Thursday, June 17, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान


गहरी नींद में थीं वे,लगा कहीं दूर कोई गाना बज रहा है,पर जैसे जैसे नींद हलकी होती गयी,गाने का स्वर पास आता प्रतीत हुआ, पूरी तरह आँख खुलने के बाद उन्हें अहसास हुआ ये आवाज तो मेज पर पड़े मोबाईल से रही है. ओह! इस मुए रमेसर ने लगता है फिर से गाना बदल दिया,इसीलिए नहीं पहचान पायीं.खुद तो घोड़े बेचकर बरामदे में सो रहा है, अब बिटिया नाराज़ होगी,फोन नहीं उठाया. संभाल कर पलंग से नीचे कदम रखा,आहिस्ता आहिस्ता कदम रखते जब तक मेज तक पहुँचती,मोबाईल थक कर चुप हो चुका था. लालटेन की बत्ती तेज की,बिजली तो बस भरे उजाले में ही आया करती है,गाँव में ,घुप्प अँधेरा देख वो भी डर कर भाग जाती है. चश्मा लगाया और मोबाईल लेकर संभल कर पलंग पर बैठ गयीं.
देखभाल कर कॉल का बटन दबाया,कितनी माथा पच्ची करके बिटिया ने सिखाया था. पर ये क्या, यहाँ तो अंग्रेजी में कुछ गिटपिट बोल रही है.मतलब वे समझती हैं, यानि की बैलेंस नहीं है अब,ये भी रमेसर की ही कारगुजारी है,कल फिर उसकी खबर लेंगी...अभी तो बस इंतज़ार कर सकती हैं,बिटिया के कॉल की. आज जरूर दफ्तर में देर हो गयी होगी, तभी इतनी देर से फोन किया है वरना उसे भी पता है,नौ बजे ही गाँव में आधी रात हो जाती है.

आंगन की तरफ खुलते दरवाजे से आँगन में छिटकी ठंढी चांदनी नज़र आई...और एक गहरा उसांस लिया, क्या ठंढी चांदनी और क्या गरम दुपहरिया,वैसा ही सन्नाटा,पसरा होता घर में...बस यह तय करना मुश्किल कि उनके मन का सन्नाटा बड़ा है या उनके घर का.. कभी कितना गुलज़ार हुआ करता था. चौदह बरस की थीं,जब ब्याह कर आई थीं. पति कॉलेज में पढ़ रहें थे. सास ससुर, ननदों से भरा-पूरा घर, पति की दादी भी जिंदा थीं, तब.दिनभर घर में मेला सा लगा रहता. बाहर बड़ी बड़ी चटाइयों पर अनाज सुखाए जाते. आँगन में पिसाई कुटाई चलती रहती. कभी कोई बड़ा सा टोकरा सर पर लिए आता तो कभी कोई पके केले का घौद लिए. बाहर के बरामदे से ही वे लोग जोर से खांसते कि अगर नई बहुरिया यानि 'वे' आँगन में हों तो अंदर चली जाएँ. जल्दी से वे उठ कर भागतीं तो पैरों की पायल जोर की छनक उठती और लोग समझ जाते अब रास्ता खाली है.

काम तो उन्हें कुछ होता नहीं .बस सज धज कर पूरे घर में डोला करतीं. कभी एक ननद हाथों में मेहंदी लगाती तो कभी दूसरी पैरों में महावर. नई नवेली भाभी को गुड़िया सी सजा कर रखतीं.

दादी सास बहुत कड़क मिजाज थीं. ससुर जी की रोबदार आवाज बाहर गूंजती रहती पर एक बार दादी सास जोर की आवाज़ लगातीं,"कितना बोला करे है, गला ना दुखे है तेरा?" और वे चुप हो जाते. पर दादी सास उन्हें बहुत प्यार करतीं. अपने सारे काम उन से ही करवातीं और काम भी क्या, पूजा के बर्तन धो दे,उनके राधा श्याम के कपड़े सिल दे. और जब वे राधा-श्याम के कपड़े सिल उसपर गोटे सितारे भी टांक देतीं तो दादी सास निहाल हो जातीं. जब तब उसे पास बिठा लेतीं, "एक भजन सुना" उन्होंने मीठा गला ,पाया था. जब वे अपने मीठे स्वर में गातीं, "मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई" तो उनके पति भी सबकी आँख बचाते पिछले दरवाजे पर खड़े होते. उनकी नज़रें मिलतीं और स्वर में थोड़ी मिठास और घुल जाती.

