Thursday, June 24, 2010

उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -3)

(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से वे जग जाती हैं,और पुराना जीवन याद करने लगती हैं कि कैसे वे चौदह बरस की उम्र में शादी कर इस  घर में आई थीं.. दादी सास,सास-ससुर,ननदों से भरा पूरा घर था. उनकी भी चार बेटियाँ और दो बेटे पूरा घर गुलज़ार किए रहते.पति गाँव के स्कूल में शिक्षक थे.बड़ी बेटी ममता की शादी ससुर जी ने पति की सम्मति लिए बगैर तय कर दी थी.)
 

गतांक से आगे.

शादी की रस्मे होती रहीं और दूसरे दिन लाल चुनरी में सजी गठरी बनी ममता ससुराल चली गयी. मेहमानों से घर भरा  था फिर भी,एक ममता के बिना सब सूना लगता.अपने नन्हे नन्हे पैरों में  पायल पहने छमछम करती मीरा, हर कमरे  में घूमती और बड़ी बड़ी आँखें फैला कर पूछती, "दीदी?" और उनका ह्रदय विदीर्ण हो जाता. वे उसे उठा कलेजे से लगा लेतीं तो उनकी आँखों में आँसू देख वो अबूझ सा उन्हें देखती रहती.

एक हफ्ते बाद फिर से हलवाइयों का मजमा लगा रात भर मिठाइयां बनी.अब दोनों भाई कलेवा लेकर ममता के ससुराल जाने वाले थे,उसे विदा करा लाने को. लडकियां घर सजाने में जुटी थीं.  'मेहमान' पहली बार घर आ रहें थे. सुन्दर परदे,ममता के कढाई किए तकिये के गिलाफ ,चादरें सब बिछाई गयीं. गाँव की ममता की सहेलियां स्मिता के साथ मिलकर तरह तरह के उपाय सोचने लगीं कि कैसे 'मेहमान'  को छकाया जाए. कभी चाय और खीर में नमक डालने की जुगत सोची जाती तो कभी पत्तों के पकौड़े बनाने की. वे भी खीर,दाल भरी पूड़ी ,पांच तरह की सब्जी बनाकर पलक पांवड़े बिछाए बेटी -दामाद का इंतज़ार करने लगीं.

सब लोग अच्छे अच्छे कपड़े पहने, नए नवेले दामाद के  इंतज़ार में थे .पति खिड़की के पास  रास्ते की तरफ टकटकी लगाए बैठे थे.सासू माँ  बाहर बरामदे में चौकी पर बैठीं पंखा झल रही थीं.पर कान किसी मोटरगाड़ी की आवाज़ के लिए सतर्क थे. बाबूजी भी गाय भैंसों को देखने भालने के बहाने बाहर अहाते में ही चहल-कदमी कर रहें थे. पूरे घर की व्यग्रता ने ऐसा सन्नाटा कर दिया था कि लगता था चिड़िया भी इस सन्नाटे से घबराकर, बिना चहके ही आँगन में से उड़ जातीं.

पर दोनों बेटे अकेले लौट  आए. ममता के ससुराल वालों ने उनकी खातिरदारी तो बहुत अच्छी की. और विदाई में बड़े कीमती कपड़े और १०० रुपये दिए. पर बहाना ये बनाया कि अभी बहुत सारे मेहमान हैं जो नई बहू के साथ रहना चाहते हैं.ममता को बाद में भेजेंगे.  दोनों बेटे उनके घर,और वहाँ से मिले कपड़े और पैसे पर इतने मुग्ध थे कि,बहन कैसी है, यह बता ही नहीं पा रहें  थे.पूछने पर यही कहते, "चिंता ना करो...दीदी बहुत खुश है...इतने जेवर और कीमती कपड़े पहने थे,वहाँ मुंहदिखाई  में बहुत सारा गहना मिला है. हमें इतनी मिठाई खिलाई दीदी ने" वे ठंढी सांस भर कर रह जातीं,एक तो लड़के उसपर से इतने  छोटे ,क्या समझ  पाए होंगे.

