैम्प की कालिख साफ़ करनी बंद सी कर दी  थी और आजकल गाँव में काम करने वालों का मिलना भी मुश्किल हो गया  था. अब नई उम्र के लड़के सब पंजाब और असाम कमाने जाने लगे थे और वहाँ  से पैसे भेजते .अब उनके घर मे भी चौकियां थीं, सब मच्छरदानी लगा के सोते, ट्रांजिस्टर पर गाना बजता रहता. और उनकी पत्नियां अब काम नहीं करती. बगीचे से जलावन भी इकट्ठा नहीं करतीं बल्कि जलाने की लकडियाँ भी पैसे देकर खरीदतीं.वरना पहले किसी को भी आवाज़ दे, ये छोटे मोटे काम करवा लिए जाते थे और बदले में थोड़ा अनाज भी  दे दिया जाता था.

इन सबके साथ ,नमिता की नीना से दोस्ती भी बढती जा रही थी. शहर  से आई नीना की दोस्ती का भी असर लगता ये सब. वरना नमिता जैसी लड़की खुद आगे बढ़कर , नीना से सखी लगाने को कहती,कभी?

सावन में एक ख़ास दिन गाँव की लडकियाँ जिसे पक्की सहली बनाना चाहतीं. उस से  चूड़ी, रिबन, नेलपॉलिश के उपहार की अदला बदली करतीं और फिर एक दूसरे को किसी फूल के नाम से पुकारतीं. एक दूसरे का नाम नहीं लेतीं. ज्यादातर लड़कियां एक दूसरे को गुलाब,चमेली,जूही, जैसे नामों  से बुलातीं . पर नमिता ने कभी किसी को ख़ास सहेली नहीं बनाया.लड़कियां उस से सिफारिश करतीं,

"चाची  उसे कहिये ना...मुझसे सखी लगाए"

"मुझे नहीं अच्छा लगता ये सब.....आज सखी लगाती हैं और कल लड़ाई हो जाती है तो उसी का नाम लेकर जोर जोर से चिल्लाती है" वह हाथ में कोई छड़ी या रस्सी का टुकड़ा लहराते हुए बोलती और गिल्ल्ली डंडा खेलने भाग जाती.
वही नमिता आज खुद से कह रही थी, "माँ इस सावन में नीना से सखी लगाऊं?"

नीना अच्छी लड़की थी,कई बार अपने भाई के साथ मोटरसाइकिल पर उनके घर आ चुकी थी. भाई छोड़कर तो चला जाता पर जब उसे लेने आता तो तीनो काफी देर तक बाहर बातें करते रहते या बाग़ में घूमने चले जाते.यह सब उन्हें नहीं सुहाता. उसकी नौकरी लग गयी थी लेकिन अभी इंजीनियरिंग का रिजल्ट नहीं आया था. वह गाँव में रहकर अपने रिजल्ट का इंतज़ार कर रहा था. अक्सर ही नीना को छोड़ने लेने आ जाता. और अब अगर 'सखी लगाने की इजाज़त दे दी ,तब तो आना जाना और बढ़ जायेगा.पर मना भी कैसे करें?

पति को यह परिवार ख़ास पसंद नहीं था,एक तो वे लोग बैकवर्ड जाति से थे,दूसरे नीना के पिता, पति के सहपाठी थे. किसी तरह खींच-खांच कर पास होते थे पर रिजर्वेशन के बल पर अच्छी नौकरी पा गए थे और अब बड़े अफसर बन चुके थे. पति को यह बात खलती थी.

कुछ ऐसा नज़र भी नहीं आ रहा था कि वह नमिता को उसके घर जाने से रोकें, वैसे भी कॉलेज के रास्ते में ही नीना का घर था. अब नमिता ने इंटर पास कर बी.ए. में एडमिशन ले लिए था और उनकी व्यग्रता अब बढ़ने लगी थी,पति से कहतीं कि लड़का देखना शुरू करिए, मनपसंद लड़का ढूँढने में समय भी तो लगना था. ममता और स्मिता का हाथ तो, मांग कर ले गए. पर अब वह पहले वाला ज़माना नहीं रहा. रिश्ते अब सिक्कों में तुल रहें थे और अब उनलोगों  के पास ज्यादा पैसे भी नहीं थे.

पर पति यह बात समझते नहीं,उन्हें कोई भी लड़का पसंद नहीं आता. कही लड़के का रूप, तो कहीं नौकरी और कहीं उसका घर. जहाँ सब कुछ पसंद आता वहाँ, दहेज़ की इतनी मांग होती कि उसे चुकाना उनके सामर्थ्य के बाहर की बात थी. एक बेटा तो विदेश ही चला गया था और एक अपनी गृहस्थी में मस्त था. दो अनब्याही बहनें घर बैठी हैं,इसकी कोई चिंता ही नहीं. प्रकाश,एक बेटा और एक बेटी का बाप भी बन चुका था. दोनों के जन्म पर वे गयी थीं.पर मेहमान सी ही रहीं. बहू के मायके के लोगों  का ही दबदबा था. बच्चे के लिए शौक से ले गयी चीज़ों को भी निकालने में उन्हें हीनता महसूस होती. किसी तरह रस्म निबटा चली आयीं वापस. बहू भी गाँव में दो दिन से ज्यादा नहीं  रूकती,गर्मी, मच्छर,ठंढ का बहाना बना वापस चली जाती.

