Sunday, June 27, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -4)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से वे जग जाती हैं,और पुराना जीवन याद करने लगती हैं.उनकी चार बेटियों  और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे.बड़ी बेटी ममता की शादी ससुर जी ने पति की इच्छा के विरुद्ध एक बड़े घर में कर दी.वे लोग ममता को तो कोई कमी नहीं महसूस होने देते पर उसे मायके नहीं आने देते )
 

गतांक से आगे
 

वे कनस्तर से आटा निकाल कर  काकी को दे रही थीं,गूंधने को. इसी बीच बाहर प्रमोद की जोर जोर से चिल्लाने की आवाजें सुनीं तो आटे सने हाथों से ही दरवाजे की तरफ भागीं और सामने जो नज़र गयी तो हतप्रभ रह गयीं,ध्यान भी नहीं रहा और वही आटे सने हाथ आश्चर्य से होठों पे रख लिए. दूर से पीले छींट की फ्रॉक पहने, कानों के पास लाल रंग के रिबन के दो फूल लगाए, नमिता साईकिल चलाती, उसकी घंटी टुनटुनाती हुई  चली आ रही थी. यहाँ प्रमोद ,गुस्से  से पागल हुआ जा रहा था, क्यूंकि उसके ट्यूशन जाने का समय हो रहा था और नमिता, साइकिल ले चली गयी थी. पर इस लड़की ने साइकिल चलाना कब सीखा? प्रमोद के शब्द उनके कानों तक जा ही नहीं रहें थे वे मंत्रमुग्ध सी नमिता को देख रही थीं,ऐसा लग रहा था, किसी मल्लिका की तरह वो राजहंस पर बैठी तैरती हुई चली आ रही है.

अहाते में पहुँचते ही, नमिता साइकिल से ठीक से उतरी भी नहीं थी की प्रमोद ने धक्का दे, उसे गिरा कर साइकिल छीन  ली. नमिता ने भी उठकर उसे जोर का धक्का  दिया पर प्रमोद ने उसके बाल खींच दो धौल पीठ पर जमा दिए और साइकिल ले चलता बना. नमिता वहीँ जमीन पर  बैठ कर पैर पटक पटक कर भाँ भाँ करके रोने लगी. उन्होंने इशारे से उसे बुलाया. क्या विवशता थी,वे देहरी लांघ,अपनी रोती बेटी को चुप भी नहीं करा सकती थीं. आँगन में काम करती, शिवनाथ माएं को आवाज दे ,नमिता को चुप करा लाने को कहा.वो उठाने गयी तो नमिता ने उसके हाथ झटक दिए और खुद ही चल पड़ी पर अंदर नहीं आई ,बाहर ही चौकी पर आँसू पोंछती बैठ गयी.



थोड़ी ही देर में बच्चों का झुण्ड "नमता नमता " की पुकार  लगाते हुए आया और वो उठ कर चल दी,गुल्ली-डंडा खेलने. बेटे गाँव के लड़कों के साथ ज्यादा घुलते मिलते नहीं थे. खुद को जरा विशिष्ट समझते पर नमिता, गाँव के हमउम्र लड़कों के साथ,"गुल्ली डंडा" ,कभी "कंचे" तो कभी "डेंगा पानी" खेला  करती. कभी भाइयों के जतन से छुपाये,गेंद-बल्ला ढूंढ निकालती और गाँव के लड़कों के साथ जम कर खेलती लेकिन उसे वापस उसी जगह पर रखने की बजाय लापरवाही से बाहर बरामदे में ही छोड़ देती. जब बेटे देख लेते फिर तो आँगन में जो महाभारत मचती कि लगता किसी का तो सर फूट कर रहेगा.

प्रमोद कहता, " इसी बल्ले से एक दिन तेरा सर फोड़ दूंगा...अगर फिर से छुआ है कभी?"

नमिता कमर पे हाथ रख कर कहती,"हिम्मत है तो आगे बढ़ के देख...सौ बार छूँऊँगी "

" पापा जी मेरे लिए शहर से लेकर आए हैं...लडकियां नहीं खेलतीं क्रिकेट...जा जा कर गुड़िया की शादी रचा..."

"नाम लिखा है उस पे तुमहरा?...और किस किताब में लिखा है लडकियां नहीं खेलती क्रिकेट...जाओ जाकर किताबों में माथा रगडो..."

"माँ समझा दो,वरना सच में बहुत मारूंगा .."

"और जैसे मैं छोड़ दूंगी..."

किसी तरह नमिता को पकड़ कमरे में ले जातीं.

