Sunday, July 18, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -10)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना  पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे. बड़ी दो बेटियों की शादी हो गयी थी. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग और छोटा बेटा,मेडिकल पढ़ रहा था. ससुर जी और सास का निधन हो गया और सारी जिम्मेवारी पति पर आ पड़ी.बड़े बेटे ने उनलोगों की रजामंदी से प्रेम-विवाह किया)

धीरे धीरे,ननदें,रिश्तेदार सब विदा हो गए. ममता भी ससुराल चली गयी, उसका बेटा अब स्कूल जाने लगा था और अब उसके स्कूल खुल गए थे. स्मिता भी ससुराल चली गयी,बम्बई लौटने से पहले कुछ दिन वहाँ रहना भी जरूरी था. आठ दिन कहकर प्रकाश गया था, वे रोज उसकी और बहू की बाट जोहतीं, रोज दाल भरी पूरी, खीर और पांच तरह की सब्जी बनाने का निर्देश देतीं,कलावती को. पर निराशा ही हाथ लगती और सुबह सारा बचा,खाना ,गाय को डालना पड़ता.

सिवनाथ माएँ उन्हें डांट भी देतीं, "अरे जब आ जाएंगे, बनवा लेना...रोज केतना गाय के नादी में डालोगी. उसकी भी आदत हो गयी रोज खीर पूरी खाने की तो घास नहीं खाया करेगी "

सिवनाथ माएँ,  अब उनकी सास की जगह पर थी, किसी भी बात पर पूरे हक़ से टोक देती. वे भी उसे पूरी  इज्जत देती ,आखिर वे ब्याह कर आयीं थी, तब से एक साल के सिवनाथ को गोदी में लेके सिवनाथ मायं काम पर आया करती थी.

ग्यारहवें दिन हैरान-परेशान सा प्रकाश अकेले ही आया. वे चौंक गयी..." दुल्हिन  कहाँ है?"

"वो अपने मायके में रुक गयी हैं माँ.....अब मेरे साथ चली जाएगी तो माँ-बाप के साथ रहने का समय नहीं मिलेगा, ना और फिर पैकिंग भी करनी थी."

"तू इतनी जल्दी, नौकरी पर ले जायेगा बहू को?"...उन्हें लग रहा था कुछ दिन बहू उनके साथ ससुराल में रहेगी. फिर प्रकाश अच्छा घर खोजेगा .तब वे भी साथ में जाएँगी. ये कल की लड़की क्या जानेगी,गृहस्थी कैसे जमाते  हैं? कौन सी चीज़ कहाँ रखनी है?. चूल्हा किस दिशा में रखना होगा. मंदिर किस कोने में ठीक होगा, रखना? कल तक किताब कॉपी में घुसी रहने वाले लड़की को ये घर-गृहस्थी  की बातें क्या मालूम?...पर प्रकाश ने तो चौंका दिया एकदम.पर ये सब उस से बोलीं नहीं वे.

" फिर छुट्टी नहीं मिलेगी ना माँ, और मुझे खाने  -पीने की इतनी तकलीफ हो रही है. प्रीति को साथ ही ले जाऊँगा.... सारी छुट्टी ख़तम हो गयी है, कल ही निकलना होगा. घर में फोन भी तो नहीं,नहीं तो मैं फोन पर ही बता देता...पर तुमलोग चिंता करोगी, इसलिए चला आया बताने." और फिर मीरा को आवाज़ दी.

"मीराssss ...जा जरा गोपाल चाचा को बुला ला तो, उन्हें घर पर टेलीफोन लगवाने का जिम्मा देता हूँ. उन्हें ही पैसे थमा देता हूँ, जल्दी से लगवा देंगे. आज फोन ना होने की वजह से लंबा चक्कर पड़  गया"

वे खुश तो हुईं फोन लगने की खबर से ,अब अपनी बेटियों से बात कर सकेंगी.पर जिस वजह से प्रकाश फोन लगवा रहा था. वह खल गयी ,घर ना  आना पड़े, फोन पर ही बात कर छुट्टी पा ले फिर ऐसा फोन किस काम का?

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प्रमोद, स्मिता ,ममता सब बड़े खुश हुए फोन लगने की खबर सुन. ममता ने कहा भी..."देखा माँ , कमाऊ पूत होने का फायदा. घर में नई चीज़ें आने लगी."

उनसे क्या कहती अपनी सुविधा के लिए लगवा कर गया है.