पति निश्चिन्त थे कि उनकी बेटियाँ भाग्य्वाली हैं, अच्छा लड़का, घरबार मिल ही जायेगा.पर उन्हें बेटी में आते  परिवर्तन के लक्षण कुछ अच्छे नहीं लग रहें थे.. घंटों अँधेरे में बैठी गाने सुनती रहती. एक दिन तो वे कमरा बंद कर रही थी कि कहीं बिल्ली आकर दही ना खा जाए तो बोली..'माँ, मैं अंदर ही हूँ." खिड़की से थोड़ी चांदनी छिटक कर कमरे में फैली थी और वह उसी में गुमसुम बैठी,खिड़की से चाँद निहार रही थी. एकदम डर गयीं वे. दूसरे दिन ही गोपाल जी, जो उन्हें ख़ास पसंद भी नहीं थे, से कहा," आप ही जरा अच्छे लड़के का पता कीजिये"  पर बात पैसों पर आकर रुक जाती, शादी का खर्चा,दान -दहेज़ सब कैसे पूरा होगा. अब अच्छी जमीन भी नहीं बची थी जिसे बेच कर सारे खर्चे पूरे किए जाएँ.

पति कहते, दो  साल में मैं रिटायर हो रहा हूँ, बस उसके बाद जो  पैसे मिलेंगे. उस से एक का ब्याह तो निबट जाएगा.पर उनका दिल धड़कता रहता इस बीच कोई अनहोनी ना हो जाए कहीं.

नीना के पिता का ट्रांसफर हो गया . नीना भी बी.ए. के इम्तहान तक रुकी थी, उसके बाद उसका परिवार वहाँ से चला गया तो उनकी जान में जान आई. दोनों सहेलियां ऐसे गले मिल कर रोयीं  जैसे सगी बहनें भी कभी क्या रोयेंगी.

पर अब तो मुश्किल और बढ़ गयी. नीना के फोन और ख़त आते रहते. जिस तरह से ख़त लेकर नमिता,छत पर भागती,उन्हें शुबहा तो होता ,पर क्या कहतीं. आजतक कभी उसके पत्रों की  जांच-पड़ताल की  ही नहीं. एकाध बार मन कड़ा कर किया भी तो कुछ नहीं मिला. इतने बड़े घर में वो कहाँ छुपा कर रखती,पता ही नहीं चलता. नीना के फ़ोन भी आते और घंटो बातें होती उनकी. कभी दूर से नमिता का लाल होता चेहरा और पैर से जमीन कुरेदते देख वे समझ  जातीं कि फोन पर नीना नहीं है. किसी बहाने कमरे में जातीं तो नमिता अचानक जोर जोर हंस कर बाते करना शुरू कर देती. सब उनकी समझ में आ जाता. एक दिन उन्होंने सोचा, पानी सर से ऊपर जाए इस से पहले , अब नमिता से साफ़-साफ़ पूछ ही लेना चाहिए.

दो तीन दिन यही सोचते गुजर गए कि बात शुरू कैसे  की जाए. और एक दिन यूँ ही तबियत नहीं ठीक लग रही थी और वे अपने कमरे में लेटी थीं कि नमिता आई. उन्होंने कहा, "लालटेन लेती आ, अँधेरे में क्यूँ आ रही है?"

"ना माँ रहने दो...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है ?" नमिता की आवाज़ की गंभीरता से वे चौंक जरूर गयीं,पर कुछ बोलीं नहीं.

उनके पास पलंग पर बैठ,नमिता ने ही शुरुआत की, "माँ, नरेंद्र मुझसे शादी ,करना चाहता है "

"हम्म..."

"जब से उसकी नौकरी लगी है, उसके घर वाले बहुत दबाब डाल रहें हैं, मुझे कब से कह रहा है,तुमलोगों से  बात करने को...पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी."

"नरेंद्र शादी करना चाहता है...और तुम ?"

पर नमिता  चुप रही, अँधेरे में उसका सल्लज चेहरा तो नहीं देख सकी ,पर उसकी ख़ामोशी ने ही सब कह दिया.

"नमिता तुझे पता है,ना...वे लोग अलग जाति के हैं...पापाजी ज्यादा पसंद भी नहीं करते उन्हें...वे मानेंगे??"

"माँ,  भैया लोगों की शादी भी तो हमारी जाति में नहीं हुई "

"हम्म ..." वे कैसे बताएं कि उनके पैसों की चमक में उनकी जाति का नाम धुंधला पड़ गया था .

" बड़के भैया को तो पापाजी ने मना नहीं किया...और छोटके भैया की शादी के लिए तो खुद ही, हाँ कहा....और माँ तुमको पता है,नरेंद्र भी इंजिनियर है,अच्छी कंपनी में काम  करता है....फिर क्यूँ मना करेंगे?"

"मैं बात करती हूँ..." उन्होंने कह तो दिया पर आशंका थी कि पति को मना पाएंगी या नहीं.

"माँ आज ही करना..नरेंद्र बहुत परेशान है...उसके परिवार वाले उसकी शादी के पीछे पड़े हैं....यहाँ से  हाँ हो तब वो अपने घर में बात करे" नमिता ने कहा और बाहर चली गयी.

उन्होंने भी सोचा दुविधा में रहने से क्या फायदा....और उसी रात पति से कह डाला पर  जो हुआ उसकी अपेक्षा तो उन्होंने कभी नहीं की थी. शांत-चित्त ,किताबों में खोये रहने वाले, मित-भाषी पति का ऐसा रौद्ररूप पहली बार देखा. चीखने -चिल्लाने लगे,  "सब तुम्हारी शह है....इस लड़की के लच्छन तो शुरू से ही नज़र आ रहें थे.जब देखो..पूरे गाँव में घूमती रहती थी और अब ये हाल है...तुम्हे तो नज़र रखना चाहिए था...अब भुगतो, अपनी छूट का नतीजा. मैं तो दिन भर घर से बाहर  रहता हूँ, एक लड़की नहीं संभाल सकी तुम"

"अरे धीरे बोलिए..."