 आज भी ,उनका मन हो रहा था,उसे अपने से चिपटा खूब दुलार करें और पूछे, "ये साइकिल चलाना कहाँ से सीखा?" पर नमिता, दादी की तरह उन्हें भी अपना विरोधी ही मानती थी. दो भाइयों के बाद उसका जनम था. बचपन से ही वह नौकरानियों की गोद में ही पलती आई. पांच साल के प्रमोद को सास गोद में उठाये रहतीं पर तीन साल की रोती नमिता को कलावती,सीला के हवाले कर देतीं.उनकी गोद में छोटी मीरा थी. ये विद्रोह के बीज तब से ही नमिता के मन में पड़ गए . जिसे आगे की रोज रोज घटती घटनाओं ने खूब खाद पानी दिया. स्कूल जाने से पहले सारे बच्चे खाना खाने बैठते और सास कलावती को अंदर से घी का डब्बा लाकर प्रकाश और प्रमोद की दाल में घी डालने को बोलतीं. उनके विचार से लड़कों को ही घी खाने का हक़ था. नमिता का जब ध्यान गया तो उसने दाल खाना ही छोड़ दिया,सब्जी चावल खा कर उठ जाती,कहती मुझे दाल नहीं पसंद. उनका मन कसमसा कर रह जाता, पर वे सास के विरुद्ध नहीं जा सकती थीं. यह बात पतिदेव ने भी गौर की और उन्हें अलग बुलाकर कहा, लड़कियों के शरीर को भी उतनी ही पौष्टिकता की जरूरत है,किसी बहाने उन्हें पौष्टिक भोजन दिया करो.

उन्होंने कहा,"आप ही क्यूँ नहीं कहते?"

"मैने आजतक माँ के विरुद्ध कुछ कहा है? कहेंगी, औरत की बातों में आ गया है. तुम रसोई संभालती हो , कोई उपाय निकालो."

 पर वे क्या करतीं,घर में एक पत्ता भी सास की मर्जी के बिना नहीं खड़कता था.

गाँव में आए दिन किसी की बेटी ससुराल से, तो बहू मायके से आती रहतीं. और घर घर बैना भेजा  जाता. लाल क्रोशिये से बुने मेजपोश से ढके डगरे में मिठाइयों की अलग अलग छोटी छोटी ढेरियाँ बनीं होतीं ,जिसे कोई कामवाली, घर घर बांटने के लिए जाती. उस से बहू,बेटी के हालचाल पूछे जाते और    कुछ पैसे दिए जाते. किस घर से कितने पैसे मिले हैं, यह लेखा-जोखा भी लिया जाता. सास हमेशा अच्छी मिठाइयां पोतों  के लिए रख देतीं. यहाँ भी नमिता कह देती मुझे मीठा नहीं पसंद. एक बार दुपहरिया में सास सो रही थीं. उन्होंने ही बैना लिया और जल्दी से कमरे में पैर फैलाए मीरा के साथ, गोटी खेलती  नमिता के पास मिठाई ले कर गयीं.

"ले आज तेरे लिए अच्छी वाली मिठाई छांट कर लाई हूँ "

"जिस दिन दादी के सामने देने की हिम्मत हो,उस दिन देना" नमिता ने टका सा जबाब दे दिया.

 जब उन्होंने जबरदस्ती खिलाने की कोशिश की तो जमीन पर फेंक दी,मिठाई. ओह!! काँप जातीं वो,कितना गुस्सा भरा है,इस लड़की के मन में. बोलीं," गिरा क्यूँ दिया कम से कम मीरा को ही दे देती.."

"अच्छा है मीरा को इसका स्वाद ही ना पता चले...वरना उसका भी मन होगा खाने  का....ले मीरा तेरी बारी" और उसने गोटियाँ मीरा के हाथों में पकड़ा दीं.

 मन उदास हो गया ,उनका और  उस दिन तो कमरे में जाकर रो ही पड़ीं ,जब प्रकाश ने दादी से खीर खाने की फरमाइश की थी.

 उन्होंने बताया,  "अम्मा जी, चीनी ज्यादा नहीं है, खीर कल बना दूंगी".

इस पर सास ने कहा," घर के मर्दों के लिए चीनी वाली खीर बना दो और औरतों ,लड़कियों के लिए गुड़  वाली"

उन्होंने प्रतिवाद भी किया, "कल चीनी, मंगवा कर सबके लिए, चीनी की खीर बना दूंगी"

"आज लड़के का मन है तो खीर कल  बनेगी?...ये क्या बात हुई...आज बनाओ"..सास ने गुस्से से कहा.

और जब नमिता ने उनकी कटोरियों में सफ़ेद खीर और अपनी कटोरी में लाल खीर देखी तो
बहाने से पूरी कटोरी ही थाली में गिरा दी,और "अब खाने  का मन नहीं है" कहती उठ कर चली गयी.

"एकदम कोई शऊर  नहीं है इस लड़की को,इसके लच्छन तो देखो"...सास जोर से चिल्लाईं  पर नमिता ने कभी परवाह की ही नहीं.

वे कमरे में जाकर रो पड़ीं, उनकी  आँखों के सामने ही उनकी बेटियों  के साथ ये अन्याय हो रहा है और वे मुहँ सिल कर बैठी हैं. पर वे विरोध करतीं, तो उनके घर का आँगन भी ,गाँव के हर आँगन की तरह महाभारत में तब्दील हो जाता  और चूल्हे चौके अलग हो जाते. जो ना उन्हें गंवारा था ना उनके पति को.
ममता,स्मिता भी ये सब झेलतीं पर भाइयों के 'लड़के'  होने की वजह से विशिष्टता का भान उन्हें था.इसे खुले मन से स्वीकार कर लिया था उन दोनों ने .वैसे भी ,भाई उनसे छोटे थे और वे समझतीं ,भगवान ने उनकी पुकार पर ही भाइयों को उनके घर भेजा है. जबसे चलने बोलने  लायक हुई,किसी मंदिर या  किसी भी  पूजा में सास उनका सर जमीन से लगा देतीं और कहतीं,"भाई मांगो, भगवान से"

एक  नमिता ,इस विशिष्ट दर्जे को बिलकुल स्वीकार नहीं  कर पाती और सबसे उलझती रहती.

