Friday, March 5, 2010

आयम स्टिल वेटिंग फॉर यू, शची (लघु उपन्यास) --1


ओफ्फ़! कल शाम ही तो वह यहाँ आया है.पर ऐसा लग रहा है मानो हफ़्तों से नज़रबंद है यहाँ.कैसे रह पाते हैं लोग,भला इन छोटे कस्बों में? ठीक है पहले यहाँ एक आदिम बस्ती थी.पर अब तो काफी विकास हो चुका है.कहने को कॉलेज हैं,अस्पताल है,बैंक हैं,सरकारी कार्यालय हैं,पर सब जैसे चींटी की रफ़्तार से चल रहें हों.महानगरों की दौड़ती भागती ज़िन्दगी का आदी अभिषेक ,तालमेल नहीं बिठा पा रहा था इस ऊंघते कस्बे के जनजीवन से.

बुरी तरह झुंझला उठा था. वह भी एक ही पागल है,क्या जरूरत थी उसे, यहाँ आकर यह सब भोगने की.अभी तो पूरे दो दिन बाकी हैं,लौटने में.अल्लाह ही मालिक है अब.बड़ा निष्ठावान बनने चला था. आँखों देखी रिपोर्ट दूंगा.अरे,इधर उधर से मैटीरियल इकट्ठा कर ,भर देता दो तीन फुलस्केप कागज़.और क्या चाहिए मैगज़ीन वालों को,बस भाषा जरा चटपटी हो.

जितने तरीके से डांट सकता था डांट चुका अपने आपको.साथ ही निरुद्देश्य उसके पैर भी घिसट रहें थे.जिधर भी नज़र दौडाओ,लम्बी लम्बी पगडंडियाँ,घरौंदे से लिपे पुते घर और पीले रंग के सरकारी आवासों की कतार.एक ढंग का रेस्टोरेंट तक नहीं जहाँ अपनी पसंद का खाना तो दूर एक कप ढंग की चाय तक पी सके.और उस गेस्टहाउस का कुक सुब्हानअल्लाह !! कल से उसने ठीक से खाना तक नहीं खाया.लम्बे विदेश प्रवास के बाद,अब खाना तो उसे अपने घर का भी नहीं रुचता.पर एक आत्मीय स्पर्श की अनुभूति होती है,एक अपनापन सा महसूस होता है, जिसके लिए तरस गया था इतने दिनों.

शारीरिक कष्ट की परवाह नहीं उसे.चाहे जितना सता लो शरीर को.लेकिन मानसिक खुराक हमेशा मिलती रहनी चाहिए.उसमे व्यवधान आया नहीं कि एक बौखलाहट सी समा जाती है,पूरे तन बदन में.और यहाँ यही हो रहा. बुरी तरह ऊब चुका है वह.जितनी जानकारी इकट्ठी करनी थी,कर चुका.कल एक दो लोगों से मिलना है,फिर काम ख़त्म.पर ट्रेन तो परसों ही आएगी.कल शायद एक कार हायर कर पास के बड़े शहर चला जाए .फिर वहाँ से कुछ देखेगा.

यही सब सोचते ,उलझते,खुद से लड़ते हुए चला जा रहा था कि उसने पाया,अरे! वह तो बाज़ार में आ गया.तभी दाहिनी तरफ जो नज़र गयी तो आश्चर्य में डूब गया.एक सुखद सिहरन सी दौड़ गयी पूरे शरीर में..तो यहाँ मैगजीन सेंटर भी है.दूर से ही रंग बिरंगी पत्रिकाओं की छटा मोह रही थी उसे.पर हाँ, ये सारी पत्रिकाएं ,अखबार तो छोटे शहरों में ही ज्यादा बिकते हैं.महानगरों में लोगों के पास वक़्त कहाँ है ,पढने का.वह भी कहाँ पढ़ पाता है.बस कवर देख,उलट पुलट कर किनारे रख देता है.कि कल पढ़ेगा और वो कल कभी नहीं आता.व्यस्ततम ज़िन्दगी में जो पन्ने,अनछुए रह गए हैं,आज पूरे मनोयोग से उन्हीं का रसास्वादन करेगा.