"क्या बोलूं धीरे...अब कल को गाँव में फैलेगी ये बात,कहीं मुहँ दिखाने के लायक नहीं रहेंगे...जमीन-जायदाद गयी, बाग़-बगीचे गए...एक इज्जत बची थी ,उसे भी यह लड़की नीलाम करने पर तुली है"

"इज्जत क्यूँ नीलाम होगी...अगर बाजे-गाजे से लड़की को विदा करेंगे तो...किस का मुहँ रहेगा, कुछ कहने का...आखिर प्रकाश, प्रमोद की शादी भी तो दूसरे जात में हुई."

"वे हमारे बराबर की जात के थे...और उनकी लड़की लेकर आए हम..अपनी लड़की नहीं दी...और वो भी उस छोटी जात में...ये कब्भी नहीं होगा...कह दो उसे...हाथ-पैर तोड़ के घर में बिठा दूंगा ....नहीं तुम क्या कहोगी...तुम्हे समझ होती तो बेटी को संभाल कर नहीं रखती...बुलाओ उसे...नमिताss...नमिताsss..." जोर से गरजने लगे.

नमिता आई और सर झुका कर खड़ी हो गयी,पर कंधे बिलकुल तने हुए थे. मीरा भी उसके पीछे कांपती हुई सी  आकार खड़ी हो गयी.

"इसीलिए तुम्हे कॉलेज भेजा?....मैं उतनी दूर भेज सकता हूँ तो कमरे में बंद करके भी रख सकता हूँ...खबरदार जो तुझे देखा है, घर से बाहर कदम रखते...यही सब देखना बाकी था खानदान की इज्ज़त मिटटी में मिला दी..." पति गुस्से से काँप रहें थे.

"जब भैया लोगों  का दूसरी जात में ब्याह हुआ तब खानदान की इज्जत नहीं खराब हुई.??." नमिता ने  सर झुकाए ही पर सधे शब्दों में कहा .और पति गुस्से से पागल हो उठे.

"जुबान चलाती है....बाप को जबाब देती है...हाँ कॉलेज में पढ़ी , है ना...यही सीखा है...देखता हूँ  मैं भी..ये सब टेलीफोन और टी.वी का असर है...देखता हूँ अब कौन इस घर में टी.वी. देखता है. अभी फोड़ देता हूँ टी.वी. ....कहाँ है टेलीफोन मैं अभी तार काट देता हूँ..."और दूसरे कमरे की तरफ बढे. उन्होंने रोकना चाहा तो इतनी जोर से उन्हें  धक्का दिया कि गिरते गिरते बचीं. मीरा रोती हुई उन्हें आकर संभालने लगी. नमिता वैसे ही सीधी अपनी जगह पर खड़ी रही.

पति ने टेलीफोन के तार खींच कर निकाल डाले...टी.वी. के तार नोच डाले. फिर हताश पलंग पर गिर पड़े.

वे डर के मारे दूर ही बनी रहीं. दोनों लडकियाँ भी अपने कमरे में  चली गयीं. वे समझ रही थीं, पति की हताशा ये सब हरकतें करवा रही थी,उनसे. लड़कों को पढ़ाने में  जमीन-जायदाद बिक गए. लड़के अपनी गृहस्थी में मगन थे. दो अनब्याही लडकियाँ घर बैठी थीं. अच्छा लड़का वे खोज नहीं पा रहें थे, रिटायरमेंट का समय नजदीक आ रहा था. मन में चल रही यही सब परेशानी लावा बनकर फूट निकली और बहाना नमिता बन गयी.

दोनों लडकियाँ अपने कमरे में चली गयीं. आज तो चार जोड़ी आँखें छत देखते ही रात बिताने वाली थीं.

दूसरे दिन पति ने हमेशा की तरह, सुबह सब्जियों की क्यारियाँ ठीक की..पीले पत्ते तोड़े..फिर नहा-धोकर  बिना खाना खाए स्कूल चले गए. मीरा ने देखा और उन्हें आश्वस्त किया, "माँ वे चपरासी से मँगा कुछ खा लेंगे...तुम चिंता मत करो...मुझे खाना दो...कॉलेज के लिए देर हो रही है" बेटियाँ बिना बोले ही समझ जाती हैं, माँ के दिल का दर्द.

नमिता अब तक बिस्तर से उठी नहीं थी. सो तो क्या रही होगी. वे पास में बैठ  उसका सर सहला कर उठाने लगीं .वह उनका हाथ झटक कर पलंग से उतरी और कमरे से बाहर चली गयी. मन रुआंसा हो गया, दोनों उस पर ही गुस्सा हैं..... जबकि दोनों तरफ से वे ही बात संभालने की कोशिश कर रही हैं. फिर मन को समझाया ,आखिर किस पर गुस्सा उतारेंगे ये लोग,जिसे अपना समझेंगे उसी पर,ना. अब राह चलते लोगों पर तो  गुस्सा नहीं उतार नहीं सकते.