पर नमिता का गुस्सा सिर्फ घर वाले ही झेलते वरना वो पूरे गाँव की प्यारी थी. उसके  तेजी से साईकिल चलाने,पेड़ पर चढ़ जाने, बरगद की बड़ी बड़ी जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने पर पूरा गाँव मुग्ध था. सब कहते ,"किस नच्छत्तर में पैदा हुई है ये लड़की...लडको के भी कान काटती है."

घर के सामने ही एक अमरुद का पेड़ था,वह उसकी फुनगी पर चढ़ कर जोर से चिल्लाती "दादीsss "
और सास जोर जोर से भुनभुनाती, पेड़ की तरफ चल देतीं,"अरे,तुझे कब अक्कल आएगी... लड़कियों वाले कोई लच्छन  तो तुझमे हैं ही नहीं ..कही पैर वैर टूट गया तो कौन तुझ लंगड़ी से शादी करेगा...उतर नीचे"

और जैसे ही सास पेड़ के नीचे पहुंचतीं  वो उनके सामने ही धम्म से कूद जाती."

गाँव के हर घर में दिन में एक चक्कर उसका जरूर लग जाता. स्कूल से आ बाहर वाले कमरे में ही किताबें  फेंकती और चल देती, वो चिल्लाती रह जातीं,कुछ तो खा के जा पर गाँव का हर घर उसका अपना घर था. यह बात, बाद में स्मिता ने बतायी थी. तुम यहाँ  चिंता कर रही थी और वो फलां के घर बैठी कचरी खा रही थी या ठेकुआ खा रही थी. किसी के घर कुछ अच्छा बनता तो नमिता के लिए जरूर रख दिया जाता. कभी किसी घर में नहीं जा पातीं तो वे लोग किसी ना किसी के हाथ कटोरी  भेज देतीं.,ये कहते ,"नमिता को ये बहुत पसंद है "

पर कभी कभी वे घबरा भी जातीं. अँधेरा हो गया, नमिता घर नहीं आई. स्मिता की चिरौरी करतीं ,"जरा देख ना,किसके घर में है? "

स्मिता गुस्से में आकर बताती, "महारानी ,फुलेसर चाचा के घर रोटियाँ बना रही थीं"

"क्याsss  " उन्होंने आश्चर्य जताया

 तो नमिता गुस्से में बोल पड़ी," क्या करती??.....वे रोटी बना रही थीं और उनका चार महीने का बच्चा भूख से चीख  चीख कर रो रहा था..मैने कहा ,आप उसे देखो मैं बना देती हूँ...उनके घर, हमारे यहाँ  की तरह नौकर चाकर नहीं झूलते रहते...सारा काम वे खुद ही किया करती हैं." और मुहँ बिचका कर चली जाती.

एक बार छठ पूजा के लिए घाट पर जाने की तैयारी हो रही थी और नमिता का कुछ पता नहीं. फिर से स्मिता को भेजा,पता चला नरेन्  चाचा  के यहाँ बैठी ,पेटीकोट  सिल रही थी मशीन पे. क्यूंकि चाची दौरी सजा रही थीं.और उन्हें दिन में समय नहीं मिल पाया और नया कपडा पहनना जरूरी था. नमिता ने साइकिल चलाने से लेकर रोटी बनानी ,मशीन चलानी  सब सीख ली लेकिन सब घर से बाहर.

ससुर जी से सब डरते. उनके दुलारे पोते भी उनसे थोड़ा दूर ही रहते. वैसे भी दोनों लड़के घर में दिखते भी कम.सुबह सुबह गणित पढने साइकिल से गणित के मास्टर साहब के यहाँ जाते.वहाँ से आते और नहा-खा कर स्कूल. स्कूल से आ एकाध घंटा क्रिकेट का बल्ला-गेंद ले दूर मैदान में खेलने  जाते.और घर आ फिर से विज्ञान  का ट्यूशन पढने के लिए साइकिल  लिए निकल जाते. रात में पति उन्हें अंग्रेजी और इतहास-भूगोल पढ़ाते. ननदें अपने पतियों के साथ शहर में रहतीं थीं. .जब छुट्टियों में आतीं तो उनके बच्चों के कपड़े, बोलने चालने के ढंग से प्रकाश,प्रमोद बहुत प्रभावित दिखते और उन्हें लगता पढाई ही वो कुंजी है जो इस गाँव के वातावरण से मुक्ति दिला सकती है. और इसी के सहारे उनके शहर में रहने का सपना साकार हो सकता है. इसी खातिर वे जी जान से पढाई में जुटे रहते. स्कूल के शिक्षकों से लेकर पूरे गाँव की जुबान पे उनके बेटों का नाम होता. वे भी यह सब देख सुन गर्व से फूली नहीं समातीं पर बेटे अपनी जरूरत की हर चीज़ दादी से ही कहते. कभी बीमार पड़ते तो दादी ही सिरहाने बैठी देखभाल करतीं. उनके जिम्मे वैसे भी घर के सैकड़ों काम होते.

