Monday, June 21, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -२)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से वे जग जाती हैं,और पुराना जीवन याद करने लगती हैं कि कैसे वे चौदह बरस की उम्र में शादी कर इस  घर में आई थीं,पति कॉलेज में थे.बाद में वही स्कूल में शिक्षक बन गए. दादी सास,सास-ससुर,ननदों से भरा पूरा घर था. उनकी भी चार बेटियाँ और दो बेटे पूरा घर गुलज़ार किए रहते)
 

गतांक से आगे.

पति को पढने का बड़ा शौक था,पूरे ध्यान से बच्चों को पढ़ाते. खुद भी टीचर ट्रेनिंग का कोर्स किया,एम.ए किया.  चारो बच्चों को सुबह शाम बिठा कर खुद  पढ़ाते. बच्चियों के सुघड़ अक्षरों में लिखी  कापियां देखतीं तो दिल गर्व से भर आता. उन्हें तो बस रामायण और व्रत, उपवास की पोथियाँ पढने  लायक अक्षर ज्ञान करवाया गया था. पर पति स्कूल के पुस्तकालय से और जब भी शहर जाते,अच्छी अच्छी पत्रिकाएं और किताबें खरीद लाते. बच्चों के नाम भी किताबों से पढ़करएकदम अलग सा रखा था.ममता तो सासू माँ ने रखा उसके बाद,स्मिता, प्रकाश, प्रमोद ,नमिता सब पति ने ही रखे.स्मिता कितना झल्लाती 'कोई मेरा नाम सही नहीं बोलता,सब मुझे सिमता कहते हैं .और पति जबाब में कहते, "तो तुम सुधार दिया करो,इस तरह सबलोग एक नया शब्द तो सीख जाएंगे" स्मिता कहती,"वे लोग क्या सीखेंगे मैं भी यही समझने   लगूंगी कि मेरा नाम सिमता ही है" वे बाप-बेटी की इस नोंक झोंक पर हंस पड़तीं   

स्कूल में लम्बी गर्मी छुट्टी होती. और दिन में लू के डर से लोग घर के अंदर ही रहते.उन्हीं दिनों उनके पठन-पाठन का कार्यक्रम चलता.पति उन्हें खुद पढने के लिए बहुत उकसाते.पर घर के काम-धाम से थकी उन्हें सुनना ज्यादा अच्छा लगता. वे पंखा झलती  और पति उन्हें पत्रिकाओं और किताबों से पढ़कर,कहानियां आलेख  सुनाते. एक नया संसार ही उनके सामने खुलता चला जाता.पूरी गर्मी की दुपहरिया ऐसे ही कटती.

पति कहते , लड़कियों को कॉलेज में भी पढ़ाएंगे.हॉस्टल में रख देंगे. अपने साथ पढने वाली लड़कियों की बातें बताते की कैसे वे बिलकुल नहीं डरतीं,मर्दों के सामने भी खुलकर बोलती हैं तो वे समझ नहीं पाती, 'कैसी होती होंगी ये लडकियां?' एक बार ननदें मायके आई थीं और सबलोग मिलकर पास के शहर में सिनेमा देखने गए थे.वे बाद में पति से पूछ बैठीं थीं, इन फ़िल्मी हिरोईन  जैसी लडकियां पढ़ती थीं,उनके साथ,कॉलेज में? पति जोर से हंस पड़े थे फिर बहुत ढूंढ कर किसी पत्रिका में कॉलेज में पढने वाली लड़कियों की तस्वीरे लेकर आए थे. तब वे देखती रह गयीं,ये तो बिलकुल गाँव की लड़कियों जैसी हैं...हाँ बस थोड़े कपड़े,अलग ढंग के पहने हैं...दुपट्टा पेट तक लम्बी रखने की बजाय गले में डाल रखा है. और कस कर दो चोटियाँ बनाने के बदले बिलकुल एक ढीली ढाली चोटी बनायी है. खुल नहीं जाती उनकी चोटी...वे सोचती रह जातीं.