घर में शान्ति छाई रहती, पति फिर समय से खाना खाने लगे थे. पर बात बिलकुल नहीं करते. बस अखबार और  किताबें पढ़ते रहते. नमिता भी घर से बाहर नहीं निकलती,  दिन भर छत वाले कमरे में  रेडिओ लिए पड़ी रहती. खाना भी बस टूंगती  भर. टेलीफोन और टी.वी. के तार वैसे ही नुचे हुए पड़े थे. टेलीफोन की घंटी  ही बजती तो किसी से बात तो होती. टी.वी. भी नहीं चलता. नहीं तो घर के सारे लोगों के एक साथ बैठने का बहाना तो था एक.

सब अपने में गुम से रहते. सिवनाथ माएँ भी टोक देती.".का बात है सबलोग ऐसे चुप्पा काहे लगाए बैठे हो." पर उनकी बात हवा में ही खोकर रह जाती.

चार-पांच दिनों बाद फिर नमिता ने बाहर निकलना शुरू किया तो उन्हें थोड़ी राहत हुई. बाग़,नहर की तरफ कभी मीरा के साथ,कभी अकेली घूम कर आ जाती. एक दो बार उन्होंने उसे समझाने की कोशिश भी की, " हमेशा मनचाहा कहाँ हो पाया है, मुझे नहीं लगता नरेंद्र के घरवाले भी तैयार होते. उन्हें भी अच्छा दहेज़ मिलेगा...वे कब्भी ये मौका नहीं छोड़ेंगे...सबको पैसे का लालच होता है...नरेंद्र भी समझ जायेगा.ये सब बचपना  है, ज़िन्दगी में कई समझौते करने पड़ते हैं." नमिता कुछ जबाब नहीं देती पर उनकी बात भी नहीं सुनती ,वहाँ से उठ कर चली जाती.

गोपाल जी का आना जाना बढ़ गया था और शनिचर, इतवार को पति उनके साथ बाहर चले जाते. उन्हें लग रहा था.अब वे जोर-शोर से नमिता के लड़के के लिए तैयारी की खोज में हैं.पर उन्हें कुछ नहीं बताते और उन्हें गोपाल जी से पूछना अच्छा नहीं लगता.क्या कहते वे कि उन्हें अपने घर की  ही बातें नहीं पता. पर नमिता  के मामले में पति अभी भी उन्हें ही दोषी समझ रहें थे कि उन्होंने ही नज़र नहीं रखी.

नमिता को भी कई बार, पति के ब्रीफकेस के कागज़-पत्तर देखते हुए देखा,उन्होंने. सोचा,चलो अच्छा है, नमिता को भी पता तो होना चाहिए कि कहाँ बात चल रही है. अगर उसे कुछ  नहीं अच्छा लगे तो वो बता सकती  है. पर उन्हें ये नहीं पता था कि नमिता के इन कागजों को टटोलने का कुछ और ही नतीजा निकलेगा.

सुबह की तैयारियों में ही लगी थीं, कि मीरा दौड़ी हुई आई, "माँ....माँ ये देखो..."
उसके हाथों में एक कागज़ था. "क्या हुआ..इतना घबराई हुई सी क्यूँ है...??"

"माँ..माँ दीदी..."और मीरा के आँसू छलक आए.

उनका कलेजा बैठ गया, मीरा का कन्धा थाम लिया.."क्या हुआ....जल्दी बोल.."

"माँ....दीदी, घर छोड़ कर  चली गयी..."

"क्याssss.....    " वे वहीँ जमीन पर ही धम्म से बैठ गयीं.

लिखा है..."माँ, मैने बहुत कोशिश की लेकिन अब और कोई रास्ता नहीं था....नरेंद्र के घरवाले भी नहीं मान रहें. मैं नरेंद्र के साथ, उसकी नौकरी पर  जा रही हूँ.....हो सके तो माफ़ कर देना.' माँ ,बस दो लाइन ही लिखा है "...मीरा के आँसू बह चले.

उसी समय पति सुबह की बागबानी कर अंदर आ रहें थे. उन्हें यूँ जमीन पर बैठे और पास खड़ी रोती मीरा को देख उसके हाथों से कागज़ ले पढ़ा और सर पे हाथ मार वहीँ कुर्सी पर गिर पड़े.

थोड़ी देर बाद उठे और अंदर चले गए , वे घबरा कर पीछे से गयीं तो देखा,पलंग की पाटी पर सर झुकाए हुए हिलक हिलक कर रो रहें हैं. उन्होंने डरते हुए उनके कंधे पर हाथ रखा...तो दिल को चीर कर रख देने वाली आवाज़ में बोले..."इस लड़की ने कहीं का नहीं छोड़ा,ममता की माँ...क्या मुहँ दिखायेंगे हम गाँव में"

वे क्या कहती वे भी रोती हुई पलंग पर बैठ गयीं.

पर उन सबमे मीरा ही सबसे दिलेर निकली. थोड़ी देर बाद कमरे में आई, " इतना रोना-पीटना क्यूँ मचा हुआ है. कोई मर नहीं  गया है, चलो, माँ  हाथ मुहँ धो...पापा जी मैं चाय लेकर आ रही हूँ " और वह चाय बनाने चली गयी.

पति ने कहा, "प्रकाश से बात करता हूँ..." और टेलीफोन के नुचे तार ठीक करने लगे. किसी तरह तार जुड़ा और प्रकाश को फोन लगाया, इतनी  खडखडाहट, कि आवाज़ ना सुनाई पड़े.
प्रकाश ने सुना और  बोला,"पापा जी क्या कर सकते हैं...नमिता २१ साल की हो गयी है. बालिग़ है. हमलोग कुछ नहीं कर सकते...हाँ, समझा बुझा कर घर ला सकते हैं, कहिये तो पता करूँ...कोशिश करता हूँ.पर शादी तो उस लड़के से ही करनी पड़ेगी पर ये है कौन...नमिता कैसे जानती है उसे..."