 ससुर जी के खडाऊं की आवाज सुनते ही पूरे घर को सांप सूंघ जाता सिवाय नमिता के. जहाँ बैठी होती, वहीँ से चिल्लाती, "क्या खोज रहें हैं,बाबा? "

उनकी भी कडक आवाज में  मुलामियत घुल जाती, "अरे कल्याण नहीं मिल रहा, इधर ही तो पढ़ के रखा था"

वो लापरवाही से बोलती,"बाहर बरामदे में ताखे में तो रखा है...आपको कुछ याद नहीं रहता"

वे उसे आँख दिखातीं धीरे से कहतीं ,"जा कर दे दे ना"

पर ससुर जी सुन लेते, और प्यार से कहते, "अरे ले लूँगा बहू...उसे आराम करने दो . दिन भर गाँव में बहनडम सा घूमती रहती है....थक गयी होगी."

घर में एक ही ट्रांजिस्टर था ,जिस पर सुबह शाम ससुर जी, बरामदे में टेबल पर रख ऊँचे वॉल्यूम में समाचार और कृषि जगत  सुनते. ट्रांजिस्टर उनके कमरे में ही रहता. ममता,स्मिता चुपके से ले आतीं और धीमी  आवाज़ में फ़िल्मी गाने, नारी-जगत सुना करतीं. पर समाचार का  समय होते ही दबे पाँव ,कोठरी में रख आतीं. लड़कियों की इतनी रूचि देख उन्होंने पति से सिफारिश की, एक ट्रांजिस्टर ला दीजिये ना ,बच्चियों के लिए"

"ये सब फ़ालतू की चीज़ें हैं,पढाई से मन हट जायेगा ,इन सबका"

पर नमिता, बाबूजी के सामने से ही ट्रांजिस्टर उठा लाती ."समाचार ख़तम हो गया ना,ले जाऊं?"  और जोर जोर से गाने सुना करती. जाड़े के दिन में तो रजाई के अंदर देर रात तक गाना सुनते सुनते सोती. सुबह वे उसे उठा उठा कर परेशान हो जातीं, " समाचार का वक़्त हो रहा है,जा बाबूजी को रेडियो दे आ" पर वो नहीं उठती आखिरकार समाचार का वक़्त हो जाता और वे , 'नमिता...नमिता'  पुकारते उसके कमरे तक आ जाते. वो ढीठ लड़की,लेटे लेटे ही आँखें  बंद किए रजाई के बाहर हाथ निकाल रेडिओ पकड़ा देती और फिर से रजाई में घुस सो जाती.

नमिता को रात-बिरात भी कुछ डर नहीं लगता. एक बार खूब आंधी तूफ़ान आया.
सुबक के चार बज  रहें थे.  नमिता -स्मिता को चादर उढ़ाने गयीं, देखा तो नमिता बिस्तर पर नहीं  है. डर कर स्मिता,पति, अम्मा जी सबको उठा दिया.किसी की समझ में कुछ नहीं आया पर अम्मा जी बोलीं,"जरूर बगीचा में आम बीनने गयी होगी, चलो टॉर्च लो और चलो.."

ये तीनो पास के बगीचे में गए तो देखा कई लोग आस पास के बगीचे में थे और नमिता अपने बगीचे में गिरे आम उठा उठा कर एक जगह इकट्ठा कर रही है.

उन्हें देखते ही बोली,"ये सारे लोग हमारे बगान में थे, मुझे देखते ही भाग गए, मैं नहीं आती तो एक भी आम नहीं मिलता."

एक बार घर में ढेर सारी खीर पूरी  बच गयी थी. गर्मी के दिन थे.वे परेशान हो रही थीं, सुबह तक सब ख़राब हो जायेगा ,अगर किसी तरह थोड़ी दूर पर बनी झोपड़ियों में पहुंचा दिया जाता तो चीज़ भी नहीं बर्बाद होती और गरीबों का पेट भी भर जाता. पति और बेटे कोठरी में पढ़ाई कर रहें थे. दरवाजे पर बाबूजी बैठे थे. किस से कही जाए ये बात .

और नमिता आगे आ गयी," पूरनमासी है, पूरा उजाला है.....मैं और छोटकी दी चले जाते है." (ममता को बडकी दी और स्मिता को छोटकी दी कहा करते थे उनसे छोटे भाई-बहन.)

बहुत डर डर के  पिछले दरवाजे से उन्हें  भेजा.वे आँगन में पीछे की तरफ खुलती खिड़की पर टकटकी लगाएं खड़ी थीं. दोनों बेटियाँ  वापस आ रही थीं और अचानक नमिता ने जोर जोर से गाना शुरू कर दिया, "नीले गगन के तले धरती  का प्यार पले". स्मिता ने उसका मुहँ दबा कर चुप कराने की कोशिश की तो वो हाथ छुड़ा खेतों  की मेंड़ के बीच जोर जोर से गाते हुए दौड़ने लगी.