शादी के बाद भी उनकी प्रेमलीला आँखों में ही चलती. इतने बड़े घर में वे बातें करने को भी छुप कर मिला करते. कभी अटारी पर तो कभी लोहे लक्कड़ से भरे पिछवाड़े के गलियारे में. रात के सन्नाटे में तो उनकी आवाज़ ही नहीं निकलती.उनके कमरे से लगा ही दादी सास का कमरा था. दादी सास पूरी रात खांसती रहतीं,राम जाने कभी सोती भी या नहीं. पर दिन में मिलने के हज़ार तरीके और जगह ढूंढ लिए थे, उन दोनों ने. वे एक ख़ास अंदाज़ में चूड़ियाँ खनकातीं और किताबों से घिरे पति ,शायद इंतज़ार में ही होते,झट किताबें बंद कर निकल आते.

दो साल बाद जब वे माँ बनीं,तब पति कॉलेज में ही थे. पूरा घर उनके आगे बिछा जाता.घर के मामलों में रूचि ना लेने वाले ,ससुर जी भी खाना खाते वक़्त,पूछ ही लेते, "बहू की तबियत कैसी है? डॉक्टर के यहाँ जाना हो तो बता देना, गाड़ी का इंतज़ाम कर दूंगा." दोनों ननदें रोज नए नए नामों को लेकर झगडा किया करतीं. मितभाषी पति के चेहरे पर भी धूपखिली मुस्कान सजी होती.उन्हें भी विशिष्ट होने का अहसास होता.

जब ममता गोद में आई तो थोड़ा डर गयीं, शायद सबको बेटे की चाह हो पर इतने दिनों बाद घर में गूंजी एक नन्ही किलकारी ने सबका मन मोह लिया..और सबकी आँखों का तारा बन गयी ,नन्ही ममता. एक बेटी को इतना प्यार मिलता देख ही शायद भगवान ने दो साल बाद भी इक बिटिया ही भेज दी. इस बार सबने खुल कर तो कुछ नहीं कहा ,पर सबके चेहरे की मायूसी ही दिल का हाल बयाँ कर गयी. वैसे भी तोतली जुबान में बोलती और डगमग पैरों से चलती ममता ही सबकी दुलारी थी. स्मिता की देखरेख का भार उन पर ही था और लगता सही अर्थों में अब वे माँ बनी हैं.

पति की पढ़ाई पूरी हो गयी थी और उन्होंने घरवालों से छुपकर रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन पत्र दिया था. सिर्फ उन्हें ही बताया था और सुन कर वे भी थोड़ी घबरा गयी थीं. पूरी ज़िन्दगी गाँव में गुजारी.कैसे शहर में रह पाएंगी?वहाँ तो सुना था लाली, पाउडर लगाए औरतें.सर उघाड़े घूमा करती हैं. उनके तो सर से पल्ला भी नहीं सरका कभी. एक बार पति ने शहर से लाकर फेस पाउडर का एक डब्बा दिया था,जिसे कभी कभी वे घरवालों के डर से सोते वक़्त लगातीं. बाद में जब बेटियों को बताया था तो कैसे लोट पोट हो हंसी थीं वे. याद करके उनके मुख पर भी मुस्कान तिर आई. शहर के नाम से एक अनजाना भय तो था ,पर नई जगह देखने की ख़ुशी भी थी,कहीं.