"उसकी शादी तो  मैं नहीं कर सकता...उस छोटी जाति का लड़का मेरा दामाद बनेगा ...ये मैं नहीं बर्दाश्त कर सकता ....ये लो अपनी माँ से पूछो...इन्हीं के नाक के नीचे सब होता रहा...और इनको कुछ मालूम ही नहीं..खाली खाना बनाने और कपड़ा सहेजने में ही लगी रहीं.." पति ने हिकारत से उनकी तरफ देखा और फोन पकड़ा दिया.

उनके आँसू निकल आए पर पीती हुई बोलीं, "उसकी सहेली का भाई है...इंजिनियर है...किसी कंपनी में नौकरी करता है...बेटा यहाँ तक बात पहुँच जायेगी,मुझे नहीं पता था..."

"वो हो गया माँ...अब आगे क्या करना है सोचो...मैं पता कर सकता हूँ...पर, घर लाकर उसकी शादी तो उसी लड़के से करनी पड़ेगी...पर पापा जी मान नहीं रहें. "

"बेटा पता करो..कहाँ गए है...लड़के के घर वाले भी तैयार नहीं  थे.....दोनों अकेले पता नहीं कहाँ गए हैं?"

"उसकी चिंता मत करो,माँ..लड़का नौकरी में है तब सब इंतज़ाम कर लिया होगा....यार दोस्त होंगे साथ में..मंदिर में या कोर्ट में शादी भी कर लेंगे...पापा जी मान ही नहीं रहें...नहीं तो मैं कोशिश करता..."

"लो...अपने पापा जी से ही बात करो..."

फिर दोनों बाप-बेटे में कुछ देर बात हुई...और पति ने कहा.."ठीक है तुम ऑफिस जाओ.."
तभी मीरा चाय लेकर आई...और पति ने कहा..."जाओ पिलाओ अपनी माँ को...मुझे नहीं चाहिए "
और छत की सीढियां चढ़ ऊपर कमरे में चले गए.

काफी देर तक वह अवसन्न सी बैठी रहीं फिर नहा धोकर पूजा घर में जाकर बैठ गयीं. यही प्रार्थना की भगवान से..." जहां  भी हो ..मेरी बेटी को सुखी रखना, भगवान"

पति स्कूल नहीं गए, खाना भी नहीं खाया...वे भी परेशान सी बैठी रहीं. सोच रही थीं ,गाँव वालों से कह देंगी...'नमिता बम्बई  गयी है..स्मिता के पास...पता तो चलना ही है,एक दिन ,उँ सबको पर जब तक टाली जा सके....'

पर गाँव वालों को सारी खबर हो गयी. दिलीप  और मनमोहन की माँ , सीधा आँगन में आ गईं...और जोर जोर से बोलने लगीं..."ममता माँ..नमिता कहाँ है...घर में नहीं है..का"

वे कुछ कहतीं,इस से पहले ही उनमे से एक बोली..."त ठीके, कह रहा था मनमोहना....सुबह वाली बस से उतरा...तांगा मिला नहीं,पैदले आ रहा था तो देखा कि नमिता एगो बैग लिए कौनो लरिका के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही है...मैने  कहा,...ना तूने ठीक से नहीं  देखा होगा...कौनो  और लरकी होगी.....पर इहाँ त सच्चे में नमिता घर में नहीं  है...कौन लरिका था....??"

वे सर झुकाए चुप रहीं. तो उनके करीब आ कंधे पर हाथ रख के बोली..." कुल का नाम डूबा गयी लड़की....कालिख पोत गयी अपने खानदान के मुहँ पर....अब रोने के सिवा का करोगी...उसका लच्छन त सुरुये से ठीक नहीं था "

" कौन बिसबास करेगा....बिसेसर बाबू की पोती....मास्टर साहब की बेटी...एगो भाई, इंजिनियर एगो डागदर और उस लरकी का  ई लच्छन ...ई सब जादा पढ़ाने का नतीजा है...अब छोटकी को संभालो...बंद कर दो इसका भी कॉलेज जाना..."..दूसरी बोलीं.

वे सर झुकाए सब सुनती रहीं...पर मीरा से बर्दाश्त नहीं हुआ...बाहर आ बोली, "चाची..दीदी ने चोरी की है....डाका डाला है, किसी को सताया है.....खून किया है, किसी का??...ऐसा  क्या किया है कि कालिख पुत गयी. और ये सब  आपलोग, गांवालों के चलते ही हुआ..कि आपलोग दूसरी जाति में शादी करने से हँसेंगे. नहीं तो पापा जी मान जाते और दीदी को ऐसे नहीं  जाना पड़ता..."

"अरे बाप रे...छोकरी की बोली  तो देखो....बित्ता भर की लड़की और गज भर की जबान...हम त तुम्हारी माँ को दिलासा देने आए थे....पर ये लड़की तो हमें ही भाषण दे रही है...इनरा  गांधी बनी बैठी है...चलो मनमोहन की माँ...इनके घर का चाल ही निराला है..."

वे लोग बाहर निकली तो चार औरतें उनके ही घर की तरफ टकटकी लगाए,  खड़ी थीं ...ये दोनों औरतें उनसे हाथ चमका कर बोलने लगीं, "अरे जाओ जाओ...अपने घर,  अपना काम देखो...यहाँ किसी को कोई दुख नहीं है...कुछ बोलोगी तो वो इनरा गांधी बैठी है, भाषण देने लगेंगी."