प्रमोद ने भी चैन की सांस ली, "बहुत अच्छा किया भैया ने, अब मुझे चिट्ठी नहीं लिखनी पड़ेगी. कितना झंझट लगता था..क्या लिखो...अब बस फोन पर हाल-चाल ले लिया करूँगा" मन में आया कहें ,'पहले कौन सा तू हाल-चाल लेने के लिए चिट्ठी लिखता था जब पैसे की जरूरत पड़े, तब ही दो लाइन की चिट्ठी आती थी.और वे घंटो नमिता की मिन्नतें कर उसके स्वास्थ्य की खबर जानने को लम्बी चिट्ठी लिखवाया करती थीं. पर कहा नहीं.

यही कहा ,"हाँ! बेटा तेरी आवाज़ सुन लिया करुँगी,अब "

लेकिन प्रमोद के फ़ोन भी बस पैसों के लिए ही आया करते. और पति के माथे पर चिंता की लकीरों में एक और इज़ाफ़ा कर जाया करते. उन्हें अब प्रमोद की पढ़ाई से ज्यादा चिंता दोनों बेटियों की शादी की हो रही थी. वो तो अच्छा था, कि अभी समय था, पर नमिता भी दसवीं  में आ चुकी थी. बस एक-एक दिन यही सोचते गुजरता कहाँ से आयेंगे  पैसे उसकी शादी के लिए? बेटों पर से भरोसा तो उठी ही चुका था. वे बाग़-बगीचे ,खेत-खलिहान  वापस लौटने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी.

उन्होंने कहा भी, " प्रमोद का अभी अंतिम वर्ष है...ना हो, एक साल के लिए  प्रकाश से कह दीजिये, प्रमोद को पैसे  भेज दिया करेगा. आखिर बड़ा भाई है...उसका भी कुछ कर्त्तव्य है. "

लेकिन आदर्शवादी पति ने कहा, "नहीं...प्रमोद मेरी जिम्मेवारी है....उसकी पढ़ाई के पैसे मैं ही दूंगा. चाहे जैस इंतज़ाम  करूँ."

"और बेटियों की शादी??"

" अभी तो सामने का खर्चा निबटाऊँ,ना...जब समय आयेगा देखा  जाएगा..बेच दूंगा सारी जमीन...हम दोनों को बुढापे में क्या चाहिए, मुट्ठी भर अन्न,...उतना जुगाड़ तो मेरी पेंशन से हो ही जाएगा...बेकार की चिंता मत करो"

पर चिंता थी की जाती ही नहीं थी...प्रमोद की डाक्टरी  की पढ़ाई पूरी हो गयी. और एक किसी अनजान आदमी का फोन आया घर पर कि मिलना चाहते हैं, आपके डाक्टर बेटे के बारे में, बात करनी है. मन एक बार धड़का. कौन सी बात?खैर पतिदेव ने बुला लिया.

इनकी कार कुछ और लम्बी थी. कपड़े कुछ और चमकदार. बहू प्रीति के दूर के चाचा लगते थे . इन सज्जन ने बताया कि वे प्रकाश की बारात में ही प्रमोद को देखकर अपनी लड़की के लिए पसंद कर चुके थे. और प्रमोद को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भेजने का खर्चा उठना चाहते हैं .उन्हें समझाने लगे कि खाली साधारण डाक्टरी की डिग्री, कुछ काम नहीं आएगी. विदेश से पढ़कर आएगा, तो बहुत  बड़ा डाक्टर बन जाएगा. आपलोगों की सम्मति हो तो आप लड़के से बात कर के बताइये. वे लड़की का फोटो भी लाये थे. शहर की लड़की लोग का फोटो तो कपड़े और बाल के डिजाइन से
ठीक ही लगता था.

वे सज्जन एक नई चिंता उन्हें सौंप कर चले गए. पति भी असमंजस में थे. उनका तो बिलकुल मन नहीं था कि  बेटे को सात समंदर पार भेजें. फिर मन में दबी हुई ये चाह भी थी कि जब प्रमोद की किसी लड़की से दोस्ती नहीं तो उसके लिए अपनी  जाति वाली लड़की लायें. दो दिन तक पति सोचते रहें ,फिर बोले.."ऐसा मौका प्रमोद को नहीं मिलेगा. हमारी तो औकात नहीं कि हम विदेश भेज सकें. सोचो गाँव का पहला डाक्टर वो भी 'फोरेन रिटर्न '..कितना रुतबा रहेगा....सबलोग ये भूल जाएंगे कि अब हमारे  पास उतनी जमीन जायदाद नहीं. हमारी खोयी हुई इज्ज़त वापस आ जाएगी"

