Thursday, May 13, 2010

आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (समापन किस्त )

शची के यहाँ से निकला....निरुद्देश्य सा इधर उधर भटकता रहा थोड़ी,देर...कुछ लोगों से बातें  की...मन में भले ही झंझावात चल रहें हों..पर प्रोफेशनल ड्यूटी तो निभानी ही है...जिस काम के लिए आया है,उसे तो अंजाम देना ही है.....भले ही दिल के  अंदर अरमानों की मौत हुई हो...पर नए विचार,आलेख के जन्म लेने के लिए तो जमीन तैयार करनी ही होगी.

थक हार कर गेस्ट हाउस लौटा. और प्रोफेशनल चोला उतार कर फेंकते ही एकदम कमजोर पड़ गया. सोचने लगा,किस मुहूर्त में यहाँ आने का फैसला लिया. कम से कम इतने दिनों, शची से मिलने की उम्मीद पर जिंदा था...अब तो वो भी गयी. पर शची के मन में भी क्या कोई भावना सर नहीं उठा सकी?.कैसे भूल गयी वह ,सबकुछ?..और एक वो है,उन्हीं दिनों की याद को सारी ज़िन्दगी भेंट कर दी. पर शची क्या सचमुच भूल गयी है?..फिर कैसे,जब वह 'कणिका ' को नहीं याद कर पा रहा था तो बड़ी गहरी मुस्कराहट के साथ बोली थी, "कभी तो तुम्हारी बड़ी गहरी छनती थी उस से " इसका अर्थ है,वह भूली नहीं है कुछ. फिर इस अभिनय का क्या अर्थ है? आखिर किस बात से बचना चाहती है?
शची  को देखते ही कितने अरमानों ने सर उठा लिया था...एक पुस्तक भी तो रची जा रही थी इस धरा पर.जिसके आधे से अधिक पन्ने कोरे रह गए थे.आज शची को देख, एक आशा जगी , काश उसके अंतिम पन्ने पर ही कुछ उकेरा जा सके.पर शची को यूँ अपने कार्य के प्रति समर्पित देख ,काली छायाएं  मंडराने लगी थीं,उस आशा पर...फिर उसका अजनबी व्यवहार उसे सर्द बना गया और आज उसकी दुनिया  से साक्षात्कार के बाद तो बिलकुल ही दफ़न हो गयी यह आशा.

 इतने दिनों से  संचित आत्मविश्वास बिखरने लगा. खामियां ही खामियां नज़र आने लगी,खुद में .क्या किया उसने जीवन में? आज ही अगर उसे कुछ हो जाए .तो कौन है ऐसा, जिसे  उसकी कमी शिद्दत से महसूस  होगी?...आँसू बहाने वाले जरूर बहुत  मिल जाएंगे पर कोई तो ऐसा नहीं...जिसे, उसके बगैर, अपनी ज़िन्दगी ही व्यर्थ होती नज़र आए .पर आज ऐसे खयालात  क्यूँ आ रहें हैं?..क्या शची को यूँ संतुष्ट देख? ..शची को अपनी दुनिया में लिप्त देख, उसे भी यह कमी खल रही है ? खुद से ही सवाल कर बैठा. तो वह क्या शची को भी अपनी तरह एकाकी जीवन बिताते देखना चाहता था? शायद शची से अब तक वह एक एकाकीपन के डोर से बंधा हुआ था और खुद ही सोच लिया कि एक छोर पर वह अकेला है तो दूसरे छोर पर शची..और अब  शची  के जीवन में दो प्यारे मासूम से बच्चों की उपस्थिति सहन   नहीं कर पा रहा, अगर कोई पुरुष होता,फिर क्या करता वह?...यही है प्यार उसका?...मन पश्चाताप से भर उठा , ये कैसा प्यार है? अपनी हर सांस में उसने शची की ख़ुशी चाही है....या सिर्फ उसे ऐसा मुगालता था?

मन बेचैन हो उठा...उठकर बालकनी  में आ गया. ऐसा लगा जैसे अपने मन की सच्ची तस्वीर वो देख नहीं पा रहा. आज खुद को इतना छोटा..इतना स्वार्थी देखना..सहन नहीं कर पा रहा था.
बाहर घुप्प अँधेरा फैला था...हाथ को हाथ नहीं सुझाई देने  वाला. और ऐसी काली रात में अपनी  ख़ास काली कॉफ़ी की तलब  हो आई उसे.  जिसमे दुधिया चांदनी का स्पर्श भी ना हो...ना ही, हो ओस की मिठास. बस एक एक जलता घूँट हलक से उतारता रहें, और उसके तन मन की आग कुछ ऐसा रूप ले ले की उसकी रोशनी में ही कुछ रास्ता नज़र आए.कितने ही ऐसे कशमकश भरे क्षण निकाले हैं उसके सहारे. पर यहाँ  कॉफ़ी कहाँ मयस्सर. काश 'लंग्स कैंसर' पर एक फीचर तैयार करते वक़्त सिगरेट ना छोड़ी होती..शायद उसके गोल्ड फ्लैक के दो कश ही कुछ रहत देते. या बियर की दो घूँट. पर इस अजनबी शहर में बहुत असहाय महसूस कर रहा था. इतने दिनों के यादों का संबल छूटने के बाद ,आज उसे  किसी सहारे की सख्त दरकार थी. आखिर बरसों पहले उठायी हुई कलम का ही सहारा ढूँढा, बेडलैम्प  जला कुछ लिखने कि कोशिश की पर दो पंक्ति से गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकी.
खीझ कर कलम पटक दिया.
पता नहीं आज माँ की इतनी क्यूँ याद आ रही थी. लन्दन में भी जब भी इतना अकेलापन महसूस करता ,झट माँ को फोन खटका लेता.पर पता था वहाँ अपनी नींद के साथ,माँ की नींद हराम नहीं कर रहा, उस वक़्त यहाँ दिन होता था ,अभी तो माँ सो रही होंगी...इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया..पर अब तो उसे ही रास्ता ढूंढना होगा...ऐसे क्यूँ नहीं सोच रहा,हो सकता है..शची को यूँ सुखी-संतुष्ट देख वह भी अपने ज़िन्दगी के फैसले कर सके. ना अब और बेवकूफी नहीं. उसे शायद भगवान ने इसीलिए यहाँ भेजा कि वह शची की तरफ से आश्वस्त हो जाए...और जिन भावनाओं ने उन्हें रोक कर रखा था..उस से छुटकारा पा सके...आसान नहीं पर कोशिश  तो करनी पड़ेगी. कल चला जायेगा यहाँ से और एक बार बैठकर फिर से अपनी ज़िन्दगी पर गौर करेगा...अभी तो सोने की कोशिश करता है...और मुहँ तक चादर खींच उसने उलटी गिनती गिनने शुरू कर दी.

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सुबह फिर, चाय के साथ,किसी के नीचे हॉल में इंतज़ार करने की खबर मिली...ओह! मन हुआ कह दे,बीमार है..फिर सोचा उसका ही भला होगा..इस जगह के बारे में  कुछ और जानकारी मिलेगी. इस बार एक कॉलेज के फंक्शन में बुलाया गया था. चलो जाकर देखेगा...कैसा कॉलेज है..उसकी नज़रें वह बहुत कुछ देख लेती हैं, जो सबकी नज़रों से छूट जाती है. उसकी राहत के लिए ये सज्जन कुछ गंभीर किस्म के थे और जरूरत से ज्यादा बातें नहीं की.