फिर भी हॉस्टल में रखने की बात वे नहीं समझ पातीं, घर वालों से दूर बेटियाँ कैसे रह पाएंगी? ममता थी भी गाय सी सीधी. पति की लाई किताबें पढ़ती रहती या फिर छोटे भाई बहनों की देखभाल में लगी रहती. सबसे छोटी मीरा की तो जैसे बालिका माँ ही थी.हर वक़्त गोद में उठाये फिरती .मीरा भी स्कूल से आकर उसे किताबें भी नहीं रखने देती और गोद में चढ़ने   को मचल पड़ती.

पर सोचा हुआ,कब हो पाया  है. ममता ने दसवीं के इम्तहान दिए और ससुर जी ने फरमान सुना दिया. पास के गाँव के सबसे बड़े रईस जो उनके मित्र भी थे के पोते  से ममता की शादी पक्की कर दी है. पति को वह लड़का बिलकुल पसंद नहीं था.उनके स्कूल का ही पढ़ा हुआ था.अव्वल नंबर का बदमाश और हर क्लास में फेल होने वाला.बस पिता के रसूख की वजह से पास होता रहा. पढने के नाम पर पास के शहर तो चल गया पर उसकी आवारगी के किस्से छन छन कर आते रहते. लेकिन ससुर जी का कहना था उन्होंने इन दोनों के बचपन में ही बात पक्की कर दी थी. लड़के के लायक ना होने की बात को वे सिरे से ही खारिज कर देते. पिता के सम्मुख कभी मुहँ ना खोलने वाले, पति ने भी जरा जोर से कहा, यह लड़का  मुझे बिलकुल नहीं पसंद' इस पर ससुर जी ने हमेशा की तरह जोर से डांट दिया, "तुम्हे क्या पता,दुनियादारी क्या होती है,सिर्फ किताबों में घुसे रहो, इस उम्र में लड़के ऐसे ही होते हैं,सबलोग तुम्हारी तरह नहीं होते. शादी हो जायेगी, तो उसे अक्कल आ जाएगी" अपने ऊपर किए कटाक्ष को पति झेल नहीं पाए और भन्नाए हुए से बाहर निकल गए.

वे घबरा कर सास के पास गयीं. सास से उनके रिश्ते एक निश्चित फासले पर चलते. सास आज भी चाबियों का गुच्छा कमर में खोंसे रहतीं.पर काम सारे उनसे ही करवातीं,जरा संदूक में से ये निकाल दे,जरा वो रख दे. वे भी सास के अधिकारों में कोई भी अतिक्रमण नहीं करतीं. कुछ भी रसोई में नया बनाना हो तो सासू माँ से पूछ कर ही बनातीं, और वे अंदर से खुश होते हुए झूठा गुस्सा दिखाती,"अरी पूछती क्या है...बना लिया कर जो जी  चाहे "  मनिहारिन  आँगन में बड़े से टोकरे से बिंदी,आलता,रंग बिरंगी चूड़ियाँ निकाल कर कपड़े पर सजा देती पर वे  पूछतीं,"अम्माजी, ये  लाल चूड़ियाँ ले लूँ?" और सास बदले में कहतीं "हाँ और वो कत्थई  वाली भी ले लो". उनके पति कमाते थे ,वे जो चाहे खरीद सकतीं थीं,पर इतना सा पूछ लेना,सास को जो ख़ुशी  देता वे,उस से उन्हें वंचित नहीं करना चाहती थीं. वो मनिहारिन धूप में बड़ा सा टोकरा उठाये, गाँव में घर घर घूमा करती थी.पर वो विजातीय थी इसलिए कोई उसे पानी भी नहीं पूछता. भले  ही उस से ख़रीदे श्रृंगार के सामन ,'चूड़ी आलता,बिंदी ,कंघी,रिबन' गाँव की सारी औरतें मंदिर में देवी माँ को चढ़ातीं. एक दिन उन्होंने डरते डरते सास से कहा,' बिचारी धूप में, इतना घूमती है प्यास लग जाती होगी...कुछ चना-चबैना देकर पानी दे दूँ? " सास चौंकी और जरा रुक्ष स्वर में बोलीं,"किस बर्तन में दोगी?" और उन्होंने स्वर में  शहद घोल कर कहा था,"ये शहर से शीशे के ग्लास और प्लेट लाये हैं ना,उनमे से ही एक में दे देती हूँ और अलग रख दूंगी, वो जब भी आयेंगी उसी में दे दिया करुँगी " सास ने बड़ी अनिच्छा से कहा था,"जाओ जैसा मन में आए करो...ये बिटवा ने चार किताबें पढ़ पढ़ कर तुम्हारा भी दिमाग खराब कर दिया है...जाओ दे दो" और वे बच्चों को बुलाने भागीं कि जाती हुई मनिहारिन को आवाज़ देकर बुलाएं. वे जोर से चिल्ला भी नहीं सकती थीं.