वे ठंढी सांस भर कर रह गयीं..."इस इज्ज़त की चिंता इंसान से क्या क्या नहीं करवाती..." अब तो बेटे की सूरत देखने को भी तरसेंगी. फिर भी एक क्षीण आशा थी कहीं बेटे मना कर दें. बोली, "प्रकाश से तो बात कर लीजिये ,बड़ा बेटा है...उसकी राय जरूरी है"

प्रकाश सुनते ही खुश हो गया, "ये लोग तो प्रीति के पिता से भी कहीं  अमीर हैं.. प्रमोद के तो नसीब खुल गए....लड़की भी ठीक ही है.. " थोड़ा अटकते हुए बोला...फिर जल्दी से कहा, "मैं बताता हूँ..प्रमोद को..आपको बाद में फोन करता हूँ"

फिर सबकुछ प्रकाश और बहू ने ही तय किया. कैसे शादी होगी...कहाँ बारात जाएगी...पति-पत्नी दर्शक से बने  देखते रहें. उनमे पहले वाला उत्साह भी नहीं रह गया था.बस मशीन की तरह सारे रस्म निबटाती रहीं. बेटियाँ भी बारात में गयी थीं. दुल्हन की कार से पहले इनलोगों  की बस आ गयी.लौटीं तो थोड़ी बुझी बुझी थीं..."क्या बात है , बहुत थक गयी हो तुमलोग?"

"हाँ... माँ..." ममता और स्मिता ने एक साथ कहा पर नमिता कहाँ चुप रहती.

"माँ..दीदी लोग दुखी है...भाभी जरा भी भैया की जोड़ी की नहीं....भैया तो राजकुमार सा लग रहा था..भाभी ने इतना लम्बा हील (उसने बित्ता फैला कर दिखाया) पहना था फिर भी भैया के कंधे तक पहुँच रही थी. रंग भी..."...पर आगे कुछ बोलती क़ि ममता ने जोर से डपट दिया..."तू चुप करेगी या कपड़ा ठूंस कर मुहँ बंद कर दूँ, तेरा...बहुत चटर चटर जुबान चलती है....ये सब गलती से भी भाभी  के कान में पड़ गया तो.??...खुद को पता नहीं फिल्म की हिरोईन समझती है..सब भगवान के बनाए होते हैं...पता  नहीं कब अक्कल आएगी इस लड़की को.."

"नमिता,...प्रमोद ने प्रकाश के घर पर देखा है उसे..देख के पसंद किया है...अब एक बार भी इस तरह की बात मत करना " उन्होंने समझाया उसे. और पहली बार नमिता ने बिना बहस किए सीधी गाय की तरह सर हिला दिया. शायद सचमुच थक गयी थी, वह.

लेकिन वे सोचने लगीं, हर लड़के की इच्छा होती है,उसे परी सी ख़ूबसूरत लड़की मिले, प्रेम-विवाह हो तब तो ये चीज़ें मायने नहीं रखतीं. शकल से ज्यादा उसके मन की पहचान होती है.पर यहाँ प्रमोद ने अपनी विदेश की पढ़ाई के लिए, समझौता कर लिया. भगवान करे,लड़की मन की बहुत अच्छी हो. तन का रूप तो दो दिन का होता है.

अच्छा किया लड़कियों ने पहले से बता दिया, जब उन्होंने प्रमोद की दुल्हन को देखा तो अचंभित नहीं हुईं ना ही मन मलिन किया. रंग कम था पर नाक-नक्श कटीले थे और उन्हें ममता ही हो आई उस पर कहीं वो हीन ना समझे ,सबके बीच खुद को.

प्रमोद भी प्रकाश की तरह हनीमून पर गया. अब टेलीफोन था घर में तो चिंता नहीं थी कि  रोज  खाना बना कर रखें. पर इस बार प्रकाश ने छठे  दिन में ही फोन किया कि माँ दोपहर को पहुँच रहा हूँ... जल्दी जल्दी खुद ही चौके में लगीं. खाना बनाया. पूजा की थाली तैयार की. कार की आवाज़ सुन, पूजा की थाली संभालती दरवाजे की तरफ दौड़ीं कि ,बहू की आरती करेंगी ,तिलक  लगाएंगी.पर ये प्रमोद किसके साथ कार से उतर रहा है.? बहू कहाँ है? उस  लड़की ने पैंट पहने थे और लम्बा सा कुरता. मीरा उन्हें अचम्भे में देख  हंस पड़ी.."माँ... भाभी  हैं "

पास आकर  पैर छुए, उन्हें समझ नहीं आ रहा था,बिना सर पर पल्लू के वे टीका कैसे लगाएं?