मैगजीन सेंटर से ही लगी एक स्टेशनरी की दुकान थी.डेबोनेयर के नए अंक के पन्ने पलट ही रहा था कि एक नारी कंठ सुनायी दिया...."दो नोटबुक और एक पेन्सिल बॉक्स भी दे दीजिये"....और उसके हाथ जहाँ के तहां रुक गए.ये आवाज़??....ज़ेहन में एक खलबली सी मच गयी.एक झटका सा लगा और आद्यांत थरथरा गया वह.अचंभित निगाहें ,अपने आप ही उस दिशा में उठ गयीं.लेकिन सिर्फ लहराता आँचल ही नज़र आया,चेहरा नहीं.आकृति जा चुकी थी.शरीर मानो भारहीन हो अपने आप ही समीप की कुर्सी पर निढाल पड़ गया.क्या सुना उसने?कान सही सलामत तो हैं, उसके? कहीं श्रवण शक्ति जबाब तो नहीं दे गयी,उसकी??

लेकिन ऐसा नहीं है .तभी तो सेल्समैन की घबराई हुई आवाज़ सुन पा रहा है,क्या हुआ साब आपको?तबियत तो ठीक है ,आपकी??"

"अँ..हँ ..वो जरा सर में चक्कर आ गया था.अब ठीक हूँ,इस मैगजीन के पैसे ले लो"...आवाज़ तो संभाल ली,उसने पर शायद चेहरे के भावों ने धोखा दे दिया.सेल्समैन की घबराहट भरी आवाज़ पूर्ववत ही रही."नए आए लगते हो स्साब ...चलिए मैं पहुंचा देता हूँ.या किसी और को साथ कर दूँ, स्साब?"

"ओ ss..नो sss.... मैं बिलकुल ठीक हूँ,..पास ही तो गेस्टहाउस है,चला जाऊंगा....थैंक्स"...और हाथ हिलाता आगे बढ़ गया,अभिषेक.ओह, ये छोटे शहर वाले लोग, अब भी कितना शिष्टाचार निभाते हैं.इतने में उसके २,४, ग्राहक छूट जाते.पर उसे परवाह नहीं.औए यही लोग महानगर में जा उसके सारे कायदे क़ानून सीख,संवेदनाविहीन हो जाते हैं.

कब उसने सड़क पार किया,कब गेट खोला,कब सीढियां चढ़ीं और कब अपने कमरे में पड़ी कुर्सी पर निढाल पड़ आँखें मींच लीं.कुछ मालूम नहीं उसे.शायद किसी अज्ञात शक्ति ने करवा लिया उससे यह सब.वरना उसकी सुध बुध तो जाने कहाँ चली गयी थी.पूरे समय एक ही वाक्य...नहीं वाक्य क्या था,यह तो अब याद भी नहीं.बस उस वाक्य की अनूगूंज मस्तिष्क में चक्कर काटती रही.कानों में लगातार कुछ प्रतिध्वनित होता रहा.शरीर के समस्त तार झनझना उठे.रोम रोम को झकझोर कर रख दिया इस आवाज़ ने.

ये आवाज़ तो??..नहीं यह कैसे संभव है?...जरूर उसके कानों ने धोखा दिया है उसे...शची और यहाँ?...असंभव....पर शची की आवाज़ और वो ना पहचाने?? यह भी तो संभव नहीं...और शची के नाम ने उन यादों के खंडहर पर पड़ी धूल जैसे एकबारगी ही हटा दी.और ध्वस्त महल का कंगूरा चमक उठा.चमक तो कब की भोंथरी पड़ चुकी थी पर उसके भीतर का ओज अभी बाकी था और शायद हमेशा रहेगा.
000
वे कॉलेज के शुरू के दिन थे.लाइब्रेरी में एक किताब में खोया था कि एक खनकती हुई आवाज़ आई..."सुनिए,वो 'शैडो फ्रॉम लद्दाख' आपके पास है क्या?"