आज भी उन्हें पूरी उम्मीद थी कि हमेशा की तरह सासू माँ उनकी बात मान जाएँगी.ममता को वे भी तो कितना प्यार करती हैं.उसका नाम भी उन्होंने ही रखा था.पर सास तो उन लोगों के  नए ढंग से बने मकान पर रीझी हुई थीं. और उनलोगों की कार ने और भी मन मोह लिया था उनका. कई बार बाबूजी से कह चुकी थीं.पर बाबूजी नहीं माने थे,"यह सब पैसे की बर्बादी है, हमें गाड़ी का क्या काम,जब शहर जाना हो किराए पर मिल जाती है." सास मन मसोस  कर रह गयी थीं और आज अपनी कल्पना में पोती को गाड़ी में घूमती देखने के सिवा  उनका मन कुछ और देखने को तैयार नहीं  था. बोलीं," अरे ,इतने सुन्दर घर में बिटिया जा रही है,और क्या चाहिए. धनधान्य से पूर्ण अमीर लोग,देखने में लड़का क्या बांका लगता है,ममता राज करेगी."

वे चुपचाप अपने कमरे में लौट आयीं. लेकिन एक दिन शाम को सहेलियों के साथ खेतों में घूमने गयी ममता तेजी से दौड़ती हुई आई और सीधा कमरे में जाकर पलंग पर गिर कर रोने लगी. वे घबराई हुई सी पीछे भागीं. तब तक स्मिता भी आ गयी और कहने लगी कि "वे सब साथ में घूम रही थीं,पर दीदी तो हमेशा कि तरह प्रकृति के रूप निहारती खोयी हुई सी थोड़ा आगे निकल गयी .तभी जीप पर वो लड़का जिससे दीदी  की शादी होने वाली है , चार लड़कों के साथ आया और खेत की मेंड़ पर पता नहीं दीदी से क्या पूछा कि दीदी तो रोते हुए भागी और वे सब लड़के ठठा कर हंस पड़े " ममता रोये जा रही थी,उन्हें पता था ममता का आभिजात्य मन कभी भी पूरी बात बताने की इजाजत नहीं देगा.लेकिन वे ऐसे लड़के से अपनी बेटी की शादी नहीं होने देंगी और वे तेज क़दमों से सीधा ससुर जी के कमरे तक पहुँच गयीं.