कॉलेज पहुंचा तो, फिर से शची को पाया वहाँ और मिस्टर पटनायक को भी. शायद ये लोग इस शहर के कुछ जानेमाने नाम में से थे और हर जगह आमंत्रित किए जाते थे. पटनायक साहब हमेशा की तरह हंसने-हंसाने के मूड में थे पर शची कुछ शांत दिख रही थी. कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद..पूछ बैठी कब जा रहा है..और जब बताया कि 'शाम को' तो कहने लगी...'अगर फ्री हो तो घर पर आ जाओ लंच पे "
शची को यूँ  उदास देख, उसने मजाक करने की सोची.और पूछ बैठा.."अच्छा तो,,खाना भी बना लेती हो "

शची के पहले ही मिस्टर पटनायक बोल पड़े, " अरे और क्या खूब बना लेती हैं, ये मौका हाथ से नही जाने दीजियेगा...मैं तो राह देखता रहता हूँ..कब के.एस. मैडम बुलाएं..."
"अरे आप भी आ जाइये ना..". शची बोल पड़ी. हम्म समथिंग रौंग...आज शची गुस्सा होना भी भूल गयी उनके के.एस. कहने पर.

"मेरी कहाँ ऐसी किस्मत मैडम...अभी ३ पीरीयड  लगातार लेने हैं..भागता हूँ मैं,अब." फिर उसकी तरफ मुखातिब होकर बोले....."अभिषेक जी,भूल मत जाइएगा इस नाचीज़  को...आपके शहर  आऊंगा तो जरूर मिलने आऊंगा "

"हाँ हाँ जरूर..आइये..मैं इंतज़ार करूँगा.."..और हाथ मिला,विदा हो गए.

शची ने पूछा,  "अभी चल रहें हो साथ?"

"थोड़ा काम है..निबटा कर आऊं...."

"हाँ हाँ...टेक योर  टाइम.."..और फिर से औपचारिक रूप से विदा हो लिए दोनों.

कुछ काम भी था और वह खाली हाथ भी नहीं जाना चाहता था. पहली बार तो उसे पता नहीं था कि बच्चे भी हैं,वहाँ...और आज जब पता चल गया तो एक चॉकलेट भी ना ले जाए..इतना भी गैरजिम्मेदार नहीं वो.

महानगर के शो रूम्स के आदी,अभिषेक को , यहाँ की दुकानों पर  कुछ भी अच्छा  नहीं लगा..फिर भी उसने ढेर सारे उपहार खरीद लिए दोनों बच्चों के लिए. और अब पुलिस मुख्यालय जाना था. यह एक आदर्श शहर था पर वो देखना चाहता था यहाँ अपराधों की क्या स्थिति है...क्या सबकुछ  मुहैया होने पर आपराधिक  मानसिकता कुछ कम हो जाती है. पर पुलिस डिपार्टमेंट पूरे देश में एक जैसी है... 'वो मोटी वाली,फ़ाइल लाना जरा'... 'हरी या लाल वाली??'....'एक भद्दी गाली..अच्छा जा..साहब के लिए एक चाय ला'...ओह, फेड अप हो गया है..पर यहाँ  जैसे किसी को समय की परवाह ही नहीं. बार बार घड़ी देख रहा था...और ये लोग एक से दूसरे के सर पर टाल रहें थे...मोटी मोटी धूल से भरी  रजिस्टर..उसके मुहँ पर ही झाड देते...काफी देर होती  देख..शची को फोन किया , "हे विल बी लिट्ल लेट"..".नो प्रोब..टेक योर टाईम ...बाय "....और बस बात ख़त्म...ये क्या हो रहा है...सुबह से बस  दो लाईन बात हो रही है...रॉंग नंबर पे भी इस से ज्यादा  बात हो जाती है...पर इस आखिरी मुलाकात को तो यादगार बनाना है. यहाँ से फुर्सत पा ले...फिर खूब हंसी मजाक करेगा ...शची कितना नहीं बोलेगी..देखता है.

वहाँ से काम ख़त्म कर सीधा  गेस्ट हाउस भागा..जल्दी से नहा कर कपड़े बदले और बैग समेत ही शची के घर की तरफ चला.वहीँ से सीधा स्टेशन जायेगा. अब जितना भी समय मिला है..शची से  दूर रहकर नहीं गँवाएगा. शची...उसके इंतज़ार में ही थी, प्लेन नीली  साड़ी , छोटी सी नीली  बिंदी और खुले बाल,उसपर कुछ इतने फब रहें थे कि देखा नहीं गया उसकी तरफ. उसके हाथों में इतने सारे पैकेट्स देख चौंक गयी..."ये ये सब क्या है.."

"तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है....यू कैन चेक..बस बच्चों के लिए है कुछ...कहाँ हैं ,दोनों?"

"नीतू...नलिन.." शची ने आवाज़ दी और दोनों बच्चे भागते हुए आए. उसे नमस्ते किया और नीतू शची की साड़ी पकड़ खड़ी हो गयी. जैसे ही नीतू की तरफ पैकेट्स बढाए..नीतू शची से थोड़ी और चिपक गयी.."अंकल हमारा बड्डे नहीं है "

"ये बड्डे के एडवांस में है..."

"तो फिर हमें बर्थडे पर ही खोलने होंगे ये..?" नलिन था..

"नहीं.. नहीं.." बस इतना ही बोल पाया..कुछ सूझा ही नहीं...ये आजकल के बच्चे भी..
दोनों एक नज़र पैकेट्स को और एक नज़र शची को देख रहें थे. शची ने आँखों से इशारा  किया और दोनों बच्चों की आँखों में चमक आ गयी.

नीतू ने ही जल्दी से आगे बढ़..पैकेट थाम लिया, और शची के कहने  पर कि 'थैंक्यू तो बोलो' शर्मा कर इतने प्यार से 'थैंक्यू अंकल'बोला कि उसने उसे खींच गोद में बिठा लिया और फिर नीचे कालीन पर बैठ ही उसकी मदद करने लगा,पैकेट खोलने में. शची उसके लिए ठंढा लेकर आई पर बैठी नहीं. नलिन अपने पैकेट्स के साथ उलझा था और वे  और नीतू दूसरे पैकेट्स खोलने में लगे थे. एक नज़र देखा शची की तरफ और कुछ दरक गया भीतर. अब ये कौन सा रूप है शची का...उसकी सारी चपलता,सारा बातूनीपन जाने कहाँ छुप गया था, धीर-गंभीर लगती,शची बहुत बहुत उदास दिख रही थी.और उसे यह ख़याल आ ही गया..'इस लड़की ने शुरू से चौंकाया है उसे, कभी भी उसका अनुमान खरा नहीं उतरने दिया. इतने दिनों के अजनबी व्यव्हार के बाद इस अपेक्षित उदासी का क्या रहस्य है.? कुछ कहने की सोच ही रहा था कि नीतू का पैकेट खुल गया और सुन्दर सी डॉल देख नीतू ख़ुशी से चीख पड़ी.."मम्मा..कितनी सुन्दर डॉल है, देखो..पिंक फ्रॉक..पिंक रिबन और शूज़ भी पिंक..."

"खेलो, तुम मैं खाना गरम करती  हूँ.." कहती शची अंदर चली गयी.

"डॉल  मोस्टली पिंक ही होती हैं...स्टुपिड"..नलिन अब तक अपने पैकेट्स में ही उलझा था.

"यू...यू...टोमैटो...पोटैटो..."..शायद नीतू 'स्टुपिड' से कुछ ज्यादा वजनदार  कहने की  कोशिश कर रही थी.
नलिन उसकी तरफ झपटा और नीतू भागी..उसने नीतू को अपने पीछे कर लिया. और नीतू  पीछे से उसके गले में बाँहें डाल उसकी पीठ पर झूल गयी.
वो उसके बालों की बेबी शैम्पू की मीठी महक और बेबी सोप की खुशबू  ,बहुत ही प्यारी लग रही थी...बिलकुल नया  अहसास था उसके लिए. मनीष-विंशी की बिटिया बहुत शर्मीली थी..उस से खुल नहीं पाती थी पर ये  तो बिंदास कणिका की बिंदास बेटी थी,एक पल नहीं लगा और इतना हिल गयी उस से.उसने भी उसके दोनों कोमल हाथ पकड़ पीठ पर झुलाना  शुरू कर दिया. नलिन अपनी गन देख  बहुत खुश हुआ..और दौड़ा गया शची को बुलाने..'मम्मा देखो ..अंकल ने क्या लाया है.." उसे पता था ये औरतें कभी गन खरीद कर नहीं देंगी...और सच ही निकली उसकी आशंका..शची भी गन देखकर चौंक पड़ी..'ये क्यूँ ले आए..?'..