इसके बाद से ही हर पंद्रह दिन पर, सासू माँ, पंडित को बुलवातीं ,वे पतरा देखकर अच्छा दिन बतलाते और ममता को मायके लाने की तैयारियां शुरू हो जातीं. मिठाइयां बनतीं, टोकरी पर लाल कागज़ चिपकाए जाते और दोनों भाई चल देते बहन को विदा कराकर लाने. पर हर बार अकेले ही लौटते. पड़ोस की निर्मला को भी ससुराल वालों ने भेजने में आनाकानी की थी तो उसके भाई ने वहाँ जाकर डेरा जमा दिया था और अड़ गया था कि जबतक वे उसकी बहन को विदा नहीं करेंगे, वो वहाँ से नहीं जायेगा. पर वे अपने बेटों से ऐसा नहीं कह सकती थीं. यूँ जबरदस्ती बार बार भेजे जाने पर वे  चिढने  भी लगे थे.उनकी पढ़ाई का हर्जा होता और अब पहले की तरह वहाँ खातिरदारी भी नहीं होती. खीझ कर कहते,"पता नहीं माँ को इतना बुलवाने की क्यूँ पड़ी है,इतने बड़े घर में अच्छे कपड़े,जेवरों से लदी दीदी कितनी खुश है." आखिरकार ममता के ससुर ने एक बार कह ही दिया,यूँ बिना वजह वे अपनी बहू को नहीं भेजेंगे. कोई बड़ा पूजा,अनुष्ठान हो या शादी-ब्याह, तब ही भेजेंगे वे. तब से वे श्रावणी पूजा की राह देखने लगीं.शायद इस अवसर पर वे भेजने को तैयार हो जाएँ. और भगवान ने उनकी सुन ली,इस बार बेटे बहन को साथ लेकर लौटे.

और जब छः महीने बाद ममता मायके आई तो उनकी गाड़ी देखते ही यह भूल कि दिन के उजाले में वे देहरी  से बाहर पैर नहीं रखतीं.दौड़ कर अहाते में निकल आयीं. ससुर जी को देखा तब जल्दी से पूरे सर तक साड़ी का आंचल खींचा. पति,सास, बच्चे सब जमा हो गए. ममता की आँखें छलक रही थीं और लाल साड़ी ,बिंदी, सिंदूर से घिरे उसके मोती से  दांत ,चमकीली हंसी बिखेर रहें थे. ससुर जी के पैरों पर झुकी तो बिना कुछ बोले देर तक उसके सर पे हाथ फेरते रहें. सास ने तो बढ़कर  अंकवार में भर लिया. पति ने भी देर तक गले से लगाए रखा. आँखें गीली हो आई थीं,सबकी.उनसे तो ममता ऐसे चिपटी जैसे नन्ही बच्ची हो. और उसकी नज़र मीरा पर पड़ी,झपटकर उसे उठाने को बढ़ी.पर मीरा थोड़ी दूर हो गयी  उस से.उसकी दीदी तो सीधीसादी सलवार कुरता पहनती थी.साड़ी;गहनों में सजी,बड़ी सी बिंदी लगाए  इस दीदी को वह नहीं पहचान रही थी. जबरदस्ती ममता ने उसे गोद में उठाया तो उसे दोनों हाथों से धकेलते वो जोर जोर से रोने लगी.छोटी नमिता ने आगे बढ़कर उसे संभाला. इतनी देर से अकेले गाड़ी के पास खड़े मेहमान पर अब सबका ध्यान गया. ससुर जी कंधे पर हाथ रखकर बोले,'चलो बेटा अंदर चलो" पर वो अंदर नहीं आए,कहा" जरूरी काम है,कल आऊंगा ममता को लिवाने".वे हतप्रभ रह गयीं,"कल??...इतनी जल्दी??"....."हाँ पूजा तो सुबह ही है ना...मैं शाम को आऊंगा" ममता भी सर झुकाए खड़ी थी.पर वे लोग कुछ और कहते इसके पहले ही वो सबको हाथ जोड़ते हुए गाड़ी में बैठ गए. ससुर जी ने कहा,"जरूरी काम होगा कोई"

दो दिन तो  दो घंटे जैसे भी  महसूस ना हुए. ममता से मिलने को घर में मेला सा लगा रहा. दो बातें करने का भी मौका ना मिला.बस रात को सोते वक़्त,बेटी के सर पे हाथ फेरते हुए पूछा," तेरा मन तो लगता है वहाँ ,दामाद बाबू, घर के सारे लोग तुझसे अच्छा व्यवहार तो करते  हैं?" .."हाँ, माँ " ममता ने बस यही कहा और पता था इसके सिवा वह कुछ कहेगी भी नहीं.