पर नौकरी के कागज़ ने वो हंगामा किया घर में कि आज भी डर जाती हैं,याद करके. ससुर जी एकदम आपे से बाहर हो गए," नौकरी करेगा??..इतने बड़े जमीन जायदाद का मालिक नौकरी करेगा??. शौक था पढने का पढ़ा दिया ,कॉलेज में. अब नौकरी भी करेगा? क्यूँ देख रेख करूँ फिर मैं इस जायदाद की...जाकर काशी ना बस जाऊं?" पति ने ससुर जी के सामने कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं की.उनके सामने पड़ते भी कम. आने जाने के लिए भी पूरब वाला बरामदा इस्तेमाल करते.सामने से नहीं आते कभी. सर झुकाए खड़े रहें.

फिर खाना खाते वक़्त ससुर जी थोड़ा पिघले ."ठीक है दस बजे, बुशर्ट पैंट पहिन कर घर से निकलने का ही शौक है तो स्कूल की नौकरी कर लो,जब शौक पूरा हो जाए तो खेती बाड़ी संभाल लेना." उन दिनों नया नया हाई स्कूल खुला था गाँव में और बी..पास करके उनके पति शिक्षक बन गए.पर गाँव में रहकर भी ठाट शहरों वाले. अब वे भी नई बहुरिया नहीं रह गयीं थीं. दिन भर दोनों बच्चियों की देखभाल में लगी होतीं. पति के नखरे ही इतने थे. बच्चियां बिलकुल साफ़ सुथरी शहरी अंदाज़ में पलनी चाहिए.उनके लिए चाहे बस एक पाउडर ही लाया हो.पर बेटियों के लिए सुन्दर फ्रॉक, रिबन,हेयर बैंड ,लाल गुलाबी चप्पलें, सब शहर से लाते.पूरे गाँव में उनकी बेटियाँ अलग से पहचानी जातीं.

शहर में रहकर पढने पर उनका खान पान भी बदल गया था.पूरा गाँव शाम को चना चबेना,भूंजा वगैरह खाया करता.पर उनके पति को हलवा,पकौड़े चाहिए होते. चाय तो हर आधे घंटे पर.यह सब उन्हें ही बनाना पड़ता, रसोई में काम करने वाली काकी के बस का नहीं था यह सब. अब महावर और मेहन्दी क्या,चूड़ियाँ बदले भी दिन गुजर जाते. कमजोर भी हो गयी थीं और उसी में दो साल के अंतर पर दो बेटों की माँ भी बन गयीं. पूरा घर खुशियों में डूब गया. तीन दिन तक तो हलवाई लगे रहें.पूरे गाँव को न्योता था. दोनों बेटे भी पांच बरस की उम्र तक नहीं जानते थे कि गोदी के अलावा कोई और भी जगह होती है बैठने की. सास ससुर के दुलारे थे दोनों पर पति की जान बेटियों में ही बसती थी.

धीरे धीरे उन पर जिम्मेवारियों का बोझ बढ़ने लगा. दोनों ननदों का ब्याह हो गया. दादी सास भी लम्बी बीमारी के बाद गुजर गयीं. बेटे भी अब स्कूल जाने लगे और उनके गिरधर गोपाल को लगा थोड़ी देर को भी उनके घर का आँगन सूना क्यूँ रहें और फिर से दो लक्ष्मी उनके गोद में डाल दी. सबसे छोटी बेटी के तो नाम रखने का भी उत्साह किसी में नहीं था. कभी मीरा के भजन वे बड़े शौक से गाती थीं,उन्होंने प्यार से उसका नाम रख दिया,मीरा.
(क्रमशः )

31 comments:

shikha varshney said...

ये कहानी भी रोचक लग रही है ..कुछ दृश्य जैसे दादी सास वाला ..राधा कृष्ण के कपड़े.. बहुत जीवंत बन पड़े हैं ..वैसे सही है दादी सास अपनी बहु के लिए जैसी भी हो ..अपनी पोता बहू के लिए बहुत अच्छी होती है :)मेरी दादी सास भी मुझे बहुत प्यार करती है :) देखें आगे कहानी क्या मोड लेती है .