'पता था मुझे...ऋचा भी डांटती है,मुझे...उसके बेटे को खूब बिगाड़ता हूँ..कहती है..इस से हिंसक प्रवृति बढती है..हिंसक प्रवृति  माई फुट...जिसमे होगी..बिना गन से खेले ही आ जाएगी"

"ऋचा का बेटा है..?.".शची ने थोड़ी उत्सुकता से पूछा..

"हाँ ..५ साल का "

"और मनीष ,विंशी के क्या हाल हैं...कोई कॉन्टैक्ट है उनसे?"

"उन दोनों की भी शादी हो गयी एक बिटिया है..३ साल की "

"गुड़..चलो खाना  लग गया है.."..और शची अंदर चली गयी..

'हाँ, शची..बस मेरे बारे में मत पूछना.'.मन ही मन कहा उसने...और बाकी पैकेट्स खोलने में बच्चों की मदद करने लगा. शची फिर से आई..और बच्चों को भी हाथ धो ,टेबल पर आने को कह गयी.

छोटी सी मेज थी...शची को भी कहा ,बैठने को..पर उसने कहा..."हाँ ,आती हूँ, मैं भी..जरा नीतू को पहले खिला लूँ..बड़े नखरे हैं,इसके...' पर वो ज्यादातर किचेन में ही कुछ न कुछ करती रही. जबकि एक महिला और थी,किचेन में काम करने को. उसने भी ज्यादा जोर नहीं दिया..खाना  तो बहुत अच्छा बना  था...और काफी दिनों बाद उसे घर  का खाना मिल रहा था. शची भी उसके प्लेट का पूरा  ध्यान रख रही थी. कुछ भी कम होता, तुरंत और डाल देती..और एक बार जब सब्जी देने को चम्मच बढ़ाया तो मुश्किल से डेढ़ फीट  की दूरी पर थीं उनकी आँखें , उसने पाया वे कमल सी आँखें पानी से लबालब हैं ...और नज़र मिलते  ही शची बिना सब्जी दिए ही लौट गयी.एक आवेग सा उमड़ा..पर नीतू के स्वर ने थाम लिया.."अंकल आपको शेर की आवाज़ निकालनी आती है?'

'आती है..पर पहले खाना ख़त्म करो.."

"नईsss...अभी सुनाओ."..और चम्मच रख झूठमूठ के गुस्से से होठ बिसूर कर सर नीचे कर लिया.

"अंकल ये ऐसी ही जिद्दी है....अपनी बात मनवाने के लिए ऐसी ही पप्पी फेस बना लेती है...आप मत मानना इसकी बात.." नलिन था.

कैसे नहीं मानता इतनी प्यारी सी  गुड़िया की बात...एक नज़र किचेन की तरफ देखा और धीरे से नीतू की तरफ झुक शेर की तरह गुर्राया तो नीतू हँसते हँसते लोट पोट हो गयी..और फिर से जिद कर बैठी .."एक बार और अंकल..एक बार और.."

उसने बुरा सा मुहँ बनाया .".मम्मी मारेगी अब?.. तुम्हे तो कम मुझे ज्यादा..."

नीतू जैसे  कल्पना कर बैठी और मुहँ दबा खी खी कर के हंसने लगी. ओह बच्चे भी कितने स्ट्रेस बस्टर होते हैं  .और उसके कुलीग्स हैं..घर जाने का नाम ही नहीं लेते, काम काम और बस काम ...अब धक्के मारकर भेजेगा उन्हें.

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खाना खाने के बाद ,फिर से ड्राईंग  रूम में आ गया. बच्चे ही साथ लगे रहें.शची अंदर ही  प्लेट्स उठाने रखने में लगी थी. शची के लिए आया था..पर आज शची छिटकी फिर रही थी. एक गहरा निश्वास लिया उसने..ऐसे ही सही...क्या कर सकता है वह. अब तो चलने का वक़्त भी हो गया. बच्चे उसके जाने की बात सुन, बड़े उदास हो गए. उन्हें अपना एक अच्छा दोस्त छीनने की खबर अच्छी नहीं लगी. नीतू ने उसकी टांगों से लिपट कर कहा, "अंकल अभी बहुत दिन रहिये ना"

"कुछ जरूरी काम है बेटे...हम फिर आयेंगे "

"जाइए..हम नहीं बोलते आपसे.." नीतू ने फिर होठ बिसूर दिए.

"अरे नहीं बेटे..."...कहते उसका गला भी भर आया..नीतू को उठा गले से लगा लिया...आँखों की नमी को उसके बालों में छुपा गया.ये कौन से क्षण होते हैं,जो सारी दूरी..सारा अजनबीपन मिटा...ऐसी आत्मीयता उगा डालते हैं.

शची ने कहा....."चलो तुम्हे स्टेशन छोड़ देती हूँ "

"अरे चला जाऊंगा...क्यूँ परेशान हो रही हो तुम "

"नहीं ऑटो मिलने में मुश्किल होती है.."

"मुझे तो नहीं हुई अब तक.."

और शची मुस्कुरा पड़ी, "हाँ, नहीं हुई होगी...तुम इस शहर के लगते कहाँ हो...उन्हें पता चल जाता होगा...तुम बाहर से आए हो और वे मनमाना किराया वसूल कर सकते हैं ..यहाँ मीटर नहीं होता,ना.."

"येस्स...तो इसका मतलब..शची ने नोटिस किया है ,उसके एपियरेंस को...नॉट बैड...' मन ही मन  सोचा पर ऊपर  से बोला.." फिर तो मिल ही जाएगी..क्यूँ तकलीफ कर रही हो...?"

एकदम से उसकी आँखों में देख शची ने पूछ लिया, "क्यूँ... मेरी कंपनी इतनी नापसंद है ?"

मन हुआ,उसे कंधे से घेर ,उसकी आँखों में झाँक कर बोले..." ताजिंदगी बस तुम्हारी कंपनी का ही सपना देखा है..एक बार आजमा कर तो देखो...कभी आजमाती ही नहीं तुम.." पर ऐसा कुछ नहीं बोल सका बस  शची के पीछे हो लिया.... शची उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर गाड़ी की तरफ बढ़ गयी थी.

सच शची ने उसे  कभी मौका ही नहीं दिया अपना प्यार प्रूव करने का. कुछ लडकियां क्यूँ इतनी सेल्फ एश्योर्ड ,इतनी कांफिडेंट  होती हैं. अरे,एक बार जरा कमजोर पड़ कर तो देखो., जरा लड़खड़ा कर तो देखो..थामने के लिए दो हाथ बढ़ते देख...कितना सुकून मिलेगा? पर नहीं, उन्हें चाहिए ही नहीं कोई सहारा...उन्हें पता है उन्हें ज़िन्दगी में क्या और कितना चाहिए...और अब ऐसी लड़कियों की तादाद बढती जा रही है..सर हिलाया उसने. बैड लक बोएज़...अपनी तो कट गयी..तुम लोगों के लिए उम्मीद कम है.
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शची,ने स्टीयरिंग संभाल ली थी...साथ वाली सीट पर बैठ ,वह सीट बेल्ट अनहुक करने लगा, लगाने को. और शची बोल पड़ी.."अरे , रहने दो..यहाँ रूल्स इतने स्ट्रिक्ट नहीं हैं..चलेगा..मैं भी नहीं लगाती"

और शची को पता नहीं था,उसने उसकी किस रग पर हाथ रख दिया है, बेल्ट लगाता हुआ बोला, "क्यूँ नहीं जरूरी है,लगाना ?"