दूसरे दिन वायदे अनुसार ,मेहमान शाम को आए,दो घंटे ही रुके पर सबकी शिकायतें दूर कर दीं, उसके भी पैर छुए ,सालियों से हंसी मजाक किया. मीरा को बार बार अपने पास बुलाना चाहा.पर उस नन्ही लड़की में ना जाने कैसी दहशत बैठ गयी थी,जीजा के नाम से,इतना डर गयी थी,उसे लगता बस वो सबको रुलाते हैं.आस-पड़ोस में भी किसी शादी में जाने के नाम से रोने लगती कि सबलोग रोयेंगे और दीदी चली जाएगी.

मेहमान सबसे इतनी अच्छी तरह पेश आए वे एक बार सोचने लगीं,उनकी शंका गलत थी क्या?.पर फिर सोचा दो घंटे में कोई भी अपना सबसे अच्छा रूप ही दिखायेगा ना.असली रूप तो बस ममता ही देखेगी.
.इस बार तो ममता विदाई से भी ज्यादा रोई. अब उसे भी लग गया था,पता नहीं फिर कब देखना नसीब हो यह घर बार.

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पर ममता के जाने के बाद घर जैसे बिखर सा गया. छोटे भाई बहनों को ना जाने किस अनुशासन के डोर से उसने बाँध रखा था कि उसके जाने के बाद ही सब छुट्टे बैल से आपस में भिड़ने लगे. पर वे सबसे ज्यादा नमिता के व्यवहार से परेशान थीं. दोनों भाई उस से बड़े थे, और 'लड़के' थे लिहाजा दादा-दादी के ज्यादा दुलारे थे. नमिता ने बचपन से  इस भेदभाव को समझा था. शायद ममता उसे समझा-बुझा लेती पर अब उसके जाने के बाद वह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होती और हर बात में भाइयों की बराबरी चाहती.
(क्रमशः)

27 comments:

माधव said...

बहुत अच्छी रचना

माधव said...

बहुत अच्छी रचना

shikha varshney said...

ये तो एकदम रुलाने वाली किश्त थी ...बेटी और उसके घरवालों कि मनोस्थिति का बहुत प्रभावी वर्णन है और "
एक तो लड़के उसपर से इतने छोटे ,क्या समझ पाए होंगे"..ही ही ही too good.

kshama said...

Abhi padh rahi hun...pahali do kishten...fir comment karungi. Aapka lekhan ek baar padhne lagen to rukne nahi deta!
Kya aap mujhe apne dooosre blog ka link dengi?

रश्मि प्रभा... said...

ek mamta ne kitna kuch samet rakha tha... bhai bahnon ka murjhana swabhawik hai,
bahut badhiyaa

Mired Mirage said...

हम्म। कैसे अपनी बेटी से मिलने को भी तरसा जा सकता है!
घुघूती बासूती

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ममता पर आधारित यह कड़ी....ममता पूरे घर की धुरी थी....अच्छी चल रही है कहानी....

mukti said...

मेरी दीदी के जाने के बाद भी घर बिखर गया था... सच घर की बड़ी बेटी परिवार की धुरी होती है... सबकी लाडली, सबसे समझदार...
इस किस्त में मुझे मीरा कि बालसुलभ उत्सुकता, डर, हिचक आदि का चित्रण बहुत ही सहज एवं सुन्दर लगा... माँ का बेटी को देखने बदहवास सी भागना, बेटी का ससुराल के बारे में कुछ साफ-साफ न बताना,ससुराल वालों के नखरे आदि बहुत ही स्वाभाविक है.