उसने चप्पल उतारी , हैंडपंप पर पैर धोये और सीधा चौके में चली गयी, "मुझे तो बड़ी भूख लगी है"

बहू  के चौके में जाने की रस्म होती है यह तो बेधड़क अंदर चली गयी. किसी तरह नमिता को बुला कर खाना परोसा. फिर वो खुद ही पूरे घर में घूमने लगी, " दो दिन तक तो आपलोगों ने घर में कैद कर दिया था ..मैने तो कुछ देखा ही नहीं."

जब वो  छत पे जाने लगी तो वे घबरा गयीं, "नमिता उसे रोक किसी बहाने...आस-पास किसी ने देख लिया तो क्या कहेंगे?"

"माँ, सोचेंगे मेरी सहेली है....कौन सोचेगा...नई बहू होगी..जाने दो,ना..मैं भी जाती हूँ,साथ में" नमिता तो जैसे खुश हो रही थी उसके जैसी कोई आ गयी इस घर में.

(क्रमशः)

19 comments:

ashish said...

कहानी समय की धारा के साथ प्रवाहमान है . सूक्ष्मता से किया गया अवलोकन , कहानी की आत्मा है. मुझे लगा की जैसे जैसे कहानी , ग्राम्य जीवन की लीक पर चलने वाली व्यवस्था से शहरी जीवन की विस्तृत फलक की और बढ रही है , भावनाए. जो इस कहानी में लोगों रुलाती हसाती थी, धीरे धीरे अपना रूप बदल रही है या कमजोर पड रही है. मैंने यह इसलिए कहा की इस कड़ी को पढने के बाद मेरे ह्रदय में कोई उठापटक नहीं हुई , जो की इस कहानी की सभी कड़ीयो मै महसूस करता आया हूँ. ये भी हो सकता है की ये कहानी के इस मोड़ पर आने का स्फुलिंग हो. , अगली कड़ी का इंतजार रहेगा.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इस कड़ी में माँ और पिता की स्थिति को मार्मिक रूप दिया है...शायद आज ऐसी ही स्थिति से निपटते हैं माता पिता...पहला बेटा तो हाथ से निकल ही गया अब दूसरे की बारी है...क्या माँ बाप बस फर्ज़ पूरे करने के लिए ही हैं? गांव के माहौल में अब शहरी करण हो रहा है...देखते हैं कहानी आगे क्या मोड़ लेती है....प्रवाह बना हुआ है....आगे का इंतज़ार है

दीपक 'मशाल' said...

फिर से सजीव चित्रण... टेलीफोन लगने की ख़ुशी का तो क्या बखूबी सही वर्णन किया है.. हमारे यहाँ लगने पर मुझे भी ऐसी ही ख़ुशी हुई थी.. बहुत लोगों की तकलीफें जो शायद मैं नहीं सोच पाता वो आप इस कहानी के माध्यम से अहसास करा रही हैं दी.. सच में आज थोड़ा सही पर रुला दिया आपने..

वाणी गीत said...

टेलीफोन लगाने के बहाने प्रकाश ने माता पिता के साथ अपने रस्मी होने जाने वाले संबंधों की पुष्टि की ... प्रमोद भी अब उसी रह पर चल पड़ा है ...भौतिक सुख समृद्धि किस तरह धीरे धीरे मानवीय रिश्तों की ऊष्मा और गरिमा को लीलती जाती है , तुम्हारी कहानी अच्छी तरह बता रही है ...ग्राम्य जीवन पर चढ़ते शहरी रंग रूप की गवाह बन रही है यह कहानी ...
मगर बदलते समय के साथ अभिभावकों को भी बदलना चाहिए वरना उनके पास मन के सूनेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं बचेगा ...
कहानी रोचक बनी हुई है ....!

वन्दना said...

हालात का सजीव चित्रण किया है……………सच माँ बाप तो एक उम्र के बाद सिर्फ़ अपने फ़र्ज़ निभाने के लिये ही रह जाते हैं और बच्चों की सोच आसमान छू रही होती है बिना ये जाने या सोचे कि उनके भी तो कुछ अरमान रहे होंगे………………कहानी रोचक बनी हुयी है।

Himanshu Mohan said...