शची की निगाहें सड़क पर थी ,वरना उसके चहरे का भाव देखते ही,सब  समझ जाती. बोली, "यहाँ कोई फाईन नहीं लगता "

"सीट बेल्ट अपनी सेफ्टी के लिए लगाए जाते हैं या फाइन से बचने के लिए "

शची ने एक नज़र उसकी तरफ देखा और बोली, "मेरा ये मतलब नहीं था...यहाँ उतना ट्रैफिक नहीं है...इसलिए कहा ."

"बात ट्रैफिक और फाइन की नहीं है,शची..बात है एटीच्यूड की.एम नॉट टाकिंग अबाउट यू पर जेनेरली  देखा है, अपने देश में कोई भी काम लोग लोग किसी ना किसी के डर से करते  हैं, क्यूँ? अपनी जिम्मेवारी क्यूँ नहीं समझते? हमें आज़ाद हुए इतने दिन हो गए पर मन से गुलामी नहीं गयी. हमें सर पर किसी का खौफ चाहिए. जिसके डर से हम कोई काम करें. आस-पास फैली गन्दगी को ही ले लो..इस शहर  को तो फिर भी तुमलोगों ने काफी साफ़-सुथरा रखा है..पर बड़े  शहरों को ले लो. कोई नहीं देख रहा..चुपके से कूड़ा डाल जाएंगे ..सिग्नल तोड़ जाएंगे. "

"अभिषेक, यहाँ जनसँख्या कितनी ज्यादा है..अशिक्षा है..गरीबी  है....अब विदेशों जैसी साफ़ सफाई ढूंढोगे तो यहाँ कहाँ मिलेगी?"

"हाँ रटते रहें सब वही जुमले...अरे मैं पढ़े लिखों की बात कर रहा हूँ...कितने लोग अपनी जिम्मेवारी समझते हैं? ड्रिंक कर के गाड़ी नहीं चलानी चाहिए कौन नहीं अवेयर है..पर नहीं,  जब तक पुलिस डंडा लेकर नहीं खड़ी  होगी...कोई असर नहीं..."वह अपनी रौ में आ चुका था और अब पुराने अभिषेक की जगह नए अभिषेक ने ले ली थी..रुकना मुश्किल था उसका,जारी रहा..." लन्दन में था...इण्डिया से  दोस्त नेट  पे आते..ख़ुशी ख़ुशी अनाउंस करते.."आज तो सारा दिन चाट पे ..बॉस छुट्टी पर है."..अरे बॉस के डर से काम करते हो?.यही मेंटालिटी है सबकी. कोई हम पर नज़र रखे और बताये कि क्या करना है.,क्या नहीं वरना हम तो बस आराम से पड़े रहते हैं....दैट्स   टू बैड "

"बाबा इतना भाषण...अभी लगा लेती हूँ सीट बेल्ट.."

"हाँ लगा लो.." वह अभी उस मूड से निकला नहीं था.

शची ने गाड़ी साइड में की..और एकदम से फिर घुमा ली...और जान बूझ कर गाड़ी दायें- बाएं करने लगी..

"अरे क्या कर रही हो ये.."

" मेरे शहर में आ कर मुझे ही भाषण दोगे...मैं क्यूँ सुनूँ तुम्हारी...मेरा जो मन होगा वही करुँगी.." हँसते हुए बोली.

हंसा पड़ा वह भी.."हाँ तुम्हारे शहर में और तुम्हारी गाड़ी में बैठकर...पर गाड़ी तो स्टेडी करो...नो शची ..आई  रियली  फील वेरी स्ट्रोंगली  अबाउट इट "

"कैन अंडरस्टैंड ,अभिषेक..पर वही चलता है एटीच्यूड "

शची की नज़र सामने थी और वह खिड़की से गुजरते...पेड़ पौधे...खेलते बच्चों को देखने लगा. याद हो आया उसे..कभी वह गाड़ी चलाता था और शची ऐसे ही साथ वाली सीट पे बैठे खिड़की से नज़ारे देखती रहती थी..शची की तरफ देखा..जाने क्यूँ  लगा.शची भी यही सोच रही है.."

बाकी का रास्ता छोटा भी था और मौन में ही कटा.

स्टेशन पर ट्रेन लगी हुई थी और एक हूक सी उठी मन में अभी उसे लिए यह चली जाएगी..शची से दूर...

अपनी बोगी देख उसके पास ही खड़ा रहा..दोनों चुप हो आए थे...अब बचा भी क्या था ,बोलने को..अचानक शची ने दूसरी तरफ देखते हुए..पूछा, "कविता और बच्चे कैसे हैं ?"

जैसे आसमान से गिरा वह...ओह, तो शची  अब तक विवाहित समझती रही उसे. उसके अब तक के व्यावहार का  कारण सूर्य प्रकाश की तरह स्पष्ट हो उठा. इसीलिए वो अब तक बचती रही पुरानी बातों से. इतनी सी बात उसके ध्यान में आने से कैसे रह गयी कि जबतक वह नहीं बताएगा..शची कैसे जानेगी भला ? कितना डम्ब है वह भी..ओह..

शची,अब भी दूसरी तरफ ही देख रही थी.  लगा जैसे कब से पूछना चाह रही थी,वो और अब  भी बड़ी हिम्मत जुटाई है उसने पूछने  की खातिर. थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला.."कोई सब पर  ईश्वर की कोप दृष्टि तो है नहीं...जहाँ भी होगी..अच्छी ही होगी?'

"मतलब??.."..अब शची  ने देखा उसकी तरफ.

कुछ देर तक वह वैसे ही उन बड़ी बड़ी आँखों का कौतूहल देखता रहा..फिर धीरे से बोला..."आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची "

"क्याsssss..." शची सिर्फ आवाज़ से ही नहीं अपने  पूरे अस्तित्व से चौंक गयी थी. विस्फारित नेत्रों से उसकी तरफ देख रही थी..लेकिन उसकी आवाज़ ट्रेन की व्हिसल में खो कर रह गयी.

"येस्स..." उसने मुस्कुरा कर सर हिला दिया. ट्रेन  सीटी पर सीटी दिए जा रही थी. वह कभी ट्रेन की तरफ देखता कभी शची की बड़ी बड़ी आँखों को जिनकी गहराइयों में तेजी से पानी भरना शुरू हो गया था. कोई फैसला नहीं ले पा रहा था..पर सरकती ट्रेन ने ही जैसे उसके लिए निर्णय ले लिया. लोहे की ट्रेन ने आज उसके लिए मैगनेट का काम किया और कब वह दौड़ते हुए ट्रेन पर चढ़ गया..पता ही नहीं चला. दरवाजे की हैंडल निहारता रहा , आहिस्ता अहिस्ता धूमिल पड़ती उस आकृति को, जिसकी सिर्फ फहराती साड़ी का आँचल ही नज़र आ रहा थ .चेहरा नहीं क्यूंकि चेहरे पर दस लम्बी लम्बी उंगलियाँ फैली थीं.

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धीरे धीरे फहराती साड़ी का आँचल भी बस एक बिंदु भर रह गया..और थोड़ी देर में वो बिंदु भी गायब हो गया. और उस बिंदु के गायब होते ही दिल में जबरदस्त टीस उठी..अब फिर कभी नहीं देख पायेगा,शची को??..वो मिला भी पर ना  कुछ पूछा, ना बताया ना ही इस मुलाकात को किसी अंजाम तक पहुंचाया  और लौट रहा है?? क्या फिर मिलेगा उसे यह मौका??...वो कहते हैं ना दुख बार बार आपका दरवाजा खटखटाता है और ख़ुशी एक बार..और अगर आपने दरवाजा नहीं खोला तो गयी ख़ुशी फिर लौट कर नहीं आती..ईश्वर ने उसे एक मौका दिया...और इतना ज्ञान बघारने वाला वह उसका फायदा भी नहीं उठा पाया...विचारों के इन्हीं तूफानों में घिरा था कि देखा..'ट्रेन तो दूर जा रही है.."फिर वो कहाँ है?" ये सब सोचते कब वह दरवाजे का हैंडल छोड़ कूद पड़ा, उसे गुमान भी ना हुआ. कंधे पर टंगे भरी बैग कि तरफ गिरा था..उसका सारा भर बैग ने ले लिए था. मिटटी झाड़ते हुए उठ खड़ा हुआ...'शुक्र है...यह छोटा सा स्टेशन है...और यहाँ इतनी जल्दी ट्रेन स्पीड नहीं पकडती . यही अगर महानगरों कि ट्रेन होती तो कब के उसे वारे न्यारे हो गए होते और वह ऊपर पहुँच गया होता,जहाँ जाकर शची  का वेट भी नहीं कर सकता था,उसपे दो छोटे बच्चों कि जिम्मेवारी है. मुस्कुरा पड़ा...अब तो मंजिल सामने खड़ी है...बेशुमार वक़्त है उसके पास,वहाँ तक पहुँचने को.