उन्होंने कभी बाबूजी से मुहँ भर बात नहीं की थी.  उनके कदम ,कमरे के दरवाजे पर जाकर ठिठक गए .बाबूजी कुछ बही-खाता देख रहें थे. आहट सुन, सर घुमाया फिर तुरंत  ही नज़र फेर दरवाजे पर टिका दीं. कभी कभार बच्चों की या सास की बीमारी के समय दो बात करते तो यूँ ही सर, ऊपर की तरफ कर दीवार की ओर मुहँ करते और आँखें मींचे उनकी बात का जबाब धीरे धीरे एक एक शब्द पर जोर देते हुए देते. आज भी उसी अंदाज़ में पूछा,"क्या बात है बहू" और उनका गला भर आया, बोल पड़ीं,"बाबूजी वो लड़का ठीक नहीं है,ममता के लिए. " और वे उन्हें समझाने लगे,"देखो बहू, जमाना बदल रहा है,अब सीधे साधे लोगों का गुजारा नहीं है. सब लोग रामावतार जी  की तरह नहीं हो सकते.( वे अपने बेटे के नाम के आगे भी जी लगाया करते थे) उनके जैसा लड़िका खोजोगी तो मेरी पोती सबकी शादी कभी नहीं होगी. देखो जमीन जायदाद बचाने के लिए थोड़ी बदमासी दिखानी ही पड़ती है.  ये तो पुरुखों का मान है और गाँव में मेरी इज्जत है कि सब बचा हुआ है.उस लड़के का बाप ,हमेसा अपने बाप के पीठ पर खड़ा रहता था,देखो केतना तरक्की कर गया, चमचम घर, मोटरगाड़ी सब है.और हम, जो है खाली उसी को बचाने में लगे हुए हैं. वो तो पुरखों का मान है और सब मेरी इज्जत है इसलिए अब तक कोई बखेड़ा नहीं हुआ.मेरे बाद क्या होगा,राम जाने. रामावतार जी को तो खाली किताब से मतलब है.  तुम चिंता ना करो. जरा लड़ीकपन  है, नया  उम्र है..शादी होते ही सब ठीक हो जायेगा"

वे थके क़दमों से लौट आयीं पहली बार ससुर जी के दिल का दर्द जाना, उनके मन में भी शायद दबी हुई चाह थी कि उनका बेटा उनका साथ देता,जब उन्हें  रात-बिरात खेतों में जाना पड़ता है तो उनके साथ चलता, जब बहस मुसाहिबा होता है तो उनके पीठ पर बोलता.

अब कोई चारा ना देख वे ममता को समझाने में जुट गयी,"बेटा, सबलोग दुनिया में एक जैसे नहीं होते,उनके घर का रहन सहन अलग होगा, तू तो इतनी समझदार है, अच्छे से निभा लेना. हो सकता है वो तुझे देखना चाहता हो ,इसलिए इस गाँव में आया हो.ऐसा कई लोग करते हैं " शायद कई बार वे ये बातें दुहरा गयी क्यूंकि एक बार जब फिर से ममता के बालों में तेल लगाते यही सब कह रही थीं तो स्मिता  बोल पड़ी," माँ लगता है तुम्हे दीदी की समझ पर भरोसा नहीं है, तभी एक ही बात रटे जा रही हो" उन्होंने देखा,ममता ने धीरे से स्मिता का हाथ दबा दिया. ओह , इतनी छोटी  सी लड़की समझ रही है कि माँ बहुत परेशान है, और ये सब कह कर अपनी परेशानी से उबरना चाहती है. वे चुप हो गयीं और ख़याल आ गया अब तक उसके बालों में वही तेल लगाती आई हैं, कभी कभी चोटियाँ भी बना देतीं अब ससुराल में कौन इसकी कंघी चोटी करेगा और साड़ी की कोर से उन्होंने आँसू पोंछ लिए.

धूमधाम से बारात दरवाजे आई, लड़के को देखा तो आँखें जुड़ा गयीं.सिल्क के कुरते, पीली धोती और सर पे मौरी ,एकदम राजकुमार लग रहा था. ननदोई की बात याद आ गयी कि ,"लड़की की माँ को तो बस सुन्दर दामाद चाहिए .सुन्दर चेहरा देखते ही वे रीझ जाती हैं" परिछावन करते, मन ही कितनी बार भगवान के आगे गुहार लगाई .."हे भगवान तन के जैसा इसका मन भी सुन्दर रखना"
(क्रमशः )

29 comments:

shikha varshney said...