"उनमे पहले वाला उत्साह भी नहीं रह गया था.बस मशीन की तरह सारे रस्म निबटाती रहीं. बेटियाँ भी बारात में गयी थीं."
और
"माँ, सोचेंगे मेरी सहेली है....कौन सोचेगा...नई बहू होगी..जाने दो,ना..मैं भी जाती हूँ,साथ में" नमिता तो जैसे खुश हो रही थी उसके जैसी कोई आ गयी इस घर में।

कथा सहज बह रही है - जैसे नदियाँ पहले-पहल बहती हैं - नहर बनने पर। नदी के रूप में तो जब बही होंगी - किसने देखा है।
कोई बहुत बड़ा घर्षण नहीं है। सच बुज़ुर्ग धीरे-धीरे रेत हो जाते हैं - जो पत्थर-पना नहीं छोड़ पाते उन्हें टकराना-टूटना लिखा होता है अपने जैसों से, किनारों से - हालात के बहाव के वशीभूत। जब तक अपना बोझ बहाव को मोड़ सकता है - बहाव मुड़ता है। जब बहाव बढ़ता है - तो चट्टानें टूटती हैं और रेत होती जाती हैं।
फिर रेत जब इकट्ठा होती है - तो उभरते हैं टापू; बार-बार बाढ़ में डूबने वाले - और बाढ़ के उतरते ही फिर से प्रकट हो जाने वाले - और फिर से हरियाने लगने के भ्रम में…
शायद हम भी रेत हो रहे हैं,
रोज़-रोज़,
लम्हा-लम्हा…
शायद सहज भी यही है कि रेत हो जाया जाए - बहाव के ख़िलाफ़ कब तक? रेत हो जाने में ही सुख है - सहजता का : जो जीवन में नैसर्गिक रूप से होती है - होनी चाहिए।
जाने क्यों बहुत जिया हुआ सा लगता है सब-का-सब।
ये रेत होना - हमारी पसन्द से या इच्छा से नहीं होता, नियति है - कालक्रम में - सो होता है।
अच्छी लग रही है कहानी - ज़िन्दगी जैसी।

Mired Mirage said...

लगता है कि यही बहू सास व परिवार के मन से जुड़ेगी।
घुघूती बासूती

रश्मि प्रभा... said...

kahani me waqt ki karwaton ko padhna achha laga...ye kahan aa gaye hum !

प्रवीण पाण्डेय said...

कहनी सहज व रोचक है। पढ़ने में ही ध्यान है बस।

shikha varshney said...

हा हा हह ..नमिता जैसी आ गई कोई घर में ..वाह अब तो आएगा मजा तब जब ये दोनों मिलकर ठीक करेंगी सब को ..ऐसा ही कुछ होने वाला है न रश्मि ! या नमिता अकेले ही संभालेगी सब ?..काश ये ट्विस्ट आता कहानी में ये नन्द भौजी मिलकर कुछ गुल खिलातीं ..भारतीय समाज में नया अद्ध्याय लिखा जाता ..तो मजा आ जाता.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

रश्मि जी, आपसे ईर्ष्या सी करने का मन करता है कभी कभी।
कैसे लिख लेती हैं आप इतनी सशक्त दास्तानें?
................
नाग बाबा का कारनामा।
महिला खिलाड़ियों का ही क्यों होता है लिंग परीक्षण?

महफूज़ अली said...

मैं फिर से पूरी सिरीज़ पढ़ता हूँ फिर से....

शोभना चौरे said...

वाह रश्मिजी
क्या खूब चित्रण किया है आज के जीवन के यथार्थ का ?आज पडोस में सत्यनारायन की कथा थी पंडितजी थोडा विस्तार से समझा रहे थे |तीसरे अध्याय में जब साधू बनिया अपनी लडकी के लिए दामाद ढूंढता है तो वह गरीब घर का होता है
और साधू अपने जमाता के साथ व्यपार करने चला जाता है तब उसकी लडकी कलावती मायके में ही रहती है आपकी कहानी पढ़कर मुझे लगा ये रीत तो सदियों से चली आ रही है कितनी समानता है दोंनो कहनियो में |
आपके कथा शैली की जितनी भी तारीफ की जय कम है\

वन्दना अवस्थी दुबे said...