उसने चौंक कर सर उठाया और बिलकुल हडबडा सा गया...अँ..हँ..है तो?..क्यूँ??"

शची के चेहरे से कौंध कर विलुप्त होती हुई हंसी की रेखा उस से छुप ना सकी.किसी तरह सहज होते हुए आगे जोड़ा..."लेकिन आपको कैसे पता"

'वो लाइब्रेरियन कह रहें थे,तीन महीने से आपके पास ही है....अगर पढ़ ली हो तो..." शची ने बात पूरी नहीं की.

"सॉरी कल ला दूंगा"

अपनी जगह पर लौट गयी शची.लेकिन फिर वह किताब में मन ना लगा सका.अभी एक महीने ही तो हुए हैं,शची को दाखिला लिए.लेकिन सब से एक आत्मीय सम्बन्ध सा स्थापित कर लिया है, उसने.लाइब्रेरी में भी आने के तीसरे दिन से ही नज़र आने लगी थी.आज पहली बार उस से बातचीत हुई.पर छात्र-छात्राओं के बीच खासी लोकप्रिय हो चली थी,शची.

वैसे,इसे ज्यादा महत्त्व ,नहीं देता वह.देखता आ रहा है,यहाँ तो जैसे ही कोई नया चेहरा आया कि सब उसी के आस-पास मंडराने लगेंगे.कोई अपने पास सीट रख रहा है तो कोई कैंटीन लेकर जा रहा है.किसी ने किताबें दीं तो किसी ने नोट्स.उसके निहायत बोदे,चुटकुले पर भी छतफाड़ ठहाके लगाए जा रहें हैं.वैसे यह सब ज्यादा दिन नहीं चलता.जल्द ही अपनी रूचि,अपनी वेबलेंथ के हिसाब से नया चेहरा,अपने हमलायक चेहरे के ग्रुप में शामिल हो जाता है या कर लिया जाता है.

लेकिन इसके पहले लपकने की जो तैयारी चलती है.उस से खासी चिढ सी है उसे.अरे भई! जब साथ पढना है तो दोस्त भी तो बनेंगे उसके.इसके लिए इतनी अफरातफरी मचाने की क्या जरूरत है?लेकिन जो परंपरा चली आ रही है सो चली आ रही है.शची के साथ भी यही सब कुछ हुआ.बल्कि कुछ ज्यादा ही हुआ.
(क्रमशः)

24 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। अगली कड़ी क इंतज़ार।

अविनाश वाचस्पति said...

आगाज तो अच्‍छा है, मन मोहने वाला है किशोरों का। अनुभव के स्‍तर पर काफी कुछ कह जाने के लिए उद्यत और काफी सार्थक आएगा इस उपन्‍यास के माध्‍यम से, ऐसा ही अहसास हो रहा है।

shikha varshney said...

बहुत ख़ूबसूरत शुरुआत कि है कहानी कि ...पहली पंक्तियों ने ही बाँध के रख लिया ...भाषा ,शब्द में अच्छा कसाव है...और ये पंक्तियाँ ही ही ही
",यहाँ तो जैसे ही कोई नया चेहरा आया कि सब उसी के आस-पास मंडराने लगेंगे.कोई अपने पास सीट रख रहा है तो कोई कैंटीन लेकर जा रहा है.किसी ने किताबें दीं तो किसी ने नोट्स.उसके निहायत बोदे,चुटकुले पर भी छतफाड़ ठहाके लगाए जा रहें हैं.वैसे यह सब ज्यादा दिन नहीं चलता.जल्द ही अपनी रूचि,अपनी वेबलेंथ के हिसाब से नया चेहरा,अपने हमलायक चेहरे के ग्रुप में शामिल हो जाता है या कर लिया जाता है"

एकदम सटीक लिखी हैं वाकई ऐसा ही होता है बिल्ल्कुल. और स्कूल, कालेज में ही क्या हमारे हमरे ब्लॉग जगत में भी ये छटा देखने को नहीं मिलती क्या :).

sangeeta swarup said...