कहानी आराम से पढूंगी अभी सिर्फ हाजिरी लगे है :)

ashish said...

ग्रामीण परिवेश के तानेबाने में बुनी गयी ये कहानी , कितनी संवेदनशीलता अपने अन्दर छुपाये हुए है.मेरे पास शब्द नहीं प्रकट करने को. एक एक पात्र जिवंत होता अपने वार्तालापो के माध्यम से . एकदम वास्तविकता के करीब.. ऐसा लगता है की आप आपने पात्रों को जीती है., मनोभावों की कुशल चितेरी है आप. . आभार इस सुन्दर अंश के लिए. अगले भाग की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी

Satish Pancham said...

यहां आपने धीरे धीरे कहानी को कसना शुरू कर दिया है....पिछली किश्त तो ज्यादातर इंट्रोडक्टरी होने के बावजूद रूचिकर तो थी ही.....लकिन इस दूसरी किश्त ने तो उसमें कसाव लाना शुरू कर दिया है....जिस अंदाज में मनिहारन, ग्रामीण चलन के तहत विजातीय को पानी पूछने से पहले कई बार सोचना, घर की महिलाओं का परछन आदि का सहज उल्लेख किया है वह लाजवाब है।

एकदम मस्त कहानी है....जारी रहें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ग्रामीण परिवेश को बखूबी उकेरा है....और सास को कैसे खुश किया जा सकता है उसका भी अच्छा चित्रण है....कहानी बहुत बढ़िया चल रही है...जिज्ञासा बानी हुई है कि अब आगे क्या होगा?

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सतीश जी सही कह रहे हैं. कहानी का ताना-बाना अब कस गया है. ग्रामीण परिवार और उसमें बहू की स्थिति बहुत अच्छे से उभर कर सामने आई है. सास-बहू का प्रसंग भी बहुत सजीव और रोचक है.

दीपक 'मशाल' said...

रवानगी बनी हुई है कहानी में.. बंधे हुए से पढ़े जा रहे हैं.. अगला भाग जल्दी चाहिदा..

Sadhana Vaid said...

बहुत ही सुन्दर वर्णन है एक परम्परावादी परिवार का ! अपना बचपन याद आ गया जब अपनी माँ व अपने बाबाजी या ताऊजी के बीच संवाद कायम रखने के लिए हम बच्चों को माध्यम बनाना लाजिमी हुआ करता था ! बाबूजी के ऑफिस में काम करने वाले मुस्लिम सहयोगी तक उनके लिए प्रयोग में लाये जाने वाले बर्तनों को पहचानते थे और अक्सर हम बच्चों की भूल को सुधार कर जलपान के लिए अपने ही बर्तनों में लाने का आग्रह करते थे ! लेकिन इस भेदभाव का कोई भी नकारात्मक प्रभाव उन दिनों के समाज में व्याप्त नहीं दिखाई देता था ! कहानी बहुत ही हृदयग्राही लग रही है !अगली कड़ी की उत्सुकता से प्रतीक्षा है !

Sanjeet Tripathi said...

kahani ko padhte hue laga ki mai vakai kisi purane samay ke gramin parivesh me hu aur mere aage hi ye sab ho raha hai.

aapne bahut hi acche se us gramin parevish ko ukera hai apne shabdo me bandh kar........
padhna chahunga ise ant tak....

रश्मि प्रभा... said...

ek pariwarik parivesh ko bade salike se likha hai ......rashmi ji, aapki her kahaniyon mein zindagi ke vishesh rang jhalakte hain, jisse shayad hi koi achhuta ho

वन्दना said...