शोभना चौरे said...

rashmiji bahut sundar kathanak hai .khani apni purn vidha ke sath aage badh rhi hai .
agli kadi ka intjar

ajit gupta said...

बहुत अच्‍छी कहानी है, आगे की कडी का इंतजार रहेगा।

ashish said...

@शादी के बाद भी उनकी प्रेमलीला आँखों में ही चलती. इतने बड़े घर में वे बातें करने को भी छुप कर मिला करते. कभी अटारी पर तो कभी लोहे लक्कड़ से भरे पिछवाड़े के गलियारे में. रात के सन्नाटे में तो उनकी आवाज़ ही नहीं निकलती.

उपरोक्त पंक्तिया मुझे बिहारी की पंक्तिया दिला गयी. '' कहत नटत रीझत खिझात , मिळत खिलत लजियात . भरे भवन में ही करत है नैनं ही सौ बात .'' कहानी का आगाज अच्छा लगा .अंजाम जानने की इच्छा बलवती हुई..इंतजार रहेगा अगली कड़ी का.

विनोद कुमार पांडेय said...

गाँव और उसके बाद शहर,रहन-सहन और तौर तरीके में धीरे धीरे परिवर्तन करना ही पड़ता है या यूँ कहे की हो जाता है..
अभी तक जितना पढ़ा बढ़िया लगा..आगे और बढ़िया और भावपूर्ण लेखन होने की कामना के साथ अगली कड़ी का इंतजार है..

सतत और सार्थक लेखन के लिए आभार...

mukti said...

पता है मुझे अपनी अम्मा की याद हो आयी...वो भी पहले गाँव में रही थीं और ऐसे ही किस्से सुनाया करती थीं... सास-ननदें भरा-पूरा घर, नयी नवेली अम्मा और शादी के बाद वाली प्रेमलीला (इसके बारे में बाऊ जी बताते थे अम्मा उनको आँखों से डपटती रही थीं कि बच्चों के सामने ऐसी "बेशर्मी" की बातें क्यों करते हैं)... बहुत ही जीवंत वर्णन किया है आपने... दी ये भी लघु उपन्यास है क्या? दूसरी किस्त कब आयेगी?

rashmi ravija said...

@मुक्ति ,ये बस एक लम्बी कहानी है..शायद दो किस्तों में ही हो जाए या तीन में...कुछ दिन पहले आकाशवाणी से प्रसारित हुई थी. ब्लॉग का ये फायदा है कि unedited version यहाँ डाल दो:)...वरना वहाँ 10 मिनट के लिए बहुत एडिट करना पड़ता है.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सुन्दर
और सारी पंक्तियां आप की

दिलीप said...

rochakta talashni nahi padti aapke lekhan me mam...rochakta ko paribhashit karta hai aapka lekhan...agli kadi ka intzaar...

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई सुन्दर कहानी है रश्मि. कई बार लेखक जिस परिवेश में रह रहा होता है, केवल उसे ही बेहतर तरीके से चित्रित कर पाता है, लेकिन तुम कहानी में आंचलिकता लाने में सफल हुई हो. अगली कड़ी के इन्तज़ार में.

Sadhana Vaid said...

कहानी बहुत रोचक और सशक्त लग रही है ! अगली कड़ी का इंतज़ार है ! सारे परिदृश्य बड़े मोहक और परिचित से लग रहे हैं !
http://sudhinama.blogspot.com
http://sadhanavaid.blogspot.com

इस्मत ज़ैदी said...

बहुत मज़ा आ रहा है ,आगे की कहानी का बेसब्री से इंतेज़ार रहेगा

Sanjeet Tripathi said...

interesting,
pahli kisht aise likhi gai hi ki agli kisht ka intejar karna hi padega....
kahani me kai jagaho pe aisa laga jaise likhne wale ne in palp ko jiya ho, iske liye aapko badhai ki pure taur par shahari parivesh se hone ke baad bhi aap kahani me ye anubhuti jagaane me kaamyad rahin....

chaliye ji agli kisht ki pratikshha karte hain bhale hi unedit sahi.... kynki ye aakashwani nahi blog jagat hai......