खरामा खरामा प्लेटफ़ॉर्म की तरफ चल पड़ा...देखा शची प्लेटफ़ॉर्म पर ही  एक किनारे एक बेंच पर बैठी है और उसकी लम्बी लम्बी उंगलियाँ अभी भी उसके चहरे को ढके हुए हैं. बिलकुल सामने जाकर धीरे से पुकारा, 'शची"

शची ने चेहरे से हाथ हटा कर उसे देखा .उसके चेहरे पर अविश्वास,आश्चर्य और हर्ष के ऐसे मिले-जुले भाव थे कि उसके दिल के कैमरे ने कहा ,'क्लिक'

पर पिक्चर अभी सेव भी नहीं हो पायी थी कि शची एकदम से उठी  और उस से इतने जोरों से लिपट गयी कि बैलेंस करने को उसे दो कदम पीछे हटना पड़ा. प्लेटफ़ॉर्म लगभग खाली हो चुका था .फिर भी इक्का दुक्का लोग और खोमचे वाले...स्टॉल वाले तो थे ही.पर आज शची को उसके सिवा कुछ नज़र नहीं  आया था. झिझकते हुए हाथ उसने भी शची के गिर्द लपेट दिए. उसे अब कुछ भी  पूछने की जरूरत नहीं थी.शची  के हाथों की जकड़न बता रही थी कि कितना मिस किया ,शची ने उसे. यहाँ शची के आंसुओं से उसकी शर्ट तरबतर हो रही थी पर उसका दिल बल्लियों उछल रहा था, 'शी मिस्ड हिम मैन...शी मिस्ड हिम.." और उसने अपना सर ऊपर आसमान की तरफ उठा दिया और मन ही मन थैंक्स बोल उठा उस नीले छतरी वाले  को.मन इतना हल्का-फुल्का हो आया था कि यहाँ तक सोच गया,'अच्छा है शची ने नाखून बढाने छोड़ दिए...वरना आज तो उसकी शामत  थी.'

बरसों पहले की शाम याद हो आई,जब ऐसे ही ,उस से  लिपट कर रोई थी शची,और उस दिन वह खुद भी दुखी हो आया था...कुछ नहीं बोल पाया था.पर आज शची के बाल सहलाते हुए बोल रहा था, "स्टॉप क्रायींग नाउ...एम हियर ओनली.....नेवर टू लीव .शची  .नेवर टू लीव ..इतनी  मुश्किल से मिली हो ....अब कहीं नहीं जाऊंगा तुम्हे छोड़कर शची..कहीं नहीं..कब्भी भी नहीं.
 (इति शुभम )

39 comments:

दीपक 'मशाल' said...

ओहो.. कोई मुझसे पहले कहानी पढ़ गया.. :(
aur chatka bhi

सारिका सक्सेना said...

wow ! इसे कहते हैं एक खुबसूरत अंत| आँखों में पानी के साथ होंठों पर मुस्कराहट भी आ गई| लेकिन अब एक खालीपन लग रहा जैसा की हमेशा एक अच्छी कृति को पढ़ने के बाद लगता है, की अब अगली कड़ी का कोई इंतज़ार नहीं| अब इसे दोबारा पढेंगे किसी दिन समय निकालकर|

दीपक 'मशाल' said...

मिलन पर मृदंग की आवाजें सुनाई दे रहीं थीं मुझे जब मैं आखिरी पंक्तियाँ पढ़ रहा था.. और आँखों में क्या था कुछ खारा पानी.. इन्हें मिलाने के लिए किसे थैंक्स कहूं आपको या ऊपर वाले को दी? इतनी समझ विकसित नहीं हुई अभी की आपकी लिखी रचना की समीक्षा कर सकूं..
पर ये कहानी कभी नहीं भूल सकता.. आपके लेखन का मुरीद तो था ही अब समझ लीजिये की भक्त बन गया.. सीटबेल्ट वाली बात तो बिलकुल खुद के डायलोग लगे.. दो मिनट के लिए रुक जाना पड़ा जब पढ़ा की 'आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची....' ओह.. हर कहानी ऐसे ही सुखांत पर आकर क्यों नहीं ख़त्म होती? हकीकत न सही कम से कम कहानी तो हो..
थैंक्स दी..

shikha varshney said...

आह सुकून आया ..कहानी के अंत तक पहुँचते पहुँचते होटों पर मुस्कान आ जाती है .मैं डर रही थी कि कहीं शीर्षक ही अंत न हो ..ट्रेन में चड़ते अभिषेक को देखकर गुस्सा आ रहा था कि अजीब पागल है इतना होने पर रुक नहीं सकता था ? यूँ ट्रेन से कूदना खतनाक होता है इतना भी नहीं पता इस लन्दन वाले अभिषेक को:) ? पर थैंक्स फॉर द हैप्पी एंडिंग ..
बहुत खूबसूरत बन पड़ी है ये किश्त खासकर अभिषेक के मनोभावों का सजीव चित्रण किया है और उसके वो लन्दन वाले विचार... एकदम सटीक हैं...
और "पप्पी फेस" हा हा हा आपने भी अजमा लिया ...यहाँ देखा और वहां लिखा ..एकदम प्रोफेशनल लेखिका हो गई हो.
बहुत ही अच्छी कहानी बनी है बाँधे रखती है अपने साथ और इसके चरित्रों के साथ पाठक अपने आप को जुड़ा पाता है ..
बहुत बहुत बधाई रश्मि ! और ढेरों शुभकामनाये.
इति शुभम !

अविनाश वाचस्पति said...

अगली किस्‍त का इंतजार है
क्‍योंकि यह अंत नहीं
शुरूआत है।

मनोज कुमार said...

संग्रहणीय प्रस्तुति!

vandana said...

wwwwwwwwwwwooooooooooooooooooooooooooooooooooowwwwwwwwwwwwww .....kaansh upar vala bhi sabki kahani likhte hue itni barkat bakshe jitni aapne barti ...bahut bahut bahut accha laga ye novel hamesha yaad rahega ..thanks for writing it...
likhte rahiye ..best wishes :)

roohshine said...

Rashmi ji..

ant tak aate aate aankhein bhar aayi.. bhavnaon ka jeevant chitran.. yah to main soch bhi nahin payai thi ki shachi abhishek ko vivahit samjh rahi hogi... behad prbhavshali chitran.. dono ki bhavnaon ka.. hats off to u..

रश्मि प्रभा... said...

शची .नेवर टू लीव ..इतनी मुश्किल से मिली हो ....अब कहीं नहीं जाऊंगा तुम्हे छोड़कर शची..कहीं नहीं..
ab jake aaya mere bechain dil ko karar

Udan Tashtari said...

आज समय काफी था तो इत्मिनान से पढ़ी और आगे पीछे खंगाल कर तारत्म्य भी बैठाला..याने कि पूरा आनन्द उठाया.

बहुत उम्दा लेखन..शानदार अंत (समापन)

अब कहो तो ईपुस्तक बना कर भेज दूँ इसकी :)

तो अंत में बेहतरीन लेखन के लिए साधुवाद, बधाई और ऐसे ही लिखती चलो, अनेक शुभकामनाएँ.