मीरा ने दरवाजा बंद कर दिया. बरसों में पहली बार दिन में इस घर के दरवाजे बंद हुए.

पति दिन भर वैसे ही बिना खाए पिए पड़े रहें....शाम को मुश्किल से दो निवाले खाए  और सोने चले गए.

दूसरे दिन मीरा कॉलेज जाने को तैयार होने लगी तो उन्होंने मना किया, "कुछ दिन मत जा...लोग बातें बनायेंगे "

मीरा फिर भड़क उठी.."माँ मुझे कोई डर नहीं, जो मुझे एक कहेगा....वो दो सुनेगा....दीदी ने कोई अपराध नहीं किया है....मुझे तो बस ये अफ़सोस है, दीदी को मुझपर भरोसा नहीं था...मुझे कुछ भी नहीं बताया उसने " कहती उसकी आँखें भर आईं. हैरान रह गयीं वो..इतनी छोटी उम्र में कैसी कैसी बातें करती है वो...इतनी किताबें जो पढ़ती रहती है. लगता था,मीरा एक रात में ही बड़ी हो गयी.

पति भी सर झुकाए, स्कूल जाते. लोग जानबूझकर रास्ते में राम-राम बोलते कि आगे टोकें.पर पति जबाब ही नहीं देते उनकी राम-राम  का कि आगे बात बढे.

दो दिन बाद फोन की घंटी बजी..पति ने ही फ़ोन उठाया और जिस तरह से चिल्ला पड़े, दिल दहल  गया उनका. नमिता का फ़ोन था. पति ने बहुत बुरा-भला कहा और यहाँ तक कह दिया, " मेरे मरने के बाद ही  इस घर में कदम रखना. जीते जी, अपना चेहरा भी मत दिखाना कभी और आज के बाद,कभी फोन करने की कोशिश मत करना " वे दौड़ती हुई गयीं.."ये क्या कह रहें हैं....मुझे फोन दीजिये..." पर पति ने फोन पटक दिया था.

बहुत दुख हुआ उन्हें,. किसी के साथ इतने बरसों तक रहकर भी उसे पूरी तरह नहीं जाना जा सकता. धीमा बोलने वाले, अच्छी अच्छी किताबें पढनेवाले, शिक्षक पति का असली रूप ये है? जब बेटों की शादी में दहेज़ नहीं लिया, दूसरी जाति की बहू लाने को तैयार हो गए, बेटियों को कॉलेज में पढने भेजा  तो कितना गर्व हो आया था उन्हें पति पर. लेकिन नमिता के साथ उनका व्यवहार देख ,ऐसा लग राह था किसी अजनबी के साथ वे इतने दिनों रहती आयीं, पहचान में ही नहीं आ रहें थे. अपनी गोद में खेली संतान के साथ कोई ऐसा कर सकता है,भला.
(क्रमशः )

25 comments:

shikha varshney said...

इस किश्त में सारा ध्यान खींच ले गई ये पंक्तियाँ
.".पर ये लड़की तो हमें ही भाषण दे रही है...इनरा गांधी बनी बैठी है." ये पंक्ति सच मुच सुनी जाती है बहुत मैं भी सुन चुकी हूँ एक बार :).
और मुख्य और खास बात ये-
किसी के साथ इतने बरसों तक रहकर भी उसे पूरी तरह नहीं जाना जा सकता. धीमा बोलने वाले, अच्छी अच्छी किताबें पढनेवाले, शिक्षक पति का असली रूप ये है?..
अगली कड़ी का इंतज़ार है ... .

kshama said...

Aap kahani me aise baandh deti hain,ki,doc ke mana karne ke baavjood mai baith ke padhti rahi!!

ashish said...

सुन्दर कड़ी. इस कड़ी में संवादों की झड़ी लगी है , जो एकदम यथार्थ के करीब है . बोलती हुई कहानी. मै मानता हूँ की नमिता का पात्र , जो कई कड़ीयो से पाठको के दिमाग पर राज कर रही थी और दिल के करीब लग रही थी, उसका इस तरह से चले जाना , थोडा निराश कर गया . अब उससे ये तो आशा थी की वो एक क्रन्तिकारी कदम उठाएगी जो उसने उठाया भी लेकिन पीठ दिखाकर गयी . खैर ये तो कहानी है और हम अगर किसी पात्र में इस तरह खोते है या अपने भावनावो को ढूंढते है तो कहानी निश्चित तौर पर बेहतरीन होती है. धन्यवाद्.

रश्मि प्रभा... said...

vichaaron ki paripakvtaa chhoti bahan me achhi lagi, badon ko idhar bhi dhyaan dena chahiye

राज भाटिय़ा said...

फ़िर से बांधे रखा आप की जादू की कलम ने, धन्यवाद

ज्योति सिंह said...

.पर ये लड़की तो हमें ही भाषण दे रही है...इनरा गांधी बनी बैठी है.
इस तरह की बडी बातो से सामने वालो को अक्सर टोक कर रोक दिया जाता है और मन की मन मे ही रह जाती है ,बहुत सुन्दर कहानी .

Mired Mirage said...

देखें, नमिता का क्या होगा! वैसे अच्छा ही होना चाहिए।
साथ रहना किसी को समझने की गारंटी नहीं है।
घुघूती बासूती

mukti said...