सतीश पंचम said...

पढ़े जा रहा हूँ...गुने जा रहा हूँ.....जारी रहें.....बढ़िया कहानी चल रही है।

Saurabh Hoonka said...

दी,
एक बार आदत से मजबूर मैने तीनो भाग एक साथ पढे (समयाभाव), लेकिन कह सकता हू कि एक बार पुनः नारी मन की मनोस्थिती का सजीव चित्रण किया आपने. बेहद मार्मिक रचना है ये. अग्ली किस्तो की एक बार पुनः प्रतीक्षा रहेगी.
आपका
सौरभ हुंका

महफूज़ अली said...

दूसरी किश्त अभी पढ़ी.... और तीसरी भी पढ़ ली....ममता ... की डेफिनिशन को बहुत अच्चेर से डिफाइन किया है ....कई जगह पढ़ते पढ़ते भावुक भी हो गया.... अब आगे का इंतज़ार है....

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर,जब अपने दुर जाते है तो बहुत अखरता है यह तो बेटी गई है, सब से ज्यादा पिता ओर मां को अकेला पन खलेगा, बहुत सुंदर कहानी कही आप ने धन्यवाद

Sadhana Vaid said...

बहुत ही सहज, स्वाभाविक और प्रभावशाली चित्रण है कहानी में ! सागर सी गंभीरता समेटे ससुराल में अपने अस्तित्व की स्थापना के लिए संघर्षशील ममता के चरित्र का कुछ अनुमान स्वयमेव ही पनपने लगा ही मन में ! हो सकता है मेरा अनुमान गलत हो ! अगली कड़ी जल्दी ही ब्लॉग पर डालियेगा ! बहुत इंतज़ार मत करवाइयेगा !कहानी में बाँध कर रखने की अद्भुत क्षमता है ! आभार !

Sanjeet Tripathi said...

is kisht ne thoda chaukaya, lkein yah kisht shayad agle kishto me aur ubhar kar samne aayegi to khulasa hoga...isliye filhal padh rahe hain gun rahe hain.....

वाणी गीत said...

बच्चे क्या समझे होंगे ...कहकर तुमने पाठकों को सब समझा दिया
अभी चुप हूँ ...
शायद अगली कड़ी में कुछ कह सकूँ ...!!

ashish said...

मर्मस्पर्शी भाग, बेटी के घर वापस आने के इंतजार का यथार्थ चित्रण, मा के ह्रदय और भाइयो के मासूमता का उत्क्रिस्ट वर्णन.

शुभम जैन said...

yu hi tadapti hai betiya ek baar apne mayke jane ko...jahan apna pura bachpan bitaya wahan ab dusro se mile udhar ke kuch ghante jine ko mil jate hai...bahut hi saziv chitarn bahut kuch yaad dila diya aapne...aankhe bhar aayi ab aur kuch likha nahi jata...

वन्दना said...

बहुत ही सुन्दर चित्रण्………………बेटी की विदाई और उसके बाद के हाल का…………अब अगली कडी का इंतज़ार है।

रचना दीक्षित said...

मर्मस्पर्शी भाग बहुत ही सहज, स्वाभाविक और प्रभावशाली चित्रण, अच्छी चल रही है कहानी

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत स्वाभाविक सा वर्णन है घर के हर सदस्य का. बेटी के इन्तज़ार का तो बहुत ही सजीव चित्रण किया है. ऐसा ही होता है इन्तज़ार, इतना ही उतावला भी.

ज्योति सिंह said...

hridyasparshi ,aankhe nam ho gayi ,aapki ye kahani padhte waqt apne rishtedaar ki ek baat yaad aa gayi ,unka kahna tha beti se jitna neh lagayenge utna taklif hogi ,us waqt mujhe unki baat uchit nahi lagi par aaj halat samjh aa rahe hai .mayke walo ke prati itna kathor ravaiya ,najayaj hai .....rochak banati jaa rahi hai .

डॉ टी एस दराल said...