अभिषेक ओझा said...

ये तो बिलकुल अपने दिल से निकली बात है: "कुछ लडकियां क्यूँ इतनी सेल्फ एश्योर्ड ,इतनी कांफिडेंट होती हैं. अरे,एक बार जरा कमजोर पड़ कर तो देखो., जरा लड़खड़ा कर तो देखो..थामने के लिए दो हाथ बढ़ते देख...कितना सुकून मिलेगा? पर नहीं, उन्हें चाहिए ही नहीं कोई सहारा...उन्हें पता है उन्हें ज़िन्दगी में क्या और कितना चाहिए...और अब ऐसी लड़कियों की तादाद बढती जा रही है.."

हरि शर्मा said...

मतबल ये कि इन्तजार खत्म.
चलो अभि काम पे जाओ. पहले ये बहाना कि शचि लिफ़्ट नही दे रही अब ये कि लिफ़्ट ही हटा ली. चलो अब काम धाम करो.

रश्मि जी मैने कहा भी था कि महिला के हाथ से अनर्थ हो ही नही सकता. हा अन्त मेरे हाथ मे होता तो शचि को ये सब कि अभि स्टिल वेट कर रहा था तब पता चलता जब अभि किसी और लडकी के साथ शादी का कार्ड भेज देता और फिर मै कहता अब पछतावे होत कया जब चिडिय चुग गयी खेत. पुरुष मानसिकता है ना. ढन्ग से कोई काम हम तो कर ही नही सकते. पर नही आपने अभि से सपनो की भी लाज रखी और शचि की तपस्या की भी.
भगवान जैसे शचि और अभि को मिलाया वैसे ही सबको मिलाये

Deepak Shukla said...

Hi..

Aha..khair sukun aaya.. Train main chadhte Abhishek ko padh soach raha tha ki agar ant dukhant hua to apna purjor virodh karunga.. Par chalie aapne pathkon ka man rakha.. Thanks for that..

Ye sanwad dil chhu gaye

Achha hua Shachi ab nakhun nahi badhati..

Aaj mera bdday nahi hai..

Puppy face..

Aur bhi bahut se..kahan tak ginayen..jab har vakya bhaya ho..

Shubhkamnaon sahit..

DEEPAK..

Sanjeet Tripathi said...

आखिर आखिर के शब्द तक सस्पेंस बना रहा, लेकिन दिल खुश हो गया, अंत पढ़कर।

सो अगला लघु या दीर्घ उपन्यास कब से?
पढ़ना चाहूंगा

विनोद कुमार पांडेय said...

अभिषेक की मनोस्थिति का बढ़िया वर्णन किया..एक सुंदर एहसास भरी कहानी....वैसे माफी चाहूँगा बीच बीच की कड़िया पढ़ कर कहानी से जुड़ने का प्रयास करता रहा..पर इतना तो समझ ही गया की एक बेहतरीन प्रस्तुति रही यह आपकी.. फ्री होने पर मेरे लिए एक ऑनलाइन उपन्यास का काम करेगा जिसके लिए धन्यवाद..अगली नयी रचना का इंतज़ार है..बहुत धन्यवाद रश्मि जी

वन्दना said...

'अच्छा है शची ने नाखून बढाने छोड़ दिए...वरना आज तो उसकी शामत थी.'
बरबस मुस्कान आ गयी जैसे ही ये पंक्तियाँ पढीं…………………बहुत ही सुन्दर अंत किया कहानी का……………………अब तो मिलना जरूरी भी था।
एक सशक्त लेखन्………………बधायी।

ashish said...

ये सत्य है. कि आपकी अपने पाठको और उपन्यास के पात्रों को बांध कर रखने कि क्षमता प्रभावशाली है. आपकी, कल्पनाशीलता , शब्द विन्यास, मानव मन का विहंगम चित्रण , सृजनात्मक शक्ति , का कायल हूँ मै. आप ऐसे ही लिखती रहे और लोगों को भक्त (अपनी लेखनी का) बनाती रहे. william wordsworth कि ये लाइन आप चरितार्थ करती है.Fill your paper with the breathings of your heart.

rashmi ravija said...

Saurabh Hoonka की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी :

yahoo, yippy, di i said naa that both are made for each other. I cant tell you di that how much im Happy. Simply i can say that YOU MADE MY DAY. awesome story, awesome ending. This story will not have such a better ending other than this. At last i just want to say one thing................ (Sorry Abhishek but...) I am in love with Shachi..........and I am still waiting for you Shachi... :)

sangeeta swarup said...

रश्मि ,

समापन किस्त लिखा देखा तो...तुम्हारी इस कहानी को पढने से खुद को नहीं रोक पायी....असल में कल ही पढ़ ली थी और भाई पसंद का चटका भी लगा दिया था :)
मुझे मालूम है कि कम से कम मेरी टिप्पणी का इंतज़ार तो कर ही रही होंगी....ना भी करो तो ये सोचने में क्या जाता है कि शायद कुछ अहमियत हो मेरे लिखे की भी :):):)

खैर मैं फिर से पढ़ कर ही यहाँ कुछ लिख पाने में अपने आप को समर्थ पा रही हूँ..कल तो बस जैसे तुम्हारे रचे सारे पात्रों की हर क्रिया का विश्लेषण ही मन में आ रहा था..एक एक पात्र के चरित्र को बखूबी तुमने अपनी कलम में उतारा है...शची का व्यवहार ...कहना होगा संतुलित व्यवहार ...अभिषेक की सोच बहुत सशक्त लिखी है...
साथ साथ ही कहानी में सन्देश देना भी नहीं भूलीं...की देश को गंदा नहीं करना चाहिए और अपना काम किसी के डर से नहीं बल्कि काम समझ कर करना चाहिए...
शची और अभिषेक के मिलन को सुन्दर शब्दों में बाँधा है...हास्य का पुट देना भी नहीं भूलीं..

और जहाँ तुमने लिखा कि अभिषेक ट्रेन में चढ गया....इतना पढते ही मुझे परिचय पिक्चर का समापन याद आ गया था...जिसमे जितेन्द्र ने ट्रेन से छलांग लगा दी थी.. :):)और आगली पंक्ति तुम्हारी यही थी कि अभिषेक ट्रेन से कूद गया

पूरा उपन्यास कहूँ या लंबी कहानी... जो भी है...पाठक को पूरे समय बांधने की क्षमता रखता है...और हर बार की किश्त पर यही लगता रहा कि अब आगे....लेखन शैली तो गज़ब की है ही कल्पनाशीलता भी ऐसी है जो सच्चाई को बताती सी है....कुल मिला कर अच्छी सीरीज़ रही......बधाई.....शुभकामनायें

rashmi ravija said...

ओह संगीता जी,
मैने बचपन में 'परिचय ' फिल्म देखी तो है...पर बच्चों की शरारतों वाले दृश्य ही याद हैं..(वैस अब मन हो रहा है, एक बार देखने का. अभिषेक को तो छलांग लगाते नहीं देख सकती ...जितेन्द्र को तो देख लूँ,कम से कम :)
आपके कमेन्ट का हमेशा ही इंतज़ार रहता है..मेरे मुट्ठी भर ही नियमित पाठक हैं...उनमे आपका नाम सर्वोपरी है, ..कहानी पसंद आई...शुक्रिया.

mukti said...