@ "फिर लालटेन को तुलसी चौरा, गाय के बथान, बैलों के पास, उनकी नाद, चारा काटने की मशीन, घूरा (जहाँ अहाते को बुहार कर पत्ते लकड़ी इकट्ठा किया जाता और उसे जला दिया जाता. जाड़े के दिनों में तो कई सूखी लकड़ियाँ, टूटी टोकरी सब इकट्ठा कर जलाया जाता,और आस-पास के लोग जमा हो आग तापते और किस्से कहानियाँ सुनाया करते एक दूसरे को.) सब जगह दिखा आती....
@...अब नई उम्र के लड़के सब पंजाब और असाम कमाने जाने लगे थे और वहाँ से पैसे भेजते .अब उनके घर मे भी चौकियां थीं, सब मच्छरदानी लगा के सोते, ट्रांजिस्टर पर गाना बजता रहता. और उनकी पत्नियां अब काम नहीं करती. बगीचे से जलावन भी इकट्ठा नहीं करतीं बल्कि जलाने की लकडियाँ भी पैसे देकर खरीदतीं.वरना पहले किसी को भी आवाज़ दे, ये छोटे मोटे काम करवा लिए जाते थे और बदले में थोड़ा अनाज भी दे दिया जाता था."... ... ये सब तो लग रहा है कि मेरे ही गाँव के बारे में लिखा है आपने.
इनके पति का ये रूप भी बहुत स्वाभाविक है "सब तुम्हारी शह है....इस लड़की के लच्छन तो शुरू से ही नज़र आ रहें थे.जब देखो..पूरे गाँव में घूमती रहती थी और अब ये हाल है...तुम्हे तो नज़र रखना चाहिए था...अब भुगतो, अपनी छूट का नतीजा. मैं तो दिन भर घर से बाहर रहता हूँ, एक लड़की नहीं संभाल सकी तुम"... ... बताओ भला ? लड़के करें तो कोई बात नहीं और लड़की...और इसका जवाब "ये" खुद अपने आप से पूछती हैं अंत में..."धीमा बोलने वाले, अच्छी अच्छी किताबें पढनेवाले, शिक्षक पति का असली रूप ये है? जब बेटों की शादी में दहेज़ नहीं लिया, दूसरी जाति की बहू लाने को तैयार हो गए, बेटियों को कॉलेज में पढने भेजा तो कितना गर्व हो आया था उन्हें पति पर. लेकिन नमिता के साथ उनका व्यवहार देख ,ऐसा लग राह था किसी अजनबी के साथ वे इतने दिनों रहती आयीं, पहचान में ही नहीं आ रहें थे. अपनी गोद में खेली संतान के साथ कोई ऐसा कर सकता है,भला."
@ " दोनों उस पर ही गुस्सा हैं..... जबकि दोनों तरफ से वे ही बात संभालने की कोशिश कर रही हैं." माँओं का यही हाल होता है.
@ "इनरा गांधी बनी बैठी है" मैंने बचपन में अपने लिये ये कमेंट बहुत सुना है... नाक थोड़ी लम्बी है ना और बाल भी वैसे ही कटे थे इसीलिये.

mukti said...

बहुत गजब का यू टर्न दिया है आपने कहानी को. मैंने तो इसकी कल्पना भी नहीं की थी.

वाणी गीत said...

खूब लालटेन दिखा लाई ...जरुरी था भई ...बिहार के गाँव में हर घर में लालटेन , मच्छरदानी का होना जरुरी है ...
बच्चों और पिता के बीच मां हमेशा ढाल बनती आई हैं मगर दोनों ही ओर से पिटती वही है ...
खिड़की से या छत से चाँद को देखते ट्रांजिस्टर पर गाने सुनना , अँधेरे में लेटे रहना ..क्या सुहाने दिन होते हैं ना जिंदगी के ...
तुम सूक्ष्मतम भावनाओं को भी बहुत अच्छे से अभिव्यक्त करती हो ..
बेटों का विवाह दूसरी जाति में करने को राजी हुए पिताजी नमिता से नाराज़ हैं ...जात -पांत एक अहम मुद्दा है आज भी ...
नमिता का इस तरह घर छोड़ कर जाना ...मेरी सहानुभूति उसके परिवार से है ...थोडा इन्तजार कर समझा बुझाया भी जा सकता था ...
मुक्ति से सहमत हूँ कि कहानी ने सचमुच यू टर्न लिया है ...ऐसा तो सोचा ही नहीं था ...!

प्रवीण पाण्डेय said...

एक उपन्यास में छपवाकर प्रस्तुत करें, पढ़ने का क्रम आ जायेगा। 'हम लोग' की तरह मिलते हैं अगले हफ्ते। रुक रुक पर पढ़ना प्रवाह में पीड़ा दे जाता है।

शुभम जैन said...

"बेटियाँ बिना बोले ही समझ जाती हैं, माँ के दिल का दर्द."
kitni sachchi baat hai ye...namita ke saath kya hota jaane ki utsukta aur badh gyi...yahna mira ka charitar sasakat hota hua aacha laga...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कहानी की यह किश्त नया मोड़ लेती हुई है..पर यह मोड़ आना ही था...जैसा की नमिता को पहले भी चित्रित किया की वो लोगों की बातों से प्रभावित नहीं होती..दबंग लडकी है....और आज की इस जाति प्रथा पर प्रहार तुम अपनी इसी पात्र के माध्यम से कर सकतीं थीं ....अभि तो मीरा भी कुछ न कुछ नया कदम उठाने की दिशा में दिखाई दे रही है....पत्नि की यही विडंबना है की वो हर रिश्ते के बीच में फंस कर रह जाती है....हर बात को सँभालने की कोशिश करती हुई...और सारी ज़िंदगी ताने सुनाने के लिए खुद को तैयार करती हुई...गाँव का वर्णन बहुत अच्छे से किया है..जैसे आज कल लोग गाँव से पलायन कर दूसरी जगह नौकरियों पर जा रहे हैं उसका सजीव चित्रण है....कुल मिला कर इस कड़ी में बहुत सी सामजिक कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है...अब आगे का इंतज़ार

वन्दना said...