कहानी बहुत ही सधी हुई मजबूत पकड के साथ आगे बढ रही है……………रिश्तों को बखुबी परिभाषित किया है……………अगली कडी जल्दी लगाईयेगा।

रेखा श्रीवास्तव said...

ग्रामीण संस्कृति कि सजीव चित्रण, कहानी रोचक बन रही है और बंधे रखे है फिर अगली कड़ी का इन्तजार..............

वाणी गीत said...

चार बेटे दो बेटियां ...मुझे लगा मुझे ही तो याद नहीं कर रही हो ..
अपनी माँ और दादी के ज़माने की याद दिला दी ...
चूड़ी वाली मनिहारिन से सब सामान खरीदना ... ...मुझे अपनी दही वाली " उषा " भी याद आ रही है ....मटके में से चकते में जमा दही सर पर लेकर घुमती ...और वो पत्र- पत्रिकाएं घर घर ले कर घूमने वाला(दीदी जी, आपके लिए ही लेकर आया हूँ ..थैले में छुपा कर रखी "वामा" दिखाते हुए ) ...मॉल में बिना मोल भाव के सामान खरीदते लोग क्या जाने किस तरह रिश्ता जुड़ जाता था इन कामगारों से ...सबके पास काम होता था करने को...
मनिहारिन के प्रति दया भाव दिखाती हमारी माँ ही हो जैसे ...
शादी मतलब सामंजस्य ही होता था ...लड़कियां अपने आपको तैयार रखती थी किसी भी तरह के माहौल में खुद को खपाने में ...ममता का ससुराल में क्या हाल होता है ..जानने की बहुत उत्सुकता हो गयी है ...
जल्दी ही लिखोगी ना दूसरी कड़ी भी ..

शुभम जैन said...

hamesha ki tarah baandh liya is kahani ne bhi...agali kadi ka besabri se intjaar...

Divya said...

Rashmi ji,

Soul stirring excellent story !

I am short of words to praise the beautiful narration of the story.

...स्मिता बोल पड़ी," माँ लगता है तुम्हे दीदी की समझ पर भरोसा नहीं है, तभी एक ही बात रटे जा रही हो" उन्होंने देखा,ममता ने धीरे से स्मिता का हाथ दबा दिया. ओह , इतनी छोटी सी लड़की समझ रही है कि माँ बहुत परेशान है, और ये सब कह कर अपनी परेशानी से उबरना चाहती है....

How beautifully the little girl understands her mother's helplessness and the mother also the daughters are aware of her constraints. I am in tears at this point of story.

Will for the remaining half

Divya said...

and the mother also knows that the daughters are** [correction]

Divya said...

I wanted to say more at this juncture of the story but refrained, because i need to know what author has in her mind.

Waiting eagerly for the next part.

डॉ टी एस दराल said...

रश्मि जी , दोनों किस्त आज ही पढ़ पाया । गाँव के परिवेश में , संयुक्त परिवार और समय के साथ आते बदलाव को बखूबी बयाँ किया है आपने । ऐसा लगता है जैसे स्वयं भी इस दौर से गुजरे हों । बहुत बारीकियों से घर के माहौल को दर्शाया है।
आगे देखते हैं क्या होता है ममता के साथ।

rashmi ravija said...

Hey Divya its not such a great story...just a simple one but am happy that u liked it so much...thanx allot dear.

And plss drop this 'Ji'....wud b happy if u call me 'Rashmi' only...I know u r much much younger to me...still :)

Mired Mirage said...

रश्मि, कहानी बहुत रोचक है। गाँव, रिश्ते, उनकी रस्साकस्सी, सब रोचक है। किन्तु प्रायः यूँ रोचक, मनमोहक लगने वाले रिश्ते किसी न किसी की बलि माँगते ही हैं। यह बलि प्रायः स्त्री की ही होती है। देखें यह बलि ममता की चढ़ेगी या किसी अन्य की।
घुघूती बासूती

ज्योति सिंह said...