आज की किस्त पढ़कर अपना तो माथा ठनक गया है । ममता की ससुराल में सब कुछ सामान्य नहीं लग रहा । रहस्य बढ़ता जा रहा है । ममता खुश नहीं नज़र आ रही ।
दुनिया में सभी तरह के लोग होते हैं । हमारे एक रिश्तेदार की शादी में दूल्हा विवाह स्थल पर पहुंचकर दो घंटे के लिए गायब हो गया , किसी ज़रूरी काम से । आज तक पता नहीं चला क्यों, लेकिन आज दोनों सुखी हैं ।
इंतजार रहेगा ।

अनामिका की सदाये...... said...

aaj hi maine is daastaan ke teeno bhaag padhe...acchha lag raha hai padhna aur aage intzar hai.

निर्मला कपिला said...

ममता की आँचल मे सारा जहाँ बहुत अच्छी लगी ये कडी हाँ एक सुझाव देना चाहती हूँ कि अगर आपस के वार्तालाप को अलग लाईन मे लिखा करें तो अधिक अच्छा लगता है जैसेिस पहरे को---
छोटी नमिता ने आगे बढ़कर उसे संभाला. इतनी देर से अकेले गाड़ी के पास खड़े मेहमान पर अब सबका ध्यान गया. ससुर जी कंधे पर हाथ रखकर बोले,'चलो बेटा अंदर चलो" पर वो अंदर नहीं आए,कहा" जरूरी काम है,कल आऊंगा ममता को लिवाने".वे हतप्रभ रह गयीं,"कल??...इतनी जल्दी??"....."हाँ पूजा तो सुबह ही है ना...मैं शाम को आऊंगा" ममता भी सर झुकाए खड़ी थी.पर वे लोग कुछ और कहते इसके पहले ही वो सबको हाथ जोड़ते हुए गाड़ी में बैठ गए. ससुर जी ने कहा,"जरूरी काम होगा कोई"

इस पहरे को अगर ऐसे लिखें -----
छोटी नमिता ने आगे बढ़कर उसे संभाला. इतनी देर से अकेले गाड़ी के पास खड़े मेहमान पर अब सबका ध्यान गया. ससुर जी कंधे पर हाथ रखकर बोले,
'चलो बेटा अंदर चलो"
पर वो अंदर नहीं आए,कहा
" जरूरी काम है,कल आऊंगा ममता को लिवाने"
.वे हतप्रभ रह गयीं,
"कल??...इतनी जल्दी??".....
"हाँ पूजा तो सुबह ही है ना...मैं शाम को आऊंगा"
ममता भी सर झुकाए खड़ी थी.पर वे लोग कुछ और कहते इसके पहले ही वो सबको हाथ जोड़ते हुए गाड़ी में बैठ गए. ससुर जी ने कहा,
"जरूरी काम होगा कोई"
आपसी वार्तालाप के अंश अलग दिखने से उस कहानी की रोचकता बढ जाती है नही तो पैराग्राफ उतना प्रभावित नही कर पाता। ये मेरा विचार है सो कह दिया ।बुरा मत मानना। आशीर्वाद्

rashmi ravija said...

निर्मला दी, किन शब्दों में धन्यवाद करूँ आपका?....आपने बिलकुल सही निर्देश दिए और आपकी पारखी नज़रों से मेरी ये लापरवाही छुप ना सकी. दो लघु उपन्यास लिख चुकने के बाद यह गलती तो अक्षम्य है. बारिश की वजह से नेट की प्रॉब्लम और किस्त डालने की जल्दबाजी में भी ऐसी भूल नहीं करनी चाहिए थी. अब तो शायद कभी ना भूलूँ .और इसका पूरा श्रेय आपको होगा.

आपको शायद याद नहीं होगा....आपके कमेंट्स से ही मुझे पता चला था कि मेरी कोई शैली भी है.:)
ऐसे ही स्नेह बनाए रखें और मार्गदर्शन करती रहें.

दीपक 'मशाल' said...

अगला भाग जल्दी चाहिए.. वर्ना आमरण अनशन पर बैठ जायेंगे हम.. हाँ..

Divya said...

curiosity badha di aapne...agli kisht padh kar dekhti hun...kya hua..