समापन किस्त पूरी तरह से सर्वगुण संपन्न है...
थोड़े चित्र---
-बाहर घुप्प अँधेरा फैला था...हाथ को हाथ नहीं सुझाई देने वाला. और ऐसी काली रात में अपनी ख़ास काली कॉफ़ी की तलब हो आई उसे. जिसमे दुधिया चांदनी का स्पर्श भी ना हो...ना ही, हो ओस की मिठास. बस एक एक जलता घूँट हलक से उतारता रहें, और उसके तन मन की आग कुछ ऐसा रूप ले ले की उसकी रोशनी में ही कुछ रास्ता नज़र आए.कितने ही ऐसे कशमकश भरे क्षण निकाले हैं उसके सहारे.
थोड़े सामान्य कथन---
-ओह बच्चे भी कितने स्ट्रेस बस्टर होते हैं .और उसके कुलीग्स हैं..घर जाने का नाम ही नहीं लेते, काम काम और बस काम ...अब धक्के मारकर भेजेगा उन्हें.
-...बैड लक बोएज़...अपनी तो कट गयी..तुम लोगों के लिए उम्मीद कम है.
-वो कहते हैं ना दुख बार बार आपका दरवाजा खटखटाता है और ख़ुशी एक बार..और अगर आपने दरवाजा नहीं खोला तो गयी ख़ुशी फिर लौट कर नहीं आती.
और थोड़ा रोमैंस---
-शची के हाथों की जकड़न बता रही थी कि कितना मिस किया ,शची ने उसे. (ये दृश्य तो आपने गजब रोमैंटिक लिखा है...)
अन्त बहुत अच्छा लगा. सुखद होगा ये तो लग रहा था, औत्सुक्य का भाव अन्त में चरम को पा जाता है, ऐसा अन्त लिखना सच में एक चुनौती भरा काम था, जिसे आपने बखूबी निभाया है. अभिषेक के चरित्र का मनोवैज्ञानिक चित्रण वाकई लाजवाब है...
उपन्यास के सफल समापन के लिये बधाई !!!

Neha said...

itne dinon net se door rahna khala...sochti rahi kii kahani ne kya mod liya hoga....jaise kewal trailer dekhkar kisine film na dekhne di ho...aaj jaise hi net par aai....apne blog,mails..sabhi ko nazarandaaj karti hui sidhi yahaan aa gayi.....aaj poori kahani bina ruke padhti chali gayi.....har ank ki samapti agle ank ka kautuhal badhakar hi jati thi...aaj jyada intzaar nahi karna pada...kyunki saare ank samne the fir bhi itna sabra bhi kahan se lati..?....yakin maniye jab abhishek ne train pakad li to man is ank ko aakhri ank manne se inkaar karne laga....kyunki bhale hi life me aisa milan na ho...hum aisa milan hi chahte hain...aapki rachna ke liye hardik badhai...

कविता रावत said...

Behtreen dhang se upnyas ke safal samapan ke liye haardik shubhkamnayne...

shikha varshney said...

ये कहानी को सुखांत करके आपने मुझे अच्छा पास टाइम दे दिया है :) ..फिर आ गई मैं एक बार पढने :) .तब तो अंत देखने कि जल्दी में जल्दी जल्दी पढ़ गई ..अब ध्यान गया इन खूबसूरत पंक्तियों पर .
मन हुआ,उसे कंधे से घेर ,उसकी आँखों में झाँक कर बोले..." ताजिंदगी बस तुम्हारी कंपनी का ही सपना देखा है..एक बार आजमा कर तो देखो...कभी आजमाती ही नहीं तुम.."
क्या बात है ...यार कहाँ से आते हैं इतने जीवंत और खूबसूरत ख्याल आपको? ...वैसे कहते हैं कि लेखक कहानी में आत्मकथा लिखते हैं और आत्मकथा में कहानी .....कहीं यही राज़ तो नहीं ;) ? ही ही ही ...just kidding ..but realy very beautifully written.

rashmi ravija said...

"वैसे कहते हैं कि लेखक कहानी में आत्मकथा लिखते हैं और आत्मकथा में कहानी ..."
और कविताओं में कवि क्या लिखते हैं शिखा.??.तुम्हारी कवितायें भी बड़ी जीवंत और खूबसूरत हुआ करती हैं हा हा हा

shikha varshney said...

कवितायेँ तो कोरी कल्पना हुआ करती हैं रश्मि ! वो कहते हैं न .."जहाँ न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि" हा हा हा.

हिमान्शु मोहन said...

||इति शुभम्||
जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहुरें।
इससे आगे कुछ बोला तो अन्त नहीं होगा बोलने का, एक अनर्गल व्याख्यान तैयार हो जाएगा।
आपकी शैली थोड़ा अलग है, पर सशक्त है। सूर्यबाला जी और शिवानी जी की कथाओं का मज़ा मिला। वर्णन शक्ति अद्भुत, कहानी चित्रपट सी जीवन्त हो सामने चल रही थी। हीरो-हीरोइन तक तय कर लिए हमने। कैमरा किस एंगल से मूव करता है, कहाँ लॉन्ग शॉट है, कहाँ क्लोज़-अप, गाड़ी से बैग पर गिरते अभिषेक का धूल झाड़ कर खड़ा होना - शॉट चलती गाड़ी से शुरू होकर गिरते ही ज़मीन पर आ जाता है - अभिषेक खड़ा होता है और पीछे से गाड़ी निकल रही है - खटर-खट, खटर-खट…
कहा न बकवास शुरू हो जाएगी। और आख़री शॉट में जब कैमरा दोनों को लिपटे हुए देह्क कर ट्रॉली पर चक्कर लगाता है और उसके बाद लॉन्ग शॉट में दूर होता है तो साथ-ही-साथ ऊपर को उठता है, चाँद देखता है और साथ में देखता है दो पंछी - एक साथ लयबद्ध उड़ान में, फिर एण्ड कास्ट शुरू हो जाती है…
सबसे बड़ी बात है सुखान्त, जिसके बिना मुझे बर्दाश्त नहीं कोई कथा, आज तक। बधाई हो।
अगली कथा कब?

CLUTCH said...

मन बेचैन हो उठा...उठकर बालकनी में आ गया. ऐसा लगा जैसे अपने मन की सच्ची तस्वीर वो देख नहीं पा रहा. आज खुद को इतना छोटा..इतना स्वार्थी देखना..सहन नहीं कर पा रहा था.

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत ...................सुन्दर अंत. हम यही चाहते हैं न की जो भी हो सबके हक में अच्छा हो. हाँ अगर किसी की नियति ही ऐसी हो तो बात अलग है लेकिन उस नियति को तो हम वैसे ही लिखने के लिए मजबूर होते हैं. तुम्हारी प्रस्तुति को दाद देती हूँ, इतने दिनों तक बाँध कर रखा था वैसे इसके शीर्षक से कुछ अनुमान तो लगाया था लेकिन ये नहीं.
अब दूसरे उपन्यास के इन्तजार में.

खुशदीप सहगल said...

रश्मि बहना,
देर से आया हूं पोस्ट पर...इसकी वजह भी है...इस पोस्ट को पढ़ने के लिए मैं शनिवार-रविवार की छुट्टी का इंतज़ार करता हूं...जिससे इत्मीनान से पढ़ सकूं...पहली बात मैं गलत साबित हुआ...शचि और अभिषेक के मिलन से उपन्यास का सुखद अंत हुआ...यानि शचि-अभिषेक का नाम हीर-रांझा, लैला-मजनूं, ससी-पुन्नू और रोमियो-जूलिएट जैसे अमर प्रेमियों की लिस्ट में आने से रह गया...वैसे दूर रह कर पहले प्यार की खुशबू जिस तरह ताउम्र ताज़ी रहती है वो मिलन के बाद उतनी कसक वाली नहीं रह जाती...

जय हिंद...

Deepak Shukla said...

Hi,

Aaj punah aa gaya.. Kahani main Abhishek aur Shachi ka milan dekhne..padhne..

Aaur sab chahe bhul jaye.. SHACHI ke nakhun na badhana hamesha ta-jindgi yaad rahega..

Ek baat samajh nahi aati.. Asal jindgi Ye sab Shachi se sahpathi duniya ki bheed main kahan gayab ho jate hain.. Ek baar gum hue ki fir kabhi nahi milte..

Kahani main hi sahi chaliye Shachi Abhishek ko mili to aur khushi ye jaan ke hui ki Shachi Abhishek ko na sirf puhah ru-ba-ru mili, balki ta-jindgi ke liye mil hi gayi..THANKS to u for that..