वे माथा पकड़ कर बैठ गयीं. रात के सन्नाटे में उसकी आवाज़ कहाँ कहाँ ना सुने दे रही होगी. ससुर जी,सासू माँ,पति सब बाहर निकल आए. डरते डरते बता दिया कि क्यूँ भेजा था? पर ससुर जी नाराज़ नहीं हुए बल्कि हँसते हुए कह रहें थे,"आ तुझे दिखाता हूँ धरती  का प्यार"

नमिता, अपने बाबा की लाडली थी. जो गुण वे अपने बेटे और पोतों में देखना चाहते थे, वो सब अपनी इस पोती में देखकर खुश हो जाते.
(क्रमशः)

43 comments:

सारिका सक्सेना said...

अभी तक की सब कडियों में ये कडी सबसे ज्यादा मन को भाई। ज़िन्दादिली से भरा नमिता का किरदार बहुत ही जीवन्त लगा। ये कहानी भी लम्बी खिचती जा रही है। वैसे हमें तो जितनी लम्बी कहानी हो उतना ही ज्यादा मज़ा पढने में आता है। बस अगली कडी का इंतज़ार थोडा बोझिल होता है।

rashmi ravija said...

सच कहा सारिका, शुरुआत में तो दो,तीन कड़ियों में ही समेटने का विचार था...पर जब देखा,गाँव के परिवेश पे लिखी कहानी पाठकों को पसंद आ रही है तो बस लेखनी निर्बांध छोड़ दी...अब कहानी खुद ही अपना रास्ता तय कर रही है...किसी बलखाती नदी सी..:)
हाँ, कोशिश करुँगी कि ज्यादा इंतज़ार ना करना पड़े..अगली किस्तों का..
और हाँ शुक्रिया कि तुम्हे ये कड़ी पसंद आई..:)

ashish said...

नमिता की tomboy वाली छवि , आपने बखूबी उभारी है. आम के बगीचे में नमिता का जाना और आम बिनना , मुझे अपने गाँव के एक भोर याद दिला गयी जब मै और मेरी दीदी महुए के बगीचे में अल सुबह ही पहुच गए थे और दीदी ने अपने पुरे हाथ दिखाए महुआ बीनने में. , नमिता सारे गाँव के आँखों का तारा इसलिए थी की गाँव वाले उसमे अन्य लडकियों से हटकर गुण देख रहे थे, और उसका विद्रोही तेवर उसकी मा को संबल प्रदान करता हुआ प्रतीत हुआ जो स्वाभाविक है .एकदम मस्त कड़ी, अच्छा है इस कहानी को खीचकर और लम्बी करदे, पब्लिक डिमांड है.

दीपक 'मशाल' said...

भाई-बहिन के झगड़े से लेकर रेडिओ उठाने तक सब इतनी बारीकी से लिखा आपने दी कि लगता है कि सब आँखों के सामने हो रहा है.. हर किसी को ये अपनी सी कहानी लग रही होगे पक्का.. नमिता के गुण देख कर लगा रहा है कि किरन बेदी जैसी कुछ बनेगी.. :) लेकिन बीच में ममता कैसे आ गई समझ नहीं आया.. शादी से पहले कि बातें हो रही हैं क्या? जो भी हो बहुत ही मजेदार रहा ये पार्ट.. लगता है ये भी लघु उपन्यास है..

वन्दना said...

कहानी का ये किरदार सभी को पसन्द आयेगा…………………शायद यही सबकी सोच मे बदलाव ला सके…………बेशक उसके मन मे विद्रोह है मगर फिर भी वो हर ऊँच नीच को बहुत ही अच्छे से समझती है……………कहानी बहुत ही रोचक होती जा रही है। अब तो अगली कडी का इंतज़ार है।

Sadhana Vaid said...

अरे वाह ! यहाँ तो फोकस ममता से अब नमिता पर आ गया ! नमिता का चरित्र भी बहुत मनभावन लग रहा है ! अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा ! कहानी बहुत रोचक लग रही है !

rashmi ravija said...

@ दीपक
दो जगह ,ममता का बस जिक्र भर है कि उसमे अपने छोटे भाइयों से कोई प्रतियोगिता की भावना नहीं थी. और सारे छोटे भाई बहन उसे 'बडकी दी' कहते थे.
लडकियाँ शादी करके ससुराल चली जाती हैं....पर उनकी बातें तो घर में होती ही रहती हैं...:)

Divya said...

Rashmi ji,

Curiosity apni charam seema par hai...Damn curious to know the end...lekin intezaar ka apna hi maza hai.

I must say i am loving the lively girl Namita and her grand father. Beautifully portrayed the two.

Admiring the natural flow in the story but somewhere the heart is sad for Mamta. Rashmi ji, mamta ko sukhi hi rakhna pleaseeeeeeeee.

शुभम जैन said...

aree wah sabse jayada rochak kadi...namita ka kirdaar bahut hi zivant...kamal ka likhti ho di aap, sab kuch ek film sa samne chalta jata hai...agali ke liye jayada intjaar na karwana...

निर्मला कपिला said...

लगता है नमिता जरूर इस कहानी को कोई नया मोड देगी बहुत्र अच्छी धारा प्रवाह चल रही है कहानी बधाई।

राज भाटिय़ा said...

देखे आगे केसा मोड आता है इस सुंदर कहानी का

रश्मि प्रभा... said...

namita ne bahut prabhaw chhoda hai... waakai rochak

वन्दना अवस्थी दुबे said...