कहानी और उपन्यास लेखन में महारत हासिल है....बहुत अच्छी शुरुआत की है....पर ये कड़ियाँ बहुत इंतज़ार करवाती हैं....प्रतिदिन इसकी कड़ियों को पोस्ट करती रहो तो पढने का आनंद दुगना हो जायेगा...शुभकामनायें

rashmi ravija said...

हा हा संगीता जी,आपकी ये मासूम सी मांग तो बस..दिल ले गयी.....प्रतिदिन एक कड़ी??... फिर तो एकांतवास में जाना पड़ेगा...थोड़ा इंतज़ार ही कर लीजिये..सब्र का फल थोड़ा ... खट्टा,मीठा होगा :)

डॉ टी एस दराल said...

कहानी की शुरुआत पढ़कर तो कॉलिज के दिनों में पहुँच गए । न जाने कितनी यादें ताज़ा होने लगेंगी ।
दिलचस्प कहानी की अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अच्छा तो ये बात है! आती हूं दोबारा पढने, अभी तो नई पोस्ट देखी तो चली आई.

वाणी गीत said...

आगाज़ ऐसा है तो अंजाम कैसा होगा ...
बहुत ही दिलचस्प शुरुआत ...
अरे भई! जब साथ पढना है तो दोस्त भी तो बनेंगे उसके.इसके लिए इतनी अफरातफरी मचाने की क्या जरूरत है?लेकिन जो परंपरा चली आ रही है सो चली आ रही है....
ये पंक्तियाँ मजेदार हैं ...मुझे चित्रांगदा का ब्लॉग याद आ गया ....:):)

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। अगली कड़ी क इंतज़ार।

वन्दना said...

rashmi ji

bahut hi umda lekhan ..........poori tarah baandh rakha hai kahani ne..........ab agli kadi ka intzaar hai.

राज भाटिय़ा said...

सच मै बहुत खुब सुरत ढंग से आप ने हमे इस कहानी के माध्यम से बांध दिया,ओर एक ही सांस मै सारी कडी पढ ली अगली कडी का इंतजार है

रश्मि प्रभा... said...

still waiting .... aage kya hua

खुशदीप सहगल said...

रश्मि बहना,
प्रोमो इतना शानदार है, फिल्म कितनी बेहतरीन होगी...हो क्यों न, क्रिएटिविटी पहले से है, संवाद सम्मान और मिल गया है...बस अब एंटरटेन्मेंट इंडस्ट्री की ट्रिक्स की थोड़ी और दरकार है...

जय हिंद...

Mahfooz Ali said...

कहानी की शुरुआत बहुत दमदार रही.... शहरी प्रवास के बाद क़स्बा-प्रवास व्यथा .... बिलकुल महसूस की हुई लगी.... कसबे में यह बात तो है..... बर्गर, पिज्जा .....बेशक न मिले..... लेकिन किताबों की दुकान ज़रूर मिलेगी... इस सत्य को भी बहुत सही चित्रित किया है आपने.... शची की आवाज़ सुनकर चौंकना.... एकदम नैचुरल लगा..... मेरे साथ ऐसा अनगिनत बार हो चुका है.... मैं तो कहीं भी जाने से डरता हूँ.... कब कहाँ ...कोई लड़की मिल जाए....जिनके साथ मैंने फ्लर्ट किया .... कहानी बहुत अच्छी जा रही है.... अब आगे का इंतज़ार है.... आपके बाँध कर रखने की कला को नमन....
--
www.lekhnee.blogspot.com


Regards...