Kahte hain.. Pyaar main deevangi na ho to pyaar pyaar nahi.. Ye deewangi hi pyaar main chah, vishwas, junoon, samarpan, tyaag, nishtha aur shiddat ko lati hai.. Kahani ke utrardh main es deewangi ne Shachi ke tyaag ka rup liya to purvardh main Abhishek aur Shachi ki chah ek shiddat, ek junoon si nazar aayi.. Jisne kahani ka ant marmik bana diya.. Aur upar se Kahani ke Shuru se ant tak ek Vakya sabke dilon main gunjta raha..' I am waiting for u Shachi' aur sab yahi pratiksha kar rahe the ki aakhir wo ghadi kab aayegi jab ye shershak vakya, Abhishek Shachi se kahega..

Khair kahani ke patron sang humne bhi ek jeevan jiya hai..

Dil main ek sukun sa chhaya..
Hothon par muskaan..
SHACHI, ABHI ko sand dekhar..
Jaan main aayi jaan,..

Agli kahani ki pratiksha main..

DEEPAK..

Deepak Shukla said...

I AM STILL WAITING FOR U SHACHI..(Meri nazar se)

Ek college main padhte the do..
Sahpathi kuchh aise..
Ek dooje se door bhagte..
Saap chhuchundar jaise..

Ek din aisa bhi aaya jab,
un dono main pyaar hua..
Bina mile na chain tha milta..
Jeena bhi dushwar hua..

Magar kahani seedhi sadhi..
Kahan aaj tak ban payi..
Ek dooje se door hue wo..
Aisi ghadi bhi thi aayi..

Ek dooje ka pyaar basaye..
Dono yun to door hue..
Ek dooje ke dil main fir bhi..
Ek yaad se rahe base..

Duniya ke mele main kuchh din..
Dono gum se kahin rahe..
Dil main aas, milan ki lekar..
Ek ek pal mar mar ke jiye..

Ek din aisa bhi fir aaya..
Wo dono ek roz mile..
Dekh ek dooje ko yun..
Dono sabko lage khile..

Shikve, gile dikhe na koi..
Jo tha wo bas pyaar hi tha..
Ek dooje se kuch bhi kahna,
sunna bhi dushwar na tha..

Laga yahi ki ek baar fir..
Dono juda ho jayenge..
Ek dooje se pyaar wo dil ka..
Ab bhi na kah payenge..

Magar pyaar jab sachcha hota..
To wo asar dikhata hai..
Dil ki baat juban tak aakhir..
Wo to le hi aata hai..

Dua humari sang main unke..
Deko aaj kabool hui..
SHACHI+ ABHI ki aaj hui hai..,
Bahon main aake hai chhupi..

Jeevan main haalat sabhi ke..
Hardam na rahte ek se..
Eshwar par vishwas karen, aur..
Pryaas karen hum bas dil se..

Bichhud gaya gar saathi koi..
Kal wo wapas aayega..
Chah agar sachchi hogi to..
Door kahan rah payega..

ABHI aur SHACHI ke pyaar ko samarpit..

DEEPAK..

वाणी गीत said...

@ पता नहीं आज माँ की इतनी क्यूँ याद आ रही थी....
ऐसा क्यों होता है ...जब अकेलापन सताता तो है माँ इतना याद क्यों आती है ...और मां अपना अकेलापन भूल कर सबको आँचल में छिपा लेती है ....
@ "डॉल मोस्टली पिंक ही होती हैं...स्टुपिड"......ढेर सारी स्म्याल्लिज ...:):):):):):)

@ये कौन से क्षण होते हैं,जो सारी दूरी..सारा अजनबीपन मिटा...ऐसी आत्मीयता उगा डालते हैं....
सच ...ऐसे पल कब आ जाते हैं जिंदगी में जब कोई अजनबी अपना लगने लगता है ... पता ही नहीं चलता

@ जब तक पुलिस डंडा लेकर नहीं खड़ी होगी...कोई असर नहीं....
सच्चाई तो ये है कि खुद डंडा लेकर खड़े लोग भी मौका मिलते ही कानून तोड़ने में पीछे नहीं रहते ...

पूरी कहानी पढ़ कर सोच रही हूँ लोग इतनी देर क्यों लगाते हैं अपने दिल की बात कहने में ...क्या होता जो शची ने कविता के बारे में पूछा आ होता ...अकेले चलते जिंदगी के किसी मोड़ पर दोनों अजनबी से मिलते और इस सच से रूबरू होते तो क्या ये बीते हुए लम्हे लौटाए जा सकते थे ...कभी नहीं ....जो वक़्त आज बीत गया कभी लौट कर नहीं आता ....
मगर फिर भी ...चलती ट्रेन से ही सही ..अभिषेक ने शची को अपनी बात कहने में सफलता तो प्राप्त की इसलिए ...
अंत भला तो सब भला ...क्यूंकि मुझे सुखांत वाली कहानिया ही पसंद आती हैं ...
तुमने ठीक ही कहा था कि मैं इस कहानी से बहुत गहरे जुड़ गयी थी ....क्यों ..शायद मुझे भी पता नहीं ....!!

बिजली महारनी रूठी रहती है आजकल ....और एक दो शादियाँ भी थी ...इसलिए तुम्हारी इस पोस्ट को देर से पढ़ पायी ...कुछ उल्टा पुल्टा मत सोचा करो ....:):)

वाणी गीत said...

@ वैसे कहते हैं कि लेखक कहानी में आत्मकथा लिखते हैं और आत्मकथा में कहानी ..."
कहानी और कविता में जो कुछ हम लिखते है वह सब सिर्फ हमारा भोगा यथार्थ नहीं होता ...कई बार हम विशेष परिस्थितियों में दूसरों को देखकर उसकी जो कल्पना करते हैं और सोचते हैं कि यदि हम होते तो हमारी क्या प्रतिक्रिया होती , क्या होता , कैसे होता , और इसमें कल्पनाशीलता का सम्पुट ही उसे पूर्ण करता है ....नहीं क्या ...??

जैसा मेरी तुच्छ बुद्धि बता रही है ..

रवि धवन said...

आहा। ह्रदय को छू गई पूरी कहानी।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

आज ही पहले तेरहवीं और फिर समापन किस्त पढी. अन्त भला सो सब भला. बहुत सहज तरीके से कहानी आगे बढती गई और फिर उसका सुखान्त हो गया. लेकिन शचि की बीमारी कैसे ठीक हुई या क्या हुआ ये ज़िक्र भी तुम करतीं तो अच्छा होता. (ये केवल एक सलाह है, समालोचक की नज़र से... :)

rashmi ravija said...

"लेकिन शची उसके मन में आते-जाते भावों से बेखबर, कुर्सी की पीठ से सर टिकाये अपनी ही रौ में कहे जा रही थी, "लेकिन जाने क्या चमत्कार हुआ...या मेडिकल साइंस की तरक्की ही कह लो. जिस ऑपरेशन को करने से डॉक्टर इतने दिन तक डरते रहें कुछ विदेशी डॉक्टर आए थे और उनके साथ मिलकर मेरा मेरे हार्ट का ऑपरेशन हुआ और मैं बिलकुल ठीक हो गयी. मुझे तो पूरा विश्वास है,इन मासूमों की देखरेख के लिए ही ईश्वर ने ज़िन्दगी बख्शी है. "

तेरहवीं किस्त में सबकुछ एक्सप्लेन किया है वंदना. लगता है,जल्दबाजी में तुमने ठीक से पढ़ा नहीं...कोई बात नहीं और तुम्हारी समालोचना का तो हमेशा ही इंतज़ार रहेगा....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

ओह, इतनी मर्मस्पर्शी रचना। बहुत बहुत बधाई।

सारिका सक्सेना said...

रश्मि दी , हम सभी मेकिंग ऑफ़ "आई ऍम स्टिल वेटिंग फॉर यू शची" का इंतज़ार कर रहे हैं..... रोज़ ही मन का पाखी खोल कर कुछ नये का इंतज़ार हो रहा है|