पर इस लड़की ने साइकिल चलाना कब सीखा? प्रमोद के शब्द उनके कानों तक जा ही नहीं रहें थे वे मंत्रमुग्ध सी नमिता को देख रही थीं,
इतना सजीव चित्र!!! जैसे भोगा हुआ यथार्थ हो!! नमिता का चरित्र तो उभर कर सामने आया ही, हमारे देश में बेटे-बेटी के बीच किये जाने वाले फ़र्क को भी खूब रेखांकित किया है. सुन्दर
कड़ी.
रश्मि, गांव की बुज़ुर्ग महिलाएं एक भेद और भी करतीं हैं, जो बड़ा अपमानजनक लगता है, यदि कुलवृद्धों का व्रत हो, और बिना नहाये लड़की छू ले तो अपवित्र हो गये, लड़का छुए तो कोई बात नहीं....चाहो तो आगे किसी कड़ी में इस प्रथा पर भी अपनी कलम चला दो और इस कहानी में समेट लो...:)

roohshine said...

रश्मि जी

चारों कड़ियों को एक साथ पढ़ा ..क्यूंकि यह श्रृंखला मेरी अनुपस्थिति में शुरू हुई थी...बहुत प्रवाहमय प्रस्तुति..और चौथी कड़ी तो बहुत ही रोचक...नमिता का चरित्र्च्त्रण बहुत अच्छा किया है आपने.. अगली कड़ी का इन्तेज़ार है...
मुदिता

अबयज़ ख़ान said...

रश्मि जी उपन्यास बहुत बढ़िया है.. आपकी कलम और अल्फ़ाज़ का जादू भरपूर चला है। इसे किताब में समेटकर कब ला रही हैं.?

Sanjeet Tripathi said...

love this part......lekin aisa lag raha hai jaise aage chalke yah namita kahi na kahi BAANDH di jayegi, kaash aisa na ho...

aapne Ashapurna devi ki trilogy padhi hai?
1- pratham Pratisruti (1964),
2- Subarnalata (1967)
3- Bakul Katha (1974)
agar inhe na padhaa to pls pls pls padhiyega.....
padhne ke baad aap samajh jayengi ki aapki is kisht ko padhne ke bad mai inhe padhne kyn kah raha hu....

वाणी गीत said...

नमिता के चरित्र को दर्शाने के लिए छोटी छोटी रोचक गतिविधियों ने मन बांध लिया ...
नमिता के इस विद्रोही चरित्र को अपनी एक बुआ में हूबहू साकार देखती हूँ ...पारंपरिक परिवारों से निकले हुए हम सभी में भी यह विद्रोह कही न कही छिपा होता है ...उस पीढ़ी के मुकाबले हमारा संघर्ष कमतर है ...अपने घरों में तो हम जीत चुके हैं मगर समाज में (लिखते हुए बहुत दुःख हो रहा है कि ब्लॉगजगत में भी, जहाँ ज्यादा बुद्धिजीवी हैं ) हर दिन एक नया संघर्ष झेलते हैं हम लोग ...
एक निष्कर्ष बहुत रोचक है कि इस तरह की विद्रोही लड़कियां अपने पापा के बहुत करीब और उनकी लाडली होती हैं ...मेरे पारंपरिक पंडित दादाजी भी सिर्फ मुझसे डरते थे ...:)
यह कड़ी सचुमच बहुत रोचक है .... लाजवाब !

Udan Tashtari said...

कहानी का डायरेक्शन बदला...रोचक...

विनोद कुमार पांडेय said...

सटीक..बिल्कुल पास से गुजराती हुई एक बेहतरीन रचना...आगे भी पढ़ना चाहेंगे..धन्यवाद रश्मि जी

डॉ टी एस दराल said...

नमिता का पात्र कहानी में दम भर रहा है । आखिर रेगिस्तान में भी फूल खिलते ही हैं ।

बढ़िया चल रही है कहानी , रश्मि जी ।

mukti said...

हे हे हे ! नमिता तो बिल्कुल मेरे जैसी है. आपने सही कहा था. ये वाली कड़ी मुझे बहुत पसंद आयी. मैं भी तो पूरी टॉम ब्वॉय थी. अम्मा मुझमें और भाई में ज़रा सा भी भेदभाव करतीं तो मैं लड़ पड़ती थी, भले ही खाने-पहनने में ऐसा दुराव बराव ना हुआ हो, पर खेलने और बाहर जाने के मामले में तो होता ही था.
मैं भी नमिता की ही तरह गुल्ली-डंडा, कंचे और बैट-बाल खेलती रहती थी. और वाणी जी ने तो मेरे दिल की बात कह दी. इस तरह की तेज लड़कियाँ बाबा-पिता आदि की लाडली होती हैं और घर की बड़ी-बूढ़ी औरतों को फूटी आँख नहीं सुहातीं, जैसे आपकी कहानी में दादी... :-)
आपने जो ये भेदभाव की बात लिखी है दी, ऐसा... बिल्कुल ऐसा मैंने अपने गाँव में कई घरों में होते देखा है. लड़कियाँ गाय की देखभाल करतीं, पर दूध लड़के पाते... कोई भी अच्छी चीज़ पहले लड़कों को दी जाती ... अब भी कई जगह ऐसा होता है और संपन्न घरों में भी होता है...
इस कहानी में स्वाभाविकता बहुत बड़ा गुण है... लगता है कि अपने ही गाँव-जवार की कहानी हो. और दीपक ने जिन वर्णनों की प्रशंसा की है, वो मुझे भी बहुत अच्छे लगे.

rashmi ravija said...