इतनी अच्छी कहानी को पढने के लिए फुर्सत के लम्हे चाहिए क्योंकि पढ़ते समय ऐसे खो जाती हूँ इनके हाव -भाव में कि कही और की सुध नहीं रहती और इसी खाली समय की तलाश में वंचित रह जाती यहाँ की कहानी पढने से , मगर आज से ये सिलसिला जारी रहेगा ,इस कहानी को पढ़ते वक़्त बहुत से ख्याल कौंधते रहे मगर लिखते वक़्त समझ नहीं पा रही कहाँ से शुरू करू और क्या लिखू ,नारी दुविधा पर कुछ बोल याद आ रहे है ---
गम ख़ुशी ख़ुशी छुपा लिया
दर्द को दिल बना लिया ,
कुछ झुकी झुकी नज़र कहे
कुछ छुपा छुपा सा डर कहे ,
जो कहे वो रात भर कहे
फिर भी हो न कुछ बयां ,
है इधर तरफ उधर गिला
ख़ामोशी है दर्द की सजा ,
गम ख़ुशी ख़ुशी छुपा लिया
दर्द को भी दिल बना लिया ,
जिंदगी ने आजमा लिया
तुम तो न लो अब इम्तिहान

mukti said...

मुझे अपनी अम्मा की याद आ गयी. वो भी ऐसे ही दूसरों की खुशी के लिए बहुत से समझौते करती रहती थीं... दादी से कभी मुँह सामने करके नहीं बोलती थीं (लोग बताते हैं... मैं तो तेरह-चौदह साल की थी जब उनकी डेथ हुई)...मेरे ख्याल से जो लोग गाँव से जुड़े हैं, उन सभी को अपना कोई ना कोई याद आ गया होगा क्योंकि आपने लिखा ही इतना स्वाभाविक है... और दी, सिम्प्लिसिटी ही तो इस कहानी के प्राण हैं...
इस कहानी में भी चित्रण बहुत ही सजीव हो उठे हैं... बारात आ गयी है, तो उत्सुकता बढ़ गयी है कि आगे ममता का क्या होगा?...
आशा है अगली कड़ी जल्दी आयेगी.

Udan Tashtari said...

कहानी में कसावट आ गई...आगे जारी रहो..पूरी पढ़कर समीक्षा होगी असल..संभलना. :)

सारिका सक्सेना said...

आज ही दोनों किस्तें साथ पढीं। ग्रामीण परिवेश में ढली ये कहानी बहुत सुन्दर लगी। आपकी कलम किसी भी माहौल का पूरा चित्र सामने खींच देती है, और पाठक चलचित्र का सा मज़ा लेते हैं।
अगली कडी का इंतज़ार है।

शहरोज़ said...

जिस प्रवाह के साथ कहानी पाठक को पढवा लेती है, घोर आश्चर्य होता है.लेकिन ये आश्चर्य ही लेखक के लिए तोष का विषय होना चाहिए.आपको क्लासिक्स पढना चाहिए और समकालीन कथा-जगत से भी रिश्ते रखें.यथा संभव !

mamta said...

बढिया कहानी .अब please मेरी namesake ko dukh ke sagar me gote mat lagawa deejiega.But you will write what the story demands,ok chalega.

निर्मला कपिला said...

ये हमारे देश के हर गाँव की कहानी है शायद अभी भी बहुत कुछ नही बदला। अच्छी चल रही है कहानी। आभार।

shikha varshney said...

कहानी की एक एक पंक्ति उस समय के ग्रामीण परिवेश को दर्शाती है ..सभी समस्यायों को जिस सहजता से आपने उभारा है वो प्रशंसनीय है.अब आगे देखते हैं.

सर्प संसार said...

मर्म स्पर्शी रचना।
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क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

Arvind Mishra said...

तन सुन्दर .....अब मन भी देखें तो .....!रफ़्तार और रवानगी पर आ चुकी कहानी!