Mahfooz..

दीपक 'मशाल' said...

दी.. एक दम बिना किसी बाँध के अविरल सरिता की तरह बहती जा रही थी कविता.. कि अचानक एक क्रमशः नाम का बड़ा ऊंचा बाँध आ गया.. भावों कि नदी उससे टकरा गई.. लगा कि किसी तरह इस बाँध को तोड़ आगे की कहानी जल्दी से जान लूं.. पर सब कुछ इंसान के बस में नहीं होता ना.. :(

रवि धवन said...

क्या शची से हो जाएगा प्रेम और क्या इनको लग जाएगी किसी की नजर? कौन होगा विलेन? कैसे बदली होंगी परिस्थितियां? जीवन में क्या आएगा बदलाव?
ढेर सारे सवाल और जवाब केवल आपके पास।
जल्दी पोस्ट करो ना।

HARI SHARMA said...

रश्मि जी आगाज अच्छा है और पक्का पदा है के आगे और अच्छा और अच्छा होता जायेगा.

Deepak Shukla said...

Hi..
Ye 'KRAMSHAH:' wali kahaniyan ek prakar se pathak ka mansik shoshan karti hain.. Par aage kya hoga ye janne ki utsukta pratyek kahani main har pathak ko bandhe rakhti hai.. Kahani ka agaj achha hai.. Anjam 'RASHMI' jane..

Aapke pratyek aalekh main maine ye anubhav kiya hai ki aap sukshmtam byore ko bhi pathneeya dhang se prastut karti hain..jaise aap likhti hain, 'Dhwast mahal ke kangure chamak uthe the.. Etni der main kitab wala 2-4 grahakon ko dekh sakta tha.. Aur jaisa Shikha ji ne apni tippani main dohraya hai..
Barhal achha likhti hain aap..aise hi likhti rahen aur humen padhne ka mauka deti rahen..

Haalanki Sangita ji ke sujhav main dam hai..rahi baat agyatvas ki to aapne apni kahani main swaym hi likha hai ki jab vyakti ko mansik khurak na mile to uski kaisi halat hoti hai.. To ye mansik khurak ki bhukh aapko kabhi agyatvas main jaane hi na degi..

Mahfooz bhai ki tippani padh kar hansi aa gayi.. Holi ke huddang main Shikha ji ke vyang ne un par kuchh jyada hi asar kar diya lagta hai.. Yun sareaam khud ko shikha ji dwara di gayi upaadhi se nawajna sach main deeda dileri ka kaam hai.. Unke es sahas ko shat shat naman..

Aapki kahani ki agli kadi ki pratiksha main..

DEEPAK SHUKLA..

Deepak Shukla said...

Truti sudhar: Uprokt tippani main 'agyatvas' ke sthan par 'ekantvas' padha jaye..

DEEPAK SHUKLA..

रचना दीक्षित said...

बहुत सुन्दर गति और प्रवाह आगे जानने की उत्कंठा बनी हुई है

निर्मला कपिला said...

आरम्भ बहुत रोचक और प्रवाहमय है आगे देखते हैं --- अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा। धन्यवाद

अभिषेक ओझा said...

'बैक तो कॉलेज' ये फ्लैशबैक तो कमाल का है... आगली पोस्ट कब आ रही है?

dimple said...

apko padna hmesha achha lga hai.aaj ki post padne ke liye pahla bhag padha aj or doosra bhi..sunder prstuti..

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

काफ़ी दिन से आपका ये नोवेल पढना पेन्डिग था.. बस अभी चाय के प्याले के साथ शुरु किया है..
कॉलेज फ़्लैशबैक सच मे जबरदस्त है और अभिषेक अभी तक तो एक अच्छा पात्र दिख रहा है.. देखते है आगे..