साधना जी,रश्मि दी,निर्मला दी, राज जी,समीर जी, दराल जी,विनोद जी, मुदिता, अबयज, वंदना,शुभम बहुत बहुत शुक्रिया....ख़ुशी हुई जानकर कि आपलोगों को नमिता का किरदार अच्छा लगा....किसी नए पात्र को introduce करते समय ये आशंका रहती है मन में कि पता नहीं..पाठकों की प्रतिक्रिया कैसी होगी?...पर संतोष हुआ आपलोगों की प्रतिक्रिया देख.

rashmi ravija said...

@आशीष जी, कहानी की अपनी गति और नियति होती है...खींचकर लम्बा करने की कोशिश करुँगी...तो वो "कोशिश" नज़र आ जायेगी,पाठकों को...फिर स्वाभाविकता चली जायेगी.

@दिव्या ,यही कहूँगी कि घटनाक्रम ही तय करेंगे कि ममता के जीवन में आगे क्या है.....यह एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है...अक्सर ,इन परिवारों में extreme कुछ नहीं होता...ना अति सुख..ना अति दुख....कुछ अपवादों को छोड़कर.

rashmi ravija said...
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rashmi ravija said...
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rashmi ravija said...

@वंदना ,तुमने ये 'कुलवृद्धों' की बात बतायी है...हो सकता है..अनायास ही यह आगे की कड़ियों में आ जाए..
और "भोग हुआ यथार्थ" कह कर तो तुमने पूरे नंबर दे दिए इस कड़ी को...:)

rashmi ravija said...

@वाणी एवं मुक्ति..तुमलोगों ने इस कड़ी पर सच की मुहर लगा दी,यह कहकर कि 'नमिता, जैसी लडकियां अपने पिता और दादा की बहुत प्यारी होती हैं.'
और वाणी अच्छा लगा जान,नमिता में तुम्हे अपनी बुआ की छवि दीखी...एकाध ऐसी लडकियां होती ही हैं....हर गाँव में.
मुक्ति,मुझे पता था,तुम्हे ये कड़ी अच्छी लगेगी और नमिता में अपनी झलक नज़र आएगी...तुम्हारे संस्मरणों...को पढ़कर ये आभास हो गया था कि तुम भी कुछ कुछ ऐसी हो होगी :)...अगर सामने बैठकर तुम्हारे संस्मरण सुने होते...तो और भी बहुत कुछ आ जाता इस कहानी में.
वंदना एवं मुक्ति,तुमलोगों ने लड़के लड़कियों में भेदभाव की जो बात कही..अक्षरशः सत्य है और ज्यादातर लडकियां...इसे सर झुका कर स्वीकार कर लेती हैं और इतना आत्मसात कर लेती हैं कि बंधी बंधाई लीक पर चलकर अपने बच्चों में भी ऐसा ही भेदभाव करने लगती हैं.

मुक्ति एक बात का जिक्र मैं कब से करना चाह रही थी पर हमेशा भूल जाती...ये दीपक तुमसे बहुत नाराज़ रहता था,कहता था कि जैसे ही कहानी पढ़कर मैं सोचता ये सब पंक्तियाँ कोट करूँगा कि देखता ,मुक्ति ने पहले ही कोट कर रखे हैं...आज खुश होगा...पासा पलट गया..तुमने उसके कोट किए हुए प्रसंग की चर्चा की :). ...आज दो रोटी ज्यादा खायेगा शायद हा हा हा

rashmi ravija said...

@संजीत जी,आपने फिर से दुखती रग पे हाथ रख दिया....मुंबई में तरस जाती हूँ,अच्छी हिंदी किताबें पढने को....पर अब सोच लिया है (प्रतिज्ञा कर ली है ) कि जैसे ही. किसी उत्तर भारत के शहर में जाना हुआ...पहला काम हिंदी की अच्छी किताबें खरीदने की कोशिश होगी.

लिखने के लिए अच्छा पढना भी बहुत जरूरी है...बहुत बहुत शुक्रिया किताबों के नाम बताने के लिए...नोट करके रख लिए हैं.

Deepak Shukla said...

Hi..

15 din ke avkash ke upraant aaj hi vapas lauta hun.. aur es beech 4 kadiyan bhi ho gaying...theek hai aaram se padhkar comment karta hun...

Deepak

रचना दीक्षित said...

रश्मि जी अच्छा चल रहा है ये उपन्यास अपनी ही लय से बढ़ रहा है नमिता का चरित्र सही जा रहा है.न जाने क्या करने वाली है ये लड़की??? यह कड़ी सचुमच बहुत रोचक है .... लाजवाब !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रश्मि ,
क्षमा चाहूंगी..इस कड़ी पर देर से आने के लिए....कुछ व्यस्त थी और कल नहीं आ पाई...