आज ही दोनों किस्त पढीं. पिछली किस्त में तुमने एक जगह लिखा है-

" वे फोटो छीनकर घुड़क देतीं, " ई मत भूलो ,तुमलोग का फोटो भी अईसही कहीं जाएगा और लोग मीन-मेख निकालेंगे. "
काश! हर लड़के वाला इस भावना को पोस पाता.
इस अंक में तो तुमने ग्रामीण और शहरी माहौल का गज़ब का खाका खींचा है. दूसरी बहू का बेधड़क चौके में जाना, सास का हतप्रभ होना.... वाह!! बहुत सुन्दर.

रचना दीक्षित said...

वाह क्या सजीव चित्रण है जैसे सब कुछ अपने आसपास ही घाट रहा हो. हमरी आपकी सबकी बात हो जैसे

Sadhana Vaid said...

कहानी का हर प्रसंग बहुत ही सशक्त और सजीव बन पड़ा है ! पाश्चात्य रंग में रंगी बहू को अपने पारंपरिक ग्राम्य परिवेश के घर संसार में अप्रत्याशित रूप से पहली बार देख कर उनकी असहजता और व्यग्रता बहुत ही स्वाभाविक और हृदयग्राही लगती है ! आज की पीढ़ी की व्यक्तिवादी सोच और बच्चों की अति व्यावहारिक मानसिकता को बहुत सधे हुए ढंग से उभारा है आपने ! इस कहानी के दर्पण में कई माता पिता अपना प्रतिबिम्ब देख पायेंगे ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा है !

मुदिता said...

रश्मि जी ,कहानी का प्रवाह मनमोहक है ,रस्मी तौर पर बड़ी बहु ने जो रिवाज निबाहे वो किस मनस्थिति के अंतर्गत निबाहे उसे आपने सटीक उभारा ..बेटे का भी दूर होते जाना मन को किस तरह निराश कर दे रहा है माता पिता दोनों के ही भावों को बखूबी चित्रित किया है..परन्तु छोटी बहु का आगमन एक नयी बयार के आने का सूचक है जो बाहरी दिखावों से परे हट कर कुछ अपनापन समेटे इस नए घर में बसने आई है .. इस माहौल को मैंने खुद अनुभव किया है.. लोग क्या कहेंगे कि चिंता ज्यादा होती है ससुरालियों को बजाय इसके कि बहु हमसे कितना जुडी हुई है ..:) रसोई में बेधड़क घुस जाना ये कहते हुए कि मुझे भूख लगी है.. और सास को चिंता हो रही है कि बहु की रसोई में जाने की रस्म होती है ..ये रस्में उस निश्छल स्नेह को बांधने लगती हैं न...यही रस्में बहु को बेटी से अलग करने लगती हैं पहले ही दिन से .....बहुत परिपक्व लेखन है आपका.. छोटी से छोटी बात भी आप भूलती नहीं ..बधाई... अगली किस्त के इंतज़ार में

Sanjeet Tripathi said...

i love it all the way.

jaqir jee se sehmat hun....

mukti said...

लेकिन आदर्शवादी पति ने कहा, "नहीं...प्रमोद मेरी जिम्मेवारी है....उसकी पढ़ाई के पैसे मैं ही दूंगा. चाहे जैस इंतज़ाम करूँ." मेरे बाऊ भी यही कहते थे कि बच्चे माँ-बाप की ज़िम्मेदारी होते हैं, भाई-बहन के नहीं.
और वाणी जी की ये बात भी बिल्कुल सही लगी मुझे-"भौतिक सुख समृद्धि किस तरह धीरे धीरे मानवीय रिश्तों की ऊष्मा और गरिमा को लीलती जाती है , तुम्हारी कहानी अच्छी तरह बता रही है ."
हिमांशु जी की टिप्पणी भी सही है कि कथा सहज ही बह रही है. और पता है ये दुल्हन के पैंट पहनकर आने वाली बात पर तो मुझे अपनी भावज का ध्यान हो आया. उसने पैंट तो नहीं पहनी थी, पर शादी के दूसरे ही दिन सूट पहनकर बिना दुपट्टा सिर पर डाले इधर-उधर घूमने लग गयी थी, मेरी माँ तो थी नहीं, पर चाची लोग "हा हू" करने लगीं. और तो और नाउन ने मुझसे कहा, "अरे कुछू समझावा अपनी भौजी के, कपार उघार के घूमत हईं" :-)