इस बार कहानी मे जो नही सोचा था वो हुआ…………ना नमिता से ऐसी उम्मीद थी और ना ही उसके पिता से………………इंसानी सोच का बहुत ही सधा हुआ चित्रण किया है……………ऐसे मे कैसे कहा जा सकता है कि हम किसी को जानते हैं चाहे सारी ज़िन्दगी ही साथ क्यूँ न गुजार दें…………वक्त के साथ इन्सान और उसकी सोच सब बदल जाते हैं………………कहानी बहुत ही अच्छे मोड पर आ गयी है और कहानी मे सरसता भी बनी हुयी है……………बस ज़रा जल्दी जल्दी लगाया करो अगला भाग्……………पाठक भी उत्सुक रहता है।

Mithilesh dubey said...

".पर ये लड़की तो हमें ही भाषण दे रही है...इनरा गांधी बनी बैठी है"

kya bat hai, bahut khub ek bar phir racha aapne, aapka koi sani kahani lekha me, aage bhi aise hee likhti rahen, subhkamnayen

दीपक 'मशाल' said...

@मुक्ति सारे गाँव ऐसे ही होते थे पहले.. कुछ अभी भी हैं..
आप पाठकों के हिसाब से कहानी को मोड़ रही हैं क्या दी???

Sadhana Vaid said...

उपन्यास की यह कड़ी भी बहुत रोचक है और दिल को झकझोरने वाली है ! मीरा के व्यक्तित्व का क्रमश: परिपक्वता की और अग्रसर होना अच्छे संकेत दे रहा है ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा है ! बधाई !

मुदिता said...

anupam prvaah ...speechless i m .. bas padhti jaati hun flow mein... waiting fr next episode

रचना दीक्षित said...

"बेटियाँ बिना बोले ही समझ जाती हैं, माँ के दिल का दर्द."

ओह!!!!!!! कितना अच्छा लिखा है बहुत रोचक कड़ी

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बेटी का बनना-संवरना, मां का ताड़ जाना, और फिर पिता का विरोध, सबकुछ बहुत स्वाभाविक. और इस वाक्य ने तो पूरे माहौल का खाका ही खींच दिया-
...ये दोनों औरतें उनसे हाथ चमका कर बोलने लगीं, "अरे जाओ जाओ...अपने घर, अपना काम देखो...यहाँ किसी को कोई दुख नहीं है...कुछ बोलोगी तो वो इनरा गांधी बैठी है, भाषण देने लगेंगी."
बहुत सही पकड़.ऐसा ही होता है, बोलने वाली लड़कियों को यही पदवी दी जाती है.
और हां, ये सखी बनाने वाला वाकया तो बड़ा मज़ेदार है, मुझे ऐसी किसी रस्म की जानकारी नहीं थी. मध्य-प्रदेश में शरद पूर्णिमा के अवसर पर ऐसा होता है, कि आप जिसे अपनी दोस्त बनाना चाहतीं हों, उसे पूर्णिमा का भोग दिया जाता है.
कसी हुई भाषा, सुन्दर शैली भी. बधाई.

सारिका सक्सेना said...

रश्मि दी,
पिछले दिनों उत्तर भारत की ओर गए हुए थे इसीलिए ब्लॉग जगत से दूरी रही| पर वापस आते ही आज सबसे पहले आपके ब्लॉग पर जाकर "उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान" की सारी कड़ियाँ एक साथ पढ़ीं | कहानी ने काफी रोचक मोड़ ले लिया है| और उत्सुकता बनी हुई है| पूजा का किरदार बहुत अच्छा लगा, पर वो तो विदेश चली गयी| और नमिता का किरदार भी बदला हुआ लग रहा है| उससे तो बहुत उम्मीदें थीं| हमें तो लगा था वो बहुत कुछ कर दिखायेगी| खैर संभावनाएं तो अभी बहुत बाकी हैं देखें आगे क्या होता है|
"किसी के साथ इतने बरसों तक रहकर भी उसे पूरी तरह नहीं जाना जा सकता. "
बहुत सटीक लगीं ये पंक्तियाँ|

निर्मला कपिला said...

पिछली सारी कहानी भूल गयी हूँ समय मिलते ही पढूँगी। शुभकामनायें

कविता रावत said...

Bahut achhi kahani likhti hai aap... printout lekar fursat mein padhti hun .... dil mein ek mukam banati chali jaati hai ..
haardik shubhkamnayne...

अनामिका की सदायें ...... said...

गाँव की छोटी छोटी ताने तुनके की बाते बहुत ही सधे रूप में पेश की हैं. पिछली कड़ी पढ़ कर नमिता के बारे में यही उम्मीद की जा रही थी. और इस बात को की पिता पुत्र की शादी में जात-पात नहीं सोचता और बेटी की शादी में गाँव की परम्पराए, मान मर्यादा सभी आगे आ जाती हैं.
माँ की स्थिति सभी रिश्तों में साम्जस्ये बिठाने में शोचनीय हो जाती है जो बिलकुल सच है.

सुंदर ...आगे इंतज़ार है.