सच ही यह कड़ी मन को बहुत भा गयी..नमिता.........वाह बहुत बढ़िया किरदार है..अपने विरोध दिखने का उसका अपना अंदाज़ है...और यही सोच शायद घर में परिवर्तन ला सकती है...घर के बाद समाज में ....कहानी ने पाठकों को बंधा हुआ है....माँ की लाचारी साफ़ नज़र आती है....और बेटी का यह कहना की जब तुम दादी के सामने बिना छिपाए दे सको तभी देना....माँ को एक नया कदम उठाने की प्रेरणा सा देता लगा....बहुत बढ़िया....

Divya said...

@-@दिव्या ,यही कहूँगी कि घटनाक्रम ही तय करेंगे कि ममता के जीवन में आगे क्या है.....यह एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है...अक्सर ,इन परिवारों में extreme कुछ नहीं होता...ना अति सुख..ना अति दुख....कुछ अपवादों को छोड़कर.

Rashmi ji,

I am disappointed by the fate of innocent and talented girls like Mamta and Namita.

It's easy to admire a fictional character but i don't think people in real life, truly admire and love a girl as portrayed in Namita. When they come across such girls they use and throw her after screwing her thoroughly.

A girl must learn to live with dignity, no matter how much she has to sacrifice for the same.

If not in real , at least in fiction, let the girls live their life. A writer can write the fate of a character. Rashmi ji, you are the creator of this beautiful character Namita. Give her wings,let her live, Let her fly. Kindly don't let her dreams die.

Divya said...

Rashmi ji,

I am sorry. I was carried away with emotions. I will wait for the natural end of the story.

I will be back here to know the fate our dear Namita.

Meanwhile i am going back to my blog where i have written my fate with my own hands and living my life on my own terms..

Divya said...

Dear Namita,

Do not become like your elder sister Mamta , as every second girl is like her.

Just be yourself !

Mired Mirage said...

नमिता सही जा रही है।
घुघूती बासूती

rashmi ravija said...

@Divya just wait n watch..."Patience" is the key word here :)

दीपक 'मशाल' said...

:P

shikha varshney said...

३ दिन बुखार के बाद आई थी कि देखूं क्या हुआ आगे कहानी में. पढूंगी बाद में ..पर इतनी रोचकता से लिखी है आपने ये कड़ी कि रहा ही नहीं गया पढ़े बिना ....चुलबुलापन, हास्य और नमिता के तेवर के बीच में जिस तरह आपने हमारे समाज कि समस्या को लपेट कर उभारा है न कबीले तारीफ़ है ..
और हाँ ये नमिता जरुर कुछ कर दिखाएगी लगता है ..

महफूज़ अली said...

मुझे तो पूरा दोबारा पढना पढ़ता है.... सुबुक सुबुक...... १ घंटे से सब कड़ियाँ पढ़ा हूँ...अब तो कहीं चटका भी नहीं मार सकता हूँ.... नहीं तो १०/१२ चटके तो लगा ही देता....कहानी में तो रोचकता बहुत अच्छी बन रही है... एकदम इन्क्यूसीटिवनेस मेनटेन है.... ये नमिता जरुर कुछ कर दिखाएगी लगता है ..

सतीश पंचम said...

बहने दो इस कथासरिता को ....निर्बाध....निरद्वंद होकर....। गाँव की बातें...गाँव के लोग सभी को पसंद आते हैं....ये ऐसा विषय है जिस पर शहरी मानसिकता प्रत्यक्ष तौर पर तो नाक भौं सिकोड़ती है लेकिन अंदर ही अंदर उस माहौल और उस संसार को जीना भी चाहती है.....मैं इस मानसिकता को अच्छी तरह से समझ रहा हूँ.. खुद शहरी और गंवई दोनो जीवन जो जीता हूँ :)

अब तक पढ़ी गई कड़ियों मे से बेहतरीन।

रेखा श्रीवास्तव said...

कहानी एकदम यथार्थ से जुड़ी है तो बांध कर रखे हैं सबको और आज भी कमोबेश यही स्थिति है गाँव में लड़कियों और लड़कों की. घर के बुजुर्ग यही करते हैं और माँ बाप भी इसी तरह से बड़ों से डरते हुए अपने ही बच्चों के जीवन को भेदभावकी चक्की में पिसता हुआ देखते रहते हैं.
बहुत सुन्दर ढंग से पेश किया है.

शोभना चौरे said...

रश्मिजी
मैंने अभी अभी चारो किश्त पढ़ी ,लगा घर घर की कहानी है |जब हम पढ़ते थे तो हमारी क्लास में नमिता की तरह ही एक लडकी थी ये बात आज से 45 साल पहले की है और अचानक उस पर घर की सारी जिम्मेवारी आ गई जिसे उसने बखूबी निभाई अपने एक भाई और चार बहनों को अपने पावो पर खड़ा किया और खुद अविवाहित रही और एक कालेज में प्राचार्या है |
बहुत ही सधा हुआ भाषा शिल्प है और प्रवाह भी बांधे रखता है |
इंतजार अगली कड़ी का ?

ज्योति सिंह said...

bahut hi suljhi hui bhasha hai jo padhne me bahut hi sahaj hai ,ladkiyon ko aksar ye kahan jaata hai ki ladko ke cheezo se door raho ,magar wo utna hi virodh kar aage nikal gayi .sundar aur badhai .