वाणी गीत said...

शादी के बाद आँखों में चलने वाली प्रेमलीला ....
दादी माँ के राधा कृष्ण के लिए सिले जाने वले वस्त्र ...
पति के दिए फेस पावडर का छुप कर लगाना ...
किस दुनिया की सैर करा लाती हो तुम भी अपनी लेखनी से ...
रोचक कहानी ...अगली कड़ियों का बेसब्री से इन्तजार ...!!

महेन्द्र मिश्र said...

रोचक कहानी .....आभार

Arvind Mishra said...

रोचक मगर यह बता दीजियेगा कि यह कहानी ,लम्बी कहानी /उपन्यासिका या उपन्यास क्या है ?

दीपक 'मशाल' said...

अगला भाग भी लगाइए सब साथ ही पढूंगा. आजकल पल-पल में नेट गड़बड़ हो रहा है, सारा मज़ा किरकिरा हो जायेगा..

Udan Tashtari said...

फेस पाउडर का एक डब्बा दिया था,जिसे कभी कभी वे घरवालों के डर से सोते वक़्त लगातीं.

हा हा!


बहुत रोचक कथा चल रही है...आगे इन्तजार है.

अनूप शुक्ल said...

मर्दों का खांस-खखार कर घर में घुसना याद दिला दिया। वाह।

परिवार नियोजन वाले दुखी हो जायेंगे इसे बांचकर लेकिन नाराज हो जायेंगे इसे बांचकर लेकिन जब वे देखेंगे स्त्री-पुरुष अनुपात सुधर रहा है तो शायद खुश भी जायें।

M VERMA said...

आपने तो पूरा परिवेश समेट लिया है. बहुत रोचक और उत्सुकता को जगाती हुई

महफूज़ अली said...

कहानी बहुत अच्छी लग रही है..... और बहुत अच्छी जा रही है.... चेंज और ट्रेडिशन .... को बहुत अच्छे से उकेरा है आपने.... अब आगे का इंतज़ार है....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गांव के परिवेश को बखूबी निखारा है...रोचक कहानी ...और अब आगे का इंतज़ार ....

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी कहानी है शुरू से अन्त तक बान्धे रखा। बधाई

खुशदीप सहगल said...

ग्रेट रश्मि बहना,
ज़ोरदार इंट्रो, फिल्म भी ज़बरदस्त ही रहेगी...

जय हिंद...

रेखा श्रीवास्तव said...

क्या कथानक चुना है, कहीं से भी चूक नहीं हुई , गाँव का हूबहू चित्रण. मैंने तो अपनी ननिहाल में देखा है ये सब तो लगा फिर बचपन लौटकर वही ले गया.
बहुत अच्छी कहानी जा रही है. बस हम तो कायल तुम्हारे और तुम्हारी इस कलम के.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मन को छू जाने वाली दास्तान... आगे की प्रतीक्षा रहेगी।
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भविष्य बताने वाली घोड़ी।
खेतों में लहराएँगी ब्लॉग की फसलें।

सतीश पंचम said...

कहानी का अंश तो अच्छी है ही....लेकिन उसका परिवेश जिस तरह से लिखा गया है, दर्शाया गया है वह कुछ ज्यादा ही जमा।

बहुत बढ़िया।

वन्दना said...

कहानी बहुत रोचक और सशक्त है ! अगली कड़ी का इंतज़ार है ! एक दम कसे हुये अन्दाज़ मे चल रही है।

Mired Mirage said...

वाह!
घुघूती बासूती

ज्योति सिंह said...

anup ji ki baate bahut dilchsp lagi ,mujhe bhi apna nanihaal yaad aa gaya ,jahan purusho ke liye alag bangala hota raha aur khnsana sanket ki tarah ,kalam ka jawab nahi yahan ,ati sundar .

आभा said...

आपने अपनी कलम से गाँव दिखा दिया ,बहुत सुन्दर , अगली कड़ी का इतजार..